कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
द्वापरयुगमें करुणामय (कबीरसाहब) के पृथ्वीपर आनेकी कथा
अनुरागसागर
( ७१ )
मधुकरवचन
कह मधुकर विनती सुन लीजै। लोकनिवास सवनकहैं दीजै ॥
यह यम देश बहुत दुख होई। जीव अम्बु बूझै नहिं कोई ॥
मोहि सब जीवनलै सुस्वामी। कृपा करहु प्रभु अन्तर्यामी ॥
छेद-यहि देश है यममहापरवल, जीवसकलसतावई ॥
कष्ट नाना भौंति व्यापे, मरण जीवन लावई ॥
काम क्रोध कठोर तृष्णा, लोभ माया अतिबली ॥
देवमुनिगण सबहि व्यापे, कोट जीवन दलमली ५७
सो०-तिहु पुरयमको देश, जीवन कहमुखछनकहिं ॥
मेटहु काल कलेश, लेह चलहु निज देशकहैं ॥६०॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
बहुत अधीन ताहि हम जाना। करचौका तब दीन्ह परवाना ॥
षांडश जिव परवाना पाये। तिन कहैंलै सतलोक पठाये ॥
यमके दूत देख सब ठाड़े। चितवहिं तेजन ऊर्द्ध अखाड़े ॥
पहुँच जाय पुरुष दरबारा। अंशन हंसन हर्ष अपारा ॥
परसे चरण पुरुषके हंसा। जन्म मरणको मेटेउ संसा ॥
सकल हंस पूछी कुशलई। कहुद्विजकुशल भये अब आई ॥
धर्मदास यह अचरज बानी। गुप्त प्रगट चीन्हे सोई ज्ञानी ॥
हंसन अगर चीर पहिराये। देह हिरम्मर लखि सुखपाये ॥
षोडश भानु हंस उजियारा। अमृत भोजन करे अहारा ॥
अगर वासना तृप्त शरीरा। पुरुष दरशगदगद मतिधीरा ॥
यहि विधि त्रेतायुगको भावा। हंस मुक्त भये नाम प्रभावा ॥
द्रापरयुगमें करुणामय ( कबीर साहब ) के पृथ्वीपर आनेकी कथा
त्रेता गत द्रापर युग आवा। तब पुनि भयो कालपरभावा ॥
द्रापर युग प्रवेश भा जवही। पुरुष अवाज कीन्ह पुनितबही ॥
ज्ञानी और निरंजनका वार्तालाप
( ८० )
अनुरागसागर
पुरुषवचन
ज्ञानी बेगि जाहु संसारा । यमसों जीवन करहु उबारा ॥
काल देत जीवन कहैं त्रासा । काटो जाय तिनहिको फाँसा ॥
कालहि मोटि जीव लै आवो । बार बारका जगहि सिधावो ॥
ज्ञानीवचन
तब हम कहा पुरुषसों बानी । आज्ञा करहु शब्द परवानी ॥
पुरुषवचन
कहा पुरुष सुनु योग संतायन । शब्द चिताय जीव मुक्तायन ॥
जो अब काल कीन्ह अन्याई । हो सुत तुम मम वचन नसाई ॥
अब तो परे जीव यह फन्दा । ज्युतहि आनु परम आनंदा ॥
काल चरित परगट है जाई । तब सब जीव चरण गहैं आई ॥
ज्ञान अज्ञान चीन्ह नहि जाई । देखहु भाव जिवनको भाई ॥
सहज भाव जग प्रगटहु जाई । जाय प्रगट है जिवन चिताई ॥
तोहि गहे सो जिव मुहि पैहै । तनु प्रतीत बिरले मय खेहै ॥
जाई करहु जीव कडिहारी । तो पर है परताप हमारी ॥
हमसो तुमहि अन्तर नाही । जिमितरंगजलमाहि समाहीं ॥
हमहि तुमहि जो दुइकर जाना । ता घट यम सब करिहै थाना ॥
जाहु बेगि वा तुम संसारा । जीवन खेह उतारहु पारा ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
चले ज्ञानी तब माथ नवायी । पुरुष आज्ञा जगमाहि सिधाई ॥
पुरुष अवाज चल्यो संसारा । चरण टेकु मम धर्म लवारा ॥
निरंजनवचन छन्द
तुहे धर्मराय अधीन है बहु भौंति विनती कीन्हेऊ
किहि कारणे अब जगसिधारेहु, माहि सोमति दीन्हेऊ
अस करहु जनिसब जग चितावहु इहै विनती मैं करौँ
तुमबंधु जेठे छोट मैं कर जोर तुम पायन परौँ ५८
रानी इन्द्रमतीकी कथा
अनुरागसागर
( ८१ )
ज्ञानीवचन
सो०—कहोधर्मसुन बात, विरल जीवमोहि चीन्हिहैं॥
शब्दनको पतियात, तुम अस कै जीवन ठगे ॥६१॥
कवीरवचन धर्मदासप्रति
अस कह मृत्युलोक पगु धारा । पुनि परमारथ शब्द पुकारा॥
छोड़यो लोक लोककी काया । नरकी देह धारि तब आया ॥
मृत्युलोकमें हम पगु धारा । जीवनसो सत शब्द पुकारा ॥
करुणामय तब नाम धराया । द्वापर युग जब महिमें आया॥
कोई न बूझे हैला मेरी । बांधे काल विषमभ्रम बेरी ॥
रानी इन्द्रमतीकी कथा
