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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

चुल्लनन्दिय ] ३७६ बोधिसत्त्व ने कहा—मा, हम तुम्हे मधुर फल भेजते है। तुम किसलिए कुम्हला रही हो ? "तात ! मुझे नही मिलते।" बोधिसत्त्व ने सोचा—यदि मै दल की नेतागिरी करता रहा तो माता मर जाएगी। मै दल को छोड माता की ही सेवा करूँगा। उसने चुल्लनन्दिय को बुलाकर कहा—तात ! तू दल की नेतागिरी कर। मैं माता की सेवा करूँगा। उसने भी अपने भाई से कहा—मुझे दल की नेतागिरी से काम नही। मै भी माता की ही सेवा करूँगा। वे दोनो एकमन हो दल को त्याग, माता को ले हिमवन्त को छोड़ सीमान्त में न्यग्रोध-वृक्ष के नीचे रहते हुए माता की सेवा करने लगे। एक वाराणसी-वासी ब्राह्मण-विद्यार्थी ने तक्षशिला में सर्वप्रसिद्ध आचार्य्य के पास सब विद्यायें ग्रहण कर पूछा—अब में जाऊँ ? आचार्य्य ने विद्या के प्रताप से उसका कठोर, परुष तथा दुस्साहसी स्वभाव जान 'तात ! तू कठोर, 'परुष तथा दुत्साहसी हैं। ऐसे लोगो को सब समय एक सा ही नही होता। महा-विनाश, महा-दुख को प्राप्त होते है। तू कठोर मत हो। ऐसा काम मत कर जिससे पीछे पछताना पड़े' उपदेश दे विदा किया। उसने आचार्य्य को प्रणाम कर, वाराणसी पहुँच, घर बसा सोचा कि मैं किसी दूसरे शिल्प से जीविका न चला सकूँगा। इसलिए मैं धनुष के सिरे से जीवित रहूँगा। मै शिकारी का काम कर जीविका चलाऊँगा। वह वारा- णसी से निकल सीमान्त के गाँव मे रहते हुए धनुष-तरकस बाँध, जगल में जा नाना प्रकार के पशुओ का मार मास बेचकर जीविका चलाने लगा। एक दिन उसे जगल में कुछ नही मिला। घर लौटते हुए उसने खुले मैदान के एक सिरे पर एक वट-वृक्ष देखा। शायद यहाँ कुछ मिले सोच वह वट-वृक्ष की ओर गया। उसी समय दोनो भाई माँ को फल खिला उसे आगे करके वृक्ष के नीचे बैठे थे। जब उन्होने उस शिकारी को आते देखा, तो सोचा कि हमारी मा को देखकर भी क्या करेगा ? वे स्वय शाखाओ के बीच मे छिप गए। उस निर्दयी आदमी न भी वृक्ष के नीचे पहुँच, उनकी उस बुढापे से दुर्बल अन्धी माँ को देख

३८० [ २८.२२२ कर सोचा—खाली हाथ जाने से मुझे क्या लाभ ? इस बन्दरी को मार कर जाऊँगा। उसने उसे मारने के लिए धनुष हाथ में लिया। बोधिसत्व ने यह देख चुल्लनन्दिय को कहा—तात ! यह आदमी मेरी मां को बींधना चाहता है। मैं इसे अपना जीवन दान दूंगा। तू मेरे मरने पर माता की सेवा करना। फिर शाखाओं की ओट से निकल 'हे पुरुष ! मेरी मां को मत मार। यह अन्धी है। बुढापे से दुर्बल है। मैं इसे जीवनदान देता हूँ। तू इसे न मार कर मुझे मार' कह उससे प्रतिज्ञा करा जाकर तीर के पास बैठा। उस निर्दयी ने बोधिसत्त्व को बींध, गिराकर फिर उसकी मां को भी मारने को धनुष उठाया। इसे देख चुल्लनन्दिय ने सोचा—यह मेरी मां को मारना चाहता है। एक दिन भी यदि मेरी मां जी सके, तो 'प्राण बचे' ही कहा जाएगा। मैं इसे अपना जीवनदान दूंगा। उसने शाखाओं की ओट से निकल कर कहा—"भो पुरुष ! मेरी मां को मत मार। मैं इसे जीवन-दान देता हूँ। तू मुझे मार। हम दोनो भाइयो को ले जाकर हमारी मां को जीवन- दान दे।" उससे प्रतिज्ञा ले, वह तीर के पास जा बैठा। शिकारी उसे मार 'यह घर पर बच्चो के लिए होगी' सोच, उनकी माता को भी मार, तीनो जना को लेकर घर की ओर गया। इस पापी के घर पर बिजली गिर पडी। उसकी भार्य्या और दो लडके घर के साथ ही जल गए। पृष्ठ-वांस और खम्बा मात्र बचे। गाँव के दरवाजे पर ही एक आदमी ने उसे देख यह समाचार कहा। वह स्त्री-बच्चों के शोक से इतना अभिभूत हुआ कि उसी जगह पर मास की बहँगी और धनुष छोड, वस्त्र उतार, नंगा हो बाँहे पछाड़ रोता हुआ घर गया। वह खम्बा टूट कर सिर पर गिर पडा। सिर फट गया। पृथ्वी ने विवर दे दिया। अवीचि नरक से अग्नि-ज्वाला निकली। जब वह पृथ्वी से निगला जा रहा था, उसने आचार्य्य के उपदेश को याद कर 'इसी बात को देख पाराशर्य ब्राह्मण ने मुझे उपदेश दिया था' रोते हुए इन दो गाथाओ को कहा— इदं सदाचरियवचो पारासरियो यदब्रवी, मासु त्वं अकरा पाप यं त्वं पच्छा कत तपे ॥

