कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
विवेकसागर
( १२५ )
लगी—हे विद्वोहिणी ! दुराचारिणी विद्या ! तू कहीं भी चूकती नहीं है । प्रवृत्ति जो सौत निवृत्ति है उसके समाजमें सदा वास करके उसके पुत्र विवेकको पाठ कुपाठ अर्थात् सत्य झूठकी बात कह कहकर उसे बहकाती है और प्रवृत्तिके वंशका नाश भी तूने ही कराया है ।
जो वांछित सा कीनो अब कित भावसी ॥
जरे पर तैं माहुर भले लगावसी ॥
टीका—हे विद्या ! जो तेरे मनमें था सो तूने कर लिया अब क्या करना चाहती है कि जलेपर जहर लगाने आयी है आशाकी ऐसी दुष्ट वाणीको सुनकर विद्याने उसकी उपेक्षा की और मनराजासे कहने लगी ।
स्वामी चित धीरज धरि नीति विचारिये ॥
उभय नारि प्रतिपालक कितहिं विसरिये ॥
टीका—विद्याने कहा हे महाराज मन ! आप नीतिपूर्वक विचार करके देखिये कि आप अपनी दोनों स्त्रियोंके पालन पोषण करनेवाले हैं । सो आप इस धर्मको कहाँ भूल गये हैं । आप अबतक प्रवृत्तिमें सम्पूर्ण लिप्त होरहे हैं और निवृत्तिको एकदम भुला दिया है उसकी ओर भी दृष्टि उठाकर देखिये । इस प्रकारसे मनराजासे कहकर विद्या आशाकी ओर फिरी और उसको डांटा—
भाग भाग दूती भामिनी नित्य इच्छा चहै ॥
प्रवृत्ति है भारी देह अजहूँ चिता गहै ॥
टीका—विद्या कहती है । हे दूती ! आशा ! यहाँसे भाग जा यहाँसे भाग जा । देखती है कि, मनराजाके साथ प्रवृत्ति शरीर रूप होकर साक्षात् इतने बड़े स्वरूपसे विराज रही है तथापि उसको फिरसे और भी बड़ा बनानेके लिये चिता कर रही है ।
मन राजाका निवृत्ति रानीपर प्रसन्न होकर उसके साथ रहना
( १२६ )
विवेकसागर
यहाँ भाग, भाग दोबार कहनेसे आशय यह है कि निवृत्ति परायण पुरुषोंको लौकिक पारलौकिक दोनों प्रकारकी आशा त्यागनी चाहिये और यही वेराग्यका स्वरूप है । आशाको इस प्रकार से दुत्कार विद्या फिर मन राजासे कहने लगी ॥
छन्द-गहि निवृत्ति स्नेह कीजे सुनहु स्वामी नागरा ॥
विषय शोचहि कहा कीजे करहु राज उजागरा ॥
टीका-विद्याने कहा हे बुद्धिमान स्वामिनअब आप निवृत्ति को ग्रहण करके उसके साथ प्रेमपूर्व राज्य कीजिये ॥
मन राजा सुनि हर्षेऊ निवृत्ति संगम आयउ ॥
पति परी आन्दन्द भारी मुफल जीवन पायउ ॥
टीका-विद्याके शिक्षाप्रद वचनोंको सुनकर मनराजा मनमे बहुत प्रसन्न हुआ और विद्याके साथही निवृत्तिके समीप गया हे धर्मदास ! उस समय निवृत्तिके आनन्दका क्या पार हो ? निवृत्ति अपने पतिको अपने ऊपर कृपा करनेके लिये निकट प्राप्त हुआ देखकर अपनी जीवनकी साफल्यताको प्राप्त जानकर पतिके चरणपर पड़ गयी ॥
अब दोनों आनन्दपूर्वक आनन्द विलासमें मग्न हुए ॥
इस प्रकारसे हे धर्मदास ! जब यह मन प्रवृत्तिसे अलग होकर निवृत्तिको प्राप्त होकर गुरुमुखद्वारा सच्चे पारख पदको प्राप्त होता है तब मन स्थिर होकर सुखकी प्राप्ति होती है ॥
इति श्रीहंसमुक्तावली अर्न्तगत मोह और विवेकका युद्ध कवीरपंथी भारत-पथिककृतटीका सहित समाप्त
इति विवेकसागर समाप्त
धर्मदासजीका सर्वज्ञानका सार पूछना
सत्यसुक्त, आदिअदली, अजर अचिन्त, पुरुष, मुनींद्र, करुणामय, कबीर सुरति योग संतायन, धनी, धर्मदास, चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध, गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाकनाम, प्रगट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया, वंश-व्यालीसकी दया ।
अथ श्रीसर्वज्ञसागर प्रारम्भः
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धर्मदास वचन-चोपाई
कहे धर्मदास सुनो गुसाई । सकल मता तुम कहा समुझाई ॥
