जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
क. वर्तमान कथा
पलासी ] ३६६ क. वर्तमान कथा वह शास्त्रार्थ करने के उद्देश्य से सारे जम्बूद्वीप मे घूमा। कोई शास्त्रार्थ करने वाला न मिला। घूमता घूमता वह श्रावस्ती पहुँचा। यहाँ जाकर लोगो से पूछा कि मेरे साथ कोई शास्त्रार्थ कर सकता है? मनुष्यो ने इस प्रकार बुद्ध गुणों की प्रशसा की—तेरे जैसे हजार हो तो उनके साथ भी शास्त्रार्थ कर सकने वाले, सर्वज्ञ, मनुष्यो म श्रेष्ठ, धर्मेश्वर, दूसरे वादो को जीतने वाले महान् गौतम हैं। सारे जम्बूद्वीप मे भी उत्पन्न हुआ विरोधी मत उन भगवान् को नही छूरा सकता। सभी मत उनके चरणो मे आने पर इस प्रकार चूर्ण विचूर्ण हो जाते है जैसे लहरे किनारे पर पहुँच कर।” परिव्राजक ने पूछा—इस समय वह कहाँ है? उत्तर मिला—जेतवन म। उसने सोचा—अब उसके साथ शास्त्रार्थ करूँगा। बहुत से आदमियो के साथ उसने जेतवन जाते समय, नो करोड खर्चे से जेत राजकुमार द्वारा बनाया हुआ जेतवन-द्वार देखा। उसने पूछा—यही श्रमण गौतम के रहने के प्रासाद हैं ? "यह तो ड्योढी है।" "यदि ड्योढी ऐसी है तो निवासस्थान कैसा होगा ?" "गन्धकुटी तो असीम है।" उसने सोचा ऐसे श्रमण से कौन शास्त्रार्थ करेगा! यह वही से भाग गया। शोर मचाते हुए कुछ मनष्यो ने जेतवन मे प्रवेश किया। शास्ता ने पूछा— क्यो असमय आए ? उन्होने वह समाचार कहा। शास्ता ने कहा—उपासको। केवल अभी नही, यह पहले भी मेरे निवासस्थान की ड्योढी को ही देख कर भाग गया था। उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल म गन्धार राष्ट्र म तक्षशिला में बोधिसत्त्व राज्य करते थे। वाराणसी म था ब्रह्मदत्त। उसने तक्षशिला पर अधिकार करने की इच्छा से बडी सेना के साथ जाकर, नगर के समीप पहुँच, सेना को यह आज्ञा देते हुए
कि 'इस तरह से हाथियों को भेजो, इस तरह से घोड़े, इस तरह से रथ, इस तरह से पैदल, इस तरह दौड़ कर शस्त्रो से प्रहार करो तथा इस प्रकार बादलो की घनी वर्षा की तरह बाणो की वर्षा बरसाओ' ये दो गाथाएँ कही— गजगमेघेहि हयग्गमालिहि रयूमिलातेहि सराभिवस्सहि; थरुग्गहावट्टदळ्हप्पहारिहि परिवारिता तक्कसिला समन्ततो ॥ अभिधावया च पतया च विविधविनदिता च दन्तिहि; वत्ततज्ज तुमुलो घोसो यथा विज्जुता जलधरस्स गज्जतो ॥ [ श्रेष्ठ हाथियो रूप बादलो से, उत्तम घोड़ो की पक्तियो से, रथो की लहरो से, शरो की वर्षा से, तलवार धारी चारो ओर प्रहार करने वालो से तक्षशिला को चारो ओर से घेर लो । दौडो, उदलो तथा नाना प्रकार के नाद करने वाले हाथियो द्वारा आज तुमुल घोष करो, जैसे बिजली गर्जना करने वाले मेघो के साथ उछलती कदती है।] गजगमेघेहि श्रेष्ठ हाथियो रूप मेघो के द्वारा । क्रौञ्चनाद गर्जना करने वाले, मस्त हाथियो रूप बादलो द्वारा, यही अर्थ है। हयग्गमालिहि श्रेष्ठ घोडो की पंक्ति द्वारा। श्रेष्ठ घोडो की पंक्ति के समूह के द्वारा, अश्वो की सेना के द्वारा, यही अर्थ है। रयूमिलातेहि लहरो के वेग वाले, सागर के जल की तरह रथो की लहरो वाले—रथसेना यही मतलब है। सराभिवस्सहि उन रथ-सेनाओ से मूसलधार बरसने वाले मेघ की तरह तीरो की वर्षा बर- साते हुए। थरुग्गहावट्टदळ्हप्पहारिहि इधर उधर से घूम कर दृढ प्रहार करने वालो से, तलवार के दस्ते पकड़े हुए, पैदल योद्धाओ से । परिवारिता तक्कसिला समन्ततो, जिस प्रकार यह तक्षशिला चारों ओर से घिर जाए, वैसा करो ।
दुतियपलासी ] ४०१
अभिधावथा च पतथा च जल्दी से दौड़ो तथा कूदो। विविध विनन्दिता च दन्तिहि धेष्ठ हाथियो के साथ नाना प्रकार से शोर मचाने वाले होओ। सीटी बजाने, गरजने, बाजे बजाने आदि के नाना प्रकार के शब्द करो। धत्तत्तज्ज तुमलो घोसो आज़ बिजली के सदृश महान् घोष हो। यथा विज्जुता जलधरस्स गज्जतो जैसे गरजते हुए बादल के मुंह से निकली हुई बिजलियाँ विचरण करती हैं, उसी प्रकार विचरते हुए, नगर को चारो ओर से घेर कर, राज्य छीन लो,' यही अभिप्राय है।
