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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

( २६८ ) भगवान् के प्रकट होने पर महाषष्टी धात्री हुई, अम्बिका ने नाल छेदन किया, गङ्गाजी ने अपने जल से गर्भक्लेद को हटाया और सावित्री ने भगवान् के शरीर का मार्जन किया ॥१६॥ कृष्ण-जन्म के समान ही अनन्त भगवान् के अवतार लेने पर वसुन्धरा ने दुग्धसुधा की धारा प्रवाहित कर दी, मातृकाओ ने मगला- चार किया ॥१७॥ शम्बल ग्राम मे भगवान् के अवतरित होने का समाचार जानकर ब्रह्माजी ने वायु को आज्ञा दी कि तुम सूतिकागार मे जाकर भगवान् से इस प्रकार कहो ॥१८॥ कि आपके चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन तो देवताओ के लिए भी दुर्लभ है, अतः हे नाथ ! इस चतुर्भुज रूप को छोडकर मनुष्य रूप बनाइये ॥१९॥ सुशीतल, सुखद, सुगन्धित वायु ने यह वचन सुनकर द्रुतगति से सूतिकागार मे जाकर भगवान् से निवेदन किया ॥२०॥ तच्छ्रुत्वा पुण्डरीकाक्षस्तत्क्षणाद्द्विभुजोऽभवत् । तदा तत्पितरौ दृष्ट्वा विस्मयापन्नमानसौ ॥ २१ ॥ भ्रमसस्कारवत्तत्र मेनाते तस्य मायया । ततस्तु शम्बलग्रामे सोत्सवा जीवाजातय । मङ्गलाचारबहुला पापतापविवर्ज्जिता. ॥ २२ ॥ सुमतिस्त सुतलब्ध्वा विष्णु जिष्णु जगत्पतिम् । पूर्णकामा विप्रमुख्यानाहूयाद्गवा शतम् ॥ २३ ॥ हरे कल्याणकृद्विष्णुयशा शुद्धेन चेतसा । सामर्ग्यजुर्विद्भिर्ऋग्भैश्चस्तन्नामकरणे रत ॥ २४ ॥ तद राम कृपो व्यासो द्रौणिभिक्षुशरीरिण । समायाता हरि द्रष्टु बालकत्वमुपागतम् ॥ २५ ॥ ब्रह्माजी का संदेश प्राप्त होने पर भगवान् ने अपना स्वरूप दो भुजाओ से युक्त बना लिया। यह लीला देखकर माता-पिता विस्मित रह गये ॥२१॥ प्रभु की माया मे मोहित हुए माता-पिता ने समझा कि

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भ्रम से ही हमने अपने पुत्र को चार भुजा देखा था । फिर उस शम्भल ग्राम मे सभी पाप-ताप नष्ट होकर नित्य नवीन मगलाचार होने लगे ॥२२॥ भगवान् को पुत्र रूप मे प्राप्त करके पूर्णकामा सुमति ने ब्राह्मणो को एक सौ गौय दान की ॥२३। पवित्र हृदय वाले विष्णु- यशजी ने अपने पुत्र के मगल की कामना से ऋक्, यजु और सामवेदी ब्राह्मणो को नामकरण के लिए नियुक्त किया ॥२४॥ भगवान् के शिशु- रूप का दर्शन करने के लिए परशुराम, कृपाचार्य, वेदव्यास और द्रोणा- चार्यजी के पुत्र अश्वत्थामा भिक्षुक वेश मे वहाँ आये ॥२५॥ तानागतान्समालोक्य चतुरः सूर्यसन्निभान् । हृष्टरोमा द्विजवर पूजयाञ्चक्र ईश्वरान् ॥ २६ ॥ पूजितास्ते स्वासनेषु सविष्टा स्वसुखाश्रया । हरि क्रोडगत तस्य ददृशु सर्वमूर्त्तयः ॥ २७ ॥ तबालक नराकार विष्णु नत्वा मुनीश्वरा । कल्कि कल्कविनाशार्थमाविर्भूतं विदुर्बुधाः ॥ २८ ॥ नामाकुर्वस्ततस्तस्य कल्किरित्यभिविश्रुतम् । कृत्वा सस्कारकर्माणि ययुस्ते हृष्टमानसाः ॥ २६ ॥ तत स ववृधे तत्र सुमत्या परिपालित । कालेनाल्पेन कसारि शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ ३० ॥ सूर्य के समान तेजस्वी उन ईश्वर स्वरूप आगन्तुको को देखकर द्विजवर विष्णुयश ने उनका पूजन किया ॥२६॥ भले प्रकार सुपूजित हुए वे मुनिगण श्रेष्ठ आसनो पर सुखपूर्वक विराजे, तब उन्होने अपने पिता की गोद मे बैठे हुए भगवान के दर्शन किए ॥२७॥ उन ज्ञानी मुनीश्वरो ने मनुष्य रूप मे शिशु स्वरूप भगवान् को नमस्कार किया और तब उन्होने जान लिया कि कलिकाल के विनाशार्थ भगवान् श्री कल्कि का अवतार हुआ है ॥२८॥ फिर उनका सस्कार करते हुए उनका कल्कि नाम रखकर प्रसन्न मन से वे मुनीश्वर चले गये ॥२६॥ फिर कसारि भगवान् माता सुमति के द्वारा भले प्रकार लालित-पालित

( २७० )

