जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
मूलपरियाय ] ४५१
उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक कहा—पूछें, उत्तर देंगे। प्राचार्य ने प्रश्न पूछते हुए पहली गाथा कही— कालो घसति भूतानि सब्बानेव सहत्तना, यो च कालघसो भूतो स भूत पचनिं पचि ॥ [ काल सभी प्राणियो को खाता है, अपने को भी (खाता है) । जो काल को खाने वाला प्राणी है वह सब प्राणियो को जलाने वाली को जलाता हैं।] कालो पूर्वाह्ण समय तथा अपराह्ण समय आदि । भूतानि प्राणी । काल प्राणियो का चर्म मास आदि नोच नोच कर उन्हे नही खाता किन्तु उनकी आयु, वर्ण बल को नष्ट कर यौवन को मर्दन कर आरोग्य का विनाश करता हुआ खाता है। इस प्रकार खाता हुआ किसी को नही छोड़ता। सब्बानेव खाता है। केवल प्राणियो को ही नही किन्तु सहत्तना अपने को भी खाता है। पूर्वाह्ण अपराह्ण तक नही रहता, इसी प्रकार अपराह्ण आदि भी । यो च कालघसो भूतो यह क्षीणास्रव के लिए कहा गया है। वह आर्य्यमार्ग से भविष्य के प्रतिसन्धि-ग्रहण करने के समय को नष्ट करने वाला होने से कालघसो भूतो कहलाता है। स भूत पचनिं पचि उसने इस तृष्णा को, जो प्राणियो को अपाय मे जलाती है, ज्ञानाग्नि से जला दिया, भस्म कर दिया । इसीसे भूतपचनिं पचि कहा जाता है। पजनिं भी पाठ है। जननि पैदा करने वाली अर्थ है। इस प्रश्न को सुनकर माणवको मे एक भी न जान सका । तब बोधिसत्त्व ने कहा—तुम यह मत समझो कि यह प्रश्न तीनो वेदो मे हैं। तुम यह समझ कर कि जो मैं जानता हूँ वह सब तुम जानते हो मुझे बेर का वृक्ष बनाते हो। तुम यह नही जानते कि ऐसा बहुत है जिसे तुम नही जानते और मैं जानता हूँ। जाओ, सात दिन का समय देता हूँ। इतने समय मे इस प्रश्न पर विचार करो । 'वे बोधिसत्त्व को प्रणाम कर अपने अपने निवासस्थान पर गए। वहाँ सप्ताह भर सोचने पर भी न उन्हे प्रश्न का आरम्भ मिला न अन्त। वे सातव दिन प्राचार्य के पास गए। प्रणाम करके बैठे। प्राचार्य ने पूछा—भद्रमुखो !
८ ४५२ [ २.१० २४६ प्रश्न समझ में आया ? वे बोले—नही जानते । बोधिसत्त्व ने फिर उनकी निन्दा करते हुए दूसरी गाथा कही— बहूनि नरसीसानि लोमसानि बृहन्ति च, गीवासु पटिमुक्कानि कोचिदेवेत्थ कण्णवा ॥ अर्थ—बहुत आदमियों के सिर दिखाई देते हैं। वे बालो वाले हैं। सभी बड़े बड़े हैं। गर्दनों पर रखे हैं। ताड के फल की तरह हाथ में पकड़े हुए नहीं हैं। इन बातो में किन्ही में आपस में भेद नहीं है। लेकिन यहाँ कोई ही कानवाला है। (यह अपने बारे में कहा) कण्णवा प्रज्ञावान् । कान का छेद तो किसको नहीं है ? इस प्रकार उन माणवकों की निन्दा कर कि तुम लोगो को कानो का छेद मात्र ही हैं, प्रज्ञा नहीं है प्रश्न समझाया। उन्होने सुनकर 'ओह ! आचार्य्य महान् होते हैं' क्षमा मांग नम्र हो बोधिसत्त्व की सेवा की। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पांच सौ माणवक यह भिक्षु थे। आचार्य्य मैं ही था । २४६. तेलोवाद जातक “हन्त्वा भत्वा वधित्वा च ” यह शास्ता ने वैशाली के आश्रय कूटा- गार शाला में विहार करते समय सिंह सेनापति के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उसने भगवान् (बुद्ध) की शरण जा, निमन्त्रण दे, अगले दिन मास सहित भोजन कराया। निगण्ठों ने उसे सुन कुपित हो असन्तुष्ट हो तथागत को १ निगण्ठ=निर्ग्रन्थ=जैन सम्प्रदाय वाले साधु ।
कथा कही—
