जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
पहले भी अधिक लज्जाशील ही था” कह यह धर्मदेशना ला जातक का
३४० [ २.७ २१२ द्वय याचनको तात सोमदत्त निगच्छति अलाभं धनलाभञ्च एवधम्मा हि याचना ॥ [ तात सोमदत्त ! माँगने वाले की दो ही हालते होती है—धन मिलता है या नही मिलता । माँगने का यह स्वभाव ही है । ] एवधम्मा हि याचना; माँगने का यही स्वभाव है । शास्ता ने “भिक्षुओ-लालुदायी केवल अभी अधिक लज्जाशील नही है, पहले भी अधिक लज्जाशील ही था” कह यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय सोमदत्त का पिता लालुदायी था। सोमदत्त मै ही था। २१२. उच्छिट्ठभत्त जातक “अद्धओ उपरिमो धण्णो ” यह शास्ता ने जतवन म विहार करते समय पूर्व भार्या की आसक्ति के बारे में कही— क. वर्तमान कथा शास्ता, ने पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? “सचमुच !” “तुझे किसने आकर्षित किया ?” “पूर्व भार्या ने ।” “भिक्षु ! यह स्त्री तेरा अपकार करने वाली है। पहले भी इसने तुझे अपने जार का जूठा खिलाया है।”
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
- उच्चिट्ठभत्त ] ३४१ इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने एक ऐसे दरिद्र नट के कुल में जन्म ग्रहण किया जो भीख मांगकर जीविका चलाता था। बडे होने पर वह दरिद्र अवस्था को प्राप्त हो भीख माँग कर जीविका चलाने लगे। उस समय काशी देश के एक गाँव में एक ब्राह्मण की ब्राह्मणी दुश्शीला थी, पापिन थी, व्यभिचार करती थी। एक दिन किसी काम से जब ब्राह्मण बाहर गया तो उसका जार मौका देख घर मे घुस आया। उसने उसके साथ अनाचार कर चुकने पर कहा—"कुछ अच्छा खा कर ही जाओगे ?” उसने भात तैयार कर दाल (= सूप) व्यञ्जन से युक्त भात परोस कर दिया कि तू खा। स्वय ब्राह्मण के आगमन की प्रतीक्षा करती हुई द्वार पर खडी हुई। उस समय बोधिसत्त्व ब्राह्मणी के जार के खाने की जगह पर भीख की प्रतीक्षा में खडे थे। तभी ब्राह्मण घर की तरफ आया। ब्राह्मणी-ने उसे आते देख जल्दी से घर मे जाकर जार को कहा—'उठ, ब्राह्मण आ रहा हैं' और उसे कोठे में उतार दिया। ब्राह्मण के घर में दाखिल हो बैठने के समय पीढा तथा हाथ धोने को पानी दे जार के जूठे छोडे ठंडे भात के ऊपर गरम भात परोस दिया। उसने जब भात में हाथ डाला तो ऊपर का भात गरम और नीचे का ठंडा पाया। वह सोचने लगा कि यह दूसरे का खाकर बचा हुआ जूठा भात होगा। उसने ब्राह्मणी से पूछते हुए पहली गाथा कही— अञ्ञो उपरिमॊ वण्णो अञ्ञो वण्णोय हेट्ठिमो, ब्राह्मणित्वेव पुच्छामि किं हेट्ठा कि च उपरि ॥ [ऊपर (के भात) का रूप ढग दूसरा हैं, नीचे (के भात) का दूसरा। ब्राह्मणी ! तुझे ही पूछता हूँ कि यह क्या ऊपर है और क्या नीचे ?] ——— वण्णो आकार। यह ऊपर वाले के गरम होने की और नीचे वाले के ठंडे होने की बात पूछते हुए कहा। किं हेट्ठा किञ्च उपरि परोसा हुआ भात
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ऊपर ठंडा और नीचे गरम होना चाहिए। यह वैसा नहीं है। इसलिए तुझे पूछता हूँ। किस कारण से ऊपर का भात गरम और नीचे का ठंडा है? ब्राह्मणी अपनी करतूत के प्रकट हो जाने के भय से ब्राह्मण के बार बार कहने पर भी चुप ही रही। उस समय बोधिसत्त्व को यह सूझा कि कोठे में बिठाया हुआ आदमी जार होगा और यह घर का स्वामी। ब्राह्मणी अपनी करतूत के प्रकट होने के भय से कुछ नहीं बोलती। हन्त ! मैं इसकी करतूत प्रकट कर जार के कोठे में बिठाए होने की बात कह दूँ। उसने ब्राह्मण के घर से निकलने से जार के घर में प्रवेश करने, अनाचार करने, श्रेष्ठ भात खाने, ब्राह्मणी का दरवाजे पर खड़े हो रास्ता देखने और जार को कोठे में उतारने तक का सब हाल कह दूसरी गाथा कही— अहं नटोस्मि भदन्ते भिक्खकोस्मि इधागतो, अयं हि फोट्ठमोतिण्णो अयं सो यं गवेससि ॥ [स्वामी ! मैं नट हूँ। भीख मांगने के लिए यहाँ आया हूँ। यह है कोठे सें उतरा हुआ और यह ही है जिसे तू खोजता है।] अहं नटोस्मि भदन्ते, स्वामी ! मैं नट जाति का हूँ। भिक्खकोस्मि इधागतो मैं भिखमंगा यहाँ भीख माँगता हुआ आया हूँ। अयं हि कोट्ठमोतिण्णो यह इसका जार इस भात को खाता हुआ तेरे भय से कोठे में उतरा है। अयं सो यं गवेससि, जिसे तू खोज रहा है कि यह किसका जूठा भात होगा, वह यही है। 'इसे बालो से पकड़, कोठे से निकाल ऐसा कर जिसमें इसे होश रहे और फिर यह ऐसा पाप-कर्म न करे' कह चला गया। ब्राह्मण उन दोनों को डरा, पीट कर ऐसी शिक्षा दे जिसमें वे फिर ऐसा पाप-कर्म न करें, कर्मानुसार गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित भिक्षु सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय ब्राह्मणी पूर्व-भार्या थी। ब्राह्मण उत्कण्ठित। नट-पुत्र मैं ही था।
२१३. भरु जातक '
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भरु ] ३४३ २१३. भरु जातक ' "इसीनमन्तरं कत्वा. " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कोशल राजाओ के बारे में कही। क. वर्तमान कथा भगवान् के भिक्षुसघ का लाभ तथा सत्कार बहुत था । जैसे कहा है— "उस समय भगवान् का सत्कार होता था, गौरव होता था, मान होता था, पूजा होती थी, आदर होता था और उन्हें चीवर, पिण्डपात (=भिक्षा), शयनासन, रोगी की दवाई आदि चीजें मिलती थी, भिक्षुसघ का भी सत्कार होता था, गौरव होता था, मान होता था, पूजा होती थी, आदर होता था और उसे चीवर, पिण्डपात, शयनासन, रोगी की दवाई आदि चींजे मिलती थी । लेकिन दूसरे तैथिक परिव्राजको का न सत्कार होता था, न गौरव होता था, न मान होता था, न पूजा होती थी, न आदर होता था और न उन्हें चीवर, पिण्डपात, शयनासन, रोगी की दवाई आदि चींजे ही मिलती थी ।" इस प्रकार जब उनका लाभ सत्कार जाता रहा तो वे दिन रात छिपकर इकट्ठे हो विचार करते कि जब से श्रमण गौतम पैदा हो गया है तभी से हमारा लाभ सत्कार जाता रहा, श्रमण गौतम को ही श्रेष्ठ लाभ तथा यश मिलता है । क्या कारण है कि इसे यह सब मिलता है ? कुछ ने कहा—श्रमण गौतम सकल जम्बूद्वीप में उत्तम स्थान श्रेष्ठ-भूमि पर रहता है । इसीसे उसे लाभ सत्कार की प्राप्ति होती है । बारी बोले— यही कारण है। हम भी जेतवन मे तैथिक आश्रम बनवाएं । इससे हमको भी लाभ होगा । उन सब ने 'यह ठीक है' निश्चय कर सोचा—यदि हम राजा को बिना सूचित किए आश्रम बनवाएँगे तो भिक्षु रोक देंगे। घूस पाकर पक्षपात न
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करने वाला कोई नहीं है। इसलिए राजा को रिश्वत दे आश्रम के लिए जगह लेंगे। यह सलाह कर उपस्थापकों से माग राजा को लाख दे कहा—महाराज ! हम जेतवन में तैर्थिक-आश्रम बनाएँगे। यदि भिक्षु तुम्हें कहें कि हम बनाने नहीं देंगे तो उनकी बात 'स्वीकार न करना। राजा ने रिश्वत के लोभ से 'अच्छा' यह स्वीकार किया। तैर्थिकों ने राजा को मिला बड़इयों को बुलवा काम शुरू किया। बड़ा शोर हुआ। शास्ता ने पूछा—आनन्द ! यह हल्ला करने वाले, शोर मचाने वाले कौन हैं ? “भन्ते ! अन्य तैर्थिक जेतवन में तैर्थिक-आश्रम बनवा रहे हैं। वही यह शोर हो रहा है।” “आनन्द ! यह स्थान तैर्थिकों के योग्य नहीं है। तैर्थिक शोर-प्रिय होते हैं। उनके साथ रहना नहीं हो सकता।” शास्ता ने भिक्षु-संघ को एकत्र कर कहा—भिक्षुओ, जाओ राजा को कह कर तैर्थिक-आश्रम का बनवाना रुकवाओ। भिक्षु जाकर राजा के प्रवेशद्वार पर खड़े हुए। राजा ने यह सुना कि भिक्षु आए हैं तो यह समझ कर कि तैर्थिकों के आश्रम के ही बारे में आए होंगे रिश्वत लिए रहने के कारण कहलवा दिया कि राजा घर में नहीं है। भिक्षुओं ने जाकर शास्ता से कहा। शास्ता ने 'रिश्वत के कारण ऐसा करता हैं' सोच दोनों प्रधान शिष्यों को भेजा। राजा ने उनका भी आना सुन वैसे ही कहलवा दिया। उन्होंने भी आकर शास्ता से कहा। ‘सारिपुत्र ! अब राजा को घर में बैठना न मिलेगा, बाहर निकलना ही होगा' कह शास्ता अगले दिन पूर्वाह्ण समय पहन कर, पात्र चीवर ले पांच सौ भिक्षुओं के साथ राजा के प्रवेशद्वार पर पहुँचे। राजा ने सुना तो वह महल से उतर पात्र ले शास्ता को (अन्दर) लिवा भिक्षुसंघ को, जिसमें मुख्य बुद्ध थे यवागू-खाद्य दे शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। शास्ता ने राजा को एक तरह का धर्मोपदेश करते हुए कहा—महाराज ! पुराने राजाओं ने रिश्वत ले शीलवानों में परस्पर झगड़ा कराया। वे अपने देश के स्वामी नहीं रहे और महान् विनाश को प्राप्त हुए। उसके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