पुटभत्त ] ३८१ यानि करोति पुरिसो तानि अत्तनि पस्सति कल्याणकारी कल्याणं पापकारी च पापकं, यादिसं वपते बीजं तादिसं हरते फलं ॥ इसका अर्थ-जो पारासरिय (पाराशर्य) ब्राह्मण ने कहा कि तू पापकर्म मत कर, पीछे तुझे ही कष्ट देगा-यह उस आचार्य्य का वचन है। आदमी शरीर, वाणी अथवा मन से जो भी कर्म करता है उनका फल पाता हुआ उन्ही कर्मों को अपने में देखता है। शुभकर्म करने वाला शुभफल पाता है, पापकर्म करने वाला बुरा अनिष्टकर फल पाता है। दुनिया म भी जैसा बीज बोता है, वैसा ही फल पाता है। बीज के अनुसार बीज के अनुरूप ही फल ल जाता है, ग्रहण करता है, भोगता है। इस प्रकार रोता हुआ यह पृथ्वी में दाखिल हो अवीची महानरक मे पैदा हुआ। शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त कठोर, परुष तथा दयाहीन है, वह पहले भी कठोर, परुष तथा दयाहीन ही रहा है' कह यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिकारी देवदत्त था। चारो दिशाओ म प्रसिद्ध आचार्य्य सारिपुत्त। चुल्लनन्दिय आनन्द। माता महाप्रजापति गौतमी। महानन्दिय तो मैं ही था। २२३. पुटभत्त जातक "नमे नमन्तस्स..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक कुटुम्बी के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

३८२ [ २.८.२२३ क. वर्तमान कथा श्रावस्ती नगर निवासी एक गृहस्थ जनपदनिवासी एक गृहस्थ के साथ लेन-देन करता था। वह अपनी भार्या को लेकर अपने करजदार के पास गया। उसने 'दे नहीं सकता हूँ' कह, कुछ न दिया। वह क्रुद्ध हो बिना कुछ खाए ही चल दिया। रास्ते में उसे भूख से पीड़ित देख, रास्ता चलने वाले आदमियो ने भात की पोटली दी—भार्या को भी देकर खाओ। उसने वह ले उसे न देने की इच्छा से कहा—भद्रे, यह चोरो के ठहरने का स्थान है। तू आगे आगे जा। फिर सब भात खा चुकने पर उसे खाली पोटली दिखा कहा—भद्रे, उन्होने भात-रहित खाली पोटली ही दी। यह जान कि यह अकेला ही खा गया, उसे दुःख हुआ। वे दोनो जेतवन विहार की पिछली तरफ से जाते हुए पानी पीने के लिए जेतवन मे प्रविष्ट हुए। शास्ता भी उनके आने की प्रतीक्षा करते हुए गन्धकुटी की छाया मे वैसे ही बैठे जैसे रास्ता घेर कर कोई शिकारी बैठा हो। वे दोनो शास्ता को देख, पास जा, प्रणाम कर बैठे। शास्ता ने उनका कुशल समाचार पूछ स्त्री से प्रश्न किया—भद्रे ! क्या यह तेरा स्वामी तेरा हितैषी है, क्या तेरे प्रति स्नेह रखता है ? “भन्ते, मेरा तो इसके प्रति स्नेह है, किन्तु यह मेरे प्रति स्नेह-रहित है। और दिनो की बात रहने दे आज ही इसे रास्ते म भात की पोटली मिली। यह बिना मुझे दिए ही स्वयं खा गया।” “उपासिका, तू नित्य इसकी हितैषिणी तथा इसके प्रति स्नेह रखती रही है। यह स्नेह रहित ही रहा है। लेकिन जब इसे पण्डितों की जबानी तेरे गुण मालूम होते हैं, तो यह तुझे सारा ऐश्वर्य दे देता है।” उसके प्रार्थना करने पर (भगवान् ने) पूर्व जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल म वाराणसी म ब्रह्मदत्त के राज्य करन के समय बोधिसत्त्व आमात्य कुल में पैदा हो बड़े होने पर उसके अर्थधर्मानुशासक हुए।