तेलोवाद ] ४५३ पीडा पहुँचाने की इच्छा से गाली दी—श्रमण गौतम जान बूझ कर अपने लिए बनाए मास को खाता है। भिक्षुओ ने धर्मसभा मे बातचीत चलाई—आयु- ष्मन्तो ! परिषद सहित निगण्ठनाथपुत्र 'श्रमण गौतम जान बूझ कर अपने लिए बना मास खाता है' कह गाली देता हुआ घूमता है। इसे सुन शास्ता ने कहा— भिक्षुओ, न केवल अभी निगण्ठनाथपुत्र 'अपने लिए बना मास खाने वाला' कह मेरी निन्दा करता है, उसने पहले भी की है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय मे बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ब्राह्मण कुल मे उत्पन्न हुए। बडे होने पर ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो नमक-खटाई खाने के लिए हिमालय से बाराणसी आ अगले दिन नगर में भिक्षा के लिए प्रवेश किया। एक गृहस्थ ने तपस्वी को तग करने के उद्देश्य से उसे घर में बुला, बिछे आसन पर बिठा मत्स्य मास परोसा। भोजन कर चुकने पर एक ओर बैठ कर कहा—यह मास तुम्हारे ही लिए प्राणियो को मार कर तैयार किया गया है। यह पाप केवल हम न लगे, तुम्हें भी लगे। इतना कह पहली गाथा कही— हन्त्वा भत्वा वधित्वा च देति दान असञ्ञतो, एदिस भत्त भुञ्जमानो स पापेन उपलिप्पति ॥ [ मारकर, कष्ट देकर तथा वध करके असयमी दान देता है। इस प्रकार के भोजन को खाने वाला पाप का भागी होता है।] हन्त्वा प्रहार देकर। भत्वा क्लेश देकर। वधित्वा मारकर। देति दान असञ्ञतो असयमी दुदशील ऐसा करके इस प्रकार दान देता है। एदिस भत्त भुञ्जमानो स पापेन उपलिप्पति इस प्रकार उद्देश्य करके बनाए हुए भोजन को खाने वाला श्रमण भी पाप से युक्त होता है। उसे सुन बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही—
४५४ [ २.१०.२४७
पुत्तदारम्पि चे हन्त्वा देति दानं असञ्जतो, भुञ्जमानो पि सप्पञ्ञो न पापेन उपलिप्पति ॥ [ यदि असंयमी (आदमी) पुत्र तथा स्त्री को मारकर भी दान देता है, तो भी बुद्धिमान् खाने वाले को पाप नहीं लगेगा । ]
<center>---</center> भुञ्जमानो पि सप्पञ्ञो दूसरे गाथ की बात रहे। पुत्र स्त्री को भी मार कर दुश्शील द्वारा दिए गए दान को प्रज्ञावान् क्षमामंत्री आदि गुणों से युक्त खाने वाला पाप से लिप्त नहीं होगा। <center>---</center> इस प्रकार बोधिसत्त्व धर्मोपदेश कर आसन से उठकर चले गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गृहस्थ निगण्ठनाथपुत्र था। तपस्वी तो मैं ही था।२४७. पादञ्जली जातक
“अद्धा पादञ्जली सब्वे...” यह शास्ता ने जेतवन में विहरते समय लालुदायी स्थविर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन दोनो प्रधान शिष्य प्रश्नो पर विचार करते थे। भिक्षु धर्मसभा में सुन स्थविरों की प्रशंसा करते थे। परिषद में बैठे हुए लाल उदायी स्थविर ने होठ चबाए—यह हमारे बराबर क्या जानते हैं ? धर्मसभा में भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो, लालुदायी ने दोनो श्रावको की निन्दा कर होठ चबाए। शास्ता ने यह सुन कर कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी, पहले भी
पूर्व-जन्म की कथा कही—
