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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

कलिकपुराण ] [ २८५ देवता ब्राह्मण श्रेष्ठ वनशो के द्वारा वन्दनीय हैं ।२३। ज्ञानवृद्ध और ब्राह्मणो के बालको के प्रति मैं अत्यन्त प्रेम करता और उनके वचन पालनार्थ ही अवतार धारण करता हूँ ।२४। सभी पापो का नाशक, कलि काल के दोषो का हरण करने वाला ब्राह्मणो के महाभाग्य रूपी चरित्र को सुनने से सदा सब भय नष्ट हो जाते हैं ।२५। इति कलिकवचः श्रुत्वा कलिदोषविनाशनम् । प्रणम्य तं शुद्धमनाः प्रययौ वैष्णवाग्रणीः ।२६। गते राजानि सन्ध्यायां शिवदत्तशुको बुधः । चरित्वा कलिकनुगतः स्तुत्वा तं पुरतः स्थितः ६७। तं शुकं प्राह कलिकस्तु सस्मितं स्तुतिपाठकम् । स्वागतं भवता कस्मात् देशात् किं खादितं ततः ।२८। शृणु नाथ ! वचो मह्यं कौतूहलसमन्वितम् । अहं गंतश्च जलधेर्मध्ये सिंहल संज्ञके ।२६। यथा वृत्तं द्वीप गते तच्चित्रं श्रवणप्रियम् । बृहद्रथस्य नृपतेः कन्यायाश्चरितामृतम् ।३०। कलियुग के दोषो को नष्ट करने वाले भगवान् कलिक के वचन सुनकर पवित्र हृदय वैष्णव श्रेष्ठ राजा उन्हें प्रणाम करके चला गया ।२६। राजा के चले जाने पर शिव प्रदत्त ज्ञानी शुक संध्या के समय भ्रमण से लौटकर भगवान् कलिक के समक्ष स्तुति करके खड़ा हुआ । उनके स्तोत्र-पाठ को सुन कर कलिक भगवान् बोले—तुम किधर से आ रहे हो ? तुमने वहाँ क्या भोजन किया ? शुक बोला—हे नाथ ! आप मुझसे कौतुकमय वाणी सुनिये । मैं समुद्र के मध्य स्थित सिंहल द्वीप में गया था ।२६। उस द्वीप में घटित वृत्तान्त सुनने में बड़ा अच्छा है । राजा बृहद्रथ की कन्या का चरित्र अमृत के समान श्रेष्ठ है ।३०। कौमुद्यामिह जाताया जगतां पापनाशनम् । चरितं सिंहले द्वीपे चातुर्वर्ण्यजनावृते ।३१।

२८६ ] [ कल्किपुराण

प्रासाद-हर्म्य-सदन-पुर-राजि-विराजिते । रत्न-स्फटिक-कुडद्यादि-स्वलताभिभूषिते ।३२। स्त्रीभिरुत्तमवेशाभिः पद्मिनीभि समावृते । सरोभि सारसैहंसरुपकूलजलाकुले ।३३। भृङ्ग रङ्ग प्रसङ्गाढ्ये पद्म कल्हारकुन्दकैः । नानाम्बुजलताजाल-वनोपवन-मण्डिते ।३४। देशे बृहद्रथो राजा महाबलपराक्रमः । तस्य पद्मावती कन्या धन्या रेजे यशस्विनी ।३५।

इस कन्या ने रानी कौमुदी के गर्भ से जन्म लिया है । इसका चरित्र श्रवण से पाप नाशक है । उस द्वीप मे चारो वर्ण के मनुष्यो का निवास है । ३१। भवन, अटारी, गृह युक्त नगर मे वहाँ का राजा सुशो- भित है । उसका भवन रत्न, स्फटिक, मणि तथा स्वर्ण आदि की पच्ची- कारी से विभूषित हो रहा है ।३२। वहाँ पद्मिनी प्रभृति स्त्रियाँ श्रेष्ठ वस्त्रादि से सुशोभित रहती हैं । सरोवरों मे सारस और हंस आदि पक्षी कलोल करते हैं । ।३३। वह द्वीप विभिन्न प्रकार की पद्मलताओ के जालो से सुशोभित है । उपवनो मे कल्हार, कुन्द आदि के पुष्पो पर भोरे गुंजार करते हैं ।३४। वहाँ का राजा बृहद्रथ महाबली और पराक्रमी है । उसकी पद्मावती नाम की कन्या भी अत्यन्त यशस्विनी है ।३५।

भुवने दुर्लभा लोकेऽप्रतिमा वरवर्णिनी । काम मोह करी चारु चरित्रा चित्र निर्मिता ।३६। शिव सेवापरा गौरी यथा पूज्या सुसम्मता । सखीभिः कन्यकाभिश्च जप ध्यान परायणा ।३७। ज्ञात्वा ताञ्च हरेर्लक्ष्मीं समुद्भूतां वराङ्गप्राम् । हरः प्रादुरभूत्साक्षात्पार्वत्या मह हर्षित ।३८। सा तमालोक्य वरदं शिव गौरी समन्वितम् । लज्जिताधोमुखी किञ्चन्नोवाच पुरतः स्थिता ।३६।