वह राजा गरज कर सेना को आज्ञा दे नगर-द्वार के समीप गया। वहाँ ड्योढी को देख कर उसने पूछा कि क्या यह राजा के रहने का स्थान है ? यह 'ड्योढी है' सुन उसने सोचा—जब ड्योढी ऐसी है तो राजा का निवास- स्थान कैसा होगा ? उत्तर मिला—वैजयन्त-प्रासाद जैसा। इस प्रकार के ऐश्वर्यशाली राजा के साथ युद्ध न कर सकूँगा, सोच ड्योढी देख कर ही रुक, भाग कर वाराणसी चला आया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वारा- णसी राजा पलासी परिव्राजक था। तक्षशिला-राजा तो मैं ही था।
२३०. दुतियपलासी जातक
"धजमपरिमितं ...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय, एक पलासी परिव्राजक के ही बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
इस कथा में वह परिव्राजक जेतवन में दाखिल हुआ। उस समय जन- समूह से घिरे हुए, अलंकृत धर्मासन पर बैठे हुए, शास्ता मनोशिलातल पर २६
भी भागा है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—।
४०२ [ २८-१३०
सिंहनाद करते हुए, सिंह-पञ्जरे के समान धर्म्म-देशना कर रहे थे। परिव्राजक दशबलधारी के ब्रह्म-शरीर जैसे रूप, पूर्ण चन्द्र जैसी शोभा वाले मुंह तथा स्वर्णपट जैसे ललाट को देख कर, 'इस प्रकार के उत्तम पुरुष को कौन जीत सकेगा ?' सोच रुका और दूसरी मण्डली में घुसकर भाग गया। जनता ने उसका पीछा कर, पकड़, शास्ता से यह वृत्तान्त कहा। शास्ता बोले—"न केवल अभी यह परिव्राजक मेरे स्वर्ण-वर्ण मुख को देख कर भाग गया है, यह पहले भी भागा है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बोधिसत्त्व वाराणशी में राज्य करते थे। तक्षशिला में एक गन्धार राजा था। उसने वाराणशी जीतने की इच्छा से चतुरङ्गिनी सेना के साथ आकर, नगर घेर लिया। फिर नगर-द्वार पर खड़े हो अपनी सेना को देखते हुए, 'इतनी सेना को कौन जीत सकेगा' सोच अपनी सेना की प्रशंसा करते हुए पहली गाथा कही—
धजमपरिमित अनन्तपारं दुप्पसह धङ्केहि सागरमिव; गिरिमिव अनिलेन दुप्पसहो दुप्पसहो अह्मज्ज तादिसेन ॥
[ मेरी असीम ध्वजाएँ हैं, अनन्त सेना है। जिस प्रकार कौवों के द्वारा सागर दुर्लङ्घ्य होता है (अथवा) हवा के द्वारा पर्वत दुर्जेय होता है, उसी प्रकार मैं आज वैसे शत्रु द्वारा दुर्जेय हूँ।]
धजमपरिमित यह मेरे रथ में मोरपङ्खों में लगाकर ऊंची की हुई ध्वजाएँ अपरिमित हैं, बहुत हैं, सैकड़ो हैं। अनन्तपारं मेरी सेना भी, इतने हाथी हैं तथा इतने घोडे हैं इस प्रकार गिनी नहीं जा सकती। दुप्पसह शत्रुओ द्वारा जीती नहीं जा सकती। जैसे क्या ? धङ्केहि सागरमिव जैसे सागर बहुत कौवा द्वारा भी अतिक्रमण नही किया जा सकता, उसी प्रकार दुर्धर्ष। गिरिमिव अनिलेन दुप्पसहो यह मेरी सेना, दूसरी सेना
दुतियपलासी ] ४०३ के सामने उसी तरह स्थिर रहती है जैसे हवा के सामने पर्वत। दुप्पसहो अह्ममज्ज तादिसेन इस सेना के साथ में आज वैसे (शत्रु) से दुर्जेय हूँ। महल पर खडे योधिसत्त्व के बारे मे कहता है। उसने उसे अपना पूर्ण चन्द्र की सी शोभा वाला मुख दिखला कर धम- काया—मूर्ख, बकवास मत कर, जिस प्रकार मस्त हाथी सरकण्डे के वन को नष्ट कर देता है उसी प्रकार अभी तेरी सेना को विध्वंस करूँगा। और दूसरी गाथा कही— मा बालियं विप्पल्लपि न हिस्स तादिसं विळम्हसे नहि लभसे निसेधकं; आसज्जसि गजमिव एकचारिनं यो तं पदा नळमिव पोथयिस्सति ॥ [ मूर्खता की बात मत बक । ऐसा नही हो सकता; 'मुझे रोकने वाला नही मिलेगा' सोच उछलता है। तू एकचारी हाथी के सामने आया है जो तुझे वैसे ही पांव से कुचल देगा जैसे सरकण्डे को ।] मा बालियं विप्पलपि अपनी मूर्खता मत बक। न हिस्स तादिसं अथवा न हिस्स तादिसो पाठ है। मेरी सेना अनन्त है, इस प्रकार विचार कर राज्य जीत सकने वाला तेरे जैसा न होवे या नही होता है। विळम्हसे तू केवल राग, द्वेष, मोह तथा मान से जलकर उबल रहा है। नहिलभसे निसेधक मेरे जैसे को जीत कर फिर और रुकावट डालने वाला तुझे न मिलेगा। जिस रास्ते से तू आया है उसीसे भगाऊँगा। आसज्जसि प्राप्त हुआ है। गजमिव एकचारिनं एकचारी मस्त हाथी की तरह। यो तं पदा नळमिव पोथयिस्सति जो तुझे उसी तरह कुचल देगा जिस तरह मस्त हाथी पाँवो से सरकण्डे को कुचलता है, अच्छी तरह पीस डालता है। तू उसे प्राप्त हुआ, यह अपने बारे मे कहा।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गन्धार
४०४ [ २८२३० इस प्रकार घबराते हुए का कहना सुन, गन्धार राजा उसके सर्वाङ्ग सङ्गुष्ट महा ललाट को देख, भयभीत हो, डर, भागकर अपने नगर ही चला गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गन्धार राजा पलासी परिव्राजक था। वाराणसी राजा तो मैं ही था।
२३१. उपाहन जातक
दूसरा परिच्छेद ६. उपाहन वर्ग २३१. उपाहन जातक "यथापि फीता " यह शास्ता ने वेळुवन म रहने समय, देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा धर्मसभा में भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—आयुष्मान् ! देवदत्त आचार्य्य को छोड़, तथागत का विरोधी शत्रु बन विनाश को प्राप्त हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' । शास्ता न, 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त आचार्य्य को त्याग, मेरा विरोधी बन महाविनाश को प्राप्त हुआ, वह पहले भी हुआ है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व हथवानों के कुल में पैदा हो, बड़े होने पर हस्ति शिल्प में पारङ्गत हो गए। काशी के एक गामडे के माणवक ने आकर उनसे विद्या सीखी। बोधिसत्व शिल्प सिखाते हुए आचार्य्य-मुट्ठी¹ नहीं रखते। जो जो जानते हैं, वह सब सिखा देते हैं। उस माणवक ने बोधिसत्व की सारी विद्या सीख चुकने पर
¹विद्या को छिपा कर रखना।
४०६ [ २.६.२३१ कहा- आचार्य ! अब में राजाओ की सेवा में रहूँगा। बोधिसत्व ने 'तात' अच्छा' यह महाराजा से कहा- "महाराज ! मेरा शिष्य आपकी सेवा में रहना चाहता है।" 'अच्छा ! रहे।' 'तो उसका वेतन कह दे।' 'आपका शिष्य आपके बराबर नहीं पा सकता। आपको सौ मिलने पर उसे पचास मिलेंगे, दो (सौ) मिलने पर एक (सौ) ।" उसने घर जाकर शिष्य से कहा। शिष्य बोला- "आचार्य ! मैं आपके बराबर शिल्प जानता हूँ। यदि जितना आप पाते हैं उतना ही वेतन मिलेगा तो राजा की सेवा में रहूँगा, नहीं तो नहीं रहूँगा।" बोधिसत्त्व ने यह वृत्तान्त राजा से कहा। राजा बोला- यदि वह तुम्हारे जितना शिल्प जानता है तो तुम्हारे बराबर शिल्प दिखा सकने पर उसे तुम्हारे बराबर मिलेगा। बोधिसत्व ने अपने शिष्य से यह बात कही। उसने कहा 'अच्छा, मैं दिखाऊँगा।' बोधिसत्त्व ने राजा से कहा। राजा बोला, तो कल शिल्प दिखा। शिष्य ने कहा- दिखाऊँगा, नगर में मुनादी करा दे। राजा ने मुनादी करा दी कि कल आचार्य और उनका शिष्य हस्ति- शिल्प दिखाएँगे। जो देखना चाहे वे राजाङ्गण में इकट्ठे होकर देख। आचार्य ने यह सोच कि मेरा शिष्य उपाय-कुशल नहीं है एक हाथी ले उसे एक ही रात में 'उलटी बात' सिखाई- चल कहने पर पीछे हटना, पीछे हटो कहने पर चलना, खड़ा हो कहने पर लेटना, लेट कहने पर खड़ा होना, पकड़ कहने पर रखना तथा रख कहने पर पकड़ना। इस प्रकार सिखा, अगले दिन वह उस हाथी पर चढ राजदरबार मे पहुँचा। शिष्य भी एक सुन्दर हाथी पर चढ़ा। जनता इकट्ठी हुई। दोनो ने बराबर शिल्प दिखाया। बोधिसत्त्व ने अपने हाथी से (हाथी) बदल लिया। वह चल कहने पर पीछे हटा। पीछे हट कहने पर आगे दौड़ा। खड़ा हो कहने पर लेट गया। लेट कहने पर खड़ा हुआ। (उसने) पकड़ कहने पर रख दिया। रख कहने पर पकड़ा। जनता बोली- अरे दुष्ट शिष्य ! तू आचार्य के साथ झगड़ा करता है। अपनी सामर्थ्य नहीं जानता। समझता है कि मैं आचार्य के बराबर जानता हूँ। फिर जनता ने उसे ढेले और डण्डो की मार से वहीं मार डाला।
