कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
(१३)
सवा लाख जिव नित सो खाहीं । सुर नर सुनि कोइ छँडिे नाहीं ॥ सत्यपुरुष सत्य लोक निवासी । सकल जीवके पीव अविनासी ॥ तिन्ह पुनि षोडश सुत निर्माया । षोडशमें एक काल सुभाया ॥ पुनि तेहिमहँ एक काल कहाया । ज्योति स्वरूप निरञ्जन राया ॥ जाकहँ नाहि सोइ यम जाना । धूर्तमता तिन लोकमहँ आना ॥ एक अण्ड दीन्हा तिन लोका । निरंकार है निष्काम अशोका ॥ निरंकार तीन सुत उपराजू । आपु गुप्त पुत्रन दिय राजू ॥ तीनहुँ तीन लोक ठगि राखा । आपन आपन महिमा भाखा ॥ अरुझिरहा जिव तिरगुन फाँसा । भूलि परा निज घर तब नासा ॥ जीवन्ह काल बहुत सन्तावै । बार बार यम जीव नचावै ॥ सत्य पुरुष तब मोहि पठाये । जिवसुक्ता वन हमहिँ चलि आये ॥
धर्मदास बचन
हे साहब कछु पूछौं तोही । जो पूछहुँ सो भाषहु मोही ॥ निरङ्कार निरंजन राई । धूर्तमता तिन्ह काकिय भाई ॥ जाते इन उहाँ रहै न पाई । सो चरित्र मोहिँ वरणि सुनाई ॥
सतगुरु बचन
अहो सन्त जो पूछहु मोहीं । समुझहु चरित्र बुझावों तोहीं ॥ सत्य पुरुष सुत षोडश कीन्हा । अष्टगीन एक कन्या रचिलीन्हा ॥ सो कन्या इन्ह कीन्ह गरासा । ताते भौ यहि लोक निकासा ॥ पुरुष दरश इन्ह बहुरि न पावा । तीन लोक महँ आनि रहावा ॥ एक अण्ड सत्यपुरुष तेहि दीन्हा । अशंख अण्ड लोक महँ कीन्हा ॥ पुरुष रूप का बरणौ भाई । मोसो वरणत वरणि न जाई ॥ तेहि साहब का हौ शठिहारा । जीव सुकाजको करों पुकारा ॥ जो समुझे सुनि हेला मोरी । काटौं ताकी कर्मकी डोरी ॥
धर्मदासका विरह
यहि कहि गुप्त भये प्रभु राई । धर्मदास महि खसेसुझाई ॥
छठे दिन कबीर साहबका धर्मदास साहबसे दूसरी बार मिलना
(१४)
ज्ञानप्रकाश
विकल भये आवै नहिं स्वासा । हमहिं छोंडि कहैं गये उदासा ॥ जो मैं जनतेउँ होइ विछोही । पलकन लइतों निरखत तोही ॥ छन्द-मोहिं काह जानि दरश दिये प्रभु जुदा पुनि काहे भये ॥ छिन पलक देत विलम्ब नहिं कौन दिशा गवनन किये ॥ बहु छोभ होत न जात विरह मन विकल धीरज ना धरे ॥ जमुनातट खड़े झखहिं जिमिपिया वियोगी भवन मुछितपरे ॥ साखी-शोच हृदया रैन दिन, भोजन भवन न भाव ॥ बड़े भाग्य सो मिले प्रभु, बिछुरे कबहुँ भेटाव ॥ सोरठा-करत शोच मन भाव, सुख सम्पत न सोहावई ॥ मोहिं चैन नहिं आव, जौं लगि चरण न देखिहौं ॥
छठ दिन कबीर साहेबका फिर मिलना-चौपाई
दिवस पाँच जब ऐसहि बीता । निपट विकल हिय व्यापेउ चिन्ता ॥ छठयें दिन अस्नान कहैं गयऊ । करि अस्नान चितवन कियऊ ॥ पुहुप वाटिका प्रेम सोहावन । बहु शोभा सुन्दर झुठि पावन ॥ तहाँ जाय पूजा अनुसारा । प्रतिमा देव सेव विस्तारा ॥ खोलि पेटारी मूर्ति निकारी । ठाँव ठाँव धरि प्रगट पसारी ॥ आनेउ तोरि पुहुप बहु भाँती । चौका विस्तार कीन्हीयहि भाँती ॥ भेष छिपाय तहाँ प्रभु आये । चौका निकटहिं आसन लाये ॥ धर्मदास पूजा मन लाये । निपट प्रीति अधिक चित चाये ॥ मन अनुहारि ध्यान लौलावई । कहि कहि मंत्र पुहुप चढ़ावई ॥ चन्दन पुष्प अच्छत कर लेही । निमित होय प्रतिमा पर देही ॥ चवर डोलावहिं घण्ट बजायी । स्तुति देवकी पढ़ै चित लायी ॥ करि पूजा प्रथमहि शिर नावा । डारि पेटारी मूर्ति छिपावा ॥
सतगुरु वचन
अहो सन्त यह का तुम करहुँ । पौवा सेर छटंकी धरहुँ ॥ केहि कारण तुम प्रगट खिडायहु । डारि पेटारी काहे छिपायेहु ॥
बोधसागर
(१५)
धर्मदास वचन
बुद्धि तुम्हार जान नहि जाई । कस अज्ञानता बोलहु भाई ॥ हम ठाकुर कर सेवा कीन्ह। हम कहैं गुरु सिखावन दीन्ह ॥ ता कहैं सेर छटंकी कहहुँ । पाहन रूप ना देव अनुसरहुँ ॥
सतगुरु वचन
