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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

( ९४६ )

गूढार्थचिन्तामणिकोष ।

कर्मसंचितप्रारब्धक्रियमाण
श्रोतामुक्तमुमुक्षुविषयी
मनुष्यज्ञानीविषयीपामर
अवस्था (शरीर)बालयुवाबूढ़
लिंगस्त्रीपुरुषनपुंसक
सम्बन्धसंयोगसमवायतादात्म्य
त्रिपुटीज्ञाताज्ञानज्ञेय-
ध्याताध्यानध्येय
द्रष्टादर्शनदृश्य
कर्ताक्रियाकर्म
नादविदकला
अध्यात्मअधिभूतअधिदैव
ज्ञानप्रतिबन्धकगंशयअसंभावनाविपरीतभावना
ज्ञानसाधकज्ञानवैरागउपशम
हेतुस्वरूपफल
अस्तिभांतीप्रिय
कारणवादआरंभपरिणामविवर्त
सृष्टिपारमार्थिकव्यावहारिकप्रातिभासिक
आनन्दब्रह्मानन्दविषयानन्दवासनानन्द
आत्माज्ञानात्मामहानात्माशांतात्मा
भेद आत्माकामिथ्यात्मागौणआत्मामुख्यआत्मा
अन्तःकरण दोष ,मलविश्लेषआवरण
वेधतिलकमालालंगोट

॥ चतुरविधि ॥

१ देदताब्रह्माविष्णुरुद्रओंकार
२ अवस्थाजाग्रतस्वप्नसुषुप्तितुरीया
शरीरनासूतमलकृतजवरुतलाहूत
अभिमानी (व्याप्ति)स्थूलसूक्ष्मकारणमहाकारण
” (समष्टि)विश्वतैजसप्राज्ञप्रत्यक्ष
आकाशविराट्हिरण्यगर्भईश्वरब्रह्म
चैतन्यअवस्थाघटाकाशजलाकाश,मेषाकाशमहाकाश
वेदकूटस्थजीवईश्वरब्रह्म
किताबश्रुद्वेदयजुर्वेदसामवेदअथर्ववेद
अपवेदजंबूरतौरितवायबुलकुरान
अनुबन्धआयुर्वेदधनुर्वेदगांधर्वस्थापत्य
साधनअधिकारीविषयप्रयोजनसंबन्ध
विवेकवैरागषटसंपत्तिमुमुक्षता

गूढार्थचिन्तामणिकोष ।

(१४७)

प्रथम बिबेक विराम पुनि, अस्मादि षट् सम्पत्ति ।

कही चतुर्षु मनुष्यता, ये सब साधनसत्ति ॥ १२ ॥

साधन (अंतरंग)श्रवणमनननिदिध्यासनसाक्षात्कार
भक्तआर्तविज्ञासुअर्थावोंज्ञानी
पुरुषार्थअर्थधर्मकाममोक्ष
आश्रमब्रह्मचर्यगाहृत्स्यवानप्रस्थसंन्यास
वर्णब्राह्मणक्षत्रीवैश्यशूद्र
शेषसंन्यासमुगलपठान
मोक्षद्वारपालशमसंतोषविचारसत्संग

