कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ५० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| सम्पद्यत आत्मा। अतर्क्यमतर्क्यः स्वबुद्ध्याभ्यूहेन केवलेन तर्केण। तर्क्यमाणेऽणुपरिमाणे केनचित् स्थापित आत्मनि ततो ह्यणतरम् अन्योऽभ्यूहति ततोऽप्यन्योऽणुतममिति न हि कुतर्कस्य निष्ठा क्वचिद्विद्यते ॥ ८ ॥ | जाता है; अपनी बुद्धिसे निकाले हुए केवल तर्कद्वारा इसका ज्ञान नहीं हो सकता। यदि कोई पुरुष तर्क करके उस अणुपरिमाण आत्माको स्थापित भी करे तो दूसरा उससे भी अणु तथा तीसरा उससे भी अत्यन्त अणु स्थापित कर देगा, क्योंकि कुतर्ककी स्थिति कहीं भी नहीं है ॥ ८ ॥ |
<br>नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ। यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥
हे प्रियतम ! सम्यक् ज्ञानके लिये शुष्क तार्किकसे भिन्न शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा कही हुई यह बुद्धि, जिसे कि तू प्राप्त हुआ है, तर्कद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है। अहा ! तू बड़ा ही सत्य धारणावाला है। हे नचिकेतः ! हमें तेरे समान प्रश्न करनेवाला प्राप्त हो ॥ ९ ॥
| अतोऽनन्यप्रोक्त आत्मनि उत्पन्ना येयमागमप्रतिपाद्यात्ममतिर्नैषा तर्केण स्वबुद्ध्यभ्यूहमात्रेणापनेया न प्रापणीयेत्यर्थः। नापनेतव्या वा न हातव्या | अतः अभेददर्शी आचार्यद्वारा उपदेश किये हुए आत्मामें उत्पन्न हुई जो यह शास्त्रप्रतिपाद्य आत्मविषयक मति है वह तर्कसे अर्थात् अपनी बुद्धिके ऊहापोहमात्रसे प्राप्त होने योग्य नहीं है। अथवा [यह समझो कि] यह आत्मबुद्धि तर्कशक्तिसे अपनेतव्य यानी छोड़ी |
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
| तार्किको ह्यनागमज्ञः स्वबुद्धिपरिकल्पितं यत्किञ्चिदेव कथयति । अत एव च येयमागमप्रसूता मतिरन्येनैवागमाभिज्ञेन आचार्येणैव तार्किकात्प्रोक्ता सती सुज्ञानाय भवति हे प्रेष्ठ प्रियतम ।<br><br>का पुनः सा तर्कागम्या मतिरित्युच्यते—<br><br>यां त्वं मतिं मद्वरप्रदानेन आपः प्राप्तवानसि । सत्या अवितथविषया धृतिर्यस्य तव स त्वं सत्यधृतिर्बतासीत्यनुकम्पयन्नाह मृत्युर्नचिकेतसं वक्ष्यमाणविज्ञानस्तुतये । त्वादृक्त्वत्तुल्यो नः अस्मभ्यं भूयाद्भवताद्भवत्वन्यः पुत्रः शिष्यो वा प्रष्टा; कीदृग्त्वादृक्त्वं हे नचिकेताः प्रष्टा ॥९॥ | जाने योग्य नहीं है, क्योंकि तार्किक तो अध्यात्मशास्त्रसे अनभिज्ञ होता है, वह अपनी बुद्धिसे कल्पना किया हुआ चाहे जो कहता रहता है। अतः हे प्रेष्ठ—प्रियतम ! यह जो शास्त्रजनित आत्मबुद्धि है वह तो तार्किकसे भिन्न किसी शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा उपदेश की जानेपर ही सम्यक् ज्ञानकी कारण होती है।<br><br>अच्छा तो, तर्कसे प्राप्त न होने योग्य वह मति कौन-सी है ? इसपर कहते हैं—<br><br>जिस मतिको तूने मेरे वर-प्रदानसे प्राप्त किया है। जिस तेरी धृति सत्य अर्थात् यथार्थ पदार्थको विषय करनेवाली है वह तू सत्य-धृति है। 'बत' इस अव्ययसे अनुकम्पा करते हुए यमराज आगे कहे जानेवाले विज्ञानकी स्तुतिके लिये नचिकेतासे कहते हैं—'हे नचिकेताः ! हमें तेरे समान प्रश्न करनेवाला और भी पुत्र अथवा शिष्य मिले। परन्तु वह हो कैसा ? जैसा कि तू प्रश्न करनेवाला है' ॥९॥ | | पुनरपि तुष्ट आह— | नचिकेतासे प्रसन्न हुए मृत्युने फिर भी कहा— |
५२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ५२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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कर्मफलकी अनित्यता
जानाम्यहँ शेवधिरित्यनित्यं
न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि-
रनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥
मैं यह जानता हूँ कि कर्मफलरूप निधि अनित्य है, क्योंकि अनित्य साधनोंद्वारा वह नित्य [ आत्मा ] प्राप्त नहीं किया जा सकता । तब मेरेद्वारा नाचिकेत अग्निका चयन किया गया । उन अनित्य पदार्थोंसे ही मैं [ आपेक्षिक ] नित्य [ याम्यपद ] को प्राप्त हुआ हूँ ॥ १० ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| जानाम्यहं शेवधिर्निधिः कर्मफललक्षणो निधिरिव प्रार्थ्यत इति । असावनित्यमनित्य इति जानामि । न हि यस्मादनित्यैः अध्रुवैर्नित्यं ध्रुवं तत्प्राप्यते परमात्माख्यः शेवधिः । यस्त्वनित्यसुखात्मकः शेवधिः स एवानित्यैर्द्रव्यैः प्राप्यते ।<br><br>हि यतस्ततस्तस्मान्मया जानतापि नित्यमनित्यसाधनैर्न प्राप्यत इति नाचिकेतश्चितोऽग्निः अनित्यैर्द्रव्यैः पश्वादिभिः स्वर्गसुखसाधनभूतोऽग्निर्निवर्तित | जिसके लिये निधि (खजाने)के समान प्रार्थना की जाती है वह कर्मफलरूप निधि ही 'शेवधि' है । यह अनित्य—सदा न रहनेवाली है—ऐसा मैं जानता हूँ । क्योंकि इन अनित्य यानी अस्थिर साधनोंसे वह परमात्मा नामक नित्य—स्थिर निधि प्राप्त नहीं की जा सकती । जो निधि अनित्यसुखरूप है वही अनित्य पदार्थोंसे प्राप्त होती है।<br><br>क्योंकि ऐसा है इसलिये मैंने यह जान-बूझकर भी कि 'अनित्य साधनोंसे नित्यकी प्राप्ति नहीं होती' नाचिकेत अग्निका चयन किया था; अर्थात् पशु आदि अनित्य पदार्थोंसे स्वर्ग-सुखके साधनस्वरूप उस अग्निका |
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
| इत्यर्थः । तेनाहमधिकारापन्नो नित्यं याम्यं स्थानं स्वर्गाख्यं नित्यमापेक्षिकं प्राप्तवानस्मि ॥१०॥ | सम्पादन किया था ! उसीसे मैं अधिकार सम्पन्न होकर आपेक्षिक नित्य स्वर्ग नामक याम्यस्थानको प्राप्त हुआ हूँ ॥ १० ॥ |
नचिकेताके त्यागकी प्रशंसा
कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां
क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् ।
स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा
धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥
हे नचिकेतः ! तूने बुद्धिमान् होकर भोगोंकी समाप्ति (अवधि), जगत्की प्रतिष्ठा, यज्ञफलके अनन्तत्व, अभयकी मर्यादा, स्तुत्य और महती (अणिमादि ऐश्वर्ययुक्त) विस्तीर्ण गति तथा प्रतिष्ठाको देखकर भी उसे धैर्यपूर्वक त्याग दिया है ॥ ११ ॥
| त्वं तु कामस्याप्तिं समाप्तिम्,<br><br>अत्रैवैहैव सर्वे कामाः परिसमाप्ताः,<br><br>जगतः साध्यात्माधिभूताधिदैवादेः प्रतिष्ठामाश्रयं सर्वात्मकत्वात्, क्रतोः फलं हैरण्यगर्भं पदमनन्त्यमानन्त्यम्, अभयस्य च पारं परां निष्ठाम्, स्तोमं | किन्तु हे नचिकेतः ! तुमने तो धीर—धृतिमान् होकर कामनाओंकी प्राप्ति—समाप्तिको, क्योंकि इस [हिरण्यगर्भ पद] में ही सम्पूर्ण कामनाएँ समाप्त होती हैं, तथा सर्वात्मक होनेके कारण अध्यात्म, अधिभूत एवं अधिदैवरूप जगत्की प्रतिष्ठा यानी आश्रयको, यज्ञके अनन्त्य—आनन्त्य अर्थात् अनन्त फल हिरण्यगर्भ पदको, अभयके पार अर्थात् परा निष्ठाको और स्तोम— |
५४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ५४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| स्तुत्यं महदणिमाद्यैश्वर्योद्यनेक-गुणसंहतं स्तोमं च तन्महच्च निरतिशयत्वात्स्तोममहत्, उरुगायं विस्तीर्णां गतिम्, प्रतिष्ठां स्थितिमात्मनोऽनुत्तमामपि दृष्ट्वा धृत्या धैर्येण धीरो धीमान्सन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः परमेव आकाङ्क्षन्नतिसृष्टवानसि सर्वम् एतत् संसारभोगजातम् । अहो बतानुत्तमगुणोऽसि ॥ ११ ॥ | स्तुत्य तथा महत्—अणिमादि ऐश्वर्य आदिक अनेक गुणोंके संघातसे युक्त, इस प्रकार जो स्तोम है और महत् भी है ऐसे सर्वोत्कृष्ट होनेके कारण स्तोममहत् उरुगाय—विस्तीर्ण गतिको तथा प्रतिष्ठा—अपनी सर्वोत्तम स्थितिको देखकर भी उसे धैर्यपूर्वक त्याग दिया । अर्थात् एकमात्र परवस्तुकी ही इच्छा करते हुए इस सम्पूर्ण सांसारिक भोगसमूहका परित्याग कर दिया । अहो ! तुम बड़े ही उत्कृष्ट गुणसम्पन्न हो ! ॥ ११ ॥ |
| यं त्वं ज्ञातुमिच्छस्यात्मानम् | जिस आत्माको तुम जानना चाहते हो— |
आत्मज्ञानका फल
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥
उस कठिनतासे दीख पड़नेवाले, गूढ स्थानमें अनुप्रविष्ट, बुद्धिमें स्थित, गहन स्थानमें रहनेवाले, पुरातन देवको अध्यात्मयोगकी प्राप्तिद्वारा जानकर धीर ( बुद्धिमान् ) पुरुष हर्ष-शोकको त्याग देता है ॥ १२ ॥
वल्ली २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५५
| वल्ली २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५५ |