पुटभत्त ] ३८३ राजा ने अपने पुत्र पर षड्यन्त्र का सन्देह पर उसे निकाल दिया। वह अपनी भार्य्या सहित नगर से निकल काशी मे एक गामडे म रहने लगा। आगे चलकर जब उसने पिता के मरने का समाचार सुना तो कुताशा राज्य को लने के लिए वापिस बनारस आया। रास्ते म उस भार्य्या को भी देकर खान के लिए भात की पोटली मिली। उसने भार्य्या को न दे अकेले ही खाया। भार्य्या कठोर-हृदय जान बडी दुखी हुई। यह बाराणसी का राजा हो उसे पटरानी बना 'इतना ही इसके लिए पर्याप्त है' समझ उसका और कोई सत्कार सम्मान न करता। कैसे दिन कटते है ? तब न पूछता। बोधिसत्त्व ने सोचा—यह देवी राजा का बहुत उपकार करने वाली है, उसके प्रति स्नेह रखती है, लेकिन राजा इसे कुछ नही मानता। इसका सत्कार-सम्मान करवाऊँगा। बोधिसत्त्व न पास जा आदर पूर्वक एक ओर खडे हो 'तात क्या है ?' पूछने पर बातचीत चलाने के लिए कहा—देवी ! हम तुम्हारी सेवा करते हैं। क्या बडे वडो को वस्त्र-खण्ड या भात नही देना चाहिए ? "तात, में स्वय कुछ नही पाती। तुम्हे क्या दूँगी। जब मिलता था दिया। अब राजा मुझे कुछ नही देता। दूसरी किसी चीज की बात जाने द। राज्य ग्रहण करने के लिए आन के समय रास्ते म भात की पोटली पा मुझे भात तक न दे अपने ही खाया।" 'अम्म ! क्या राजा के सामने ऐसा कह सकेगी ?' "तात ! कह सकूँगी।" "तो आज ही जब में राजा के सामने खडा होकर पूछूँ तो ऐसा कहना। में आज ही तेरे गुण प्रकट करूँगा।" ऐसा कहँ बोधिसत्त्व पहले से जाकर राजा के सामने खडा हुआ। वह भी जाकर राजा के सामने खडी हुई। बोधिसत्त्व ने उसे कहा—अम्म ! तुम अति कठोर-हृदया हो। क्या वडे बूडो को वस्त्र या भात नही देना चाहिए ? "तात ! मुझे ही राजा से कुछ नही मिलता। तुम्हें क्या दूँगी।" "क्या पटरानी नही हो ?" 'तात ! कुछ सम्मान न मिलने पर पटरानी होने से क्या होगा ? अब

३८४ [ २.८ २२३ मुझे तुम्हारा राजा क्या देगा। उसने रास्ते में भात की पोटली पा, उसमें से कुछ भी न दे स्वयं खाया।" बोधिसत्त्व ने पूछा— “महाराज, क्या ऐसी बात है ?” राजा ने स्वीकार किया। बोधिसत्त्व ने राजा 'स्वीकार करता है' जान देवी को कहा— “देवी ! राजा को अप्रिय होने पर तुम्हे यहाँ रहने से क्या लाभ ? संसार में अप्रिय का साथ दुखदायी होता है। तुम्हारे यहाँ रहने से राजा को अप्रिय के साथ रहने का दुख होगा। 'प्राणी मिलने वाले के साथ मिलते हैं, न मिलने वाले के साथ नहीं मिलते' जान दूसरी जगह चला जाना चाहिए। दुनिया बहुत बड़ी है।” इतना कह यह गाथाएँ कही— नमे नमन्तस्स भजे भजन्त किच्चानुकुब्बस्स करेय्य किच्च, नानत्थकामस्स करेय्य अत्थ असम्भजन्तम्पि न सम्भजेय्य ॥१॥ चजे चजन्तं घणयं न कयिरा अपेताचित्तेन न सम्भजेय्य, द्विजो दुमं खीरणफलं ति अत्वा अञ्ञं समवेक्खेय्य महा हि लोको ॥२॥ [ झुकने वाले के सामने झुके। संगति करना चाहने वाले के साथ संगति करे। जो अपने काम आता हो उसका काम करे। अनर्थ चाहने वाले का अर्थ न करे। जो संगति करना न चाहता हो, उससे संगति न करे ॥१॥ छोड़ने वाले को छोड़ दे। ऐसे से स्नेह न करे। जिसका दिल विमुख हो गया हो, उससे संगति न करे। जिस तरह पक्षी वृक्ष को फलरहित जानकर दूसरे (वृक्ष) को ढूँढते हैं, उसी तरह दूसरे को ढूँढे। संसार बड़ा है ॥२॥ ]

कुम्भील ] ३८५ नमे नमन्तस्स भजे भजन्त जो अपने सामने झुके उसी के सामने झुके। जो संगति करता है उसी से संगति करे। किच्चानुकुब्बस्स करेय्य किच्चं, काम पड़ने पर जो अपने काम आये, काम पड़ने पर उसका भी काम करे। चजे चजन्तं वणयं न कयिरा अपने को छोड़ने वाले को छोड़ ही दे। उससे तृष्णा नामक स्नेह न करे। अपेतचित्तेन विगन चित्त से वा बदलं हुए चित्त (वाले) के साथ। न सम्भजेय्य वैसे के साथ न मिले जुले। द्विजो दुमं जैसे पक्षी पहले फले होने पर भी जब वृक्ष के फल नहीं रहते तो क्षीणफल हुआ जान उसे छोड़ दूसरे को देखता है, खोजता है उसी तरह अञ्ञं समवेक्खेय्य महा हि यहु लोको। तुम्हें स्नेह करने वाला एक न एक आदमी मिल जायगा। यह सुन बाराणसी राजा ने देवी को सब ऐश्वर्य दिये। तब से लगाकर मिल जुलकर प्रसन्नता पूर्वक रहने लगे। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर दोनो पति पत्नी स्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुए। उस समय पति पत्नी यह दोनो पति पत्नी थे। पण्डित ग्रामात्य तो मैं ही था। २२४. कुम्भार जातक¹ “यस्सेते चतुरो धम्मा...” यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही। ¹देखें वानरिंद जातक (५७)। कथा समान है। केवल एक गाथा अधिक है। २५