अहो संत तुम नीक सिखावा । हमरे चित यक संशय आवा ॥ एक देव सम सुनेउ पुराना । विप्रन कहे ज्ञान सुनिधाना ॥ वेद वाणि तिन्ह मोहि सुनावा । प्रभुके लीला सुनि मन भावा ॥ कहे प्रभू वह अगम अपारा । अगम गहे नहि आव अकारा ॥ सुनेउँ शीश प्रभुकेर अकाशा । पगपताल तेहि अपर निवाशा ॥ एके पुरुष जगतके ईसा । अमित रूप वह लोचन अंमीसा ॥ सोकित पौतिन्ह माहि समाहीं । अहो सन्त यह अचरज आहीं ॥ औ गुरुगम्य मैं सुना रे भाई । अहैं सङ्ग प्रभु लखौ न जाई ॥ अहो सन्त मैं पूछहुँ तोहीं । बात एक जो भाषो मोहीं ॥ यहि घटमहैं को बोलत आही । ज्ञानदृष्टि नहि सन्त चिन्हाही ॥ जौ लगि ताहि न चीन्हहुँ भाई । पाहन पूजि मुक्ति नहि पाई ॥ कोटि कोटि जो तीर्थ नहाओ । सत्यनाम विन मुक्ति न पाओ ॥ को तुझ को तव को घट माहीं । सन्तों चीन्ह वेगि तुम ताहीं ॥ सर्वे मई औ सबते न्यारा । सो खेले यह खेल रिसाला ॥ जो घरवा में बोले भाई । काहि नाम तेहि कहहु बुझाई ॥ कीन सुन्दर यह साज बनाया । नाना रंग रूप उपजाया ॥ ताहि न खोजहु साहु के पूता । का पाहन पूजहु अजगूता ॥ धर्मदास सुनि चकित भयऊ । पूजापति बिसरि सब गयऊ ॥ एक टक मुख जो चितै रहाई । पलकौ सुरति ना आनौ जाई ॥ प्रिय लागे सुनि ब्रह्मका ज्ञान । विनयकीन्ह बहु प्रीति प्रमाना ॥
१ अमित का विगाड़ है ।
(१६)
ज्ञानप्रकाश
धर्मदास वचन
अहो साहब तब बात पियारी । चरण टेकि बहु विनय उचारी ॥ अहो साहब जस तुम्ह उपदेशा । ब्रह्मज्ञान गुरु अगम सँदेशा ॥ छठयें दिवस साधु एक आये । प्रीय बात पुनि उनहु सुनाये ॥ अगम अगाधि बात उन भाखा । कृत्रिम कला एक नहिं राखा ॥ तीरथ व्रत त्रिगुण कर सेवा । पाप पुण्य वह करम करेवा ॥ सो सब उन्हहि एक नहिं भावै । सबते श्रेष्ठ जो तेहि गुण गावै ॥ जस तुम कहेहु विलोइ विलोई । अस उनहूँ मोहिं कहा सँजोई ॥ गुप्त भये पुनि हमकहँ त्यागी । तिन्ह दरशनके हम वैरागी ॥ मोरे चित अस परचै आवा । तुम्ह वै एक कीन्ह दुइ भावा ॥ तुम कहाँ रहो कहो सो बाता । उन्ह साहब कहँ जानहु ताता ॥ केहि प्रभु कै तुम सुमिरण करहु । कहहु विलोइ गोइ जनि धरहु ॥
सतगुरु वचन
अहो धर्मदास तुम सन्त सयाना । देखौं तोहि मैं निरमल ज्ञाना ॥ धर्मदास मैं उनकर सेवक । जहँहि सो भव सार पद देवक ॥ जिन कहा तुमहिं अस ज्ञाना । तिन साहेब कै मोहिं सहि दाना ॥ वे प्रभु सत्यलोकके वासी । आये यहि जग रहहिं उदासी ॥ नहिं वो भग दुवार होइ आये । नहिं वो भग माहिं समाये ॥ उनके पाँव तत्त्व तन नाहिं । इच्छा रूप सो देह नहिं आहिं ॥ निःइच्छा सदा रहँहीं सोई । गुप्त रहहिं जग लखै न कोई ॥ नाम कबीर सन्त कहलाये । रामानन्द सो जान सुनाये ॥ हिन्दू तूर्क दोउ उपदेशैं । मेटैं जीवन केर काल कलेशैं ॥ माया ठगन आई बहु बारी । रहैं अतीत माया गइ हारी ॥ तिनहि उठावा तोहि पाही । निश्चय उन्ह सेवक हम आही ॥ अहो सन्त जो कारज चहहु । तो हमार सिखावन गहहु ॥ उनकर सुमिरण जो तुम करिहौ । एकोतरसौ पुरुषा लै तरिहौ ॥
बोधसागर
(१७)
वो प्रभु अविगत अविनाशी । दास कहाय प्रगट भे काशी ॥ भाषिन निरगुण ज्ञान निनारा । वेद कितेब कोइ पाव न पारा ॥ तीन लोक महाँ महतो काला । जीवन कहैं यम करै जँजाला ॥ वे यमके सिर मर्दन हारे । जनहि गहै सो उत्तै पारे ॥ जहाँ वो रहहि काल तहाँ नाही । हंसन सुखद एक यह आहीं ॥
धर्मदास बचन
अहो साहब बलि बलि जाऊँ । मोहिं उनके सँदेश सुनाऊँ ॥ मोरे तुम उनहीं सम भाई । तुम वै एक नाहिं विगराई ॥ नाम तुम्हार काह है स्वामी । सो भाषहु प्रभु अन्तर्यामी ॥
सतगुरु बचन
धर्मनि नाम साधु मम आही । सन्तन माँह हम सदा रहाही ॥ साधूसंगति निशिदिन मन भावै । सतगुरु ज्ञान साधु मिलि गावै ॥ जो जिव करै साधु सेवकाई । सो जिव अति प्रिय लागै भाई ॥ हमरे साहिबकी ऐसन रीती । सदा करहिं साधुन सो प्रीती ॥ जो जिव उन्हकर दिशा लेहीं । साधू सेव सिखावन देहीं ॥ जीव दया पर आतम पूजा । सद्गुरु भक्ति देव नहिं दूजा ॥ सद्गुरु सङ्कट मोचक आहीं । निरगुण भक्ति छुवैं यम नाहीं ॥
छन्द-है आपु सत्यकबीर सद्गुरु प्रकट कहु तुम सना ॥ सत्यनाम भक्ति हठावहिं दया क्षेम निश्चल मना ॥ मन कर्म भर्म अबाट परिहरि बाट घरको देत हैं ॥ जो शीश अरपे भव तरे सार जेहि यह लेत हैं ॥
साखी-सुनहु संत मति धीर, हृदया करहु विवेख ॥ हो ज्ञाता परखहु हिये, संत असंतको रेख ॥
सोरठा-जीवन यम धरिखाय, सत्यनाम जाने बिना ॥ वाचै एक उपाय, सत्यकबीर कहि भव तरे ॥
(१८)
ज्ञानप्रकाश
धर्मदास वचन-चोपाई
