भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

का स्थान हुआ था । दूसरे देश में उत्पन्न दो स्कन्धों से वे सात नागों को गृह हुए थे । जिनकी संज्ञा पाताल है और जो महान सुखप्रद है जहाँ पर महेश स्वयं रहते हैं । उसके तेज समूहों से यह लोक उत्पन्न हुआ था जो कि महर्लोक इस नाम से श्रुत हुआ था । गर्भ से मरुत् जनलोक नाम वाला हुआ था और ध्यान से परम श्रेष्ठ तपोलोक उत्पन्न हुआ था । उस अण्ड की ऊर्ध्वगति में सत्यलोक समुत्पन्न हुआ था । उस ब्रह्माण्ड के खण्ड के भगवान् अच्युत विष्णु हैं जिनको धीर पुरुष परमपद कहते हैं और जो ज्ञान के ही द्वारा जानने के योग्य वीर परिनिष्ठित रूप से समन्वित है । इसी रीति से सबसे प्रथम विष्णु स्वरूप वाले हुए थे और वे ही स्थिति अर्थात् पालन के लिए हुए । क्योंकि ये स्वयं ही समुत्पन्न शरीर वाले थे अर्थात् इनकी उत्पत्ति स्वयं अपनी इच्छा से ही हुई थी और इनको किसी ने उत्पन्न नहीं किया था । अतएव उन भगवान् विष्णु ने 'स्वयम्भू' यह प्रसिद्धि प्राप्त की थी । इसके अनन्तर भगवान् विष्णु यज्ञ वाराह के रूपधारी हुए थे जो भूमि के समुद्धरण करने के लिए परमाधिक पीन थे । उन वराह के रूपधारी प्रभु ने मध्य में निमग्न होती हुई इस पृथ्वी का भेदन करके अत्यधिक वेग से अन्दर चले गये थे । अपनी दाढ़ के अग्र भाग में पृथ्वी को रखकर वे सम्पूर्ण जल का अतिक्रमण करके ऊपर आगत हो गये थे । इसके अनन्तर यह सात फनों से सयंत अनन्त की मूर्ति होकर इस पृथ्वी को धारण करने के लिए प्रकट हो गये थे । शेषनाग ने भी अपने फन को फैलाकर और उसने एक फन पर धरित्री धारण करके जल में संस्थित होते हुए जल के ऊपर उसको रख दिया था और यज्ञ वाराह ने भी पृथ्वी को त्याग दिया था । उन शेष ने भी फनों को फैला दिया था । उनमें से एक फन तो पूर्व दिशा की ओर था तथा दूसरा फन पश्चिम में था और अन्य फन दक्षिण और उत्तर दिशा की ओर थे । उनका एक फन ऐशानी दिशा में और दूसरा फन आग्नेय दिशा में था । एक फन पृथ्वी के मध्य में था और उसका तनु नैर्ऋत्य दिशा में था । वहाँ पर वायव्य दिशा शून्य

थी। फिर नग्न भूमि स्थित थी। वह दीर्घ तनु जल में था जिसको अनन्त न धारण कर सके थे। उस समय हरि कर्म के रूप वाले हो गये थे और अनन्त के काम को उन्होंने धारण किया था। उस कच्छप ने अपने चरणों से नीचे ब्रह्माण्ड का आक्रमण करके वायव्य दिशा में ग्रीवान्वित के पृष्ठ में अनन्तर को धारण किया था। विशाल शरीरधारी भगवान् अनन्त देव ने कूर्म के पृष्ठ पर नौ वेष्टनों (लपेटों) से अपने शरीर को देखकर सुख से ही पृथ्वी को धारण किया। उसके अनन्तर अनन्त देव के फन पर चलती हुई पृथ्वी स्थित हुई थी। वराह भगवान ने इस पृथ्वी को अचल बनाने का प्रयत्न किया था और उसको अति सुदृढ़ अचलायमान कर दिया था। मेरु पर्वत को अपने सुरों के द्वारा प्रहत करके पृथ्वीतल में गाड़ लिया था फिर उसका भेदन करके वह पृथ्वी के अन्दर प्रवेश कर गये थे। वराह भगवान के चरणों के प्रहारों से वह महान पर्वत सोलह सहस्त्र योजन तक रसातल में प्रवेश कर गया था। हे द्विजोत्तमो! मेरु पर्वत का शिर उससे बत्तीस हजार यौजन के विस्तार वाला हो गया था।

रुद्र और ब्रह्मा का नाम विभाजन

इसके उपरान्त ब्रह्माजी ने महान् ओज वाले वराह भगवान को प्रणाम किया था और देवों के देव अर्धनारीश्वर को शरीर से समुत्पन्न किया था। पहले ही उत्पन्न होने के साथ वह महान ध्वनि वाले वे रूदन करने लगे थे। ब्रह्माजी ने उनसे कहा था कि तुम क्यों रो रहे हो। उन महेश्वर ने उत्तर दिया था कि उनका नाम रखो। रुदन करने से वे रुद्र नाम वाले हुए थे। उन ब्रह्माजी ने कहा- हे महाशय! आप रूदन मत करो। इस प्रकार से कहे हुए वे रुद्र सात बार रोये थे अर्थात् सात बार उन्होंने रुदन किया था। फिर ब्रह्माजी ने इसके उपरान्त सात दूसरे नाम किये थे। शर्व, भव, भीम और चौथा नाम महादेव किया था। पाँचवाँ नाम उग्र, छठवाँ नाम ईशान और परम पशुपति ये नाम किए थे। ब्रह्माजी ने कहा-मेरे द्वारा जिस प्रकार से आपका विभाग किया गया

൘ श्रीकालिका पुराण ൘ १६९ है वैसे ही आप अंपने आपको विभक्त करिए। आप भी बहुत सृष्टि के ही लिए हैं और आप भी प्रजापति हैं। इसके अनन्तर ब्रह्माजी दो भागों में विभक्त हो गये थे। वे अपने आधे भाग में पुरुष हुए थे और आधे भाग में नारी हो गए थे और उसमें प्रभु ने विराट का सृजन किया था। उसको भगवान ब्रह्माजी ने कहा था-हे प्रजापते! सृष्टि की रचना करो। उस विराट् ने भी तपश्चर्या का तपन करके उसने स्वायम्भुव मनु का सृजन किया था। उस स्वायम्भु मनु ने भी तप करके ब्रह्माजी को परितुष्ट कर दिया था। उसके द्वारा तुष्ट हुए ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करने के लिए अपने मन से दक्ष का सृजन किया था अर्थात् दक्ष को मन से ही उत्पन्न कर दिया था। दक्ष के सृष्ट हो जाने पर मनु के द्वारा दशावतार ब्रह्मा प्रणत हुए थे और फिर भी और मानस पुत्रों की सृष्टि की थी। उन पुत्रों के नाम ये हैं-मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वशिष्ठ, भृगु और नारद। इन सबका उत्पादन करके जो कि मन के ही द्वारा हुआ था फिर स्वायम्भू मनु से उन्होंने कहा था कि आप सृजन करो, यही कहकर लोकों के ईश ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये थे। वाराह भगवान ने इसके अनन्तर पौत्र से द्वारा सात सागरों को खोदकर परमेश्वर ने पृथिवी को उनको वलय के आधार वाले बनाकर सृजन किया था। इसके उपरान्त इन्होंने सात बार भ्रमण करने के द्वारा सात सागरों की रचना करके सात द्वीपों को अवच्छिन्न करके वे फिर पृथ्वी के अन्दर चले गये थे। लोकालोक पर्वत को इस पृथ्वी का वेष्टना बना करके स्थित कर दिया था। उसको सुदृढ़ रूप से भित्ति प्रान्त में गृह की ही भाँति स्थापित कर दिया था। हे विप्रगणो! मैंने आप लोगों के समक्ष में यह आदि सृष्टि का वर्णन कर दिया है। हे महर्षियों! प्रतिसर्ग में मैं इसको बतलाऊँगा उसे आप श्रवण करिए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-यह आप लोगों ने वाराह सर्ग का श्रवण कर लिया है क्योंकि यह वाराह से ही अधिष्ठित है। आप सबने प्रतिसर्ग का भी श्रवण किया है जो दक्ष आदि के द्वारा पृथक किया

