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जपजी साहिब (श्री गुरु नानक देव जी - मूल बाणी एवं हिन्दी अनुवाद)

Japji Sahib of Guru Nanak Dev Ji with Hindi Commentary

श्री गुरु नानक देव जी द्वारा

DevanagariHindipublished56 पृष्ठ

दया-भाव रखने से ही सद्गुणों की प्राप्ति होती है। घट-घट में जो चेतन सत्ता प्रकट हो रही है वह नाद बजने के समान है। जिसने सम्पूर्ण सृष्टि को एक सूत्र में बांध रखा है, वही सृजनहार परमात्मा नाथ है, सभी ऋद्धियों-सिद्धियाँ अन्य प्रकार का स्वाद हैं। संयोग व वियोग रूपी नियम दोनों मिलकर इस सृष्टि का कार्य चला रहे हैं, कर्मानुसार ही जीवों को अपने-अपने भाग्य की प्राप्ति होती है। नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ २९ ॥ एका माई जुगत विआई तेन चेले परवाण ॥ इक संसारी इक भंडारी इक लाए दीबाण ॥ जिव तिस भावै तिवै चलावै जिव होवै फुरमाण ॥ ओहो वेखै ओना नदर न आवै बहुता एहो विडाण ॥ आदेस तिसै आदेस ॥ आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥३०॥ एक ब्रह्म की किसी रहस्यमयी युक्ति द्वारा माया की प्रसूति से तीन पुत्र पैदा हुए। इन में से एक ब्रह्मा सृष्टि रचयिता, एक विष्णु संसार का पोषक, और एक शिव संहारक के रूप में दरबार लगाकर बैठ 44 | P a g e sikhizm.com

५. पौड़ी ३१-३८: ज्ञान, सरम, करम व सच खण्ड तथा श्लोक

गया। जिस तरह उस अकाल पुरुष को भला लगता है उसी तरह वह इन तीनों को चलाता है और जैसा उसका आदेश होता है वैसा ही कार्य ये देव करते हैं। वह अकाल पुरुष तो इन तीनों को आदि व अन्त समय में देख रहा है किंतु इनको वह अदृश्य स्वरूप निरंकार नज़र नहीं आता, यह अत्याश्चर्यजनक बात है। नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ ३०॥

आसण लोए लोए भंडार ॥ जो किछ पाया सु एका वार ॥ कर कर वेखै सिरजणहार ॥ नानक सचे की साची कार ॥ आदेस तिसै आदेस ॥ आद अनील अनाद अनाहत जुग जुग एको वेस ॥३१॥

उसका आसन प्रत्येक लोक में है तथा प्रत्येक लोक में उसका भण्डार है। उस परमात्मा ने सभी भण्डारों को एक ही बार परिपूर्ण कर दिया है। वह सृजनहार रचना कर करके सृष्टि को देख रहा है। हे नानक ! उस सत्यस्वरूप निरंकार की सम्पूर्ण रचना भी सत्य है।