होते हुए शुक्लपक्ष के चन्द्रमा के समान प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होने लगे ॥३०॥ कल्केर्ज्येष्ठास्त्रय शूरा कवि प्राज्ञ सुमन्त्रका । पितृमातृप्रियकरा गुरुविप्रप्रतिष्ठिता ॥ ३१ ॥ कल्केरशा पुरो जाता. साधवो धर्म्मतत्परा । गार्ग्यभर्ग्यविशालाद्या ज्ञातयस्तदनुव्रता ॥ ३२ ॥ विशाखयूप भूपाल पालितास्तापवर्जिता । ब्राह्मणा कल्किमालोक्य परा प्रीतिमुपागता. ॥ ३३ ॥ ततो विष्णुयशा पुत्र धीर सर्वगुणाकरम् । कल्कि कमलपत्राक्ष प्रोवाच पठनाहृतम् ॥ ३४ ॥ तात ते ब्रह्मसस्कार यज्ञसूत्रमनुत्तमम् । सावित्री वाचयिष्यामि ततो वेदान्पठिष्यसि ॥ ३५ ॥ भगवान् कल्कि के उत्पन्न होने से पहले माता-पिता को प्रिय, गुरु-ब्राह्मण का हित करने वाले इनके तीन भाई और उत्पन्न हो चुके थे । उनके नाम कवि, प्राज्ञ और सुमन्त्रक थे । भगवान् के ही अंश से उनकी जाति मे, उनके अनुगामी, साधु स्वभाव वाले एव धार्मिक प्रवृत्ति वाले गार्ग्य, भर्ग्य और विशाल आदि भगवान् से पहिले ही उत्पन्न हो चुके थे ॥३१-३१॥ विशाखयूप-नरेश द्वारा परिपालित यह सभी ब्राह्मण भगवान् का दर्शन करके सम्पूर्ण पाप-ताप से छूटकर अत्यत हर्षित हुए ॥३३॥ फिर अपने कमलनयन एव सर्वगुण सम्पन्न पुत्र को अध्ययन करने के योग्य वय वाला हुआ देखकर विष्णुयश उनसे बोले ॥३४॥ हे पुत्र ! मै तुम्हारा श्रेष्ठ ब्रह्म सस्कार, उपनयन और सावित्री का श्रवण कराऊँगा, फिर तुम वेदाध्ययन करना ॥३५॥ को वेद का च सावित्री केन सूत्रेण सस्कृताः । ब्राह्मणा विदिता लोक तत्तत्त्व वद तात माम् ॥ ३६ ॥ वेदो हरेर्वाक् सावित्री वेदमाता प्रतिष्ठिता ।

( २७१ ) त्रिगुणञ्च त्रिवृत्सूत्र तेन विप्रा प्रतिष्ठिता ॥ ३७ ॥ दशयज्ञै सस्कृता ये ब्राह्मणा ब्रह्मवादिन । तत्र वेदाश्च लोकाना त्रयाणामिह पोषका ॥ ३८ ॥ यज्ञाध्ययन दानादि तप स्वाध्याय सयम । प्रीणयन्ति हरि भक्त्या वेद तन्त्र विधानत ॥ ३६ ॥ तस्माद्यथोपनयन कर्मणोऽह द्विजै सह । सस्कत्तु बान्धवजनैस्त्वामिच्छामि शुभे दिने ॥ ४० ॥ पिता के वचन सुनकर कल्कि भगवान् ने पूछा—वेद क्या है । सावित्री क्या है । किस सूत्र से सस्कारित पुरुष ब्राह्मण सज्ञक होता है ? हे तात ! यह सब मुझे बताइये ॥३६॥ पिता बोले—वेद भगवान् विष्णु की वाणी है, सावित्री ही प्रतिष्ठा एव वेद-माता है । त्रिगुण-सूत्र को त्रिवृत्ताकार करके धारण करने पर ब्राह्मण नाम से प्रतिष्ठित होता है ॥३७॥ तीनो लोको के पोषक एव दशयज्ञ द्वारा सस्कृत ब्रह्म- वादी जो ब्राह्मण है, उन्ही के पास वेद निवास करते है ॥३८॥ यही दश सस्कार वाले विप्र वेद, तन्त्र और शास्त्रादि के विधान से यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, स्वाध्याय, सयम आदि के सहित भक्ति करते हुए भगवान् को प्रसन्न करते है ॥३६॥ इसी लिए ब्राह्मणो, बाँधवो आदि के सहित किसी शुभ दिन मै तुम्हारा उपनयन सस्कार करना चाहता हू ॥४०॥ के च ते दश सस्कारा ब्राह्मणेषु प्रतिष्ठिता । ब्राह्मणा केन वा विष्णुमर्चयन्ति विधानत ॥ ४१ ॥ ब्रह्मण्या ब्राह्मणाज्जातो गर्भाधानादिसस्कृत । सन्ध्यात्रयेण सावित्री-पूजा-जप-परायणः ॥ ४२ ॥ तपस्वी सत्यवाग्धीरो धर्मात्मा त्राति ससृतिम् । विष्ण्वर्चनमिद ज्ञात्वा सदानन्दमयो द्विज ॥ ४३ ॥ कुत्रास्ते स द्विजो येन तारयत्यखिल जगत् । सन्मार्गेण हरिप्रीणान्कामदोग्धा जगत्त्रये ॥ ४४ ॥

( २७२ ) कल्कि भगवान् बोले—ब्राह्मण के लिए निश्चित किये गये वे दश-सस्कार कौन-कौन से है ? किस विधान से ब्राह्मण भगवान् विष्णु की अर्चना किया करतें है ? ॥४१॥ विष्णुयश बोले—हे पुत्र ! ब्राह्मण के द्वारा ब्राह्मणी मे गर्भाधान सस्कार आदि से सस्कृत, त्रिकाल सध्या एव सावित्री की पूजा और जप मे परायण, तपस्वी, सत्यवक्ता, धीर धर्मात्मा ब्राह्मण भगवान् विष्णु की अर्चना विधि को भले प्रकार जानकर आनन्द मे निमग्न रहता हुआ सदैव इस सृष्टि क रक्षक होता है ॥४२-४३॥ भगवान् ने कहा-हे तात ! जो ब्राह्मण सम्पूर्ण विश्व का उद्धारक, साधुमार्ग-परायण, भगवान् विष्णु को उपासना द्वारा प्रसन्न करने वाला और तीनो लोको की कामना पूर्ण करने वाला है, वह ब्राह्मण कहाँ है ? ॥४४॥ कलिना बलिना धर्म घातिना द्विज पातिना । निराकृता धर्मरता गता वर्षान्तरान्तरम् ॥ ४५ ॥ ये स्वल्पतपसो विप्रा स्थिता कलियुगान्तरे । शिश्नोदरभृतोऽधर्मनिरता विरत क्रिया ॥ ४६ ॥ पापसारा दुराचारास्तेजोहीना कलाविह । आत्मान रक्षितु नैव शक्ता शूद्रस्य सेवका ॥ ४७ ॥ इति जनकवचो निशम्य कल्कि. कलिकुलनाशमनोऽ भिलाषजन्मा द्विजनिजवचनैस्तदोपनीतोगुरुकुलवासमुवास साधुनाथ. ॥ ४८ ॥ पिता बोले—धर्मघाती और ब्राह्मणो के हिंसक महाबली कलि के द्वारा पीडित हुये विप्र गण अन्य देश को चले गये ॥४५॥ स्वल्प तप वाले जो ब्राह्मण इस कलिकाल मे यहाँ स्थित रहे, वे सब शिश्नो- दर धर्मी होकर धर्म और कर्म से विरत हो गये ॥४६॥ पाप युक्त, दुराचारी एव तेज-रहित ब्राह्मण इस कलिकाल मे आत्म-रक्षा मे अशक्त एव शूद्रो के सेवक बन गये है ॥४७॥ पिता के यह वचन सुन कर कल्कि भगवान् ने कलि को नष्ट करने का निश्चय किया । ब्राह्मणो ने अपनी वाणी द्वारा उनका उपनयन सस्कार किया । और तब भगवान् कल्कि गुरुकुल में निवास हेतु गये ॥४८॥