चतुर्थ अध्याय ] [ २८७ हरस्तामाह सुभगे ! तव नारायण पति । पाणि ग्रहीष्यति मुदा नान्यो योग्यो नृपात्मज ।४०। श्रेष्ठ मुख वाली,सुन्दर चरित्रमयी, कामदेव को भी मोहित करने वाली उस कन्या की समानता ससार मे कोई नही कर सकता ।३६। जिस प्रकार गिरिजा भगवान शकर की सेवा परायण है, उसी प्रकार पूज- नीया पद्मावती अपनी सखियो के साथ जप ध्यान-परायण रहती हैं । ।३७। भगवान विष्णु की प्रिया लक्ष्मी जी को पद्मावती के रूप मे उत्पन्न हुई जानकर पार्वती जी के साथ भगवान शकर वहाँ पधारे ।३८। वरदाता शिवजी को पार्वती जी के सहित आये देख कर उस कन्या ने लज्जा से शिर नीचा कर लिया और अवाक् खडी रही ।३६। तब शिवजी बोले— हे सुभगे ! तुम्हारे पति भगवान नारायण ही तुम्हारा पाणि ग्रहण करेगे । क्योकि अन्य कोई राजकुमार तुम्हारे योग्य नही है ।४०। कामभावेन भुवने ये त्वा पश्यन्ति मानवा । तेनैव वयमा नार्यो भविष्यन्त्यपि तत्क्षणात् ।४१। देवासुरास्तथा नागा गन्धर्वाश्चारणादयः । त्वया रन्तु तथाकाले भविष्यन्ति किल स्त्रियः ।४२। विना नारायण देव त्वत्पाणिग्रहणार्थिनम् । गृह याहि तपस्त्यक्त्वा भाग्यस्तननुत्तमम् ।४३। मा क्षोभये हरेः पत्नि कमले विमल कुरु । इति दत्वा वर सोयस्तत्रैवान्तर्दधे हर ।४४। हरवरमिति सा निशम्य पद्मा समुचितमात्मनोरथ प्रकाशम् । विकसितवदना प्रणम्य सोम निजजन कालयभाविवेश रामा मृत्युलोक के वासी जो मनुष्य तुम्हारी ओर काम भाव से दृष्टि पात करेगे, वे तत्काल अपनी आयु के अनुकूल स्त्रीत्व भाव को प्राप्त हो जायेंगे ।४१। देवता, दैत्य, नाग, गधर्व चारण आदि मे भी जो कोई तुम पर कुदृष्टि डालेगे वे भी स्त्रीत्व को उसी समय प्राप्त होगे ।४२।

२८८ ] [ कल्कि पुराण भगवान नारायण के अतिरिक्त जो कोई भी तुम्हारा पाणिग्रहण करना चाहेगा, वह ऐसी ही दशा को प्राप्त होगा । अब तुम तपस्या को छोड़- कर भोग के योग्य अपना रूप बनालो और अपने घर को प्रस्थान करो ।४३। हे कमले ! तुम हरि की पत्नी हो, हर प्रकार का क्षोभ त्याग कर मन को स्वस्थ करो । इस प्रकार वर प्रदान करके शिवजी अन्तर्ध्यान होगये ।४४। भगवान शंकर से मनोवाञ्छित वरदान प्राप्त करके प्रफुल्ल मुख हुई पद्मा शिवजी को प्रणाम करके अपने पितृ-गृह को गई ।४५। —❀— पंचम अध्याय गते बहुतिथे काले पद्मा वीक्ष्य बृहद्रथः । निरूढ यौवना पुत्री विस्मित पापशङ्कया ।१। कौमुदी प्राह महिषी पद्मोद्वाहेऽत्र क नृपम् । वरयिष्यामि सुभगे ! कुलशील समन्वितम् ।२। सा तमाह पति देवी शिवेन प्रतिभाषितम् । विष्णुरस्यः पतिरिति भविष्यति न सशय ।३। इति तस्यावच. श्रुत्वा राजा प्राह कदेतिताम् । विष्णुः सर्व गुहावासः पाणिमस्या ग्रहीस्यति ।४। न मे भाग्योदयः कश्चित् ये न जामातर हरिम् । वरयिष्यामि कन्यार्थे वेदवत्या मुनेर्यथा ।५। इमा स्वय वरा पद्मा पद्मामिव महोदधे । मथनेऽसुरदेवाना तथा विष्णुर्ग्रहीष्यति ।६। शुकदेव जी ने कहा — बहुत समय व्यतीत होने पर जब पुत्री को

पञ्चम अध्याय ] [ २८६ राजाबृहद्रथ ने उसे यौवनावस्था के लक्षणो से युक्त देखा तब वह पाप की शका से चिन्ता करने लगा ।१। तब राजा ने अपनी रानी कौमुदी के प्रति कहा कि हे सुभगे ! तुम मुझे परामर्श दो कि अपनी प्रिय पुत्री के विवा- हार्थ किस शीलगुण सम्पन्न एव श्रेष्ठ कुलोत्पन्न राजा को आमन्त्रित किया जाय ? ।२। यह सुन कर रानी कौमुदी ने राजा को भगवान् शकर के वचन स्मरण कराते हुए कहा कि इसके पति भगवान् श्री हरि ही होगे, इसमे सशय नही है ।३। उसके यह वचन सुनकर राजा बृहद्रथ ने रानी से पूछा कि हे प्रिये । यह तो बताओ कि भगवान् विष्णु कितने समय मे इसका पाणिग्रहण कर लेगे ।४। हे प्रिये ! अभी तो हमारा ऐसा भाग्योदय नही हुआ जन पडता कि जिससे प्रभाव से वेदवती के समान मैं भी स्वयवर मे भगवान् श्री हरि को अपने जामाता के रूप मे प्राप्त कर सकूँ ।५। देवताओ और दैत्यो के द्वारा मथन किये जाते समुद्र से उत्पन्न हुई पद्मासना पद्मा के समान मेरी इस पद्मा को स्वय- वर मे भगवान् श्री हरि वरण करलें ।६। इति भूपगणान्भूप समाहूय पुरस्कृतान् । गुणशीलवयोरूप विद्याद्रविण सवृतान् ।७। स्वयवरार्थं पद्मायाः सिंहले बहुमङ्गले । विचार्य कारयामास स्थान भूपनिवेशनम् ।८। तत्रायाता नृपाः सर्व विवाह कृत निश्चयाः । निज सैन्यैः परिवृता, स्वर्णांरत्न विभूषिता ।६। रथान्गजानश्ववरान्समारूढा महाबला. । श्वेतच्छत्रकृतच्छायाः श्वेतचामर वीजिताः ।१०। शस्त्रास्त्रतेजसा दीप्ता देवा सेन्द्राइवाभवन । रुचिराश्वः सुकर्मा च मदिराक्षो दृढाशुगः ।११। कृष्णसारः पारदश्च जीमूतः क्रूरमर्दन । काश कुशाम्बुर्वसुमान् कङ्कः क्रथन सञ्जयौ ।१२। गुरुमित्रः प्रमार्थी च विजृम्भ सञ्जयोक्षम ।