गया था। विराट्, रुद्र, मनु, दक्ष और मरिचि आदि मानस पुत्रों ने जिस-जिस सर्ग का पृथक किया था वह प्रतिसर्ग भी कहा गया है। विराट सुत ने वंश में होने वाले मनुओं का सृजन किया था। जिनके द्वारा यह जगत् वितत किया गया है। मनु ने सात मनुओं की रचना करके बहुत सी प्रजा को बना दिया था अर्थात् बहुत अधिक प्रजा की सृष्टि कर दी थी। प्रजा की सृष्टि की इच्छा वाले मनु ने जो स्वायम्भुव नाम वाले थे उन्होंने दूसरे सुत छः मनुओं का सृजन किया था। उन छः मनुओं के नाम ये हैं—स्वरोचिष, आँत्तभि, तामस, रैवत, चाक्षुष और महान तेज से संयुत विवस्वान। स्वयम्भुव मनु ने यश, राक्षस, पिशाच, नाग, गन्धर्व, किन्नर, विद्याधर, अप्सरायें, सिद्ध, भूतगण, मेघ जो विद्युत के सहित थे, वृक्ष, लता, गुल्म, तृण आदि मत्स्य, पशु, कीट, जल में समुत्पन्न होने वाले और स्थल में समुत्पन्न इन सबकी रचना की थी। इस प्रकार के सबको स्वयम्भुव मनु ने अपने सुतों के सहित सृष्ट किया था। वह इसका प्रति सर्ग प्रकीर्त्तित किया गया है। अन्य जो छः मनु थे उन्होंने भी अपने-अपने अन्तर में स्वयं प्रतिसर्ग को चराचर में प्राप्त किया करते हैं। यज्ञ का यज्ञयूप और प्राग्वंश हुआ था तथा वाराह की भाँति धर्म और अधर्म एवं सब गुणों की सृष्टि की थे। देवर्षि दक्ष ने परम श्रेष्ठ बहुत से सुतों का समुत्पादन करके सोमय आदि महर्षियों को और पितृगणों को उत्पन्न किया था तथा सृष्टि को प्रवृत्त किया था यह इसका प्रतिसर्ग कहा गया है। हे विप्रो! विप्र उसके मुख से उत्पन्न हुए थे और क्षत्रिय दोनों बाहुओं से समुत्पन्न हुए थे। ऊरुओं से वैश्यों की उत्पत्ति हुई थी तथा शूद्र पादों से समुत्पन्न हुए थे। चारों वेद ब्रह्माजी के चार मुखों से निःसृत हुए थे। यह ब्रह्माजी का प्रतिसर्ग है जो ब्रह्मसर्ग इस नाम से कहा गया है। मरीचि ऋषि से कश्यप ऋषि ने जन्म ग्रहण किया था। और कश्यप से यह सम्पूर्ण जगत समुत्पन्न हुआ था। जिसमें देव, दैत्य और दानव सभी उत्पन्न हुए थे। यह उसका सर्ग कीर्ति हुआ था। अत्रि ऋषि के नेत्रों से चन्द्रदेव ने जन्म धारण किया था और तभी

६०४ श्रीकालिका पुराण ६०४ १७१ से यह चन्द्रवंश हुआ । उस चन्द्रवंश से यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त हैं और वह इसका ही सर्ग कीर्त्तित किया गया है । अथर्वाङ्गिरस के दस पुत्र और बहुत से दूसरे पौत्र हुए । जो भी मन्त्र और तन्त्र आदि हैं वे सब अंगिरस कहे गए हैं । पुलस्त्य का प्रतिसर्ग है जो बल और वेग से समन्वित था । काक्रदेव, गज, अश्व आदि बहुत अधिक प्रजा हुई थी । यह सर्ग प्रलह ने किया था अर्थात् इसकी सृष्टि की थी । अतएव यह इसका ही सर्ग कहा गया है । क्रतु ऋषि के बालखिल्य पुत्र हुए थे जो सभी कुछ के ज्ञान रखने वाले और परमाधिक तेज से संयुक्त थे । ये अट्ठासी हजार थे जो कि जाज्वल्यमान सूर्य के ही समान हुए थे । प्रचेता के जो सब पुत्र हुए थे वे सब प्राचेतस इस नाम से प्रथित हुए थे । ये छियासी हजार संख्या में थे और अग्नि के सदृश तेजस्वी हुए थे । वशिष्ठ ऋषि के सुत सुकालिन थे और दूसरे योगी थे । ये अरुन्धती से समुत्पन्न पचास आरुन्धतेय कहलाये थे । यह वशिष्ठ अर्थात वशिष्ठ मुनि का सर्ग कहा जाया करता है । भृगु ऋषि से जो उत्पन्न हुए थे जो दैत्यों के पुरोहित थे । वे कवि और बहुत विशाल बुद्धि वाले हुए थे । उनसे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है । नारद से तारकों ने जन्म प्राप्त किया था तथा विमान हुए थे एवं अन्य प्रश्नोत्तर से नृत्य, गीत और कौतुक हुए थे । इन दक्ष और मरीचि आदि ने दाराओं के ग्रहण करने वाले बहुत से पुत्रों का समुत्पादन कर, इस पृथ्वी को और देवलोक को पूरित कर दिया था । उनके सबके पुत्रों को भी पुत्र हुए और फिर उन पुत्रों के भी पुत्र हुए थे । ये समुत्पन्न पुत्र आज भी भुवनों में प्रवृत्त हो रहे हैं । भगवान् विष्णु की आँखों से सूर्यदेव और मन से चन्द्रमा का उत्पन्न होना बताया गया है । श्रोत से वायु समुद्भव हुआ था तथा भगवान विष्णु के मुख से अग्नि ने जन्म प्राप्त किया था । यह प्रतिसर्ग विष्णु है । उसी भाँति दश दिशाएँ भी हुई थीं । पीछे सृष्टि की रचना करने के लिए चन्द्रमा अग्नि नेत्र से अवतरित हुआ था । भगवान भुवनभास्कर कश्यप से समुत्पन्न हुए थे जो भार्या के संयुत थे ।