तृतीय अध्याय ततो वस्तु गुरुकुले यान्त कल्किं निरीक्ष्य स । महेन्द्राद्रिस्थितो रामः समानीयाश्रम प्रभु ॥१॥ प्राह त्वा पाठयिष्यामि गुरुं मा विद्धि धर्मत' । भृगु वंश समुत्पन्न जामदग्न्य महाप्रभुम् ॥२॥ वेद वेदाङ्ग तत्वज्ञ धनुर्वेद विशारदम् । कृत्वा निःक्षत्रिया पृथिवी दत्वा विप्राय दक्षिणाम् ॥३॥ महेन्द्राद्रौ तपस्तत्तु मागतोऽहद्विजात्मज । त्व पठात्र निज वेद यच्चान्यच्छास्त्रमुत्तमम् ॥४॥ इति तद्वच आश्रुत्य सप्रहृष्टतनूरूह । कल्कि. पुरो नमस्कृत्य वेदाधीतो ततोऽभवत् ॥५॥ सूतजी बोले — भगवान् कल्कि को गुरुकुल वास के लिए जाते देख कर महेन्द्र पर्वत निवासी परशुराम उन्हे अपने आश्रम मे ले गये ।१। वहाँ पहुँच कर परशुराम ने उनसे कहा—मैं भृगु वंश मे उत्पन्न, महर्षि जमदग्नि का पुत्र, वेद-वेदांग के तत्व की जानने वाला, धनुर्वेद-विद्या- विशारद परशुराम हूँ ।२। मैंने इस पृथिवी को क्षत्रिय-विहीन करके ब्राह्मणो को दक्षिणा स्वरूप दे डाली थी । अब तुम मुझे धर्म पूर्वक गुरु मानो, मैं तुमको शिक्षा दूँगा । हे द्विजात्मज ! मैं इस महेन्द्र पर्वत पर तपस्या करने के लिए आया हूँ, तुम यहाँ अपना वेदाध्ययन करो तथा अन्य जो भी कोई शास्त्र पढना चाहो, उसे पढो ।३-४। यह सुन कर भगवान् कल्कि ने आनन्द से गद्गद् होकर परशुराम को प्रणाम किया और फिर वेदाध्ययन करने लगे ।५। २७३

२७४ ] [ कल्कि पुराण साङ्गं चतुःषष्टिकलां धनुर्वेदादिकञ्च यत् । समधीत्य जामदग्न्यात्कल्किः प्राह कृताञ्जलिः ॥६॥ दक्षिणां प्रार्थय विभो ! या देया तव सन्निधौ । ययामे सर्वसिद्धिः स्याद्या स्यात्तव तोषकारिणी ॥७॥ ब्रह्मणा प्रार्थितो भूमन् ! कलिनिग्रहकारणात् । विष्णुः सर्व्वाश्रयः पूर्णः स जातः सम्भले भवान् ॥८॥ मत्तो विद्यां शिवाद्शस्त्रं लब्ध्वा वेदमयं शुकम् । सिंहले च प्रियां पद्मा धर्मान्संस्थापयिष्यसि । ६॥ जब भगवान् कल्कि चौंसठ कलाएं और सम्पूर्ण धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर चुके तब उन्होंने हाथ जोड कर परशुराम से कहा- ।६। हे विभो ! जिस दक्षिणा के देने से मुझे सर्वसिद्धि की प्राप्ति होगी और जिस दक्षिणा की प्राप्ति से आप संतुष्ट हो सकेंगे, वह दक्षिणा मुझे बताने की कृपा करिये ।७। परशुराम बोले-- हे भूमन् ! कलिकाल का नाश करने के लिए ब्रह्माजी ने जिन भगवान् श्री हरि से निवेदन किया था, वे ही आप भगवान् विष्णु शम्भल ग्राम मे अवतरित हुए हैं ।८ और मुझसे विद्या, भगवान् शंकर से शस्त्र और वेदमय शुक तथा सिंहल देश से अपनी पत्नी पद्मा को प्राप्त करके भूमण्डल पर धर्म की स्थापना करेंगे ।६। ततो दिग्विजयेभूपान् धर्महीनान् कलिप्रियान् । निगृह्य बौद्धांन् देवापिं मरुञ्च स्थापयिष्यसि ।१०। वयमेतैस्तु संतुष्टाः साधुकृत्यैः सदक्षिणाः । यज्ञं दानं तपः कर्म करिष्यामो यथोचितम् ।११। इत्येतद्वचनं श्रुत्वा नमस्कृत्य मुनिं गुरुम् । बिल्वोदकेश्वरं देवं गत्वा तुष्टाव शंकरम् ।१२। पूजयित्वा यथान्याय शिवं शान्तं महेश्वरम् । प्रणिपत्याशुतोषं तं ध्यात्वा प्राह हृदिस्थितम् ।१३।