पादञ्जली ] ४५५ लालुदायी होठ चबाना छोड और अधिक कुछ नही जानता था। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी म ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसके अर्थधर्मानुशासक आमात्य हुए। राजा का पादञ्जली नाम का पुत्र मूर्ख था, आलसी था। आगे चलकर राजा मर गया। आमात्यो ने राजा का क्रिया कर्म करके, किसे राज्याभिषिक्त करे सलाह करते हुए कहा कि राजपुत्र पादञ्जली को। बोधिसत्त्व ने कहा—यह कुमार मूर्ख है, आलसी है। परीक्षा करके इसे राज्याभिषिक्त करें। आमात्यो ने मुकद्दमा बना कुमार को पास बैठा मुकद्दमे का फैसला करते हुए ठीक फैसला नही किया। उन्होने अस्वामी को स्वामी बना कुमार से पूछा—कुमार ! क्या हम लोगो ने ठीक फैसला किया ? उसने होठ चबाए। बोधिसत्त्व ने समझा मालूम होता है कुमार पण्डित है। वह समझ गया होगा कि मुकद्दमे का ठीक फैसला नही हुआ। ऐसा मानकर पहली गाथा कही— अद्धा पादञ्जली सम्बे पञ्जाय अतिरोचति, तथाहि ओट्ठं भञ्जति उत्तरिं नून पस्सति ॥ [ पादञ्जली निश्चय से प्रज्ञा म सबसे बढकर है। इसीसे होठ चबाता है। निश्चय से इसे दूसरी बात दिखाई देती है ।] निश्चय से पादञ्जली कुमार सम्बे हम पञ्जाय अतिरोचति तथाहि ओट्ठ भञ्जति नून उत्तरिं दूसरे कारण को पस्सति । उन्होने दूसरे दिन भी एक मुकद्दमा तैयार कर उस मुकद्दमे का ठीक से फैसला कर पूछा—देव ! कैसे क्या यह ठीक से फैसला हुआ है ? उसने फिर भी होठ चबाए। उसकी मूर्खता की बात जान बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही— नाय धम्म अधम्म वा अत्यानत्थं च बुज्झति, अञ्ञत्र ओट्ठनिब्भोगा नाय जानाति किञ्चन ॥
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पादञ्जली
४५६ . [ २.१०.२४८ [ यह धर्म अधर्म वा अर्थ अनर्थ कुछ नहीं बूझता है। यह होठ चबाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानता है।] आमात्यो ने पादञ्जली कुमार की मूर्खता पहचान बोधिसत्त्व को राज्या- भिषिक्त किया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय पादञ्जली लालुदायी था। पण्डित आमात्य तो मै ही था। २४८. किंसुकोपम जातक “सब्बेहि किंसुको दिट्ठो...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय किंसुकोपमसुत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा चार भिक्षुओ ने तथागत के पास आ कर्मस्थान मांगा। शास्ता ने उनको कर्मस्थान कहा। वे कर्मस्थान ले अपने अपने रात्रि के निवासस्थान तथा दिन के निवासस्थानो को गए। उनमें से एक ने छ स्पर्श आयतनो का परिग्रहण कर अर्हत्व प्राप्त किया। एक ने पञ्चस्कन्धो को। एक ने चारो महाभूतो को। एक ने अठारह धातुओ को। उन सबने अपनी अपनी अर्हत्व-प्राप्ति तथागत से निवेदन की। उन भिक्षुओ म से एक को शङ्का हुई—यह कर्मस्थान तो भिन्न भिन्न हैं। निर्वाण एक है। सभी को अर्हत्व की प्राप्ति कैसे हुई ? उसने शास्ता से पूछा। शास्ता बोले—भिक्षु, क्या तुम्हे किंसुक देखने वाले भाइयो जैसा भेद (पैदा हुआ है) ? भिक्षुओ ने प्रार्थना की भन्ते ! यह बात हमे कहे। शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
[किंसुकोपम ] ४५७ ख. अतीत कथा पूर्वं समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। उन्होने सारथी को बुलाकर कहा—सौम्य ! हम किंसुक देखना चाहते हैं। हमे किंसुक वृक्ष दिखाएँ। सारथी बोला—अच्छा दिखाऊँगा। उसने चारो को एक साथ न दिखा ज्येष्ठ पुत्र को रथ मे बिठा जगल मे ले जा ठूंठ की अवस्था मे किंसुक दिखाकर कहा कि यह किंसुक है। दूसरे को छोटे छोटे पत्ते निकलने के समय। तीसरे को फूल निकलने के समय। चौथे को फल निकलने पर। आगे चलकर एक बार जब चारो भाई एक साथ बैठे थे उन्होने बातचीत