अहो साहब तुम्ह अविगत अहहू । अमृत वचन तुम निश्चय कहहू ॥ हे प्रभु पूछेउ बात दुइ चारा । अब मैं परिचय भेद विचारी ॥ सो तो हम नहि जानहि स्वामी । तुम कहहु प्रभु अंतरयामी ॥
सतगुरु वचन
अहो धर्मदास तुम्ह भलयह भाखो । कहो सो जो प्रतीति तुम राखो ॥ अहहु निगुरा कि गुरु किहुँ भाई । तौन बात मोहि कहहु बुझाई ॥
धर्मदास वचन
हे सामर्थ्य गुरु हमतौ कीन्हा । यह परिचे गुरु मोहि न दीन्हा ॥ रूपदास विठलेश्वर रहहीं । तिनकर शिष्य सुनहुँ हम अहहीं ॥ उन मोहि इहे भेद समुझावा । पूजहु शालिग्राम मन भावा ॥ गया गोमती काशि परागा । होइ पुण्य शुद्ध जनम अनुरागा ॥ लक्ष्मीनारायण शिलाकै दीन्हा । विष्णुपंजर पुनि गीता चीन्हा ॥ जगन्नाथ बलभद्र सहोद्रा । पञ्चदेव औरो योगीन्द्रा ॥ बहुतैं कही प्रमोध दढाई । विष्णुहिं सुमिरि सुक्ति होइ भाई ॥ गुरुके वचन शीश पर राखा । बहुतक दिन पूजा अभिलाखा ॥ तुम्हरी भेष मिले प्रभु जबते । तुम बानी प्रिय लागी तबते ॥ वे गुरु तुम्हहीं सतगुरु अहहू । सारभेह मोहिं प्रभु कहहू ॥ तौहैर दास कहाउब स्वामी । यमते छोडावहु अन्तरयामी ॥ उनहुँ कर नाहीं निन्द करावै । अस विश्वास मोरे मन आवै ॥ वह गुरु सर्गुण त्रिगुण पसारा । तुमहौ यमते छोडावनहारा ॥
सतगुरु वचन
सुनु धर्मनि जो तव मन इच्छा । तौ तोहिं देउँ सार पद दिच्छा ॥ तुम अब निज भवन चलि जाऊ । गुरु परीक्षा जाइ कराऊ ॥ जो गुरु तुम्हैं न कहैं सँदेशा । तब हम तुम्ह कहैं देव उपदेशा ॥ हमहुँ जाहिं सतगुरु पहुँ भाई । तुम्हरी प्रीति अब उनहिं सुनाई ॥
बोधसागर
(११)
धर्मदास बचन
हे साहेब एक आज्ञा पावों । दया करो कछु प्रसाद लै आवों ॥
सतगुरु बचन
हे धर्मदास मोहि इच्छा नाहीं । क्षुधा न व्यापै सहज रहाहीं ॥ सत्यनाम है मोर अंधारा । भक्ति भजन सतसंग सहारा ॥
धर्मदास बचन
अहो साहब जो अन्न न खाहू । तो मोरे चितकर मिटै न दाहू ॥
सतगुरु बचन
तुम्है इच्छा तो ल्यावहु भाई । अन्तै लेइ पाइव हम जाई ॥ धर्मदास उठि हाट सिधाये । बतासा पेडा रुचि लै आये ॥ आनि धरेउ आगे प्रभुकेरा । विनय भाव कीन्ह बहुतेरा ॥ अहो साहु अब अज्ञा देहू । गुरु पहाँ जाब आशिष लेहू ॥
धर्मदास बचन
करि दण्डवत धर्मनि कर जोरी । अबधौ सुदिन होइ कब मोरी ॥ तेहि दिन सुदिन लेखब प्रभुराई । जेहि दिन तुव पगु दरशन पाई ॥ हम कहैं निज चेरा करि जानो । सत्य कहौं निश्चयकरि मानो ॥ आशिष दे प्रभु चले तुरन्ता । अबिगति लीला लखेको अन्ता ॥ धर्मदास चितवहि मगु ठाढो । उपजा प्रेम हृदय अति गाढो ॥ छंद-विलखि लोचन जब प्रभु अन्तर भये तबहीं चित अति खरभरे ॥ चक्षुवारिध प्रबल प्रवाह भव हिय धीरज तनिको ना धरे ॥ धरि स्वास आस विश्वास मिलन बहुरि जो भवन सिधायऊ ॥ गिरहि सेज विथा विकल होइ उर विरह अति दुख छायऊ ॥ साखी-भोजन क्षेम मलीन तन, बसन विभेष बनाइ ॥ रेनि दिवस छिन कल नहीं, जहाँ तहाँ बैठे जाइ ॥
धर्मदासजी का गुरु रूपदासजीके निकट जाकर ज्ञान पूछना
(२०)
ज्ञानप्रकाश
सोरठा-मिलहिं जो भेष अनेक, पूछहिं तेहि संदेश पुनि ॥ होय न चित महाँ एक, यक सम बचन न भावई ॥
धर्मदासका गुरुरूपदासजीके निकट जाकर ज्ञान पूछना धर्मदासवचन-चौपाई
धर्मदास चलि भो गुरु पाहाँ । रूपदास कर आश्रम जाहाँ ॥ पहुँचे जाइ गुरुके धामा । होइ आधीन तब कीन्ह प्रणामा ॥ तुम गुरुदेव शिष्य हम आहीं । परचे ज्ञान कहहु मोहि पाहीं ॥ जीव मुक्त कौन विधि होई । तन छूटे कहैं जाय समोई ॥ (जिवकर मुक्ति कैसे होइ भाई । पारब्रह्म सो कहाँ रहाई ? ॥) आदि ब्रह्म सो कहँवा रहाई । घट महाँ बोले कौन सो आही ॥ ताकर नाम कहो हम पाही । घट में बोले सो कस आही ॥ हम को हैं घट को होई । जग करता प्रभु कहाँ समोई ॥
गुरु रूपदास वचन
धर्मदास तुम भयो अजाना । को सिखयो तोहि अस ज्ञाना ॥ सुमिरहु रामकृष्ण भगवाना । ठाकुर सेवा कर बुधिवाना ॥ विष्णुपंजर ओ लक्ष्मिनरायन । प्रतिमा पूजन मुक्ति परायन ॥ मन वच सुमिरहु कुञ्जविहारी । रहै वैकुंठ सोह बनवारी ॥ पुरुषोत्तम पुरि वेगि सिधाओ । जगन्नाथ परसो घर आओ ॥ गया गोमती काशीथाना । तीरथ नहाय पुण्य परधाना ॥ निराकार निर्गुण अविनाशी । ज्योति स्वरूप शून्यका वासी ॥ ताहि पुरुषकर सुमिरहु नामा । तन छूटै पहुँचहु हरिधामा ॥
