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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

कर्मयोग ६१

नहीं पाते। कर्मयोगी इन व्यक्ति-गत या जाति-गत धर्मों में प्रवृत्त नहीं होता, उसका धर्म-कर्म जो कुछ है, वह सब ईश्वर की भक्ति और उसका सच्चा प्रेम है। ईश्वर सब का है, इसलिए उसका धर्म भी सबकी सेवा और सब से प्रेम करना है। जिन धर्मों का सेवन करने से सांसारिक बन्धन दृढ़ होते हैं, यदि तुम कर्मयोगी बनना चाहते हो तो, उनके लिए मत ललचो। तुम चाहे किसी धर्म का पालन करो, पर अपने मन में इस बात का अभिमान कभी न करो कि मैं इसका करनेवाला हूँ या यह मेरा धर्म या कर्म है। जहाँ तुमने मेरा कहा, बस वहीं लगाव पैदा हुआ और यह लगाव ही तुम्हारे गले की फाँसी है। जब तुम अपना सर्वस्व ही ईश्वर के अर्पण कर चुके तब तुम्हें यह अधिकार ही कब है कि तुम किसी वस्तु को (चाहे वह तुम्हारे शरीर के भीतर हो या बाहर) अपना कह सको। हम सब उसी के आज्ञानुसार काम कर रहे हैं, हमको प्रहार और उपहार (सज़ा व जज़ा) से क्या काम! यदि हम पारितोषिक लेना चाहते हैं तो हमको दण्ड भी अवश्य मिलेगा। दण्ड से बचने का केवल यह उपाय है कि पारितोषिक की मन में कल्पना भी न की जाय। दुःख से बचने का सिवा इसके और क्या उपाय हो सकता है कि हम सुख की कल्पना को सर्वथा त्याग दें। क्योंकि सुख-दुःख दोनों साथ साथ मिले रहते हैं। जहाँ सुख है वहीं दुःख भी है। जीवन के साथ मरण लगा हुआ है, जो जीना चाहता है उसके लिए अवश्य मौत है। हाँ, यदि हम जीवन की इच्छा और मोह छोड़ दें तो निस्स-न्देह मौत को जीत सकते हैं। यदि विचार-दृष्टि से देखा जावे तो

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जीवन और मरण इन दोनों में नाम मात्र का भेद है, वस्तुतः ये एक ही पदार्थ के दो सापेक्ष्य धर्म या अङ्ग हैं। सुख बिना दुःख के या जीवन बिना मरण के एक बाल-प्रलाप है।

अतएव जो कर्म करो, उसके लिए न तो प्रशंसा की और न ख्याति की लालसा रक्खो। हम में यह निर्बलता है, अच्छा काम पीछे करते हैं, प्रशंसा पहले चाहते हैं। यदि किसी धर्म-कार्य में कुछ दान देते हैं, तो जब तक समाचारपत्रों में छप नहीं जाता, हम को चैन नहीं पड़ता। संसार में प्रायः बहुत बड़े और प्रथम श्रेणी के मनुष्य हुए हैं, जिनका कोई नाम भी नहीं जानता, इतिहास की तो कथा ही क्या है। प्रत्येक देश में ऐसे महात्मा पुरुष हुए हैं, जिन्होंने चुपचाप कर्म करते हुए अपना जीवन बिताया और चुपचाप ही अपना काम पूरा करके चल दिये। समय आया कि उनके विचार और उपदेशों ने बुद्ध और ईसा जैसी प्राकृत मूर्तियाँ धारण कीं, जिनको हम जानते हैं। बड़े आदमी नाम और प्रतिष्ठा के भूखे नहीं होते। वे अपने शुद्ध संस्कार और पवित्र विचार लोगों को दे जाते हैं। न वे कोई पन्थ चलाते हैं, न संप्रदाय बनाते हैं, न अपने नाम से कोई धार्मिक या दार्शनिक परिपाटी चलाते हैं। उनमें मान और मत्सर का लेश भी नहीं होता, वे सात्विक भावों से परिपूर्ण होते हैं। मैं एक ऐसे ही योगी को जानता हूँ, जो आर्यावर्त्त में रहता है। वह अपने शरीर और जीवन तक से निरपेक्ष है। उसने अपने आपे को बिलकुल भुला दिया है। यदि कोई जन्तु उसके एक हाथ को काटना चाहे, तो वह दूसरे हाथ को भी उसके सामने कर देता है और यह कहता है कि "परमात्मन् ! आपकी इच्छा