उपाहन ] ४०७ बोधिसत्त्व ने हाथी से उतर राजा के पास जाकर कहा—महाराज ! विद्या अपने को गुणी बनाने के लिए सीखी जाती है। लेकिन किसी किसी के लिए शिल्प विनाश का कारण होता है जैसे ठीक से न बनाया हुआ जूता । इतना कह यह दो गाथाएँ कहीं— यथापि कीता पुरिसस्सुपाहना सुखस्स अत्थाय दुखं उदव्वहे; घम्माभितत्ता तलसा पपीळिता तस्सेव पादे पुरिसस्स खादरे ॥ एवमेव यो दुक्कुलीनो अनरियो तम्हारविज्जञ्च सुतञ्च मादिय; तमेव सो तस्स सुतेन खादति अनरियो वुच्चति पानदूपमो ॥ [ जिस प्रकार सुख के लिए खरीदे गए जूते गर्मी से तप्त होकर तथा पाद- तल से पीडित होकर उसी आदमी के पैर को काट खाते हैं, उसी प्रकार जो नीचकुल या अनार्य्य होता है वह जिस (आचार्य्य) से विद्या तथा श्रुत ग्रहण करता है उसी को वह अपने ज्ञान (श्रुत) से खाता है। अनार्य्य आदमी खराब जूते के समान समझा जाता है।] उदव्वहे, कष्ट दे। घम्माभितत्ता तलसा पपीळिता घाम से अभितप्त और पैर के तलुवे से पीडित । तस्सेव जिसने वह खराब जूते सुख की आशा से खरीद कर पाँव में डाले उसीके । खादरे जखम करते हैं या पाँव खाते हैं। दुक्कुलीनो खराब जाति का, कुलहीन पुत्र । अनरियो लज्जा-भय रहित असत्पुरुष। तम्हाफविज्जञ्च सुतञ्च मादिय उस उसको सिखाता है इसलिए तमावो की जगह तम्हावो। मतलब है उस उसको हुनर का अभ्यास कराता है, उसमें लगाता है । आचार्य्य ही इसका अर्थ है, इसलिए तम्हारा। गाथा-बन्धन को सरल करने के लिए ह्रस्व किया गया है। विज्जं, अठारह विद्याओ म से कोई । सुतं जो कुछ श्रुतशास्त्र । आदिय, लेकर। तमेव सो
अट्टकथा¹ मे तेनेव सो तस्स सुतेन खादति भी पाठ है। उसका भी 'वह वहाँ
४०८ [ २.६-२३२ तस्स सुतेन खादति अपने ही आपको वह अर्थात् जो दुष्टकुल का अनार्य्य आचार्य्य से विद्या और ज्ञान ग्रहण करता है वह वहाँ ज्ञान से खाता है अर्थात् उसके पास से श्रुतज्ञान से वह अपने को ही नष्ट करता है। अट्टकथा¹ मे तेनेव सो तस्स सुतेन खादति भी पाठ है। उसका भी 'वह वहाँ ज्ञान से अपने को खाता है' ही अर्थ है। अनरियो वुच्चति पानदूपमो अनार्य्य (आदमी) खराब जूते जैसा कहा जाता है। जिस प्रकार खराब जूते आदमी को खाते है, उसी प्रकार यह ज्ञान से खाता है तो अपने आप अपने को ही खाता है। अथवा जूते से जख्मी पानदू । जूते से पीड़ित, जूते से खाए गए पैर से मतलब है। इसलिए अपने आपको जो ज्ञान से हानि पहुँचाता है, वह उस ज्ञान से खाया जाने के कारण अनार्य्य कहलाता है। पानदूपमो का यही अर्थ है कि जूते से पीड़ित पाँव की तरह। राजा ने सन्तुष्ट हो बोधिसत्त्व को महान् सम्पत्ति दी। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिष्य देवदत्त था। आचार्य्य तो मै ही था। २३२. वीणथूण जातक एकचिन्तितोय अयमत्यो . .यह शास्ता ने जेतवन में विचरते समय एक कुमारी के बारे में कही। ¹ पुरानी सिंहल अट्ठकथा।
क. वर्तमान कथा