मोक्ष द्वारपालकचतुर, शम संतोष विचार ।

चौथो सत्संगति घरम, महापूज्य निर्धार ॥

संन्यासकुटिचरवहृदकहंसपरमहंस
भूमिकाक्षिप्राअनागतसूलिश्रुतासुलीनता
अन्तःकरणमनबुद्धिचित्तअहंकार
खानिजरायुजअण्डजउद्भिज्जस्वेदज
चित्तनिरोध-अध्यात्म-साधूसंग,वासनात्याग,प्राणायाम,
उपाय.विद्या.
स्पर्शशीतउष्णकोमलकठिन
युगसतयुगत्रेताद्वापरकलियुग
गरीर अवस्थाबालकिशोरयुवाबृद्ध
वैनानाटामञ्जोलालम्बा
वाणी भेदपरापश्यन्तोमध्यमावैखरी
शब्द भेदकालसंधिझाड़सार
अर्थशब्दार्थभावार्यव्यंग्यार्थधन्यार्थ
सेना चतुरंगिणीहाथीरथपैदलघोडा
नीति मार्गसामदानदण्डभेद
रिपुकामक्रोधलोभमोह
मुक्तिसालोकसामीप्यसारुप्यसायुज्य
मनुष्य लक्षणदयाशीलविचारशीर्य
सनकादिकसनकसनन्दनसन्तकुमारसनातन
यार ४अबुबक्उमरउसामनअली
मार्ग (हिन्दूधर्म)कर्मउपाशनायोगज्ञान
मार्ग (मुसलमानी)शरीयततरीकतमारफतहकीकत
आधार चक्र अक्षर
स्त्री भेदपश्चिनीचित्रनीशंखनीहस्तिनी
पुरुष भेदशशाभुगाघोडाखर
उत्तममध्यमलघुनिकुट्ट

(९४८)

गूढार्थोचिततामणिकोष ।

ज्ञान परीक्षानिरालम्बनिःश्रेमनिर्वासनिकनिर्विकार
विचार परीक्षानिर्माहिनिर्वेधनिहिंसकनिर्वाण
विवेक परीक्षासावधानसर्वगीसारग्राहीसंतोषी
परम संतोष परीक्षाअयाचकअमानीअपक्षीकस्थिर
सहज परीक्षानिष्प्रपंचनिःतरंगनिलिप्तनिष्कर्म
निर्वर परीक्षासुहृदतामुबुदार्ईशीतलताईसुमति
गून्य परीक्षाशोलवंतमुबुद्धिसत्यवादोध्यानसमाधि
सन्ध्याप्रातःमध्याह्निसांज्ञमध्यरात्री
दिशापूर्वपश्चिमउत्तरदक्षिण
विष्णु आयुधपांचचक्रगदापद्म
संमप्रदाश्रीसम्प्रदाशिवसम्प्रदाब्रह्मसम्प्रदासनकादिक
आचार्यरामानुजविष्णुस्वामी,माधवानंद,निम्बाकैस्वामी
पृथ्वीके खण्डएशियाअफरिकायोरपअमेरिका

शंकराचार्य निर्मित मठ १ गोवर्धन मठ पूर्व जगन्नाथपुरीमें ॥ २ शारदा मठ पश्चिम द्वारकामें ॥

३ जोशी मठ उत्तर बद्रिकाश्रममें ॥ शृंगेरी मठ दक्षिण रामेश्वर ४ ॥

विवेकियों के जाननेयोग्य ॥ १ हेय ॥ २ ज्ञेय ३ आप्य ॥ ४ पात्र्य ॥

कबीरसाहबके ४ नाम ॥ सतमुक्त सत्यगुणमें ९ मुनिन्द्र जेतोमें ॥ कृष्णामय द्वारपरमें कबीर कलियुगमें ॥

चारगुरु ४ । १ धर्मदास सा. २ चतुर्भुज ३ वकजी ४ सहतेजी ।

॥ पदार्थ पंचविधि ॥

॥ हंस देहके तत्व आदिक वर्णन ॥

तत्व सांच धीरता, दया, शील, विचार,

ई पांचो हूं तत्व सो, संगी हंसा केर ।

साधु गुरुभत गहन मन, कल्पित सूष्टि हेर ॥

अब प्रकृति पञ्चोसको, कहौ मुनहु परसंग ।

पांच पांचते पांचई, जेहि बिधि बाढो अंग ॥

प्रकृति (साँचकी) निर्णयता, निर्विन्दता, प्रकाशता, थोरता, क्षमता ॥

प्रकृति (दैव्यकी) मिथ्या त्यागन, सत्यग्रहण, निःसंदेहता, हंता नाशन, अवलता ॥

प्रकृति (दयाकी) अद्रोहता, समता, मैत्री, अभयता, अभेदता ॥

प्रकृति (शीलकी) सहनशीलता (तितिक्षा) प्रियवचन बोलना, बुद्धिकी शांतता, परख प्रत्यक्ष प्रकट सुखमें निलेपता, (दुःख सुखमें समबुद्धि रख आनन्दमें रहना,) ॥