१७२ 卐 श्रीकालिका पुराण 卐 बहुत से रुद्र उत्पन्न हुए और चार प्रकार के भूतग्राम हुए थे । शृगाल, वाराह और उष्ट्र रूप वाले प्लव, गोमायु, गोमुख, रीछ मार्जर के मुख वाले थे तथा दूसरे सिंह और व्याघ्र के मुख वाले थे । सभी अनेक प्रकार के शस्त्रों के धारण करने वाले थे तथा विभिन्न और अनेकों रूप वाले थे एवं महाबल से युक्त थे । हे द्विज श्रेष्ठों ! यह प्रतिसर्ग आपको बतला दिया गया है । अब दैनन्दिन अर्थात् दिनों दिन में होने वाली प्रलय को कल्प शेष से आप लोग श्रवण कीजिए । सृष्टि कथन मार्कण्डेय मुनि ने कहा-यह मन्वन्तर मनु का काल होता है जितने पर्यन्त वह मनु प्रजाओं का पालन किया करता है वह एक ही मनु होता है और वह काल मन्वन्तर इस नाम से प्रसिद्ध होता है । यह देवों के इकहत्तर युगों से यहाँ पर होता है । तात्पर्य यह है कि एक मन्वन्तर में अर्थात् एक ही मनु के काल में देवगणों के इकहत्तर युगों का समय हुआ करता है ऐसे चौदह मन्वन्तरों का एक कल्प होता है जो ब्रह्माजी का एक दिन हुआ करता है । ब्रह्माजी के दिन के अन्त में उनको सोने की इच्छा उत्पन्न होती है और फिर महामाया योगनिद्रा ब्रह्मा जी के निकट आ जाया करती है । इसके अनन्तर वे लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने अपरिमित तेज वाले भगवान विष्णु के नाभि के पद्म में प्रवेश करके वे सुख से शयन किया करते हैं । उसके पश्चात भगवान विष्णु स्वयं रुद्ररूपी जनार्दन होकर उन्होंने पूर्व की ही भाँति सम्पूर्ण तीनों भुवनों का विनाश कर दिया था । वायु के साथ वह्नि ने महाप्रलय कालों में जैसे ही वैसे ही सम्पूर्ण तीनों जगतों का दाह कर दिया था । प्रताप से आर्त्त होकर महर्लोक के निवासी जन जनलोक को प्रयाण किया करते हैं । क्योंकि जब तीनों लोकों के दाह होने के समय उस दारुण अग्नि से जन प्रपीड़ित हो गये । इसके अनन्तर कालान्तर महामेघों जिनकी गर्जना की महाध्वनि थी, समुत्पादित करके महावृष्टि से तीनों भुवनों को आपूरित करके चलती

൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ १७३ हुई तरंगों वाले जलों के समूह से जो ध्रुव के स्थान पर्यन्त संगत थे और घोर वृष्टि की थी। फिर वह जनार्दन प्रभु इन तीनों लोकों को अपने उदर में रखकर वे परमेश्वर शेष के पर्यंक पर शयन किया करते हैं। वे जगत् के गुरुदेव ब्रह्मा को अपनी नाभि के कमल में शयन किए हुए संस्थापित करके इन तीनों लोकों को श्री के सहित दग्ध करके और भक्षण करके नारायण के स्वरूपधारी ब्रह्मशरों की शय्या में शयन किया करते हैं अर्थात् शेषशय्या पर सो जाते हैं। त्रैलोक्य के ग्रास से गृहित वे प्रभु योगनिद्रा के वशीभूत हो गये हैं। जिस समय में कालाग्नि ने सम्पूर्ण त्रिलोकी की दग्ध कर दिया था उसी विष्णु के समीप में समागत हो गये थे। उनके द्वारा त्यागी हुई पृथ्वी एक ही क्षण में नीचे की ओर चली गयी थी और वह कूर्म के पृष्ठ भाग पर पतित होकर उस समय विकीर्ण सी हो गयी थी। कूर्म ने भी बड़े भारी प्रयत्नों से जल में चलती हुई पृथ्वी को पैरों से ब्रह्माण्ड पर आक्रमण करके पृष्ठ पर धरा को धारण किया था। ब्रह्माण्ड के खण्डों से संयोग से वह पृथ्वी चूर्ण हो गयी थी इससे भगवान् कूर्म रूपधारी जनार्दन ने उसको परिगृहीत कर लिया। चलते हुए जल के समूह में संसर्ग से चलती हुई धरा से उस समय में कूर्म पृष्ठ बहुतर वरण्डी से विततीभूत अर्थात् विस्तृत कर दी थी। अनन्त भगवान उस समय में क्षीरोद सागर में गये थे वहाँ पर उन्होंने देखा कि भगवान जनार्दन प्रभु अपनी श्री के साथ शयन कर रहे थे। मध्य में रहने वाले फन से त्रैलोक्य के ग्रास से उपवृंहित हो धारण कर रहे थे। महान बल वाले ने पहले फन को चौड़ा कर ऊर्ध्व में पद्म बनाकर उन शेषनागधारी ने परमेश्वर भगवान विष्णु को समाच्छादित कर दिया था। अनन्त ने अपने दाहिने फन को उनका उपधान (तकिया) बना दिया था। महान् बलवान उन्होंने उत्तर फन को चरणों की ओर तकिया बना दिया था। उस समय में उन शेष ने पश्चिम फन को तालवृत्त कर दिया था। शेषरूपधारी ने शयन करते हुए जनार्दन प्रभु का व्यंजन किया था। महान बलधारी उन्होंने ऐशानी फन से शंख, चक्र, नन्दक, असि और दो इषुधीयों को और गरुड़ को धारण किया था।