तृतीय अध्याय ] [ २७५ फिर दिग्विजय द्वारा धर्म-विहीन और कलिप्रिय राजाओ और बौद्धो का सहार कर मरु और देवापि को प्रतिष्ठित करोगे । तुम्हारा यह साधुकृत्य ही मुझको सतुष्ट करने वाली दक्षिणा होगी, क्योकि तब हम तप, यज्ञ, दान, ध्यान, आदि सभी कर्म भले प्रकार से कर सकेगे ।१०- ११। यह सुन कर और गुरुवर परशुरामजी को नमस्कार करके कल्कि भगवान् बिल्वोदकेश्वर महादेव के मन्दिर मे गये और उन्हे सन्तुष्ट करने लगे ।१२। हृदय मे स्थित उन आशुतोष शान्त स्वरूप शिवजी का उन्होने विधिवत् पूजन किया और प्रणाम तथा ध्यान के पश्चात् निवेदन किया ।१३। गौरीनाथ विश्वनाथ शरण्यंभूतावास वासुकीकण्ठभूषम् । त्र्यक्ष पञ्चास्यादिदेव पुराणं वन्दे सान्द्रनन्दसन्दोहदक्षम् । योगाधीश कामनाश कराल गङ्गासङ्गाक्लिन्नमूर्द्धानमीशम् । जटाजूटाटोपरिक्षिप्तभाव महाकाल चन्द्रभाल नमामि ॥ श्मशानस्थभूतबेतालसङ्ग नानाशस्त्रै. खड्गशूलादिभिश्च । व्यग्रात्युग्रा बाहवो लाकनाशे यस्य क्रोधोद्भूतलोकोऽनमेति । यो भूतादि पञ्चभूतंसिसृक्षु. तन्मात्रात्मा काल कर्मस्वभावे प्रहृत्येद् प्राप्य जीवत्वमीशो ब्रह्मानन्दो रमते त नमामि ॥ स्थितौ विष्णु सर्वजिष्णुः सुरात्मा लोकान् साधून् धर्ममेतून् बिभर्ति। ब्रह्माद्याशे योऽभिमानी गुणात्मा शब्दाद्यङ्गैस्तपरेश नमामि । यज्ञस्या वायवो वान्ति लोके ज्वलत्याग्नि सविता यातितप्यन् । शीताशु खेतारकैः सग्रहैश्च प्रवर्तते त परेश प्रपद्ये । यस्याश्वासात् सर्वधात्री धरित्री देवो वर्षत्यम्बु काल.- प्रमाता । मेरुमध्ये भुवनानाञ्च भर्त्ता तमीशानविश्वरूप नमामि ।१४-२०। कल्किजी ने कहा--हे गौरीपते ! हे विश्वेश्वर ! हे शरणागत- वत्सल ! हे सर्वभूताश्रय ! हे वासुकी नाग का कण्ठभूषण धारण करने

२७६ ] [ कल्किपुराण वाले प्रभो ! हे त्रिनेत्र ! हे पञ्चवदन ! हे पुराण पुरुष ! हे सघन आनन्द- दक्ष आदिदेव ! आपको नमस्कार है ।१४। हे योगाधीश्वर ! आप काम- देव का नाश करने वाले, कराल दशन, गगतरंग से समुज्ज्वल मूर्द्धा वाले, जटाजूट टोप युक्त, परिक्षिप्त भाव वाले महाकाल है । हे चन्द्रभाल ! आपको नमस्कार है ।१५। हे प्रभो ! आप भूत वेतालों के सहित श्मशान मे निवास करते हैं । आप अपनी भयानक भुजाओ मे विभिन्न प्रकार के शस्त्रास्त्र धारण करते हैं । प्रलय काल मे यह समस्त विश्व आपकी ही क्रोधानल मे भस्मीभूत हो जाता है ।१६। आप ही भूतादि तन्मात्रा रूप पञ्च भूत एव काल-कर्म-स्वभावानुसार सृष्टि रचना करते और अन्त मे प्रलय करके जीवत्व को प्राप्त होकर ब्रह्मानन्द मे रमण करते है, ऐसे आपको मेरा नमस्कार है ।१७। आप ही सुरात्मा विश्व के पालनार्थ विष्णु स्वरूप लेकर धर्म सेतु स्वरूप साधुओ की रक्षा करते हैं। आप ही शब्दादि अवयवो के द्वारा सगुण रूप ब्रह्माजी के अग रूप होते है। ऐसे आप परमेश्वर को नमस्कार है ।१८। आपकी आज्ञा से, वायु बहता, अग्नि प्रज्वलित होता, सूर्य प्रकाशित होता और तारागण के सहित चन्द्रमा उदित होता है । ऐसे आपको मैं शरण लेता हूँ ।१९। जिन की आज्ञा से पृथिवी विश्व को धारण किये है और मेघ समय पर वर्षा करते हैं तथा जो सब लोको क भरण करने वाले हैं, ऐसे आप ईशान एव विश्वरूप भगवान शकर को नमस्कार करता हूँ ।२०। इति कल्किस्तवं श्रुत्वा शिवः सर्वार्त्तिदर्शनः साक्षात् प्राह हसन्नीश. पार्वतीसहितोग्रत ।२१। कल्के. सम्स्पृश्य हस्तेन समस्तावयवं मुदा । तमाह वरय प्रेष्ठ ! वरं यत्तेऽभिकांक्षितम् ।२२। त्वया कृतमिद स्तोत्र ये पठन्ति जना भुवि । तेषां सर्वार्थसिद्धिः स्यादिह लोके परत्र च ।२३। विद्यार्थी चाप्नुयाद्विद्यां धर्मार्थी धर्ममाप्नुयात् । कामानवाप्नुयात् कामी पठनाच्छ्रवणादपि ।२४।

तृतीय अध्याय ] [ २७७ त्व गारुडमिद चाश्व कामग बहुरूपिणम् । शुकमेतञ्च सर्वज्ञ मया दत्त गृहाण भो ।२५। भगवान् कल्कि का स्तोत्र सुन कर सर्वात्मा भगवान् शङ्कर पार्वती सहित साक्षात् रूप मे प्रकट हुये-उन्होने आनन्दित होकर भगवान् कल्कि के देह पर कर स्पर्श करते हुए घोर मुसकराते हुए कहा-हे श्रेष्ठ ! अपना इच्छित वर मागो ।२१-२२। तुम्हारे द्वारा रचित इस स्तोत्र का का भू-मण्डल मे जो भी कोई पाठ करेगा, उसकी इहलौ- किक और पारलौकिक सभी कामनाएँ पूर्ण होगी ।२३। इस स्तोत्र के पढने सुनने से विद्यार्थी को विद्या, धर्मार्थी को धर्म और अन्य कामना वाले को उसकी उसी कामना की प्राप्ति होती है ।२४। हे कल्कि ! मैं तुम्हे यह शीघ्रगामी, अनेक रूप धारी, गरुड़ अश्व युक्त सर्वज्ञ शुक प्रदान करता हूँ, इन्हे ग्रहण करो ।२५। सर्व शास्त्रास्त्रविद्वास सर्व वेदार्थपारगम् । जयिन सर्वभूताना त्वां वदिष्यन्ति मानवा ।२६। रत्नत्सरु करालञ्च करवालं महाप्रभम् । गृहाण गुरुभारायाः पृथिव्या भारसाधनम् ।२७। इति तद्वच आश्रुत्य नमस्कृत्य महेश्वरम् । शम्बलग्राममगमत् तुरगेण त्वरान्वितः ।२८। पितरं मातर भ्रातृन् नमस्कृत्य यथाविधि । सर्व तद्वर्णयामास जामदग्न्यस्य भाषितम् ।२६। शिवस्य वरदानञ्च कथयित्वा शुभा कथा । कल्किः परमतेजस्वी ज्ञातिभ्योऽथवदन्मुदा । हे कल्कि ! मनुष्यो मे तुम सर्व शास्त्रज्ञ, सर्व शस्त्रास्त्र विशारद, सर्व वेदो मे पारगामी एव सर्व भूतो मे विजयी कहे आओगे ।२६। यह रत्नत्सरु नामक महा कराल, अत्यन्त चमकती हुई, अत्यन्त भारी और पृथिवी के भार को सँभालने वाली तलवार ग्रहण