प्रकृति विचारकी —अस्ति नास्ति पदका विलगाना, (विवेक) यथार्थ ग्रहण व्यवहार शुद्ध सतो-गुणी बाल रखना, परख या टकसार (सर्वका पारख करना तथा बिना पारख ग्रहण नहीं करना) ॥ वेद

गूढार्थचिन्तामणिकोष ।

(१४९)

कुरान आदिसे लेकर सर्व महात्माओं विद्वानोंकी वाणीका यथाशक्ति अभ्यास करके बोध प्राप्त करना और उसके आशयको समझना ॥

इहि पांचोंको पंचधा, भेद प्रकृति पञ्चौस ।

हँहू हेहूकी तत्त्व प्रकृति, बूझो दिस्वाबीस ॥

अहंकारके पांच मुख—१ प्रथम मुख विषय, कर्म काण्डका प्रकाशक ॥ २ तैजस, योग, काण्डका प्रकाशक ॥ ३ प्राज्ञ उपासना कांडका प्रकाशक ४ प्रत्यक्ष अत्याज्ञान काण्डका प्रकाशक ॥ ५

॥ अद्वैत विज्ञानका प्रकाशक ॥

तन्मात्राशब्द,स्पर्श.स्पर्शःरस,गंध.
तत्त्वआकाश,वायुअग्नि,जल,पृथ्वी.
ज्ञान इन्द्रीश्रवण,त्वचा,नेत्र,जिह्वानासा.
कर्म इन्द्रीवाक्,पाणि (हस्त)पाद पायु,गुदा.उपस्थ.
वायु स्थूलव्यान,समान,उदान,प्राण,अपान.
वायु सूक्ष्मधनञ्जय,किंकरा,कूर्म,नाग,देवदत्त.
वाणी (अवस्था)शून्य,परा,पश्यन्ती,मध्यमा,वैचारी.
आकाशकी प्रकृती १शिराकाशकंठाकाश,हृदयाकाश,उदराकाशकटयाकाश
सूक्ष्मप्रकृति ,, लोभकामक्रोधमोह,भय,
वायुकी ,, फैलना,बलकरना,उठना,चलना,संकोचन.
अग्निकी ,, निद्राप्यास,भूख,क्रांति,अलस्य.
जलकी ,, लार,स्वेद,मूत्र,वीर्य,रक्त.
,,मज्जा,रक्त,मूत्र,मल.
रक्तविद्रूकफ,मेद,मूत्र.
,, पृथ्वीकी-रोम,त्वचा,नाडी,मांस,अस्थि,
,,नाडी,मांस,त्वचा,अस्थि,
शरीर-कैवल्यमहाकारणकारणसूक्ष्मस्थूल,
कोश-अन्नमय,प्राणमय,मनोमयविज्ञानमय,आनन्दमय,
भक्त-आर्त,जिज्ञासूअर्थार्थी,विज्ञान,निर्वासि,
कर्म-नित्य,नैमित्तिक,काम्य,प्रायश्चित्त,निषिद्ध,
क्लेश-अविद्या,अस्मिता,राग,द्वेष,अभिनिवेश,

दृष्टांत ५— (जगतके मिथ्यापने विषय वेदान्तानुसार) ॥ १ शक्तिविषय रजत, २ रज्जुविषय, सर्प ३ स्थाणु विषय पुष्प, ४ गगन विषय नीलता, ५ मरीचिका विषय जल ॥