१७४ || श्रीकालिका पुराण ||

गदा, पद्म, शाधनुषंग तथा अनेक आयुधों को जो भी अन्य उनके अस्त्र थे उनको आग्नेय दिशा वाले फन से धारण किया था। उस समय में भगवान हरि के शयन अर्थात् शय्या के लिए अपने स्वकीय शरीर को बनाकर जल से मग्न पृथ्वी का अधरकाय से आक्रमण करके स्थित हुए थे। त्रैलोक्य ब्रह्म के सहित तथा लक्ष्मी से समन्वित, सामासंग, जगत् के बीज स्वरूप और जगत् के कारण के भी कारण जनार्दन प्रभु को धारण किया था। वे जनार्दन प्रभु नित्य आनन्द स्वरूप हैं, वेदों से परिपूर्ण हैं, ब्रह्मण्य हैं जगत् के कारण के भी कारण हैं, जगत के कारण कर्त्ता हैं, परमेश्वर हैं, भूत, भव्य और भव के नाथ हैं, बराबर गति से संयुत हैं ऐसे हरि को शिर से धारण किया था और अपने शरीर को भी धारण कर लिया था। इस रीति से अव्यय नारायण हरि भगवान् ब्रह्माजी ने दिन के प्रमाण से निशा और संध्या को अभिव्याप्त करके शयन किया करते हैं। यह प्रलय जिससे ब्रह्मा के दिन-दिन में होती है। इसी कारण से पुरातत्व के ज्ञानीजन इसको दैनन्दिन ख्यापित किया करते हैं अर्थात् कहा करते हैं। उस निशा के व्यतीत हो जाने पर लोकों के पितामह ब्रह्माजी निद्रा को त्याग करके पुनः सृष्टि की रचना के लिए समुत्थित हो गये थे अर्थात् जागकर खड़े हो गये थे। उन्होंने देखा कि तीनों लोक जल से परिपूर्ण भरे हुए हैं और भगवान पुरुषोत्तम शयन किये हैं। भगवान विष्णु को जगन्मयी महामाया का उन्होंने निरीक्षण किया था फिर ब्रह्माजी ने भगवान हरि के अंग में विराजमान योगनिद्रा की स्तुति की थी। ब्रह्माजी ने कहा-चित्तशक्ति अर्थात् ज्ञान की शक्तिरूपा, विकारों से रहित, परब्रह्म के स्वरूप वाली, सनातनी महामाया योगमाया को मैं प्रणाम करता हूँ। हे देवी! आप योगियों की विद्या हैं, आप ही गति, मति और स्तुतिरूपा हैं। आप सृष्टि, स्थिति, स्वाहा, स्वधा और आप ही गीतिका हैं। आप सामवेद की नीति हैं और आप ह्रीं, श्रीं और सरस्वती हैं। आप महामाया, योगनिद्रा, मोहनिद्रा और आप ईश्वरी हैं। आप कान्ति हैं, सर्वशक्ति हैं और आप वैष्णवी शिवातनू हैं। आप

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १७५ समस्त लोकों की धात्री हैं और आप शरीरधारियों की अविद्या हैं। आप जाधर शक्ति देवी हैं और आप ही इस ब्रह्माण्ड को धारण करने वाली हैं। आप ही समस्त जगतों की तीन गुणों के स्वरूप वाली अर्थात् सत, रज और तम से संयुत प्रकृति हैं। आप सावित्री और गायत्री तथा आप सौम्य से भी अत्यधिक शोभना हैं आप नित्य भगवान हरि की सृजन की इच्छा हैं। आप सुषुप्ति अर्थात् शयन करने की इच्छा हैं। आप पुष्टि, लज्जा, क्षमा, शान्ति हैं और आप परमेश्वरि द्युति हैं। आप ही भूमि के स्वरूप से इस सम्पूर्ण चराचर को धारण किया करती हैं। आप अर्थात् जल हैं और आप जलों को जन्म देने वाली माता हैं। आप सबके अन्दर रहकर संचरण करने वाली हैं। आप स्तुति, स्तुत्य, स्तोत्री हैं तथा आप ही स्तुति की शक्ति हैं। मैं आपकी क्या स्तुति करूँगा, हे परमेश्वरि! आप प्रसन्न हो जाइए। हे जगत की माता! आपको नमस्कार है। अब आप भगवान जनार्दन को प्रबोध करा दो अर्थात् उनको जगा दीजिए। इस प्रकार से लोकों की रचना करने वाले ब्रह्माजी के द्वारा महामाया की स्तुति की गयी थी। फिर उसकी नासिका, मुख, बाहु हरि के हृदय से निकले थे और उनके राजसी मूर्ति का समाश्रय ग्रहण करके वह ब्रह्माजी के दर्शन में स्थित हो गई थी। इसके उपरान्त जनार्दन शेष की शय्या पर निद्रा लेते हुए थे उस निद्रा से एक ही क्षण में उठकर खड़े हो गये थे और फिर सृष्टि की रचना करने की वृद्धि की थी। फिर वाराह के स्वरूप से जल में निमग्न हुई पृथ्वी को शीघ्र ही समुद्धृत करके उसको जल के ऊपर रख दिया था। उस जल के समुदाय के ऊपर वह बड़ी विशाल भाव की ही भाँति स्थित हो गयी थी। देह के बहुत विशाल एवं विस्तृत होने से वह मही संप्लव को प्राप्त नहीं हो रही थी। फिर भगवान हरि स्वयं वहाँ पर उपस्थित हुए थे और अपनी माया से जल से समूह का संहार करके जन्तुओं की स्थिति के लिए स्वयं की प्रभु प्रवृत्त हो गये थे। पूर्व में जैसे थे उसी के समान भगवान अनन्त भी वहाँ पर भूमि के तल प्रदेश में

१७६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ जाकर कूर्म के ऊपर संस्थित हो गये थे और पृथ्वी को धारण कर लिया था। इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने सभी प्रजापतियों को भली-भाँति उत्पादन करके समस्त लोकों के पितामह ने इस जगत् को उत्पादित कर लिया था अथवा ब्रह्मा सृष्टि की रचना करते हैं जबकि अन्य भी सृष्टि किया करते हैं। जो परब्रह्म के रूप वाले हैं वे स्वयं निरन्तर अनुग्रह किया करते हैं और प्रकृतियाँ व महाभूतों को अनुगृहीत किया करती हैं। पुरुष तथा महदादिक भी अनुग्रह किया करते हैं जो ईश्वर की इच्छा के अनुसार अष्ट संचय अधिष्ठान पुरुष से अनुगृहीत किया करते हैं। पुरुषों के अधिष्ठान से और महाभूतों के गुण से उसी भाँति से महदादि का और महात्मा काल के अधिष्ठान से तथा प्रधान के अधिष्ठान से जो कुछ समुत्पन्न होता है। स्थावर अर्थात् अचर और जंगम अर्थात् चेतन स्थिर अथवा अद्भुत हे द्विजश्रेष्ठों! सभी कुछ अधिष्ठान से उत्पन्न होता है। जैसा कि पूर्व में दिखाया था वह सब आपको बतला दिया था। जिस प्रकार से इस जगत् के प्रपंच की परा असारता दिखलाई थी और जहाँ पर सार दिखलाया है। हे द्विजों! वह आप मुझसे श्रवण करिये। सारासार निरूपण मार्कण्डेय मुनि ने कहा-यह सम्पूर्ण जगत् सारहीन है, अनित्य है और महान दुःखों का पात्र अर्थात् आधार है। यह एक ही क्षण में तो उत्पन्न होता है और एक ही क्षण में विपन्नता को प्राप्त हो जाया करता है। यह निस्सार जगत शीघ्र ही उस भाँति सार से उत्पन्न होता है और फिर महाप्रलय के संगम में उसमें विलीन हो जाया करते हैं। भगवान हरि ने उत्पत्ति और प्रलयों से जगत की निःसारता शम्भु के लिए भाव से जगतों के पति ने दिखलाई थी। एक शिव, शान्त, अनन्त, अच्युत, पर से भी पर, ज्ञान से परिपूर्ण, विशेष अद्वैत, अव्यक्त और अचिन्त्य रूप ही सार है उससे अन्य सार नहीं है। जिससे यह उत्तम जगत् अर्थात्