गढ़गिरिनारतबहि चलि आये । चंद्रविजय नृप तहां रहाये ॥
तेहि नृप गृहरह नारि सयानी । पूजै साधु महातम जानी ॥
चढ़ी अटारी वाट निहारे । संत दरश कहैं कायागारे ॥
रानी प्रीति बहुत हम जाना । तेहि मारग कहैं कीन्ह पयाना॥
मोहि पहुँ दृष्टि परी जब रानी । वृषली रसना कह यह बानी ॥
इन्द्रमती वचन
मारग बेगि जाहु तुम धाई । देखहु साधु आनु गहि पाई॥
दासीवचन
वृषली आय चरण लपटानी । नृप वनिता मुख भास सयानी ॥
कही वृषली रानि अस भाषा । तुम दर्शन कहैं अभिलाषा ॥
देहु दरश मोहि दीनदयाला । तुम्हरे दरश मिटे सब शाला॥
करुणामय वचन दासोप्रति
तब ज्ञानी कहि वचन सुनावें । राज रावघर हम नहिं जावें ॥
राज काज है मान बढ़ाई । हम साधू नृप गुह नहिं जाई॥
१ दासी लौड़ी
( ८२ )
अनुरागसागर
दासीवचन रानीप्रति
चली वृषली रानी पहुँ आयी । द्वै कर जोरे विनय सुनायी ॥
साधु न आवे मोर बुलाई । राज राव घर हम नहिं जाई ॥
यह सुन इन्द्रमती उठि धाई । कीन्ह दंडवत टेके पाई ॥
इन्द्रमती वचन
हे साहिब मोपर करू दाय। मोरे गृह अब धरिये पाया ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
प्रीति देख हम भवन सिधारे । राजा घर तबहीं पग धारे ॥
कहे रानी चलु मन्दिर मोरे । भयो सुखी दर्शन लिये तोरे ॥
प्रीति देखितहि भवन सिधारे । दीन्ह सिंहासन चरण खटाये ॥
दीन्ह सिंहासन चरण पखारी । चरणपरछालन अंगोछाधारी ॥
चरण धोय पुनि राखे सिरानी । पटपद पोंछ जन्मशुभ जानी ॥
इन्द्रमती वचन
पुनि प्रसादको आज्ञा मांगी । हे प्रभु मोकहँ करहु सुभागी ॥
जूठन परै मोरे गृहमाहीं । सीताप्रसाद लै हमहुँ खाहीं ॥
कृष्णामयवचन
सुनु रानी मोहि श्रुधान कोई । पंचतत्त्व पावे जेहि सोई ॥
अमृत नाम अहार है मोरा । सुनु रानी यह भाष्यो थोरा ॥
देह हमारि तत्व गुण न्यारी । तत्वप्रकृतिहि कालरचिवारी ॥
असी पंच किहु कालसमीरा । पंच तत्वकी देह खमीरा ॥
ताहम आदि पवन इक आहीं । जीव सोहंग बोलियो ताही ॥
यह जिव अहै पुरुषको अंशा । रोकसि काल ताहि दे संशा ॥
नाना फन्द रचि जीव गरासै । देह लोभ तब जीवहि फांसै ॥
जिवतारन हम यहि जग आये । जोजिव चीन्हेताहि मुक्ताये ॥
धर्मराय अस बाजी कीन्हा । धोक अनेकजीव कहँ दीन्हा ॥
नीर पवनकृत्रिम किहु काला । विनशिजाय बहुकरे बिहाला ॥
अनुरागसागर
( ८३ )
तन हमार यदि साजते न्यारा। मम तन नहिं सिरज्यो करतारा॥
शब्द अमान देह है मोरा। परखि गहहु भाज्यो कछु थोरा॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
सुनी वचन अचल भौ भारी । तब रानी अस वचन उचारी॥
रानो इन्द्रमती वचन
हे प्रभु अचरज यह होई । अस सुभाव दूजा नहिं कोई॥
इन्द्र
इन्द्रमती आधीन है कहै, कृपा करहु दयानिधी ॥
एक एक विलोय वरणहु, मोहिते सकलहु विधी ॥
विष्णु सम दूजा नहिं कोई रुद्र चतुरानन मुनि ॥
पंचत्व स्वमीर तनहि, तत्त्वके वश गणगुणी ॥५९॥
सो०-तुम प्रभु गम अपार, बरनो मोते कितभये ॥
भेटहु तृषा हमार अपनो, परिचय मोहि कह॥६२॥
हे प्रभु अस अचरज मोहि होई। अस सुभाव दूजा नहिं कोई॥
कौन आहु कहवाँते आये । तन अचित प्रभु कहैवा पाये॥
कौन नाम तुम्हरो गुरु देवा । यह सब वरणि कहे मोहि भेवा॥
हम का जानहि भेद तुम्हारा । ताते पूछों यह व्यवहारा ॥
करुणामय वचन
इन्द्रमती सुनो कथा सुहावन । तोहि समुझाय कहों गुणपावन॥
देश हमार न्यार तिहुँ पुरते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुरते॥
तहाँ नहीं यमकेर प्रवेशा । आदि पुरुषको जहवाँ देशा॥
सत्य लोक तेहि देश सुहेला । सत्य नाम गहि कीजे मेला॥
अद्भुत ज्योति पुरुषकी काया । हंसन शोभा अधिक सुहाया॥
आदि पुरुष शोभा अधिकारा । पटतर काहि देहुँ संसारा ॥