छठा अध्याय

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पूर्ण हो।" उसकी दृष्टि में सब कुछ ईश्वर का है और उसी के लिए है। वह सब सङ्ग और सम्बन्धों से पृथक् होने पर भी प्रेम और पवित्रता का आदर्श है।

इनके पश्चात् उन लोगों का नम्बर आता है जो रजोगुणी अर्थात् राजस-वृत्तिवाले हैं। इनमें उत्साह, आन्दोलन और प्रयत्न की शक्ति होती है। ये सात्विक-भाववालों का अनुकरण करते हैं, संसार को उनका उपदेश सुनाते हैं। प्रथम कक्षा के लोग चुपचाप शान्ति के साथ सच्चे और शुद्ध भावों को इकट्ठा कर जाते हैं। दूसरी कक्षा के लोग अपने उद्योग और पुरुषार्थ द्वारा उनका संदेश लोगों को पहुँचाते हैं। गौतम-बुद्ध के जीवन-चरित्र में हमने कई बार पढ़ा है कि २४ बुद्ध उससे पहले हो चुके हैं और वह २५वाँ है। उन २४ बुद्धों के नाम तक को कोई नहीं जानता। किन्तु गौतम-बुद्ध, जो ऐतिहासिक बुद्ध है, स्पष्ट कहता है कि उसने अपने प्रचार का काम उनके उपदेशों के आधार पर आरम्भ किया है। उच्चकक्षा के मनुष्य सदा शान्त और प्रसन्न-चित्त रहते हैं। वे उच्च भावों की शक्ति को जानते हैं। उनको विश्वास है कि यदि वे अपनी गुफा के द्वार बन्द करके पाँच उच्च-कोटि के सिद्धान्त भी मनुष्यों के वास्ते छोड़ जायँगे तो भी, जब तक सृष्टि है, उनका यह पवित्र स्मारक संसार में बना रहेगा। वस्तुतः ये सिद्धान्त पहाड़ों को छेदते हुए, समुद्रों को चीरते हुए, संसार में परिक्रमण करते रहेंगे और अवसर पाकर मनुष्यों के हृदय और मस्तिष्क में प्रवेश करके उन्हें पवित्र और उच्च बना देंगे, जिनके प्रताप से मानुष-जीवन का उद्देश सफल और पूर्ण हो जायगा। ये सात्विक मनुष्य ईश्वर के

६४ कर्मयोग

इतने समीप होते हैं कि इनको आन्दोलन, उपदेश और कर्त्तव्य-कर्मों के पालन करने का अवकाश ही नहीं रहता।

उत्साह से कर्म करनेवाले चाहे कितने ही धर्मात्मा हों, फिर भी उनमें कुछ न कुछ अज्ञान का लेश रहता ही है। जब तक हम में अपूर्णता है, तभी तक हम कर्म करते हैं। कर्म में फिर भी कुछ न कुछ स्वार्थ या सम्बन्ध का योग रहता ही है। जिनकी सब इच्छायें ईश्वर में अर्पित हो गई हैं और जिनका आत्मा ईश्वरमय हो गया है, उनके लिए कर्म नहीं है। वे चाहे स्वाभाविक कर्म करते रहें, परन्तु कर्तृत्व का व्यपदेश उनमें नहीं होता। ऐसे ही लोग उस सबसे बड़े पद—मोक्ष—के अधिकारी हैं। हम में से बहुत से मनुष्य ऐसे होंगे जो अपने को बड़ा आदमी समझते हैं, किन्तु अपने आप को बड़ा समझने से कोई बड़ा नहीं होता। बड़ा वह है जिसको संसार बड़ा कहे। हम जब संसार को छोड़ देते हैं, पाँच मिनट में संसार हमको भूल जाता है। परन्तु ईश्वर की सत्ता अपरिमित है। यदि उसकी इच्छा न हो तो कौन जी सकता है। वह आत्माओं का आत्मा है। प्राकृत और अप्राकृत सारी शक्तियाँ उसमें हैं और उसकी हैं। उसीकी आज्ञा से वायु चलता है, सूर्य चमकता है, पृथ्वी भ्रमण करती है और मृत्यु प्राणियों को अपना भक्ष्य बनाता है। वह सब में है और सब कुछ है। तुम जो कुछ कर सकते हो, उसके लिए करो, अपने लिए फल की वासना मत रक्खो। यही सच्चा त्याग है, इसी से कर्म-बन्धन की फाँसी कटती है और यही मुक्ति का सीधा मार्ग है, जिसकी पहली सीढ़ी कर्मयोग है।