२६० ] [ कल्कि पुराण एते चान्ये च बहवः समायाता महाबलाः ।१३। ऐसा सोचते हुए राजा वृहद्रथ ने, अपनी कन्या के स्वयवर के निमित्त गुणवान, शीलवान, रूपवान, विज्ञ एव महान् ऐश्वर्य वाले युवावस्था से परिपूर्ण राजाओ को सम्मान सहित आमन्त्रित किया ।७। इस प्रकार उस सिंहल देश मे पद्मा के स्वयवर का उत्सव मनाया जाने लगा बहुत प्रकार के मगल होने लगे और राजाओ के निवास आदि के लिए स्थान सज्जित किये जाने लगे ।८। विवाह की इच्छा से सुवर्ण, मणि- रत्नादि से विभूषित हुए राजागण देश विदेश से अपनी सेनाओ के सहित वहाँ आने लगे ।६। वे सभी बलवान् राजागण रथ, अश्व, गज आदि विभिन्न वाहनो पर सवार होकर वहाँ आये। उनके ऊपर श्वेत छत्र लगाये और चमर डुलाये जाते थे । १०। उस समय शस्त्रादि से दैदीप्यमान वे सब राजागण ऐसे शोभा पाने लगे जैसे देवताओ के समाज मे इन्दु सुशोभित होते हैं। रुचिराश्व, सुकर्मा, मदिराक्ष, दृढाशुग, कृष्ण- सार, पारद, जीमूत क्रूरमर्दन, शश, कुशाम्बु, वसुमान, कक, क्रथन, सजय, गुरुमित्र, प्रमाथी, विजृम्भ सञ्जय, अक्षम आदि अनेक महा- पराक्रमी नरेशगण वहाँ एकत्र होगये ।११-१३। विविशुस्ते रङ्गगता स्वस्वस्थानेषु पूजिता. । वाद्यताण्डवसन्हृष्टाश्चित्र माल्यम्बराधराः ।१४। नानाभोगसुखोद्रिक्ता कामरामा रतिप्रदा. । तानालोक्य सिंहलेश स्वा कन्या वरवर्णिनीम् ।१५। गौरी चन्द्रनना श्यामा तारहारविभूषिताम् । मणिमुक्ताप्रवालैश्च सर्वाङ्गालकृतां शुभाम् ।१६। कि माया मोहजननी कि वा कामप्रियां भुवि । रूपलावण्यसम्पन्न्या न चान्यमिह दृष्टवान ।१७। स्वर्गे क्षितौ वा पातालेऽप्यह सर्वत्रगो यदि । पश्चद्वासीगणाकीर्णां सखीभिः परिवारिताम् ।१८।

पंचम अध्याय ] [ २६१ वे राजागण विविध प्रकार के वस्त्राभूषण, माला आदि से विभूषित होकर रगभूमि मे आकर सादर सम्मानित होते हुए सुखपूर्वक अपने-२ अपने स्थान पर बैठ गये ।१४। विभिन्न प्रकार के भोगो और ऐश्वर्य से सम्पन्न, रमणीय, चरित्र वाले एव सब को प्रसन्न करने के स्वभाव वाले राजाओ को देखकर सिंहलेश बृहद्रथ ने अपनी वरवर्णिनी कन्या को स्वयवर मे बुलाया ।१५। गौरी, चन्द्रानना, श्यामा मणि-मोती रत्नो आदि से सब प्रकार विभूषित, अत्यन्त सुन्दर हार को धारण किये हुए वह पद्मावती मोहमयी माया अथवा कामदेव की साक्षात् पत्नी ही अव- तरित हुई प्रतीत होने लगी । मैं स्वर्ग, मर्त्यलोक, पाताल सभी लोको मे तो गमन करता हूँ । परन्तु ऐसी रूप लावण्य वाली कोई अन्य कन्या मैंने कही भी नही देखी । उस कन्या के पीछे दासियां चल रही थी तथा उसके चारो ओर सखियां थी ।१६-१८। दौवारिकैर्वेत्रहस्तै शासितान्तः पुराद्बहिः । पुरोबन्दिगणाकीर्णा प्रापयामास ता शनैः ।१९। नूपुरैः किङ्किणीमिश्र क्वणन्ती जनमोहिनीम् । स्वागताना नृपाणाञ्च कुल शील गुणान्बहून ।२०। शृण्वन्ती हसगमना रत्नमालाकरग्रहा । रुचिरापाङ्गभङ्गेन प्रेक्षन्ती लोलकुण्डला ।२१। नृत्यत्कुन्तलसोपान गण्ड मण्डल मडिता । किञ्चित्स्मेरोल्लसद्द्रकदशनद्योतदीपिता ।२२। वेदीमध्यारुणा क्षौमवसना कोकिलस्वना । रूप लावण्य पण्येन क्रतुकामा जगत्त्रयम् ।२३। समागता तां प्रसमीक्ष्य भूपाः समोहिनी काम विमूढ चित्ताः । पेतुः क्षितौ विस्मृतवस्त्रशस्त्रा रथाश्वमत्तद्विपवाहनास्ते ।२४। नगर के बाहर दौवारिकगण हाथो मे बेत लिए हुए अन्त पुर के शासन मे सलग्न थे । सभास्थल के अगले भाग मे बंदीगण खडे थे । उस रग भूमि मे राजकुमारी पद्मा मदगति से प्रविष्ट हुई ।१९। नूपुर और