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मैं ही

३८८ [ २.८.२२६ आमात्य समझ गया कि राजा ने उसीके बारे मे कहा है। उसके बाद से उसने रणवास को दूषित करने का साहस नहीं किया। उसके सेवक ने भी यह जानकर कि आमात्य को पता लग गया है उसके बाद से वह कर्म करने का साहस नहीं किया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मैं ही बाराणसी-राजा था। वह आमात्य भी राजा ने शास्ता को कह दिया जान तब से यह कर्म नहीं कर सका। २२६. कोसिय जातक “काले निक्खमणा साधु. ” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय कोशल नरेश के बारे में कही। क. वर्तमान कथा कोशल राजा प्रत्यन्त देश को शान्त करने के लिए गैर मुनासिब समय पर निकल पड़ा। कथा उपरोक्त कथा¹ के सदृश ही है। ख. अतीत कथा शास्ता ने पूर्व(-जन्म) की कथा लाकर कहा—महाराज ! पूर्वकाल मे बाराणसी नरेश ने नामुनासिब समय निकल उद्यान में पड़ाव डलवाया। उसी समय एक उल्लू बाँसो के झुण्डो मे घुस कर छिप रहा। कौओ की सेना ने आकर उसे घेर लिया कि निकलते ही पकडेगे। उसने सूर्यास्त तक ¹देखें कळाय मुट्ठि जातक (१७६)

कोसिय ] ३८६ गिरा रहे समय रहते ही निकलकर भागना आरम्भ किया। कौओ ने उसे घेर चोचो से ठांगे मार मार कर गिरा दिया। राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर पूछा—तात ! यह कौवे उल्लू को क्यो मार गिरा रहे हैं ? बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया-महाराज ! अपने निवासस्थान से असमय बाहर निकलने वाले इस प्रकार का बुरा अनुभव करते ही हैं। इसलिए नामुनासिब समय पर अपने स्थान से नहीं निकलना चाहिए। यह बात कहते हुए ये दो गाथाएँ कहीँ— काले निक्खमणा साधु नाकाले साधु निक्खमो, अकालेनेहि निक्खम्म एकम्पि बहूजनो; न किञ्चि अत्थं जोतेति धङ्कारोनाव कोसिय ॥ धीरो च विधिविधानञ्जू परेस विवरन्तगू, सब्बामित्ते वसीकत्वा कोसियोव सुखी सिया ॥¹ [ समय पर (घर से बाहर) निकलना अच्छा है। असमय निकलना अच्छा नही। असमय पर निकलने से किसी लाभ को प्राप्त नहीं करता। अकेले को भी बहुत जन (मार देते हैं) जैसे कौवा की सेना न उल्लू को। धीर, विधि-विधान को जानने वाला, तथा दूसरे के मार्ग पर चलने वाला सभी शत्रुओ को वशीभूत कर (पण्डित) उल्लू की तरह सुखी होने ] काले निक्खमणा साधु महाराज निष्क्रमण का मतलब है निकलने का पराक्रम करना, यह उचित समय पर ही अच्छा होता है। नाकाले साधु निक्खमो असमय अपने निवासस्थान से दूसरे स्थान पर जाना—निकलना या पराक्रम करना—ठीक नहीं। अकालेनेहि इत्यादि चारो पदो मे पहले से तीसरे और दूसरे से चौथे का सम्बन्ध जोडकर इस प्रकार अर्थ जानना चाहिए। अपने निवासस्थान से असमय निकलकर आदमी न किञ्चि अत्थं जोतेति अपनी कुछ भी उन्नति नहीं कर सकता। सो एकम्पि बहूननो बहुत मे भी ¹गाथाओं का टीकाकार ने जो अर्थ दिया है वह ठीक नहीं है। प्रतीत होता है कि कथा अन्यथा हो गई है।

३६० [ २.८.२२६ वे शत्रु इसे अकेला निकला वा जाता देख मारकर महाविनाश को पहुँचा देंगे। यह उपमा है—यङ्ककसेनाय कोसियं जिस प्रकार यह कौओं की सेना इस असमय पर निकले, जाने उल्लू को चोंच से ठोंगे मारती है, महाविनाश को प्राप्त करती है वैसे ही। इसलिए पशु-पक्षियों तक को भी—किसीको भी असमय पर अपने निवासस्थान से नहीं निकलना चाहिए, नहीं चल पड़ना चाहिए। दूसरी गाथा में धीर का मतलब है पण्डित। विधि पुराने बुद्धिमान लोगों द्वारा स्थापित परम्परा। विधानं हिस्सा या क्रम। विवरन्तगू भेद को जानते हुए। सब्बामित्ते सभी शत्रु। वसी कत्वा अपने वश में करके। कोसियोव इस मूर्ख उल्लू से भिन्न किसी दूसरे बुद्धिमान उल्लू की तरह। मतलब यह है कि जो बुद्धिमान 'इस समय निकलना चाहिए, पराक्रम करना चाहिए; इस समय नहीं निकलना चाहिए, नहीं पराक्रम करना चाहिए' यह पुराने पण्डितों द्वारा स्थापित परम्परा नामक जो विधि है उसके विभाग नामक विधान को, अथवा विधि के विधान, क्रम वा अनुष्ठान को जानता है; वह विधिविधान को जानने वाला पराए और अपने भेद को जानकर जैसे बुद्धिमान उल्लू रात्रि को अपने समय पर निकल पराक्रम कर जहां तहां सोए हुए कौओ के सिरों को छेदता हुआ उन सभी शत्रुओं को वश में कर सुखी होता है, इस प्रकार बुद्धिमान आदमी समय पर निकल पराक्रम कर अपने शत्रुओं को वश में कर सुखी होवे, दुःखरहित होवे। राजा बोधिसत्व का कहना सुन रुका। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। पण्डित आमात्य तो मैं ही था।