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १७७ विश्व उत्पन्न होता है जिससे महास्थिति को प्राप्त होता है और पीछे लीन हुआ करता है। मेघों के जल को आकाश की ही भाँति वृत्ति से जो इस विश्व को धारण किया जाता है वह तत्व सार है। योगी के द्वारा योगी जिसकी प्राप्ति के लिए इच्छा करता हुआ सदा ही आत्मरूप को पवित्र किया करता है और जिसको प्राप्त करके वह निवृत्त हो जाया करता है। इस लोक में निश्चय ही अन्य कुछ सार नहीं हैं। द्वितीय सार धर्म है जो नित्य ही प्राप्ति के लिए होता है। जो निवर्त्तक नाम है वहाँ पर असार प्रवर्त्तक हैं। धर्म का धीरे-धीरे संचय करना चाहिए जिस प्रकार से वाल्मीक मिट्टी का संचय किया करता है। इस धर्म का संचय परलोक से सहायता के लिए और पूर्व में किए गये पापों की विमुक्ति के लिए होता है। संसार के समस्त कर्मों में एक धर्म ही परमश्रेय होता है और दूसरे तीनों अर्थात् अर्थ, काम और मोक्ष धर्म से ही समुत्पन्न हुआ करते हैं। तात्पर्य यही है कि धर्म ही सबसे अधिक एवं प्रमुख होता है। प्राणों का त्यागकर देना श्रेष्ठ है तथा शिर का काट देना ही अच्छा है किन्तु धर्म का परित्याग करना उचित नहीं है। ऐसा करना लोक और वेद में बुरा होता है। धर्म से ही लोक को धारण किया जाता है और धर्म से जगत् को धारण किया जाता है। धर्म के द्वारा ही सब सुरगण पहले सुरत्व को प्राप्त हुए थे। चार चरणों वाला भगवत् धर्म निरन्तर इस जगत का पालन किया करता है वह ही पुरुष मूल है जो 'धर्म' इस नाम से कहा जाता है। इस लोक में सभी कुछ क्षरित हो जाया करता है किन्तु धर्म कभी भी च्युत नहीं हुआ करता है। जो पुरुष धर्म से कभी विचलित नहीं होता है वही 'अक्षर' यह कहा जाता है। यह ही हमने आपको सार बतला दिया है और यह सम्पूर्ण जगत सार से रहित है। जिस प्रकार से भगवान शम्भू ने अपने अन्तर में ज्ञान से देखा था। जगतों के पति भगवान विष्णु ने यहीं दिखलाया था और शंकर ने स्वयं ही ध्यान के द्वारा मन से आत्मा को ग्रहण किया था। जो सार-तत्व, परम, निष्कल है और मूर्ति से हीन हैं वही यह मूर्तिमान धर्म है। यह अन्यसार है, सार

१७८ শ্রীকালিকা পুরাণ

है और इसके अतिरिक्त अन्य सब सारहीन है। इसी प्रकार से इसका ज्ञान प्राप्त करके महा बुद्धिमान नित्य ही गमन किया करते हैं। ऋषियों ने कहा-जो भगवान शम्भु के द्वारा पूर्व में चार प्रकार के भूत ग्राम सृष्ट किये थे अर्थात् जो चार तरह के भूत ग्रामों का पूर्व में सृजन किया था वे किस प्रयोजन की सिद्धि के लिए समुत्पन्न हुए थे और किस तरह से उनको अनेकरूपता हुई थी ? उनका आधा शरीर तो वाराह का है और आधा दन्ताबल है। कुछ-कुछ गणों के अवयव तो सिंह, व्याघ्र के शरीर से हुए थे। वे गण किस कारण से महान क्रूर थे और महान ओज वाले थे। किन भागों वाले थे यह सब हम लोग श्रवण करने की इच्छा रखते हैं हे द्विजश्रेष्ठ! हमारी ऐसी ही इच्छा है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-हे मुनियों! अब लोग श्रवण कीजिये कि जिस रीति से भगवान शम्भु के गण हुए थे ओर आप जिसके लिए वे समुत्पन्न हुए थे और जिस कारण से वे एकरूप वाले नहीं थे। यह विषय बहुत ही अधिक गोपनीय है और यह धर्म, अर्थ और काम के प्रदान करने वाला है। यह परम तेज है और निरन्तर परम तप है। इस महान आख्यान का श्रवण करके पुरुष इस लोक में और परलोक में दुःख नहीं प्राप्त किया करता है। यह आख्यान यश देने वाला है, धर्म से युक्त है, आयु की वृद्धि करने वाला है और परम तुष्टि तथा पुष्टि का प्रदान करने वाला है। ईश्वर ने कहा-हे विभो! आपने जिसके वाराह के स्वरूप को कल्पित किया था वह आपने पूर्ण कर दिया है कि आपने इस पृथ्वी को यथावत् स्थापित कर दिया है। आपके ही प्रसाद से सब सागरों का संस्थान और नदियों का तथा क्षिति का संस्थान हुआ था और ब्रह्मा के द्वारा की हुई सृष्टि भी उत्पन्न हुई थी। आप सबसे परिपूर्ण हैं, यज्ञमय हैं तथा तेज से परिपूर्ण हैं आप समस्त गुरुओं के भी गुरु हैं तथा आप पर से भी पर हैं। हे जगत्पते! विकीर्ण हुई पृथ्वी आपको वहन करने में समर्थ नहीं है। पहले आपके द्वारा स्थापित शैलों के संघातों से यन्त्रित यह पृथ्वी है। उस कारण से हे जगतों के स्वामिन्! इस वाराह