२६२ ] [ कल्कि पुराण किङ्किणी से लोको को मोहने वाली झंकार करती हुई और आगत नरेशो के कुल, गुण, शील आदि का वर्णन श्रवण करती हुई वह हंसगति वाली राजकन्या हाथ मे रत्नमाला लिए हुए अपने चंचल अंगो से शोभा को पाती हुई और कटाक्षपूर्वक सब को देखती हुई बढ़ती जा रही थी । वह हिलते हुए कुण्डल वाली, केशकुन्तल की चंचलता से युक्त, सुन्दर ग्रीवा वाली, विकसित मुख से मद मुमकराती हुई, जिसके दांतो की पक्तियाँ चमक रही थी, लाल रंग के रेशमी वस्त्र धारण किये हुए, कोकिला जैसे कण्ठ स्वर वाली, जिसके रूप लावण्य से तीनो लोक मोहित हो रहे थे, उस मनमोहिनी सुकुमारी राज कन्या को रंगभूमि मे घूमती हुई देख- कर कामदेव के वशीभूत हुए राजागण ऐसे विह्वल चित्त होगये कि उनके शस्त्रास्त्र और वस्त्रादि सभी खुल-खुल कर पृथिवी पर गिरने लगे ।१६-२४। तस्याः स्मरक्षोभ निरीक्षणेन स्त्रियो बभूवुः कमनीयरूपाः । बृहन्नितम्बस्तनभारनम्रा सुमध्यमास्तत्स्मृतिजातरूपा. ।२५। विलासहास व्यसनातिचित्राः कान्तानन. शोणसरोज नेत्राः । स्त्रीरूपमात्मानमवेक्ष्य भूपास्तामन्वगच्छन्विशदानुवृत्त्या ।२६। अह वटस्थः परहर्षितात्मा पद्माविवाहोत्सवदर्शनाकुल. । तस्या वचोऽन्तर्हृदि दुःखितायाः श्रोतु स्थित. स्त्रीत्वमितेषु तेषु । जाहीहि कल्के कमलाविलाप श्रुत विचित्रं जगतामधीश । गते विवाहोत्सवमङ्गले सा शिव शरण्य हृदये निधाय ।२८। तान्दृष्ट्वा नृपती.गजाश्वरथिभिरत्यक्तान्सखित्व गतान् । स्त्रीभावेन समन्विताननुगतानपद्मा विलोक्यान्तिके । दीना त्यक्तविभूषणा विलिखती पादागुलै. कामिनी ॥ ईशं कर्तुं निजनाथमीश्वरवचस्तथ्य हरिसाऽस्मरत् ।२६। काम से विमोहित हुए उन राजाओ ने जैसेही उस राजकन्या को वासनामय नेत्रो से देखा वैसे ही वे जिस रूप पर लालायित हुए थे, वैसे

पचम अध्याय ] [ २६३ ही रूप वाली कमनीय नारी का रूप उन्हे प्राप्त होगया ।२५। इस प्रकार नारी सुलभ हास, विलास, व्यसन, चातुर्य, सुन्दर मुख और कमल जैसे नेत्रो को प्राप्त हुए वे राजागण अपने को स्त्री हुए देख कर पद्मा के पीछे पीछे उसकी सहेली बनकर चलने लगे ।२६। उस समय पद्मा के विवाह का वह उत्सव देखने के निमित्त मैं पास ही के एक वृक्ष पर बैठ गया था । जब वे राजागण स्त्री रूप हो गये, तब तो पद्मा अत्यन्त शोकित ही उठी । मैं उसके विलाप को सुनता रहा । हे लोक स्वामिन् ! उस मगलमय उत्सव के इस प्रकार समाप्त हो जाने पर पद्मा ने भगवान् शकर का ध्यान कर जो विलाप किया था, उस करुण विलाप को आप श्रवण कीजिये । पद्मा ने देखा कि सभी राजागण मुझे देखते ही अपने हाथी, अश्व, रथ आदि से विलग होकर स्त्री रूप मे मेरी सहेली होकर साथ-साथ चल रहे हैं, तो वह अत्यन्त दीनतापूर्वक अपने आभूषणो को त्याग कर धरती को कुरेदने लगी । फिर वह शिवजी के वर- दान की सफलता के हेतु भगवान् विष्णु का पति भाव से ध्यान करने लगी ।२७-२६।

षष्ठ अध्याय तत. सा विस्मितमुखी पद्मा निजजनैर्वृता। हरिं पतिं चिन्तयन्तो प्रोवाच विमला स्थिताम् ॥१॥ विमले किं कृतं धात्रां ललाटे लिखनं मम । दर्शनादपि लोकानां पुंसां स्त्रीभावकारकम् ॥२॥ ममापि मन्दभाग्याया पापित्या. शिवमेवनम् । विफलत्वं मनुप्राप्त बीजमुप्त यथोपरे ॥३॥ हरिर्लक्ष्मीपति सर्वजगतामधिप प्रभु । मत्कृतेऽप्यभिलाष किं करिष्यति जगत्पति, ॥४॥ यदि शम्भोर्वचो मिथ्या यदि विष्णुर्न मां स्मरेत् । तदाहमनले देहं त्यक्ष्यामि करिभाविता ॥५॥ शुकदेव जी बोले—तदनन्तर विस्मित मुख वाली पद्मा अपनी सहेलियो के मध्य स्थित हुई, भगवान् विष्णु को पतिरूप मे विचार करती हुई, अपने निकट स्थित विमला नाम की सहेली से कहने लगी ।१। पद्मा बोली — हे विमले ! क्या ब्रह्मा ने मेरे भाग्य मे यही लिख दिया है कि जो पुरुष मुझे देखे, वह तुरन्त स्त्रीत्व को प्राप्त हो जाय ।२। हे सखी ! जैसे मरुभूमि मे बोया गया बीज निष्फल होता है, वैसे ही मुझ अभागिनी एव पापिनी द्वारा भगवान् शकर की, की गई उपासना व्यर्थ होगई ।३। भगवान् रमापति विष्णु सम्पूर्ण विश्व के अधीश्वर और प्रभु हैं मैं उन्हे पति रूप मे प्राप्त करने की कामना करूँ तो क्या वे मुझे स्वी- कार करेगे ? ।४। यदि भगवान् शम्भु का वचन मिथ्या हो गया और भगवान विष्णु ने मेरी कामना नही की तो मैं उन्ही भगवान् श्री हरि का ध्यान करती हुई अपने देह को अग्नि कुण्ड मे डाल कर भस्म कर दूँगी ।५। २६४