धर्मदास वचन
हो गुरुदेव पूँछो यक बाता । कोघ करि कहहु जनि ताता ॥ जीव रक्षक सो कहाँ रहाही । निराकार जिव भक्षक आही ॥ लक्ष जीव नित खाय निरंजन । तिया सुत ताहि करै बहु गञ्जन ॥ तीनो देव पड़े मुख काला । सुर नर मुनि सब करै विहाला ॥
धर्मदासजीका साहबसे मिलनेकी चिन्ता करना और सद्गुरुका जिन्दा रूपसे तीसरीबार दर्शन देना और धर्मदास साहबका रसोई बनाते हुए चींटीके जलनेसे दुःखी होना और साहबको पहचानना
बोधसागर
(२१)
नर बपुराकी कौन चलावै । कौनी ठोर जीव सचुपावै ॥ तीन लोक वैकुण्ठ नशायी । अस्थिर घर मोहिं देहु बतायी ॥ पाप पुण्य भ्रम जाल पसारा । कर्मबन्ध भरमे संसारा ॥ किरतम भजि जोइन नहिं छूटै । सत्यनाम विनु यम धरि लूटै ॥
रूपदास वचन
अहो धर्मदास हम चक्रित होही । यह कछु समुझि परै नहिं मोही ॥ तीनि लोकके कर्ता जोहै । तेहि भाषत हो जमरा सोहे ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश गोसाई । तुम्ह तेहि कहहु काल धरि खाई ॥ तीनि लोकमें वैकुण्ठहिं श्रेष्ठा । सो सब तुम्ह मानहु निकुष्ठा ॥ तीरथ व्रत अरु पुण्य कमाई । तुम यमजाल ताहि ठहराई ॥ और अधिक मैं कहा बताऊँ । जो जानों सो नहीं दुराऊँ ॥ जिन्ह तोहि अस बुझि दिया भाई । तिनहीं कहैं तुम सेवहु जाई ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास विनवैं कर जोरी । चूक ढिठाई बक्सहु मोरी ॥ हम तेही पद अब सेवैं जायी । जिन्ह यह अगम मोहि बतायी ॥ तुम हो गुरु उन सतगुरु मोरा । उन हमरे मन मैगल तोरा ॥ तुम्हहुँ गुरु वो सतगुरु मोरा । उन हमार यमफन्दा तोरा ॥ तुम्है गुण कीन्ह अभक्ष्य छुटावा । उन मोहि अलख अगम्य लखावा ॥ धर्मदास तब करी प्रणामा । मथुरा नगर पहुँचे निज धामा ॥ कैतिक दिन यहि भाँती गयऊँ । धर्मदास मन चिन्ता भयऊँ ॥ कैतिक दिवस यहि विधि बीता । धर्मदास चित बाढी प्रीता ॥ बहुत दिवस भो प्रभु नहिं आये । कीधौं केहि सेवक विलमाये ॥ एक दिवस प्रभु ध्यान लगाय । क्षोभित चित प्रसाद बनाय ॥ बढी प्रीति मन बहु बिरहावा । सुरति सनेह प्रसाद बनावा ॥ जिन्दा रूप धरी प्रभु आये । वृक्ष एक तर आसन लाये ॥ आसन अधर देह नहिं छाया । अविगति लीला गुप्त रहाया ॥
त्रिगुण जालका वर्णन
(२२)
ज्ञानप्रकाश
इत चौका महाँ अस भो भाई । बहु चिउँटी चूलहे झरकाई ॥ हरि हरि करि धर्मनि अकुलाने । महापाप लखि मनहिं भुलाने ॥ ततक्षण धर्मनि जिन्दहि हेरा । आये प्रसाद लेहु यहि बेरा ॥ जिन्दा आय ठाढ पुनि भयऊ । कर प्रसाद लै चिन्तवन कियऊ ॥ धर्मदास दीन्हेउ परसादा । तब जिन्दा पुनि कीन्ह समादा ॥
जिन्दा वचन
घात कियउ तुम जीव अनेका । सो प्रसाद ले मम शिर टेका ॥
धर्मदास वचन
जीव घात सुनि अचरज माना । हो जिन्दा तुम्ह कैसे जाना ॥ कवन जाव हम कीन्ही घाता । सो समुझाइ कहो मोहिं बाता ॥
जिन्दा वचन
अहो साहु कस धरहु छिपायी । चिउँटी चूलहा बहुत जरायी ॥ सुनि धर्मनि चित संशय आने । यह को आहि हृदय अनुमाने ॥ अगुन सगुन चित करे बढाई । मनही मन बहु अचरज पाई ॥ भात सबै चिउँटी तब भयऊ । बहु संशय धर्मनि मन ठयऊ ॥ सबै भात चिउँटी होइ बीता । बहुत संदेश धर्मनि हिय कीता ॥
धर्मदास वचन
हो जिन्दा में अचरज भयऊँ । लीला देखि थकित होय गयऊँ ॥ हो जिन्दा मैं पुछत सकाऊँ । दया करि तृष्णा मोरि बुझाऊँ ॥ चिउँटी सही जरी प्रभु हमते । सो अहछिट बहु अन्तर तुमते ॥ सो कैसे जानेहु तुम ताता । औ प्रसाद चिउँटी होइ जाता ॥ कौतुक देखि अचरजमुहि आवा । यह लीला तै जानि न पावा ॥
जिन्दा वचन
धर्मनि यह सतगुरुकी लीला । धन्यसतगुरुजिन्हरुयालकरीला ॥ जानहु सतगुरु नाम प्रतापा । भयो पपील सर जिवगत पापा ॥ सतगुरु नाम सुनत सुख माना । धर्मदास हिय हरष समाना ॥
सत्यनामकी महिमा
बोधसागर
(२३)
धर्मदास वचन