नियम—शौच, संतोष. तप स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान ॥

प्रलय—नित्य नैमित्तिक, दिनप्रलय, महाप्रलय, आत्यंतिकप्रलय,

भेद ५—जीव ईश्वरका भेद, जीव जीवका भेद, जीव जडका भेद, ईश जडका भेद, जड जडका भेद, भ्रम—भेद भ्रम, कर्तृत्वभ्रम, संग भ्रम, विकार भ्रम, सत्यत्वभ्रम ।

(९५०)

गूढार्थचिन्तामणिकोश ।

अम निवर्तक दृष्टांत—बिम्बप्रतिबिम्ब, लोहित स्फटिक, घटकाश रज्जू सर्प, कनक कुंडल ॥

महायज्ञ—देव,ऋषि,पितर,मनुष्य,भूत,
यम—अहिंसा,सत्य,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह,अस्तेय,
योगभूमिका,क्षेप,विक्षेप,मूढ,एकाग्र,निरोध,
पांच ब्रह्म.सोहृ,ररकार,औकार,अकार,पराशक्ति
पाण्डव पांचयुधिष्ठिरभीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव
कन्याअहल्या.द्रौपदी,तारा,कुंती,मंदोदरी
रामपंचायतन,रामजानकीभरतलक्ष्मण,शत्रुहन
पंच मकार (तंत्रशास्त्रके) मधु,मांस,मत्स्य,मैथुनमुद्रा

॥ पदार्थ बद्धविधि ॥

आनादि पदार्थ ६ १ जीव २ ईश, ३ शुद्धचैतन, अविद्या, ४ चैतन, और अविद्याके सम्बन्ध, ५ तिनका परस्पर भेद ॥

अरिवर्ग,—कामक्रोध(द्वेष)लोभ,मोह,मदमत्सर,
अवस्था शरीरका—शिशु,कौमार,पौर्गंड,किशोर,युवा,जरा,
ईश्वरके गुण—समग्रऐश्वर्यसमग्रधर्म,समग्रयशसमग्रश्री,समग्रज्ञानसमग्रवैराग
ईश्वरके ज्ञान—उत्पत्तिप्रलय,गतिआगति,विद्या,अविद्या,
उर्मि धर्म—जन्म,मरण,क्षुधा,तृष्णा,हर्ष,शोक,
कर्म नित्य—स्नान,जप,ह्रीम,अर्चन,आतिथ्य,वैश्वदेव
कौशिक (अन्नमय कौशिकेपदार्थ)वक्,मांस,रुधिर,मेद,मज्जा,अस्ति,
प्रमाण—प्रत्यक्षअनुमान,उपमान,शब्द,अर्थापत्ति,अनुपलब्धि
ध्रम—कुल,गोत्र,जाति,वर्ण,आश्रम,नाम
रस—मधुर,अम्ल,लवण,कटु,कृषायतिक्त,
लिंग—उपक्रमउपसंहार,अभ्यास,अपूर्वता,फल,अर्थवाद,
विकार—जन्म,अस्तित्ता,बुद्धित्ताविपरिणामता,अपक्षीयता,विनाशना
वेदांत—शिक्षा,कल्प,व्याकरण,निरुक्तछंद,ज्योतिष
षट्संभति—शम,दम,उपरम,तिलिक्षा,श्रद्धा,समाधान

शास्त्र—१ सांख्य (कपिलकृत) २ योग पातंजल (पतंजलिकृत) ३ न्याय गौतमकृत ४ पूर्वमिमांसा (जैमिनिंकृत) ५ वैशेषिक (कण्वा मुनिकृत) ६ वेदांत वा उत्तर मीमांसा (व्यास वा ब्राह्मणकृत) ॥