२२७. गूथपाणक जातक

गूथपाणक ] ३६१ २२७. गूथपाणक जातक “सूरो सूरेण सङ्गम्म....” यह शास्ता ने जेतवन मे रहते समय एक भिक्षु के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा उस समय जेतवन से गव्यूति¹, आधे योजन की दूरी पर एक निगम-ग्राम था। यहाँ से बहुत शलाका-भोजन² मिलता था। वहाँ एक प्रश्न पूछने वाला ठिंगना व्यक्ति रहता था। वह शलाका-भोजन तथा पाक्षिकभोजन लेने के लिए गए तरुण भिक्षु तथा सामणेरो से 'कौन खाते हैं ? कौन पीते हैं ? कौन भोजन करते हैं ?' आदि प्रश्न पूछता। उत्तर न दे सकने पर उन्हे लज्जित करता। वे उसके भय से शलाका भोजन तथा पाक्षिक-भोजन लेने उस गाँव न जाते। एक दिन एक भिक्षु शलाका बाँटने के स्थान पर जाकर बोला—भन्ते ! क्या अमुक गाँव में शलाका-भोजन या पाक्षिक-भोजन है ? “आयुष्मान् ! है, किन्तु वहाँ एक ठिंगना व्यक्ति है जो प्रश्न पूछता है। उत्तर न दे सकने पर गाली देता है, अपशब्द कहता है। उसके भय से कोई नही जा सकते हैं।” “भन्ते ! वहाँ के भोजन मेरे जिम्मे कर। मै उस का दमन कर, उसे निर्विष करके ऐसा बना दूँगा कि आगे से तुम्हे देख कर भागे।” भिक्षुओ ने 'अच्छा' कह वहाँ का भोजन उसके जिम्मे कर दिया। ¹गव्यूति=१/४ योजन। ²शलाक भत्त—गृहस्थों के घर से शलाका से प्राप्त होने वाला भोजन।

गूथपाणक ] ३६३ ने उसे देख सोचा—यह मेरे भय से ही भागा जा रहा है। मेरा इसका युद्ध होना चाहिए। उसने उसे ललकारते हुए पहली गाथा कही— सूरो सूरेन सङ्कम्म विक्कन्तेन पहारिना, एहि नाग निवत्तस्सु किम्मु भीतो पलायसि; पस्सन्तु अङ्गमगधा मम तुम्हञ्च विक्कमं ॥ [ तू शूर है। लडने मे, प्रहार करने मे समर्थ शूर के सम्मुख होने पर हे नाग ! रुक, डर कर भाग क्यो रहा है। जरा अङ्गमगध के लोग मेरा और तेरा पराक्रम देखे । ] तू सूरो मुझ सूरेन साथ आकर वीर्य्य-विक्रम से विक्कन्तेन प्रहार करने की सामर्थ्य होने से पहारिना किस कारण से बिना लडे ही जाता है। एक प्रहार तो देने दे। इसलिए एहि नाग निवत्तस्सु इतने से ही मरने से भयभीत हो किम्मु भीतो पलायसि । यह इस सीमा मे रहने वाले पस्सन्तु अङ्गमगधा मम तुम्हञ्च विक्कम हम दोनो का पराक्रम देखे। उस हाथी ने ध्यान देकर उसकी बात सुन, रुक कर उसने पास जा उसे अप्रसन्न करते हुए दूसरी गाथा कही— न त पादा वधिस्सामि न दन्तेहि न सोण्डिया, मिळ्हेन त वधिस्सामि पूति हञ्जतु पूतिना ॥ [ न तुझे पांव से मारूँगा, न दांतो से, न सूण्ड से । तुझे गूह से मारूँगा । गन्दगी गन्दगी से ही मरे । ] तुझे पांव आदि से नही मारूँगा। तेरे योग्य गूह से ही तुझे मारूँगा। ऐसा कह 'गन्दगी मे रहने वाला कीडा गन्दगी से ही मरे' (करके) उसके सिर पर बडा सा लेण्डा गिरा कर जल छोड उसे वही मार क्रौञ्चनाद करता हुआ आरण्य मे गया।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गूह

३६४ [ २८ २२८

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गूह का कीडा ठिगना था। हाथी वह भिक्षु था। उस बात को प्रत्यक्ष देखने वाला, उस वन-खण्ड मे रहने वाला देवता मै ही था।

२२८. कामनीत जातक

“तयो गिरि... "यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कामनीत ब्राह्मण के बारे मे कही। वर्तमान कथा तथा अतीत-कथा बारहवें परिच्छेद की कामजातक' में आएगी। उन दोनो राजपुत्रो में ज्येष्ठ भाई वाराणसी का राजा हुआ। छोटा भाई उपराजा। राजा की कामभोगो से तृप्ति न होती थी। वह धन का लालची था। तब बोधिसत्त्व शक्र देवेन्द्र राजा था। उसने जम्बूद्वीप पर नजर डालते हुए उस राजा को दोनो प्रकार के भोगा मे अतृप्त जान उसका निग्रह कर उसे लज्जित करने के उद्देश्य से ब्राह्मण-ब्रह्मचारी का रूप बना आकर राजा को देखा। राजा ने पूछा- “ब्रह्मचारी ! किस मतलब से आये ?" "महाराज ! मुझे तीन नगर ऐसे दिखाई देते है जो शान्त हैं, धनधान्य से पूर्ण है, जहाँ हाथी, घोडे, रथ और पैदल बहुत है, तथा जो हिरण्य, स्वर्ण के अलङ्कारो से भरे हैं। उन नगरा को थोडी ही सेना से जीता जा सकता है। मैं तुम्हें वे नगर जीत कर देने के लिए आया हूँ।" “ब्रह्मचारी ! कब चलेंगे।"