सातवाँ अध्याय

सातवाँ अध्याय

कर्मयोग का आदर्श

वेदान्त का यह एक बड़ा गम्भीर सिद्धान्त है कि हम भिन्न भिन्न मार्गों से एक ही सर्वाभिमत स्थान पर पहुँच जाते हैं। वे भिन्न भिन्न मार्ग आंशिक रीति पर तो बहुत से हैं, परन्तु उनमें चार मुख्य हैं, जिनमें सब आ जाते हैं। पहला कर्म, दूसरा भक्ति या प्रेम, तीसरा विज्ञान और चौथा ज्ञान। पर तुमको स्मरण रखना चाहिए कि ये मार्ग ऐसे नहीं हैं कि इनका परस्पर एक दूसरे से कुछ सम्बन्ध न हो। ये सब आपस में मिले-जुले हैं। तुम को संसार में ऐसा कोई भी मनुष्य न मिलेगा जो केवल कर्म ही करता हो। न ऐसा ही जन दृष्टि पड़ेगा जो केवल ईश्वर-पूजा और भक्ति में ही अपना सारा समय लगाता हो और न कोई ऐसी ही व्यक्ति मिलेगी जो केवल आत्मिक ज्ञान में ही रमण करती हो और उसको कर्म और भक्ति से कुछ लगाव न हो। यह विभाग केवल अवस्था और अधिकार-भेद से है। हम यह कह चुके हैं कि ये चारों मार्ग मिलकर एक हो जाते हैं। सब धर्म और कर्म के सारे अनुष्ठान और पूजा के सारे अङ्ग एक ही अभिमत स्थान पर पहुँचाने का प्रबन्ध करते हैं।

मैंने तुमको उस अभीष्ट स्थान के समझाने की भी चेष्टा की है। वह केवल मोक्ष है, जिसको स्वातन्त्र्य की पराकाष्ठा कहना

८६ कर्मयोग

चाहिए। प्रत्येक वस्तु, जिसको हम देखते हैं, स्वतन्त्रता के लिए छटपटा रही है। निर्जीव अणु से लेकर सजीव मनुष्य तक सब इसी स्वतन्त्रता के लिए उद्योग कर रहे हैं। प्रत्येक सघन वस्तु या पिण्ड—क्या समष्टिरूप से और क्या व्यष्टिरूप से—एक दूसरे से पृथक् होने का यत्न कर रहे हैं, पर उनका कर्म-चक्र ऐसा घूम रहा है कि वह उनको क्षण भर के लिए भी पृथक् होने नहीं देता। पृथिवी सूर्य से भागना चाहती है, चन्द्रमा पृथिवी से अलग रहना चाहता है। प्रत्येक वस्तु (चाहे वह जड़ हो या चेतन) जिन बन्धनों में बँधी हुई है, उनसे वह छूटना चाहती है और यही स्वतन्त्रता की स्वाभाविक इच्छा है। इसी के लिए योगी योग और भक्तजन भक्ति करते हैं और इसी की इच्छा से डाकू और लुटेरे लूट-मार में लगे हुए हैं। जब काम करने का ढंग अच्छा नहीं होता, हम उसको बुरा कहते हैं। मुमुक्षु को बन्धन का दुःख है, वह उससे छूटना चाहता है, इसलिए वह भक्ति और ज्ञान का आश्रय लेता है। चोर को किसी वस्तु की आवश्यकता है, वह दीनता के दुःख से बचना चाहता है, इसलिए चोरी करता है। दोनों का उद्देश्य एक ही मुक्ति है, सिर्फ़ इनके काम करने के ढंग भिन्न भिन्न हैं। एक उचित रीति पर अपना इष्ट-साधन करना चाहता है, दूसरा अनुचित रीति पर। जड़ हों या चेतन, मूर्ख हों या विद्वान् सब एक ही स्थान पर पहुँचना चाहते हैं।

सारे धर्म और सम्प्रदाय भी इसी मुक्ति के ग्राहक हैं, परन्तु यह मुक्ति बिना अपने आप को मिटाये किसी को मिल नहीं सकती। आप को मिटाने का यह आशय नहीं है कि हम आत्म-