चलाई कि किंसुक कैसा होता है ? एक बोला—जैसे जला हुआ ठूंठ। दूसरा— जैसे न्यग्रोध वृक्ष। तीसरा—जैसे मांसपेशी। चौथा—जैसे सिरीष। वे परस्पर एक दूसरे के कथन से असन्तुष्ट हो पिता के पास गए और पूछा— देव ! किंसुक कैसा होता है ? राजा ने पूछा—तुमने कैसे कैसे बताया ? सबने अपना अपना कहने का ढग राजा से कहा। राजा बोला—तुम चारो ने किंसुक देखा है। हाँ, केवल किंसुक दिखाने वाले सारथी से इस समय में किंसुक कैसा होता है, इस समय में कैसा होता है यह बाँट कर नही पूछा। उसीसे शक पैदा हुआ है। यह कह पहली गाथा कही— सब्बेहि किंसुको दिट्ठो किन्थेत्थ विचिकिच्छथ, नहि सब्बेसु ठानेसु सारथी परिपुच्छितो ॥ [ सभी ने किंसुक देखा है, किन्तु उसमें शङ्का करते हो। सभी अवस्थाओ मे सारथी से नही पूछा।]
नहि सब्बेसु ठानेसु सारथी परिपुच्छितो सभी ने किंसुक देखा है। तुम यहाँ क्या शङ्का करते हो ? सब जगह यह किंसुक ही था, किन्तु तुमने सभी अवस्थाओ में सारथी को नही पूछा। उसीसे शङ्का उत्पन्न हुई है।
शास्ता ने यह बात कह कर समझाया कि भिक्षु जैसे वे चार भाई विभाग करके न पूछने के कारण किंसुक के बारे में सन्देहशील हुए, उसी तरह तू भी
इस धर्म में शङ्का करता है। यह कह अभिसम्बुद्ध होने पर दूसरी कथा कही—
[Header] ४५८ [ २.१०.२४६
इस धर्म में शङ्का करता है। यह कह अभिसम्बुद्ध होने पर दूसरी कथा कही— एवं सब्वेहि जाणेहि येसं धम्मा अजानिता, ते वे धम्मेसु कङ्खन्ति किसुकस्मिंव भातरो ॥ [ सभी विषयो में, जो धर्म के जानकार नही हैं वह धर्मों के वारे में वैसे ही शङ्का करते हैं जैसे किसुक के वारे में (चारो) भाई । ]
जैसे वे भाई सभी अवस्थाओ में किसुक को न देखने के कारण सन्देहशील हुए। उसी प्रकार विपश्यना ज्ञान से जिनको सच छ स्पर्धायतन स्कन्ध महाभूत धातु आदि धर्म अज्ञात है, स्रोतापत्ति मार्ग को प्राप्त न किए रहने के कारण, ज्ञानी न हुए रहने के कारण ही (वे) उन स्पर्श आयतन आदि धर्मों मे शका पैदा करते हैं। जैसे एक ही किसुक में चारो भाई ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वाराणसी राजा में ही था।
२४६. सालक जातक "एकपुत्तको भविस्ससि..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक महास्थविर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा वह एक कुमार को प्रव्रजित कर उसे कष्ट पहुँचाता रहता था। श्रामणेर ने पीड़ान सह सकने के कारण चीवर त्याग दिया। स्थविर जाकर उसे फुसलाता —कुमारक ! तेरा चीवर तेरा ही रहेगा। पात्र भी। मेरे पास जो पात्र चीवर है वह भी तेरा ही रहेगा। आ प्रव्रजित हो। 'मैं प्रव्रजित नहीं होऊँगा'
६ जातक ] ४५६
६ जातक ] ४५६
कहते हुए भी यह बार बार आग्रह किए जाने के कारण प्रव्रजित हो गया। प्रव्रजित होने के दिन से फिर स्थविर उसे तंग करने लगा। उसने कष्ट न सह सकने के कारण फिर चीवर त्याग दिया। अब स्थविर के अनेक बार कहने पर भी उसने प्रव्रजित होना स्वीकार नही किया। बोला—मुझे तू सहन भी नही कर सकता। मेरे बिना तू रह भी नही सकता। जा प्रव्रजित नही होऊँगा। भिक्षुओं ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! उस बच्चे का दिल अच्छा था। महास्थविर के आशय को समझ कर वह प्रव्रजित नहीं हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बात- चीत' कहने पर शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, यह केवल अभी सुहृदय नहीं है। यह पहले भी सुहृदय ही था। एक बार उसका दोष देखकर उसे फिर ग्रहण नही किया। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक गृहस्थ कुल में पैदा हुआ। बड़े होने पर धान्य बेच कर जीविका चलाने लगा। एक सपेरा भी एक बन्दर को सिखा, औषध ग्रहण करवा, उसे तथा सर्प को खिलाता हुआ जीविका चलाता था। वाराणसी में उत्सव घोषित होने पर उसमें खेलने की इच्छा से उस सपेरे ने वह बन्दर उस धान्य के व्यापारी को सौंपा और कहा—इसका ख्याल रखना। उत्सव खेल आकर सातवें दिन उस व्यापारी के पास जाकर पूछा—बन्दर कहाँ है ? बन्दर स्वामी की आवाज सुनते ही अनाज की दूकान से जल्दी से निकला। उसने बन्दर को बाँस की छड़ी से पीठ पर मार घोर लेकर उद्यान गया। वहाँ उसे एक तरफ बाँधा और सो गया। बन्दर ने उसे सोता देख अपना बन्धन तोड़ा और भाग कर आम के वृक्ष पर चढ़ गया। वहाँ उसने खूब आम खाकर गुठली सपेरे के शरीर पर गिराई। सपेरे ने उठ- कर देखा तो सोचा कि मधुर वाणी से उस ठग वृक्ष से उतार पकडूंगा। उसने उसे फुसलाते हुए पहली गाथा कही—
४६० [ २.१०.२४६ एकपुत्तको भविस्ससि त्वञ्च नो हेस्ससि इस्सरो कुले, ओरोह दुमस्मा सालक एहि दानि घरफ यजेमसे ॥ अर्थ—तू मेरा एकपुत्रक होकर रहेगा। मेरे कुल में (भोगों का) स्वामी होकर रहेगा। इस वृक्ष से उतर। आ, अपने घर चलें। सालक ! यह नाम लेकर सम्बोधन किया है। उसे सुनकर बन्दर ने दूसरी गाथा कही— ननु मं हृदयतिमञ्ञसि यञ्च मं हनसि वेलुमट्ठिया, पक्कम्बवने रमामसे गच्छ त्वं घरकं यथासुखं ॥ [ निश्चय से तू मुझे हृदय से बहुत चाहता है। तभी तो मुझे बांस की छड़ी से मारता है। अब हम पके आम्रवन में रहेंगे। तू सुखपूर्वक घर जा । ] ननु मं हृदयेंति मञ्जसि निश्चय से तू मुझे हृदय में बहुत मानता है। मतलब है कि तू समझता है कि यह सुहृदय है। यञ्च मं हनसि वेलुलट्ठिया इतना अधिक मानता है कि बांस की छड़ी से मारता है। इससे प्रकट करता हूँ कि इस कारण से मैं नहीं आता हूँ। इसलिए हम इस पक्कम्बवने रमामसे गच्छ त्वं घरकं यथासुखं यह कह कूद कर बन म चला गया। सपेरा भी असन्तुष्ट हो अपन घर गया । शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय बन्दर शामणेर था । सपेरा महास्थविर । धान्य का व्यापारी तो में ही था ।
२५०. कपि जातक
कपि ] ४६१ २५०. कपि जातक "अयं इसी उपसम सङ्कमे रतो " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक ढोगी भिक्षु के बारे मे कही। क वर्तमान कथा उसका ढोग भिक्षुओ म प्रकट हो गया। भिक्षुओ ने धर्मसभा में बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक भिक्षु कल्याणकारी बुद्धशासन म प्रव्रजित हो ढोग करता है। शास्ता ने आकर पूछा- भिक्षुओ, बैठ क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा- भिक्षुओ, यह भिक्षु केवल अभी ढोंगी नही है, यह पहले भी ढोगी रहा है। इसने जब यह वन्दर या केवल आग के लिए ढोग किया। इतना कह पूर्व-जन्म की क्या कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व काशीदेश में ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ। बडे होने पर पुत्र के भागने दौड़ने में समर्थ होने पर, ब्राह्मणी के मर जाने पर पुत्र को गोद मे ल हिमालय चला गया। वहाँ ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो उस पुत्र को भी तपस्वीकुमार बना पर्णशाला में रहने लगा। वर्षा ऋतु मे मूसलधार वर्षा होने के समय एक बन्दर पीडित, दाँत फटफटाता हुआ, काँपता हुआ भटकता था। बोधिसत्त्व बडे बडे लकड लाकर आग बना मन्च पर लेटा था। उसका पुत्र भी पाँव दबाता हुआ बैठा था। वह बन्दर एक मृत तपस्वी के वल्कल वस्त्र ओढ पहन, एक कन्धे पर अजिनचर्म रख, बैहगी तथा कमण्डल ले ऋषिवेष बना पर्णशाला के द्वार पर जा आग के लिए ढोग करके खडा हुआ।