द्वीपकरी शोभा उजियारी । पटतर देहुँ काहि संसारी ॥
( ८४ )
अनुरागसागर
यहि तीनों पुर अस नहिं कोई । जाकर तटपर दीजै सोई ॥
चन्द्र सूर यहि देश मंझारा । इन सम और नहीं उजियारा ॥
सत्य लोककी ऐसी बाता । कोटिकशशि इकरोम लजाता ॥
एक रोमकी शोभा ऐसी । और वदनकी वरणों कैसी ॥
ऐसा पुरुष कान्ति उजियारा । हंसन शोभा कहीं बिचारा ॥
एक हंस जस षोडश भाना । अग्र वासना हंस अधाना ॥
तहैं कबहुँ यामिनि नहिं होई । सदा अजोर पुरुष तन सोई ॥
कहा कहां कछु कहत न आवै । धन्य भाग जे हंस सिधवै ॥
ताहि देशते हम चलि आये । करुणामय निज नाम धराये ॥
सतयुग त्रेता द्वापर नामा । तोसन वचन कहीं सुख धामा ॥
युगन युगनमें मैं चलि आवों । जो चेते तेहि लोक पठावों ॥
इन्द्रमती वचन
हे प्रभु औरौ युग तुम आये । कौन नाम उन युगन धराये ॥
करुणामय वचन
सतयुगमें सतनाम कहाये । त्रेता नाम सुनींद्र धराये ॥
युगन युगन हम नाम धरावा । जो चीन्हा तिहिलोक पठावा ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
धर्मदास तेहि कह्यो बुझाई । सतयुग त्रेता कथा सुनाई ॥
सो सुनि अधिक चाह तिन कीन्हा । और बातसु पूछन लीन्हा ॥
उत्पति प्रलय और बहु भाऊ । यम चरित्र सब बरनि सुनाऊ ॥
जेहि विधि षोडश सुत प्रगटना । सो सब भाषा सुनायो ज्ञाना ॥
कूर्म विदार देवी उत्पानी । सो सब ताहि कहा सहिदानी ॥
त्रास अष्टंगी और निकास । जेहि विधि भये मही आकासा ॥
सिंधुमथन त्रय सुत उत्पानी । सबहि कहेउ पाछिल सहिदानी ॥
अनुरागसागर
( ८६ )
जेहिविधिजीवनजमठगिराखा । सो सब ताहि सुनायउ भाषा ॥
सुनत ज्ञान पाछिल भ्रम भागा । हरषि सो चरण गहे अनुरागा ॥
इन्द्रमती वचन
जोरि पाणि बोली बिलखायी । प्रभु यमते लेहु छुड़ाई ॥
राज पाट सब तुम पर बारों । धन सम्पति यह सब तजि डारों ॥
देहु शरण मुहिं दीनदयाला । बंदिछोर मुहिं करहु निहाला ॥
कृष्णामय वचन
इन्द्रमती सुन वचन हमारा । छोरों निश्चय बंदि तुम्हारा ॥
चीन्हेउ मोहिं परतीत ददाना । अब देहुँ तोहि नाम परवाना ॥
करहु आरती लेहु परवाना । भागे यम तब दूर पयाना ॥
चीन्हों मोहि करो परवाती । लेहु पान चालु भौ जल जाती ॥
आनहु जो कछु आरती साजा । राजपाट कर मोहि न काजा ॥
धन सम्पति कछु मोहि न भावा । जीव चितावन यहि जग आवा ॥
धन सम्पति तुम यहवों लायी । करहु सन्त सम्मान बनायी ॥
सकल जीव हैं साहिब केरा । मोह वश जिय परें अँधेरा ॥
सब घट पुरुष अंश कियो बासा । यहि प्रगट कहिं गुप्त निवासा ॥
छन्द
सब जीव हैं सतपुरुषका वश, मोह भ्रम विगानहो ॥
यमराजको यह चरित सब, भ्रम जाल जग परधानहो ॥
जिव काल वश लरत मोसे भ्रम वश मोहि चीन्हई ॥
तजिसुधाकीन्होनेह विषसे, छोड़ि घृत अँचवे मही ६० ॥
सो ०-कोइइ कविरला जीव, परसि शब्द मोहि चीन्हई ॥
धाय मिले निज पीव, तजे जारको आसरो ॥ ६३ ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती सुन वचन अमानी । बोली मधुर ज्ञान गुण बानी ॥
( ८६ )
अनुरागसागर
मोहि अधमको तुम सुख दीन्हा। तुव प्रसाद आगमगम चीन्हा ॥
हे प्रभु चीन्ह तोहि अब पाहू । निश्चय सत्यपुरुष तुम आहू ॥
सत्यपुरुष जिन लोक सवारा । करेहु कृपा सो मोहि उदारा ॥
आपन हिरदै असहम जाना । तुमते अधिक और नहि आना ॥
अब भाषहु प्रभु आरती भाऊ । जो चाहिये सो मोहि बताऊ ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
हे धर्मनि सो ताहि सुनावा । जस खेमसरि सो भाषेउ भावा ॥
चौका कर लेवहु परवाना । पीछे कहों अपन सहिदाना ॥
आने उसकलसाज तब रानी । चौका बैठि शब्दध्वनि ठानी ॥
आरति कर दीन्हा परवाना । पुरुष ध्यानसुमिरण सहिदाना ॥