थीणपूण ] ४०६ क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती के एक सेठ की लड़की थी। उसने अपने घर में वृषभराज का सत्कार होते देख दाई से पूछा- माँ, यह कौन है जिसका इस प्रकार सत्कार होता है ? "बेटी, यह वृषभराज है।" एक दिन उस लड़की ने प्रासाद पर खड़े होकर गली में एक कुबड़े को देखा। उसने सोचा-बैलों में जो ज्येष्ठ होता है उसकी पीठ पर एक ककुध होता है, मनुष्यों में जो बड़ा हो उसकी पीठ पर भी होना चाहिए। यह मनुष्यों में वृषभ-राज होगा। मुझे इसकी चरणसेविका बनना चाहिए। उसने दासी को भेजकर उसे कहलवाया कि सेठ की लड़की तेरे साथ जाना चाहती है। तू अमुक स्थान पर जाकर ठहर। वह कीमती चीजें ले, भेष बदल, महल से उतर उसके साथ भाग गई। आगे चलकर यह बात नगर में और भिक्षुसङ्घ में प्रकट हो गई। धर्मसभा में भिक्षुओं ने बात चलाई-आयुष्मानो ! अमुक सेठ-लड़की कुबड़े के साथ भाग गई। शास्ता ने आकर पूछा- भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा- भिक्षुओ, न केवल अभी यह कुबड़े को चाहती है, इसने पहले भी कुबड़े की ही इच्छा की है। इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने एक निगम-ग्राम में सेठ के कुल में पैदा हो, गृहस्थी बसाते हुए, पुत्र-पुत्री के साथ बढ़ते हुए अपने पुत्र के लिए वाराणसी-सेठ की लड़की पक्की कर दिन का निश्चय किया। सेठ की लड़की ने अपने घर पर वृषभ का सत्कार-सम्मान होते देख दाई से पूछा- यह कौन है ? उसने कहा- यह वृषभ है। तब सेठ की लड़की ने गली में जाते हुए एक कुबड़े को देखकर समझा कि यह पुरुषों में वृषभ होगा। उसने कीमती सामान लिया और उसके साथ भाग गई।
४१० [ २६.२३२
बोधिसत्त्व भी सेठ की लडकी को घर लाने की इच्छा से बडी बारात के साथ बाराणसी जाते हुए उसी रास्ते पर हो लिए। वे दोनो सारी रात रास्ता चलते रहे। रात भर सर्दी खाने के कारण अरुणोदय होने पर कुबडे के शरीर का वायु कुपित हो गया। बडी पीडा होने लगी। वह रास्ते से हट, पीडा से बेहोश होने के कारण वीणा के दण्डे की तरह मुडकर पड रहा। सेठ की लडकी भी उसके चरणो म बैठ रही। बोधिसत्त्व ने सेठ की लडकी को कुबडे के चरणो में बैठे देख, पहचान कर, पास आ, सेठ की लडकी से वार्तालाप करते हुए पहली गाथा कही—
एकचिन्तितोय अयमत्थो बालो अपरिनायको, नहि खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि ॥
[ यह (कुबडे के साथ भागने की बात) एक देशी चिन्ता है। (कुबडा) मूर्ख है, जाने में असमर्थ है। कुबडे बौने के साथ आपका जाना उचित नही।]
एकचिन्तितोव अयमत्थो, अम्म ! यह जो तू सोचकर इस कुबडे के साथ निकल भागी यह बात तेरी अकेली को ही सोची होगी। बालो अपरिनायको यह कुबडा मूर्ख है, दुर्बुद्धि होने से बढा होने पर भी बाल ही है। दूसरा पकड कर ले जाने वाला न होने पर जाने मे असमर्थ होने से अपरिनायक। नहि खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि, इस कुबडे के साथ, वामनरूप होने से बौने के साथ, तुम्हें जो महान् कुल मे उत्पन्न हुई हो, सुन्दर हो, दर्शनीय हो जाना योग्य नहीं।
उसकी इस बात को सुनकर सेठ की लडकी ने दूसरी गाथा कही—
पुरिसूत्तम मञ्ञमाना अह खुज्जमकामयि, सोय सकुदितो सेति छिन्नतन्ति यथा घुणा ॥
[ मैने कुबडे को पुरुषो म वृषभ समझ कर उसकी इच्छा की। यह तार टूटी वीणा की तरह सुकदा हुआ पडा है।]
[विकण्णक ] ४११ आर्ये ! मैने एक साड को देखकर सोचा कि बैलों म जो ज्येष्ठ होता हैं उसकी पीठ पर एक ककुध होता है। इसकी पीठ पर भी यह है। इसलिए यह पुरुष म वृषभ होगा। इस प्रकार मैने इस कुबडे को पुरुष-वृषभ मान कर इसकी इच्छा की। यह तो जैसे, तार टूटा तूमडी सहित वीणा-दण्ड हो वैसे मुडा हुआ पडा है। बोधिसत्त्व यह जान कि यह अज्ञान के ही कारण घर से निकल पडी, उसे नहला, अलङ्कृत कर, रथ पर चढ़ा कर ल गय। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय यही सेठ की लडकी थी। बाराणसी-सेठ तो मैं ही था। २३३. विकण्णक जातक "कामं मंहि इच्छसि तेन गच्छ " यह शास्ता ने जेतवन म विहार करते समय एक उत्कण्ठित भिक्षु के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा वह धर्मसभा म लाया गया। शास्ता ने पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? 'सचमुच' कहने पर पूछा—किस कारण से उत्कण्ठित है ? बोला—कामुकता के कारण। शास्ता ने उसे कहा—भिक्षु, कामुकता तीखे शल्य की तरह है। एक बार हृदय में प्रविष्ट होने पर तीर लगे मगरमच्छ की तरह मार ही डालती है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