वरनि भेद कहो बहुमानी । सर्व ज्ञान तुम कही बखानी ॥
सब को सार कहो समुझायी । भित्र २ मोहि देहु लखायी ॥
सावन भादो वरसे मेहा । एते शब्द तुम कथे विदेहा ॥
बहुत अगम है मता तुम्हारा । कहैं लंगि गम्य करै संसारा ॥
नर देही कछु गम्य न जाने । जो कछु सुने सोई अनुमाने ॥
तहैंको भेद कहैं मूरख पावे । त्रितु सतगुरुको आन लखावे ॥
जो नहीं गर्भवास महीं आवा । अजावन सोई गुरु कहावा ॥
कबीर साहबका चार ज्ञान कहना
(१२८)
सर्वज्ञसागर
सारखी-बहुत भेद कहो तुम, सुन्यो सुरति दे कान ॥
अब कछु ऐसो भाषिये, आदि अंत बंधान ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
तब सतगुरु असवचन उचारा । सुनु धर्मनि प्राण अधारा ॥
बहुत ज्ञान सुनायो तोही । तुम अंतर जाना अब मोही ॥
कोटि ग्रन्थ ज्ञान हम भाखा । सुनिके भेद तुम अन्तर राखा ॥
पुनि टकसार मैं कहाँ अमानी । सो धर्मनि तुव मन नहिं मानी ॥
बीजक ज्ञान मैं कहो अरथाई । सो तुमरे चित एक नहिं आई ॥
चौथे मूल ज्ञान लै आवा । सर्व लोकन को भेद बतावा ॥
चार ज्ञान मैं कहा समझायी । तेहिमें तुम्हे परतीति न आयी ॥
विनु परतीति काज नहिं होई । श्रद्धा विना जिव जाय विगोई ॥
सारखी--पुरुष हमसों जो कही, सो तोहि दीन्ह दिखाय ॥
और धर्म नहिं गोइहों, सुनु धर्मनि चित लाय ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनती अनुसारी । साहिब विन्ती सुनो हमारी ॥
सकल भेद गुरु कहौ बुझायी । जाते संशय सब मिटि जायी ॥
आदि अंत मधि गति सोई । सबै कहौ राखो मति गोई ॥
पहले आदि समरथ किमि होई । उत्पति प्रलय भाषो तुम सोई ॥
तुम संदेशी आदिते आये । सर्व भेद तुम हमें सुनाये ॥
चारि ज्ञान तुम भाषि सुनावा । ज्ञान चारिको अर्थ बतावा ॥
अब त्रयवाचिक मोहि सुनावहु । दया करो जनिमोहि छिपावहु ॥
सारखी--तुम निज सतगुरु आदि हो, हम हैं वंश तुम्हार ॥
समरथ अन्त बतावहु, मिटे भर्म कौवार ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
तब साहिब अस वचन उचारा । सुनु धर्मनि प्राण अधारा ॥
आदि अन्त नहिं कोई वासा । आपहि आप कीन्ह प्रकासा ॥
आदिका वर्णन
सर्वज्ञसागर
(१२९)
साहब हते और नहीं कोई । शिष्य गुरु हते नहीं होई ॥
नहीं तब ब्रह्मा वेद निशानी । नहीं तब शिवकी उत्पानी ॥
नहीं तब विष्णु न निरंजन राया । नहीं तब अच्छर सृष्टि बनाया ॥
नहीं तब अतीत पुरुष कर ताना । नहीं तब रचे लोक अरु धामा ॥
नहीं सृष्टि न सिरजनहारा । नहीं कछु असार नहीं कछु सारा ॥
नहीं नरसिंग न कलकी नाहीं । गुरु और शिष्य बताऊ काहीं ॥
सारखी-पिण्ड ब्रह्माण्ड तब ना हता, नहीं लोक विस्तार ॥
पुरुष एक निश्चल हता, जिनकी सकल पसार ॥
धर्मदास बचन-चौपाई
सुनु सद्गुरु विनती चित लायी । तुम गुरु रूप सदा सुखदायी ॥
ब्रह्मा देवता वेद विचारा । सो हम बूझे हृदय मँझारा ॥
चारि वेद भे तहैं चारी । चारि धाम गुरु कहौ विचारी ॥
सर्व ज्ञान गति तुम भाखा । क्षर अक्षर थापि जो राखा ॥
उत्तर पुरुष सब कछु कीना । सो तौ हम जीवन सब चीन्हा ॥
यही भेद विरञ्चि विचारा । सोई आठों योग पुकारा ॥
सोई सकल मुनिन ठहराई । सोई शुक्रदेव संसार सुनाई ॥
सारखी-सोई पुरुष तुमही कहो, हम चीन्हा जियमाँहि ॥
तुम काहेको आयऊ, सोई बतावो थाहि ॥
सतगुरु बचन-चौपाई
तब सतगुरु बोले विहँसाई । धर्मदास बोले लडकाई ॥
जो कछु और विरञ्चि विचारा । सबकी गतिमतिकह्यौ निरधारा ॥
तेहिते और कहाँ है भाई । यही भेद सब जीवन पायी ॥
त्रिवाचिक तुम पूछो मोही । नितप्रति अगम कहाँ मैं तोही ॥
आदि अन्तकी उत्पत्तिका प्रश्नोत्तर
( १२० )
सबन्धसागर
कहा कहौं मैं कहत डराऊँ । ताते उत्पति कहत लजाऊँ ॥