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १७९ के शरीर को त्याग दीजिए। यह जगत से परिपूर्ण, जगत् के रूप वाले और जगत के कारणों का भी कारण है। हे विभो! आपके वाराह के शरीर को धारण करने में अन्य कौन समर्थ हो सकता है ? विशेष रूप से आपके द्वारा ही यह सकाम पृथ्वी जल में घर्षित हुई है। यह स्त्री के रूप वाली ने आपके तेजों से दारुण गर्भ को धारण किया था। हे जगतपते! रजस्वला इसमें समर्थ होती हुई जिसने गर्भ को धारण किया था। उससे जो समय होने वाला है यह भी दुर्यश का आदान करेगा। यह असुरों के भाव को प्राप्त करते ही देवों और गन्धर्वों की हिंसा करने वाला होगा। यह लोकेश ने मुझसे दक्ष की सन्निधि में कहा था। मालिन के साथ रति से समुत्पन्न यह आपका अनिष्ट करने वाला दुष्ट है। हे लोकेश! इस वाराह के कामुक स्वरूप का आप त्याग कर दीजिए। आप ही लोकों के भावन करने वाले हैं और सृष्टि, स्थिति और संहार के करने वाले हैं। हे महाबलवान आप लोकों के हित के सम्पादन करने के लिए इस शरीर को त्याग करके पुनः समय के सम्प्राप्त होने पर अन्य काम को पौत्र करेंगे। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-महान् आत्मा वाले भगवान् शंकर के इस वचन का श्रवण करके वाराह की मूर्ति को धारण करने वाले भगवान ने महादेव जी से कहा। श्री भगवान ने कहा-हे परमेश्वर! जैसा आप कर रहे हैं उस वचन का मैं पूर्णतया पालन करूँगा और इस यज्ञ वाराह के शरीर का मैं त्याग कर दूँगा। उसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। समय के प्राप्त हो जाने पर फिर अन्य उत्तम वाराह के रूप को धारण करूँगा जो अत्यन्त दुराधर्ष है और लोकों के पावन करने के लिए हैं। इतना कहकर महान कार्य वाले वे वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गए थे जो इस जगत के गुरु हैं और इस जगत के सृजन करने वाले हैं जो जगत् के धाता हैं और जगत् के स्वामी हैं। उन देव के अन्तर्धान हो जाने पर देवों के देव महेश्वर प्रभु देवगणों के तथा अपने गणों के साथ ही अपने स्थान को गमन कर गये थे। भगवान वाराह भी लोकालोक नामक पर्वत पर स्वयं चले गये थे और वहाँ पर वे अपनी पत्नी वाराही

के साथ रमण करने लगा गये थे जो कि परमसुन्दर स्वरूप वाली पृथ्वी थी। वह उस उत्तम पर्वत में बहुत लम्बे समय तक रमण करते हुए वह लोकेशपौत्री और परमाधिक कामुक तोष को प्राप्त नहीं हुए थे अर्थात् रमण करने पर भी उनको संतोष नहीं हुआ था। पौत्री के स्वरूप वाली पृथ्वी के साथ रमण किए जाने वाले से तीन पुत्र समुत्पन्न हुए थे। हे द्विजोत्तमो! आप अब उनके नामों को भी श्रवण करिए। वे सुवृत्त, कनक और घोर नामों वाले थे जो कि सभी महान बल से समन्वित थे। वे शिशु ही सुवर्ण के मेरु पर्वत के पृष्ठ पर व प्रस्तर में, गह्वरों में और सरोवरों में परस्पर में संसक्त हुए रमण करते थे। हे द्विजो! वह वाराह उन पुत्रों से परिवृत्त अपनी भार्या के साथ रमण करने वाले थे और उस समय में उन्होंने शरीर के त्याग करने का कुछ भी ध्यान नहीं किया था। किसी समय में महान बलवान् वह कर्दमों के अन्तर में शिशुओं के साथ संश्लिष्ट होकर भार्या के साथ कर्दम क्रीड़ा किया करता था। कीच के लेप से संयुत मधु पिंगल वराह शोभित हुए थे। जिस प्रकार से सन्ध्या का मेघ जल का क्षरण किया करता है उसी भाँति वह भी जल का क्षरण करने वाले थे। वह पुत्रों के सहित और पृथ्वी भार्या के साथ परम प्रीत और वह मध्य में निम्न हो गये थे। सुवृत्त ने और घोर तथा कनक ने सुवर्ण के व प्रपोत्र पातों से विदारित कर दिया था। मेरु पर्वत के पृष्ठ भाग पर सुरों के द्वारा जो भी सुवर्ण द्वारा रचित हुए थे उसके पुत्रों ने यत्नपूर्वक उनको भग्न कर दिया था। मानस आदि तो देवों के सरोवर थे उस समय में उसके पुत्रों ने अर्थात् शिशुओं के पौत्र धात्रों से सब ओर आविल अर्थात् यतिन कर दिए थे। वनिता के स्वरूप वाली पृथ्वी ने पौत्रिण से रमण किया था और स्थावर रूप से सुदृढ़ सुख को प्राप्त किया करती हैं। सुवृत्त आदि के द्वारा सभी ओर सागरों का अवगाहन करके पत्रौद्य्यों के द्वारा विकीर्ण रत्न वाले सब ही आकुलकृत हो गये थे। उस समय में इधर-उधर क्रीड़ा करने वाले पौत्री शिशुओं के द्वारा वहाँ पर जगतों को तथा

नदियों को और कल्प द्रुमों को भग्न कर दिया था। जगत के भरण करने वाले वाराह ने स्वयं ही जगत् की पीड़ा को जानते हुए भी सुतों के स्नेह से उनका निवारण नहीं किया था। सुवृत्त कनक और घोर जब दिव्यलोक में आगमन करते हैं उस अवसर पर देवों का समुदाय परमभीत होकर दशों दिशाओं में भाग जाया करते हैं। इस प्रकार से अपने पुत्रों के तथा भार्या के साथ जो यज्ञ पौत्री था वह क्रीड़ा करता हुआ भी किसी भी समय में कोई तुष्टि के प्राप्त करने वाले नहीं हुए थे अर्थात् उनको सन्तोष नहीं हुआ था। नित्य-नित्य ही उनकी कामवासना बढ़ती ही जाती है और ऐसा प्रदिष्ट हो गये थे कि वह अपने शरीर का त्याग करने की इच्छा नहीं किया करते हैं। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर सब देवगणों ने देव योनियों के साथ और रुद्रदेव के सहित मिलकर भली-भाँति जगत के हित के लिए सलाह ही थी। फिर मुनियों के साथ शक्र (इन्द्र) आदि उन सबने निश्चय करके शरण्य, विभु, अज भगवान नारायण की शरणागति में गये थे। उन गोविन्द, वासुदेव जगत के स्वामी के समीप में पहुँचकर सब देवों को प्रणाम किया था और फिर भगवान गरुड़ध्वज का स्तवन किया था। देवों ने कहा-हे देवेश्वर! हे देव! हे जगत के कारण को करने वाले! हे काल के रूप वाले! हे प्रधान और पुरुष के स्वरूप वाले! हे भगवान्! आपकी सेवा में हमारा सबका प्रणिपात समर्पित है। हे स्थूल और सूक्ष्म! हे जगत व्याप्त रहने वाले! हे परेश! हे पुरुषोत्तम! आप ही समस्त प्राणियों के कर्ता हैं अर्थात् सबका सृजन आप ही के द्वारा हुआ करता है और वही सबका पालन करने वाले रक्षक हैं तथा आप ही सबका विनाश करने वाले हैं। आप अपनी माया के स्वरूप के द्वारा इस जगत को सम्मोहित किया करते हैं। जो भी कुछ हो गया है, जो इस समय में हो रहा है और जो भविष्य में होनेवाला है। हे परमेश! वह सब स्थावर हो या जंगम हो आप ही हैं। आप अर्थ के अर्थियों के अर्थ हैं तथा आप जो भी काम के इच्छुक हैं उनके काम हैं।