२७८ ] [ कल्किपुराण करो ।२७। भगवान् महेश्वर के वचन सुन कर कल्कि ने उन्हे प्रणाम किया और अश्व पर आरूढ होकर द्रुतगति से शभल ग्राम मे जा पहुंचे- ।२८। वहाँ पहुँच कर उन्होने अपने पिता, माता, भ्राता आदि को विधि- वत् नमस्कार कर परशुराम जी के कहे हुए सब वचन उन्हे सुनाये ।२६। फिर शिवजी द्वारा प्राप्त हुए वरदान की चर्चा की और अपने जाति वालो के मध्य स्थित होकर प्रसन्न हृदय से श्रेष्ठ कथा कहने लगे .३०। गार्ग्यभर्ग्यविशालाद्यास्तच्छ्रुत्वा नन्दिता स्थिता. । कथोपकथन जात शम्भलग्रामवासिनाम् ।३१। विशाखयूपभूपाल श्रुत्वा तेषाञ्च भाषितम् । प्रादुर्भाव हरेर्मेने कलिनिग्रहकारकम् ।३२। माहिष्मत्या निजपुरे यागदानतपोव्रतान् । ब्राह्मणान् क्षत्रियान् वैश्यान् शूद्रानपि हरे प्रियान् ।३३। स्वधर्मनिरतान् दृष्ट्वा धर्मिष्ठोऽभून्नृप. स्वयम् । प्रजापालः शुद्ध मनाः प्रादुर्भावात् श्रियः पतेः ।३४। अधर्मवश्यास्तान् दृष्ट्वा जनान् धर्मक्रियापरान् । लोभानृतादयो जग्मुस्तद्देशाद्दु खिता भयम् ।३५। उनके द्वारा वर्णित कथा सुन कर गार्ग्य, भर्ग्य और विशाल आदि अत्यन्त प्रसन्न हुए । कथा शभल ग्राम मे परस्पर कही जाती हुई अधिक प्रचारित हो गई ।३१। शभल ग्राम के लोगो से ही यह चर्चा विशाखयूपराज ने सुनी और उन्होने जान लिया कि भगवान् कल्कि ने कलि का निग्रह करने के लिए पृथिवी पर अवतार ले लिया है ।३२। उसकी माहिष्मती नगरी मे यज्ञ, दान, तपस्या और व्रतादि करने वाले सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भगवान के प्रीति पात्र हुए ।३३। रमापति भगवान् के अवतार लेने पर सभी वर्ण अपने-अपने धर्म मे तत्पर हुए तथा राजा भी प्रजापालक, पवित्र मन वाला, धार्मिक हुआ ।३४। उस नगरी के निवासियों को धर्म मे तत्पर देख कर लोभ,

तृतीय अध्याय ] [ २७६ असत्य और अधर्म के वशज भय से दुःखित होकर वहाँ से पलायन कर गये ।३५। जैत्रं तुरगमारुह्य खड्गञ्च विमलप्रभम् । दशितं, सशरं चापं गृहीत्वागात् पुराद्वहि ।३६। विशाखयूपभूपालः प्रायात् साधुजनप्रियः । कल्कि द्रष्टु हरेरंशाविर्भूतञ्च शम्भले ।३७। कवि प्राज्ञ सुमन्तञ्च पुरस्कृत्य महाप्रभुम् । गार्ग्य-भर्ग्य विशालैश्च ज्ञातिभि परिवारितम् ।३८। विशाखयूपो ददृशे चन्द्र तारागणैरिव । पुराद्बहि सुरैर्यद्वन्दिन्द्रमुच्चैःश्रव स्थितम् ।३६। विशाखयूपोऽवनतः सप्रहृष्टतनूरूहः । कल्केरालोकनात् सद्यः पूर्णात्मा वैष्णवोऽभवत् ।४०। भगवान् कल्कि तीक्ष्ण तलवार, धनुष और श्रेष्ठ बाणो को धारण कर शिव-प्रदत्त अश्व पर आरूढ होकर नगरी से बाहर चल दिये ।३६। सत जनो से स्नेह करने वाले विशाखयूप नरेश शभल ग्राम में अव- तरित भगवान् के दर्शनार्थ उपस्थित हुए ।३७। उस समय अत्यन्त प्रभाव वाले कवि प्राज्ञ, सुमन्त्र और गार्ग्य विशालादि से घिरे हुए तथा तारागण सहित चन्द्रमा और देवताओं सहित उच्चैःश्रवा के समान अश्व पर चढे कल्कि भगवान् को विशाखयूप नरेश ने नगर के बाहर निकलते देखा ।३८-३६। कल्कि भगवान को देखते ही रोमाञ्चित हुए राजा झुकते हुए पूर्ण वैष्णवत्व को प्राप्त होगया ।४०। सह राज्ञा वसन् कल्कि धर्मोनाह पुरोदितान् । ब्राह्मणाक्षत्रियविशामाश्रमाणां समासतः ।४१। ममाशान् कलिविभ्रष्टानिति मज्जन्मसङ्गतान् । राजसूयाश्वमेधाभ्यां मा यजस्व समाहितः ।४२। अयमेव परो लोको धर्मश्चाह सनातनः । कालस्वभावसस्काराः कर्मानुगतयो मम ।४३।