सातवाँ अध्याय

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घात कर लें। नहीं, नहीं, इसका मतलब यह है कि हम अपने आप को अस्थिचर्मावनद्ध शरीर न समझें। ममता ही स्वार्थ की जननी है और यही सारे दुःखों का कारण है। यदि तुम मुक्ति चाहते हो तो “मैं” और “मेरा” इन दो फांसियों को काट दो। यही दो बेड़ियाँ हैं जो मनुष्य को इतनी प्रबल मुक्ति की इच्छा रखते हुए भी बन्धन में जकड़े हुए हैं। बिना इनको काटे तुम स्वार्थ के चक्र से नहीं निकल सकते। कर्मयोग हमको इस बन्धन से छूटने का उपाय बतलाता है और वह केवल स्वार्थ-त्याग है। जब तक स्वार्थ है, तभी तक “मैं” और “मेरा” बने हुए हैं। जहाँ स्वार्थ का नाश हुआ फिर केवल तू और तेरा ही शेष रह जाता है। वही कर्म बन्धन का हेतु है, जिसमें स्वार्थ लगा हुआ है। मैं करता हूँ, अपने या अपनों के लिए करता हूँ, ये संस्कार हैं जो हमको बार बार कर्म-चक्र में घुमा रहे हैं और इससे निकलने नहीं देते। कर्मयोगी यद्यपि कर्म करता है, तथापि वह उसका न अपने को कर्त्ता समझता है और न सम्प्रदान—अधिकारी। उसकी दृष्टि में ईश्वर ही कर्त्ता है और वही सम्प्रदान है। वह अपने को केवल निमित्त मात्र समझता है।

किन्तु यदि तुम आंशिक भेदों और शाखाओं में पड़कर वाद-विवाद करने लगोगे तो फिर इसका समझ में आना कठिन हो जायगा। क्योंकि आस पास की दशाओं और घटनाओं से भेद उत्पन्न हो जाता है। एक कर्म किसी विशेष दशा में निष्काम कहा जाता है, परन्तु दूसरी दशा में वही सकाम बन जाता है। इसलिए हम केवल एक सर्वतन्त्र-सिद्धान्त का पता दे सकते हैं,

६८ कर्मयोग

आंशिक और तदन्तर्गत बातों को देश, काल और अवसर के अधीन कर देते हैं। एक देश में एक काम अच्छा समझा जाता है, दूसरे देश में वही बुरा हो जाता है, क्योंकि उन दोनों की दशा एक सी नहीं होती।

निदान सृष्टि का सबसे बड़ा उद्देश मुक्ति है और मुक्ति केवल निष्काम कर्म करने से प्राप्त होती है। प्रत्येक शब्द, सङ्कल्प और कर्म—जिनमें स्वार्थ का लेश नहीं है—हमको मुक्ति की ओर ले जाते हैं, इस-लिए सदाचार का भी सबसे बड़ा आदर्श स्वार्थ-त्याग ही है। प्रत्येक धर्म और प्रत्येक जाति का धार्मिक दर्शन और ऐतिहासिक साहित्य इस आदर्श की सत्यता को स्वीकार करता है। कोई कोई धर्म यह शिक्षा देते हैं कि मनुष्य-जीवन का यह आदर्श ईश्वर की ओर से है। यदि तुम उनसे प्रश्न करो कि हम यह कर्म क्यों करें ? तो उत्तर मिलेगा कि "यह ईश्वर की आज्ञा है।" चाहे इसका कारण कुछ ही हो, सब में एक भाव काम करता मिलेगा और वह यह है कि अपने अभिमान और अहंभाव को दूर कर दो। परन्तु फिर भी बहुत से मनुष्य ऐसे होंगे जो यह बात सुनकर चौंक पड़ेंगे। क्योंकि ममता ने उनको जकड़ रक्खा है, वे यह समझते हैं कि आपे को मिटाने से हम आप ही न रहेंगे। वे भूले हुए हैं, वे चाहे ममता करें या न करें; मौत प्रत्येक दशा में अपना काम करेगी। अन्तर केवल इतना ही है कि ममता और अहंभाव में पड़े रहने से मौत उनके लिए बड़ी भयानक और दुःख-दायक होगी और इनको मिटा देने से वही मौत सुहावनी और सुखदायिनी हो जायगी। जब तक मनुष्य अहंभाव के मद से उन्मत्त है और अहंकार के चक्र में