उठि रानी तब माथ नवायी । ले आज्ञा परवानी पायी ॥
पुनि रानी राजहि समुझावा । हे प्रभु बहुरि न ऐसो दावा ॥
गहो शरण जो कारज चाहो । इतना वचन मोर निरवाहो ॥
राजा चन्द्र विजय वचन
तुम रानी अरधंगी सोई । हम तुम भक्त होय नहि होई ॥
तोरि भक्ति कर देखो भाऊ । किहिविधि मोहि लेहु सुत्ताऊ ॥
देखो तोरि भक्ति परतापा । पहुँचै लोक मिटे संतापा ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
रानी बहुरि मोहिपहँ आयी । हम तिहिकाल चरित्र लखाई ॥
रानी आई हमरें पास । तासों कियो वचन परकासा ॥
कृष्णामय वचन
सुनु रानी एक वचन हमारा । कालहु कला करे छल धारा ॥
काल ब्याल है तोपहँ आयी । डसे तोहि सो देउँ बतायी ॥
ता कह शिष्य कीन्ह मैं जानी । डसे काल तक्षक है आनी ॥
तब हम तो कहँ मंत्र लखायी । काल गरल तब दूर परायी ॥
अनुरागसागर
( ८७ )
दीन्हों शब्द विरहुली ताहीं । काल गरल जेहि व्यापे नाहीं॥
पुनियम दूसर छल तोहि ठानी । सो चरित्र मैं कहों बखानी ॥
छलकर यम आये तुम पासा । सो तुहि भेद कहों परगासा ॥
हंसवर्ण वह रूप बनायी । हमसम ज्ञान तोहि समझायी ॥
तुमसन कहे चीन्ह मोहिरानी । मरदन काल नाम ममज्ञानी ॥
यहि विधि काल ठगे तोहि आयी । काल रेख सब देउ बतायी ॥
मस्तक छोट कालकर जानू । चक्षु गुंजनको रंग बखानू ॥
काल लक्ष मैं तोहि बतायी । और अंग सब सेत रहायी ॥
इन्द्रमती वचन
रानी चरण गहे तब धायी । है प्रभु मोहि लोक लै जायी ॥
यह तो देश आही यमकेरा । लै चलु लोक मिटे झकझोरा ॥
यह तो देश कालकर थानी । हे प्रभु लै चलु देश अमानी ॥
करुणामय वचन
तब रानीसों कहेउ बुझाई । वचन हमार सुनो चितलाई ॥
अब तोर तिनका यमसों दूटा । परिचय भयो सकल भ्रम छूटा ॥
निशिदिन सुमरो नाम हमारा । कहा करे यह धर्म लबारा ॥
जब लगि ठेका पूरे नाई । तब लगि रहो नाम लौ लाई ॥
छन्द
सुमरु नाम हमार निशिदिन, काल तो कहैं जब छले ॥
टीका पुरे नाहिं जौलों तौलों जीव नाहीं चले ॥
काल कला प्रचंड देखो, गजरूप धर जग आवई ॥
देखि केहरि गजत्रास माने, धीर बढ़रि न लावई ॥ ६१ ॥
सो०—गजरूपी है काल, केहरि पुरुष प्रताप है ॥
रोप रहो तुम ढाल, काल खड़ व्यापे नाहीं ॥ ६४ ॥
( ८८ )
अनुरागसागर
इन्द्रमती वचन
हे साहिब मैं तुम कहैं जानी । वचन तुम्हार लीन्ह सिर मानी ॥
विनती एक करों तुहि स्वामी । तुम तो साहिब अंतरयामी ॥
काल ब्याल दुष्ट मोहि सताई । अरु पुनि हंसरूप भरमायी ॥
तब पुनि साहिब मोपहैं आज्ञ । हंस हमार लोको लै जाऊ ॥
करुणामय वचन
कह ज्ञानी सुन रानी बाता । तुमसों एक कहों विख्याता ॥
काल कला धरती पहैं आयी । नाना रंग चरित्र बनायी ॥
तोरों ताहि मान अपमाना । मोहि देखि तब काल पराना ॥
तेहि पीछे हम तुम लग आवैं । हंस हमार लोक पहुँचावैं ॥
शब्द तोहि हम दीन्ह लखाई । निशिदिन सुपरी चित्त लगायी ॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति
इतना कह हम गुप्त छिपाया । तक्षक रूप काल हो आया ॥
चित्रसार पर तक्षक आया । रानी केर तहैं पलंग रहया ॥
जबही रात बीत गई आधी । रानी उठि चली सेवा साधी ॥
रानी तब कहैं सीस नवायी । चली तबै महलन कहैं आयी ॥
सेज आय रानी पौढ़ायी । डसेउ ब्याल मस्तक महैं जायी ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती अस वचन सुनायी । तक्षक डसेउ मोहि कहैं आयी ॥
सुन राजा व्याकुल है धावा । गुणी गारुणी वेगि बुलावा ॥
राय कहे मम प्राणपियारी । लेहु चिताय जो अबकी बारी ॥
तक्षक गरल दूर हो आयी । देहुँ परगना तोहि दिवायी ॥
इन्द्रमती वचन छन्द
शब्द विरहुली जपेउ रानी, सुरति साहब राखिहो ॥
वैद गारुणि दूर भाग्या, दूर नरपति नाहि हो ॥