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है। जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ ३१॥ इक दू जीभौ लख होहे लख होवह लख वीस ॥ लख लख गेड़ा आखीअह एक नाम जगदीस ॥ एत राहे पत पवड़ीआ चड़ीऐ होए इकीस ॥ सुण गला आकास की कीटा आई रीस ॥ नानक नदरी पाईऐ कूड़ी कूड़ै ठीस ॥३२॥ एक जिव्हा से लाख जिव्हा हो जाएँ, फिर लाख से बीस लाख हो जाएँ। फिर एक-एक जिव्हा से लाख-लाख बार उस जगदीश्वर का एक नाम उच्चारण करें, अर्थात् निशदिन उस प्रभु का नाम सिमरन किया जाए। इस मार्ग से पति-परमेश्वर को मिलने हेतु बनी नाम रूपी सीढ़ियों पर चढ़ कर ही उस अद्वितीय प्रभु से मिलन हो सकता है। वैसे तो ब्रह्म-ज्ञानियों की बड़ी-बड़ी बातें सुनकर निकृष्ट जीव भी देहाभिमान में अनुकरण करने की इच्छा रखते हैं। परंतु गुरु नानक जी कहते हैं कि उस परमात्मा की प्राप्ति तो उसकी कृपा से ही होती है, वरन् ये तो मिथ्या लोगों की मिथ्या ही बातें है ॥ ३२ ॥ 46 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM आखण जोर चुपै नह जोर ॥ जोर न मंगण देण न जोर ॥ जोर न जीवण मरण नह जोर ॥ जोर न राज माल मन सोर ॥ जोर न सुरती ज्ञान वीचार ॥ जोर न जुगती छुटै संसार ॥ जिस हथ जोर कर वेखै सोए ॥ नानक उतम नीच न कोए ॥३३॥ अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि के बिना इस जीव में कुछ भी कहने व चुप रहने की शक्ति नहीं है अर्थात् रसना को चला पाना जीव के वश में नहीं है। माँगने की भी इसमें ताकत नहीं है और न ही कुछ देने की समर्था है। यदि जीव चाहे कि मैं जीवित रहूँ तो भी इसमें बल नहीं है, क्योंकि कई बार मनुष्य उपचाराधीन ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, मरना भी उसके वश में नहीं है। धन, सम्पत्ति व वैभव प्राप्त करने में भी इस जीव का कोई बल है, जिन के लिए मन में जो जुनून होता है। श्रुति वेदों के ज्ञान का विचार करने का भी इसमें बल नहीं है। संसार से मुक्त होने की षट्-शास्त्रों में दी गई युक्तियाँ धारण कर लेने की शक्ति भी इसमें नहीं है। जिस अकाल 47 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM पुरुष के हाथ में ताकत है वही रचना करके देख रहा है। गुरु नानक जी कहते हैं कि फिर तो यही जानना चाहिए कि इस संसार में न कोई स्वेच्छा से नीच है, न उत्तम है, वह प्रभु जिस को कर्मानुसार जैसा रखता है वैसा ही वह रहता है॥ ३३॥ राती रुती थिती वार ॥ पवण पाणी अगनी पाताल ॥ तिस विच धरती थाप रखी धरम साल ॥ तिस विच जीअ जुगत के रंग ॥ तिन के नाम अनेक अनंत ॥ करमी करमी होए वीचार ॥ सचा आप सचा दरबार ॥ तिथै सोहन पंच परवाण ॥ नदरी करम पवै नीसाण ॥ कच पकाई ओथै पाए ॥ नानक गया जापै जाए ॥३४॥ रात्रियों, ऋतुओं, तिथियों, सप्ताह के वारों, वायु, जल, अग्नि व पाताल आदि यावत प्रपंच हैं। स्रष्टा प्रभु ने उस में पृथ्वी रूपी धर्मशाला स्थापित करके रखी हुई है, इसी को कर्मभूमि कहते हैं। 48 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM उस धर्मशाला में नाना प्रकार के जीव हैं, जिनकी अनेक भांति की धर्म-कर्म की उपासना की युक्ति है और उनके श्वेत-श्यामादि अनेक प्रकार के वर्ण हैं। उनके अनेक प्रकार के अनंत नाम हैं। संसार में विचरण कर रहे उन अनेकानेक जीवों को अपने शुभाशुभ कर्मों के अनुसार ही उन पर विचार किया जाता है। विचार करने वाला वह निरंकार स्वयं भी सत्य है और उसका दरबार भी सत्य है। वही उसके दरबार में शोभायमान होते हैं जो प्रामाणिक संत हैं, जिनके माथे पर कृपालु परमात्मा की कृपा का चिन्ह अंकित होता है। प्रभु के दरबार में कच्चे-पक्के होने का परीक्षण होता है। हे नानक ! इस तथ्य का निर्णय वहाँ जाकर ही होता है॥ ३४ ॥ धरम खंड का एहो धरम ॥ ज्ञान खंड का आखहो करम ॥ केते पवण पाणी वैसंतर केते कान्ह महेस ॥ केते बरमे घाड़त घड़ीअह रूप रंग के वेस ॥ केतीआ करम भूमी मेर केते केते धू उपदेस ॥ केते इंद चंद सूर केते केते मंडल देस ॥ केते सिध बुध नाथ केते केते देवी वेस ॥ केते देव दानव मुन केते केते रतन समुंद ॥ केतीआ खाणी केतीआ बाणी केते पात नरिंद ॥ केतीआ सुरती सेवक केते नानक अंत न अंत ॥३५॥ 49 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM (कर्मकाण्ड में) धर्मखण्ड का यही नियम है; जो पूर्व पंक्तियों में कथन किया गया है। (गुरु नानक जी) अब ज्ञान खण्ड का व्यवहार वर्णन करते हैं। (इस संसार में) कितने प्रकार के पवन, जल, अग्नि हैं, और कितने ही रूप कृष्ण व रुद्र (शिव) के हैं। कितने ही ब्रह्मा इस सृष्टि में अनेकानेक रूप-रंगों के भेष में जीव पैदा करते हैं। कितनी ही कर्म भूमियों, सुमेर पर्वत, धुव भक्त व उनके उपदेष्टा हैं। इन्द्र व चंद्रमा भी कितने हैं, कितने ही सूर्य, कितने ही मण्डल व मण्डलांतर्गत देश हैं। कितने ही सिद्ध, विद्वान व नाथ हैं, कितने ही देवियों के स्वरूप हैं। कितने ही देव, दैत्य व मुनि हैं और रत्नों से भरपूर कितने ही समुद्र हैं। कितने ही उत्पत्ति के स्रोत हैं (अण्डज-जरायुजादि), कितनी प्रकार की वाणी है (परा, पश्यन्ती आदि) कितने ही बादशाह हैं और कितने ही राजा हैं। कितनी ही वेद-श्रुतियाँ हैं, उनके सेवक भी कितने ही हैं, गुरु नानक जी कहते हैं कि उसकी रचना का कोई अन्त नहीं है; इन सबके अन्त का बोध ज्ञान-खण्ड में जाने से होता है, जहाँ पर जीव ज्ञानयान हो जाता है॥ ३५ ॥ ज्ञान खंड मह ज्ञान परचंड ॥ तिथै नाद बिनोद कोड अनंद ॥ 50 | P a g e sikhizm.com