भरु ] ३४५ ख. अतीत कथा पूर्व काल में भरु राष्ट्र में भरु राजा राज्य करता था। उस समय बोधि- सत्व पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्ति प्राप्त थे। वे गण-शास्ता तपस्वी हो, हिमालय प्रदेश में चिरकाल तक रह नमक खटाई खाने के लिए पाँच सौ तपस्वियो को साथ ले हिमवन्त से उतरे। क्रमश भरु नगर पहुँच, वहाँ भिक्षा माँग, नगर से निकल उत्तर-द्वार पर टहनी-टहनो वाले वट वृक्ष के नीचे बैठ भोजन कर वही रहने लगे। इस प्रकार जब उस ऋषि-समूह को वहाँ रहते आधा महीना हुआ, एक दूसरा गण-शास्ता पाँच सौ तपस्वियो सहित आ, नगर में भिक्षा माँग, नगर से निकल दक्षिण-द्वार पर उसी वट वृक्ष के नीचे बैठ, भोजन कर वही रहने लगा। वे दोनो ऋषि-समूह वहाँ यथारुचि रह कर हिमालय चले गए। उनके चले जाने पर दक्षिण-द्वार का वट वृक्ष सूख गया। अगली बार आने पर दक्षिण-द्वार के वट-वृक्ष के नीचे रहने वालो ने पहले पहुँच जब यह देखा कि उनका वट-वृक्ष सूख गया है, तो वे भिक्षा माँग, नगर से निकल, उत्तर-द्वार पर वट-वृक्ष के नीचे जा, भोजन कर वही रहने लगे। दूसरे ऋषि पीछे आकर, नगर में भिक्षा माँग, अपने वृक्ष के नीचे पहुँच भोजन कर वहाँ रहने लग। उन दोनो में 'यह तुम्हारा वृक्ष है' 'यह हमारा वृक्ष है' करके झगडा हो गया। झगडा बढ गया। एक पक्ष ने कहा कि हम यहाँ रहने थे, इसलिए इस स्थान पर तुम्हारा अधिकार नही। दूसरे ने कहा कि इस बार हम यहाँ पहले आए, इसलिए तुम्हारा अधिकार नही। इस प्रकार वे दोनो 'हम स्वामी' 'हम स्वामी' करके वृक्ष के नीचे की जगह के लिए झगडा करते हुए राज-कुल गए। राजा ने पहले रहे ऋषि-समूह को ही स्वामी बनाया। दूसरो ने कहा अब हम यह नही कहलाएँगे कि इनसे हार गए। उन्होने दिव्य-चक्षु से चक्रवर्ती राजा के योग्य एक रथ का चौखटा देख, ला, राजा को रिश्वत दे कहा— महाराज ! हमें भी (उस स्थान का) स्वामी बनाएँ। राजा ने रिश्वत ले दोनो समूह रहें (कह) दोनो को स्वामी बनाया। दूसरे ऋषियो ने उस रथ के चौखटे के रत्नो के पहिए लाकर रिश्वत दे कहा— महाराज ! हमें ही स्वामी करें।
३४६ [ २.७.२१३ राजा ने वैसा ही किया। ऋषियो ने सोचा कि हम काम-भोगो को छोड प्रव्रजित हुए। फिर वृक्ष के नीचे की जगह के लिए झगडते हुए रिश्वत देने लगे। हमने यह अनुचित किया। इस प्रकार पश्चात्ताप कर वे जल्दी से भाग कर हिमालय ही चले गए। सकल भरु राष्ट्रवासी देवताओ ने एकत्र हो कर कहा—राजा ने शील- बानो में झगडा पैदा करके अच्छा नही किया। उन्होने क्रोधित हो तीन सौ योजन के भरु राष्ट्र को समुद्र मे तूफान लाकर नष्ट कर दिया। इस प्रकार एक भरु राजाओ के कारण सारा राष्ट्र विनाश को प्राप्त हुआ (यह) शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा ला अभिसम्बुद्ध होने पर यह गाथाएँ कही— इसीनमन्तर कत्वा भरूराजाति मे सुत, उच्छिन्नो सहराट्ठेन स राजा विभव गतो ॥ तस्मा हि छन्दागमन नप्पसंसन्ति पण्डिता, अदुट्ठचित्तो भासेय्य गिर सञ्चूपसंहित ॥ [ ऐसा मैने सुना कि ऋषियों में भेद करके भरु राजा अपने राष्ट्र सहित विनाश को प्राप्त हुआ। इसलिए पण्डित लोग पक्षपात की प्रशंसा नही करते। द्वेषरहित चित्त से सच्ची बात कह देनी चाहिए। ] अन्तर कत्वा, पक्षपात के कारण भेद करके। भरु राजा भरु राष्ट्र का राजा। इति मे सुत ऐसा मैने पहले सुना। तस्मा हि छन्दागमन, क्योकि पक्षपात करके भरु राजा राष्ट्र सहित नष्ट हुआ इसलिए पण्डित पक्षपात की प्रशंसा नही करते। अदुट्ठचित्तो, विकारो से मलिन चित्त न हो। भासेय्य गिरं सञ्चूपसहित यथार्थ, अर्थयुक्त, सकारण वाणी ही बोले। जिन्होने भरु राजा के रिश्वत लेते समय 'यह उचित नही हैं' कह निन्दा करते हुए सच्ची बात कही, वे जहाँ खडे थे वहाँ नारियल के द्वीप में आज भी हज़ारो दीपक (जलते) दिखाई देते हैं। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला 'महाराज, पक्षपात नहीं करना चाहिए, प्रव्रजितो में झगडा नही कराना चाहिए' कह जातक का मेल बैठाया।