४६२ [ २.१०.२५० तपस्वी कुमार ने उसे देखे 'तात ! एक तपस्वी शीत से पीड़ित है। काँप रहा है। उसे यहाँ बुला। सेक लेगा' कहा। उसने पिता से प्रार्थना करते हुए यह गाथा कही— अयं इसी उपसमसंयमे रतो संतिट्ठति सिसिरभयेन अट्टितो, हन्द अयं पविसतुमं अगारकं विनेतु सीतं दरथञ्च केवलं । [ यह ऋषि उपशमन में तथा संयम में लगा है। शीतभय से पीड़ित है। यह इस घर में प्रवेश करे और अपने शीत तथा पीड़ा को दूर करे ।] उपसमसंयमे रतो रागादि क्लेश के उपशमन में तथा शीलसंयम मे लगा है। संतिट्ठति, वह ठहरता है। सिसिरभयेन वायु और वर्षा से उत्पन्न शीतभय से। अट्टितो पीड़ित। पविसतुमं, यहाँ प्रवेश करे। केवलं सब। बोधिसत्व ने पुत्र की बात सुन उठकर देखते हुए बन्दर का भाव समझ दूसरी गाथा कही— नायं इसी उपसमसंयमे रतो कपी अयं दुमवरसाखगोचरो, सो दूसको रोसकोचापि जम्मो सचे वजे इमम्पिं दूसये घरं ॥ [ यह उपशमन तथा सयम मे लगा हुआ ऋषि नही । यह वृक्षो की शाखा पर घूमने वाला बन्दर है। यह दूषित करने वाला है। यह क्रोध करने वाला है। यह नीच है। यदि घर मे आए तो इस घर को भी दूषित करे ।] दुमवरसाखगोचरो वृक्षो की शाखां पर घूमने वाला। सो दूसको रोसको चापि जम्मो जहाँ जहाँ जाए उस उस जगह को दूषित करने वाला होने से दूसक। झगड़ने वाला होने से रोसको, नीच होने से जम्मो। सचे वजे यदि इस पर्ण-
कपि ] ४६३ शाला म आवे, दाखिल हो तो सब जगह पाखाना पेशाब करके और आग लगा कर खराब कर दे । यह कह कर बोधिसत्त्व ने जली लकड़ी ले उसे डरा भगाया । वह कूद कर वन म प्रवेश कर चला ही गया । फिर उस जगह नही गया । बोधिसत्त्व न अभिञ्जा और समापत्तियां प्राप्त कर तपस्वीकुमार को व सिन-परिकर्म सिखाया । उसने अभिञ्जा तथा समापत्तियां प्राप्त कीं । व दोनो ध्यान प्राप्त हो ब्रह्मलोक परायण हुए । शास्ता न 'न भिक्षुओ केवल अभी किन्तु पुरान समय से भी यह ढोगी ही हैं', कह यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यों के अन्त म कोई खोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी हुए । उस समय बन्दर ढोगी भिक्षु था । पुत्र राहुल । पिता तो मैं ही था ।
कपि ] ४६३ शाला म आवे, दाखिल हो तो सब जगह पाखाना पेशाब करके और आग लगा कर खराब कर दे । यह कह कर बोधिसत्त्व ने जली लकडी ले उसे डरा भगाया । वह कूद कर वन में प्रवेश कर चला ही गया । फिर उस जगह नहीं गया । बोधिसत्त्व ने अभिज्ञा और समापत्तियां प्राप्त कर तपस्वीकुमार को कसिन्-परिकर्म सिखाया । उसने अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कीं । वे दोनो ध्यान-प्राप्त हो ब्रह्मलोक परायण हुए । शास्ता ने 'न भिक्षुओ केवल अभी किन्तु पुराने समय से भी यह ढोगी ही हैं', कह यह धर्मदेशना ला (आर्य-)सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यो के अन्त में कोई स्रोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी हुए । उस समय बन्दर ढोगी भिक्षु था । पुत्र राहुल । पिता तो मैं ही था ।