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सरम खंड की बाणी रूप ॥ तिथै घाड़त घड़ीऐ बहुत अनूप ॥ ता कीआ गला कथीआ ना जाहे ॥ जे को कहै पिछै पछुताए ॥ तिथै घड़ीऐ सुरत मत मन बुध ॥ तिथै घड़ीऐ सुरा सिधा की सुध ॥३६॥

ज्ञान खण्ड में जो ज्ञान कथन किया है वह प्रबल है। इस खण्ड में रागमयी, प्रसन्नतापूर्ण व कौतुकी आनंद विद्यमान है।(श्रम खंड में परमेश्वर की भक्ति को प्रमुख माना गया है) परमेश्वर की भक्ति करने का उद्यम करने वाले संतजनों की वाणी मधुर है। वहाँ (श्रम खण्ड में) पर अद्वितीय सुन्दरता वाले स्वरूप की गढ़न की जाती है। उनकी बातों का कथन नहीं किया जा सकता। यदि कोई उनकी महिमा कथन करने की चेष्टा करता भी है तो उसे बाद में पछताना पड़ता है। वहाँ पर वेद-श्रुति, ज्ञान, मन और बुद्धि गढ़े जाते हैं। वहाँ पर दिव्य बुद्धि वाले देवों व सिद्ध अवस्था की प्राप्ति वाली सूझ गढ़ी जाती है॥ ३६॥

करम खंड की बाणी जोर ॥ तिथै होर न कोई होर ॥

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तिथै जोध महाबल सूर ॥ तिन मह राम रहिआ भरपूर ॥ तिथै सीतो सीता महिमा माहे ॥ ता के रूप न कथने जाहे ॥ ना ओह मरह न ठागे जाहे ॥ जिन कै राम वसै मन माहे ॥ तिथै भगत वसह के लोअ ॥ करह अनंद सचा मन सोए ॥ सच खंड वसै निरंकार ॥ कर कर वेखै नदर निहाल ॥ तिथै खंड मंडल वरभंड ॥ जे को कथै त अंत न अंत ॥ तिथै लोअ लोअ आकार ॥ जिव जिव हुकम तिवै तिव कार ॥ वेखै विगसै कर वीचार ॥ नानक कथना करड़ा सार ॥३७॥ जिन उपासकों पर परमेश्वर की कृपा हुई उनकी वाणी शक्तिवान हो जाती है। जहाँ पर ये उपासक विद्यमान होते हैं वहाँ पर कोई और नहीं होता। उन उपासकों में देह को जीतने वाले योद्धा, इन्द्रियों को