'कामजातक (४६७)

कामनीत ] ३६५ "महाराज ! कल ।" "तो जा, प्रातःकाल ही आना ।" "अच्छा महाराज ! जल्दी से सेना तैयार कराएं" यह शक्र अपने स्थान को चला गया । अगले दिन राजा ने मुनादी करवा सेना तैयार करवाई और आमात्यो को बुलाकर कहा—"कल एक ब्राह्मण-तरुण ने उत्तर-पाञ्चाल, इन्द्रप्रस्थ तथा केकय इन तीन नगरो के राज्य को जीत कर देने के लिए कहा है । उस तरुण को लेकर तीनो नगरो का राज्य जीतेंगे । उसे जल्दी से बुलाओ।" "देव ! उसे निवासस्थान कहाँ दिलवाया है ?" "मैने उसे निवास-गृह नही दिलवाया ।" "उसे भोजन-खर्च दिया ?" "वह भी नही दिया ।" "उसे कहाँ ढूँढ ?" "नगर की गलियो में ढूँढो ।" उन्होने ढूँढा । न मिलने पर कहा— "महाराज ! दिखाई नही देता ।" माणवक को न देखने से राजा को महान शोक हुआ—अरे ! इतना बडा ऐश्वर्य जाता रहा । हृदय गर्म हो गया । रक्त प्रकुप्त हो गया । रक्तातिसार हो गया । वैद्य चिकित्सा न कर सके । तब तीन चार दिन गुजरने पर शक्र ने ध्यान देकर उसके रोग को जान उसकी चिकित्सा करूँगा सोच ब्राह्मण रूप धारण कर दरवाजे पर खडे हो कहलाया—वैद्य-ब्राह्मण तुम्हारी चिकित्सा के लिए आया है । राजा ने उसे सुन कहा—बडे वडे ˚द्य भी मेरा इलाज नही कर सके । इसे खर्चा देकर विदा करो । शक्र बोला—मुझे न भोजन की आवश्यकता है, न खर्चे की । वैद्य की फीस भी नही लूंगा । उसकी चिकित्सा करूँगा । राजा मुझे मिले । राजा ने यह सुनकर कहा—तो आ जाए । शक्र प्रविष्ट हो जय बुलाकर एक ओर खडा हुआ । राजा ने पूछा— "तू मेरी चिकित्सा करेगा ?" "देव, हाँ !"

३६६ [ २.८.२२८ “तो चिकित्सा कर।” “अच्छा महाराज ! मुझे रोग का लक्षण बताएँ। किस कारण से रोग पैदा हुआ ? कुछ खाने पीने के कारण हुआ वा कुछ देखने सुनने के ?” “तात ! मेरा रोग सुनने से पैदा हुआ।” “तूने क्या सुना ?” “तात ! एक तरुण ने आकर कहा कि मैं तीन नगरो या राज्य जीत कर दूंगा। मैने उसे निवासस्थान वा भोजन-खर्च नही दिलवाया। वह मुझसे क्रुद्ध होकर दूसरे राजा के पास चला गया होगा। इस प्रकार 'मेरा इतना बड़ा ऐश्वर्य्य जाता रहा' सोचते रहने के कारण यह रोग पैदा हो गया है। यदि कर सकते हो तो कामना से उत्पन्न रोग की चिकित्सा करो।” इस अर्थ को प्रकट करते हुए पहली गाथा कही— तयो गिरिं अन्तर कामयामि पञ्चाला कुरयो केकये च; ततुत्तरिं ब्राह्मण कामयामि तिकिच्छ मं ब्राह्मण कामनीत ॥ [तीनो नगर और वे जिनकी राजधानी है उन पाञ्चाल, कुरु तथा केकय देश की इच्छा करता हूँ। उससे अधिक भी इच्छा करता हूँ। हे ब्राह्मण ! मुझ कामना-ग्रस्त की चिकित्सा कर।] तयोगिरिं का मतलब है तीन गिरि। अथवा तयोगिरी को ही पाठ समझें। जैसे 'यह सुदर्शनगिरि के द्वार को प्रकाशित करता है' यहाँ सुदर्शन देवनगर को युद्ध करके ग्रहण करना कठिन होने से, अस्थिर करना कठिन होने से सुदर्शन- गिरि कहा गया। इसी प्रकार यहाँ भी तीनो नगरो से मतलब है तीनों गिरि। इसीलिए यही अर्थ है कि तीनो नगर और उनके अन्दर तीनो प्रकार के राष्ट्र की इच्छा करता हूँ। पञ्चाला, कुरयो केकये च यह उन राष्ट्रो के नाम हैं। उनमें पञ्चाला से मतलब है उत्तर पञ्चाल, जहां कम्पिल्ल नगर है। —————— 'निमि जातक (५४१); गाथा १५१