१८२ ௬௮ श्रीकालिका पुराण ௮௨ आप धर्म के चाहने वालों के लिए धर्म हैं और जो निर्वाण पद के चाहने वाले हैं आप ही मोक्ष हैं, आप कामुक हैं, आप ही अर्थ हैं और आप ही सदा गति धार्मिक हैं। आपके मुख से ब्राह्मण समुत्पन्न हुए हैं और आपकी बाहुओं से क्षत्रियों ने जन्म ग्रहण किया था, आपके ऊरुओं से वैश्यों की उत्पत्ति हुई है तथा आपके चरणों से शूद्र निकले हैं अर्थात् आप ही के भिन्न-भिन्न अंगों से चारों वर्णों का समुत्पादन हुआ है। हे विभो! सूर्यदेव आपके नेत्रों से समुत्पन्न हुए हैं तथा चन्द्रमा आपके मन से जायमान हुआ है। आपके काम से वायु की उत्पत्ति हुई है तथा दूसरे दश प्राण भी आप ही से हुए हैं। वायु के प्राण अपान आदि दश स्वरूप होते हैं। ऊपर की ओर जो स्वर्ग आदि भुवन हैं वे सब आपके मस्तक से ही उत्पन्न हुए हैं। आपकी नाभि से आकाश ने जन्म लिया है तथा आपके पाद तल से पृथ्वी समुद्भव हुई है। आपके कानों से सब दिशायें उत्पन्न हुई हैं आपके जठर (उदर) से यह सम्पूर्ण जगत प्रादुर्भूत हुआ है। आप ही माया के स्वरूप से निश्चय ही जगत को सम्मोहित किया करते हैं। आप गुणों से रहित होते हुए भी गुण गण से समन्वित हैं आप परम शुद्ध, एक और पर से भी पर हैं। आप उत्पत्ति और स्थिति से रहित हैं और आप अच्युत अर्थात् क्षीण न होने वाले गुणों से अधिक हैं। हे जगत के स्वामिन! आप ही आदित्यों के द्वारा, वसुओं के द्वारा, देवों के, सतियों के, पक्षों के मरुद्गणों के द्वारा मुनियों के द्वारा और मुमुक्षुओं के द्वारा चिन्तन किये जाया करते हैं अर्थात् सभी के चिन्तन करने का विषय केवल आप ही होते हैं। विशेष विज्ञानवाले विगत भोग से संयुत मुनिगण चित्त (ज्ञान) और आनन्द से परिपूर्ण आप को ही समझते अर्थात जानते हैं। आप ही इस संसार रूपी वृक्ष के बीज हैं, जल हैं, स्थान हैं और फल हैं। आप पद्मा से पद्माकर विभात होते हैं। आप वरदान, खड्ग, चक्र, कमल और धनुष के धारण करने वाले हैं। आप ही नित्य तार्क्ष्य प्रतिभाव होते हैं। जिस प्रकार से स्वर्णाचल पर जल से समन्वित शब्द

ॐ० श्रीकालिका पुराण ॐ० १८३ हुआ करता है। आप ही पीताम्बर शंकर कमल से समुत्पन्न हैं। यह सब आप ही हैं और अन्य कुछ भी नहीं है। आपके गुण गण हमारे द्वारा चिन्तन करने के योग्य नहीं है। विधाता, हर और दिक्पालों के भी गुण चिन्तन करने के योग्य नहीं हैं। भय से और भक्ति से आप आपकी शरणागति से प्राप्त हुए हैं। हे विष्णो! आप हमारी रक्षा करिए। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से देवों के देव, भूतों के भावन करने वालों के भी भावन इस रीति से स्तुति किए गए थे जो इन्द्रदेव के सहित देवगणों के द्वारा स्तवन किए गये थे। मेघ के समान ध्वनि वाले प्रभु ने उन सबसे कहा था। श्री भगवान ने कहा-जिस प्रयोजन की सिद्धि के लिए आप लोग यहाँ पर समागात हुए हैं अथवा जो भी कुछ भय आपको हुआ है अथवा वहाँ पर जो भी कुछ कार्य मुझे करना चाहिए हे देवों! वह शीघ्र ही बतलाइए। देवों ने कहा-यह पौत्री अर्थात् यज्ञ वाराह से क्रीड़ा से यह वसुधा अर्थात् पृथ्वी नित्य विकीर्ण हो रही है और सभी लोक विशेष रूप से क्षुब्ध हो रहे हैं और वह उपसान्त्वना प्राप्त नहीं कर रहे हैं। जिस प्रकार से सूखा हुआ तुम्बी का फल घातों से जर्जरता को प्राप्त हो जाता है ठीक उसी भाँति यह भूमि यज्ञ वाराह के खुरों के प्रहारों से जर्जरित हो गई है। उसके जो तीन कालाग्नि के तेज से समान पुत्र हैं जिनके नाम सुवृत्त, कनक और घोर हैं उनके द्वारा भी यह सम्पूर्ण जगत आपतित हो रहा है। उनकी कर्दम लीलाओं से हे जगतों के पति! मानस आदि सब सरोवर भग्न हो गये हैं और अभी भी प्राकृतिक स्वरूप को प्राप्त नहीं होते हैं। महान बल वाले उनके द्वारा मन्दार आदि देवों के तरु भग्न कर दिए गए हैं। हे देव! वे आज तक भी प्ररोह को प्राप्त नहीं हो रहे हैं। जिस समय से वे सुवृत्त प्रभृति तीनों त्रिकूट पर्वत पर समारोहण किया करते हैं। हे महाबाहो। वहाँ से वे प्लुति करके क्षीर सागर में गिर जाया करते हैं। उस समय में क्षोभ को प्राप्त हुए सागर के जल के समुदायों से यह सम्पूर्ण भूमि प्लावित हो जाया करती है। उस समय में सभी मनुष्य उत्प्लवन को प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जल से