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM जीतने वाले महाबली तथा मन को जीतने वाले शूरवीर होते हैं। उन में प्रभु राम परिपूर्ण रहते हैं। उन निर्गुण स्वरूप राम के साथ महिमा रूपी सीता चन्द्रमा समान प्रकाशमान व मन को शीतल करने वाली है। ऐसा स्वरूप प्राप्त करने वालों के गुण कथन नहीं किए जा सकते। वे उपासक न तो मरते हैं और न ही ठगे जाते हैं, जिनके हृदय में परमात्मा राम का स्वरूप विद्यमान होता है। वहाँ कई लोकों के भक्त निवास करते हैं। जिनके हृदय में सत्यस्वरूप निरंकार वास करता है, वे आनंद प्राप्त करते हैं। सत्य धारण करने वालों के हृदय (सचखण्ड) में वह निरंकार निवास करता है; अर्थात् वैकुण्ठ लोक, जहाँ सद्गुणी व्यक्तियों का वास हैं, में वह सर्गुण स्वरूप परमात्मा रहता है। यह सृजनहार परमात्मा अपनी सृजना को रच-रचकर कृपा-दृष्टि से देखता है अर्थात् उसका पोषण करता है। उस सचखण्ड में अनन्त ही खण्ड, मण्डल व ब्रह्माण्ड है। यदि कोई उसके अन्त को कथन करे तो अन्त नहीं पा सकता, क्योंकि वह असीम है। वहाँ अनेकानेक लोक विद्यमान है और उनमें रहने वालों के अस्तित्व भी अनेक हैं। फिर जिस तरह वह सर्वशक्तिमान परमात्मा आदेश करता है उसी तरह वे कार्य करते हैं। अपने इस रचे हुए प्रपंच को देख कर व शुभाशुभ कर्मों को विचार कर वह प्रसन्न होता है। गुरु नानक जी कहते हैं कि उस 53 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM निरंकार के मूल-तत्व का जो मैंने उल्लेख किया है उसे कथन करना अत्यंत कठिन है॥ ३७॥ जत पाहारा धीरज सुनिआर ॥ अहरण मत वेद हथीआर ॥ भओ खला अगन तप ताओ ॥ भांडा भाओ अमृत तित ढाल ॥ घड़ीऐ सबद सची टकसाल ॥ जिन कओ नदर करम तिन कार ॥ नानक नदरी नदर निहाल ॥३८॥ इंद्रिय-निग्रह रूपी भट्ठी हो, संयम रूपी सुनार हो। अचल बुद्धि रूपी अहरन हो, गुरु ज्ञान रूपी हथौड़ा हो। निरंकार के भय को धौंकनी तथा तपोमय जीवन को अग्नि ताप बनाओ। हृदय - प्रेम को बर्तन बनाकर उसमें नाम - अमृत को गलाया जाए। इसी सच्ची टकसाल में नैतिक जीवन को गढ़ा जाता है। अर्थात्-ऐसी टकसाल से ही सद् गुणी जीवन बनाया जा सकता है। जिन पर अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि होती है, उन्हीं को ये कार्य करने को मिलते हैं। हे नानक ! ऐसे सद् गुणी जीव उस कृपासागर परमात्मा की कृपा-दृष्टि के कारण कृतार्थ होते हैं। ॥ ३८ ॥ 54 | P a g e sikhizm.com

JAPJI SAHIB HINDI SIKHIZM.COM सलोक ॥ पवण गुरू पाणी पिता माता धरत महत ॥ दिवस रात दुए दाई दाया खेलै सगल जगत ॥ चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरम हदूर ॥ करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूर ॥ जिनी नाम धिआया गए मसकत घाल ॥ नानक ते मुख उजले केती छुटी नाल ॥१॥ सलोक ॥ समस्त सृष्टि का गुरु पवन है, पानी पिता है, और पृथ्वी बड़ी माता है। दिन और रात दोनों धाय एवं धीया (बच्चों को खिलाने वाले) के समान हैं तथा सम्पूर्ण जगत् इन दोनों की गोद में खेल रहा है। शुभ व अशुभ कर्मों का विवेचन उस अकाल-पुरुष के दरबार में होगा। अपने शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप ही जीव परमात्मा के निकट अथवा दूर होता है। जिन्होंने प्रभु का नाम- सुमिरन किया है, वे जप-तप आदि की गई मेहनत को सफल कर गए हैं। गुरु नानक देव जी कथन करते हैं कि ऐसे सद्प्राणियों के मुख उज्ज्वल हुए हैं और कितने ही जीव उनके साथ, अर्थात् उनका अनुसरण करके, आवागमन के चक्र से मुक्त हो गए हैं॥ १॥ 55 | Page sikhizm.com