विक्कण्णक ] ४१३ भोजन के कारण मच्छो का पीछा करता हुआ लोभवश मारा गया है।] काम निश्चय से। यहि इच्छसि तेन गच्छ जहां चाहे वहाँ जा। मम्मम्हि मर्म स्थान मे। विक्कण्णकेन उल्टी नोक वाले शल्य से। हतोसि भत्तेन स्वादसितेन लोलो च मच्छे अनुबन्धमानो तू नगाडा बजाकर भात दिए जाते समय लोभी बन खाने के लिए मच्छो का पीछा करता हुआ उस स्वादिष्ट भोजन द्वारा मारा गया। जाने की जगह भी तू जीवित नही रहेगा। यह अपने वासस्थान पर पहुँच कर मर गया। शास्ता ने यह बात कह, अभिसम्बुद्ध होने पर दूसरी गाथा कही— एवम्पि लोकाभिस ओपतन्तो विहञ्ञती चित्तवसानुवत्ती; सो हञ्जति ञातिसखानमज्झे मच्छानुगो सोरिव सुसुमारो ॥ [इस प्रकार लौकिक लाभ के पीछे भागता हुआ, अपने चित्त के वशीभूत आदमी मारा जाता है। वह रिश्तेदारो और दोस्तो के बीच वैसे ही मारा जाता है जैसे मच्छो का पीछा करने वाला मगरमच्छ।] लोकाभिस पांच विषय। उन्हें ससार इष्ट, कान्त तथा सुन्दर समझ ग्रहण करता है, इसलिए लोकाभिस कहलाते है। ओपतन्तो उन लौकिक चीजो के पीछे भागता हुआ राग के वशीभूत आदमी विहञ्जति कष्ट पाता है। सो हञ्जति इस प्रकार का वह आदमी रिश्तेदारो तथा मित्रो के बीच म भी सो तीर से बिंधे मच्छानुगो सुसुमारो विय पाँच विषयो को सुन्दर मानकर हञ्जति कष्ट पाता है, महाविनाश को प्राप्त होता है। इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो के प्रकाशन के अन्त म उत्कण्ठित भिक्षु स्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय वाराणसी राजा मै ही था।
२३४. असिताभू जातक
४१४ [ २.६.२३४ २३४. असिताभू जातक “त्वमेवदानिमकर ” यह शास्ता ने जेतवन मे बिहार करते समय एक कुमारी के बारे म कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में दोनों प्रधान शिष्यो की सेवा करने वाले एक कुल मे एक कुमारी थी—सुन्दर, सौभाग्यशाली। वह बडी होने पर अपनी बराबर की जाति के कुल में गई। उसका स्वामी उसे कुछ न समझ किसी दूसरी जगह ही आसक्त रहता। वह उसके अनादर का कुछ ख्याल न कर, दोनो श्रावको को निमन्त्रित कर, महादान दे धर्मोपदेश सुनती हुई स्रोतापत्ति फल मे प्रतिष्ठित हुई। उसके बाद से वह मार्ग-सुख तथा फल-सुख का आनन्द लेती हुई सोचने लगी कि स्वामी भी मुझे नही चाहता और गृहस्थी से भी मुझे प्रयोजन नही। में प्रव्रजित होऊँगी। वह मातापिता को कह, प्रव्रजित हो अर्हत्त्व को प्राप्त हुई। उसकी यह करनी भिक्षुओ को ज्ञात हो गई। एक दिनं भिक्षुओं ने धर्मसभा म बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक कुल की लड़की सद्धर्म की खोज करने वाली है। उसने यह जान कि स्वामी उसे नही चहता है, प्रधान शिष्यो का धर्मोपदेश सुन, स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हो, फिर मातापिता की आज्ञा ले, प्रव्रजित हो अर्हत्व प्राप्त किया। ऐसी है वह सद्धर्म की खोज करने वाली लडकी। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा— .भिक्षुओ, यह कुलकुमारी केवल अभी सद्धर्म की खोज करने वाली रही है. यह पहले भी सद्धर्म की खोज करने वाली ही रही है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
