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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

५० केनोपनिषद् [ खण्ड १

पद-भाष्य यन्मनसा न मनुते; मन | जिसका मनके द्वारा मनन नहीं इत्यन्तःकरणं बुद्धिमन्सोरेकत्वेन | किया जाता; मन और बुद्धिके गृह्यते । मनुतेऽनेनेति मनः सर्व- | एकत्वरूपसे यहाँ मन शब्दसे अन्तः- करणसाधारणम्, सर्वविषय- | करणका ग्रहण किया जाता है। व्यापकत्वात् । “कामः सङ्कल्पो | जिसके द्वारा मनन करते हैं उसे विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिर- | मन कहते हैं; वह समस्त इन्द्रियोंके धृतिर्ह्रीर्धीरित्येतत्सर्वं मन एव” | विषयोंमें व्यापक होनेके कारण (बृ० उ० १।५।३) इति | सम्पूर्ण इन्द्रियोंके लिये समान है। श्रुतेः कामादिवृत्तिमन्मनः । तेन | “काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, मनसा यत् चैतन्यज्योतिर्मनसः | अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि अवभासकं न मनुते न सङ्कल्प- | और भय—ये सब मन ही हैं” इस यति नापि निश्चिनोति लोकः, | श्रुतिके अनुसार मन कामादि मनसोऽवभासकत्वेन नियन्तृ- | वृत्तियोंवाला है । उस मनके द्वारा त्वात् । सर्वविषयं प्रति प्रत्य- | यह लोक जिस मनके प्रकाशक गेवेति स्वात्मनि न प्रवर्ततेऽन्तः- | चैतन्यज्योतिका मनन—संकल्प करणम् । अन्तःस्थेन हि चैतन्य- | अथवा निश्चय नहीं कर सकता, ज्योतिषावभासितस्य मनसो | क्योंकि मनका प्रकाशक होनेके मननसामर्थ्यम्; तेन सवृत्तिकं | कारण वह तो उसका नियामक | है । आत्मा सब विषयोंके प्रति | प्रत्यक्रूप (आन्तरिक) ही है; अतः | उसमें मन प्रवृत्त नहीं हो सकता । | अपने भीतर स्थित चैतन्यज्योतिसे | प्रकाशित हुए मनमें ही मनन करनेका | सामर्थ्य है। उसके द्वारा वृत्तियुक्त हुए वाक्य-भाष्य यन्मनसा इत्यादि समानम् । | ‘यन्मनसा’ इत्यादि श्रुतियोंका मनो मतमितिःयेन ब्रह्मणा मनोऽपि | तात्पर्य समान ही है । ‘मन मनन विषयीकृतं नित्यविज्ञानस्वरूपेण | किया जाता है’ अर्थात् जिस नित्य | विज्ञानस्वरूप ब्रह्मद्वारा मन भी विषय

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१ पद-भाष्य मनो येन ब्रह्मणा मतं विषयीकृतं | मनको ब्रह्मवेत्तालोग जिस ब्रह्मके व्याप्तम् आहुः कथयन्ति ब्रह्म- | द्वारा मत--विषयीकृत अर्थात् व्याप्त विदः । तस्मात् तदेव मनस | बतलाते हैं; उस मनके प्रत्यक्चेतयिता आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं ब्रह्म | आत्माको ही तू ब्रह्म जान । 'नेदं••••' विद्धि। नेदमित्यादि पूर्ववत् ॥५॥ | इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पूर्ववत् समझनी चाहिये ॥ ५ ॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६ ॥ जिसे कोई नेत्रसे नहीं देखता बल्कि जिसकी सहायतासे नेत्र [ अपने विषयोंको ] देखते हैं उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देश- कालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥६॥ पद-भाष्य यत् चक्षुषा न पश्यति न | लोक जिसे अन्तःकरणकी वृत्ति- विषयीकरोति अन्तःकरणवृत्ति- | से युक्त नेत्रद्वारा नहीं देखता अर्थात् संयुक्तेन लोकः, येन चक्षूंषि | विषय नहीं करता किन्तु जिस चैतन्यआत्मज्योतिके द्वारा चक्षुओं अन्तःकरणवृत्तिभेदभिन्नाश्चक्षु- | अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तियोंके भेदसे विभिन्न हुई—नेत्रेन्द्रियकी र्वृत्तीः पश्यति चैतन्यात्म- | वृत्तियोंको देखता—विषय करता यानी व्याप्त करता है उसीको तू ज्योतिषा विषयीकरोति व्या- | ब्रह्म जान इत्यादि पूर्ववत् समझना प्नोति । तदेवेत्यादि पूर्ववत् ॥६॥ | चाहिये ॥६॥ वाक्य-भाष्य इत्येतत् । सर्वकरणानामविषयम्, | किया जाता है। जो सब इन्द्रियोंका तानि च सव्यापाराणि सविषयाणि | अविषय है और नित्य विज्ञानस्वरूपसे नित्यविज्ञानस्वरूपावभासतया | अवभासित होनेके कारण जिससे वे