अनुरागसागर
( ८९ )
मन्त्र मोहि लखाय सतगुरु, गरल मोहि न लागई ॥
होत सूर्यप्रकाश जेहिक्षण, अन्ध घोर नशावई ॥६२॥
सोरठा-ऐसे गुरु हमार, बार बार विनती करौं ॥
ठाढ़भयी उठिनार, राजा लखि हरषित भयो ॥६५॥
यमदूतवचन
चल्यो दूत तब उहवां जायी । जहाँ ब्रह्मा विष्णु मद्देश रहायी॥
कहे दूत विषतेज न लागा । नाम प्रतापबंध लो भागा ॥
विष्णुवचन
कहे विष्णु सुन हो यम दूता । सेतहि अंग करो तुम पूता ॥
छक करि जाइ लिवाइय रानी । वचन हमार लेहु तुम मानी ॥
कीन्हो दूत सेत सब अंगा । जलेउ नारि पहुँ बहुत उमंगा ॥
यमदूतवचन
रानीसों अस वचन प्रकाशा । तुम कस रानी भई उदासा ॥
जानि बूझि कस भई अचीन्हा । दीक्षा मन्त्र तोहि हम दीन्हा ॥
ज्ञानी नाम हमारो रानी । मरदो काल करौं पिसमानी ॥
तक्षक काल होय तोहि खायी । तब हम राख लीन्ह तोहि आयी ॥
छोड़हु पल्लंग गहो तुम पाई । तजहु आपनी मान बड़ाई ॥
अब हम लेन तोहि कहैं आवा । प्रभुके दर्शन तोहि करावा ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती तब चीन्हेउ रेखा । असकछु साहिब कहेउ विशेषा ॥
तीनों रेख देख चक माहीं । जर्द सेत अरु राता आहीं ॥
मस्तक ओछ देख पुनि ताको । भयो प्रतीत वचनको साको ॥
जाहु दूत तुम अपने देशा । अब हम चीन्हेउ तुम्हारो भेसा ॥
काग रूप जो बहुत बनाई । हंस रूप शोभा किमि पाई ॥
तस हम तोरा रूप निहारा । है समर्थ बड़ गुरु हमारा ॥
( ९० )
अनुरागसागर
यमदूतवचन
यह सुन दूत रोष बड़ कीन्ह। इन्द्रमतीसों बोले लीन्ह। ॥
बार २ तो कहैं समुझावा । नाहिंन समुझत मती हिरावा ॥
बोला वचन निकट चलिआवा । इन्द्रमती पर थाप चलावा ॥
थाप चलाय सुमुखपर मारा । रानी खसि परि भूमि मझारा ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती तब सुमिरण लाई । हे गुरु ज्ञानी होहु सहाई ॥
हमकहैं काल बहुत विधिआसा । तुमसाहिब काटो यमफाँसा ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सुनत पुकार सुनि रहो न जायी । सुनहु धर्मनि यह मोर सुभायी ॥
रानी जबही कीन्ह पुकारा । तब छिन मैं तहांहि पगुधारा ॥
देखत रानी भयी हुलासा । मनते भाग्यो कालको त्रासा ॥
आवत हमरे काल पराया । भयी शुद्ध रानीकी काया ॥
इन्द्रमतीवचन
पुनि कह इन्द्रमती कर जोरी । हे प्रभु सुनु विनती एक मोरी ॥
चीन्हि परी मोहियमकी छाहीं । अब यहि देश रहब हम नाहीं ॥
हे साहिब लै चलु निज देशा । तहवाँ है बहु काल कलेशा ॥
इहि विधि कही भली उदासा । अबहीं लै चलु पुरुषके पास ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
प्रथमहिं रानी कीन्हो संग। मेटचो काल कठिन परसंगा ॥
तबही टीका पूर भराया । ले रानी सतलोक सिधाया ॥
ले पहुँचायो मान सरोवर । जहवां कामनि करहिं कतोहर ॥
अमी सरोवर अमी चखायो । सागर कबीर पांव परायो ॥
तेहि आगे सुरतिको सागर । पहुँची रानी भई उजागर ॥
लोक द्वार ठाढ़े तब कीनी । देखत रानी अति सुख भीनी ॥
हंस धाय अंकमें लीन्ह। गावहिं मंगल आरति कीन्ह ॥
अनुरागसागर
( ११ )
सकल हंस कीना सनमाना । धन्य हंस सतगुरु पहिचाना ॥
मलतुम छोड़ेउ कालका फंदा । तुम्हारो कष्ट मिटचो दुख द्रंदा ॥
चलो हंस तुम हमारे साथा । पुरुष दरश करिनावहु माथा ॥
इन्द्रमती आवहु संग मोरे । पुरुष दरश होवें अब तोरे ॥
इन्द्रमती अरु हंस मिलाहीं । करहिं कुतूहल मंगल गाहीं ॥
चलत हंस सब अस्तुति लावें । अब तो दरश पुरुषको पावें ॥
तब हम पुरुष सनविनती लावा । देहु दरस अब हंस ढिग आवा ॥
देहु दरश तिहिं दीनदयाला । बंदीछोर सु होहु कृपाला ॥
बिकस्यो पुहुष उठी असबानी । सुनहु योग संतायन ज्ञानी ॥