जोरि पानि मैं पूछौं स्वामी । कहो कृपा करि अन्तर्यामी ॥ अहो साहेब नाम क आही । परचै नाम कहो मोहिं पाहीं ॥ अरु सतगुरु तुमका कहैं कहहुँ । हे प्रभु कौन देश तुम रहहु ॥
जिन्दा वचन
हो धर्मनि जो पूछेहु मोहीं । सुनहुँ सुरति धरि कहों मैं तोहीं ॥ जिन्दा नाम अहैं सुनु मोरा । जिन्दा भेष खोज किहैं तोरा ॥ हम सतगुरु कर सेवक आहीं । सतगुरु संग हम सदा रहाहीं ॥ सत्य पुरुष वह सत्यगुरु आहीं । सत्य लोक वह सदा रहाहीं ॥ सकल जीवके रक्षक सोई । सतगुरु भक्ति काज जिव होई ॥ सतगुरु सत्यकवीर सो आहीं । गुप्त प्रगट कोइ चीन्है नाहीं ॥ सतगुरु आ जगत तन धारी । दासातन धरि शब्द पुकारी ॥ काशी रहहिं परखि हम पावा । सत्यनाम उन मोहिं दढावा ॥ जम राजा कर सब छल चीन्हा । निरखि परखिभै यम सो भीना ॥ तीन लोक जो काल सितावे । ताको सब जग ध्यान लगावे ॥ निराकार जेहि वेद बखानै । सोई काल कोइ मरम न जानै ॥ तिन्ह कर सुत आहि त्रिदेवा । सब जग करै जो उनकी सेवा ॥ त्रिगुण जाल यह जग फन्दाना । गहै न अविचल पुरुष पुराना ॥ जाकर ई जग भक्ति कराई । अन्तकाल जिव सो धरि खाई ॥ सबै जीव सतपुरुषके आहीं । यम दै धोख फन्दाइस ताहीं ॥ प्रथमहि भये असुर यमराई । बहुत कष्ट जीवन कहैं लाई ॥ दूसरि कला काल पुनि धारा । धरि अवतार असुर सँधारा ॥ जीवन बहु विधि कीन्ह पुकारा । रक्षा करन बहु करै पुकारा ॥ जिव जानै यह धनी हमारा । दे विश्वास पुनि धरै अवतारा ॥ प्रभुता देखि कीन्ह विश्वासा । अन्तकाल पुनि करै निरासा ॥
(२४)
ज्ञानप्रकाश
कालै भेष दयाल बनावा । दया हृदाय पुनि घात करावा ॥ द्वापर देखहु कृष्णकी रीती । धर्मनि परिखहु नीति अनिती ॥ अर्जुन कहै तिन्ह दया हठावा । दया हृदाय पुनि घात करावा ॥ गीता पाठकै अर्थ बतलावा । पुनि पाछे बहु पाप लगावा ॥ बन्धु घातकर दोष लगावा । पाण्डो कहै बहु काल सतावा ॥ भेजि हिमालय तेहि गलाये । छल अनेक कीन्ह यमराये ॥ बहु गंजन जीवन कहै कीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥ पतिव्रता वृन्दा व्रत टारा । ताके पाप पहन औतारा ॥ बलिते सो छल कीन्ह बहुता । पुण्य नसाय कीन्ह अजगूता ॥ छल बुद्धि दीन्है ताहिं पताला । कोई न लखै प्रपंची काला ॥ लघु सुरूप होय प्रथम देखाये । पृथिवीलीन्ह पुनि स्वस्तिकराये ॥ स्वस्तिकराइ तबै प्रगटना । दीर्घरूप देखि बलि भय माना ॥ तीनि परग तीनो पुर भयऊ । आधा पाँव नृप दान न दियऊ ॥ देहु पुराय नृप आधा पाऊँ । तो नहिं तव पुण्य प्रभाव नसाऊँ ॥ तेहि कारण पतालहिं दीन्हा । अन्धा जीव जल प्रगटन चीन्हा ॥ तब ले पीठ नपाय तेहि दीन्हा । हरि ले ताहि पतालै कीन्हा ॥ यहि चर जीव देखि नहिं चीन्हा । कहै मुक्त हरि हमको कीन्हा ॥ जाकर वचन थिर होवे नाहीं । औ पुनि जीव दया नहिं ताहीं ॥ तासो कहहु लाभ किमि होई । तेहि सेवै सो जाय विगोई ॥ औ हरिचन्द्र केर कस लेखा । धर्मदास चित करो विवेखा ॥ यती सती त्यागी भयऊ । सब कहै काल विगुरुचन लयऊ ॥ काहूकै व्रत हट नहिं राखा । ताकहै मुक्तिदाता जग भाखा ॥ स्वर्गहिं धोखा नरकहिं जाहीं । जीव अचेत छल चीन्है नाहीं ॥ पण्डो सम जग को व्रतधारी । नरक बास ताकहै ले डारी ॥ करण मोरध्वज सत्यव्रत धारी । ले कसनी ताहि दीन्ह विडारी ॥ भक्त अनेक जगत महीं भयेऊ । काहू कहै वैकुण्ठ न दयऊ ॥
बोधसागर
(२५)
नरक वास नहिं छूटै भाई । महा नरक भग जठर कहाई ॥ नरकते विष्णु छुटे नहिं पाये । जनम जनम जठरै भग आये ॥ जग अंधा हिय गम्य न कीन्हा । सबै आस ताही कर लीन्हा ॥ जिव अचेत हिय गम्य न करई । सबै आस वैकुण्ठहिं धरई ॥ विष्णु सरीखे को जग आही । बहु भगता किमि वरणो ताही ॥ तिन्ह वैकुण्ठ वास नहिं पाया । कर्महिं वसि पुनि नर्क भोगाया ॥ सो वैकुंठ चाहत नर प्रानी । यह यम छल विरले पहिचानी ॥ जस जो कर्म करै संसारा । तस भुगतै चौरासी धारा ॥ मानुष जन्म बडे तप होई । सो मानुष तन जात विगोई ॥ नाम विना नहिं छूटे कालू । बार बार यम नर्कहिं घालू ॥ नरक निवारण नाम जो आही । सुर नर मुनि लखन कोइ नाहीं ॥ ताते यम फिर फिर भटकावै । नाना जोइनि काल सतावै ॥ विरलै सार शब्द पहिचाने । सतगुरु मिलै सतनाम समाने ॥ छंद-सुनु धर्मदास सुजाना शब्द प्रमान सतगुरु जानहुँ ॥ सुरति निरति गहि ठाम चीन्हो अनूप अलच्छन मानहुँ ॥ सत्यनाम अराधहु मनहीं साधहु चतुर चोर जो मन अहैं ॥ मने अहैं निरञ्जन कोइ न चीन्है सुत्रवासी सब कहैं ॥ साखी-सुन्य सरूपी मन सोई, धर्मदास लेहु जानि ॥ रेख रूप वाको नहीं, जिन्दा शब्द प्रमान ॥ सोरठा-निरंकार निःरूप, परिचय वेद प्रकास इमि ॥ तिहुँपुरके सोइ भूप, नेति निगम यश गावहीं ॥