२१४. पुण्णनदी जातक
पुण्णनदी ] ३४७ मैं उस समय में ज्येष्ठ ऋषि था। राजा ने तथागत के भोजन करके चले जाने पर आदमियों को भेज कर तैर्थिकों का आश्रम विध्वंस करा दिया। तैर्थिक अप्रतिष्ठित हो गए। २१४. पुण्णनदी जातक "पुण्णं नदि...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय प्रज्ञा पारमिता के बारे में कही। क. वर्तमान कथा एक दिन धर्मसभा में भिक्षुओं ने तथागत की प्रज्ञा के बारे में बातचीत चलाई—आयुष्मन्तो ! सम्यक् सम्बुद्ध महाप्रज्ञा हैं, विस्तृतप्रज्ञा हैं, प्रसन्न- प्रज्ञा हैं, क्षिप्र-प्रज्ञा हैं, तीक्ष्ण प्रज्ञा हैं, उनकी प्रज्ञा बींधने वाली है, वे उपाय- कुशल हैं। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ ! यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, तथागत केवल अभी प्रज्ञावान् तथा उपायकुशल नहीं हैं, पहले भी थे' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व पुरोहित-कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला जा सब शिल्प सीख पिता के मरने पर पुरोहित का पद पा राजा के अर्थधर्मानुशासक हुए। आगे चलकर राजा ने चुगली करने वालों की बात का विश्वास कर क्रोधित हो बोधिसत्त्व को 'मेरे पास मत रह' कह निकाल दिया। बोधिसत्त्व स्त्री-बच्चों को ले काशी के एक गामड़े में रहने लगे। फिर राजा को बोधि-
३४८ [ २.७.२१४ सत्य के गुणो की याद आई। उसने सोचा कि किसीको भेजकर मेरे लिए आचाय्यं को बुलाना ठीक नही। एक गाथा रच, पत्र लिख, कौवे का मास पकवा, सफेद वस्त्र से लपेट, राजकीय मोहर लगाकर भेजूंगा। यदि पण्डित होगा, पत्र पढ कर कौवे के मास का भाव समझ कर चला आएगा। नहीं, तो नही आएगा। उसने यह गाथा पत्र में लिखी— पुण्णं नदि येन च पेय्यमाहु, जातं यवं येन च गुह्यमाहु ॥ दूरं गतं येन च अब्भपन्ति, सो त्यागतो हन्द च भुञ्ज ब्राह्मण ॥ [ जिसके पीने योग्य होने से नदी पूर्ण समझी जाती है, जिसको छिपा रखने योग्य होने से जौ उत्पन्न हुए समझे जाते हैं; जिसके बोलने से दूर गए आने वाले समझे जाते हैं; वह तेरे लिए आया है। ब्राह्मण ! इसे खा।] पुण्ण नदि येन च पेय्यामाहु, 'काकपेय्य नदी' कहते हुए पूर्ण नदी को ही पेय्य कहते है। अपूर्ण नदी काकपेय्य नदी नही कहलाती; जब नदी किनारे खड़े हो गरदन पसार कर कौआ पी सकता है, तभी उसे काकपेय्य कहते हैं। जातं यवं येन च गुह्यमाहु, जो शीर्षक मात्र है। यहाँ सभी पैदा हुई, उत्पन्न हुई, तरुण खेती से मतलब है। वह जब अन्दर दाखिल हुए कौवे को छिपा सकती है तभी गोपन करने वाली होने से गुह्य कहलाती है। किसे छिपाती है ? कौवे को। इस प्रकार कौवे को छिपाने से काकगुह्य। काक-गुह्य कहने वाले (लोग) गुह्य-वचन का कारण कौवा होता है इसलिए काक-गुह्य कहते हैं। इसीलिए कहा है—येन च गुह्यमाहु । दूरं गतं येन च अब्भहन्ति दूर गया हुआ प्रवासी प्रिय जन होने पर; जिसके आकर बैठने पर (लोग) कहते हैं कि यदि अमुक नाम का व्यक्ति आने वाला है तो कौवे बोल अथवा जिसके बोलने पर लोग समझते हे क्योकि कौवा बोलता है, इसलिए अमुक नाम का व्यक्ति आएगा; इस तरह कहने वाले जिसके कारण कहते हैं, विचार करते हैं, व्यक्त करते हैं। सो त्यागतो वह तेरे लिए लाया गया है। हन्द च भुञ्ज ब्राह्मण, ब्राह्मण ग्रहण कर, खा ! मतलब इस कौवे के मास को खा।