२८० ] [ कल्किपुराण सोमसूर्यकुले जातौ देवापिमरुसंज्ञकौ । स्थापयित्वा कृतयुगं कृत्वा यास्यामि सद्गतिम् ।४४। इति तद्वचनं श्रुत्वा राजा कल्कि हरि प्रभुम् । प्रणम्य प्राह सद्धर्मान् वैष्णवान् मनसेप्सितान् ।४५। इति नृपवचन निशम्य कल्कि कलिकुलनाशनवासनावतार । निजजनपरिषद्विनोदकारीमधुरवचोभिराह साधुधर्मान् ।४६म। राजा से वार्तालाप करते हुए भगवान् कल्कि ने ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य तथा आश्रमादि के धर्मों का सक्षिप्त रूप से वर्णन किया ।४१। कल्कि बोले – हमारे जो अंश कलि से प्राप्त पाप के द्वारा भ्रष्ट होगये थे, वे हमारे अवतरित होनेपर धर्म मार्ग पर आ गये हैं। हे राजन् ! तुम राजसूय या अश्वमेध यज्ञ करते हुए मेरी आराधना करो ।४२। मै ही परलोक हूँ, सनातन धर्म मे ही हूँ, काल, स्वभाव और सस्कार सभी मेरे कर्म के अनुगत रहते हैं ।४३। मैं चन्द्रवंश और सूर्यवंश मे क्रमश उत्पन्न देवापि और मरु नामक राजाओ को स्थापित करके तथा इस युग को सतयुग रूप करके सद्गति को प्राप्त हूँगा ।४४। यह सुनकर विशाखयूप नरेश ने भगवान कल्कि को प्रणाम किया और उनसे वैष्णव धर्म का प्रसग कहने का अनुरोध किया ।४५। राजा की कामना सुन कर कलिकुल का नाश करने की इच्छा से भूमण्डल पर अवतरित भगवान् कल्कि अपने परिजनो और अनुयायियो के हृदयो को आनन्दित करने वाली मिष्ठ वाणी से साधु धर्म की व्याख्या करने लगे .४६। — ❀ —

चतुर्थ-अध्याय 1 ततः कल्कि सभा मध्ये राजामानो रवियथा । बभाषे तं नृप धर्म-मयो धर्मान् द्विज प्रियान् ।१। कालेन ब्रह्मणो नाशे प्रलये मयि सङ्गताः । अहमेवासमेवाग्रे नान्यत् कार्यमिदं मम ।२। प्रसुप्तलोकतन्त्रस्य द्वैतहीनस्य चात्मन । महानिशान्ते रन्तु मे समुद्भूतो विराट् प्रभुः ।३। सहस्रशीर्षा पुरुषा सहस्राक्षः सहस्रपात् । तदङ्गजोऽभवद्ब्रह्मा वेदवक्रो महाप्रभुः ।४। सूतजी बोले मुनीश्वरो ! उस समय सभा के मध्य मे भगवान् कल्कि सूर्य के समान विराजमान होकर विशङ्खयूप नरेश के प्रति धर्म- प्रसङ्ग कहने लगे ।१। कल्कि बोले—कालान्तर मे जब यह ब्रह्माण्ड नाश को प्राप्त होगा तब प्रलय होने पर मुझ मे विलोन हो जायगा । सृष्टि से पूर्व मैं ही विद्यमान था, अन्य कुछ भी नही था । इस सम्पूर्ण जगत् का कारण मैं ही हूँ ।२। सम्पूर्ण विश्व की प्रसुप्ति और द्वैतहीना- त्मिका महा रात्रि का अन्त होने पर मैं सर्वशक्ति सम्पन्न विराट्र्मूर्ति रूप मे आविर्भूत होता हूँ ।३। वह विराट्मूर्त्ति सहस्र मस्तक, सहस्र नेत्र और सहस्र चरण वाली हुई, उसी मूर्ति के अङ्ग से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए ।४। जीवोपाधेर्ममांशाच्च प्रकृत्या मायया स्वया । ब्रह्मोपाधिः स सर्वज्ञो मम वाग्वेदशासितः ।। २८१

२८२ ] [ कल्किपुराण ससर्ज जीव जातानि कालमाया शयोगतः देवा मन्वादयो लोका स प्रजापतयः प्रभुः ॥६॥ गुणिन्‍या मायायाशा मे नानोपाधौ ससजरे । सोपाधय इमे लोका देवा सस्थाणुजङ्गमाः ॥७॥ ममांशा मायया सृष्टा यतो मय्याविशन् लये । एवविधा ब्राह्मणा ये मच्छरीरा मदात्मिकाः॥८॥ मामुद्धरन्ति भुवने यज्ञाध्ययनसत्क्रियाः । मां प्रसेवन्ति शसन्ति तपोदानक्रियास्विह ॥६॥ स्मरन्त्यामोदयन्त्येव नान्ये देवादयस्तथा । ब्राह्मणा वेदवक्तारो वेदा मे मूर्तयः पराः ॥१०॥ ब्रह्म उपाधि वाले सर्वज्ञपुरुष ने मेरी वेद वाणी के शासनानुसार मेरी माया प्रकृति की शक्ति, काल और अंश के सम्मिश्रण से इस जीवो- पधारी जाति को प्रकट किया । इस प्रकार मनु आदि प्रजापतियों के सहित देवता प्रकट हुए।५-६। मेरे अंश से त्रिगुणात्मिका माया अनेक प्रकार की उपाधि धारण करके इस लोक में देवता एव स्थावर जंगम सृष्टि प्रकट करती है ।७। माया सृष्टि का रचियता मेरा अंश अन्त मे मुझ में ही लय हो जाता है । इसी प्रकार ब्राह्मण मेरे ही आत्म स्वरूप एव देह हैं ।८। क्योकि ब्राह्मण यज्ञ वेदाध्ययन आदि श्रेष्ठ कार्यों के द्वारा मेरा उद्धार तथा तप दानादि द्वारा मेरी सेवा करते हैं ।६। वेदवक्ता ब्राह्मण जिस प्रकार स्मरण द्वारा मुझे प्रसन्न करते हैं, उस प्रकार देवतादि अन्य कोई भी मुझे प्रसन्न नहीं करते, क्योकि वेद ही मेरी परम मूर्ति है ।१०। तस्मादिमे ब्राह्मणाजास्तै पुष्टस्त्रिजगज्जनाः । जगन्तिमे शरीराणि तत्पोषे ब्रह्मणो वरः ॥११॥ तेनाहं तान्ममस्यामि शुद्धसत्वगुणाश्रयः। ततो जगन्मय पूर्वं मां सेवन्तेऽखिलाश्रयाः ॥१२॥