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| तं दुर्दर्शं दुःखेन दर्शनम् अस्येति दुर्दर्शोऽतिसूक्ष्मत्वात् , गूढं गहनमनुप्रविष्टं प्राकृतविषय-विकारविज्ञानैः प्रच्छन्नमित्येतत् , गुहाहितं गुहायां बुद्धौ स्थितं तत्रोपलभ्यमानत्वात् , गह्वरेष्ठं गह्वरे विषमेऽनेकानर्थसंकटं तिष्ठतीति गह्वरेष्ठम् । यत एवं गूढमनुप्रविष्टो गुहाहितश्चातो गह्वरेष्ठः; अतो दुर्दर्शः । | अति सूक्ष्म होनेके कारण दुर्दर्श—जिसका कठिनतासे दर्शन हो सके उसे दुर्दर्श कहते हैं, गूढ अर्थात् गहन स्थानमें अनुप्रविष्ट यानी शब्दादि प्राकृत विषयविकाररूप विज्ञानसे छिपे हुए, गुहा—बुद्धिमें उपलब्ध होनेके कारण उसीमें स्थित तथा गह्वरेष्ठ—गह्वर—विषम यानी अनेक अनर्थोंसे सङ्कुलित स्थानमें रहनेवाले [देवको जानकर धीर पुरुष हर्ष-शोकको त्याग देता है] । क्योंकि आत्मा इस प्रकार गूढ स्थानमें अनुप्रविष्ट और बुद्धिमें स्थित है इसलिये वह गह्वरेष्ठ है तथा गह्वरेष्ठ होनेके कारण ही दुर्दर्श है । | | तं पुराणं पुरातनमध्यात्म-योगाधिगमेन विषयेभ्यः प्रति-संहृत्य चेतस आत्मनि समाधानम् अध्यात्मयोगस्तस्याधिगमस्तेन मत्वा देवमात्मानं धीरो हर्ष-शोकावात्मन उत्कर्षापकर्षयोः अभावाज्हाति ॥ १२ ॥ | उस पुराण यानी पुरातन देवको अध्यात्मयोगकी—चित्तको विषयोंसे हटाकर आत्मामें लगा देना अध्यात्मयोग है, उसकी प्राप्तिद्वारा जानकर धीर पुरुष अपने उत्कर्ष-अपकर्षका अभाव हो जानेके कारण हर्ष-शोकका परित्याग कर देता है ॥ १२ ॥ |
| कठो० ३— | इसके सिवा— |
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५६ कठोपनिषद् [ अध्याय १
५६ कठोपनिषद् [ अध्याय १
$ \begin{gathered} एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य मर्त्यः \ प्रवृह्य धर्म्म्यमणुमेतमाप्य । \ स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा \ विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ \end{gathered} $
मनुष्य इस आत्मतत्त्वको सुनकर और उसे भली प्रकार ग्रहणकर धर्मी आत्माको देहादि संघातसे पृथक् करके इस सूक्ष्म आत्माको पाकर तथा इस मोदनीयकी उपलब्धि कर अति आनन्दित हो जाता है। मैं [ तुझ ] नचिकेताको खुले हुए ब्रह्मभवनवाला समझता हूँ, [ अर्थात् हे नचिकेतः ! मेरे विचारसे तेरे लिये मोक्षका द्वार खुला हुआ है ] ॥१३॥
| एतदात्मतत्त्वं यदहं वक्ष्यामि तच्छ्रुत्वाचार्यप्रसादात्सम्यगात्मभावेन परिगृह्योपादाय मर्त्यो मरणधर्मा धर्मादनपेतं धर्म्यं प्रवृह्योद्यम्य पृथक्कृत्य शरीरादेः अणुं सूक्ष्ममेतमात्मानम् आप्य प्राप्य स मर्त्यो विद्वान्मोदते मोदनीयं हर्षणीयमात्मानं लब्ध्वा। तदेतदेवंविधं ब्रह्म सद्म भवनं नचिकेतसं त्वां प्रत्यपावृतद्वारं विवृतमभिमुखीभूतं मन्ये मोक्षार्हं त्वां मन्य इत्यभिप्रायः॥ १३॥ | इस आत्मतत्त्वको, जिसका कि अब मैं वर्णन करूँगा, उसे सुनकर—आचार्यकी कृपासे भली प्रकार आत्मभावसे ग्रहण कर मरणधर्मा मनुष्य इस धर्म्य—धर्मविशिष्ट आत्मा—को शरीरादिसे उद्यमन करके यानी पृथक् करके तथा इस अणु अर्थात् सूक्ष्म और मोदनीय—हर्षयोग्य आत्माको उपलब्ध कर वह मरणशील विद्वान् आनन्दित हो जाता है। इस प्रकारके तुझ नचिकेताके प्रति मैं ब्रह्मभवनको खुले द्वारवाला अर्थात् अभिमुख हुआ मानता हूँ। अभिप्राय यह कि मैं तुझे मोक्षके योग्य समझता हूँ ॥ १३ ॥ |
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
| यद्यहं योग्यः प्रसन्नश्चासि भगवन्मां प्रति— | [ नचिकेता बोला—] भगवन् ! यदि मैं योग्य हूँ और आप मुझपर प्रसन्न हैं तो— |
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सर्वातीतवस्तुविषयक प्रश्न
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥१४॥
जो धर्मसे पृथक्, अधर्मसे पृथक् तथा इस कार्यकारणरूप प्रपञ्चसे भी पृथक् है और जो भूत एवं भविष्यत्से भी अन्य है—ऐसा आप जिसे देखते हैं वही मुझसे कहिये ॥ १४ ॥
| अन्यत्र धर्माच्छास्त्रीयाद्धर्मानुष्ठानात्तत्फलात्तत्कारकेभ्यश्च पृथग्भूतमित्यर्थः । तथान्यत्र अधर्मात्तथान्यत्रास्मात्कृताकृतात् कृतं कार्यमकृतं कारणमस्माद् अन्यत्र । किं चान्यत्र भूताच्चातिक्रान्तात्कालाद्भव्याच्च भविष्यतश्च तथा वर्तमानात्; कालत्रयेण यन्न परिच्छिद्यत इत्यर्थः । यद् ईदृशं वस्तु सर्वव्यवहारगोचरातीतं पश्यसि तद्वद मह्यम् ॥१४॥ | जो धर्म यानी शास्त्रीय धर्मानुष्ठान, उसके फल तथा [कर्ता-करण आदि] कारकोंसे अन्यत्र—पृथग्भूत है, तथा जो अधर्मसे भिन्न है और कृत—कार्य तथा अकृत—कारण इस प्रकार इस कार्य-कारण (स्थूल-सूक्ष्म प्रपञ्च) से भी पृथक् है, यही नहीं भूत अर्थात् बीते हुए भव्य—आगामी तथा वर्तमान कालसे भी अन्यत्र है; तात्पर्य यह है कि जो तीनों कालोंसे परिच्छिन्न नहीं है । ऐसी जिस सम्पूर्ण व्यवहारविषयसे अतीत वस्तुको आप देखते हैं वह मुझसे कहिये ॥१४॥ |
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५८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ५८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| इत्येवं पृष्टवते मृत्युरुवाच<br>पृष्टं वस्तु विशेषणान्तरं च<br>विवक्षन्— | इस प्रकार पूछते हुए नचिकेतासे,<br>पूछी हुई वस्तु तथा उसके अन्य<br>विशेषणको बतलानेकी इच्छासे<br>यमराजने कहा— |
ॐकारोपदेश
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति<br> तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।<br> यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति<br> तत्ते पदꣳसंग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥
सारे वेद जिस पदका वर्णन करते हैं, समस्त तपोंको जिसकी प्राप्तिके साधक कहते हैं, जिसकी इच्छासे [ मुमुक्षुजन ] ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं उस पदको मैं तुमसे संक्षेपमें कहता हूँ। 'ॐ' यही वह पद है ॥ १५ ॥
| सर्वे वेदा यत्पदं पदनीयं गमनीयमविभागेनामनन्ति प्रतिपादयन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति यत्प्राप्त्यर्थानीत्यर्थः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं गुरुकुलवासलक्षणमन्यद्वा ब्रह्मप्राप्त्यर्थं चरन्ति तत्ते तुभ्यं पदं यज्ज्ञातुम् इच्छसि संग्रहेण संक्षेपतो ब्रवीमि। | समस्त वेद जिस पद अर्थात् गमनीय स्थानका अविभाग यानी एक रूपसे आमनन—प्रतिपादन करते हैं, समस्त तपोंको भी जिसके लिये कहते हैं अर्थात् वे जिस स्थानकी प्राप्तिके लिये हैं, जिसकी इच्छासे गुरुकुलवासरूप ब्रह्मचर्य अथवा ब्रह्मप्राप्तिमें उपयोगी कोई और साधन करते हैं उस पदको, जिसे कि तू जानना चाहता है, मैं संक्षेपमें कहता हूँ। |
वल्ली २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५९
| वल्ली २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५९ |
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| ओमित्येतत् । तदेतत्पदं यद्बुभुत्सितं त्वया । यदेतद् ओमित्योंशब्दवाच्योंशब्दप्रतीकं च ॥ १५ ॥ | 'ॐ' यही वह पद है । यह जो 'ॐ' है यानी जो ॐ शब्दका वाच्य और ॐ ही जिसका प्रतीक है वही वह पद है जिसे तू जानना चाहता है ॥ १५ ॥ | | अतः— | इसलिये— |
एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥
यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह० अक्षर ही पर है; इस अक्षरको ही जानकर जो जिसकी इच्छा करता है, वही उसका हो जाता है ॥ १६ ॥
| एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्मापरमेतद्ध्येवाक्षरं परं च । तयोर्हि प्रतीकमेतदक्षरम्, एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वोपास्य ब्रह्मेति यो यदिच्छति परमपरं वा तस्य तद्भवति । परं चेज्ज्ञातव्यमपरं चेत्प्राप्तव्यम् ॥ १६ ॥ | यह अक्षर ही अपर ब्रह्म है और यह अक्षर ही पर ब्रह्म है । यह अक्षर उन दोनोंहीका प्रतीक है । इस अक्षरको ही 'यही उपास्य ब्रह्म है' ऐसा जानकर जो पर अथवा अपर जिस ब्रह्मकी इच्छा करता है उसे वही प्राप्त हो जाता है । यदि उसका उपास्य पर ब्रह्म हो तो वह केवल जाना जा सकता है और यदि अपर ब्रह्म हो तो प्राप्त किया जा सकता है ॥ १६ ॥ | | यत एवमतः— | क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये— |
एतदालम्बनँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥
६० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ६० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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यही श्रेष्ठ आलम्बन है, यही पर आलम्बन है। इस आलम्बनको जानकर पुरुष ब्रह्मलोकमें महिमान्वित होता है ॥ १७ ॥
| एतदालम्बनमेतद्ब्रह्मप्राप्त्या- <br> लम्बनानां श्रेष्ठं प्रशस्ततमम् । <br> एतदालम्बनं परमपरं च परापर- <br> ब्रह्मविषयत्वात् । एतदालम्बनं <br> ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते परस्मिन् <br> ब्रह्मणि । अपरस्मिंश्च ब्रह्मभूतो <br> ब्रह्मवदुपास्यो भवतीत्यर्थः ॥१७॥ | यह [ओंकाररूप] आलम्बन ब्रह्मप्राप्तिके [ गायत्री आदि ] सभी आलम्बनोंमें श्रेष्ठ यानी सबसे अधिक प्रशंसनीय है । पर और अपर ब्रह्मविषयक होनेसे यह आलम्बन पर और अपररूप है । तात्पर्य यह है कि इस आलम्बनको जानकर साधक ब्रह्मलोक अर्थात् परब्रह्ममें स्थित होकर महिमान्वित होता है तथा अपर ब्रह्ममें ब्रह्मत्वको प्राप्त होकर ब्रह्मके समान उपासनीय होता है ॥ १७ ॥ | | अन्यत्र धर्मादित्यादिना पृष्टस्यात्मनोऽशेषविशेषरहितस्य आलम्बनत्वेन प्रतीकत्वेन चोङ्कारो निर्दिष्टः; अपरस्य च ब्रह्मणो मन्दमध्यमप्रतिपत्तॄन्प्रति । अथे- दानीं तस्योङ्कारालम्बनस्यात्मनः साक्षात्स्वरूपनिर्दिधारयिषया इदमुच्यते— | उपर्युक्त 'अन्यत्र धर्मात्' इत्यादि श्लोकसे नचिकेताद्वारा पूछे गये सर्वविशेषरहित आत्माके तथा मन्द और मध्यम उपासकोंके लिये अपर ब्रह्मके प्रतीक और आलम्बन रूपसे ओंकारका निर्देश किया गया । अब, जिसका आलम्बन ओंकार है उस आत्माके स्वरूपका साक्षात् निर्धारण करनेकी इच्छासे यह कहा जाता है— |
आत्मस्वरूपनिरूपण
न जायते म्रियते वा विपश्चि- न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥
यह विपश्चित्—मेधावी आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है; यह न तो किसी अन्य कारणसे ही उत्पन्न हुआ है और न स्वतः ही कुछ [अर्थान्तररूपसे] बना है। यह अजन्मा, नित्य (सदासे वर्तमान) शाश्वत (सर्वदा रहनेवाला) और पुरातन है तथा शरीरके मारे जानेपर भी स्वयं नहीं मरता ॥ १८ ॥
| न जायते नोत्पद्यते म्रियते वा न म्रियते चोत्पत्तिमतो वस्तुनोऽनित्यस्य अनेकविक्रियाः तासामाद्यन्ते जन्मविनाशलक्षणे विक्रिये इहात्मनि प्रतिषिध्येते प्रथमं सर्वविक्रियाप्रतिषेधार्थं न जायते म्रियते वेति । विपश्चिन्मेधावी, अविपरिलुप्तचैतन्यस्वभावात् । | यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता और न मरता ही है। उत्पन्न होनेवाली अनित्य वस्तुके अनेक विकार होते हैं। यहाँ—आत्मामें सब विकारोंका प्रतिषेध करनेके लिये 'न जायते म्रियते वा' ऐसा कहकर सबसे पहले उनमेंसे जन्म और विनाशरूप आदि और अन्तके विकारोंका निषेध किया जाता है। कभी लुप्त न होनेवाले चैतन्यरूप स्वभावके कारण आत्मा विपश्चित् यानी मेधावी है। |
| किं च नायमात्मा कुतश्चित् कारणान्तराद्बभूव । स्वस्माच्च आत्मनो न बभूव कश्चिदर्थान्तरभूतः । अतोऽयमात्माऽजो नित्यः शाश्वतोऽपक्षयविवर्जितः । यो ह्यशाश्वतः सोऽपक्षीयते; अयं | तथा यह आत्मा कहींसे अर्थात् किसी अन्य कारणसे उत्पन्न नहीं हुआ और न अर्थान्तररूपसे स्वयं अपनेसे ही हुआ है। इसलिये यह आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत—यानी क्षयरहित है, क्योंकि जो अशाश्वत होता है वही क्षीण हुआ |
६२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ६२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तु शाश्वतोऽत एव पुराणः पुरापि नव एवेति। यो ह्यवयवोपचयद्वारेणाभिनिर्वर्त्यते स इदानीं नवो यथा कुम्भादिः। तद्विपरीतस्त्वात्मा पुराणो वृद्धिविवर्जित इत्यर्थः।<br><br>यत एवमतो न हन्यते न हिंस्यते हन्यमाने शस्त्रादिभिः शरीरे। तत्स्थोऽप्याकाशवदेव ॥ १८ ॥ | करता है। यह तो शाश्वत है, इसलिये पुराण भी है यानी प्राचीन होकर भी नवीन ही है। क्योंकि जो पदार्थ अवयवोंके उपचय (मेल) से निष्पन्न किया जाता है वही 'इस समय नया है' ऐसा कहा जाता है; जैसे घड़ा। किन्तु आत्मा उससे विपरीत स्वभाववाला है; अर्थात् वह पुराण यानी वृद्धिरहित है।<br><br>क्योंकि ऐसा है; इसलिये शस्त्रादिद्वारा शरीरके मारे जानेपर भी वह नहीं मरता—उसकी हिंसा नहीं होती। अर्थात् शरीरमें रहकर भी वह आकाशके समान निर्लिप्त ही है ॥ १८ ॥ |
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँꣳहतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायँꣳहन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