षष्ठ अध्याय ] [ २६५ क्व चाह मानुषी दीना क्वाते देवो जनार्दनः । निगृहीता विधात्राह शिवेन परिवञ्चिता ।६। विष्णौ च परित्यक्ता मदन्या नात्र जीवति ।७। इति नाना विलपिन्या वचन शोचनाश्रयम् । पद्मायाश्चरुचेष्टाया। श्रुत्वायातस्तवान्तिके ।८। शुकस्य वचनं श्रुत्वा कल्किः परमविस्मितः । त जगाद् पुनर्याहि पद्मा बोधयितु प्रियाम् ।६। मत्सन्देशहरो भूत्वा यद्रूपगुणकीर्तनम् । श्रावयित्वा पुन कीर ! समायास्यासि बांधव ।१०। कहाँ तो मैं दीन मानुषी और कहाँ वे जनार्दन प्रभु-इन दोनो मे विवाह की कल्पना करने से ही मैं तो यह समझती हूँ कि विधाता मुझ से विमुख है, तभी तो शिवजी ने मुझे वैसा वर देकर ठग लिया है- ।६। भगवान श्री हरि के द्वारा परित्यक्ता होकर मेरे अतिरिक्त और कौन जीवित रह सकता है ।७। सुन्दर चरित्र वाली पद्मावती इस प्रकार से विलाप करती थी । उसके शोकाकुल वचनो को सुनकर ही मैं आपके निकट उपस्थित हुआ हूँ ।८। शुक के यह वचन सुनकर अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हुए कल्कि जी ने शुक के प्रति कहा—हे शुक मेरी प्रिया पद्मा को आश्वासन देने के निमित्त तुम पुनः सिंहल देश को प्रस्थान करो ।६। हे शुक ! तुम हमारे संदेश वाहक होकर पद्मा को हमारे रूप गुण का वृत्तान्त सुनाना और फिर हे खग ! तुम शीघ्र ही यहाँ लौट आना ।१०। सा मे पतिरह तस्या दैवविनिर्मितः । मध्यस्थेन त्वया योगमावयोश्च भविष्यति ।११। सर्वज्ञसि विधिज्ञोऽसि कालज्ञोऽसि कथामृते । तामाश्वास्य ममाश्वासकथास्तस्याः समाहरः ।१२। इति कल्केर्वचः श्रुत्वा शुक परमहर्षितः । प्रणम्य त प्रोतमनाःप्रययौ सिंहलं त्वरन् ।१३।

२६६ ] [ कल्कि पुराण खगः समुद्रपारेण स्नात्वा पीत्वामृतं पय । बीजपूरफलाहारो ययौ नाजदिनिवेशमम् ।१४। तत्र कन्यापुर गत्वावृक्षे नागेश्वरे वसन् । पद्मालोक्य तां प्राह मुको मानुष भाषया ।१५। अवश्य ही पद्मा मेरी पत्नी और मैं उसका पति हूँ । विधाता ने ही यह संयोग नियत किया है और यह कार्य तुम्हारी मध्यस्थता मे ही सम्पन्न होना है । ११। तुम सर्वज्ञ हो, नियम और काल के भी ज्ञाता हो । तुम अपने वचनामृत से समझा कर और मेरे द्वारा ग्रहण किये जाने का आश्वासन देकर यहाँ लौट आओ । ।१२। कल्किजी का ऐसा आदेश पाकर मुदित हुए शुक ने उन्हें प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक सिंहल- देश को प्रस्थान किया ।१३। मार्ग मे, समुद्र के पार जाकर शुक ने स्नान करके उस मृतोपम जल का पान और बिजौरे के फलको भक्षण किया और फिर राजभवन मे प्रविष्ट होगया ।१४। वह अन्त पुर मे पहुंच कर राजकन्या के निवास स्थान पर जाकर नागकेशर के एक वृक्ष पर चढ गया और पद्मा को देख कर मनुष्यो की भाषा मे उससे बोला ।१५। कुशलं ते वरारोहे ! रूप यौवन शालिनी । त्वा लोलनयनां मन्ये लक्ष्मी रूपमिवापराम् ।१६। पद्मानना पद्मगन्धां पद्मनेत्रा कराम्बुजे । कमल कालयन्तीं त्वां लक्षयामि परां श्रियम् ।१७। किं धात्रा सर्वजगतां रूपलावण्यसम्पदाम् । निर्मितासि वरारोहे ! जीवानां मोहकारिणि ! ।१८। इति भाषितमाकर्ण्य कीरस्यामितमद्भुतम् । हसन्ती प्राह सा देवी त पद्मा पद्ममालिनी ।१६। कस्त्वं कस्मादागतोऽसि कथ मा शुकरूपधृक् । देवो वा दानवो वा त्वमागतोऽसि दयापरः ।२०।

षष्ठ अध्याय ] [ २६७ शुक ने कहा—हे वरारोहे ! हे रूप यौवन सम्पने तुम कुशल पूर्वक तो हो ? तुम अपने चंचल नेत्रो से सुशोभित द्वितीय लक्ष्मी ही प्रतीत होती हैं ।१६। तुम कमल जैसे मुख वाली, कमलगंधा, कमलाक्ष तथा कमल के समान हाथो वाली हो । अपने हाथ मे तुमने कमल धारण किया हुआ है, यह लक्षण तुम्हारा लक्ष्मी होना सूचित करता है- ।१७। हे वरारोहे ! विधाता ने क्या सम्पूर्ण विश्व का रूप लावण्य तुम्ही मे भर कर तुम्हे ही सब जीवो को मोहित करने वाली बना दियो है ।१८। शुक के यह अद्भुत वचन सुनकर पद्ममालधारिणी पद्मा ने हँस- कर कहा ।१६। तुम कौन हो ? कहाँ से आगमन हुआ है ? तुम इस शुक वेश मे देवता हो अथवा दानव ? तुम यहाँ आकर किसलिए ऐसी दया प्रदर्शित कर रहे हो ।२०। सर्वज्ञोऽह कामगामी सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् । देवगन्धर्वभूपानां सभासु परिपूजित ।२१। चरामि स्वेच्छाया खे त्वामीक्षणार्थमिहागतः । त्वामह हृदि सतप्तं त्यक्तभोग मनस्विनीम् ।२२। हास्यालाप-सखी-सङ्ग देहाभरण-वर्जिताम् । विलोक्याह दोनचेता पृच्छामि श्रोतुमोरितम् । कोकिलालाप-सन्ताप-जनक मधुर मृदु ।२३। तव दन्तौष्ठजिह्वाग्रलुलिताक्षरपक्तय यत्कर्णकुहरे मग्नास्तेषा किं वर्ण्यते तत ।२४। सौकुमार्यं शिरीषस्य क्व कान्तिर्वा निशाकरे । पीयूष क्व वदन्त्येवानन्द ब्रह्मणि ते बुधा, ।२५। शुक ने कहा— देवी ! मैं सब कुछ जानने वाला तथा सब शास्त्रो का तत्वज्ञानी हूँ । मैं स्वेच्छापूर्वक सर्वत्र गमन क'ने मे समथ हूँ । देवता, गधर्व अथवा राजाओ की सभा मे मेरा पूर्ण सम्मान होता है ।२१। मैं गगन मडल मे अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करता हूँ । तुम हृदय