चौथा अध्याय ] [ २८३ विप्रस्य लक्षणं ब्रूहि त्वद्भक्तिं का च तत्कृता । यतस्तवानुग्रहेण वाग्बाणा ब्राह्मणा कृता ॥१३॥ वेदा मामीश्वरं प्राहुरव्यक्तं व्यक्तिमत्परम् । ते वेदा ब्राह्मणामुखे नानाधर्मे प्रकाशिताः ॥१४॥ यो धर्मो ब्राह्मणानां हि सा भक्तिर्मम पुष्कला । तयाहं तोषितः श्रीशः संभवामि युगे-युगे ॥१५॥ ब्राह्मण द्वारा वेदाध्ययन से तीनो लोको के निवासी पुष्टि को प्राप्त हो रहे हैं, प्राणी रूप मेरे देह को श्रेष्ठ ब्राह्मण ही पुष्ट करने हैं ॥११॥ इसलिए शुद्ध सत्वगुण का आश्रिन हुआ मैं ब्राह्मणो को मैं नमस्कार करता हूँ, तब ब्राह्मण भी मुझे विश्वमय समझ कर कर ही मेरी सेवा करते हैं ॥१२॥ विशाखयूप नरेश ने कहा-हे प्रभो ! आप मेरे प्रति ब्राह्मणों के लक्षण कहिये । वे आपकी भक्ति किस प्रकार करते हैं, जिस भक्ति को करके वे आपके अनुग्रह से वाग्बाण स्वरूप हो जाते हैं ॥१३॥ कल्कि बोले-हे राजन् ! अव्यक्त एव वेद ही मेरे ईश्वर हैं । ब्राह्मण के मुख मे यह वेद विभिन्न कर्मों का प्रकाश करते हैं ॥१४॥ ब्राह्मणों का धर्माचरण मेरे प्रति भक्ति रूप मे प्रकट है । उनकी उसी भक्ति से संतुष्ट होकर मैं युग-युग मे प्रकट होता हूँ ॥१५॥ ऊर्द्ध्वन्तु त्रिवृतं सूत्रं सधवार्निर्मितं शनैः । तन्तुत्रयमधोवृत्तं यज्ञ सूत्रं विदुर्बुधाः ॥१६॥ त्रिगुणं तद्ग्रन्थियुक्तं वेदप्रवरसंमितम् । शिरोधरात् नाभिमध्यात् पृष्ठाद्धं परिमाणकम् ॥१७॥ यजुर्विदां नाभिभितं सामगानामयं विधिः । वामस्कन्धेन विधृतं यज्ञ सूत्रं बलप्रदम् ॥१८॥ मृद्भस्मचन्दनाद्यैस्तु धारयेत् तिलक द्विजः । भाले त्रिपुण्ड्रं कर्माङ्गं केश पर्यन्तमुज्ज्वलम् ॥१६॥ पुण्ड्रमंगुलिमानन्तु त्रिपुण्ड्रं तत् त्रिधा कृतम् । ब्रह्मविष्णुशिवावासं दर्शनात् पापनाशनम् ॥२०॥

२८४ ] [ कल्किपुराण ज्ञानियों का कहना है कि ब्राह्मण की सधवा नारी के द्वारा सूत्र को त्रिवृत्त करे तथा उस त्रिवृत सूत्र को पुनः तिवृत करे यही यज्ञ सूत्र है। १६। वेद प्रवर युक्त उस सूत्र में गाँठ लगावे। यजुर्वेदी ब्राह्मण को यही यज्ञोपवीत कण्ठ से नाभि तक तथा पृष्ठ के आधे भाग तक धारण करे। सामवेदी ब्राह्मण को नाभि तक धारण करना चाहिए। यज्ञोपवीत बाँये कन्धे पर धारण करने से बल का देने वाला होता है- ।१७-१८। द्विज को मृत्तिका भस्म और चन्दनादि का तिलक लगाना चाहिये। मस्तक पर केश पर्यन्त उज्ज्वल त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये। १६। पुण्ड्र का प्रमाण एक अंगुल और त्रिपुण्ड्र इससे तिगुना होता है। त्रिपुण्ड्र में ब्रह्मा, विष्णु और शिव निवास करते हैं। यह दर्शन करते ही पाप का नाश करने में समर्थ है। २०। ब्राह्मणाना करे स्वर्गा वाचो वेदा करे हरिः । गात्रे तीर्थानि रागश्च नाडीषु प्रकृतिस्त्रिवृत् ।२१ सावित्री कण्ठकुहरे हृदय ब्रह्म सहितम् । तेषा स्तनान्तरे धर्मं पृष्ठोऽधर्म. प्रकीर्तितः ।२२। भू देवा ब्राह्मणा राजन् ! पूज्या वन्द्या सदुक्तिभि । चतुराश्रम्यकुशला मम धर्म, प्रवर्त्तका. ।२३। बालाश्चापि ज्ञानवृद्धास्तपोवृद्धा मम प्रियाः । तेषा वच पालयितुमवतारा कृता मयाः ।२४। महाभाग्य ब्राह्मणाना सर्वपापप्रणाशनम् । कलिदोषहर श्रुत्वा मुच्यते सर्वतो भयात् ।२५। ब्राह्मणों के हाथों में स्वर्ग और भगवान् विष्णु निवास करते हैं वाणी में वेद देह में तीर्थ और राग तथा नाडी में त्रिगुणात्मिका प्रकृति है। २१। ब्राह्मणों के कण्ठ में सावित्री, हृदय में ब्रह्म वक्षस्थल के मध्य में धर्म एवं पृष्ठ देश में अधर्म का निवास रहता है। २२। हे राजन् ! चारों आश्रमों के धर्म को जानने वाले, मेरे धर्म के प्रवर्त्तक—