कच्छप ] : ३४५ इस प्रकार राजा ने दूसरे पत्र में लिख बोधिसत्व के पास भेजा। उसने पत्र बाँच 'राजा मुझे देखना चाहता है' यह दूसरी गाथा लिखी— यतो मं सरती राजा वायसम्पित पेहेतवे, हंसा क्रोञ्चा मयूरा च असतिम्येव पापिया ॥ [ जब राजा कौवे का मांस पाकर भी मुझे भेजना याद रखता है, तो हंस, क्रोञ्च और मयूर की तो बात ही क्या ? याद न आना ही बुरा है। ] यतो मं सरति राजा वायसम्पित पहेतवे जब राजा कौवे का मास पाकर भी मुझे उसे भेजना याद रखता है। हंसा क्रोञ्चामयूरा च, जब इसके लिए इस आदि लाए जाएँगे, यह हंसमांस आदि पाएगा, तब मुझे क्यो न याद करेगा ? अट्ठकथा मे हंसारोञ्चमयूरानं पाठ है। यह सुन्दरतर है। अर्थ यही है कि इन हंस आदि का मास पाकर मुझे क्यो न याद करेगा ? असतिम्येव पापिया यह या वह मिलने पर याद आना ही अच्छा है। दुनिया मे याद न आना ही बुरा है, याद न करना ही हीन है, खराब है। यह हमारे राजा में नहीं है। राजा मुझे याद करता है। मेरे आने की प्रतीक्षा करता है। इसलिए जाऊँगा। गाड़ी जुड़वा, जाकर राजा को देखा। राजा ने सन्तुष्ट हो पुरोहित का ही पद दिया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय राजा आनन्द था। पुरोहित मैं ही था।
२१५. कच्छप जातक "अवधी वत अत्तानं.." यह शास्ता ने जेतवन मे रहने समय कोकालिय के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
३५० [ २७ २१५ क. वर्तमान कथा यह कथा महातक्कारि¹ जातक में आएगी। उस समय शास्ता ने कहा— भिक्षुओ, कोकालिक केवल अभी अपनी वाणी से नही मारा गया, पहले भी मारा गया। यह कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा 'पूर्व काल, में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्व अमात्य- कुल में पैदा हो, बडे होने पर उसके अर्थधर्मानुशासक हुए। वह राजा बहुत बोलने वाला था। वह बोलता तो दूसरो को बोलने का मौका न मिलता। बोधिसत्त्व उसकी वाचालता हटाने का कोई उपाय सोचते हुए घूमते थे। उस समय हिमालय-प्रदेश के किसी तालाब में एक कछुआ रहता था। दो हस-बच्चो ने शिकार के लिए घूमते हुए उससे दोस्ती कर ली। उसके प्रति दृढ-विश्वासी हो एक दिन हस-बच्चो ने कछुवे से कहा—दोस्त कछुवे ! हमारे हिमवन्त में चित्रकूट पर्वत के नीचे कञ्चन गुफा में रहने का रमणीक स्थान है। हमारे साथ चलेगा ? "मै कैसे चलूंगा ?" "हम तुझे लेकर चलेंगे, यदि तू अपने मुंह पर काबू रख सकेगा, किसी को कुछ न कहेगा।" "स्वामी ! काबू रखूंगा। मुझे लेकर चलें।' उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया। एक लकडी को कछुवे के मुंह म दे, उसके दोनो सिरो को अपने मुंह में ले वे आकाश में उडे। उसे इस प्रकार हसो द्वारा लिए जाते देख गांव के लडको ने कहा—दो हस कछुवे को डडे पर लिए जाते हैं। हसो की गति तेज होने के कारण वे बाराणसी नगर के राजमहल के ऊपर आ पहुँचे थे। कछुवे ने "दुष्ट चेटको ! यदि मेरे मित्र मुझे ले जाते है ¹ महातक्कारि जातक (४८१)
[Header] कच्छप ] ३५१
तो इसमें तुम्हारा क्या ?'' कहने की इच्छा से उस लकड़ी को जहाँ से पकड़ा था छोड़ दिया। वह खुले आँगन में गिर दो टुकड़े हो गया। एक शोर हुआ—कछुवा खुले आँगन में गिर दो टुकड़े हो गया। अमात्यों से घिरे हुए राजा ने बोधिसत्त्व को साथ ले उस जगह पहुँच, कछुवे को देख पूछा—पण्डित ! यह कैसे गिरा ? बोधिसत्त्व ने सोचा—मै बड़ी देर से राजा को उपदेश देने की इच्छा से किसी उपाय की खोज में घूमता हूँ। इस कछुवे की हंसों के साथ दोस्ती हुई होगी। वे 'इसे हिमवन्त ले चलेंगे' सोच लकड़ी मुंह में दे आकाश में उड़े होंगे। इसने किसी की बात सुन जबान पर काबू न होने से कुछ कहने की इच्छा से डण्डा छोड़ दिया होगा। इस प्रकार आकाश से गिर कर मरा होगा। यह बोला—"हाँ ! महाराज ! जो वाचाल होते हैं, जिनके वचन की सीमा नही होती वे इस प्रकार दुःख को प्राप्त होते हैं।" इतना कह यह गाथाएँ कही— अवधी वत अत्तान कच्छपो व्याहरं गिरं, सुग्गहीतस्मि कट्ठस्मि वाचाय सकिया वधि ॥ एतम्पि दिस्वा नरविरिय सेट्ठ ! वाच पमुञ्चे कुसलं नातिवेलं; पस्ससि बहुभाणेन कच्छप व्यसनं गतं ॥ [कछुवे ने वाणी का प्रयोग करके अपने को मार डाला। अच्छी तरह लकड़ी को पकड़े हुए अपनी वाणी के कारण (उसे छोड़ कर) अपने को मारा। नरवीर्य श्रेष्ठ ! इसे भी देख कर (आदमी को) कुशल वाणी ही बोलनी चाहिए और वह भी समय (की सीमा) लांघ कर नही। देखते ही हो, अधिक बोलने से कछुआ मर गया।] अवधी वत घात किया। व्याहर व्यवहार करते हुए। सुग्गहीतस्मि कट्ठस्मि मुख से अच्छी तरह लकड़ी को पकड़े हुए। वाचाय सकिया वधि वाचाल होने से अनुचित समय पर बोल कर पकड़ी हुई जगह को छोड़ अपनी उस वाणी के कारण अपने को मार डाला। इस प्रकार यह मरा। किसी दूसरे कारण से नही।
३५२ [ २७.२१६
एतम्पि दिस्वा यह बात भी देखकर मरुविरिय रोद्ध नरो में श्रेष्ठ-वीर्य्यं । उत्तसवीर्य्यं राजवर ! वाचं पमुञ्चे कुसलं नातियेतं सत्यादि से युक्त कुशल वाणी ही पण्डित आदमी बोले; वह भी हियाकर समयानुकूल । समय (की सीमा) लांघ कर असीम वाणी न बोले। पस्ससि प्रत्यक्ष देखना है बहुभानेन अधिक बोलने से कच्छपं व्यसनं गतं, यह कछुआ मर गया ।
'राजा ने 'मेरे लिए यह कहा है' सोच पूछा—पण्डित ! मेरे बारे में कह रहा है ? बोधिसत्त्व—महाराज ! चाहे आप हो, चाहे कोई और हो, जो कोई सीमा लांघ कर बोलता है वह इसी प्रकार दु ख भोगता है। यह स्पष्ट करके कहा । उस समय से राजा संयम कर मितभाषी हो गया । शास्ता ने यह धर्म- देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय कछुवा कोकालिक था। दो हंस-बच्चे दो महास्थविर । राजा आनन्द । अमात्य पण्डित तो मैं ही था।
२१६. मच्छ जातक¹ "न मायमग्गि तपित " यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय पूर्व-भार्या के आकर्षण के बारे में कही।
¹देखो मच्छ जातक (१. ४. ३४)
क. वर्तमान कथा
' मच्छ ] ३५३ क. वर्तमान कथा शास्ता ने उसे पूछा—भिक्षु ! क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? “भन्ते, सचमुच” कहने पर शास्ता ने पूछा—“किसने उत्कण्ठित किया ?” जवाब दिया—पूर्व-भार्या ने । शास्ता ने “भिक्षु ! यह स्त्री तेरा अनर्थ करने वाली है। पहले भी तू इसके कारण कांटे से बींधा जाकर, अङ्गारो पर पकाया जाकर खाया जाने वाला था। पण्डित की सहायता से जान बची” कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उसके पुरोहित हुए। एक दिन मछुए जाल में फँसे मच्छ को निकाल कर, गर्म-बालू पर डाल, ‘उसे अङ्गारो में पकाकर खाएँगे’ सोच शूल तराशने लगे। मच्छ ने मछली के बारे में रोने हुए यह गाथा कही— न मायमग्गि तपति न सूलो साधु तच्छितो, यञ्च मं मञ्जति मच्छी अञ्ज सो रतिया गतो ॥ सो मं दहति रागग्गि चित्तं बूपतपेति मं, जालिनो मुञ्चयथिरं मं न कामे हञ्जते क्वचि ॥ [न मुझे, अग्नि तपाती है, न अच्छी तरह से छीला हुआ शूल ही। यह जो मुझे मछली समझेगी कि रति के कारण यह दूसरी मछली के पास चला गया— इसीका मुझे शोक है। मुझे वह रागाग्नि जला रही है। मेर चित्त को तपाती है। हे मछुओ, मुझे छोड़ दो। कामी कही नही मारा जाता ।] न मायमग्गि तपति, न मुझे यह आग जलाती है, न तपाती है, अर्थ है शोक नही है। न सूलो यह शूल भी साधुतच्छितो न मुझे ताप देता है, न शोक उत्पन्न करता है। यञ्च मं मञ्जति, जो मुझे मछली ऐसा कहेगी कि वह पञ्च कामगुणो से प्रेरित हो दूसरी मछली के पास चला गया, यही मुझे तपाता है, यही शोक उत्पन्न करता है। २३
३५४ [ २.७२१७ सो मं दहति, जो यह रागाग्नि है यह मुझे जलाती है। चित्तं धूपतपेति मं, रागयुक्त मेरा चित्त ही मुझे तपाता है, कष्ट देता है, पीडा देता है। जासिनो कैवर्त्तो (मछुओ) को सम्बोधन करता हूँ। यह जाल के अर्थी होने से जासिनो कहलाते हैं। मुञ्चययिरा मं, स्वामी मुझे छोड़ दें, यही याचना करता हूँ न कामे हञ्ञते क्वचि, काम मे प्रतिष्ठित, काम में बहता हुआ प्राणी कहीं नहीं मारा जाता; तुम्हारे जैसो को उसे मारना योग्य नहीं। अथवा कामे हेतु के अर्थ में सप्तमी का प्रयोग है। काम-हेतु से मछली के पीछे पीछे चलने वाला वही भी तुम्हारे जैसो से नहीं मारा