सातवाँ अध्याय

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घूम रहा है, तब तक वह न तो निष्काम कर्म ही कर सकता है और न कर्म-योग का अधिकारी ही बन सकता है। इसलिए कर्म-योग में सबसे पहले अपने आपे को मिटाना होता है।

कर्म-योगी चाहे और किसी सिद्धान्त को न माने, उसका चाहे ईश्वर पर भी विश्वास न हो, वह सांख्य और वेदान्त के गूढ़ रहस्यों को भी चाहे न जानता हो, पर उसके लिए यह अत्यन्त आवश्यक और उचित है कि वह स्वार्थ-त्याग का अभ्यास करता हुआ अपनी अहंता (खुदी) को बिलकुल मिटा दे। उसका जीवन दूसरों के लिए होना चाहिए, न कि अपने लिए। जो दूसरों के लिए आप मिट सकता है, चाहे वह किसी सिद्धान्त या मत का अनुयायी हो, सच्चा कर्मयोगी है। भक्त-जन भक्ति से और ज्ञानी ज्ञान से भी इसी पदवी को प्राप्त करते हैं।

अब प्रश्न यह है कि कर्म क्या है? क्या हम संसार का उपकार कर सकते हैं? यथार्थ में तो इसका उत्तर "नहीं" है परन्तु सापेक्ष दशा में इसका उत्तर 'हाँ' होगा। कोई मनुष्य पूर्ण रीति पर संसार को लाभ नहीं पहुँचा सकता, यह असम्भव है। यदि ऐसा हो तो फिर संसार संसार ही न रहेगा। आप थोड़ी देर के लिए किसी भूखे की भूख मिटा सकते हैं, पर उसे भूख फिर सतावेगी। प्रत्येक प्रकार का सुख अनित्य है। कोई किसी को सदा के लिए न सुख पहुँचा सकता है, न दुःख। समुद्र में एक स्थान पर लहरें उठती हैं, दूसरी जगह खाली हो जाती है। संसार के समस्त उपकारों का परिणाम प्रत्येक समय में मनुष्य की इच्छा और चेष्टा के अनुसार एक सा रहा है। न कोई उसको बढ़ा सकता है, न घटा

१०० कर्मयोग

सकता है। आज तुम मानव-इतिहास के पत्र उलट कर देखो, क्या वे दुःख-सुख जो पहले थे, अब नहीं हैं। अब भी वे ही दिन-रात और मौसम हैं, जो पहले थे। यूनानी, मिसरी और रूमियों के समय में भी यही दशा थी और अब भी वही है। जहाँ तक इतिहास पता देता है, उसमें बदलाव नहीं हुआ। पर तो भी हम देखते हैं कि मनुष्य ने अपनी उन्नति के लिए सर्वदा कुछ न कुछ यत्न किया है। इतिहास के प्रत्येक समय में ऐसे हज़ारों स्त्री-पुरुष हुए हैं, जिन्होंने दूसरों की भलाई में अपने जीवन को लगाया है। उनको कहाँ तक सफलता हुई, इसमें संशय है। गेंद इधर से उधर तक लुढ़कती रहेगी। शारीरिक दुःख मिटा, मानसिक दुःख उत्पन्न हो गया, ऐसा होता ही रहता है। इधर कमी हुई, उधर बढ़ती हो गई। यह कहना कि किसी समय मैं संसार मैं दुःख न रहेगा, उन्मत्त-प्रलाप है। सब जातियों में यह विश्वास है कि एक दिन ऐसा आवेगा जब कि संसार में पाप और दुःख का नाम न रहेगा, परन्तु यह भ्रमात्मक और अमूलक विश्वास है। यदि ऐसा होगा तो फिर संसार संसार ही न रहेगा।

हम संसार में न तो दुःख की मात्रा बढ़ा सकते हैं, न सुख की। सदा इनकी मात्रा एक सी रहेगी। अन्तर केवल इतना होता है कि गेंद इधर से लुढ़क कर उधर जा रहेगी। यह न्यूनाधिक्य, यह ज्वार-भाटा प्रकृति का धर्म है। कैसे कोई मान ले कि मृत्यु के बिना जीवन हो सकता है? यह असमञ्जस है। जहाँ जीवन है वहाँ मौत का होना भी आवश्यक है। कोई सुख-दुःख के बिना नहीं है। दीपक जल रहा है, थोड़ी देर मैं अवश्य बुझेगा। यदि तुमको जीने

सर्वप्रिय ग्रन्थार्थ १०१

की इच्छा है तो साथ ही साथ मरना भी होगा। एक मनुष्य, जो अवनति की ओर देखता है, दुःखी हो जाता है। दूसरा जो उन्नति की ओर देख रहा है, अपने को सुखी समझता है। एक बालक, जिसको कोई चिन्ता नहीं है और जिसके माता-पिता संरक्षक वर्त्तमान हैं, अपने लिए प्रत्येक वस्तु को सुखदायक मानता है और प्रसन्न रहता है। बूढ़ों का अनुभव इसके बिलकुल विरुद्ध है। उनकी सब आशायें मन्द और शान्त होगई हैं; उनको पद पद पर मृत्यु का भय लगा हुआ है, जो कभी उनको सुख की नींद नहीं सोने देता। पुरानी जातियों में उदासीनता छाई हुई है, उनकी सब आशायें मर चुकीं। नई जातियाँ उत्साह में भरी हुई हैं, क्योंकि उनके चढ़ाव और उभार के दिन हैं। आर्यावर्त्त में एक कहावत चली आती है "हज़ार वर्ष का नगर हज़ार वर्ष का जङ्गल।" नगर उजड़ कर जङ्गल और जङ्गल आबाद होकर नगर बनते रहते हैं। इसी प्रकार सुख-दुःख का चक्र भी संसार में चल रहा है।

इसके पश्चात् समता (बराबरी) का सिद्धान्त भी विचारणीय है। किन्हीं किन्हीं मतवालों का विश्वास है कि ईश्वर उनका न्याय करने के लिए आवेगा, तब बड़ाई-छुटाई का सारा भेद मिट जायगा। यह सिद्धान्त कट्टर मनुष्यों का है जो अपने विश्वास में सच्चे हैं, पर सच्चाई से कोसों दूर हैं। इसी विश्वास ने रूम व यूनान के ग़ुलामों को ईसाई-धर्म की ओर आकर्षित किया। यह ग़ुलाम समझने लगे—जब ऐसा समय आवेगा, उनको ख़ूब खाने-पीने को मिलेगा। और वे झुण्ड के झुण्ड मसीही-झंडे के तले आने

१०२ कर्मयोग

लगे। जिन्होंने आरम्भ में इस विश्वास को फैलाया, वे कट्टर और मूर्ख थे। इस समय भी बराबरी और मानुष-अधिकारों के साम्य का उपदेश सुनाया जाता है। यह भी कट्टरपन है। न तो कभी संसार में समता की दशा आई और न कभी आवेगी। भला यह क्योंकर हो सकता है कि इस सृष्टि में, जो प्रकृति के वैषम्य का परिणाम है, सबकी साम्यावस्था हो जावे ! यह सर्वथा असम्भव है। सृष्टि क्यों उत्पन्न होती है ? प्रकृति की साम्यावस्था में भेद पड़ जाता है। आदि में जब यह सृष्टि नहीं बनी थी, प्रकृति साम्यावस्था में थी। उसमें विषमता का आना ही सृष्टि की उत्पत्ति का कारण है। जब तक यह सृष्टि वर्त्तमान है, उसमें विषमता रहेगी। कल्पना करो, सृष्टि के सारे परमाणु एकही दशा में आजायँ तब क्या इस दशा में सृष्टि का विलोप न हो जायगा ? अवश्य हो जायगा। इसलिए वैषम्य और अनेकता ही सृष्टि के चिह्न हैं। साम्य और एकता प्रलय में जाकर होती है। अब हमको देखना यह है कि मनुष्यों में यह भिन्नता क्यों है। उनके कर्म और संस्कार भिन्न भिन्न होने से हम संसार में भिन्न भिन्न संस्कारों को लेकर उत्पन्न होते हैं। हमारी इच्छायें, आचार, विचार और कर्म भी भिन्न भिन्न होते हैं। फिर हमारी दशा एकसी क्यों कर हो सकती है ? समता मृत्यु है और विषमता ही जीवन है। जब तक यह संसार है, समता हो नहीं सकती। पूरी समता उस समय आवेगी जब यह संसार न रहेगा। संसार में शक्ति-वैषम्य ही एक ऐसी वस्तु है जो मनुष्य को कर्म के लिए प्रेरित करती है। क्योंकि कर्म करने के लिए किसी न किसी उद्देश का सामने होना आवश्यक है

सातवाँ अध्याय १०३

और यह तब हो सकता है जबकि भिन्न भिन्न शक्तियाँ उस उद्देश के लिए अपना काम करती हों ।