कलिकपुराण ] [ २८५ देवता ब्राह्मण श्रेष्ठ वनशो के द्वारा वन्दनीय हैं ।२३। ज्ञानवृद्ध और ब्राह्मणो के बालको के प्रति मैं अत्यन्त प्रेम करता और उनके वचन पालनार्थ ही अवतार धारण करता हूँ ।२४। सभी पापो का नाशक, कलि काल के दोषो का हरण करने वाला ब्राह्मणो के महाभाग्य रूपी चरित्र को सुनने से सदा सब भय नष्ट हो जाते हैं ।२५। इति कलिकवचः श्रुत्वा कलिदोषविनाशनम् । प्रणम्य तं शुद्धमनाः प्रययौ वैष्णवाग्रणीः ।२६। गते राजानि सन्ध्यायां शिवदत्तशुको बुधः । चरित्वा कलिकनुगतः स्तुत्वा तं पुरतः स्थितः ६७। तं शुकं प्राह कलिकस्तु सस्मितं स्तुतिपाठकम् । स्वागतं भवता कस्मात् देशात् किं खादितं ततः ।२८। शृणु नाथ ! वचो मह्यं कौतूहलसमन्वितम् । अहं गंतश्च जलधेर्मध्ये सिंहल संज्ञके ।२६। यथा वृत्तं द्वीप गते तच्चित्रं श्रवणप्रियम् । बृहद्रथस्य नृपतेः कन्यायाश्चरितामृतम् ।३०। कलियुग के दोषो को नष्ट करने वाले भगवान् कलिक के वचन सुनकर पवित्र हृदय वैष्णव श्रेष्ठ राजा उन्हें प्रणाम करके चला गया ।२६। राजा के चले जाने पर शिव प्रदत्त ज्ञानी शुक संध्या के समय भ्रमण से लौटकर भगवान् कलिक के समक्ष स्तुति करके खड़ा हुआ । उनके स्तोत्र-पाठ को सुन कर कलिक भगवान् बोले—तुम किधर से आ रहे हो ? तुमने वहाँ क्या भोजन किया ? शुक बोला—हे नाथ ! आप मुझसे कौतुकमय वाणी सुनिये । मैं समुद्र के मध्य स्थित सिंहल द्वीप में गया था ।२६। उस द्वीप में घटित वृत्तान्त सुनने में बड़ा अच्छा है । राजा बृहद्रथ की कन्या का चरित्र अमृत के समान श्रेष्ठ है ।३०। कौमुद्यामिह जाताया जगतां पापनाशनम् । चरितं सिंहले द्वीपे चातुर्वर्ण्यजनावृते ।३१।

२८६ ] [ कल्किपुराण

प्रासाद-हर्म्य-सदन-पुर-राजि-विराजिते । रत्न-स्फटिक-कुडद्यादि-स्वलताभिभूषिते ।३२। स्त्रीभिरुत्तमवेशाभिः पद्मिनीभि समावृते । सरोभि सारसैहंसरुपकूलजलाकुले ।३३। भृङ्ग रङ्ग प्रसङ्गाढ्ये पद्म कल्हारकुन्दकैः । नानाम्बुजलताजाल-वनोपवन-मण्डिते ।३४। देशे बृहद्रथो राजा महाबलपराक्रमः । तस्य पद्मावती कन्या धन्या रेजे यशस्विनी ।३५।

इस कन्या ने रानी कौमुदी के गर्भ से जन्म लिया है । इसका चरित्र श्रवण से पाप नाशक है । उस द्वीप मे चारो वर्ण के मनुष्यो का निवास है । ३१। भवन, अटारी, गृह युक्त नगर मे वहाँ का राजा सुशो- भित है । उसका भवन रत्न, स्फटिक, मणि तथा स्वर्ण आदि की पच्ची- कारी से विभूषित हो रहा है ।३२। वहाँ पद्मिनी प्रभृति स्त्रियाँ श्रेष्ठ वस्त्रादि से सुशोभित रहती हैं । सरोवरों मे सारस और हंस आदि पक्षी कलोल करते हैं । ।३३। वह द्वीप विभिन्न प्रकार की पद्मलताओ के जालो से सुशोभित है । उपवनो मे कल्हार, कुन्द आदि के पुष्पो पर भोरे गुंजार करते हैं ।३४। वहाँ का राजा बृहद्रथ महाबली और पराक्रमी है । उसकी पद्मावती नाम की कन्या भी अत्यन्त यशस्विनी है ।३५।

भुवने दुर्लभा लोकेऽप्रतिमा वरवर्णिनी । काम मोह करी चारु चरित्रा चित्र निर्मिता ।३६। शिव सेवापरा गौरी यथा पूज्या सुसम्मता । सखीभिः कन्यकाभिश्च जप ध्यान परायणा ।३७। ज्ञात्वा ताञ्च हरेर्लक्ष्मीं समुद्भूतां वराङ्गप्राम् । हरः प्रादुरभूत्साक्षात्पार्वत्या मह हर्षित ।३८। सा तमालोक्य वरदं शिव गौरी समन्वितम् । लज्जिताधोमुखी किञ्चन्नोवाच पुरतः स्थिता ।३६।

चतुर्थ अध्याय ] [ २८७ हरस्तामाह सुभगे ! तव नारायण पति । पाणि ग्रहीष्यति मुदा नान्यो योग्यो नृपात्मज ।४०। श्रेष्ठ मुख वाली,सुन्दर चरित्रमयी, कामदेव को भी मोहित करने वाली उस कन्या की समानता ससार मे कोई नही कर सकता ।३६। जिस प्रकार गिरिजा भगवान शकर की सेवा परायण है, उसी प्रकार पूज- नीया पद्मावती अपनी सखियो के साथ जप ध्यान-परायण रहती हैं । ।३७। भगवान विष्णु की प्रिया लक्ष्मी जी को पद्मावती के रूप मे उत्पन्न हुई जानकर पार्वती जी के साथ भगवान शकर वहाँ पधारे ।३८। वरदाता शिवजी को पार्वती जी के सहित आये देख कर उस कन्या ने लज्जा से शिर नीचा कर लिया और अवाक् खडी रही ।३६। तब शिवजी बोले— हे सुभगे ! तुम्हारे पति भगवान नारायण ही तुम्हारा पाणि ग्रहण करेगे । क्योकि अन्य कोई राजकुमार तुम्हारे योग्य नही है ।४०। कामभावेन भुवने ये त्वा पश्यन्ति मानवा । तेनैव वयमा नार्यो भविष्यन्त्यपि तत्क्षणात् ।४१। देवासुरास्तथा नागा गन्धर्वाश्चारणादयः । त्वया रन्तु तथाकाले भविष्यन्ति किल स्त्रियः ।४२। विना नारायण देव त्वत्पाणिग्रहणार्थिनम् । गृह याहि तपस्त्यक्त्वा भाग्यस्तननुत्तमम् ।४३। मा क्षोभये हरेः पत्नि कमले विमल कुरु । इति दत्वा वर सोयस्तत्रैवान्तर्दधे हर ।४४। हरवरमिति सा निशम्य पद्मा समुचितमात्मनोरथ प्रकाशम् । विकसितवदना प्रणम्य सोम निजजन कालयभाविवेश रामा मृत्युलोक के वासी जो मनुष्य तुम्हारी ओर काम भाव से दृष्टि पात करेगे, वे तत्काल अपनी आयु के अनुकूल स्त्रीत्व भाव को प्राप्त हो जायेंगे ।४१। देवता, दैत्य, नाग, गधर्व चारण आदि मे भी जो कोई तुम पर कुदृष्टि डालेगे वे भी स्त्रीत्व को उसी समय प्राप्त होगे ।४२।