तब नहिं होते पिण्ड ब्रह्मण्डा । तब ना हती पृथ्वी नौ खंडा ॥
तब नहिं लोक द्रौप की बानी । तब नहिं जीव जन्तु उत्पानी ॥
तब नहिं पुरुष और प्रकीरती । तब नहिं अछर निरञ्जन जोती ॥
तब नहिं ब्रह्मा विष्णु महेशा । तब नहिं गौरी गणेश औशेषा ॥
तब नहिं ज्ञान ध्यान औज्ञानी । तब नहिं वेद कितेव निशानी ॥
तब नहिं गुरु सतगुरुकी बानी । तब नहिं सात सिन्धु उत्पानी ॥
तब नहिं सुरति शब्द निर्मावा । तब नहिं एक दोय परभावा ॥
सारखी-पांचतत्त्व तब ना हते, न हते आठों धाम ॥
नौद्वार तब ना हते, कहाँ लीन्ह विश्राम ॥
धर्मदासवचन-चौपाई
सतगुरु मैं बलिहारी तेरी । जीवन की काटी तुम बेरी ॥
दया सिंधु दया तुम कीन्हा । सर्व जीव आपन करि लीन्हा ॥
दया करो जनि मोहिं छिपाओ । आदि अन्त उत्पन्न सुनाओ ॥
जो आपण करि जानो मोही । सकल भेद बतावहु तोही ॥
सारखी-धर्मदास विनती करै, गहि कबीरको पाय ॥
साहिब तुम बीछुरे, शब्द वाहिरे जाय ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
सुनु धर्मदास यह अकथ कहानी । सुर नर मुनि काहु नहिं मानी ॥
तन मन धनसो चित्त लगावे । गुरुका अन्त कोइ विरले पावे ॥
युगन युगन मोहि आवत भयऊ । सत्य शब्द मैं कहते रहेऊ ॥
कहा कहौं कोई नहिं मानै । जे समझे ते झगरा ठानै ॥
सत्ययुगका वर्णन
सतयुग चारि हंस समझाये । प्रथम राय मित्रसे नहिं आये ॥
त्रेतायुगका वर्णन
सर्वज्ञसागर
(१३१)
चित्ररेखा रानी कर नाऊ । तिन सुनिशब्द श्रवण चितलाऊ ॥
तिन युगबन्ध चौका कीन्हा । युग बन्धी परवाना लीन्हा ॥
राजा रानी पूछत मोही । सो हकीकत कहौ मैं तोही ॥
अष्टचौकाको शब्द सुनावा । राजा रानी लोक पठावा ॥
दुसरे राय वटक्षेत्रके आवा । सतसुकृति तहँ नाभ धरावा ॥
तिन राजा पूछा चित लायी । तब तेहि भेद कह्यो समझायी ॥
पान परवाना राजहिं दीन्हा । राजा वास लोकमें कीन्हा ॥
तिसरे राय हरचन्द कहँ आये । बन्ध काटिके लोक पठाये ॥
चौथे पुरी मथुरामें आयी । विकसी ग्वालिनके समझायी ॥
चारिहंस सतयुग समझाये । ते चारों गुरुवंश कहाये ॥
चारिहंस नौ लाख बचाये । शब्द भरोसे घरहि पठाये ॥
त्रेता युगका वर्णन
पुनि त्रेता युग कहौ विचारी । सात हंस त्रेतायुग तारी ॥
प्रथम ऋषी शृंगी समझाये । दुसरे अयोध्या मधुकर आये ॥
तिनसे शब्द कह्यो टकसारा । चौथे बोधे लछन कुमार ॥
पचवें चलि रावण लगि गयऊ । तहाँ भेंट मन्दोदरिसे भयऊ ॥
गर्वी रावण शब्द न माना । मन्दोदरी शब्द पहचाना ॥
छठै चलि वसिष्ठ लगि आये । ब्रह्म निरूपन उर्नहि सुनाये ॥
सतये जंगलमें कियो वासा । जहाँ मिले ऋषी दुर्वासा ॥
सात हंस सातौ गुरु कीन्हा । परमतत्त्व उन्ही भल चीन्हा ॥
सातौ गुरु त्रेतामें भयऊ । देह उपदेश सो हंस पठयऊ ॥
द्रापरयुग वर्णन
त्रेता गत द्रापर युग आया । सत्रह जीव परवाना पाया ॥
प्रथमें रायचन्द विजय कहँ गयऊ । ताकी रानी इन्दुमति रहेऊ ॥
कलियुगका वर्णन
(१३२)
सर्वज्ञसागर
दुसरे राय युधिष्ठिर कहैं आये । द्रौपदी सहित परवाना पाये ॥
तिसरे पाराशर पहाँ आये । निर्णय ज्ञान ताहि समझाये ॥
चौथे राय धुधुल लहि भेदा । बहुत ज्ञानको कीन्ह निखेदा ॥
पचये पारसदास समझावा । स्त्री सहित परवाना पावा ॥
छठये गरुडबोध हम कीन्हा । विहँग शब्द गरुडको दीन्हा ॥
सातें हरिदास सुपच समझावा । नीमषार महाँ उसको पावा ॥
अठयें शुक्रदेव पहाँ ज्ञान पसारा । सकल सरब भेद निरवारा ॥
नवमें राजा विदुर समझाया । भक्तिरूप उन दर्शन पाया ॥
दशमें राजा भोज बुझाया । सत्य शब्द पुनि उसे चिह्नाया ॥
ग्यारहें राजा मुचकुन्दहि तारे । बारहें राजा चन्द्रहास उबारे ॥
