कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
१४७
जीवधर्मबोध
( २०५५ )
चील्ह गीध गहि गगन उड़ाही । तेहि मानुषको धरि धरि खाही॥ तब सो नर गण जोरि सहाई । पंछिके संग करे लड़ाई ॥ ऐसे विविधि भांति नरजाती । तिनकी कथा न कथे सिराती ॥ नानारूप बरण गुणधारी । जहाँ तहाँ पृथ्वी माह विहारी ॥ चार लक्ष मानुषकी जाती । तिनकी कथा कथे बहु भांती ॥ जलमानुष थलमानुष देखो । वनमानुष आदिक बहु लेखो ॥ पशुमानुष कहु मिश्रित होई । अकथकथा कहि जात न कोई ॥ बहुरि कहो मानुष पशु ख्याला । सब परिवार जो करे उगाला ॥ भोजन पीछे पागुर करही । बिन उगाल तिनको दुःखधरही ॥ पशु नर नरपशु एक सो हेरी । देखहु कुदरत करता केरी ॥ छायारूपी नर कहु सरसै । चेष्टा दीख रूप नहिं दुरसै ॥ रचना विविधि भांति कहि गार्ई । ताको लेख लिखो नहिं गार्ई ॥ चौथो सूत्र बहुरि कहि गावो । जलचर मानुष मेल मिलावो ॥ रह समुद्रमें गर्गन मच्छी । अर्थ है मीन अर्थ तिय अच्छी ॥ कटिके ऊपर सुन्दर नारी । अर्थहेट मच्छी तनधारी ॥ कबहुके सागर तीर सुरखारी । कबहुके जलमें गोता मारी ॥ भुंगी ऋषि शिर सींग बताई । मुखमें सुण्ड गणेश गोसाई ॥ पंचम पौरी करो बखाना । पशुपंछीको मेल मिलाना ॥ चाम सुन्दरी वाको कहई । दोनों रंग ढंग गुण गहई ॥ सो नहिं खग अंडजकी जाती । चाम गूदरी है बहु भांती ॥ नहिं पशु नहिं खग मध्यम थापू । सुरगी एकसै परसे टापू ॥ वृद्ध नारि सो सुख है जाको । जब कोइ दुःख देत है वाको ॥ रुदन विलाप करे जस नारी । केते पशु खग नरगुण धारी ॥ दाडुर एक अमेरिका देश ! रुदन करे जब लहे कलेशा ॥ छठी पौरी बरणो सोई । जो चेतन रूप जड़ होई ॥
( २०५६ )
बोधसागर
१४८
लजवंयक पौधा चेतन । पशु पंछी सम चेत तासु तन ॥ जड़ चेतन गुण दोहू गहावै । पशु पौधाको मेल मिलावै ॥ सतई पौरीको अर्थावो । जो चेतन जड़ सम स्थिलावो ॥ पलपी तारा दोनों मछरी । सो सम चेतनते अति पछरी ॥ जड़ समान यक ठौर गहाई । हले न चले गहे थिरताई ॥ पलपी देह दाग बहुताई । जो कोइ ताको काटै जाई ॥ जैसे माली कलम लगावै । फूल बेलको काटि बनावै ॥ जेतनो टूक करें कोइ ताको । होहि पालपी सबही वाको ॥ जेतनी दाग रहे तब माही । सो सबही पलपी है जाही ॥ जड़ चेतन दोऊ ता ढंगा । जड़समान चेतनको अंगा ॥ अष्टम पौरी कहो बखानी । जड़मय योनि गोदजिव जानी ॥ नर नारकी लोक जिव पौरी । जड़सम सदा रहै एक ठौरी ॥ नर्कहेत नारकसो नाही । जैन मते दुख देखो नाही ॥ तीन लोकको सत जो भाषा । काया तरुकी पह सब साषा ॥ जैसो कर्म जीव जो कर्ता । तैसो तनधरि जगमें वर्ता ॥ सब जिव पुण्य पापकी आसा । पुनि पुनि कर योगिनमें वासा ॥ इति जीवधर्मबोध समाप्त
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The emblem is centered on a red background. It consists of a golden teardrop-shaped frame containing the Devanagari word 'प्रेमी' (Premi). Below this frame is a golden ribbon or banner with the text 'खेमराज श्रीकृष्णदास' (Khemraj Shri Kunnadas) written in Devanagari script. The entire emblem is surrounded by a wide, ornate golden border with a repeating pattern of stylized floral and geometric motifs.
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई.