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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

८४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

८४कठोपनिषद्[ अध्याय १

| नैष दोषः। सर्वस्य प्रत्यगात्मत्वादवगतिरेव गतिरित्युपचर्यते। प्रत्यगात्मत्वं च दर्शितमिन्द्रियमनोबुद्धिपरत्वेन। यो हि गन्ता सोऽगतमप्रत्यग्रूपं गच्छत्यनात्मभूतं न विपर्ययेण। तथा च श्रुतिः—"अनध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः" इत्याद्या। तथा च दर्शयति प्रत्यगात्मत्वं सर्वस्य— | समाधान—यह दोष नहीं है, क्योंकि सबका प्रत्यगात्मा होनेसे आत्माके ज्ञानको ही उपचारसे गति कहा गया है। तथा इन्द्रिय, मन और बुद्धिसे आत्माका परत्व प्रदर्शित कर उसका प्रत्यगात्मत्व दिखलाया गया है, क्योंकि जो जानेवाला है वह अपने पृथक् अनात्मभूत एवं अप्राप्त स्थानकी ओर ही जाया करता है; इससे विपरीत अपनी ही ओर नहीं आता-जाता। इस विषयमें "संसारमार्गसे पार होनेकी इच्छावाले पुरुष मार्गरहित होते हैं" इत्यादि श्रुति भी प्रमाण है। तथा आगेकी श्रुति भी पुरुषका सबका ही प्रत्यगात्मा होना प्रदर्शित करती है— |

आत्मा सूक्ष्मबुद्धिग्राह्य है

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥

सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशमान नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरुषोंद्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्मबुद्धिसे ही देखा जाता है ॥ १२ ॥

| एष पुरुषः सर्वेषु ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु भूतेषु गूढः संवृत्तो दर्शनश्रवणादिकर्माविद्यामाया- | यह पुरुष ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंमें गूढ यानी छिपा हुआ, दर्शन, श्रवण आदि कर्म करनेवाला तथा अविद्या यानी |

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५


संस्कृतहिन्दी
च्छन्नोऽत एवात्मा न प्रकाशत आत्मत्वेन कस्यचित् । अहो अतिगम्भीरा दुरवगाहा विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः परमार्थसत्त्वोऽप्येवं बोध्यमानोऽहं परमात्मेति न गृह्णात्यनात्मानं देहेन्द्रियादिसङ्घातमात्मनो दृश्यमानमपि घटादिवदात्मत्वेनाहममुष्य पुत्र इत्यनुच्यमानोऽपि गृह्णाति । नूनं परस्यैव मायया मोमुह्यमानः सर्वो लोको बम्भ्रमीति । तथा च स्मरणम्—"नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः" (गीता ७ । २५) इत्यादि ।मायासे आच्छादित है । अतः सबका अन्तरात्मस्वरूप होनेके कारण आत्मा किसीके प्रति प्रकाशित नहीं होता । अहो ! यह माया बड़ी ही गम्भीर, दुर्गम और विचित्र है, जिससे कि ये संसारके सभी जीव वस्तुतः परमार्थस्वरूप होनेपर भी [शास्त्र और आचार्यद्वारा] वैसा बोध कराये जानेपर 'मैं परमात्मा हूँ' इस तत्त्वको ग्रहण नहीं करते; बल्कि जो देह और इन्द्रिय आदि संघात घटादिके समान अपने दृश्य हैं उन्हें, किसीके न कहनेपर भी 'मैं इसका पुत्र हूँ' इत्यादि प्रकारसे आत्मभावसे ग्रहण करते हैं । निश्चय, उस परमात्माकी ही मायासे यह सारा जगत् अत्यन्त भ्रान्त हो रहा है । "योगमायासे आवृत हुआ मैं सबके प्रति प्रकाशित नहीं होता" ऐसी ही यह स्मृति भी है ।
ननु विरुद्धमिदमुच्यते "मत्वा धीरो न शोचति" (क० उ० २ । १ । ४) "न प्रकाशते" (क० उ० १ । ३ । १२) इति च ।शङ्का—किन्तु "उसे जानकर पुरुष शोक नहीं करता" "[वह गूढ आत्मा] प्रकाशित (ज्ञात) नहीं होता" यह तो विपरीत ही कहा गया है ।
नैतदेवम् । असंस्कृतबुद्धेरविज्ञेयत्वान्न प्रकाशत इत्युक्तम् ।समाधान—ऐसी बात नहीं है । आत्मा अशुद्धबुद्धि पुरुषके लिये अविज्ञेय है; इसीलिये यह कहा

८६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

८६कठोपनिषद्[ अध्याय १

| दृश्यते तु संस्कृतया अग्र्यया अग्रमिवाग्र्या तया, एकाग्रतयोपेतयेत्येतत्, सूक्ष्मया सूक्ष्मवस्तुनिरूपणपरया; कै:? सूक्ष्मदर्शिभिः 'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः' इत्यादिप्रकारेण सूक्ष्मतापारम्पर्यदर्शनेन परं सूक्ष्मं द्रष्टुं शीलं येषां ते सूक्ष्मदर्शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः पण्डितैरित्येतत् ॥ १२ ॥ | गया है कि 'वह प्रकाशित नहीं होता'। वह तो संस्कारयुक्त और तीक्ष्ण—जो किसी पैनी नोकके समान सूक्ष्म हो ऐसी एकाग्रतासे युक्त और सूक्ष्म वस्तुके निरीक्षणमें लगी हुई तीव्र बुद्धिसे ही दिखलायी देता है। किन्हें दिखलायी देता है? [इसपर कहते हैं—] सूक्ष्मदर्शियोंको। 'इन्द्रियोंसे उनके विषय सूक्ष्म हैं' इत्यादि प्रकारसे सूक्ष्मताकी परम्पराका विचार करनेसे जिनका पर—सूक्ष्म वस्तुको देखनेका स्वभाव पड़ गया है, वे सूक्ष्मदर्शी हैं; उन सूक्ष्मदर्शी पण्डितोंको [वह दिखलायी देता है]—यह इसका भावार्थ है ॥ १२ ॥ |

लयचिन्तन

तत्प्रतिपत्त्युपायमाह—अब उसकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं—

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि १३

विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रियका मनमें उपसंहार करे, उसका प्रकाश-स्वरूप बुद्धिमें लय करे, बुद्धिको महत्तत्त्वमें लीन करे और महत्तत्त्वको शान्त आत्मामें नियुक्त करे ॥ १३ ॥

| वल्ली ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८७ |

वल्ली ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ८७
संस्कृतहिन्दी
यच्छेन्नियच्छेदुपसंहरेत्प्राज्ञो विवेकी; किम् ? वाग्वाचम्। वागत्रोपलक्षणार्था सर्वेषामिन्द्रियाणाम्। क्व ? मनसी मनसीतिच्छान्दसं दैर्घ्यम्। तच्च मनो यच्छेज्ज्ञाने प्रकाशस्वरूपे बुद्धौ आत्मनि। बुद्धिर्हि मनआदिकरणान्याप्नोतीत्यात्मा प्रत्यक् तेषाम्। ज्ञानं बुद्धिमात्मनि महति प्रथमजे नियच्छेत्। प्रथमजवत् स्वच्छस्वभावकमात्मनो विज्ञानम् आपादयेदित्यर्थः। तं च महान्तम् आत्मानं यच्छेच्छान्ते सर्वविशेषप्रत्यस्तमितरूपेऽविक्रिये सर्वान्तरे सर्वबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणि मुख्य आत्मनि ॥ १३ ॥विवेकी पुरुष 'यच्छेत्' अर्थात् नियुक्त करे—उपसंहार करे; किसका उपसंहार करे ? वाक् अर्थात् वाणीका। यहाँ वाक् सम्पूर्ण इन्द्रियोंका उपलक्षण करानेके लिये है। कहाँ उपसंहार करे? मनमें; 'मनसी' पदमें ह्रस्व इकारके स्थानमें दीर्घ प्रयोग छान्दस है। फिर उस मनको ज्ञान अर्थात् प्रकाशस्वरूप बुद्धि—आत्मामें लीन करे। बुद्धि ही मन आदि इन्द्रियोंमें व्याप्त है, इसलिये वह उनका आत्मा—प्रत्यक्स्वरूप है। उस ज्ञानस्वरूप बुद्धिको प्रथम विकार महान् आत्मामें लीन करे अर्थात् प्रथम उत्पन्न हुए महत्तत्त्वके समान आत्माका स्वच्छस्वभाव विज्ञान प्राप्त करे। और महान् आत्माको जिसका स्वरूप सम्पूर्ण विशेषोंसे रहित है और जो अविक्रिय, सर्वान्तर तथा बुद्धिके सम्पूर्ण प्रत्ययोंका साक्षी है उस मुख्य आत्मामें लीन करे ॥ १३ ॥
एवं पुरुष आत्मनि सर्वं प्रविलाप्य नामरूपकर्मत्रयं यन्मिथ्याज्ञानविजृम्भितं क्रियाकारकफललक्षणं स्वात्मयाथात्म्यज्ञानेन<br>कठो० ४—मृगतृष्णा, रज्जु और आकाशके स्वरूपका ज्ञान होनेसे जैसे मृगजल, रज्जु-सर्प और आकाश-मालिन्यका बाध हो जाता है उसी प्रकार मिथ्याज्ञानसे प्रतीत होनेवाले समस्त प्रपञ्च यानी नाम, रूप और कर्म

८८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

८८कठोपनिषद्[ अध्याय १

| मरीच्युदकरज्जुसर्पगगनमलानीव मरीचिरज्जुगगनस्वरूपदर्शनेनैव स्वस्थः प्रशान्तात्मा कृतकृत्यो भवति यतोऽतस्तद्दर्शनार्थम्— | इन तीनोंको, जो क्रिया कारक और फलरूप ही हैं, स्वात्मतत्त्वके यथार्थ ज्ञानद्वारा पुरुष अर्थात् आत्मामें लीन करके मनुष्य स्वस्थ, प्रशान्तचित्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। क्योंकि ऐसा है, इसलिये उसका साक्षात्कार करनेके लिये— |

उद्बोधन

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥

[अरे अविद्याग्रस्त लोगो !] उठो, [अज्ञान-निद्रासे] जागो, और श्रेष्ठ पुरुषोंके समीप जाकर ज्ञान प्राप्त करो। जिस प्रकार छुरेकी धार तीक्ष्ण और दुस्तर होती है, तत्त्वज्ञानी लोग उस मार्गको वैसा ही दुर्गम बतलाते हैं ॥ १४ ॥

| अनाद्यविद्याप्रसुप्ता उत्तिष्ठत हे जन्तव आत्मज्ञानाभिमुखा भवत; जाग्रताज्ञाननिद्राया घोररूपायाः सर्वानर्थबीजभूतायाः क्षयं कुरुत। | अरे अनादि अविद्यासे सोये हुए जीवो ! उठो, आत्मज्ञानके अभिमुख होओ तथा घोररूप अज्ञाननिद्रासे जागो—सम्पूर्ण अनर्थोंकी बीजभूत उस अज्ञान-निद्राका क्षय करो। | | कथम् ? प्राप्योपगम्य वरान् प्रकृष्टानाचार्यांस्तद्विदस्तदुपदिष्टं सर्वान्तरमात्मानमहमस्मीति निबोधतावगच्छत। न ह्युपेक्षित- | किस प्रकार [क्षय करें ?] श्रेष्ठ—उत्कृष्ट आत्मज्ञानी आचार्योंके पास जाकर—उनके समीप पहुँचकर उनके उपदेश किये हुए सर्वान्तर्यामी आत्माको 'मैं यही हूँ' ऐसा जानो। उसकी उपेक्षा नहीं |

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९


शाङ्करभाष्यम्भाषानुवाद
व्यमिति श्रुतिरनुकम्पयाह मातृवत् । अतिसूक्ष्मबुद्धिविषयत्वाज्ज्ञेयस्य । किमित्र सूक्ष्मबुद्धिः इत्युच्यते; क्षुरस्य धाराग्रं निशिता तीक्ष्णीकृता दुरत्यया दुःखेनात्ययो यस्याः सा दुरत्यया । यथा सा पद्भ्यां दुर्गमनीया तथा दुर्गं दुःसंपाद्यमित्येतत् पथः पन्थानं तत्त्वज्ञानलक्षणं मार्गं कवयो मेधाविनो वदन्ति । ज्ञेयस्यातिसूक्ष्मत्वात्तद्विषयस्य ज्ञानमार्गस्य दुःसंपाद्यत्वं वदन्तीत्यभिप्रायः ॥ १४ ॥करनी चाहिये—ऐसा मातृवत् श्रुति कृपापूर्वक कह रही है, क्योंकि वह ज्ञेय पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धिका ही विषय है । सूक्ष्म बुद्धि कैसी होती है ? इसपर कहते हैं—निशित अर्थात् पैनायी हुई छुरेकी धार—अग्रभाग जिस प्रकार दुरत्यय होती है—जिसे कठिनतासे पार किया जा सके उसे दुरत्यय कहते हैं । जिस प्रकार उसपर पैरोंसे चलना अत्यन्त कठिन है उसी प्रकार यह आत्म-ज्ञानका मार्ग बड़ा दुर्गम अर्थात् दुष्प्राप्य है—ऐसा कवि—मेधावी पुरुष कहते हैं । अभिप्राय यह है कि ज्ञेय अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण मनीषिजन उससे सम्बन्धित ज्ञान-मार्गको दुष्प्राप्य बतलाते हैं ॥ १४ ॥
तत्कथमतिसूक्ष्मत्वं ज्ञेयस्य इत्युच्यते; स्थूला तावदियं मेदिनी शब्दस्पर्शरूपरसगन्धोपचिता सर्वेन्द्रियविषयभूता तथा शरीरम् । तत्रैकैकगुणापकर्षेण गन्धादीनां सूक्ष्मत्वमहत्त्वविशुद्धत्वनित्यत्वा-उस ज्ञेयकी अत्यन्त सूक्ष्मता किस प्रकार है ? इसपर कहते हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—[इन पाँचों विषयों] से वृद्धिको प्राप्त हुई तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी विषयभूत यह पृथिवी स्थूल है; ऐसा ही शरीर भी है । उनमें गन्धादि गुणोंमेंसे एक-एकका अपकर्ष—क्षय होनेसे जलसे लेकर

९० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

९०कठोपनिषद्[ अध्याय १

दितारतम्यं दृष्टमब्वादिषु याव-<br>दाकाशमिति ते गन्धादयः सर्व<br>एव स्थूलत्वाद्विकाराः शब्दान्ता<br>यत्र न सन्ति किमु तस्य सूक्ष्म-<br>त्वादिनिरतिशयत्वं वक्तव्यम्<br>इत्येतद्दर्शयति श्रुतिः—आकाशपर्यन्त चार भूतोंमें सूक्ष्मत्व,<br>महत्त्व, विशुद्धत्व और नित्यत्व<br>आदिका तारतम्य देखा गया है ।<br>किन्तु स्थूल होनेके कारण जहाँ<br>गन्धसे लेकर शब्दपर्यन्त ये सारे<br>विकार नहीं हैं उसके सूक्ष्मत्वादिकी<br>निरतिशयताके विषयमें क्या कहा<br>जाय ? यही बात आगेकी श्रुति<br>दिखलाती है—

'निर्विशेष आत्मज्ञानसे अमृतत्वप्राप्ति'

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥

जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, तथा रसहीन, नित्य और गन्धरहित है; जो अनादि, अनन्त, महत्तत्त्वसे भी पर और ध्रुव (निश्चल) है उस आत्मतत्त्वको जानकर पुरुष मृत्युके मुखसे छूट जाता है ॥ १५ ॥

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं<br><br>तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्<br><br>एतद्व्याख्यातं ब्रह्माव्ययम्—<br><br>यद्धि शब्दादिमत्तद्व्येतीदं तु<br><br>अशब्दादिमत्त्वादव्ययं न व्येति<br><br>न क्षीयते, अत एव च नित्यं<br><br>यद्धि व्येति तदनित्यमिदं तु नजो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय तथा अरस, नित्य और अगन्धयुक्त है—ऐसी जिसकी व्याख्या की जाती है वह ब्रह्म अविनाशी है, क्योंकि जो पदार्थ शब्दादियुक्त होता है उसीका व्यय होता है; किन्तु यह ब्रह्म तो अशब्दादियुक्त होनेके कारण अव्ययः है; इसका व्यय—क्षय नहीं होता, इसीलिये यह नित्य भी है; क्योंकि जिसका व्यय होता है वह अनित्य है। इसका व्यय नहीं होता

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
व्येत्यतो नित्यम् । इतश्च नित्यम् अनाद्यविद्यमान आदिः कारणम् अस्य तदिदमनादि । यद्द्यादिमत्तत्कार्यत्वादनित्यं कारणे प्रलीयते यथा पृथिव्यादि । इदं तु सर्वकारणत्वादकार्यमकार्यत्वान्नित्यं न तस्य कारणमस्ति यस्मिन्प्रलीयेत ।इसलिये यह नित्य है । यह अनादि अर्थात् जिसका आदि—कारण विद्यमान नहीं है ऐसा होनेसे भी नित्य है, क्योंकि जो पदार्थ आदिमान् होता है वह कार्यरूप होनेसे अनित्य होता है और अपने कारणमें लीन हो जाता है; जैसे कि पृथिवी आदि । किन्तु यह आत्मा तो सबका कारण होनेसे अकार्य है और अकार्य होनेके कारण नित्य है । इसका कोई कारण नहीं है, जिसमें कि यह लीन हो ।
तथानन्तम् अविद्यमानोऽन्तः कार्यमस्य तदनन्तम् । यथा कदल्यादेः फलादिकार्योत्पादनेन अपि अनित्यत्वं दृष्टं न च तथाप्यन्तवत्त्वं ब्रह्मणः; अतोऽपि नित्यम् ।इसी प्रकार यह आत्मा अनन्त भी है । जिसका अन्त अर्थात् कार्य अविद्यमान हो उसे अनन्त कहते हैं । जिस प्रकार फलादि कार्य उत्पन्न करनेसे भी कदली आदि पौधोंकी अनित्यता देखी गयी है उस प्रकार ब्रह्मका अन्तवत्त्व नहीं देखा गया । इसलिये भी वह नित्य है ।
महतो महत्तत्त्वाद्वुद्ध्याख्यात्परं विलक्षणं नित्यविज्ञप्तिस्वरूपत्वात्सर्वसाक्षि हि सर्वभूतात्मत्वाद्ब्रह्म । उक्तं हि "एष सर्वेषु भूतेषु" (क० उ० १।३।१२)नित्यविज्ञप्तिस्वरूप होनेके कारण बुद्धिसंज्ञक महत्तत्त्वसे भी पर अर्थात् विलक्षण है, क्योंकि ब्रह्म सम्पूर्ण भूतोंका अन्तरात्मा होनेके कारण सबका साक्षी है । यह बात उपर्युक्त "एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते" इत्यादि मन्त्रमें कही ही

९२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

९२कठोपनिषद्[ अध्याय १

| इत्यादि । ध्रुवं च कूटस्थं नित्यं<br>न पृथिव्यादिवदापेक्षिकं नित्य-<br>त्वम् । तदेवंभूतं ब्रह्मात्मानं<br>निचाय्यावगम्य तमात्मानं मृत्यु-<br>मुखान्मृत्युगोचरादविद्याकाम-<br>कर्मलक्षणात्प्रमुच्यते विमुच्यते । | गयी है। इसी प्रकार वह ध्रुव—<br>कूटस्थ नित्य है। उसकी नित्यता<br>पृथिवी आदिके समान आपेक्षिक<br>नहीं है। उस इस प्रकारके<br>ब्रह्म—आत्माको जानकर पुरुष<br>मृत्युमुखसे—अविद्या, काम और<br>कर्मरूप मृत्युके पंजेसे मुक्त—वियुक्त<br>हो जाता है ॥ १५ ॥ |

| प्रस्तुतविज्ञानस्तुत्यर्थमाह श्रुतिः— | अब प्रस्तुत विज्ञानकी स्तुतिके लिये श्रुति कहती है— |

प्रस्तुत विज्ञानकी महिमा

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥

नचिकेताद्वारा प्राप्त तथा मृत्युके कहे हुए इस सनातन विज्ञानको कह और सुनकर बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मलोकमें महिमान्वित होता है ॥१६॥

| नाचिकेतं नचिकेतसा प्राप्तं<br>नाचिकेतं मृत्युना प्रोक्तं मृत्यु-<br>प्रोक्तमिदमाख्यानमुपाख्यानं<br>वल्लीत्रयलक्षणं सनातनं चिरन्तनं<br>वैदिकत्वादुक्त्वा ब्राह्मणेभ्यः<br>श्रुत्वाचार्येभ्यो मेधावी ब्रह्मैव<br>लोको ब्रह्मलोकस्तस्मिन्महीयत<br>आत्मभूत उपास्यो भवतीत्यर्थः<br>॥ १६ ॥ | नचिकेताद्वारा प्राप्त किये तथा<br>मृत्युके कहे हुए इस तीन वल्लियों-<br>वाले उपाख्यानको, जो वैदिक<br>होनेके कारण सनातन—चिरन्तन<br>है, ब्राह्मणोंसे कहकर तथा आचार्यों-<br>से सुनकर मेधावी पुरुष ब्रह्मलोक-<br>में—ब्रह्म ही लोक है; उसमें<br>महिमान्वित होता है अर्थात् सबका<br>आत्मस्वरूप होकर उपासनीय<br>होता है ॥ १६ ॥ |

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९३

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९३


य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ॥
तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥

जो पुरुष इस परमगुह्य ग्रन्थको पवित्रतापूर्वक ब्राह्मणोंकी सभामें अथवा श्राद्धकालमें सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है, अनन्त फलवाला होता है ॥ १७॥


यः कश्चिदिमं ग्रन्थं परमं प्रकृष्टं गुह्यं गोप्यं श्रावयेद्ग्रन्थतोऽर्थतश्च ब्राह्मणानां संसदि ब्रह्मसंसदि प्रयतः शुचिर्भूत्वा श्राद्धकाले वा श्रावयेद्भुञ्जानानां तच्छ्राद्धमस्याऽऽनन्त्यायानन्तफलाय कल्पते संपद्यते । द्विर्वचनम् अध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १७ ॥जो कोई पुरुष इस परम—प्रकृष्ट और गुह्य—गोपनीय ग्रन्थको पवित्र होकर ब्राह्मणोंकी सभामें अथवा श्राद्धकालमें—भोजन करनेके लिये बैठे हुए ब्राह्मणोंके प्रति केवल पाठमात्र या अर्थ करते हुए सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है । यहाँ अध्यायकी समाप्तिके लिये ‘तदानन्त्याय कल्पते’ यह वाक्य दो बार कहा गया है ॥१७॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये तृतीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ ३ ॥


इति कठोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय

द्वितीय अध्याय

प्रथमा वल्ली

आत्मदर्शनका विघ्न—इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता

| एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा<br><br>न प्रकाशते दृश्यते त्वग्र्यया<br><br>बुद्धयेत्युक्तम् । कः पुनः प्रति-<br><br>बन्धोऽग्रचाया बुद्धेर्येन तदभावात्<br><br>आत्मा न दृश्यत इति तद्दर्शन-<br><br>कारणप्रदर्शनार्था वल्लयारभ्यते ।<br><br>विज्ञाते हि श्रेयःप्रतिबन्धकारणे<br><br>तदपनयनाय यत्न आरब्धुं शक्यते<br><br>नान्यथेति— | 'सम्पूर्ण भूतोंमें छिपा हुआ वह आत्मा प्रकाशित नहीं होता; वह तो एकाग्र बुद्धिसे ही देखा जाता है' ऐसा पहले ( १ । ३ । १२ में ) कहा था । अब प्रश्न होता है कि एकाग्र बुद्धिका ऐसा कौन प्रतिबन्ध है जिससे कि उस( एकाग्र बुद्धि ) का अभाव होनेपर आत्मा दिखायी नहीं देता ? अतः आत्मदर्शनके प्रतिबन्धका कारण दिखलानेके लिये यह वल्ली आरम्भ की जाती है, क्योंकि श्रेयके प्रतिबन्धका कारण जान लेनेपर ही उसकी निवृत्तिके यत्नका आरम्भ किया जा सकता है, अन्यथा नहीं— |

पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू-<br> स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् ।<br> कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष-<br> दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥

स्वयम्भू ( परमात्मा ) ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है । इसीसे जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं । जिसने अमरत्वको इच्छा करते हुए अपनी इन्द्रियोंको रोक लिया है ऐसा कोई धीर पुरुष ही प्रत्यगात्माको देख पाता है ॥ १ ॥

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५


| पराञ्चि परागञ्चन्ति गच्छन्तीति खानि तदुपलक्षितानि श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि खानीत्युच्यन्ते। तानि पराञ्च्येव शब्दादिविषयप्रकाशनाय प्रवर्त्तन्ते। यस्मादेवं स्वाभाविकानि तानि व्यतृणद्धिंसितवान्हननं कृतवान् इत्यर्थः। कोऽसौ ? स्वयम्भूः परमेश्वरः स्वयमेव स्वतन्त्रो भवति सर्वदा न परतन्त्र इति। तस्मात्पराङ् पराग्रूपाननात्मभूताञ्छब्दादीन्पश्यत्युपलभत उपलब्ध्वा, नान्तरात्मन्नान्तरात्मानमित्यर्थः।<br><br>एवंस्वभावेऽपि सति लोकस्य कश्चिन्नद्याः प्रतिस्रोतःप्रवर्त्तनमिव धीरो धीमान्विवेकी प्रत्यगात्मानं | जो पराक् अर्थात् बाहरकी ओर अञ्चन करती—गमन करती हैं उन्हें 'पराञ्चि' (बाहर जानेवाली) कहते हैं। 'ख' छिद्रोंको कहते हैं, उनसे उपलक्षित श्रोत्रादि इन्द्रियाँ 'खानि'* नामसे कही गयी हैं। वे बहिर्मुख होकर ही शब्दादि विषयोंको प्रकाशित करनेके लिये प्रवृत्त हुआ करती हैं। क्योंकि वे ऐसी हैं इसलिये स्वभावसे ही उन्हें हिंसित कर दिया है—उनका हनन कर दिया है। वह [हनन करनेवाला] कौन है ? स्वयम्भू—परमेश्वर अर्थात् जो स्वतः ही सर्वदा स्वतन्त्र रहता है—परतन्त्र नहीं रहता। इसलिये वह उपलब्ध्वा सर्वदा पराक् अर्थात् बहिःस्वरूप अनात्मभूत शब्दादि विषयोंको ही देखता—उपलब्ध करता है, 'नान्तरात्मन्' अर्थात् अन्तरात्माको नहीं।<br><br>यद्यपि लोकका ऐसा ही स्वभाव है तो भी कोई धीर—बुद्धिमान्—विवेकी पुरुष ही नदीको उसके प्रवाहके विपरीत दिशामें फेर देनेके समान [इन्द्रियोंको विषयोंकी |


* नपुं० 'ख' शब्दका प्रथमा-बहुवचन।

९६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

९६कठोपनिषद्[ अध्याय २
प्रत्यक्चासावात्मा चेति प्रत्यगात्मा। प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढो लोके नान्यस्मिन्। व्युत्पत्तिपक्षेऽपि तत्रैवात्मशब्दो वर्तते।<br><br>“यच्चाप्नोति यदादत्ते<br>  यच्चात्ति विषयानिह।<br>यच्चास्य संततो भाव-<br>  स्तस्मादात्मेति कीर्त्यते”<br>   (लिङ्ग० १। ७०। ९६)<br><br>इत्यात्मशब्दव्युत्पत्तिस्मरणात्।ओरसे हटाकर] उस अपने प्रत्यगात्माको [देखता है]। जो प्रत्यक् (सम्पूर्ण विषयोंको जाननेवाला) हो और आत्मा भी हो उसे प्रत्यगात्मा कहते हैं। लोकमें आत्मा शब्द ‘प्रत्यक्’ के अर्थमें ही रूढ है, और किसी अर्थमें नहीं। व्युत्पत्तिपक्षमें भी ‘आत्मा’ शब्दकी प्रवृत्ति उसी (प्रत्यक्-अर्थ ही) में है जैसा कि “क्योंकि यह सबको व्याप्त करता है, ग्रहण करता है और इस लोकमें विषयोंको भोगता है तथा इसका सर्वदा सद्भाव है इसलिये यह ‘आत्मा’ कहलाता है” इस प्रकार आत्मा शब्दकी व्युत्पत्तिके सम्बन्धमें स्मृति है।
तं प्रत्यगात्मानं स्वं स्वभावमैक्षदपश्यत्पश्यतीत्यर्थः, छन्दसि कालानियमात्। कथं पश्यतीत्युच्यते। आवृत्तचक्षुरावृत्तं व्यावृतं चक्षुः श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातमशेषविषयाद्यस्य स आवृत्तचक्षुः। स एवं संस्कृतः प्रत्यगात्मानं पश्यति। न हि बाह्यविषया-उस प्रत्यगात्माको अर्थात् अपने स्वरूपको ‘ऐक्षत्’—देखा यानी देखता है। वैदिक प्रयोगमें कालका नियम न होनेके कारण यहाँ वर्तमान कालके अर्थमें भूतकालकी क्रिया [ऐक्षत्] का प्रयोग हुआ है। वह किस प्रकार देखता है ? इसपर कहते हैं—‘आवृत्तचक्षुः’ अर्थात् जिसने अपनी चक्षु और श्रोत्रादि इन्द्रियसमूहको सम्पूर्ण विषयोंसे व्यावृत कर लिया है—लौटा लिया है, वह इस प्रकार संस्कारयुक्त हुआ पुरुष ही उस प्रत्यगात्माको देख पाता है। एक

| वल्ली १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७ |

वल्ली १ ]शाङ्करभाष्यार्थ९७
संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
लोचनपरत्वं प्रत्यगात्मेक्षणं चैकस्य संभवति। किमर्थं पुनरित्थं महता प्रयासेन स्वभावप्रवृत्तिनिरोधं कृत्वा धीरः प्रत्यगात्मानं पश्यति इत्युच्यते; अमृतत्वममरणधर्मत्वं नित्यस्वभावतामिच्छन् आत्मन इत्यर्थः ॥ १ ॥ही पुरुषके लिये बाह्य विषयोंकी आलोचनामें तत्पर रहना तथा प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करना—ये दोनों बातें सम्भव नहीं हैं। 'अच्छा, तो, इस प्रकार महान् परिश्रमसे [इन्द्रियोंकी] स्वाभाविक प्रवृत्तिको रोककर धीर पुरुष प्रत्यगात्माको क्यों देखता है?' ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं—'अमृतत्व—अमरणधर्मत्व अर्थात् आत्माकी नित्यस्वभावताकी इच्छा करता हुआ [उसे देखता है]' ॥१॥
यत्तत्स्वाभाविकं परागेव अनात्मदर्शनं तदात्मदर्शनस्य प्रतिबन्धकारणमविद्या तत्प्रतिकूलत्वात्। या च पराक्ष्वेवाविद्योपप्रदर्शिताेषु दृष्टादृष्टेषु भोगेषु तृष्णा ताभ्यामविद्यातृष्णाभ्यां प्रतिबद्धात्मदर्शनाः—जो स्वभावसे ही बाह्य अनात्मदर्शन है वही आत्मदर्शनके प्रतिबन्धकी कारणरूपा अविद्या है, क्योंकि वह उस (आत्मदर्शन) के प्रतिकूल है। इसके सिवा अविद्यासे दिखलायी देनेवाले दृष्ट और अदृष्ट बाह्य भोगोंमें जो तृष्णा है उन अविद्या और तृष्णा दोनोंहीसे जिनका आत्मदर्शन प्रतिरुद्ध हो रहा है वे—

अविवेकी और विवेकीका अन्तर

पराचः कामाननुयन्ति बाला-
स्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा
ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥

९८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

९८कठोपनिषद्[ अध्याय २

अल्पज्ञ पुरुष बाह्य भोगोंके पीछे लगे रहते हैं। वे मृत्युके सर्वत्र फैले हुए पाशमें पड़ते हैं। किन्तु विवेकी पुरुष अमरत्वको ध्रुव (निश्चल) जानकर संसारके अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते ॥ २ ॥

| पराचो बहिर्गतानेव कामान् काम्यान्विषयाननुयन्ति अनुगच्छन्ति बाला अल्पप्रज्ञास्ते तेन कारणेन मृत्योरविद्याकामकर्मसमुदायस्य यन्ति गच्छन्ति विततस्य विस्तीर्णस्य सर्वतो व्याप्तस्य पाशं पाश्यते बध्यते येन तं पाशं देहेन्द्रियादिसंयोगवियोगलक्षणम्। अनवरतजन्ममरणजरारोगाद्यनेकानर्थव्रातं प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः।<br><br>यत एवमथ तस्माद्धीरा विवेकिनः प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणममृतत्वं ध्रुवं विदित्वा, देवाद्यमृतत्वं ह्यध्रुवमिदं तु प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणं “न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्” (बृ० उ० ४।४।२३) इति ध्रुवम्। तदेवंभूतं कूटस्थमविचाल्यममृतत्वं विदित्वाध्रुवेषु सर्वपदार्थेष्वनित्येषु निर्धार्य | बाल--मन्दमति पुरुष पराक्--बाह्य कामनाओंका--काम्यविषयोंका ही अनुगमन--पीछा किया करते हैं। इसी कारणसे वे अविद्या काम और कर्मके समुदायरूप मृत्युके वितत--विस्तीर्ण--सर्वत्र व्याप्त पाशमें [पड़ते हैं]। जिससे जीव पाशित होता है--बाँधा जाता है उस देहेन्द्रियादिके संयोगवियोगरूप पाशमें पड़ते हैं। अर्थात् निरन्तर जन्म-मरण, जरा और रोग आदि बहुतसे अनर्थसमूहको प्राप्त होते हैं।<br><br>क्योंकि ऐसी बात है इसलिये धीर--विवेकी पुरुष प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थितिरूप अमृतत्वको ध्रुव (निश्चल) जानकर; देवता आदिका अमृतत्व तो अध्रुव है किन्तु यह प्रत्यगात्मस्वरूपमें स्थितिरूप अमृतत्व “यह कर्मसे न बढ़ता है न घटता है” इस उक्तिके अनुसार ध्रुव है। इस प्रकारके अमृतत्वको कूटस्थ और अविचाल्य जानकर वे ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) लोग इस अनर्थप्राय संसारके सम्पूर्ण |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ९९


ब्राह्मणा इह संसारेऽनर्थप्राये न प्रार्थयन्ते किंचिदपि प्रत्यगात्म-दर्शनप्रतिकूलत्वात् । पुत्रवित्त-लोकैषणाभ्यो व्युत्तिष्ठन्त्ये-वेत्यर्थः ॥ २ ॥अध्रुव—अनित्य पदार्थोंमेंसे किसीकी इच्छा नहीं करते, क्योंकि वे सब तो प्रत्यगात्माके दर्शनके विरोधी ही हैं। अर्थात् वे पुत्र, वित्त और लोकैषणासे दूर ही रहते हैं ॥ २ ॥
यद्विज्ञानान्न किंचिदन्यत् प्रार्थयन्ते ब्राह्मणाः कथं तदधिगम इत्युच्यते—ब्राह्मण लोग जिसका ज्ञान हो जानेसे और किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करते उस ब्रह्मका बोध किस प्रकार होता है ? इसपर कहते हैं—

आत्मज्ञकी सर्वज्ञता

येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाँश्च मैथुनान् ।
एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥

जिस इस आत्माके द्वारा मनुष्य रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुनजन्य सुखोंको निश्चयपूर्वक जानता है [ उस आत्मासे अविज्ञेय ] इस लोकमें और क्या रह जाता है ? [ तुझ नचिकेताका पूछा हुआ ] वह तत्त्व निश्चय यही है ॥ ३ ॥

येन विज्ञानस्वभावेनात्मना रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शांश्च मैथुनान्मैथुननिमित्तान्सुखप्रत्य-यान्विजानाति विस्पष्टं जानाति सर्वो लोकः ।सम्पूर्ण लोक जिस विज्ञान-स्वरूप आत्माके द्वारा रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुन—मैथुनजनित सुखोंको स्पष्टतया जानता है [ वही ब्रह्म है ] ।
ननु नैवं प्रसिद्धिर्लोकस्य आत्मना देहादिविलक्षणेनाहं वि-जानामीति । देहादिसंघातोऽहं विजानामीति तु सर्वो लोकोऽव-गच्छति ।शङ्का—परन्तु लोकमें ऐसी कोई प्रसिद्धि नहीं है कि मैं किसी देहादिसे विलक्षण आत्माद्वारा जानता हूँ। सब लोग यही समझते हैं कि मैं देहादि संघातस्वरूप ही सब कुछ जानता हूँ।

| १०० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |

१००कठोपनिषद्[ अध्याय २

| [दृग्दृश्य-विवेचनम्]<br>न त्वेवम् । देहादिसंघातस्यापि शब्दादिस्वरूपत्वाविशेषाद्विज्ञेयत्वाविशेषाच्च न युक्तं विज्ञातृत्वम्। यदि हि देहादिसंघातो रूपाद्यात्मकः सन् रूपादीन्विजानीयाद्वाह्या अपि रूपादयोऽन्योन्यं स्वं स्वं रूपं च विजानीयुः। न चैतदस्ति । तस्माद्देहादिलक्षणांश्च रूपादीनेतेनैव देहादिव्यतिरिक्तेनैव विज्ञानस्वभावेनात्मना विजानाति लोकः । यथा येन लोहो दहति सोऽग्निरिति तद्वत् ।<br><br>आत्मनोऽविज्ञेयं किमत्रास्मिँल्लोके परिशिष्यते न किंचित्परिशिष्यते । सर्वमेव त्वात्मना विज्ञेयम् । यस्यात्मनोऽविज्ञेयं न किंचित्परिशिष्यते स आत्मा सर्वज्ञः । एतद्वै तत् । किं तद्यत् नचिकेत्सा पृष्टं देवादिभिरपि | समाधान—ऐसी बात तो नहीं है, क्योंकि देहादि संघात भी समानरूपसे शब्दादिरूप तथा विज्ञेयरूप है; अतः उसे ज्ञाता मानना उचित नहीं है। यदि देहादि संघात रूप-रसादिखरूप होकर भी रूपादिको जान ले तो बाह्य रूपादि भी परस्पर एक-दूसरेको तथा अपने-अपने रूपको जान लेंगे; किन्तु यह बात है नहीं। अतः लोक देहादि-स्वरूप रूपादिको इस देहादि-व्यतिरिक्त विज्ञानस्वभाव आत्माके द्वारा ही जानता है। जिस प्रकार लोहा जिसके द्वारा जलाता है उसे अग्नि कहते हैं उसी प्रकार [जिसके द्वारा लोक देहादि विषयोंको जानता है उसे आत्मा कहते हैं]।<br><br>उस आत्मासे जिसका ज्ञान न हो सके ऐसा क्या पदार्थ इस लोकमें रह जाता है, अर्थात् कुछ भी नहीं रहता—सभी कुछ आत्मासे ही जाना जा सकता है। [इस प्रकार] जिस आत्मासे अविज्ञेय कोई भी वस्तु नहीं रहती वह आत्मा सर्वज्ञ है और यही वह है। वह कौन है? जिसके विषयमें तुझ नचिकेताने प्रश्न किया है, जो देवादिका भी सन्देहास्पद है तथा |

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१


| विचिकित्सितं धर्मादिभ्योऽन्यद् विष्णोः परमं पदं यस्मात्परं नास्ति तद्वा एतदधिगतमित्यर्थः ॥ ३ ॥ | जो धर्माधर्मादिसे अन्य विष्णुका परम पद है और जिससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है वही यह [ब्रह्म-पद] अत्र ज्ञात हुआ है—ऐसा इसका भावार्थ है ॥ ३ ॥ |


| अतिसूक्ष्मत्वाद्दुर्विज्ञेयमिति मत्वैतमेवार्थं पुनः पुनराह— | वह ब्रह्म अति सूक्ष्म होनेके कारण दुर्विज्ञेय है—ऐसा मानकर उसी बातको बारम्बार कहते हैं— |

आत्मज्ञकी निःशोकता

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥

जिसके द्वारा मनुष्य स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले तथा जाग्रत्‌में दिखायी देनेवाले—दोनों प्रकारके पदार्थोंको देखता है उस महान् और विभु आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥

| स्वप्नान्तं स्वप्नमध्यं स्वप्नविज्ञेयमित्यर्थः तथा जागरितान्तं जागरितमध्यं जागरितविज्ञेयं च; उभौ स्वप्नजागरितान्तौ येन आत्मनानुपश्यति लोक इति सर्वं पूर्ववत् । तं महान्तं विभुमात्मानं | स्वप्नान्त—स्वप्नका मध्य अर्थात् स्वप्नावस्थामें जानने योग्य तथा जागरितान्त—जाग्रत् अवस्थाका मध्य यानी जाग्रत् अवस्थामें जाननेयोग्य—इन दोनों स्वप्न और जाग्रत्‌के अन्तर्गत पदार्थोंको लोक जिस आत्माके द्वारा देखता है [वही ब्रह्म है; इस प्रकार] इस वाक्यकी और सब व्याख्या पूर्व मन्त्रके समान करनी चाहिये । उस |

१०२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१०२कठोपनिषद्[ अध्याय २

| मत्वावगम्यात्मभावेन साक्षात् अहमास्मि परमात्मेति धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ | महान् और विभु आत्माको जानकर अर्थात् 'वह परमात्मा मैं ही हूँ' ऐसा आत्मभावसे साक्षात् अनुभव कर धीर—बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ४ ॥ | | किं च— | तथा— |

आत्मज्ञकी निर्भयता

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५॥

जो पुरुष इस कर्मफलभोक्ता और प्राणादिको धारण करनेवाले आत्माको उसके समीप रहकर भूत, भविष्यत् [ और वर्तमान ] के शासकरूपसे जानता है वह वैसा विज्ञान हो जानेके अनन्तर उस (आत्मा) की रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता । निश्चय यही वह [ आत्मतत्त्व ] है ॥ ५ ॥

यः कश्चिदिमं मध्वदं कर्मफलभुजं जीवं प्राणादिकलापस्य धारयितारमात्मानं वेद विजानाति अन्तिकादन्तिके समीप ईशानम् ईशितारं भूतभव्यस्य कालत्रयस्य, ततस्तद्विज्ञानादूर्ध्वमात्मानं न विजुगुप्सते न गोपायितुम् इच्छत्यभयप्राप्तत्वात् । यावद्धि भयमध्यस्थोऽनित्यमात्मानं मन्यते तावद्गोपायितुमिच्छत्यात्मानम् ।जो कोई इस मध्वद—कर्मफलभोक्ता और जीव—प्राणादि कारणकलापको धारण करनेवाले आत्माको समीपसे भूत-भविष्यत् आदि तीनों कालोंके शासकरूपसे जानता है, वह ऐसा ज्ञान हो जानेके अनन्तर उस आत्माका गोपन—रक्षण नहीं करना चाहता, क्योंकि वह अभयको प्राप्त हो जाता है । जबतक वह भयके मध्यमें स्थित हुआ अपने आत्माको अनित्य समझता है तभीतक उसकी रक्षा भी करना चाहता

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०३

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १०३


| यदा तु नित्यमद्वैतमात्मानं विजानाति तदा किं कः कुतो वा गोपायितुमिच्छेत् । एतद्वै तदिति पूर्ववत् ॥ ५ ॥ | है । जिस समय आत्माको नित्य और अद्वैत जान लेता है उस समय कौन किसको कहाँसे सुरक्षित रखनेकी इच्छा करेगा ? निश्चय यही वह आत्मतत्त्व है—इस प्रकार पूर्ववत् समझना चाहिये ॥ ५ ॥ |


| यः प्रत्यगात्मेश्वरभावेन निर्दिष्टः स सर्वात्मेत्येतद्दर्शयति— | जिस प्रत्यगात्माका यहाँ ईश्वर भावसे निर्देश किया गया है वह सबका अन्तरात्मा है—यह बात इस मन्त्रसे दिखलायी जाती है— |

ब्रह्मज्ञका सर्वात्म्यदर्शन

यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥६॥

जो मुमुक्षु पहले तपसे उत्पन्न हुए [हिरण्यगर्भ] को, जो कि जल आदि भूतोंसे पहले उत्पन्न हुआ है, भूतोंके सहित बुद्धिरूप गुहामें स्थित हुआ देखता है वही उस ब्रह्मको देखता है । निश्चय यही वह ब्रह्म है ॥ ६ ॥

| यः कश्चिन्मुमुक्षुः पूर्वं प्रथमं तपसो ज्ञानादिलक्षणाद्ब्रह्मण इत्येतज्जातमुत्पन्नं हिरण्यगर्भम्; किमपेक्ष्य पूर्वमित्याह—अद्भ्यः पूर्वमप्सहितेभ्यः पञ्चभूतेभ्यो न केवलाभ्योऽद्भ्य इत्यभिप्रायः, | जिस मुमुक्षुने पहले तपसे—ज्ञानादिलक्षण ब्रह्मसे उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको । किसकी अपेक्षा पूर्व उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको ? ऐसा प्रश्न होनेपर कहते हैं—जो जलसे पूर्व अर्थात् जलसहित पाँचों तत्त्वोंसे, न कि केवल जलसे ही, पूर्व उत्पन्न हुआ है उस प्रथमज |