संसार एक प्रकार का चक्र है, जिसमें भिन्न भिन्न कर्मों के अरे ( डंडे ) लगे हुए हैं। यदि हम अपना हाथ उसमें दे देंगे तो फँस जायेंगे। हम सोचते हैं कि हमने एक काम कर लिया और अब हमको आराम मिलेगा। पर देखने में आता है कि अभी एक काम पूरा नहीं हुआ, दूसरा आकर हमारे सामने खड़ा हो जाता है और यह संसार-चक्र हमको बलात् खींच ले जाता है। इससे बचने के दो उपाय हैं। एक यह कि चक्र से अलग खड़े रह कर तमाशा देखो, इसमें अपना हाथ मत दो। पर यह काम बड़ा कठिन है। मैं नहीं कह सकता कि २० करोड़ में एक मनुष्य भी ऐसा निकल सके। कहना सहज है, पर करना बड़ा कठिन है। दूसरा उपाय यह है कि संसार-समुद्र में प्रवेश करो, कर्म के रहस्य को समझो। संसार-चक्र से अलग मत रहो, किन्तु इसके सुरक्षित स्थान में बैठ कर संसार की परिक्रमा करो। स्मरण रक्खो, इस चक्र के भीतर से ही बाहर निकलने का द्वार है। परन्तु उस द्वार से वे ही निकल सकते हैं, जो कर्मों के डंडों में अपना हाथ नहीं देते। यदि तुम भी निर्लेप रह कर कर्म करोगे तो एक दिन इस चक्र से अवश्य बाहर निकल आओगे।

अब हमने जान लिया कि कर्म क्या है। इसी कर्म के आधार पर संसार की नींव रक्खी गई है और यह अनादि काल से प्रवाह रूप में इस संसार को चला रहा है। जो लोग ईश्वर पर विश्वास रखते हैं, वे इस कर्म के रहस्य को औरों की अपेक्षा अधिक समझ

१०४

कर्मयोग

सकते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि ईश्वर को हमारी सहायता की अपेक्षा नहीं। हमारा उद्देश मुक्ति है और वह निष्काम कर्म से मिल सकती है। "हम संसार का उपकार कर सकते हैं" यह भाव चाहे कट्टर मनुष्यों के लिए अच्छा हो, पर कर्मयोगी को इस से बचना चाहिए। कर्मयोगी के लिए सिवा परमार्थ या मुक्ति के और कोई उद्देश न होना चाहिए। सांसारिक उद्देश चाहे वह कितना ही बड़ा और अच्छा क्यों न हो, उसको नीचे गिरानेवाला है। गीता कहती है "कर्म करने का हमको अधिकार है, पर फल की आशा हमको कर्मयोग के उच्च उद्देश से गिरा देती है।" इसलिए फल की अपेक्षा न करके कर्म करना ही कर्मयोग का आदर्श है। कर्म करो, उसका फल ईश्वर के अर्पण कर दो। यदि फल की इच्छा से कर्म करोगे (चाहे शुभ कर्म ही हो) तो वह तुम्हारे बन्धन का हेतु होगा।

हम संसार नहीं हैं; हम शरीर नहीं हैं, वस्तुतः हम कर्म नहीं करते। हम केवल आत्मा हैं। हम अपने स्वरूप से शुद्ध, शान्त और आनन्दमय हैं। फिर क्यों हम इस कर्म के बन्धन में अपने को जकड़ें। क्यों और किसके लिए शोक और विलाप करते हो। आनन्दमय होकर और आनन्द-धाम में रह कर यह रोना कैसा ! पर हा ! हम लोग तो यहाँ तक अज्ञान और बालकों के समान मूर्ख हो गये हैं कि केवल आप ही नहीं रोते, किन्तु अपने ईश्वर को भी रुलाते हैं। हमारे समान हमारा ईश्वर भी स्वर्ग के सिंहासन पर बैठा हुआ रोया करता है। यह निर्बलता की चरम सीमा है। संसार में आसक्त पुरुष ही अपने प्रिय पदार्थों के वियोग से रोता है। इसलिए तुम बेलाग बनो। स्वार्थ की भावना