तेरहे चलि वृन्दावन आये । चारि ग्वाल गोपी समझाये ॥
गुरु रूप पुनि पन्थ चलाये । भौसे हंसा आनि छुडाये ॥
बावन लाख जो जीव उवारा । कलियुग चौथे यहाँ पर धारा ॥
कलियुग वर्णन
प्रथमें गोरखदत्त समझाये । तारक भेद हम तुमहिं बताये ॥
दुसरे शाह बलखको बोधा । षट् आरबी बहुविधि सोधा ॥
तिसरे रामानन्द पहाँ आये । गुप्त भेद हम उन्हें सुनाये ॥
चौथे पीरकी परचे दीन्हा । पचये शरण सिकन्दर लीन्हा ॥
छठे वीरसिंह राजा भयऊ । ताको हम शब्द सुनयऊ ॥
सतयें कनकसिंध समझाये । सोलह रानी लोक पठाये ॥
अठहँ राव भूपाले आये । ग्यारह रानी लोक पठाये ॥
नौमें रतना बनिन समझाई । जाति अग्रवालिन करत मिठाई ॥
दशहँ अलिदास धोबी गयऊ । सात जीव परवाना पयऊ ॥
ग्यारहें राजा भोज समझायी । तिन बहु भक्ति करी चितलायी ॥
बारहें सुहम्मदसोकहचोकुराना । हद हुकुम जीव कर माना ॥
धर्मदासजीका भयमान होना
सर्वज्ञसागर
(१३३)
तेरहैं नानकसे कह्यो उपदेशा । गुप्त भेदका कहा संदेशा ॥
चौदहैं साहु दमोदर समझावा । करामात दै जीव मुक्तावा ॥
चौदह हंस कलियुगमें कीन्हा । गुरु स्वरूप परवाना दीन्हा ॥
पांचलाख हम पहिले तारे । पीछे धर्मनि तुम पगुधारे ॥
वंशन थाप्यों कियो कडिहारा । लाख ब्यालिस जीव उबारा ॥
साखी- तुम जानो हमही मिलै, फिर पूछो मोहि ॥
नाम भरोसे पहुँचि हैं, ज्ञान करे का होहि ॥
धर्मदास बचन-चौपाई
धर्मदास जिव संशय मानी । जब बोले सतगुरु अस वानी ॥
दोह करजोरि चरण चित धरई । फिर फिर गुरुसों विनतीकरई ॥
बड़ी भूल हमरे जिय आयी । समरस करिके ज्ञान फैलायी ॥
मेटचो धोखा साहिब मोरा । दयासिन्धु जिव बन्दी छोरा ॥
धर्मदास जिय भये मलीना । जैसेकमलजिव सम्पुटदीन्हा ॥
अजान जीव हम तुम्हैं न चीन्हा । भाग बड़े मोहि दर्शन दीन्हा ॥
जो कुछ कहब सोई हम मानब । वचन तुम्हार हृदयमें आनब ॥
साखी-धर्मदास जिव डरपे, गुरुकी मानी त्रास ॥
अब नहिं पूछौं ज्ञान मैं, मोहिं दरशकी आस ॥
सतगुरुबचन-चौपाई
सुनु धर्मदास कहौं मैं तोसो । जो कछु भेद पूछिहौ मोसो ॥
प्रथमहिं समरथ आप अकेला । उनके संग दोसर नहिं चेला ॥
तब निश्चल शब्द उच्चारण भयऊ । तेहि शब्द एक कमल निर्मयऊ ॥
तेहि कमलमें आसन दियऊ । तहाँ शब्द एक कमल निर्मयऊ ॥
तेहि कायाको रूप अपारा । असंख पाखरीको विस्तारा ॥
(१३४)
सर्वज्ञसागर
तहाँ बैठि सब रचना कीन्ह। सोई शब्द अधार जो लीन्ह। ॥
सुख हिरदय ते कीन्ह प्रकाशा। तहाँ रूप अति भयी उजासा ॥
काया ते काया निरमाये। सुख कमल हो बाहर आये ॥
रूप सुरतिका रूप अपारा। भुंगि शब्द पारस अनुसारा ॥
भुंगिशब्द पुनि पारस दीन्ह। निःकलंकपुरुषप्रकटकरलीन्ह। ॥
रूप सुरति ते निकलंकी भयऊ। तिनको आज्ञा उत्पति दियऊ ॥
निकलंक विनती तब कीन्ह। कौन सन्धि साहब मोहि दीन्ह। ॥
कहौ भेद जेहि उत्पन होई। सोई शब्द गुरु भाषो सोई ॥
तब समरथ अस वचन उचारा। निष्कलंक सुन मता हमारा ॥
शब्द हमार दृढ हिरदय धरहू। निज सुमिरण तुम हमरा करहू ॥
जो चित सुरति तुम्हारे होई। तौन वस्तु सिसै सब कोई ॥
साखी-जो कुछ रचना चाहो करन, सुरति करत सो होई ॥
रचहु लोक तुम वेगि पुनि, दीन्ह वचन मैं सोई ॥
चौपाई
सुरति करत सबही बनि आई। इच्छा करत सन्धि होय भाई ॥
निश्चल लोक हमारो बासा। अविगति कमल कीन्ह प्रकासा ॥
साखी-जीव सृष्टि रचना करो, सकल जीव उत्पान ॥
शब्द भरोसे तुम रहो, लेउ वचन सिर मान ॥
चौपाई
तुम धर्मदास सुनो चित लाई। तब निष्कलंक सृष्टि निरमायी ॥
निःकलंक सुरति स्वास ठहरायी। सहज सुरतिको टेक बनायी ॥
दहिने अंक सो शब्द निर्मायी। सहज शब्द सुरति अंकुर उपायी ॥
सात करी विस्तार बनायी। यहि विधि रचना निरमायी ॥
सर्वज्ञसागर
( १३५ )