धर्मदास वचन
हे साहेब तुमको शिर नावा । तुमतो मोहि अलख लखावा ॥ समरथ नव चरनन बलि जावै । तुम्ह ते बहु परचै हम पावै ॥ उन साहेब सम तुमहू अहहू । वैसिहि बात तुमहु प्रभु कहहू ॥
(२६)
ज्ञानप्रकाश
मेव तीन दिव्य दरशन मोहीं । तीनों भेष मैं जानौं तोहीं ॥ सतगुरुप्रथम दरस मोहिदीन्हा । हम कहँ आय कृतारथ कीन्हा ॥ भेष छिपाय बहुरि ओहि आये । सार बात बहु मोहिं सुनाये ॥ तिसरे तुम्ह आयउ तन धारी । हम हैं तोहरे दरश भिखारी ॥ तुम्ह मोहिआय परमसुखदीन्हा । हम कहँ आय कृतारथ कीन्हा ॥ तुमतो प्रभु बहु सुख दीन्हा । तुमते प्रभु परिचय हम चीन्हा ॥ एक बात प्रभु कहहु बिलोई । कहहु दया करि धरहु न गोई ॥ चिउँटी बहुत जरी मम पाहीं । तुम प्रताप अघ पायो नाहीं ॥ औरौ कबहिं होइ जो ऐसी । हे प्रभु कहहु बने तब कैसी ॥ चेत अचेत पावैं तर परई । हे प्रभु दास कौने विधि तरई ॥
जिन्दा वचन
धर्मदास निःसंशय रहहु । सद्गुरुध्यान अस्थिरचित्त गहहु ॥ जानिके जीव कबहिं नहिं मारो । भरोंसा और दया उर धारो ॥ भरसक चूको नाहीं कबहु । सब जीवनकी रक्षा करहु ॥ साधू सेवा पर सरवस वारी । सेवा सन्त प्रीति चित धारो ॥ सन्त चरण कर अस परतापा । मेटै दोष दुख करमज दापा ॥ साधू सेवा जीव जन धारो । नाम ध्यान धरि काज सँवारो ॥ साधू सेवा चित देइ करई । जीवन मुक्तिसो भव जल तरई ॥ तीर्थ व्रत बहु कम्म कगहीं । सत्यभक्ति विनु तरे जिव नाहीं ॥ कोटि तीर्थ सन्तन्हपद वासा । अंधा जीवहि नहिं विश्वासा ॥ सन्त जाहि घर चरण पखारा । भूत पिशाच होये सब न्यारा ॥ नौग्रह कर वसि नहिं चलई । सब विघ्न सदा सो टलई ॥ जेहि घर संत चरण परछालैं । सन्त उछिष्ट जाहि घर डालैं ॥ ताकर फल कछु वरणि न जाई । जाहि गहि विश्वास करै सेवकाई ॥ गुरु चरणोदक नित प्रीतिसे लेई । निहचै लोक पयान देई ॥ गुरुमुख कणिक प्रीतिसे पावै । ऊँच नीचकै भरम मिटावै ॥
बोधसागर
(२७)
गुरुमुख सती महा परसादा । पावत मेटे करमकर फाँदा ॥ गुरु हैं ब्रह्म अखण्ड अमाने । गुरु कहैं नहिं मानुष कर जाने ॥ गुरुते द्रोह तजे विष बादा । गुरु निन्दा नहिं पावै स्वादा ॥ नाम पान चरणोदक सीते । कहैं कबीर भक्ति दृढ रीते ॥ गुरु सेवा संतन सनमाना । दया धर्म ले मोक्ष अमाना ॥ जग महे जीव घात बहुतेरे । जीव घात शिर पाप घनेरे ॥ दया न गुणै करै जिव घाता । खेलि शिकार मगन मदमाता ॥ मारि मारि तन करै अहारा । जीव दया नहिं करै गवँरा ॥ जिव घातिक बहुते दुख पावै । जनम जनम तेहि काल सतावै ॥ कागदेह धरि निरघिन खाहीं । जनम अमित तेहि विष्टा माहीं ॥ झूकर स्वान जनम पुनि पावै । मीन मांस मद जाकहैं भावै ॥ साधु देव भक्ष अंकुर आहीं । मीन मांस मद राक्षस खाहीं ॥ कोटिक जप तप पुण्य कमावै । दया विना नर मुक्ति न पावै ॥
छंद-जप योग दान विधान बहु विधि करै कर्म अनेक हो ॥
सत कोटि तीर्थ भूमि परिकरमा करि न पावै थेक हो ॥
जौ लौं दया नहिं जीवको तो सबहि कर्म असार हो ॥
कोई लखे सज्जन जो हरि मैं कह्यों शब्द पुकारि हो ॥
साखी-जीव दया चित्त मों धरै, तजे अभक्ष्य अहार ॥
हंस दया धरि नाम गहि, उतरे भवजल पार ॥
सोरठा-सत्यनाम गुण गाय, गही माधु सेवा करै ॥
सहज परमपद पाय, सो सतगुरुपद विश्वास धरि ॥
चौपाई
जहां फूल तहैं आवै बासा । जहां साधु तहैं प्रभुकर बासा ॥
एक तत्त्व मन गुनि नाम समावै । दया क्षेम सत्य मन भावै ॥
गुरु औ साधु सेवा चित लावै । सत्यनाम गहि लोक सिधावै ॥
सत्यनाम सो विनसै नाहीं । त्रिगुण जालते न्यार रहाहीं ॥
(२८)
ज्ञानप्रकाश