५२ केनोपनिषद् [ खण्ड १

५२ केनोपनिषद् [ खण्ड १ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदंऽ श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ७॥ जिसे कोई कानसे नहीं सुनता बल्कि जिससे यह श्रोत्रेन्द्रिय सुनी जाती है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥ पद-भाष्य यत् श्रोत्रेण न शृणोति | लोक जिसे मनोवृत्तिसे युक्त दिग्देवताधिष्ठितेन आकाश- | आकाशके कार्यभूत तथा दिशा- कार्येण मनोवृत्तिसंयुक्तेन न | रूप देवतासे अधिष्ठित श्रोत्रेन्द्रियद्वारा विषयीकरोति लोकः, येन श्रोत्रम् | नहीं सुन सकता अर्थात् जिसे इदं श्रुतं यत्प्रसिद्धं चैतन्यात्म- | श्रोत्रसे विषय नहीं कर सकता, ज्योतिषा विषयीकृतं तदेव | बल्कि जिस चैतन्यआत्मज्योतिद्वारा इत्यादि पूर्ववत् ॥७॥ | यह प्रसिद्ध श्रोत्र सुना यानी विषय | किया जाता है वही [ब्रह्म है] इत्यादि | पूर्ववत् समझना चाहिये ॥७॥ यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥ जो नासिकारन्ध्रस्थ प्राणके द्वारा विषय नहीं किया जाता बल्कि जिससे प्राण अपने विषयोंकी ओर जाता है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ८ ॥ वाक्य-भाष्य येनावभास्यन्त इति श्लोकार्थः । | सभी इन्द्रियाँ अपने व्यापार और “क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं | विषयोंके सहित अवभासित होती हैं— | यह इन मन्त्रोंका तात्पर्य है । “तथा प्रकाशयति” ( गीता १३ । ३३ ) | क्षेत्रज्ञ सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३ पद-भाष्य यत् प्राणेन घ्राणेन पार्थिवेन अन्तःकरणकी और प्राणकी नासिकापुटान्तरवस्थितेनान्तः- वृत्तियोंके सहित नासिकारन्ध्रमें स्थित एवं पृथिवीके कार्यभूत प्राण यानी करणप्राणवृत्तिभ्यां सहितेन यन्न घ्राणके द्वारा जो प्राणन अर्थात् गन्ध- प्राणिति गन्धवन्न विषयीकरोति, युक्त वस्तुओंको विषय नहीं करता, बल्कि जिस चैतन्यात्मज्योतिसे येन चैतन्यात्मज्योतिषावभास्य- प्रकाश्यरूपसे प्राण अपने विषयकी त्वेन स्वविषयं प्रति प्राणः प्रणी- ओर प्रवृत्त किया जाता है वही ब्रह्म है इत्यादि शेष सब अर्थ पहले- यते तदेवैत्यादि सर्वं समानम् ॥८॥ हीके समान है ॥ ८ ॥ इति प्रथमः खण्डः ॥१॥ वाक्य-भाष्य इति स्मृतेः । "तस्य भासा" है" इस स्मृतिसे और "उसीके तेजसे (मुं० उ० २।२।१०) इति [ यह सब प्रकाशित है]" इस आथर्वणी चाथर्वणे । येन प्राण इति क्रिया- श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है । 'येन प्राणः' इस श्रुतिका यह तात्पर्य है शक्तिरप्यात्मविज्ञाननिमित्तेत्ये- कि क्रियाशक्ति भी आत्मविज्ञानके तत् ॥५॥६॥ ॥७॥ ॥८॥ कारण ही प्रवृत्त होती है ॥ ५-८ ॥ इति प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥

५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २

५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २

द्वितीय खण्ड

ब्रह्मज्ञानकी अनिर्वचनीयता पद-भाष्य एवं हेयोपादेयविपरीतस्त्व- | इस प्रकार हेयोपादेयसे विपरीत मात्मा ब्रह्मेति प्रत्यायितः शिष्यः | तू आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसी प्रतीति अहमेव ब्रह्मेति सुष्ठु वेदाहमिति | कराया हुआ शिष्य यह न समझ मा गृह्णीयादित्याशयादाहाचार्यः | बैठे कि 'ब्रह्म मैं ही हूँ, ऐसा मैं उसे शिष्यबुद्धिविचालनार्थम्—यदि- | अच्छी तरह जानता हूँ' इस त्यादि । | अभिप्रायसे उसकी बुद्धिको [ इस निश्चयसे ] विचलित करनेके लिये आचार्यने 'यदि मन्यसे'इत्यादि कहा। नन्विष्टैव सु वेदाहम् इति | पूर्व०—मैं उसे अच्छी तरह निश्चिता प्रतिपत्तिः । | जानता हूँ—ऐसा निश्चित ज्ञान तो इष्ट ही है । सत्यम्, इष्टा निश्चिता प्रति- | सिद्धान्ती—ठीक है, निश्चित पत्तिः; न हि सु वेदा- | ज्ञान तो अवश्य इष्ट ही है, परन्तु ब्रह्मणोऽवेद्यत्वे हेतुः | 'मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ' हमिति । यद्धि वेद्यं | ऐसा कथन इष्ट नहीं है । जो वेद्य वस्तु विषयीभवति, तत्सुष्ठु | वस्तु वेत्ताकी विषय होती है वही वेदितुं शक्यम्, दाह्यमिव दग्धुम् | अच्छी तरह जानी जा सकती है; अग्नेर्दग्धुः न त्वग्नेः स्वरूपमेव । | जिस प्रकार दहन करनेवाले अग्नि- के दाहका विषय दाह्य पदार्थ ही हो सकता है उसका स्वरूप नहीं सर्वस्य हि वेदितुः स्वात्मा ब्रह्मेति | हो सकता । 'ब्रह्म सभी ज्ञाताओंका सर्ववेदान्तानां सुनिश्चितोऽर्थः। | आत्मा (अपना-आप) ही है' यह समस्त वेदान्तोंका भलीभाँति निश्चय इह च तदेव प्रतिपादितं प्रश्न- | किया हुआ अर्थ है । यहाँ भी

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ पद-भाष्य प्रतिवचनोक्त्या ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ | ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि प्रश्नोत्तरों- इत्यादि । ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ | द्वारा उसीका प्रतिपादन किया गया इति च विशेषतोऽवधारितम् । | है । उसीको ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ ब्रह्मवित्सम्प्रदायनिश्चयश्चोक्तः | इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निश्चय ‘अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | किया है । ‘वह विदितसे अन्य है दितादधि’ इति । उपन्यस्तमुप- | और अविदितसे भी ऊपर है’ इस संहरिष्यति च ‘अविज्ञातं वि- | वाक्यद्वारा ब्रह्मवेत्ताओंके सम्प्रदाय- जानतां विज्ञातमविजानताम्’ | का निश्चय भी बतलाया गया है; इति । तस्माद्युक्तमेव शिष्यस्य सु | तथा इस प्रकार उल्लेख किये हुए वेदेति बुद्धिं निराकर्तुम् । | प्रकरणका ‘अविज्ञातं विजानतां न हि वेदिता वेदितुर्वेदितुं | विज्ञातमविजानताम्’ इस वाक्यद्वारा शक्यः अग्निर्द्धग्धुरिव दग्धुमग्नेः । | उपसंहार करेंगे । अतः ‘मैं अच्छी | तरह जानता हूँ’ ऐसी शिष्यकी | बुद्धिका निराकरण करना उचित | ही है । | जिस प्रकार जलानेवाले अग्नि- | द्वारा स्वयं अग्नि नहीं जलाया जा | सकता उसी प्रकार जाननेवालेके वाक्य-भाष्य यदि मन्यसे सुवेद इति | ‘यदि मन्यसे सुवेद’ इत्यादि वाक्यसे शिष्यबुद्धिविचालना गृहीत- | जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करना स्थिरतायै । विदिताविदि- | है वह उसके ग्रहण किये हुए अर्थको ताभ्यां निवर्त्य बुद्धिं शिष्यस्य | स्थिर करनेके लिये ही है । शिष्यकी स्वात्मन्यवस्थाप्य तदेव ब्रह्म त्वं | बुद्धिको ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंसे विद्धीति स्वाराज्येऽभिषिच्य | हटाकर ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि’ (उसीको उपास्यप्रतिषेधेनाथास्य बुद्धिं | तू ब्रह्म जान ) इस कथनसे अपने विचालयति । | आत्मस्वरूपमें स्थिर कर तथा उपास्यके | प्रतिषेधद्वारा उसे स्वाराज्यपर अभिषिक्त- | कर अब उसकी बुद्धिको विचलित | करते हैं ।