स्वभाव प्राणीका—छाजन, भोजन, चक्र ६ आचारचक्र चार दल कमल, ३ मणिपूरक चक्र १० दलकमल

मैथुन, भय, निद्रा, मोह ॥ १ स्वाधिष्ठान चक्र छः दल कमल, ४ अनाहतचक्र १२ दल, ५ विशुद्धाख्य चक्र १६ दल, अज्ञाख्य पद्म अज्ञाथके २ दल ॥

दर्शनभेद—योगी,जंगम,सेवडा,संन्यासी,दवशब्राह्मण ॥
जैनियोंके—द्रव्यजीव,बुद्धि,आकाश,कालस्वर्ग,मोक्ष ॥
तंत्र क्रिया—भारण,मोहन,वशीकरण,उच्चटन,स्तम्भन,तारण ॥

न्यायोक्त जीव के छः विशेष गुण—१ बुद्धि, २ सुख, ३ दुख, ४ इच्छा, ५ द्वेष, ६ प्रयत्न

मूढार्चिचितामणिकोष ।

(१५१)

॥ सप्त विधि ॥

ऋषी— वशिष्ठ अत्रि, कश्यप, विश्वामित्र, भरद्वाज, जमदग्नि, गौतम आवरण— जल, पवन, अग्नि आकाश अहंकार, महत्त्व प्रकृति ज्ञानभूमिका-शुभइच्छा, सुविचारण तनुमानसा, सर्वपापति, असंशक्ति, पदार्थाभावनी, तुर्वा अज्ञानभू०—अशुचि जाग्रत, महाजाग्रत, जाग्रत स्वप्न, स्वप्न जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, बीज— ओं, श्रीं, रं, सौं, रौं, ह्रीं, क्लीं, ॥

अ, इ, उ, ए, व, म, ह,

कर्मादि ६—कर्म,उपासना,योगज्ञानउत्पत्तिनाश
कर्म—यजन, याजन,अध्यायनअध्यापन,दान,प्रतिग्रह,मैथुन
उपास्य—शिव,विष्णुगणपतिसूर्यशक्तिराम, कृष्ण ॥
योगप्रकार ॥ हठ,कुंडली,लाम्बका,तारकलय,असनस्क, सांख्य ॥
उत्पत्ति—शब्द,स्पर्श,रूप,रस,गंध,इच्छा, वासना ॥
स्थिति—अन्नपानी,घास,मिट्टी,पत्ती,फूल, फल ॥
लय (नाश)—पृथ्वी,वायु,जल,अग्नि,हाथ,पग, दांत ॥
दिनसात—शनिवार,रविवार,चंद्रवार,भंगलवार,बुधवार,गुरुवार, शुक्रवार, ॥
ऊपरके लोक—भूर,भुवर,स्वर,महर,जन,तप,
नीचेके अतल,वितल,सुतल,तलातल,रसातल,महातल,
धातु—रस,रुधिर,मांस,मेद,मज्जा,अस्थि,
रूपरंग—शुक्ल,कृष्ण,पीत,रक्त,हरित,कपिल,
चित्र ॥

॥ अष्ट विधि ॥

योगके अंग—यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान,समाधि ।
सिद्धि—अणिमा,महिमा,लधिमा,गिरिमा,प्राप्ति,प्राकाम्य,ईशित्व,वशित्व ॥
पाश—दया,शंकाभय,लज्जा,निंदा,कुल,शील,धन, ॥
प्रकृति—पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु,आकाश,मन,बुद्धि, ॥
मैथुन—श्रवण, स्मरण,कीर्तन,चिंतन,एकांतवातसंकल्प दृढ,प्रयत्न,तन,प्राप्ति, ॥
करना,
मद—कुल,धन,रूप,प्यौवन,विद्या,तप,राज्य ॥

॥ नव विधि ॥

लिङ्ग शरीरके तत्त्व—श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ॥ ग्रह—सूर्य, चंद्र, बुध, अंगारक इत्यादि ॥ भक्ति—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन ॥ नवगुण ब्राह्मणके—धृति, क्षमा दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, ज्ञान, विद्या, सत्य ॥