सात करी अंकुर ते भयऊ । भिन्न भिन्न प्रसंग सो लयऊ ॥
सीप सरूपी करी जो कीन्हा । स्वास स्वरूपी इच्छा दीन्हा ॥
सात इच्छा सात करिनमें भयऊ । स्वाति सरूप बून्दतेहि दयऊ ॥
सातो करि भयी प्रकासा । नहिं तब धरती नहीं अकाशा ॥
अर्द्ध अंकुर रहा ठहरायी । तब मुख शब्द स्थिर कहैं आयी ॥
सोरह अंस जो जन विस्तारा । इतनी दृष्टि अंकुरज पसारा ॥
तेहिमें सास करी उपजायी । ताकर मर्म काहु नहिं पायी ॥
तेहि करिन ते अण्डा भयऊ । द्योयकरी विन अण्डा रहेऊ ॥
नहिं तब धरती नहीं अकाशा । अधरहिं अघर अण्ड प्रकासा ॥
मध्य में अण्ड करे चौ चण्डा । एक अण्ड उपज्यो प्रचण्डा ॥
भिन्न भिन्न गति न्यारी कीन्हा । शिवशक्ति अण्डमहँ धरि दीन्हा ॥
नौसे निमिष अन्तर होय छूटा । तबहीं अण्ड उठचो पुनि फूटा ॥
प्रथमहिं तेज अण्ड विगस्यो भाई । तामें पांच तत्त्व निर्माई ॥
बाहर पालँग तेज अण्ड विस्तारा । तामें पांच तत्त्व भौ सारा ॥
तत्त्व स्नेह अण्ड सो कीन्हा । अस्थिर शब्द काल भल दीन्हा ॥
तबहीं श्रवण साजी वानी । तेहिंते मूल सुरति उत्पानी ॥
अबोलपरस सुरति कहि दीन्हा । सात संधि प्रकट कर लीन्हा ॥
सात सन्धि तब गुप्तहिं पेखा । पीछे सोहँ शब्द विवेखा ॥
सोहँ शब्द सत्य अनुसारा । सोहँ सुरति अजावन पसारा ॥
जावन ते पुरुष अचित निर्मायी । तेहि पुरुष अपने निकट बुलायी ॥
तेहि सो पुरुष ऐसी कही । सकल सृष्टि रचो तुम सही ॥
पुरुषको विनय कीन्ह करजोरी । हो सतगुरु विनती यक मोरी ॥
केहि विधि रचौं सो देहु बतायी । तीन भेद गुरु देउ पढायी ॥
नीकलंकी पुरुष वाच उच्चार । शब्द प्रतापकर अगम विचारा ॥
शब्द प्रताप लेओ शिर नायी । सुमिरण करौ हमहिं लौलाई ॥
सात सन्धि विषयक प्रश्न
( १३६ )
सर्वज्ञसागर
पांच अण्ड हम पहिले कीन्हा । तेहिमें सर्व तत्त्व गुण दीन्हा ॥
जो कछु इच्छा करौ दिलमाहीं । सो सब कछु पैहौ तहाँहीं ॥
शब्द प्रताप अर्चित जब लीन्हा । सकल सृष्टिसो उत्पन्न कीन्हा ॥
साखी-पुरुष अण्ड लैगये, देखा सकल पसार ॥
सद्गुरु रहे निहार तब, समरथ वचन अधार ॥
धर्मदासवचन-चौपाई
धर्मदास चरण गहे धाये । हे सतगुरु तुम अगम बताये ॥
पुरुष अर्चितके सृष्टि फरमायी । तात सन्धि कहैं राखे छिपाई ॥
कौन लोक कहैं लीन्हे वासा । सोई भेद गहौ परकासा ॥
सतगुरु वचन
जब अर्चितको सृष्टि फरमायी । तेहि पाछे यक सुरति उठायी ॥
सोरह असंख अंकुर पसारा । तेहि में पांच अण्ड विस्तारा ॥
मिहरसुरति अजर लोक बनायी । तेहि महाँसातौ सन्धि छिपायी ॥
सातौ सन्धि उहाँ लै राखा । समरथ भेद गोइ कछु भाखा ॥
सातौ सन्धि सो गुप्त छिपावा । ताकोअन्त काहु नहि पावा ॥
मिहर लोक सन्धिन कहैं दीन्हा । आपन वास निरन्तर लीन्हा ॥
निरंतर गुप्त ठिका निर्मायी । तामे सतगुरु रहे छिपायी ॥
साखी-गुप्त भेद किया इतनौ, काहु न पायो पार ॥
पुरुष अर्चितकी सृष्टिको, धर्मनि सुनो विचार ॥
चौपाई
पुरुष जब घटमें कीन्ह विचारा । प्रेम सुरति तबहीं उचारा ॥
प्रेम अनन्द उपज्यो रे भाई । तेहिते प्रेम सुरति उपजाई ॥
प्रेम सुरति भै रूप अपारा । प्रेमानन्द घट शब्द उचारा ॥
नेत्र हेर बुन्द सो ढारी । सोइ सुरति दिल माँहिनिहारी ॥
सर्वज्ञसागर
(१३७)
सुरति बुन्द तब तासों लीन्हा । सोई बुन्द अथर महँ दीन्हा ॥
ताहि बुन्दके अक्षर भयऊ । स्वर स्वासा हो बाहर गयऊ ॥
पुरुष अचिन्त आज्ञा सब दीन्हा । तेज अण्ड जो बैठक लीन्हा ॥
बारह पालंग अण्ड है सोई । तेहि में सृष्टि तुम्हारी होई ॥
अच्छर आनन्द ताहि समाया । तामें परकृति सुरति उपजाया ॥
प्रकृति तें चारि अंश निर्मायी । देखि अंश आनन्द समायी ॥