२६८ ] [ कल्कि पुराण मे सन्तप्त तथा भोग सुख से परे एवं मनस्विनो के दर्शनार्थ ही यहाँ आ पहुँचा हूँ ।२२। तुमने हास्यालाप, सखियोका सग और आभरणको त्याग रखा है । तुमको उस स्थिति मे देखकर दीन-हृदय हुआ मै तुम्हारी कोकिल जैसी मधुर वाणी मे तुम्हारे सन्तप्त रहने कारण जानना चाहता हूँ । २३। तुम्हारे, ओष्ठ और जिह्वा के अग्र भाग मे निसृत अक्षर पक्तियाँ जिसके कानो को सुनाई पड जाय, उसकी तपस्या का प्रभाव कहाँ तक कहा जा सकता है ? ।२४। तुम्हारे समक्ष शिरस के पुष्पो की कमनीयता भी क्या है ? तथा चन्द्रकान्ति भी क्या वस्तु है ? ज्ञानीजन जिस ब्रह्म रूपी पीयूष का वर्णन करते है, वह आनन्द भी तुम्हारी क्या समता करेगा ? ।२५। तिलकालकसमिश्र लोलकुण्डलमण्डितम् ।२६। लोलेक्षणोल्लसद्वक्नेत्र पश्यताम् न पुनर्भव. ।२७। बृहद्रथसुते ! स्वाधि वद भामिनि यत्कृते । तप क्षीणामिव तनू लक्षयामि रुज विना । कनकप्रतिमा यद्वत मासुभिर्मलिनीकृता ।२८। कि रूपेण कुलेनापि धनेनाभिजनेन वा । सर्व निष्फलतामेति यस्यदैवमदक्षिणम् ।।२६।। शृणु कीर समाख्यान यदि वा विदित तव । बाल्य-पौगण्ड-केंशोरे हरसेवा करोम्यहम् ।३०।। तुम्हारे तिलक, अलक से युक्त चचल कुण्डलो से मण्डित तथा चंचल नेत्रो से सुशोभित सुन्दर मुख का दर्शन करने वाले को पुनर्जन्म धारण नही करना होता । २६ २७। हे बृहद्रथसुते ! अपने मान- सिक दुख का कारण मुझे बताओ । हे भामिनि ! तुम्हारी देह बिना रोग के ही, तप से क्षीण दिखाई दे रही है । जैसे मैल के कारण कचन की प्रतिमा मैली हो जाती है, वैसे ही तुम्हारा देह भी मलीन होगया है ।२८। पद्मा ने कहा—धन अथवा उच्च कुल मे उत्पन्न होने से ही

प्रथम अंश: अध्याय ४-७ (सिंहल द्वीप यात्रा व पद्मावती विवाह)

षष्ठ अध्याय ] [ २६६ क्या प्रयोजन सिद्ध होता है, अर्थात् दैव की प्रतिकूलता हो तो यह सभी निष्फल हैं ।२६। हे कीर ! यदि तुम्हे हमारा वृत्तान्तज्ञात न हो तो सुनो— मैने अपनी बाल और किशोर अवस्था मे भगवान शकर की आराधना की थी ।३०। तेन पूजाविधानेन तुष्टो भूत्वा महेश्वर । वर वरय पद्मे ! त्वमित्याह प्रियया सह ।।३१।। लज्जयेधोमुखीमग्रे स्थिता मा वीक्ष्य शङ्कर. । प्राह ते भविता स्वामी हरिनारायण प्रभु ।।३२।। देवो वा दानवो वान्यौ गन्धर्वो वा तवेक्षणात् । कामेन मनसा नारी भविष्यन्ति न सशय ।।३३।। इति दत्वा वर सोम प्राह विष्ण्वर्च्चनं यथा । तथाह ते प्रवक्ष्यामि समाहितमना शृणु ।३४। एता. सख्यो नृपा पूर्वमाहता ये स्वयम्बरे । पित्रा धर्मार्थिना दृष्ट्वा रम्या मा यौवनान्विताम् ।३५। मेरे द्वारा किये गये उम पूजन से प्रसन्न हुए शिवजी ने पार्वतीजी के सहित प्रकट होकर मुझवे कहा कि हे पद्मे ! वर माँगो ।३१। फिर मुझे लज्जा पूर्वक सिर झुकाये देख कर उन्होने कहा कि तुम्हारे पति भगवान् नारायण होगे ।३२। देवता, दानव, गन्धर्व अथवा जो कोई भी हो, यदि तुम्हे काम-भाव से देखेगा तो तुरन्त स्त्री-रूप हो जायगा, इममे सन्देह नही है ।३३। यह वर देने के पश्चात् शिवजी ने भगवान् विष्णु की जो पूजन विधि बताई थी, वह कहती हूँ, समाहित चित्त से सुनो।३४। यह जितनी भी सखियाँ हैं, सभी पहिले राजा थे । मेरे पिता ने मेरी यौवनावस्था देख कर धर्म की रक्षा के निमित्त इन सब राजाओ को मेरे स्वयम्बर मे बुलाया था ।३५। स्वागतास्ते सुखासीना विवाहकृतनिश्चय । युवानो गुणवन्तश्चरूपद्रविणसम्मता• ।३६।