॥ वराविधि ॥

औतार मुख—१ १ मत्स्य, ३ कूर्म, ३ वराह, ४ नरसिंह, ५ वामन, ६ परशुराम, ७ राम, ८ कृष्ण, ९ बौद्ध, १० कर्लकी ।

(९५२)

गूढार्थचिन्तामणिकोष ।

नाडिका और देवता-महाविद्यादश- १ काली, २ दुर्गा, ३ भुवना, ४ बगला, ५ मातंगी, ६ धूमा, ७ तारा ८ छिम्स्ता, ९ त्रिपुरा, १० कमला, १ इडा (चंद्र) देवता हरि । २ पिंगला (सूर्य), देवता ब्रह्मा ॥ ३ सुमुमन मध्यमा, रुद्र, ॥ ४ गांधारी, दक्षिण नेत्र, इन्द्र ॥ ५ हस्त जिह्वा वाम नेत्र-वरुण ॥ ६ पुष्प दक्षिण कर्ण ईश्वर ॥ ७ यशस्विनी वामकर्ण-ब्रह्मा ॥ ८ कुंडं गुदा-पृथ्वी ९ अलम्बुषा मेढ्र सूर्य १० शंखिनी नाभी-चंद्र ॥

रस (कवितাকে) शृंगार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स, रौद्र शांति प्रेमभक्ती वा ज्ञान ।

॥ एकादश विधि ॥

रुद्र—१० प्राण ग्यारहवां मन ॥

ज्ञान साधन—विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति मुमुक्षता, गुरुसंपत्ति, श्रवण, तत्त्वज्ञानाभ्यास मनन, निदि- ध्यासन, मनोनाश, वासना क्षय ॥

॥ द्वादशविधि ॥

मास—चैत्र, वैशाखसे फालगुन तक ॥

आभारण ॥ नुपूर, चूड़ी, हार, कंकण, अंगूठी, बाजूबंद बेसर बिरिया, टीका, शिशफूल, तागडी, (करधनी) कण्ठधी ॥

द्वादश महावाक्य—तत् त्वम, आदि ॥

तिलक १२ ।

ऊर्ध्वं पुण्ड्र मस्तक, प्रथम, ब्रह्म रंध्र पुनि जोय ।

त्रितिय नेत्र दोउ कण्ठपुनि, उरनाभी फिर होय ॥ १५ ॥

उर दोहु बिशि भुज दोऊ पुनि, तथा पृष्ठ प्रबाण ।

बरन वैष्णवके यही, द्वादश तिलक बखान ॥ १६ ॥

इजोल—बारह ॥

॥ चतुर्दशविधि ॥

विद्या— १ ब्रह्मज्ञान, २ रसायन, ३ श्रुति, कथा, ४ वैश्वक, ५ ज्योतिष, ६ व्याकरण, ७ धनुर्विद्या, ८ जलतरना, ९ संगीत, १० नाटक, ११ अश्वारोहण, १२ कोकशास्त्र, १३ चोरी, १४ चतुरता ॥

॥ चौदह मासूम मुसलमानी धर्म के ॥

इति संक्षेप गूढार्थ चिन्तामणी कोष कवीराश्रमाचार्य्य स्वामी श्रीयुगलानन्द विहारी विरचित

॥ समाप्त शुभम् ॥

This image shows a blank, aged, cream-colored page, likely an endpaper or flyleaf from an old book. The paper has a slightly textured appearance with some minor creases and discoloration, particularly along the left edge and bottom. There is no text or other markings on the page.

The logo is a red line drawing. It features a central teardrop-shaped frame containing a stylized, calligraphic 'K'. Below this frame is a curved banner with the text 'खेमराज श्रीकृष्णदास' written in Devanagari script. The entire logo is rendered in red ink.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई