कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
२१७ उत्तरकाण्ड
करते हैं और महादेवजी संहार करते हैं। सारे विश्वका तेरेहीमें विकास होता है, तेरेहीमें उसकी स्थिति है और फिर तेरेहीमें उसका लय होता है। हे जगजननी ! तुम कृपा-तरङ्गावलिसे विभूषित करुणामयी सरिता हो। तुम देरी न करके मुझे आश्रय दो। हे मुनिमनमानसमरालिके ! कुपित होनेपर तुम महामारी हो जाती हो और प्रसन्न होनेपर तुम्हीं संसारकी साक्षात् जननीस्वरूपा हो; अतः अब तुम कृपादृष्टिसे हम दुखियोंकी ओर देखो। निपट बसेरे अघ-औगुन घनेरे, नर- नारिऊ अनेरे जगदंब ! चेरी-चेरे हैं। दारिद-दुखारी देवि भूसुर भिखारी-भीरु लोभ मोह काम कोह कलिमल घेरे हैं ॥ लोकरीति राखी राम, साखी बामदेव जानि जनकी विनति मानि मातु ! कहि मेरे हैं। महामारी महेसानि ! महिमाकी खानि, मोद- मंगलकी रासि, दास कासीवासी तेरे हैं ॥१७४॥ हे जगन्मातः ! यहाँके अन्यायी नर-नारी यद्यपि पाप और अवगुणोंके पूरे निवासस्थान हैं तो भी वे हैं तेरे ही दास-दासी। हे देवि ! वे दरिद्रताके कारण अत्यन्त दुखी हैं; ब्राह्मण लोग भिखमंगे और बड़े डरपोक हो गये हैं; इसलिये लोभ, मोह, काम और क्रोध- रूप कलिकलुषने उन्हें घेर लिया हैं। देख, भगवान् रामने भी [ अपनी प्रजाके गुण-दोषोंकी ओर दृष्टि न देकर ] लोकमर्यादाकी रक्षा की थी, इसमें स्वयं श्रीमहादेवजी साक्षी हैं—ऐसा जानकर हे मातः ! इस दासकी प्रार्थनापर ध्यान देकर एक बार ऐसा कह दे
कवितावली २१८ कि 'ये सब मेरे हैं।' हे महामारी ! हे महिमाकी खानि एवं मंगल और आनन्दकी राशि महेश्वरि ! ये काशीवासी तेरे ही दास हैं। लोगनिकें पाप कैधौं, सिद्ध-सुर-साप कैधौं, कालकें प्रताप कासी तिहूँ ताप तई है। ऊँचे, नीचे, बीचके, धनिक, रंक, राजा, राय हठनि बजाइ करि डीठि पीठि दई है ॥ देवता निहोरे, महामारिन्ह सों कर जोरे, भोरानाथ जानि भोरे आपनी-सी ठई है। करुनानिधान हनुमान बीर बलवान ! जसरासि जहाँ-तहाँ तैंहीं लुटि लई है ॥१७५॥ न जाने लोगोंका पाप है अथवा सिद्ध और देवताओंका शाप है या समयका प्रताप है, जिसके कारण काशी तीनों तापोंसे तप रही है। इस समय ऊँच, नीच, मध्यम श्रेणीके लोग, धनी, निर्धन, राजा और राव सभीने हठपूर्वक, खुल्लमखुल्ला, सब कुछ देखकर भी पीठ फेर ली है। देवताओंकी प्रार्थना की और महामारियोंको भी हाथ जोड़े; परन्तु इन्होंने भोलानाथको सीधा-सादा जानकर मनमानी ठान रक्खी है। हे करुणानिधान, बलवान्, वीर हनुमान्जी ! जहाँ-तहाँ आपहीने यशकी राशि लूटी है [ अतः आप ही यहाँके लोगोंका भी दुःख दूर करके यशस्वी होइये ]। संकर-सहर सर, नरनारि वारिचर बिकल सकल, महामारी माजा भई है।
२१९ उत्तरकाण्ड उछरत उतरात हहरात मरि जात, भभरि भगात जल-थल मीचुमई है॥ देव न दयाल, महिपाल न कृपालुचित, बारानसीं बाढ़ति अनीति नित नई है। पाहि रघुराज ! पाहि कपिराज रामदूत ! रामहूकी विगरी तुहीं सुधारि लई है ॥१७६॥ इस शिवपुरीरूप सरोवर के नर-नारीरूप समस्त जलचर बड़े व्याकुल हैं; यह महामारी उनके लिये माजा* हो रही है । वे उछलते हैं, तैरते हैं, घबड़ाकर भागते हैं और हाय-हाय करके मर जाते हैं। इस प्रकार सारा जल-थल मृत्युमय हो रहा है। इस समय देवतालोग दया नहीं करते तथा राजालोग भी कृपालुचित्त नहीं हैं। अतः वाराणसीमें नित्य-नवीन अन्याय बढ़ रहा है। हे रघुराज ! रक्षा कीजिये । हे वानरराज हनुमान्जी ! रक्षा कीजिये; भगवान् रामकी बात बिगड़नेपर भी आपहीने उसे सँभाला था ; अतः यहाँ भी आप ही कृपा कीजिये ] । एक तौ कराल कलिकाल सूल-मूल, तामें कोढ़मेंकी खाजुसी सनीचरी है मीनकी । वेद-धर्म दूरि गए, भूमि चोर भूप भए, साधु सीद्यमान जानि रीति पाप पीनकी ॥ दूबरेको दूसरो न द्वार, राम दयाधाम ! रावरीऐ गति बल-विभव बिहीन की ।
- जलचरोंमें होनेवाला एक प्रकारका रोग ।
कवितावली २२५ लागैगी पै लाज वा विराजमान विरुदहि, महाराज ! आजुजौं न देत दादि दीनकी ॥१७७॥ एक तो सारे दुःखोंका मूलभूत यह भयंकर कलिकाल और उसमें भी कोढ़में खाजके समान मीनराशिपर शनैश्चरकी स्थिति है। इसीसे इस समय वेद-धर्म तो लुप्त हो गये हैं, लुटेरे ही राजा हो गये तथा बढ़े हुए पापकी गति देखकर साधुजन दुखी हैं। हे दयाधाम भगवान्-सम ! दुर्बल पुरुषोंके लिये कोई दूसरा द्वार नहीं है, बल- वैभवशून्य पुरुषोंको तो एकमात्र आपकी ही गति है। हे महाराज ! यदि इस समय आपने इन दीनोंकी सहायता न की तो आपके उस (सर्वोपरि) विराजमान विरदको लज्जित होना पड़ेगा। विविध रामनाम मातु-पितु, स्वामि समरथ, हितु, आस रामनामकी, भरोसो रामनामको। प्रेम रामनामहीसों, नेम रामनामहीको, जानों ना मरम पद दाहिनो न वामको ॥ स्वारथ सकल परमारथको रामनाम, रामनाम हीन तुलसी न काहू कामको। रामकी सपथ, सरबस मेरें रामनाम, कामधेनु-कामतरु मोसे छीन-छामको ॥१७८॥ रामनाम ही मेरा माता-पिता है, वही मेरा समर्थ स्वामी और हितकारी है, मुझे रामनामसे ही सब प्रकारकी आशा है और राम- नामका ही भरोसा है। रामनामसे ही मेरा प्रेम है और रामनाम
२२१ उत्तरकाण्ड जपनेका ही नियम है। [ रामनामके अतिरिक्त ] और किसी अनुकूल-प्रतिकूल मार्गका मुझे कोई भेद ज्ञात नहीं है। रामनाम ही मेरे सारे स्वार्थ और परमार्थको सिद्ध करनेवाला है, रामनामके बिना तुलसीदास किसी कामका नहीं है। मैं रामकी शपथ करके कहता हूँ-रामनाम ही मेरा सर्वस्व है और वही मेरे-जैसे दीन- दुर्बलके लिये कामधेनु और कल्पवृक्षके समान है। मारग मारि, महीसुर मारि, कुमारग कोटिककै धन लीयो। संकरकोपसों पापको दाम परीच्छित जाहिगो जारि कै हं या ॥ कासीमें कंटक जेते भये ते गे पाइ अघाइ कै आपनो कीयो। आजु कि कालि परों कि नरों जड जाहिंगे चाटि दिवारीको दीयो॥ जिन लोगोंने पथिकोंको लूटकर अथवा ब्राह्मणोंको मार (सता) कर करोड़ों कुमार्गोंसे धन एकत्रित किया है उनका वह धन भगवान् शङ्करके कोपसे हृदयको जलाकर जायगा— यह बात खूब परीक्षा की हुई है। काशीमें जितने कण्टक (पापी) हुए हैं वे अपनी करनीका भली प्रकार फल भोगकर नष्ट हो गये हैं। ये सब भी आज, कल, परसों अथवा नरसों दिवालीका दिया चाटकर जायेंगे ही [कहते हैं दीपावलीका दीया चाटकर सर्प चले जाते हैं, फिर वे दिखायी नहीं देते। इसी प्रकार ये पापी लोग भी ऐसे नष्ट होंगे कि इनका कोई पता नहीं चलेगा]। कुंकुम रंग सुअंग जितो, मुखचंदसों चंदसों होड़ परी है। बोलत बोल समृद्धि चुवै, अवलोकत सोच-विषाद हरी है॥ गौरी कि गंग विहंगनिवेष, कि मंजुल मूरति मोदमयी है। पेखि सप्रेम पयान समै सब सोच विमोचन छेमकरी है ॥१८०॥