जाता। उसी समय बोधिसत्त्व ने नदी किनारे जा उस मच्छ का रोना सुन, मछुओ के पास पहुँच उस मच्छ को छुड़ाया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो का प्रकाशन समाप्त होने पर उत्कण्ठित भिक्षु स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय मछली पूर्व-भार्या थी। उत्कण्ठित भिक्षु मच्छ था। पुरोहित मैं ही था। २१७. सेग्गु जातक “सब्बो लोको....” यह शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय एक तरकारी बेचन वाले उपासक के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
सेग्गु ] ३५५ क. वर्तमान कथा यह कथा पहले परिच्छेद में आ ही चुकी है।१ इस कथा में शास्ता ने पूछा—उपासक ! क्यो देर करके आया है ? "भन्ते ! मेरी लडकी सदैव हँसमुख रहती थी। मैने उसकी परीक्षा कर उसे एक तरुण को दिया।" सो यह करने से आपके दर्शन के लिए आने का समय नहीं मिला।" "उपासक ! वह अब ही सदाचारिणी नही है। पहले भी सदाचारिणी थी। तूने न केवल अभी उसकी परीक्षा की है, पहले भी की ही थी।" इतना कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वं काल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व वृक्ष-देवता हुए। उस समय उसी तरकारी बेचने वाले उपासक ने लडकी की 'परीक्षा करने के लिए' उसे जगल में ले जा काम-भोग चाहने वाले की तरह उसे हाथ से पकडा। वह रोने लगी। उसे यह पहली गाथा कही— सब्बो लोको अत्तमना अहॉसि, अकोविदा गामधम्मस्स सेग्गु ॥ कोमारि कोनाम तवज्ज धम्मो, य त्व गहिता पवने परोदसि ॥ [ सारा लोक (इससे) आनन्दित (होता) है। सेग्गु तू इस ग्राम्य-धर्म से अपरिचित है। कुमारी ! यह तेरा क्या धर्म है कि तू बन मे पकडने पर रोती है। ] सव्यो लोको अत्तमना अहॉसि, धम्म ! सारे प्राणी इस कामभोग के १ पण्णिक जातक (१०२)
३५६ [ २७.२१७ सेवन से सन्तुष्ट (होते) हैं। अकोविदो गामधम्मस्स सेग्गु, सेग्गु, उसका नाम है। सो धम्म सेग्गु । तू इस ग्राम्य धर्म में, इस चाण्डाल-कर्म में दक्ष नही है। कोमारि को नाम सवज्ज धम्मो, धम्म कुमारी । यह आज तेरा क्या स्वभाव है ? य त्व गहिता पवने परोदसि, जो तू मेरे द्वारा इस वन में कामभोग के लिए पकड़ी जाने पर रोती है। स्वीकार नहीं करती। यह तेरा क्या स्वभाव है ? क्या तू कुमारी ही है ? —पूछता है। इसे सुन कुमारी ने कहा—हाँ तात ! मैं कुमारी ही हूँ। मैं मैथुन धर्म को नहीं जानती हूँ। ऐसा कह, रोती हुई दूसरी गाथा बोली— यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताणं, सो मे पिता दूभि वने करोति ॥ सर कस्स कन्दामि वनस्स मज्झे, यो तायिता सो सहसा करोति ॥ अर्थ उपरोक्त प्रकार¹ से ही है। तब वह तरकारी बेचने वाला उस लड़की की परीक्षा कर, घर ले जा, तरुण को दे यथा-कर्म सिधारा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों का प्रकाशन कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर तरकारी बेचने वाला श्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय लड़की (अब की) लड़की ही थी। पिता पिता ही हुआ। उस बात को प्रत्यक्ष करने वाला वृक्ष देवता मैं ही था। ¹पण्णिक जातक (१०२)
२१८. कूटवाणिज जातक
कूटवाणिज ] ३५७ २१८. कूटवाणिज जातक "साठस्स साठेय्यमिद...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक कूट व्यापारी के बारे में कही। क. वर्तमान कथा कूट व्यापारी और पण्डित व्यापारी दो श्रावस्तीनिवासी व्यापारियों ने साझा व्यापार करना आरम्भ करके, सामान की पाँच सौ गाड़ियाँ भरीं। ये पूर्व से पश्चिम घूमते हुए व्यापार कर बहुत मुनाफा कमा श्रावस्ती लौटे। पण्डित व्यापारी ने कूट व्यापारी को कहा—दोस्त ! सामान बाँट लें। कूट व्यापारी ने सोचा—यह बहुत दिनों तक आराम से सोना तथा अच्छा भोजन न मिलने के कारण थका हुआ अपने घर जाकर नाना प्रकार के अच्छे अच्छे भोजा खाएगा, बदहजमी से मरेगा। तब यह सारा सामान मेरा ही हो जाएगा। इस लिए वह 'आज नक्षत्र अच्छा नहीं, कल देगें', 'आज दिन अच्छा नहीं, कल देंगे' करता हुआ समय बिताने लगा। पण्डित व्यापारी ने उसे मजबूर कर सामान बँटवाया। फिर गन्धमाला से शास्ता के पास जा, पूजा-वन्दना कर एक ओर बैठा। शास्ता ने पूछा— कब आया ? "भन्ते ! मुझे आए आधा महीना हुआ।" "तो इस प्रकार देर करके क्यो बुद्ध की सेवा में आया है ?" उसने यह हाल कहा। शास्ता ने 'उपासक ! यह केवल अभी ठग व्यापारी नहीं है, पहले भी ठग व्यापारी ही था' कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही—