यदि मारनेवाला आत्माको मारनेका विचार करता है और मारा जानेवाला उसे मारा हुआ समझता है तो वे दोनों ही उसे नहीं जानते, क्योंकि यह न तो मारता है और न मारा जाता है ॥ १९ ॥
| एवं भूतम्प्यात्मानं शरीरमात्रात्मदृष्टिर्हन्ता चेद्यदि मन्यते चिन्तयति हन्तुं हनिष्याम्येनम् | ऐसे प्रकारके आत्माको भी जो देहमात्रको ही आत्मा समझनेवाला किसीको मारनेवाला पुरुष यदि किसीको मारनेका विचार करता |
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वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
| इति योऽप्यन्यो हतः सोऽपि चेन्मन्यते हतमात्मानं हतोऽहमित्युभावपि तौ न विजानीतः स्वमात्मानं यतो नायं हन्ति अविक्रियत्वादात्मनस्तथा न हन्यत आकाशवदविक्रियत्वादेव। अतोऽनात्मज्ञविषय एव धर्माधर्मादिलक्षणः संसारो न ब्रह्मज्ञस्य। श्रुतिप्रामाण्यान्न्यायाच्च धर्माधर्माद्यनुपपत्तेः॥१९॥ | है—यह सोचता है कि मैं इसे मारूँगा, तथा दूसरा मारा जानेवाला भी यह समझकर कि 'मैं मारा गया हूँ' अपने (आत्मा) को मारा गया मानता है तो वे दोनों ही अपने आत्माको नहीं जानते; क्योंकि आत्मा अविकारी है, इसलिये वह मार नहीं सकता और आकाशके समान अविकारी होनेसे ही मारा भी नहीं जा सकता। अतः धर्माधर्मादिरूप संसार अनात्मज्ञसे ही सम्बन्ध रखता है, ब्रह्मज्ञसे नहीं। क्योंकि श्रुतिप्रमाण और युक्तिसे भी ब्रह्मज्ञानीद्वारा धर्म-अधर्म आदि नहीं बन सकते ॥१९॥ |
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| कथं पुनरात्मानं जानाति इत्युच्यते— | तो फिर मुमुक्षु पुरुष आत्माको किस रूपसे जानता है ? इसपर कहते हैं— |
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अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥२०॥
यह अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् आत्मा जीवकी हृदयरूप गुहामें स्थित है। निष्काम पुरुष अपनी इन्द्रियोंके प्रसादसे आत्माकी उस महिमाको देखता है और शोकरहित हो जाता है ॥२०॥
| ६४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
| ६४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ | | :--- | :--- |
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अणोः सूक्ष्मादणीयाञ्छ्यामाकादेरणुतरः। महतो महत्परिमाणान्महीयान्महत्तरःपृथिव्यादेः। अणु महद्वा यदस्ति लोके वस्तु तत्तेनैवात्मना नित्येन आत्मवत्संभवति । तदात्मना विनिर्मुक्तमसत्संपद्यते । तस्माद् असावेवात्माणोरणीयान्महतो महीयान्सर्वनामरूपवस्तूपपाधिकत्वात्। स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य प्राणिजातस्य गुहायां हृदये निहित आत्मभूतः स्थित इत्यर्थः । | आत्मा अणुसे भी अणु अर्थात् श्यामाक आदि सूक्ष्म पदार्थोंसे भी सूक्ष्मतर तथा महान्से भी महान् यानी पृथिवी आदि महत्परिमाणवाले पदार्थोंसे भी महत्तर है । संसारमें अणु अथवा महत्परिमाणवाली जो कुछ वस्तु है वह उस नित्यस्वरूप आत्मासे ही आत्मवान् (स्वरूप-सत्तायुक्त) हो सकती है । आत्मासे परित्यक्त हो जानेपर वह सत्ताशून्य हो जाती है । अतः यह आत्मा ही अणु-से-अणु और महान्-से-महान् है, क्योंकि नाम-रूपवाली सभी वस्तुएँ इसकी उपाधि हैं। वह आत्मा ही ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायकी गुहा—हृदयमें निहित है अर्थात् अन्तरात्म-रूपसे स्थित है । |
| तमात्मानं दर्शनश्रवणमननविज्ञानलिङ्गमक्रतुरकामो दृष्टादृष्टवाह्यविषयोपरतबुद्धिरित्यर्थः—यदा चैवं तदा मन आदीनि करणानि धातवः शरीरस्य धारणात्प्रसीदन्तीत्येषां धातूनां | देखना, सुनना, मनन करना और जानना—ये जिसके लिङ्ग हैं उस आत्माको अक्रतु—निष्काम पुरुष अर्थात् जिसकी बुद्धि दृष्ट और अदृष्ट बाह्य विषयोंसे उपरत हो गयी है, क्योंकि जिस समय ऐसी स्थिति होती है उसी समय मन आदि इन्द्रियाँ, जो कि शरीरको धारण करनेके कारण धातु कहलाती हैं, प्रसन्न होती हैं—सो, |
| वल्ली २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६५ |
| वल्ली २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६५ |