३०० ] [ कल्कि पुराण स्वयंवरगता मा ते विलोक्य रुचिरप्रभाम् । रत्नमालाश्रितकरा निपेतु काममोहिता ।३७। तत उत्थाय सभ्रान्ता सप्रेक्ष्य स्त्रीत्वमात्मन । स्तनभार नतम्बेन गुरुणा परिणामिता ।३८। ह्रिया भिया च शत्रूणा मित्राणामतिदु खदम् । स्त्रीभाव मनसा ध्यात्वा मामेवानगता शुक ! पारिचर्य्या हररता सख्य स्वगुणान्विता । मया सम तपोध्यान पूजा, कुर्व्वन्ति सम्मता ॥४०॥ तदुदितमिति सनिशम्य कीर श्रवणमुख निजमानसप्रकाशम्। समुचितवचनैःप्रतोष्य पद्मा मुरहरयजन पुन प्रचष्टे ॥४१॥ यह सभी युवावस्था वाले, रूप, गुण एव ऐश्वर्य से सम्पन्न थे । यह सभी मेरे साथ विवाह करने की इच्छा से आकर स्वयवर-स्थल मे सुखपूर्वक बैठ गये ।३६। मुझ सुन्दर प्रभा वाली को हाथ मे रत्नमाला लेकर स्वयवर-स्थल मे घूमती देखकर यह सभी काम मोहित राजागण पृथिवी पर गिर गये ।३७। फिर जब सचेत होकर उठे तो अपने को स्त्रीत्व के सभी लक्षणो से युक्त अर्थात् स्त्री रूप मे पाया ।३८। तब तो यह अपने को स्त्री हुआ जान कर बडे दुःखी हुए और शत्रु मित्र आदि की लज्जा छोड कर मेरे ही साथ चल पडे ।३६। अब यह सर्वगुण सम्पन्न नारी रूपी राजागण मेरी सखी होकर मेरे साथ ही भगवान् विष्णुका तप, ध्यान एव पूजन करते है ।४०। अपनी इच्छा के अनुकूल, सुनने मे सुख- दायक इस वार्ता को सुन कर शुक ने समुचित वाणी से पद्मा को प्रसन्न किया और फिर भगवान् विष्णु के पूजन के प्रसङ्ग मे प्रश्न किया ।४१।

सप्तम अध्याय विष्ण्वर्चनं शिवेनोक्तं श्रोतुमिच्छाम्यहं शुभे । धन्यासि कृतपुण्यासि शिवशिष्यत्वमागता ॥१॥ अह भाग्यवशादत्र समागम्य तवान्तिकम् । शृणोमि परमाश्चर्यं कीराकारनिवारणम् ॥२॥ भगवद्भक्तियोगञ्च जपध्यानविधि मुदा। परमानन्द-सन्दोह-दान-दक्षं श्रुतिप्रियम् ॥३॥ श्रीविष्णोरर्चनं पुण्यं शिवेन परिभाषितम् । यच्छ्रद्धयानुष्ठितस्य श्रुतस्य गदितस्य च ॥४॥ सद्य पापहरं पुंसां गुरुगोब्रह्मघातिनाम् । समाहितेन मनसा शृणु कीर यथोदितम् ॥५॥ शुक बोला—हे शुभे ! शिवजी ने भगवान् विष्णु की जो पूजा- विधि तुम्हे बताई थी, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। तुम धन्य हो, तुम अपने पुण्य कर्म द्वारा भगवान् शिव की शिष्या हो गई हो ।१। मैं भाग्य- वशात् ही यहाँ आ पहुँचा हूँ । अब मैं अपने शुक-शरीर का निवारण करने वाली आश्चर्यमयी पूजन विधि का श्रवण करूँगा ।२। भगवान् विष्णु का जप-ध्यान एवं पूजन की यह विधि भगवद्भक्ति के देने वाली, श्रवण मे सुखद एवं परमानन्ददायिनी है ।३। पद्मा ने कहा—शिव-वर्णित विष्णु के पूजन की विधि अत्यन्त पुण्यमयी है । इसके श्रद्धापूर्वक सुनने, अध्ययन करने या कहने से गोहत्या, गुरुहत्या और ब्रह्महत्या के पाप भी नष्ट हो जाते हैं । हे कीर ! इसका वर्णन शिवजी ने जिस प्रकार किया था, उसे समाहित चित्त से सुनो ।४-५। ( ३०१ )

३०२ ] ] कल्कि पुराण कृत्वा यथोक्तकर्माणि पूर्वाह्ने स्नानकृच्छुचिः । प्रक्षाल्य पाणी पादौ च स्पृष्ट्वापः स्वासने वसेत् ।६। प्राचोमुखः संयतात्मा साङ्गन्यास प्रकल्पयेत् । भूतशुद्धिं ततोऽर्घ्यस्य स्थापनं विधिवच्चरेत् ॥७॥ ततः केशवकृत्यादिन्यासेन तन्मयो भवेत् । आत्मानं तन्मयं ध्यात्वा हृदिस्थं स्वासने न्यसेत् ॥८॥ पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः । यथोपचारैः संपूज्य मूलमन्त्रेण देशिकः ॥६॥ ध्यायेदापादमकेशान्तं हृदयाम्बुजमध्यगम् । प्रसन्नवदनं देवं भक्ताभीष्टफलप्रदम् ॥१० प्रातः काल स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर हाथ-पांवों का प्रक्षालन कर, जल स्पर्श करके अपने आसन पर बैठ जाय ।६। फिर संयतात्मा होकर पूर्वाभिमुख हो और अङ्गन्यास भूतशुद्धि तथा विधिवत् अर्घ्य स्थापन करे ।७। फिर केशव कृत्यादि न्यास युक्त होकर हृदय में विष्णु का ध्यान करता हुआ, उन्हें कल्पित आसन पर प्रतिष्ठित करे ।८। फिर पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नानार्थ जल, वस्त्राभूषण आदि भेंट करे और यथोपचार देशिक मूलमंत्र से पूजन करे ।६। तदुपरान्त भक्तों को इच्छित फलदायक, हृदयाम्बुज में रमण करने वाले, प्रसन्न मुख भगवान् विष्णु का चरणकमलों से केश पर्यन्त ध्यान करे ।१०। योगेन सिद्धिविबुधैः परिभाव्यमानं लक्ष्म्यालयं तुलसिकाञ्चितभक्तभृङ्गम् । प्रोत्तुङ्गरक्तनखराङ्ग- लिपत्रचित्रं गङ्गारसं हरिपदाम्बुजमाश्रयेऽहम् ॥११ गुल्फन्मर्माणप्रचयघटितराजहंससिञ्चत्सुनूपुरयुतं पदपद्मवृत्तम् । पीताम्बराञ्चलविलाललवलत्पता- कं स्वर्णान्त्रिकक्वलयञ्च हरेः स्मरामि ।१२ जंघे सुपर्णगलनीलमणिप्रवृद्धे शोभास्पदारुण- मणिद्युतिचंचुमंध्ये । आरक्तपादतललम्बनशो-