असिताभू ] ४१५ ख. अतीत कथा पूर्व समय मे वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ऋषियो के क्रम से प्रव्रजित हो अभिञ्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर हिमालय प्रदेश मे रहने लगे। उस समय वाराणसी नरेश ने यह देख कि उसके पुत्र ब्रह्मदत्त कुमार के साथ बहुत लोग है उससे आशङ्का होने के कारण उसे राष्ट्र से बाहर करवा दिया। वह असिताभू नामक अपनी देवी को साथ ले, हिमालय म प्रविष्ट हो मछली, मास, फलमूल खाता हुआ पर्णशाला मे रहने लगा। एक किन्नरी को देख, उसके प्रति आसक्त हो उसने सोचा कि इसे अपनी भार्या बनाऊँगा और असिताभू का ख्याल न कर उसके पीछे पीछे गया। उसने उसे किन्नरी के पीछे जाता देख सोचा यह मुझे छोड किन्नरी के पीछे जाता है, मुझे इससे क्या ? उसने उसके प्रति विरक्त हो बोधिसत्त्व के पास जा, प्रणाम कर, अपने योग्य कसिम पूछ, कसिम की भावना कर अभिञ्ञा और समापत्तियाँ प्राप्त कीं। फिर बोधिसत्त्व को प्रणाम कर आकर स्वयं पर्ण- शाला-द्वार पर खडी हुई। ब्रह्मदत्त भी किन्नरी का पीछा करता हुआ घूमता रहा। उसे उसके जाने का मार्ग तक न दिखाई दिया। यह निराश होकर पर्णशाला के सामने आया। असिताभू ने उसे आते देख आकाश मे उठ, मणि वर्ण के गगनतल मे खडी हो 'आर्यपुत्र ! तेरे कारण मुझे यह ध्यान सुख प्राप्त हुआ' कह पहली गाथा कही— त्वमेवदानिमकर य कामो व्यगमा तथि, सो य अप्पटिसन्धिको खरा छिन्नव रेचक ॥ [ यह जो तेरे प्रति आसक्ति जाती रही, यह अब तून ही किया है। आरी से कटे हाथीदाँत की तरह यह अब जुड नही सकती । ] त्वमेवदानिमकर आर्यपुत्र ! मुझे छोड किन्नरी का पीछा करते हुए तूने ही यह किया है। य कामो व्यगमा तपि जो मेरी तेरे प्रति आसक्ति जाती रही, विष्कम्भन-प्रहाण द्वारा प्रहीण हो गई, जिसके प्रहीण होने से मुझ यह विशेष अवस्था प्राप्त हुई। सोय अप्पटिसन्धिको_वह आसक्ति अब बिना जुड सकने वाली हो गई, फिर जोडी नही जा सकती। खरा छिन्नव रेचक
४१६ [ २.६२३४ रार कहते हैं आरी को और रेरुव कहते हैं हाथीदांत को। जैसे आरी से कटा हुआ हाथीदांत फिर जुड़ नहीं सकता, फिर पहले की तरह से नहीं मिलता। इसी प्रकार मेरा तेरे साथ फिर चित्त का संयोग नहीं हो सकता। ——— यह कह उसने देखते हुए ही ऊपर उठकर दूसरी जगह चली गई। उसने उसके जाने पर रोते हुए दूसरी गाथा कही— अतिच्छदा अतिलोभेन अतिलोभमदेन च, एव हायति अत्थम्हा अहंव असिताभुया ॥ [ जहाँ तहाँ इच्छा करने से, अति लोभ से तथा अति लोभमद से आदमी उसी प्रकार अपने लाभ को गँवा देता है जैसे मैंने असिताभू को।] ——— अतिच्छदा अतिलोभेन अतिच्छा कहते हैं जहाँ तहाँ पैदा होने वाली असीम तृष्णा को। अतिलोभ कहते हैं सीमा लाँघने वाले लोभ को। अतिलोभमदेन च पुनः मद पैदा होने से अतिलोभ मद हो गया। भावार्थ यह है कि जहाँ तहाँ इच्छा करने वाला आदमी अतिलोभ से तथा अतिलोभमद से अहं व असिताभुया जैसे मैं असिताभू राजकन्या से जुदा हो गया वैसे वह अपने लाभ को गँवा देता है।
२३५. वच्छनख जातक
वच्छनख ] ४१७ २३५. वच्छनख जातक “सुखा घरा वच्छनख .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय रोजमल्ल के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा यह आयुष्मन् आनन्द का गृहस्थी-काल का मित्र था। उसने एक दिन स्थविर के पास आने के लिए सन्देश भेजा। स्थविर शास्ता से आज्ञा लेकर गए। उसने स्थविर को नाना प्रकार के बढ़िया भोजन खिला, एक ओर बैठ, स्थविर के साथ कुशल क्षेम बतियाते हुए स्थविर को गृहस्थ-भोगो तथा पाँच विषयो का निमन्त्रण दिया। वह बोला—भन्ते आनन्द ! मेरे घर मे बहुत सी जडचेतन सम्पत्ति है। इसे बीच मे से आधी बाँटकर तुम्हे देता हूँ। आएँ दोनो घर में रहें। स्थविर ने उसे कामभोगो के दुष्परिणाम कहे और आसन से उठकर विहार चले गए। शास्ता ने पूछा—आनन्द ! तूने रोज को देखा ? “हाँ, भन्ते ।” “उसे क्या कहा ?” “भन्ते ! मुझे रोज गृहस्थ होने का निमन्त्रण देता था। मैने उसे गृहस्थ जीवन के तथा विषयो के दोष बताए।” शास्ता ने कहा—आनन्द ! रोजमल्ल केवल अभी प्रव्रजितो को गृहस्थ होने का निमन्त्रण नही देता। इसने पहले भी निमन्त्रण दिया है। उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— २७