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| प्रसादादात्मनो महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षयरहितं पश्यत्ययम् अहमस्मीति साक्षाद्विजानाति । ततो वीतशोको भवति ॥ २० ॥ | इन धातुओंके प्रसादसे वह अपने आत्माकी कर्मनिमित्तक वृद्धि और क्षयसे रहित महिमाको देखता है; अर्थात् इस बातको साक्षात् जानता है कि 'मैं यह हूँ'। [ऐसा जानकर] फिर वह शोकरहित हो जाता है॥२०॥ |
| अन्यथा दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा कामिभिः प्राकृतपुरुषैः, यस्मात्— | अन्यथा सकाम प्राकृत पुरुषोंके लिये यह आत्मा बड़ा दुर्विज्ञेय है; क्योंकि— |
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥
वह स्थित हुआ भी दूरतक जाता है, शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है । मद ( हर्ष ) से युक्त और मदसे रहित उस देवको भला मेरे सिवा और कौन जान सकता है ? ॥ २१ ॥
| आसीनोऽवस्थितोऽचल एव सन् दूरं व्रजति । शयानो याति सर्वत एवमसावात्मा देवो मदामदः समदोऽमदश्च सहर्षोऽहर्षश्च विरुद्धधर्मवानतोऽशक्यत्वाज्ज्ञातुं कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ? | आसीन—अवस्थित अर्थात् अचल होकर भी वह दूर चला जाता है तथा शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है। इस प्रकार वह आत्मा—देव समद और अमद यानी हर्षसहित और हर्षरहित—विरुद्ध धर्मवाला है। अतः जाननेमें न आ सकनेके कारण उस मदयुक्त और मदरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ? |
६६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ६६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अस्मदादेरेव सूक्ष्मबुद्धेः पण्डितस्य सुविज्ञेयोऽयमात्मा स्थितिगतिनित्यानित्यादिविरुद्धानेकधर्मोपाधिकत्वाद्विरुद्धधर्मवत्त्वाद्विश्वरूप इव चिन्तामणिवदवभासते। अतो दुर्विज्ञेयत्वं दर्शयति कस्तं मदन्यो ज्ञातुमर्हतीति। | यह आत्मा हम-जैसे सूक्ष्मबुद्धि विद्वानोंके लिये ही सुविज्ञेय है। स्थिति-गति तथा नित्य और अनित्य आदि अनेक विरुद्धधर्मरूप उपाधिवाला तथा विपरीतधर्मयुक्त होनेसे यह चिन्तामणिके समान विश्वरूप-सा भासता है। अतः 'मेरे सिवा उसे और कौन जानने योग्य है' ऐसा कहकर उसकी दुर्विज्ञेयता दिखलाते हैं। | | कारणानामुपशमः शयनं करणजनितस्यैकदेशविज्ञानस्योपशमः शयानस्य भवति। यदा चैवं केवलसामान्यविज्ञानत्वात् सर्वतो यातीव यदा विशेषविज्ञानस्थः स्वेन रूपेण स्थित एव सन्मनआदिगतिषु तदुपाधिकत्वाद्दूरं व्रजतीव। स चेहैव वर्तते ॥ २१ ॥ | इन्द्रियोंका शान्त हो जाना शयन है। शयन करनेवाले पुरुषका इन्द्रियजनित एकदेशसम्बन्धी विज्ञान शान्त हो जाता है। जिस समय ऐसी अवस्था होती है उस समय केवल सामान्य विज्ञान होनेसे वह सब ओर जाता हुआ-सा जान पड़ता है; और जब वह विशेष विज्ञानमें स्थित होता है तो स्वरूपसे अविचल रहकर भी मन आदि उपाधियोंवाला होनेसे उन मन आदिकी गतियोंमें जाता हुआ-सा जान पड़ता है। वस्तुतः तो वह यहीं रहता है॥२१॥ | | तद्विज्ञानाच्च शोकात्यय इत्यपि दर्शयति— | तथा अब यह भी दिखलाते हैं कि उस आत्माके ज्ञानसे शोकका अन्त हो जाता है— |
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६७
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६७
अशरीरँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥
जो शरीरोंमें शरीररहित तथा अनित्योंमें नित्यस्वरूप है उस महान् और सर्वव्यापक आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ २२ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| अशरीरं स्वेन रूपेण आकाशकल्प आत्मा तमशरीरं शरीरेषु देवपितृमनुष्यादिशरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थितिरहितेष्ववस्थितं नित्यमविकृतमित्येतत्, महान्तं महत्त्वस्यापेक्षिकत्वशङ्कायामाह— विभुं व्यापिनमात्मानम्—आत्मग्रहणं स्वतोऽनन्यत्वप्रदर्शनार्थम्, आत्मशब्दः प्रत्यगात्मविषय एव मुख्यस्तमीदृशमात्मानं मत्वा अयमहमिति धीरो धीमान्न शोचति। न ह्येवंविधस्यात्मविदः शोकोपपत्तिः ॥ २२ ॥ | आत्मा अपने स्वरूपसे आकाशके समान है, अतः देव, पितृ और मनुष्यादि शरीरोंमें अशरीर है, अनवस्थित—अवस्थितिरहित यानी अनित्योंमें अवस्थित—नित्य अर्थात् अविकारी है, तथा महान् है—[किससे महान् है—इस प्रकार] महत्त्वमें इतरकी अपेक्षा होनेकी शङ्का करके कहते हैं उस विभु अर्थात् व्यापक आत्माको जानकर—यहाँ 'आत्मा' शब्द अपनेसे ब्रह्मकी अभिन्नता दिखानेके लिये लिया गया है, क्योंकि 'आत्मा' शब्द प्रत्यगात्मविषयमें ही मुख्य है—ऐसे उस आत्माको 'यही मैं हूँ' ऐसा जानकर धीर—बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योंकि इस प्रकारके आत्मवेत्तामें शोक बन ही नहीं सकता ॥ २२ ॥ |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| यद्यपि दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा तथाप्युपायेन सुविज्ञेय एवेत्याह— | यद्यपि यह आत्मा दुर्विज्ञेय है तो भी उपाय करनेसे तो सुविज्ञेय ही है; इसपर कहते हैं— |
६८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १
| ६८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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आत्मा आत्मकृपासाध्य है
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य-
स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳस्वाम् ॥ २३ ॥
यह आत्मा वेदाध्ययनद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है और न धारणाशक्ति अथवा अधिक श्रवणसे ही प्राप्त हो सकता है । यह [ साधक ] जिस [ आत्मा ] का वरण करता है उस [ आत्मा ] से ही यह प्राप्त किया जा सकता है । उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूपको अभिव्यक्त कर देता है ॥ २३ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| नायमात्मा प्रवचनेनानेक-<br>वेदस्वीकरणेन लभ्यो ज्ञेयो नापि<br>मेधया ग्रन्थार्थधारणशक्त्या ।<br>न बहुना श्रुतेन केवलेन । केन<br>तर्हि लभ्य इत्युच्यते— | यह आत्मा प्रवचन अर्थात् अनेकों वेदोंको स्वीकार करनेसे प्राप्त यानी विदित होने योग्य नहीं है, न मेधा यानी ग्रन्थ-धारणकी शक्तिसे ही जाना जा सकता है और न केवल बहुत-सा श्रवण करनेसे ही । तो फिर किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है, इसपर कहते हैं— |
| यमेव स्वात्मानमेष साधको<br>वृणुते प्रार्थयते तेनैवात्मना<br>वरित्रा स्वयमात्मा लभ्यो ज्ञायत<br>एवमित्येतत् । निष्कामस्यात्मानम्<br>एव प्रार्थयत आत्मनैवात्मा<br>लभ्यत इत्यर्थः । | यह साधक जिस आत्माका वरण—प्रार्थना करता है उस वरण करनेवाले आत्माद्वारा यह आत्मा स्वयं ही प्राप्त किया जाता है—अर्थात् उससे ही ‘यह ऐसा है’ इस प्रकार जाना जाता है । तात्पर्य यह कि केवल आत्मलाभके लिये ही प्रार्थना करनेवाले निष्काम पुरुषको आत्माके द्वारा ही आत्माकी उपलब्धि होती है । |
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९
वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९
| कथं लभ्यत इत्युच्यते—<br>तस्यात्मकामस्यैष आत्मा विवृणुते प्रकाशयति पारमार्थिकीं तनूं स्वां स्वकीयां स्वयाथात्म्यम् इत्यर्थः ॥ २३ ॥ | किस प्रकार उपलब्ध होता है, इसपर कहते हैं—उस आत्मकामीके प्रति यह आत्मा अपने पारमार्थिक स्वरूप अर्थात् अपने याथात्म्यको विवृत—प्रकाशित कर देता है ॥ २३ ॥ |
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| किं चान्यत्— | इसके सिवा दूसरी बात यह भी है— |
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आत्मज्ञानका अनधिकारी
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥
जो पापकर्मोंसे निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त असमाहित या अशान्त है वह इसे आत्मज्ञान-द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता है ॥ २४ ॥
| न दुश्चरितात्प्रतिषिद्धाच्छ्रुतिस्मृत्यविहितात्पापकर्मणोऽविरतः अनुपरतो नापीन्द्रियलौल्याद् अशान्तोऽनुपरतो नाप्यसमाहितोऽनेकाग्रमना विक्षिप्तचित्तः, समाहितचित्तोऽपि सन्समाधान- | जो दुश्चरित—प्रतिषिद्ध कर्म यानी श्रुति-स्मृतिसे अविहित पापकर्मसे अविरत—अनुपरत है वह नहीं, जो इन्द्रियोंकी चञ्चलताके कारण अशान्त यानी उपरतिशून्य है वह भी नहीं, जो असमाहित अर्थात् जिसका चित्त एकाग्र नहीं है—जो विक्षिप्तचित्त है वह भी नहीं, तथा समाहितचित्त होनेपर भी उस एकाग्रताके फलका इच्छुक |
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