सप्तम अध्याय ] [ ३०३ भभाने लोकेक्षणोत्सवकरे च हरे स्मरामि। १३ ते जानुनी मखपतेर्भजमूलसङ्गरङ्गोत्सवावृतत- डिद्वसने विचित्रे। चञ्चत्पतत्रमुखनिर्गतसामगीन विस्तारितात्मयशसी च हरे स्मरामि॥ १४ विष्णो कटिं विधिकृतान्तमनोजभूमि जीवाण्ड- कोषणरासङ्गदुकूलमध्याम्। मानागुणप्रकृतिपी- तविचित्रवस्त्राध्यायेन्निबद्धवसना खगपृष्ठसंस्थाम्। १५ ध्यान के पश्चात् "ॐ नमो नारायणाय स्वाहा" कहे और इस स्तोत्र का उच्चारण करे-योग के द्वारा सिद्ध हुए ज्ञानीजन जिनके ध्यान में सदा रत रहते हैं, जो लक्ष्मी के आश्रय हैं, जिनके भक्तगण भृङ्ग रूपी तुलसी का सदा सेवन करते हैं, जिनके लोहित वर्ण कमलो- पम नखयुक्त अँगुलिपद्मों से गङ्गाजल निकल रहा है, उन कमल जैसे चरणों वाले नारायण की शरण लेता हूँ ॥ १॥ जिनके चरणों में विभू- षित मणिमान् युक्त नूपुर हंस के कलरव जैसा शब्द करते हैं, जिन चरणों में पीताम्बर का छोर उड़ती हुई ध्वजा जैसा लगता है, जिन चरणों में स्वर्णिम त्रिवक्र नामक कड़ा शोभित है, उन कमल के समान चरणाम्बुजों का मैं स्मरण करता हूँ ॥२॥ गरुड के कण्ठ भूषण रूप नीलकान्त मणि की प्रभा से समुज्ज्वल जिन जंघाओं के मध्य में गरुड की अरुण- मणि के समान लाल चोंच सुशोभित है, जिन जंघाओं के नीचे लाल पादतल स्थिर हैं, उन विश्व-लोचन के परमानन्द रूप भगवान् की जंघाओं का मैं स्मरण करता हूँ ॥३॥ सामगान के द्वारा गरुड जिनका यशोगान करते हैं, उत्सव के अवसर पर चित्र विचित्र रंगों से युक्त वस्त्रों की विद्युत् आभा से विभूषित भगवान् की उन जंघाओं का स्मरण करता हूँ ॥४॥ ब्रह्मा, काल और कन्दर्प की आश्रयभूता जो कटि है तथा जो कटि दुकूल से सुशोभित रहती है, गरुड की पीठ पर स्थित विष्णु की उस कटि का मैं ध्यान करता हूँ ॥५॥

३०४ ] [ कल्कि पुराण शातोदरं भगवतस्त्रिवलिप्रकाशभावर्त्तनाभि- विकनद्विधिजन्मपद्मम् । नाडीनदीगणरसोत्थ- सितन्त्रसिन्धु ध्यायेऽण्डकोषनिलय तनुरोमरेखम् । १६ वक्षः पयोधितनयाकुङ्कुमेन धारेण कौस्तु- भमणिप्रभयां विभातम् । श्रीवत्सलक्ष्म हरि च- न्दनप्रसूममालोचित भगवतः सुभग स्मरामि । १७ जो उदर त्रिवाली से सुशोभित हैं, जिस उदर के नाभि कमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं, जिस उदर मे नाडी रूपी सरिताओ के रथ से अन्त्र रूप समुद्र तरगित हो रहा है, ब्रह्माण्ड के आश्रय रूप जिस उदर मे लोभ रेखाएं सुशोभित है, भगवान् के उस उदर का मैं स्मरण करता हूँ ।१६। जिस हृदय मे समुद्रजा लक्ष्मी के वक्षस्थल की केसर लगी हुई है, जो हृदय कठहार ओर कौस्तुभ मणि से दमक रहा है, जो हृदय श्रीवत्स के चिह्न से युक्त है और जिस पर हरिचन्दन फूलो की माला विभूषित है उस प्रभु-हृदय का मैं स्मरण करता हूँ ।१७। बाहू सुवेशसदनौ वलयाङ्गदादिशोभास्पदौ दुग्ति दैत्यविनाशदक्षौ । तौ दक्षिणौ भगवतश्च गदासु- नाभतेजोजितौ सुललितौ मनसा स्मरामि । १८ वामौ भुजौ मुररिपोर्धृतपद्मशंखौ श्यामौ करीन्द्रकर वन्मणिभूषणाढ्यौ । रक्ताङ्गुलिप्चयचुम्बितजानु मध्यौ पद्नालयाप्यिकरौ रुचिरौ स्मरामि । १६ कण्ठ मृणालममलं मुखपङ्कजस्य लेखाययेणावन मालिकया निवत्तम् । किंवा मुक्तिरसमन्त्रकस त्फलस्य वृन्ते चिरं भगवत सुभग स्मरामि । २० जिन श्रेष्ठ भुजाओ मे वलय अ गद आदि सुन्दर आभूषण सुशो- भित है, जो भुजाएँ असख्य दानवो का संहार कर चुकी है, जिन भुजाओ की प्रभा के समक्ष गदा और चक्र आदि अस्त्रो का तेज भी नगण्य है, मैं