तेहि अनन्द सो निद्रा आयी । सत्तर निमिष जब गयो सिरायी ॥
चारों जने समाधि लगायी । ताको मरम कहौ समझायी ॥
तब सतगुरु एक अवगति कीन्हा । जल तत्त्व ते अण्ड तब दीन्हा ॥
जब अण्डा जलमें उतराना । तब अन्तर निद्रा विलगाना ॥
अक्षर मनमें कीन्ह विचारा । विकल भये तबहीं पगु धारा ॥
चले चले अण्डा लगि आवा । देखत अण्ड कोष उपजावा ॥
सोई कोष अण्डमें आवा । तेज शक्ति ताकर प्रभावा ॥
तेहि कारण मो फूटचो भाई । तेहिते निरंजन उपजाई ॥
कालरूप सो प्रकट प्रचण्डा । महा भयानक रूप अखण्डा ॥
अक्षर मनमें शंका आई । तब चारों सुतन कहँ लीन्ह बुलाई ॥
उनको बहुत भांति समुझाई । पृथ्वी बीज धरौ तुम जाई ॥
जग उत्पति तापै होय भाई । कूर्म शेष पृथ्वी थाह्यो जाई ॥
जाते पृथ्वी डगे नहिं भाई । साइ उपाय करौ तुम जाई ॥
धर्मराय तुम लेखा लेहू । सकल सृष्टि को लेखा देहू ॥
चारों अंश को सिखाप दीन्हा । आप वास मुक्ति दीपमें लीन्हा ॥
साखी—यह रचना अचिन्तक, अक्षर को विस्तार ॥
निरंजन बैठे शुभ शिखर, मान सरोवर द्वार ॥
चौपाई
पुरुष अचिन्त अस चित्त विचारा । सन्धि सुरति घट में उबारा ॥
सात सन्धिका वर्णन
(१३८)
सबन्धसागर
तेहिंते चौदह मुनि उपजाये । जल अण्डते अंश बनावे ॥
चौदह मुनि चौदह दीप बैठारा । पांजी पताल उनको विस्तारा ॥
संधि छाप सौंप सब दीन्हा । अच्छर लोकमें चौका कीन्हा ॥
यहि पुरुष चौदह अंश बनावा । यहि अक्षरमें मोह समावा ॥
तब अक्षरको संशय आई । तेहि ते स्वासा छोड़े भाई ॥
स्वासा संगम उठी तब बानी । माया सुरति तब भयी उत्पानी ॥
माया सुरति अच्छर उपजायी । अष्टंगी सो कैसो शक्ती आयी ॥
अच्छर अष्टंगी सो कहई । जाब जहाँ निरंजन रहई ॥
अष्टंगी तब कहे समझाई । हम कैसे निरंजन पहुँ जाई ॥
तब अक्षर अस कहे भेऊ । निरंजने जाइ सिखापन देहू ॥
कन्या चलि निरंजन लगी आयी । आदि निरंजन मिले तब धायी ॥
देखि कला तब गये भुलाई । हे कन्या तोहिं को निर्माई ॥
काम ज्योति प्रकटी प्रचण्डा । तब चित विकल भयो नरमण्डा ॥
सकल रूप गयउ भुलाई । कामकि लहरि दोउको आई ॥
तब संयोग भयो त्रय बारा । जेठे ब्रह्मा लघु विष्णु कुमार ॥
तीजे शम्भू सबसे छोटा । ये निज भये ताहिंके ढोटा ॥
साखी-जैसे रूप निरंजन, तैसे तीनों बार ॥
प्रलय काल पैदा भये, प्रलय करत संसार ॥
धर्मदासवचन-चोपाई
धर्मदास जिव भये अनन्दा । मैं पाया पूर्ण गुरु चन्दा ॥
धन्य भाग मोहि मिलै गुसाई । आपन करि मोहि लियो सुत्ताई ॥
और एक पूछनकी आशा । चौरासी लक्ष कैसे प्रकाशा ॥
तीन प्रकार सृष्टि किन पाऊ । चौथेका मोहि भेद बताऊ ॥
साखी-धर्मदास सुख पायो, घट मो भयो अनन्द ॥
संशय मिटे प्रफुल्लित भये, ज्यों पूनोको चन्द ॥
चौरासी लक्षका प्राकट्य
सर्वज्ञसागर
( १३९ )
सतगुरु वचन—चौपाई
सुनु धर्मनि मैं कहूँ समझायी । लक्ष चौरासी योनि बनायी ॥
माया चरित्र अब तोहिँ सुनाओ । एक एक कै सब भेद बताओ ॥
चारि कला स्वरूप धरि चारी । एक एक गति कहौँ विचारी ॥
एक स्वरूप सुरति लगि रही । तीन स्वरूप भिन्न घर सही ॥
एक कला गायत्री भयञ्ज । जब पिताखोजको ब्रह्म गयञ्ज ॥
सो गायत्री ब्रह्माको दीन्हा । दूसरी कला लक्ष्मी कीन्हा ॥
मध्यो समुद्र रतन कटि आया । लक्ष्मी तबही विष्णुने पाया ॥
तिसरी कला पार्वती कीन्हा । सोइ कला शम्भु कहँ दीन्हा ॥
यह चरित्र मायाको भाई । जाकी गति मति लखी न जाई ॥
तीन शक्तिको खेल अपारा । इनही रचयो सकल संसारा ॥
सारखी-माया परबल सबनमें, जो चाहे सो होय ॥
लख चौरासी इन रची, मरम न जाने कोय ॥
माया सृष्टि माया रची, जीव अनेक बनाइ ॥
उनते सब कहु होत है, कहै कबीर समझाइ ॥
इति श्रीसर्वज्ञसागरे सृष्टिखण्डवर्णनोनाम प्रथमस्तरंगः ।