कूटवाणिज ] ३५१
बोधिसत्त्व ने दूसरे से पूछा— “क्या यह सच है ?” "स्वामी ! मैं उसे लेकर गया। चिड़िया के उसे ले जाने की बात सच ही है।” “क्या इस दुनिया में चिड़ियाँ बच्चो को ले जाती हैं ?” “स्वामी ! मैं भी आपसे पूछना चाहता हूँ कि चिड़ियाँ तो बच्चों को लेकर आकाश में नहीं उड़ सकती, तो क्या चूहे लोहे के फाल खा सकते हैं ?” “इसका क्या मतलब है ?” “स्वामी ! मैंने इसके घर में पाँच सौ फाल रक्खे। यह कहता है कि तेरे फालो को चूहे खा गए और ‘यह तेरे फालो को खाने वाले चूहों की मेंगनी है’ वह मेंगनी दिखाता है। स्वामी ! यदि चूहे फालें खाते हैं, तो चिड़ियाँ भी बच्चे ले जाती हैं। यदि नहीं खाते हैं, तो बाज तब भी नहीं ले जा सकते हैं। यह कहता है कि तेरे फाला को चूहं खा गए। उन्होंने खाए, या नहीं खाए— इसकी परीक्षा करें। मेरे मुकदमे का फैसला करें।” बोधिसत्त्व ने सोचा—इसने शठ के प्रति शठता का व्यवहार करके जीतने की बात सोची होगी। उसने कहा—तूने ठीक सोचा है। और यह गाथा कही— सठस्स साठेय्यमिदं सुचिन्तित, पच्चोड्डितं पतिकूटस्स कूट । फालञ्चे खादेय्यु मूसिका, कस्मा कुमारं कुलला नो हरेय्यु ॥ कूटस्स हि सन्ति कूटकूटा, भवति चापि निकतिनो निकत्या । देहि पुत्तकट्ठ फालनट्ठस्स फाल, मा ते पुत्तमहासि फालनट्ठो ॥ [ शठ के प्रति शठता, यह अच्छा सोचा है। कुटिल के प्रति कुटिलता का जाल फैलाया है। यदि चूहे फाल खा जाएँगे, तो चिड़ियाँ बच्चे को क्यों नहीं ले जाएँगी।
कुटिल के प्रति कुटिलता का व्यवहार करने वाले हैं। ठग को भी ठगने वाले होते हैं। हे पुत्र-नष्ट ! जिसकी फाल खोई गई है उसकी फाल दे। तेरे पुत्र को जिसकी फाल नष्ट हुई है, वह न ले जाए।] सठस्स, शठता से, धोखे से कोई ढंग निकाल कर दूसरे का माल खाना चाहिए, ऐसा समझने वाले शठ के प्रति। साठेय्यमिवं सुचिन्तितं, जो यह शठता का व्यवहार सोचा है, सो तूने ठीक सोचा है। पच्चोड्डितं पतिकूटस्स कूट, कुटिल आदमी के प्रति तूने कुटिलता का जाल ठीक फैलाया, उसकी चाल का जवाब दे जाल फैलाने सा ही किया—यही अर्थ है। फालञ्चे अदेय्युं मूसिका, यदि चूहे फाल खाएं। कस्मा कुमारं कुळला नो हरेय्युं, जब चूहे फाल खा जाते हैं तो चिड़ियां क्यो बच्चो को नही ले जाएँगी ? कूटस्स हि सन्ति कूटकूटा, तू समझता है कि मै ही चूहो को फाल खिला देने वाला कुटिल पुरुष हूँ; तेरे जैसे कुटिल पुरुष के साथ कुटिलता करने वाले इस लोक मे बहुत कुटिल है। कुटिल के (भी) कुटिल यह कुटिल के प्रति कुटिलता करने वालो का नाम है। यही कहा गया है कि कुटिल के प्रति कुटि- लता करने वाले है। भवन्ति चापि निकतिनो निकत्या, ठगने वाले को ठगने वाला भी दूसरा आदमी होता है। देहि पुत्तनट्ठ फालनट्ठस्स फालं, भो पुत्र नष्ट-पुरुष ! जिसकी फाल नष्ट हुई है उसकी फाल दे। मा ते पुत्तमहासि फालनट्ठो, यदि इसकी फाल नही देगा, तो यह तेरे पुत्र को ले जाएगा। जिससे यह न ले जाए, इसलिए इसकी फाल दे। “स्वामी ! मैं इसकी फाल देता हूँ। यदि यह मेरा पुत्र दे।" “स्वामी ! मैं देता हूँ यदि यह मेरे फाल दे।” इस प्रकार जिसका पुत्र खोया गया था उसने पुत्र पाया। जिसकी फाल खोई गई थी उसने फाल पाई। दोनो कर्मानुसार गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना सुना जातक का मेल बैठाया। उस समय का कुटिल व्यापारी ही कुटिल व्यापारी था। पण्डित व्यापारी ही पण्डित व्यापारी था। मुकद्दमा फैसला करने वाला अमात्य मैं ही था।