५६ केनोपनिषद् [ खण्ड २

५६ केनोपनिषद् [ खण्ड २ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧ पद-भाष्य न चान्यो वेदिता ब्रह्मणोऽस्ति | द्वारा स्वयं जाननेवाला नहीं जाना यस्य वेद्यमन्यत्स्याद्ब्रह्म । "नान्य- | जा सकता । ब्रह्मका जाननेवाला कोई और है भी नहीं जिसका वह दतोऽस्ति विज्ञातृ" (बृ० उ० | उससे भिन्न ब्रह्म ज्ञेय हो सके । ३।८।११) इत्यन्यो विज्ञाता | "इससे भिन्न और कोई ज्ञाता नहीं है" इस श्रुतिद्वारा भी ब्रह्मसे भिन्न प्रतिषिध्यते । तस्मात् सुष्ठु वेदाहं | ज्ञाताका प्रतिषेध किया गया है । अतः 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता ब्रह्मेति प्रतिपत्तिर्मिथ्यैव । तस्माद् | हूँ' यह समझना मिथ्या ही है । इसलिये गुरुने 'यदि मन्यसे' युक्तमेवाहाचार्यो यदीत्यादि । | इत्यादि ठीक ही कहा है । यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥ यदि तू ऐसा मानता है कि 'मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तो निश्चय ही तू ब्रह्मका थोड़ा-सा ही रूप जानता है । इसका जो रूप तू जानता है और इसका जो रूप देवताओंमें विदित है [ वह भी अल्प ही है ] अतः तेरे लिये ब्रह्म विचारणीय ही है । [ तब शिष्यने एकान्त देशमें विचार करनेके अनन्तर कहा— ] 'मैं ब्रह्मको जान गया—ऐसा समझता हूँ' ॥ १ ॥ पद-भाष्य यदि कदाचित् मन्यसे सु | यदि कदाचित् तू ऐसा मानता वेदेति सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति । | हो कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह वाक्य-भाष्य यदि मन्यसे सुवेद अहं | यदि तू यह मानता है कि मैं ब्रह्मको ब्रह्मेति त्वं ततोऽल्पमेव ब्रह्मणो | अच्छी तरह जानता हूँ तो तू निश्चय १ 'दभ्रमेव' ऐसा भी पाठ है ।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य कदाचिद्यथाश्रुतं दुर्विज्ञेयमपि | जानता हूँ । जिसके दोष क्षीण हो क्षीणदोषः सुमेधाः कश्चित्प्रति- | गये हैं ऐसा कोई बुद्धिमान् पुरुष कभी सुने हुएके अनुसार दुर्विज्ञेय पद्यते कश्चिन्नेति साशङ्कमाह | विषयको भी समझ लेता है और कोई नहीं भी समझता—इस यदीत्यादि । दृष्टं च “य एषोऽ- | आशयसे ही [गुरुने] 'यदि मन्यसे' इत्यादि शंकायुक्त वाक्य कहा है । क्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति | ऐसा देखा भी गया है कि “यह जो नेत्रोंके भीतर पुरुष दिखायी होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म” | देता है यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभयपद है और यही (छा० उ० ८।७।४) इत्युक्ते | ब्रह्म है—ऐसा [ब्रह्माने] कहा” इस प्राजापत्यः पण्डितोऽप्यसुरराड्- | प्रकार ब्रह्माजीके कहनेपर प्रजापति-की सन्तान और पण्डित होनेपर विरोचनः स्वभावदोषवशादनुप- | भी असुरराज विरोचनने अपने स्वभावके दोषसे, किसी प्रकार सिद्ध पद्यमानमपि विपरीतमर्थं शरीर- | न होनेपर भी शरीर ही आत्मा है, मात्मेति प्रतिपन्नः । तथेन्द्रो | ऐसा विपरीत अर्थ समझ लिया । तथा देवराज इन्द्रने भी एक, देवराट् सकृद्द्विस्त्रिरुक्तं चाप्रति- | दो तथा तीन बार कहनेपर भी इसका भाव न समझकर अपने पद्यमानः स्वभावदोषक्षयमपेक्ष्य | स्वभावका दोष क्षीण हो जानेके वाक्य-भाष्य रूपं वेत्थ त्वमिति नूनं निश्चितं | ही ब्रह्मके रूपको बहुत कम जानता है—ऐसा आचार्य समझते हैं । परन्तु मन्यत इत्याचार्यः। सा पुनर्वि- | आचार्य जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करते हैं वह किसलिये है—इसपर चालना किमर्थेत्युच्यते-पूर्व- | कहते हैं कि [उनका यह कार्य] शिष्यद्वारा पहले ग्रहण किये हुए अर्थमें गृहीतवस्तुनि बुद्धेः स्थिरतायै । | बुद्धिकी स्थिरताके लिये है ।