कामनीत ] ३६७ कुरयो का मतलब है कुरु राष्ट्र, उसमें इन्दपत्त नाम का नगर है। केकये प्रथमा विभक्ति के अर्थ में द्वितीया है। इससे केकय राष्ट्र का मतलब है। वहाँ केक्य राजधानी ही नगर है। ततुत्तरिं मैने यहाँ वाराणसी राज्य तो प्राप्त किया है और तीन राज्य कामयामि। तिकिच्छ मं ब्राह्मण काम- नीत, इन वस्तु-कामनाओं तथा भोग-कामनाओं से ले जाए गए, मारे गए मुझको, हे ब्राह्मण ! यदि सामर्थ्य है तो अच्छा कर। शक्र ने 'महाराज ! जड़फूल की ओषधियों से तेरी चिकित्सा नही हो सकती, ज्ञानौषध से ही तेरी चिकित्सा हो सकती है' कह दूसरी गाथा कही— कण्हाहिदिट्ठस्स करोन्ति हेके अमनुस्सावद्वस्स¹ करोन्ति पण्डिता; न कामनीतस्स करोति कोचि ओक्कन्तसुक्कस्स ही का तिकिच्छा ॥ [ कोई कोई काले साँप से डसे की चिकित्सा करते हैं, कोई कोई पण्डित भूत प्रेतादि अमनुष्यों से अभिभूतो की चिकित्सा करते हैं, लेकिन कामनाओं के जो वशीभूत हुआ है उसकी कोई चिकित्सा नही करता। जो शुक्लधर्म की मर्यादा को लाँघ गया, उसकी क्या चिकित्सा ? ] कण्हाहिदिट्ठस्स करोन्ति हेके कुछ चिकित्सक घोर विषैले सर्प, काले सर्प से डसे हुए की मन्त्रो से तथा औषधिया से चिकित्सा करते हैं। अमनुस्सवद्वस्स करोन्ति पण्डिता, दूसरे पण्डित भूतवैद्य, भूतयक्षादि अमनुष्यों द्वारा मारे गए, अभिभूत, ग्रहण किए गए, लोगो की बलिकर्म, परित्तकर्म, औषध तथा भावना आदि से चिकित्सा करते है। न कामनीतस्स करोति कोचि कामनाओ के वशीभूत आदमी की पण्डितों को छोड़ दूसरा कोई चिकित्सा नही करता। यदि करे भी, तो कर नही सकता। किस कारण से ? ओक्कन्तसुक्कस्स ही का तिकिच्छा, जिन्होने कुशल धर्म को पार कर लिया, जिन्होने कुशलधर्म की ¹'अमनुस्सयिद्वस्स' पाठ अच्छा है।

३६८ [ २८.२२८ मर्यादा लांघ दी, जो अकुशल धर्म में प्रतिष्ठित हो गए, ऐसे आदमियो कं मन्त्र वा औषध से क्या चिकित्सा होगी ? ऐसे मूर्ख को दवाइयो से अच्छ नही किया जा सकता । इस प्रकार वोधिसत्त्व ने राजा को यह बात समझाते हुए आगे यूं कहा— “महाराज ! यदि तू इन तीनो राज्यो को प्राप्त करेगा, तो इन चारो नगरं पर राज्य करता हुआ क्या तू एक ही साथ चार चार वस्त्र पहनेगा ? अथवा चार चार सोने की थालियो मे भोजन करेगा ? अथवा चार चार पलंगो पर सोएगा ? महाराज ! तृष्णा के वशीभूत न होना चाहिए । यह विपत्ति क मूल है। यह बढने पर अपने को बढाने वाले आदमी को आठ महा निरयं में, सोलह उस्सद निरयो मे तथा शेष नाना प्रकार के अपायो मे जा गिराती है।' इस प्रकार राजा को निरय आदि के भय से धमका कर वोधिसत्त्व ने धर्मोपदेश दिया । राजा भी धर्म सुनकर शोकरहित हुआ । उसी समय उसक रोग जाता रहा । शक्र भी इसे उपदेश दे, शीलो मे प्रतिष्ठित कर देवलोक कं ही चला गया । वह भी उस समय से लेकर दानादिपुण्यकर्म करके यथाकर्म (परलोक) गया शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय राज कामनीत ब्राह्मण था । शक्र तो मै ही था ।

२२६. पलासी जातक¹

“गज्जग्गमेघेहि ” यह शास्ता ने जेतवन मे रहते समय पलासी परि- व्राजक के बारे मे कही—

¹पलासि जातक

क. वर्तमान कथा

पलासी ] ३६६ क. वर्तमान कथा वह शास्त्रार्थ करने के उद्देश्य से सारे जम्बूद्वीप मे घूमा। कोई शास्त्रार्थ करने वाला न मिला। घूमता घूमता वह श्रावस्ती पहुँचा। यहाँ जाकर लोगो से पूछा कि मेरे साथ कोई शास्त्रार्थ कर सकता है? मनुष्यो ने इस प्रकार बुद्ध गुणों की प्रशसा की—तेरे जैसे हजार हो तो उनके साथ भी शास्त्रार्थ कर सकने वाले, सर्वज्ञ, मनुष्यो म श्रेष्ठ, धर्मेश्वर, दूसरे वादो को जीतने वाले महान् गौतम हैं। सारे जम्बूद्वीप मे भी उत्पन्न हुआ विरोधी मत उन भगवान् को नही छूरा सकता। सभी मत उनके चरणो मे आने पर इस प्रकार चूर्ण विचूर्ण हो जाते है जैसे लहरे किनारे पर पहुँच कर।” परिव्राजक ने पूछा—इस समय वह कहाँ है? उत्तर मिला—जेतवन म। उसने सोचा—अब उसके साथ शास्त्रार्थ करूँगा। बहुत से आदमियो के साथ उसने जेतवन जाते समय, नो करोड खर्चे से जेत राजकुमार द्वारा बनाया हुआ जेतवन-द्वार देखा। उसने पूछा—यही श्रमण गौतम के रहने के प्रासाद हैं ? "यह तो ड्योढी है।" "यदि ड्योढी ऐसी है तो निवासस्थान कैसा होगा ?" "गन्धकुटी तो असीम है।" उसने सोचा ऐसे श्रमण से कौन शास्त्रार्थ करेगा! यह वही से भाग गया। शोर मचाते हुए कुछ मनष्यो ने जेतवन मे प्रवेश किया। शास्ता ने पूछा— क्यो असमय आए ? उन्होने वह समाचार कहा। शास्ता ने कहा—उपासको। केवल अभी नही, यह पहले भी मेरे निवासस्थान की ड्योढी को ही देख कर भाग गया था। उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल म गन्धार राष्ट्र म तक्षशिला में बोधिसत्त्व राज्य करते थे। वाराणसी म था ब्रह्मदत्त। उसने तक्षशिला पर अधिकार करने की इच्छा से बडी सेना के साथ जाकर, नगर के समीप पहुँच, सेना को यह आज्ञा देते हुए