कवितावली २३२ जिसने अपने शरीरकी आभासे कुंकुमको जीत लिया है तथा जिसका मुखचन्द्र चन्द्रमासे होड़ बदता है, जिसके बोलनेमें सब प्रकारकी समृद्धि चूने लगती है और जो देखने ही सब प्रकारकी चिन्ता और खेदको हर लेती है; यह पक्षिणीके वेषमें साक्षात् गौरी है या गङ्गा ? अथवा आनन्दसे परिपूर्ण किसी अन्य देव.की मनोहर मूर्ति है। इस क्षेमकरी (लाल रंगकी चील्ह) को कहीं जाते समय प्रेमपूर्वक देखा जाय तो यह सब प्रकारके शोकोंकी निवृत्ति करनेवाली होती है। मंगलकी रासि, परमारथकी खानि जानि विरचि बनाई विधि, केसव बसाई है। प्रलयहूँ काल राखी सूलपानि सूलपर, मीचुवस नीच सोऊ चाहत खसाई है ॥ छाडि छितिपाल जो परीछित भए कृपाल, भलो कियो खलको, निकाई सो न साई है। पाहि हनुमान ! करुनानिधान राम पाहि ! कासी-कामधेनु कलि कुहत कसाई है ॥१८१॥ विधाताने काशीको मङ्गलकी राशि और परमार्थकी खानि जानकर रचा है और श्रीविष्णु भगवान्ने उसे बसाया है। प्रलय- कालमें भी भगवान् शङ्करने उसे अपने त्रिशूलपर रखकर बचाया था, उसीको यह मृत्युके वशीभूत हुआ नीच कलि गिराना चाहता है। महाराज परीक्षित्ने इसे छोड़कर इसपर कृपा की और इस दुष्टका भला किया; उस उपकारको इसने भुला ही दिया। हे हनुमान्जी ! रक्षा कीजिये; हे करुणानिधान भगवान् राम ! बचाइये; यह कलिरूप कसाई काशीरूप कामधेनुको मारे डालता है।
२२३ उत्तरकाण्ड विरची विरंचिकी, वसति विस्वनाथकी जो, प्रानहू तें प्यारी पुरी केसव कृपालकी। जोतिरूप लिंगमई अगनित लिंगमयी मोच्छ वितरनि, बिदरनि जगजालकी ॥ देवी-देव-देवसरि-सिद्ध-मुनिवर-बास लोपति बिलोकत कुलिपि भोंडे भालकी। हा हा करै तुलसी, दयानिधान राम ! ऐसी कासीकी कदर्थना कराल कलिकालकी ॥१८४॥ जो ब्रह्माजीकी रची हुई है और स्वयं विश्वनाथकी राजधानी है, और जो कृपामय विष्णु भगवान्को प्राणोंसे भी प्यारी है, वह ज्योतिर्लिङ्गमयी और अगणित लिङ्गमयी पुरी मोक्षदान करनेवाली और जगजालको नष्ट करनेवाली है। वह देवी, देवता, सुरसरि, सिद्धजन और मुनिवरोंकी निवासभूमि है और दर्शनमात्रसे ही अभागोंके ललाटपर लिखी हुई दुर्भाग्यकी रेखाको मिटा देती है, ऐसी काशीकी भी इस कलिकालने दुर्दशा कर रखी है जिसे देखकर, हे दयानिधान श्रीराम ! यह तुलसीदास हाहा खाता है [ आप कृपाकर इसकी रक्षा कीजिये ] । आश्रम-बरन कलि बिबस बिकल भए निज-निज मरजाद मोटरी-सी डार दी। संकर सरोष महामारीहीतें जानियत, साहिब-सरोष दुनी दिन-दिन दारदी ॥ नारि-नर आरत पुकारत, सुनै न कोऊ, काहूँ देवतनि मिलि मोटी मूठि मारि दी।
कवितावली २२४ तुलसी सभीतपाल सुमिरैं कृपाल राम समय सुकरुना सराहि सनकार दी ॥१८३॥ आश्रम और वर्ग कलिके प्रभावसे विकलङ्ग हो गये और सबने अपनी-अपनी मर्यादाको भारस्वरूप समझकर त्याग दिया। शिवजीका कोप तो महामारीसे ही प्रकट है, स्वामीके कुपित होनेके कारण ही संसारका दारिद्र्य दिनों-दिन बढ़ता जाता है। स्त्री-पुरुष सब आर्त होकर पुकारते हैं, किन्तु उनकी पुकार कोई नहीं सुनता। [मालूम होता है] किन्हीं देवताओंने मिलकर मूठ चला दी थी (अभिचारका प्रयोग किया था); किन्तु भयभीतोंकी रक्षा करनेवाले कृपालु श्रीरामको स्मरण करते ही उन्होंने अपनी करुणाकी प्रशंसा करके उसे समयपर अपना काम करनेका संकेत कर दिया [जिससे वह बीमारी बात-की-बातमें चली गयी]। समाप्त कुछ प्रतियोंमें १७७ छन्द ही मिलते हैं। काशी-नागरीप्रचारिणी सभाकी प्रतिमें १८३ छन्द हैं। अतः १८३ छन्द रखे गये हैं।
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