हंसन कहैं अब आव लिवाई । दरश कराइ लेउ तुम आई ॥
छन्द
ज्ञानीखाउ हंस लग तब, हंस सकला ले गये ॥
पुरुषदर्शन पाय हंसा, रूप शोभा तब भये ॥
करहिं दंडवत हंस सबही, पुरुष पहुँ चित लाइया ॥
अमीफल तब चार दीन्हों, हंस सब मिल पाइया ॥ ६३ ॥
सो०—जस रविके परकाश, दरश पायपंकज खुले ॥
तैंसैं हंस विलास, जन्म जन्म दुखमिटि गयो ॥ ६६ ॥
इन्द्रमतीको लोकमें पहुँच पुरुष और करणामयको एकही
रूपमें देखकर चकित होना
पुरुष कांति जब देखेउ रानी । अद्भुत अमी सुधाकी खानी ॥
गदगद होय चरण लपटानी । हंस सुबुद्धि सुजन गुणज्ञानी ॥
दीनों शीश हाथ जिव मूला । रविप्रकाश जिमि पंकज फूला ॥
इन्द्रमती वचन
कह रानी तुम धनिकरुणामय । जिमिभ्रममेटि आनियहिठामय
( ९२ )
अनुरागसागर
पुरुष वचन
कहा पुरुष रानी समझायी । करूणामय कहँ आनु बुलाई॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
नारि धाय आई मो पासा । महिमा देखि चकित भये दासा॥
इन्द्रमतीवचन
कह रानी यह अचरज आही । भिन्न भाव कछु देखों नाहीं ॥
जे कोइ कला पुरुष कहँ देखा । करूणामय तन एक विशेषा॥
धाय चरण गह हंस सुजाना । हे प्रभु तब चरित्र सब जाना॥
तुम सतपुरुष दास कहलाये । यह शोभा कस कहाँ छिपाये॥
मोरे चित यह निश्चय आई । तुमहि पुरुष दूजा नहिं भाई॥
सो मैं आय देख यहि ठाई । धनसमरथ मुहिं लिया जगाई॥
इन्द्रमती स्तुति करती है । छन्द
तुम धन्य हो दयानिधान सुजान नाम अर्चितयं ॥
अकथ अविचल अमर अस्थित अनघ अजसु आदिये ॥
असंशय निःकाम वाम अनाम अटल अखंडितं ॥
आदि सबके तुमहि प्रभु हो सर्व भूतसमीपतं ॥ ६४ ॥
सो ०-मोपर भये दयाल, लियहु जगाई जानि निज ॥
काटेहु यमको जाल, दीन्हो सुखसागर करी ॥ ५७ ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
संपुट कमल लगे तेहि बारा । चले हंस निज दीप मैझारा ॥
करूणामय ( ज्ञानी ) वचन इन्द्रमतीप्रति
ज्ञानी बूझें रानी बाता । कहो हंस तुम्हरो विख्याता ॥
अब दुख द्रंद तोर मिटि गयऊ । षोडश भानु रूप पुनि भयऊ ॥
ऐसे पुरुष दया तोहि कीन्हा । संशय सोग मेंटि तुव दीन्हा ॥
अनुरागसागर
( ९३ )
इन्द्रमतीका अपने पति राजा चन्द्रविजयको लोकमें लानेके लिये
विनती करना इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती कह दोउ कर जोरी । हे साहिब इक विनती मोरी ॥
तुम्हरे चरण भागते पायी । पुरुष दर्श कीन्हा हम आयी ॥
अंग हमार रूप अति सोही । इक संशय व्यापे चित मोही ॥
मो कहैं भयो मोह अधिकारा । राजापति आहि हमारा ॥
आनहु ताहि हंसपति राई । राजा मोर कालमुख जाई ॥
कृष्णा वचन
कहे ज्ञानी सुन हंस सुजाना । राजा नहिं पाये परवाना ॥
तुम तो हंसरूप अब पाया । कौनकाज कहैं राव बुलाया ॥
राजा भाव भक्ति नहिं पाया । सत्त्वहीन भव भटका खाया ॥
इन्द्रमती वचन
हे प्रभु हम जग माँह रहेऊ । भक्तितुम्हारि बहुत विधि करेऊ ॥
राजा भक्ति हमारी जाना । हम कहैं बरजेउ नहीं सुजाना ॥
कठिन भाव संसार सुभाऊ । पुरुष छोड़ कहु नारि रहाऊ ॥
सब संसार देहि तिहि गारी । सुनतहि पुरुष डार तेहि मारी ॥
राज काज अतिमान बड़ाई । पाखंड क्रोध और चतुराई ॥
साधु संतकी सेवा करऊ । राजकेर त्रास ना डरऊ ॥
सेवा करौ संतकी जबहीं । राजा सुनि हरषित हो तबहीं ॥
जो मोहिं तजि न देता राजा । तो प्रभु मोर होत किमि काजा ॥
छन्द
रायकी हम हती प्यारी, मोहिं कबहुँ न बरजेऊ ॥
साधु सेवा कीन्ह नित हम, शब्द मारग चीन्हैऊ ॥
चरण मो कहैं मिलत कैसे, मोहि बरजत रायजो ॥
नामपाननमिलत मोकहैं, कैसे सुधरत काजजो ॥ ६५ ॥
( ९४ )
अनुरागसागर
सो०-धन्य राय सुज्ञान, आनहु ताहि हंस ॥