अथ द्वितीयस्तरंगः
ज्ञानखण्ड वर्णन
धर्मदास वचन—चौपाई
धरमदास पूछे चितलायी । उत्पति भेद सकल हम पायी ॥
अब जिव कारज कहौ विचारा । जेहि करनीसो हंस उबारा ॥
सो विधि ज्ञान कहो समझायी । जाहि ज्ञान से लोकहि पायी ॥
जीव उबारन ज्ञान सुनाओ । हे सादेब ! मोहि नाहि दुराओ ॥
(१४०)
सवज्ञसागर
साखी-सत्यसार बतावहु जाते कारज होय ॥
चौदह कोटि ज्ञान जो, सो हम देखि विलोय ॥
सतगुरुवचन-चौपाई
सुनु सुकृत मोर प्राण अधारा । तुमसे कहौँ अब सकल पसारा ॥
ऋग्वेद भेद मूलको पाया । चारि सुखको मर्म लखाया ॥
प्रथमहिं चारि वेद है सारा । चारि धाम पर मुक्ति पसारा ॥
सेवक शब्द सुमिरन चित लावे । सब सुख पृथ्वी पर भुक्तावे ॥
कोइ सिद्ध कोइ पण्डित होई । कोइ रूप पावै पुनि सोई ॥
जौँ लगि दान पुण्यकी आशा । तब लगि है वैकुण्ठ निवासा ॥
कोइ विद्या कोइ वेदको पावै । फिरिकै देह संसार धरावै ॥
अब सुनु साम वेद विचारा । विष्णु ध्यान वैकुण्ठ सिधारा ॥
साखी-बीते पुण्य भोग सो कीन्हे, आइ धरे जग देह ॥
जब लग दान पुण्य का आशा, तब लग सुरपुर नेह ॥
चौपाई
तिखरी मुक्तिको सुनो विचारा । सब मुनि योगी शून्य सिधारा ॥
सायुज्य मुक्ति चौथी है भाई । अक्षर ध्यान मानिकपुर जाई ॥
पचई जीवन मुक्ति है भाई । जहाँ देह धरे विन रहै समाई ॥
कहि निज उत्तम पुरुष बतावा । परम धाम सब संतन गावा ॥
पुरुष भक्ति जाके घट आई । एक ब्रह्म राखे ठहराई ॥
परम धाम सोइ पहुँचे जायी । जिन परमात्मा चीन्हो भाई ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास पूछे कर जोरी । एक भेद प्रभु कहौँ बहोरी ॥
सर्वज्ञसागर
(१४१)
काहे पर वह कहिये भामा । जहां जीव पावे विश्रामा ॥
करनी लोक मुक्तिको भेदा । तुमसे कहौ मैं सुन्यो निखेदा ॥
सो सब भेद अहौ मोहि साई । संशय सब विधि देहु मिटाई ॥
साखी-काहे पर सुमेरु है, काहेपर कैलास ॥
काहे ऊपर शून्य है, कहैं अक्षरको वास ॥
सतगुरु बचन-चौपाई
सुनुधर्मदासतोहिकहौंविचारा । यह भेद अगमगति भारा ॥
सोरह नाल पुरुष निरमायी । लोकनको थम्भन नाल रहायी॥
कदली नाल लोकते आई । सात शाख भइ ताकी भाई ॥
सुवरण रंग नाल है सोई । एकहि वर्ण नाल सब होई ॥
प्रथमहि गुप्त नाल है भाई । तहां परवत पुनि नाम धराई ॥
तापर परम धाम बनाया । तेहि में पुरुष तत्त्व रहाया ॥
दुसरी मंजुम नाल जो आवा । मानिक पर्वत नाम धरावा ॥
तेहि पर मानिक दीप बसाया । अक्षर पुरुष दीप सो पावा ॥
तिसरी सुरंग नाल है भाई । तापर झझरी दोष रहाई ॥
तहैंवा रहै निरंजन राई । तीन देव तिनही निर्माई ॥
चौथी नाल क्रांति रह सोई । ता ऊपर वैकुण्ठ जो होई ॥
पंच शिखर सुमेरु सँवारी । एकपै इन्द्र एक कुबेर भंडारी॥
यकपै ध्रुव एक पैयम विस्तारी । मध्यमें विष्णु सकल व्रतधारा॥
पांच ये नाल जो रचि राखा । ताकर नाम कैलास असभाखा॥
तहवों शंकरको है बासा । याग समाधिकी लावे आसा ॥
छठयें नाल उमंग ठहरायी । अघाचलही नाम सो पायी ॥
सतय त्रिकुटी ब्रह्म अस्थाना । तरंग नाल पारस है ठाना ॥
कलकी नालकी सातों साखा । सातों दस यहां लों राखा ॥
(१४२)
सर्वज्ञसागर
यही बनाव धरती में होई । अधर वस्तुको जाने सोई ॥
अधरही चौका चारि प्रकासा । चन्द्र सूरजको तहां निवासा ॥
प्रथम अधर अंकुरहि निशानी । पांच अण्ड कीन्हे उत्पानी ॥
दूसर अधर निकलंकी जाना । तिसरे रूप सुरति परवाना ॥
चौथे अविगति नाम धराया । पांचे सरवल्ली पुरुष कहाया ॥
चारी अंश अधर विस्तारा । धर अधर दोनोंसे न्यारा ॥
साखी-पांच तत्त्व तब ना हते, हते न हाट रु बाट ॥
लोक द्वीप तब ना हते, ना हते औघट घाट ॥
चौपाई