कि 'इस तरह से हाथियों को भेजो, इस तरह से घोड़े, इस तरह से रथ, इस तरह से पैदल, इस तरह दौड़ कर शस्त्रो से प्रहार करो तथा इस प्रकार बादलो की घनी वर्षा की तरह बाणो की वर्षा बरसाओ' ये दो गाथाएँ कही— गजगमेघेहि हयग्गमालिहि रयूमिलातेहि सराभिवस्सहि; थरुग्गहावट्टदळ्हप्पहारिहि परिवारिता तक्कसिला समन्ततो ॥ अभिधावया च पतया च विविधविनदिता च दन्तिहि; वत्ततज्ज तुमुलो घोसो यथा विज्जुता जलधरस्स गज्जतो ॥ [ श्रेष्ठ हाथियो रूप बादलो से, उत्तम घोड़ो की पक्तियो से, रथो की लहरो से, शरो की वर्षा से, तलवार धारी चारो ओर प्रहार करने वालो से तक्षशिला को चारो ओर से घेर लो । दौडो, उदलो तथा नाना प्रकार के नाद करने वाले हाथियो द्वारा आज तुमुल घोष करो, जैसे बिजली गर्जना करने वाले मेघो के साथ उछलती कदती है।] गजगमेघेहि श्रेष्ठ हाथियो रूप मेघो के द्वारा । क्रौञ्चनाद गर्जना करने वाले, मस्त हाथियो रूप बादलो द्वारा, यही अर्थ है। हयग्गमालिहि श्रेष्ठ घोडो की पंक्ति द्वारा। श्रेष्ठ घोडो की पंक्ति के समूह के द्वारा, अश्वो की सेना के द्वारा, यही अर्थ है। रयूमिलातेहि लहरो के वेग वाले, सागर के जल की तरह रथो की लहरो वाले—रथसेना यही मतलब है। सराभिवस्सहि उन रथ-सेनाओ से मूसलधार बरसने वाले मेघ की तरह तीरो की वर्षा बर- साते हुए। थरुग्गहावट्टदळ्हप्पहारिहि इधर उधर से घूम कर दृढ प्रहार करने वालो से, तलवार के दस्ते पकड़े हुए, पैदल योद्धाओ से । परिवारिता तक्कसिला समन्ततो, जिस प्रकार यह तक्षशिला चारों ओर से घिर जाए, वैसा करो ।

दुतियपलासी ] ४०१

अभिधावथा च पतथा च जल्दी से दौड़ो तथा कूदो। विविध विनन्दिता च दन्तिहि धेष्ठ हाथियो के साथ नाना प्रकार से शोर मचाने वाले होओ। सीटी बजाने, गरजने, बाजे बजाने आदि के नाना प्रकार के शब्द करो। धत्तत्तज्ज तुमलो घोसो आज़ बिजली के सदृश महान् घोष हो। यथा विज्जुता जलधरस्स गज्जतो जैसे गरजते हुए बादल के मुंह से निकली हुई बिजलियाँ विचरण करती हैं, उसी प्रकार विचरते हुए, नगर को चारो ओर से घेर कर, राज्य छीन लो,' यही अभिप्राय है।

वह राजा गरज कर सेना को आज्ञा दे नगर-द्वार के समीप गया। वहाँ ड्योढी को देख कर उसने पूछा कि क्या यह राजा के रहने का स्थान है ? यह 'ड्योढी है' सुन उसने सोचा—जब ड्योढी ऐसी है तो राजा का निवास- स्थान कैसा होगा ? उत्तर मिला—वैजयन्त-प्रासाद जैसा। इस प्रकार के ऐश्वर्यशाली राजा के साथ युद्ध न कर सकूँगा, सोच ड्योढी देख कर ही रुक, भाग कर वाराणसी चला आया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वारा- णसी राजा पलासी परिव्राजक था। तक्षशिला-राजा तो मैं ही था।

२३०. दुतियपलासी जातक

"धजमपरिमितं ...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय, एक पलासी परिव्राजक के ही बारे मे कही।

क. वर्तमान कथा

इस कथा में वह परिव्राजक जेतवन में दाखिल हुआ। उस समय जन- समूह से घिरे हुए, अलंकृत धर्मासन पर बैठे हुए, शास्ता मनोशिलातल पर २६