ख. अतीत कथा
४१८ [ २.६.२३५ ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक निगम-ग्राम में किसी ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो हिमालय में रहने लगे। वहाँ चिरकाल तक रहकर नमक-खटाई खाने के लिए वाराणसी पहुँच, राजा के बाग में रह, अगले दिन वाराणसी मे प्रवेश किया। वाराणसी का सेठ उनकी चालढाल से प्रसन्न हुआ। उसने उन्हें घर ले जाकर भोजन खिलाया। फिर उद्यान में रहने का वचन ले सेवा करते हुए उद्यान में बसाया। उनमें परस्पर स्नेह पैदा हो गया । बोधिसत्त्व के प्रति प्रेम और विश्वास होने के कारण वाराणसी-सेठ एक दिन इस प्रकार सोचने लगा—प्रव्रजित रहना दुष्कर है। मैं अपने मित्र वच्छनख परिव्राजक को गृहस्थ बना सारा धन बीच में से आधा आधा बाँट कर उसे दे दूँ। दोनो मिलकर रहें। उसने एक दिन भोजन के अनन्तर उसके साथ मधुर बातचीत करते हुए कहा—'भन्ते वच्छनख ! प्रव्रजित रहना दु ख है। गृहस्थ रहने में सुख है। आएं दोनो मिलकर विषयो का भोग करते हुए रहें।' यह कह पहली गाथा कही— सुखा घरा वच्छनख सहिरञ्जा सभोजना, यत्थ भुत्वा च पीत्वा च सयेय्याय अनुस्सुको ॥ [ वच्छनख ! सोने और खाद्य पदार्थों से भरपूर घर सुख-कर हैं, जहाँ खा पीकर आदमी निश्चिन्त सोता है।] सहिरञ्जा सात रत्नो से युक्त। सभोजना बहुत खाद्य भोज्य पदार्थों से युक्त। यत्थ भुत्वा च पीत्वा च जिन सोने और भोजनो से युक्त घरो में नाना प्रकार के बढ़िया भोजन खाकर और नाना प्रकार के पान पीकर । सयेय्याय अनुस्सुको जिन (घरो) में अलंकृत शयनासनो पर निश्चित होकर सोएगा, उससे घर बहुत ही सुखकर हैं।
वच्छनख ] ४१६ उसकी बात सुन बोधिसत्त्व ने कहा—सेठ ! तू अज्ञान के कारण काम- भोगों में आसक्त होकर गृहस्थी का गुण और प्रव्रज्या का अवगुण कह रहा है। अब तू सुन, मैं गृहस्थी के दोष बताता हूँ। यह कह दूसरी गाथा कही— घरा नानीहमानस्स घरा नाभणतो मुसा, घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो; एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति ॥ [ (नित्य) मेहनत न करने वाले की गृहस्थी नहीं चलती। झूठ न बोलने वाले की गृहस्थी नहीं चलती। दूसरा को न ठगते हुए की गृहस्थी नहीं चलती। दण्डत्यागी की गृहस्थी नहीं चलती। इस प्रकार की छिद्रों से पूर्ण, मुश्किल से चलने वाली गृहस्थी को कौन करता है।] घरा नानीहमानस्स नित्य कृषि गोरक्षा आदि करने में परिश्रम न करने वाले की गृहस्थी नहीं (चलती)। गृहस्थी स्थिर नहीं होती। घरा नाभणतो मुसा खेत, वस्तु, हिरण्य, स्वर्ण आदि के लिए झूठ न बोलने वाले की भी गृहस्थी नहीं। घरा नाछिन्नदण्डस्स परेसं अनिकुब्बतो जिसने दण्ड नहीं लिया, जिसने दण्ड ग्रहण नहीं किया, जिसने दण्ड रख दिया वैसे दूसरा को न ठगने वाले की भी गृहस्थी नहीं। जो दण्डधारी होकर दूसरों के दासों तथा नौकर चाकर आदि को उस उस अपराध के लिए अपराध के अनुसार वध करना, बाँधना, (अङ्ग-) छेद करना, ताडना आदि करता है उसीकी गृहस्थी ठहरती है। एव छिद्दं दुरभिभवं को घरं पटिपज्जति सो अब इस प्रकार डाग आदि के न करने पर अनेक हानियां होने के कारण छिद्रपूर्ण, करने पर नित्य ही करना पड़ने के कारण कठिन, मुश्किल से निभने वाली, नित्य करने पर भी दुरभि- सम्भव तथा मुश्किल से पूरा पडने वाले घर को मैं चिन्ता-रहित होकर करूँगा ? (ऐसा बोलकर) गृहस्थी को कौन करे ? इस प्रकार बोधिसत्त्व गृहस्थी के दोष कह उद्यान ही चले गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय बाराणसी-सेठ रोजमल्ल था। वच्छनख परिव्राजक तो मैं ही था।