कर्मयोग १०५

को हृदय से निकाल कर शुभ कर्म करते रहो, तुम्हारे सारे बन्धन अपने आप टूट जावेंगे। प्रत्येक शुभ सङ्कल्प, शुभ उपदेश और शुभ कर्म, जो फल की प्रत्याशा से रहित होकर किया जाता है, इस बन्धन के दृढ़ पाश को (जिसमें बँधे हुए हम अपने को दीन, असमर्थ और दुःखार्त्त समझ रहे हैं) छिन्न भिन्न कर सकता है।

अब मैं एक बात कह कर अपने इस कथन को समाप्त करता हूँ। संसार में एक बहुत बड़ा कर्मयोगी हुआ है, उसका नाम बुद्ध था। संसार के सारे अवतार और पैग़म्बर किसी न किसी प्रयोजन या उद्देश से काम करते थे, पर बुद्ध इन सब से विलक्षण था। संसार में दो प्रकार के पैग़म्बर हुए हैं। एक तो वे जो अपने आप को ईश्वर का अवतार मानते थे। दूसरे वे जिन्होंने अपने को ईश्वर का दूत (रसूल) प्रकट किया। यद्यपि उन सब के उपदेशों और चरित्रों में बहुत से आध्यात्मिक उच्च-भाव और आदर्श मिलेंगे तथापि यह सिद्ध है कि उन्होंने बाह्य उद्देशों को अपने सामने रख कर काम किया। केवल बुद्ध ही ऐसा मनुष्य था जिसका यह कथन है कि "मुझको ईश्वर के विषय में ज्ञान प्राप्त करने की कुछ भी आवश्यकता नहीं। आत्मिक गूढ़ सिद्धान्तों पर वाद-विवाद करने की आवश्यकता क्या है? शुभ कर्म करो, धर्मात्मा बनो, तुमको इसी से मुक्ति और सच्चाई मिलेगी।" वह अपने पवित्र और उच्च-भावों का मूर्त्तिमान् चित्र था। उसमें स्वार्थ का लेश नहीं था, न उसका कोई जातीय वा सामूहिक उद्देश था। संसार में किसने उससे अच्छा या अधिक काम किया है? इतिहास में कोई व्यक्ति ऐसी दिखाई नहीं पड़ती, जिसने संसार पर अपना इतना आश्चर्य-

१०६

कर्मयोग

मय प्रभाव डाला हो। मनुष्य-जाति में यह एक अपूर्व उदाहरण है। ऐसी उच्च फ़िलासफ़ी और ऐसी प्रबल संवेदना और सहानुभूति आपको और कहाँ दीख पड़ती है? यह ऐसा उच्चमनस्क दार्शनिक हुआ है, जिसके गूढ़ विचार और उच्च सिद्धान्तों में काल्पनिक और विवादास्पद विषयों की मीमांसा या विवेचना मिलेगी। किन्तु मनुष्य की स्वभाव-सुलभ और अनुभव-सिद्ध जो बातें हैं, उन्हीं का विवेचन प्रबल युक्तियों के द्वारा इस महात्मा ने किया है। क्षुद्र से क्षुद्र प्राणी के साथ भी उसकी सहानुभूति थी। उसने सब के साथ दया-भाव प्रकट किया। जब तक जिया, दूसरों के कष्ट-मोचन और दुःख-निवारण में लगा रहा, पर अपने लिए किसी फल का इच्छुक नहीं हुआ। यही कर्मयोग का उच्च आदर्श है। इसमें न कोई स्वार्थ है और न निज का कोई उद्देश है। इतिहास पुकार पुकार कर कह रहा है कि बुद्ध जैसा निःस्वार्थ, त्यागी, सच्चा कर्मयोगी, महापुरुष संसार ने अब तक उत्पन्न नहीं किया। वह पहला मनुष्य था, जो कहा करता था कि "प्राचीन पुस्तकों की आज्ञाओं पर केवल उनके प्राचीन होने के कारण विश्वास न करो, अपने जातीय सिद्धान्तों पर केवल जातीयता के विचार से विश्वास न करो; किन्तु उनको बुद्धि की तुला पर तोल कर देखो, तर्क और युक्ति की कसौटी में परखो। यदि उनमें भलाई और सच्चाई है तो स्वीकार करो और उन पर विश्वास करो, और उन्हीं के अनुसार अपना जीवन बनाओ। अपने मन, वचन और कर्म को एक बनाओ और उनके द्वारा दूसरों की सहायता करो।" बस, यही गौतम-बुद्ध की शिक्षा है और यही कर्मयोग का सब से उच्च आदर्श है।

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CC-0. In Public Domain. Funding by IKS-MoE

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