त्रिगुण त्यागि चौथा पद भेटे । तब जरा मरणकी संशय मेटे ॥ चौथा पद सत्यनाम अमाना । विरला पाइ करै पद ध्याना ॥ सत्यनाम है सार अनुपा । प्रेम प्रीति गुरु दरस सरूपा ॥ काह भये यह अंगुरीके देखे । जो नहिं शीश दरश प्रभु पेखे ॥ काह भये ठठिया के भेटै । शीश दरश विनु भरम न मेटै ॥ नख सिख सत्पद दरश जबहीं । सो जिव जठर न आवै कबहीं ॥ निश्चै सत्य पर रहै समाई । कर्म भर्म तजि जिव दुरि ताई ॥ सत्यपद जिन एकहि मन लाया । शीश दरश निज निश्चै पाया ॥ सुरति निरति सत्यगुरुपद परसै । षोडश भानु चन्द्र छबि दरशै ॥ सुधापान सिंधासन सारा । हंसन्ह मिलि सुख बड़ा अपारा ॥ पुरुष दरश लोचन छकि जायी । पुरुष वचन शुभ घ्रान अघायी ॥ अन्धकार तहवाँ नहिं होई । सदा अँजोर अमरपुर सोई ॥ दीप असंख्य तहँ गणिन सिराहीं । हंसा निश्चल राज कराहीं ॥ निराकार यम तहाँ न जाई । तिरदेवनकी कौन चलाई ॥ सतगुरु शरण गहहिं जो कोई । ताहि देसको पहुँचे सोई ॥ जब राजा सो तिनुका मूटै । पाप पुण्य कै आशा छूटै ॥ तबहीं सत्यगुरु शब्द मन जूटै । जन्म मरणका संशय छूटै ॥ असुर भक्ष सो रहै निनारा । तजि असंग सत्संग बिचारा ॥ विरले हंस निःसंशय होई । दृढ़ प्रतीति नाम गहे सोई ॥ गुरु कहैं सत्यपुरुष सम जाने । सन्त कहैं गुरु सम करि मानै ॥ होइ निःकपट चरण गुरुआशा । सदगुरु नाम गहै विश्वासा ॥ निराधार सतनाम अधारा । शब्द सुरति जगबंध विचारा ॥ कर्म भर्म सो न्यारा होई । गुरुपद राखै सुरति समोई ॥ बहु विधि ज्ञान गुरुते पावै । यमका फन्दन सोई कटावै ॥ यमके फन्द कटे सुख होई । पशुआ हो नहिं पावै सोई ॥ गुरुका शब्द सुने जो काना । करे विचार बहुत परमाना ॥
धर्मदाससाहबकी सद्गुरुसे शिष्य करने के लिये प्रार्थना और उत्तर
बोधसागर
(२९)
काल रूप धरि गुरु कहावै । करि पारख तासो हरिजावै ॥ अन्धविश्वास जगतसो सोवै । जाय नरक पुनि मूलहु खोवै ॥ निरखि परखिकै शरणै जावै । अगम निगम सब सोई जनावै॥ रहै अजाचक नामलौ लाई । जीव दया सन्तन सेवकाई ॥ निजआतमसम सबही जानौ । प्रेम प्रीतिसे सेवा ठानौ ॥ परमारथकी भिक्षा करिये । गुरु साधुन आज्ञा अनुसरिये॥ अभ्यागत आतम सम जाने । साधुनाम सद्गुरु सहिदाने ॥ छंद-गुरुसाधु महिमा अमित अगम अपार पारनहिं कोऊ लहै॥ त्रीदेव दश औतार हरि गुरु साधु पद रज तेऊ चहैं ॥ सनकादिक सुरनरमुनि सिद्धि ज्ञानीसाधु गुरु आतित रहै॥ हरि आपु मुख महिमा प्रकाशें निगम अस्तुति नित कहै ॥ सारखी-अस नर पाँवर अन्धमति, हृदय न करहिं विचार ॥ गुरु सन्तन्ह पद सारतजि, विष वेली प्रतिपार ॥ सोरठा-सुत नारी हित प्रान, गुरु सन्तन्ह सो चातुरी ॥ जब यम बाँधै तान, तब पछितावहि सुगुध नर ॥
धर्मदासवचन-चौपाई
धन सतगुरु धन तुमरी बानी । मोहिअसअधमदीन्हगतिजानी अब साहब मोहि आपन करहु । मम शिरचरणसरोरुह धरहु ॥ मैं आपन दिन शुभकरि जाना । तोहरे दरश मोक्ष परमाना ॥ अब अस दया करहु दुखभञ्जन । कबहुँमोहिनधरिपाव निरञ्जन॥
जिन्दा वचन
अहो धर्मदास दरश तुम पावो । शब्द गहे होय जिवमुक्तावो ॥ यमफन्दा तब निश्चै छूटै । जब यमरासो तिनका टूटै ॥ अमीअंक परवाना पावै । सुमिरण नामध्यान चितलावै॥ हियते और आस सब छोडे । सद्गुरु चरण नेह चित माडे ॥
(३०)
ज्ञानप्रकाश
नाम कबीर जपो दिनराती । तजहुकर्म भ्रमअरु कुलजाती ॥ प्रतिमा धोखा दूरि बहावो । आतम पूजा नाम चितलाओ॥ पीतर पाथर दूरि बहाऊ । सद्गुरु सन्त सेवा चित लाऊ॥ तब जमरा तोहीं नहिं पाई । नाम प्रताप काल सुरझाई ॥ होइहैं जीव काज तब तोरा । निश्चै वचन मानु दिठ मोरा ॥
धर्मदास वचन
हे साहब मैं तब पग धरऊँ । तुम्हते कछु दुबिया नहिं करऊँ॥ अब मोहि चिन्हि परायम बाजाँ । तुम्हते भयउ मोर मन राजी ॥ मोरे हृदय प्रीति अस आई । तुम्हते होइहै जिव मुक्ताई ॥ तुमहीं सत्यकबीर हो स्वामी । कृपा करहु तुम अन्तर््यामी ॥ हे प्रभु देहु प्रवाना मोहीं । यम तृण तोरि भजौ मैं तोहीं॥ मोरे नहीं अवर सो कामा । निसिदिन सुमिरों सद्गुरु नामा ॥ पीतर पाथर देव बहायी । सद्गुरु भक्ति करब चितलायी ॥ अरपौं शीस सर्वस सब तोहीं । हे प्रभु यमते छोडावहु मोहीं॥ सन्तन्ह सेवा प्रीति सों करिहैं । वचन शिक्षापन निश्चय धरिहैं॥ जो तुम्ह करहु करब हम सोई । हे प्रभु दुतिया कबहुँ नहिं होई॥
जिन्दा वचन
सुनु धर्मनि अब तोहीं मुक्ताओ । निश्चै यमसों तोहिं बचाओ ॥ देइ परवाना हंस उबारो । जनम मरण दुख दारुण टारो ॥ ले प्रवाना जो करै प्रतीती । जिन्दा कहै चले यम जीती ॥ अब मोहि आज्ञा देहु धर्मदासा । हम गवनहि सद्गुरुके पास ॥ सद्गुरु संग आइब तव पाहीं । तब परवाना तोहि मिलाहीं ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु अब तोहिं जाने न देहौं । नहिं आवो तो मैं पछितैहौं ॥ पछताइ पछताइ बहु दुख पैहौं । नहिं आवहुतो प्राण गवैहौं ॥ हाथके रतन खोइ कोइ डारे । सो मूरख निजकाज विगारे ॥
कबीर साहबका तीसरी बार गुप्त हो जाना और धर्मदास साहबका व्याकुल होना तथा धर्मदास साहबका सद्गुरुसे मिलनेके लिये भंडारा करना और चौथीबार सद्गुरुका मिलना
बोधसागर
(३१)
मोरे प्रान पियारे तुम्ह हौ । केहि कारण अनत लेजे हौ ॥
कबीर साहबका तीसरी बार गुप्त हो जाना और धर्मदास साहबकी व्याकुलता
यह कहि धर्मदास पल लाऊँ । जिन्दा गुप्त भये तेहि ठाऊँ ॥ धर्मदास पुढुमी परु हारी । सद्गुरु कहैं बहु कीन्ह गोहारी ॥ मोहिं समको जग आहि अभाग । छुटे नदेह ठगौरी लागा ॥ जिमीभुअँग मणि जाइ हेराई । विकल फिरहिं जित तित बिललाई ॥ उहै हाल सद्गुरु विनु मोरा । कत पल दियेउ मन्द मति मोरा ॥ काह करौं कित दर्शन पाऊँ । बिनु दर्शन मैं प्रान गवाऊँ ॥ कीन्ह विवेक मन धीरज दीन्हा । मन महाँ पकर एक पुनिकीन्हा ॥ करौं महोत्सव संत अवराधौ । तब दर्शन देहिं पुरुष अनादी ॥ साहेब सन्त सनेही आहीं । सन्तन तजि वह अंत न जाहीं ॥ असहिय ठानि भवन चलि गयऊ । सन्त प्रसादको चितवन कियऊ ॥ संत धाम जहाँ लगि गम पावा । तहां तहां विनती नेवति पठावा ॥ छन्द-दिन अवधि वाही जुरन लागे बहु भेष पहुँचे आयहो ॥ दीहुँ जुथथि सेज आश्रम कीन्ह विनती जाइ हो ॥ दे भाव भोजन गमनिरश्वहिं सकल भेष अलेखही ॥ सबहिं निरखहिं सुरति परखहिं हृदय समाह विवेकही ॥ दोहा-पान सुपारी हाथलै, करहिं दण्डवत जाय ॥ भेषन सो चित विलखिके, पूछहिं मन परिचाय ॥ सोरठा-तुम्ह हो सन्त सुजान, निजदासन्ह सुख देतुहौ ॥ सत्य पुरुष सहिदान, सत्य लोक महिमा कहो ॥
बेष मता वर्णन
जोपाई
कोई कहै त्रिदेव अवराधौ । कोई कहै व्रत करि तन साधौ ॥ कोई कहै करु प्रतिमा सेवा । कोई तीरथ कोई जपत प भेवा ॥
(३२)
ज्ञानप्रकाश
कृत्रिमभक्ति जो सबै दृढावै । सत्य सारपद नाहि बतावै ॥ तब अकुलायसंसाथरि जोये । प्रगट नहीं गुप्तहिं हिय रोये ॥ प्रति आश्रमगम्यउठी निरासा । जिततितचितवहिं धर्मनिदासा ॥ पुनि चितवनउत्तरदिशिकीन्हा । मूरति एक भिन्न तहैं चीन्हा ॥ धमदास तहैं बेगि सिधाये । प्रथम रूपको दरशन पाये ॥ धायचरणगहि अति अदरागा । बुन्दपाय चात्रिक जिमि पागा ॥ गुरु पद पायप्रीति चित जागा । होसतगुरु मोहिं कीन्ह सुभागा ॥ धाये चरणनगहिअति अनुरागा । युगपदगहेउ प्रीति चित लागा ॥ करगहि दास उठायेउ स्वामी । सुधा वचन कह अन्तर्यामी ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तुम्ह हंस सुहेला । मोहिं दरश कह कीन्हेउ मेला ॥ इच्छा सफल भइ सुन तोरा । अब तुम्ह दरशन पायउ मोरा ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु जौ दर्शन नहिं पावत । तौ हम निश्चै प्राण गवाँवत ॥ अब प्रभु कीजे कृपा तुरंता । दीजे बीरा अविचल संता ॥ यमसे तितुका बेगि तोराओ । वन्दी छोरि मोहिं सुकताओ ॥
सतगुरु वचन
सुनुधर्मनि जो कहो सो मानो । तजि संशय धीरज चित आनो ॥ करहु जाय सन्तनसनमाना । ता पीछे दैहों परवाना ॥
धर्मदास वचन
हे प्रभु कहो सोई हम माने । करब जाइ सन्तन्ह सनमाने ॥ हे प्रभु जौ कतहुँ अब जाहू । तौ जीवित नहिं पइहौ साहू ॥
सतगुरु वचन
हे धर्मनि सुनहु मम बानी । कतहुँ न जाब सत्य हियजानी ॥ करि प्रमान चितवत चलु पाछे । जौ नटनिरत सुघरता काछे ॥ जाय कीन्ह सन्तन सनमाना । यथा शक्ति पूजा परधाना ॥