१८४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ निमग्न हो जाया करते हैं और देशों दिशाओं में जहाँ कभी भी जीवन की रक्षा करते हुए परिभ्रमण करने लगते हैं । जिस समय में यज्ञ वाराह के पुत्र त्रिविष्ट अर्थात् स्वर्ग को गमन नहीं किया करते थे । हे जगत्पते ! सभी पर्वत उस वाराह के पुत्रों ने शिखर पर क्रीड़ा करते हुए अधिक भाग नीचे की ओर गया हुआ कर दिया था । इस प्रकार से विशेष क्रीड़ा करते हुए उनकी क्रीड़ाओं से सम्पूर्ण जगत् हे वैकुण्ठ ! नाश के भाव को प्राप्त हो जाता है । हे जगत् के प्रभो! उससे आप रक्षा कीजिए । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-भगवान जनार्दन ने इस प्रकार से कहते हुए उनके वाक्य का श्रवण करके भगवान ने देव शंकर से और विशेष रूप से ब्रह्माजी ने कहा । जिसके लिए सभी देवगण और ये समस्त प्रजा महान् दुःख को पा रहे हैं और यह सम्पूर्ण जगत् शीर्ण हो रहा है । हे शंकर! मैं इस वाराह के शरीर को त्याग करने की इच्छा कर रहा हूँ। निर्वेश में शक्त उसका त्याग करना स्वेच्छा से नहीं हो सकता है । हे शंकर! अब आप यत्न से उसका त्याग कराइए । हे ब्राह्मण! आप भी अपने नेत्रों से पुनः समर के विनाशक शिव को आप्याप्ति कीजिए तथा सब देवगण भी शंकर को आप्यादित करें कि वे इस पौत्री का हनन करने को उद्यत हो जावें । रजस्वला के संसर्ग से तथा विप्रगण के मारने से यह शरीर पापों के करने वाला हो गया है । इस समय में उसका त्याग करना युक्त होता है । यह पाप प्रायश्चितों के द्वारा ही दूर होता है । अतएव मैं प्रायश्चित करूँगा । उसके लिए मेरा शरीर यत्न से साम्यता को प्राप्त होवे । मुझे सदा ही प्रजा का पालन करना ही चाहिए । वह प्रजा नित्य ही दुःखित हुआ करती है और वह मेरे ही द्वारा दुःखित हो रही है अतएव प्रजा की भलाई के लिए मैं शरीर का त्याग कर दूँगा । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस रीति से वे दोनों ब्रह्मा और शंकर उस समय में वासुदेव प्रभु के द्वारा कहे गये थे । तब उन्होंने वासुदेव प्रभु के कहा था कि जैसा भी आपने कहा है वही मुझे सब करना ही

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १८५ चाहिए। भगवान् वासुदेव ने भी उन सब देवगणों को विदा करके वाराह के तेज का आहरण करने के लिए वे फिर ध्यान में परायण हो गए थे। जब धीरे-धीरे माधव प्रभु उस तेज का अपहरण करते हैं तो उस समय में वह वाराह का देह सत्व से हीन हो गया था। जब सभी देवों ने उस देह को तेज से हीन समझ लिया था उसी समय में देव अद्भुत यज्ञ वाराह के समीप में प्राप्त हुए थे। ब्रह्मा आदि समस्त देव उमा के स्वामी महोदव के समीप में गये थे कि उस समय में उस तेज को कामदेव के शासन करने के लिए अधीन करें। फिर इसके अनन्तर सभी देवों के समुदाय ने अपना-अपना तेज भगवान् वृषभध्वज में समायोजित कर दिया था उससे वे भगवान् शम्भु बहुत ही अधिक बलवान हो गये थे। इसके अनन्तर शरभ के वाले रूप उसी क्षण में गिरीश हो गये थे। वे ऊपर और नीचे के भाग से आठों पादों से युक्त अत्यन्त भैरव हो गये। वह वाराह का शरीर दो लाख योजन ऊँचाई वाला था और डेढ़ लाख योजन के विस्तार से युक्त था। ऊपर की ओर वह वाराह का शरीर एक लाख योजन के विस्तार वाला था। आधा लाख योजन पार्श्व में विस्तृत था। उस समय में ऐसा वह वाराह शरीर वर्तमान हो गया था। इसके अनन्तर उस यज्ञ पौत्री ने शिर पर चन्द्र का स्पर्श करने वाले शरभ के रूप वाले उमापति महादेव का दर्शन किया था। उनका स्वरूप लम्बी नाक, और नखों वाला था तथा काले अंगार के समान प्रभा से युक्त था। उनका मुख दीर्घ था, महान् शरीर से समन्वित था और उसमें आठ दाढ़ें थीं, जटायें धारण करने वाली पूँछ थी तथा लम्बे कानों वाला परमाधिक भयानक स्वरूप था। उसके चार पद पृष्ठ भाग में थे तथा चार अधर में थे। वह महान् घोर शब्द कर रहे थे तथा बारम्बार उछाल खा रहे थे। इसके अनन्तर आगमन करते हुए उनको देखकर तो तुरन्त ही क्रोध से दौड़ लगा रहे थे। सुवृत्त, कनक और घोर वहाँ पर क्रोध से मूर्छित होते हुए प्राप्त हो गये थे। फिर वे तीनों भाई महान शरीरधारी शरभ के समीप में आ गये थे

[Page Header] [Header Left: १८६] [Header Center: ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ] [Decorative border]

और उन्होंने एक ही साथ पौत्र घातों से उत्क्षेप किया था जो कि महान बल से समन्वित थे। वे सब जितने प्रमाण वाले शरभ था उतने ही प्रमाण वाले उस समय में हो गये थे। वे तीनों पौत्री माया के द्वारा शरभ के उत्पक्षेप के अवसर पर बन गये थे। वह शरभ पृथ्वी के भाग में गहन जल के सागर में पतित हो गया था। मकरों के निवास स्थान सागर में सुवृत्त कनक और घोर के गिर जाने पर वाराह भी अपने पुत्रों के स्नेह से वशीभूत होकर और क्रोध से हे द्विजसत्तमो! उछाल खाकर सहसा उस जल से समुदाय वाले सागर में गिर गया था। उस समय में वे सब वाराह और शरभ उछाल खाते हुओं ने दिव्यलोक में सब देवों का और समस्त नक्षत्रों का भग्न कर दिया था। उनमें कुछ देवगण तो निहित हो गए थे और कुछ भूमि में नियति हो गये थे और उनमें कुछ देवज्ञान से समन्वित थे जो महर्लोक का समुपाश्रय ग्रहण करके वहाँ पर संस्थित हो गये थे। हे द्विज श्रेष्ठों! नक्षत्र विमान से महीबल में पतित हो गये थे वे सब ज्वालाओं की मालाओं से समाकुल दिखलाई दे रहे थे। उनके उत्पतन में जो वेग था वह बहुत ही अधिक दारुण था। उनसे अत्यधिक वेग वाला वायु उत्पन्न हो गया था जो बहुत ही अधिक दारुण था। उस वायु से प्रेरित हुए पर्वत पृथ्वीतल में गिर गये थे और कुछ पर्वत पुनः ही पर्वतों में पतित हो गये थे। वह वृक्षों का और जन्तुओं का विभर्दित करके बारम्बार निपातित हो गये थे। कुछ तो पर्वतों के आघातों से महीतल में नृत्यमान हो रहे थे। उन पर्वतों ने गमन करते हुओं ने बहुत सी प्रजाओं का भग्न कर दिया था। वायु के वेग से भूतल में पर्वत दिखलाई दिए थे। उनसे सदृश्यमान होते हुए अर्थात् रगड़ खाते हुए अन्य पर्वत गमन करते हुए से प्रतीत हो रहे थे। अम्भीनिधि में पतित हुए वाराहों से और शरभ से दिखाई दे रहे थे। महान ऊँचे पर्वतों से जल की राशियाँ उत्क्षिप्त हो गयी थी। एक ही क्षण में सब सागर बिना जल वाले हो गये थे क्योंकि वे सब जल की राशियों समुत्क्षिप्त होकर पृथ्वी जल में समागत हो गई