तुम गुरुदयानिधान, भूपति बंद छुड़ाइये ॥६८॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
सुन ज्ञानी बहुतै विहँसाये । चले तुरंग बार नहिं लाये ॥
गढगिरनार बेगि चलि आया । नृपति केरि अवधी नियराया ॥
घेरेचो ताहि लेन यमराई । राजहि देत कष्ट बहुताई ॥
राजा परे गाढ़ महाँ आया । सतगुरु कहै तहाँ गुहराया ॥
घोड़े नृप नाहीं यमराई । ऐसे भक्ति चूक है भाई ॥
भक्ति चूक कर ऐसे ख्याला । अवधि पूर यम करे विहाला ॥
चन्द्रविजयका करगहि लीन्हा । तत्क्षण लोक पयाना दीन्हा ॥
रानी देखि नृपति ढिग आई । राजा केर गह्यो तब पाई ॥
इन्द्रमती वचन
इन्द्रमती के सुनहु भुवारा । मोहि चीन्हों मैं नारि तुम्हारा ॥
राजा चन्द्रविजय वचन
राय कहैं सुनु हंस सुजाना । वरण तोर षोडश शशिमाना ॥
अंग अंग तोरे चमकारी । कैसे कहाँ तोहि मैं नारी ॥
तुम तो भक्त कीन्ह भल नारी । हमहू कहैं तुम लीन्ह उबारी ॥
धन्य गुरु अस भक्ति दृढ़ाई । तोरि भक्ति हम निज घर पाई ॥
कोटिन जन्म कीन्ह हम धर्मा । तब पाई अस नारि सुकर्मा ॥
हम तो राजकाज मनलाया । सतगुरु भक्ति चीन्ह नहिं पाया ॥
जो तुम मोरि होत ना नारी । तो हम जात नरककी खानी ॥
तुवगुण मोहि वरणि ना जाई । धनगुरु धन्य नारि हम पाई ॥
जस हम तो कहैं पायउ नारी । तैसे मिले सकल संसारी ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
मुनत वचन ज्ञानी वहसायी । चन्द्रविजय कहैं वचन मुनायी ॥
सुपच सुदर्शनकी कथा
अनुरागसागर
( १५ )
कहणा मय वचन
सुनो राय तुम नृपति सुजाना । जो जिव शब्द हमारा माना ॥
ते पुनि आय पुरुष दरबारा । बहुरि न देखे वह संसारा ॥
हंस रूप होवे नर नारी । जो निजमाने बात हमारी ॥
पुरुष दर्श नरपति चितलायी । हंस रूप शोभा अतिपायी ॥
षोडश भानु रूप नृप पावा । जानुमयंकम ढार बनावा ॥
धर्मदासवचन छन्द
धर्मदास विनती करे, युग लेख जीव सुनायऊ ॥
धन्य नाम तुम्हारा साहिब, राय लोक समायऊ ॥
तत्त्वभाव न गहेउ राजा, भक्ति तुव निजठानिया ॥
नारिभक्ति प्रतापते, यमराजसै नृप आनिया ॥६६॥
सो०-धन्यनारिकोज्ञान, लीन्ह बुलायस्व नृपति कहैं ॥
आवागमन नशान, जगमें बहुरि न आइया ॥६९॥
ता पीछे पुनि का प्रभु कीना । सोई कथा कहो परबीना ॥
कैसे पुनि आये भवसागर । सो कहिये हंसन पतिनागर ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
धर्मनि पुनि आये जगमाहीं । रानी पति ले गये तहांहीं ॥
राख्यो ताहि लोक मंझारा । तत छिन पुनि आयउ संसारा ॥
काशी नगर तहां चलि आये । नाम सुदरशन सुपच जगाये ॥
सुपच सुदर्शनकी कथा
नाम सुदर्शन सुपच रहाई । ता कहे हम सतशब्द दृढाई ॥
शब्द विवेकी संत सुहेला । चीन्हा मोहि शब्दके मेला ॥
निश्चय वचन मान तिन्ह मोरा । लखि परतीत वंदि तिहि छोरा ॥
नाम पान दियो मुक्ति सँदेशा । मेटचो सकल काल कलेशा ॥
कलियुगमें कबीरसाहबके पृथ्वीपर आनेका वृत्तांत
( ९६ )
अनुरागसागर
शब्द ध्यान तेहि दीन्ह हढाई । हरषित नाम सुमिरे चितलाई॥
सतगुरु भक्ति करे चितलाई । छोडी सकल कपट चतुराई॥
तात मात तेहि हर्ष अपारा । महाप्रेम अतिहित चितधारा॥
धर्मनि यह संसार अँधेरा । विनु परिचय जिव यमको चेरा॥
भक्ति देखि हर्षित हो जायी । नाम पान हमरो नहिं पाईं ॥
प्रगट देखि चीन्हे नहिं मूढ़ा । परे कालके फन्द अगूढ़ा ॥
जैसे श्वान अपावन रांचेउतिमिजगअमीछोड़िविषखांचेउ
नृपति युधिष्ठिर द्वापर राजा । तिन पुनि कीन्ह यज्ञको साजा ॥
बन्धु मार अपकीरति कीन्हा । ताते यज्ञरचनके चित दीन्हा ॥
कृष्ण केर जब आज्ञा पाई । तब पांडव सब साज मँगाईं ॥
यज्ञकी सामग्री गहि सारी । जहाँ तहाँते सब साधु हँकारी ॥
पाण्डव प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहिंकाला ॥
घण्ट अकाश बजत सुनि आवे । यज्ञको फल तब पूरन पावे ॥
संन्यासी वैरागी झारी । आवे ब्राह्मण औ ब्रह्मचारी ॥
भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहिं जेवाईं ॥
इच्छा भोजन सब मिलि पावा । घण्ट न बाजा राय लजावा ॥
जबहि घण्ट न बाज अकाशा । चकित भयोराय बुधिनाशा ॥
भोजन कीन सकल ऋषिराया । बजा न घण्ट भूप भ्रम आया ॥
पांडव तबहिं कृष्णपह गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥
युधिष्ठिर वचन
करिके कृपा कहो यदुराजा । कारण कौन घण्ट नहिं बाजा ॥
कृष्ण उत्तर
कृष्ण अस कारण तासु बताया । साधू कोइ न भोजन पाया ॥
१ “शब्द ध्यान” के बदले किसी प्रतियोगी “ सुरति ध्यान ” लिखा है ।
अनुरागसागर
( १७ )
युधिष्ठिरवचन
चकित भै तब पाण्डव कहेऊ । कोटिन साधु भोजन लहेऊ॥
अब कहैं साधु पाइय नाथा । तिनते तब बोले यदुनाथा ॥
कृष्ण वचन
सुपच सुदर्शनको ले आवो । आदरमान समेत जिमावो ॥
सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति
कृष्ण आज्ञा जब अस पयऊ । पाण्डव तब ताके ढिग गयऊ॥
सुपच सुदर्शनको ले आये । विनय प्रीतिसे ताहि जेवाये ॥
भूपभवन भोजन कर जबहीं । बजा आकाशमें घंटा तबहीं ॥
सुपच भक्त जब त्रास उठावा । बाजो घण्ट नाम परभावा ॥
तबहुँ न चीन्हे सतगुरु बानी । बुद्धि नाश यम हाट विकानी ॥
भक्त जीव कहैं काल सताये । भक्त अभक्त सबन कहैं खाये ॥
कृष्ण बुद्धि पांडव कहैं दीन्हा । बंधु घात पांडव तब कीन्हा ॥
पुनि पांडव कहैं दोष लगावा । दोष लगा तेहिं यज्ञ करावा ॥
ताहूपर पुनि अधिक दुखावा । भेजि हिमालय तिन्हैं लगावा ॥
चार बंधु सह द्रौपदि गहेऊ । उबरे सत्य युधिष्ठिर रहेऊ ॥
अर्जुन सम प्रिय और न आना । ताकर अस कीन्हा अपमाना ॥
बलि हरि चन्द्र करण बड़ दानी । काल कीन्ह पुनि तिन्हकी हानी ॥
जिव अचेत आशा तेहि लावे । खसम बिसार जारको धावे ॥
कला अनेक दिखावे काला । पीछे जीवन करे बिहाला ॥
मुक्ति जान जिव आशा लावै । आशा बांधि कालमुख जावै ॥
सब कहैं काल नचावै नाचा । भक्त अभक्त कोइ नहिं बाचा ॥
जो रक्षक तेहि खोजे नाहीं । अनचीन्हे यमके सुख जाहीं ॥
बार बार जीवन समुझावा । परमारथ कहैं जीव चितावा ॥
( ९८ )
अनुरागसागर
अस यम बुद्धि हरी सब केरी । फंद लगाय जीव सब घेरी ॥
सत्य शब्द कोइ परखे नाहीं । यम दिशि होय लरै हम पाहीं ॥
जबलगि पुरुष नाम नहिं भेटे । तब लगि जन्म मरण नहिं भेटे ॥
पुरुष प्रभाव पुरुष पहुँ जाई । कुत्रिम नामते यम धरिखाई ॥
पुरुष नाम परवाना पाये । कालहि जीत अमर घर जावे ॥
चन्द्र
सत नाम प्रताप धर्मनि, हंस लोक सिधार्वई ॥
जन्ममरणको कष्ट भेटै, बहुरि न भव जल आवई ॥
पुरुषकी छबि हंस निरखहि, लहे अति आनंद घना ॥
अंश हंस मिलिकरै कुतूहल, चन्द्र कुमुदिनि सँग बना ६६
सो०—जैसे कुमुदिनि भाव, चन्द्र देखि निशि हर्षई ॥
तैसह हंस सुख पाव, पुरुष दर्शके पावते ॥ ७० ॥
नहिं मलीन सुखभाव, एक प्रभाव सदा उदित ॥
हंस सदा सुख पाव, शोक मोह दुख क्षण कनहि ॥ ७१ ॥
जबै सुदर्शन देका पूरा । ले सत लोक पठायो सूरा ॥
मिले रूप शोभा अधिकारा । हंसन संग कुतूहल सारा ॥
षोडश भानु रूप तब पावा । पुरुष दर्श सो हंस जुड़ावा ॥
धर्मराय वचन
हे साहिब इक बिनती मोरा । खसम कबीर कहु बंदी छोरा ॥
भक्त सुदरशन लोक पठायी । पीछे साहिब कहाँ सिधायी ॥
सो सतगुरु कहो सुदि संदेशा । सुधा वचन सुनि मिटै अँदेशा ॥
कबीर वचन
अब सुनु धर्मनि परम पियारा । तुमसों कहौं अलग व्यवहारा ॥
द्रापर गत कलियुग परवेशा । पुनि हम चल जीवन उपदेशा ॥
धर्मराय कहैं देख्यो आई । मोहि देखि यम गयो मुझाई ॥