सुनो धर्मदास कहौ मैं तोही । जो कछु भेद पुछिहौ मोही ॥
सब अंशनके लोक बतावा । अंश वंश सब तोहि लखावा ॥
करनी करै सो लोकहि जायी । विनु करनी फिरिफिरि पछितायी ॥
साखी-सर्वज्ञसागर खोजहि, सब ग्रन्थनको सार ॥
कहैं कबीर निज मूलको, सत्य शब्द आधार ॥
इति श्रीसर्वज्ञसागरे ज्ञानखण्डवर्णनो नाम द्वितीयस्तरंगः ।
समाप्तोयं ग्रन्थः
उपसंहार-चौपाई
जेहि मानुष बुद्धि सब विधि आवै । अपनो कारज सोइ बनावै ॥
कपट कुटिलता काल नशायी । सत्य विचार रहै लौलाई ॥
जवनी भांति जिव कारज होई । लाज मिटाय करै दृढ सोई ॥
लोककाज कुलकानके मारे । भँवरि भँवरि भव रहैं विचारे ॥
जेहि यम फन्द छूटे सो करना । नाहकमें काहे पचि २ मरना ॥
सर्वज्ञसागर
( १४३ )
भली भांति सो लेहु विचारी । सकल अंचारज मतहिं सुधारी ॥
खरा खोट जो परखा नाही । अन्धा धोखे मूल नशाही ॥
प्रथम विचारहु औषध रोगा । केहिविधि शब्द हरे सब सोगा ॥
देखो शब्द प्रकाश विचारी । जाते सकल होय उजियारी ॥
गुरु एक सो कौन कहावे । जासो आवागमन नशावे ॥
सेवा अनेक करिय केहि केरा । विन जाने सब धुन्ध अन्धेरा ॥
गुरु मत मनमत करे विचारा । सो जिव निज करे निरुआरा ॥
सारखी-विन देखे नहिं देशकी, बातें कहै सो क्रूर ॥
आपै खारी खात है, बेचत फिरे कपूर ॥
चौपाई
औषध पांच राह सब करई । औषध विना न कोई सहई ॥
शब्द स्पर्श रूप रस गन्धा । द्वारा पंच औषधिकी सन्धा ॥
सबहीं द्वार बूझ रहायी । बिन बूझे नहिं कोइ ठहरायी ॥
कोइ झीना कोइ मोटा द्वारा । तैसहिं तासु भिन्न व्यवहारा ॥
झीना शब्द है पवन स्वरूपा । तासो मोटा अनलको रूपा ॥
अनलहु ते जल मोटा होई । जलते मोटी पृथ्वी है सोई ॥
पुनि प्रकाश एकते एका । थिर होइ देखे करे विवेका ॥
पृथ्वी मोटी आँख प्रकाशी । तासे मध्यम दृष्टि प्रवेशी ॥
दृष्टीसे जल झीना होई । भीतर जो है दीसे सोई ॥
जलसो झीन तेज प्रकाशा । जामे परशे धरति अकाशा ॥
रूपसो अधिक शब्द उजियारा । दृष्टिमें आवे सब संसारा ॥
भूत भविष्य जो हो वर्तमाना । शब्द भीतरे सबै समाना ॥
बूझ शब्द में पेठे जायी । शब्दके भीतर अनल रहायी ॥
अनल मध्य होयके जल देखा । जलके भीतर पृथ्वी पेखा ॥
१ आचार्य, धर्मप्रवर्तक ।
( १४४ )
सर्वज्ञसागर
साखी-रैन समानी भानुमें, भानु अकाशे माहिं ॥
अकाश समाना शब्दमें, शब्द रहा कछु नाहिं ॥
चौपाई
पांचो औषध करै विचारा । मोटा झीना जो व्यवहारा ॥
औषध अन्न जल पेट समाही । जाते क्षुधा औ प्यास नसाही ॥
बहुत प्रकार लादके रोगू । सो सब जाय भोजन संयोगू ॥
गन्ध कपाले पहुँचे जायी । गुण औगुण सब अंग समायी ॥
लेपै गुण सब ले पहुँचावै । गुण औगुण सबमाहिं समावै ॥
आंखिकी राह रूप गहि लेई । शीत उष्ण सब अंगमें देई ॥
शब्द औषधी कानके द्वारा । बूझ समय करे निरुआरा ॥
हर्ष विषाद यंत्र औ मन्त्रा । व्यापै सबै कोइ कोइ स्वतन्त्रा ॥
मर्म सबै द्वाराको बूझे । विना शब्द निर्णय नहिं सूझे ॥
स्पर्श रूप इत्यादिक चारी । सो सब मोट स्थूल अधिकारी ॥
पुनि अस्थूल सो थिर न रहारी । तैसहिं औषध ताहि समायी ॥
अंग अंगको देश है जैसा । अल्पे गहिये औषध जैसा ॥
शब्द अति झीना बूझविचारा । जाते होय सकल निरुआरा ॥
शब्द विना कोइ पार न पावै । विन गुरु कौन जो दाव लखावै ॥
सर्व देश सर्वज्ञ है सोई । तेहि विनु कारज सघे न काई ॥
साखी-शब्द विना श्रुति आंधरी, कहो कहाँको जाय ॥
द्वार न पावे शब्दका, फिरि फिरि भटका खाय ॥
गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ॥
गुरु सदा सो वंदिये, शब्द बनावे दाव ॥
फेर परा नहिं अंगमें, नहिं इंद्रिनकी माहिं ॥
फेरा परा कछु बूझमें, सो निरबारचो नाहिं ॥