५८ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य चतुर्थे पर्याये प्रथमोक्तमेव ब्रह्म | अनन्तर चौथी बार कहनेपर पहली | ही बार कहे हुए ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त प्रतिपन्नवान् । लोकेऽपि एकस्माद् | किया । लोकमें भी एक ही गुरु- | से श्रवण करनेवालोंमें कोई तो गुरोः शृण्वतां कश्चिद्यथावत्प्रति- | ठीक-ठीक समझ लेता है, कोई पद्यते कश्चिदद्यथावत् कश्चिद्विप- | ठीक नहीं समझता है, कोई उलटा | समझ बैठता है और कोई समझता रींतं कश्चिन्न प्रतिपद्यते । किमु | ही नहीं । फिर यदि अतीन्द्रिय | आत्मतत्त्वको न समझ सकें तो वक्तव्यमतीन्द्रियमात्मतत्त्वम् ? | इसमें कहना ही क्या है ? इसके | सम्बन्धमें तो समस्त सद्वादी और अत्र हि विप्रतिपन्नाः सदसद्वादि- | असद्वादी तार्किक भी उलटा ही | समझे हुए हैं । अतः 'ब्रह्मको जान मस्तार्किकाः सर्वे । तस्माद्विदितं | लिया' यह कथन सुनिश्चित होनेपर | भी विषम प्रतिपत्ति (ज्ञान) होनेके ब्रह्मेति सुनिश्चितोक्तमपि विषम- | कारण आचार्यका 'यदि मन्यसे | सुवेद' इत्यादि शंकायुक्त कथन प्रतिपत्तित्वाद् यदि मन्यसे | उचित ही है । [अतः आचार्य इत्यादि साशङ्कं वचनं युक्तमेव | कहते हैं यदि तू 'ब्रह्मको मैने जान | लिया है' ऐसा मानता है तो] आचार्यस्य । दहरम् अल्पमेवापि | निश्चय ही तू ब्रह्मके अल्प रूपको नूनं त्वं वेत्थ जानीषे ब्रह्मणो | ही जानता है । रूपम् । | वाक्य-भाष्य देवेष्वपि सुवेदाहमिति मन्यते यः | उद्देश्यको लेकर आचार्य कहते हैं—] | देवताओंमें भी जो कोई यह मानता है सोऽप्यस्य ब्रह्मणो रूपं दहरमेव | कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ | वह भी निश्चय ही उस ब्रह्मके रूपको वेत्ति नूनम् । कस्मात् ? अविषय- | बहुत कम जानता है। क्यों ? क्योंकि ब्रह्म त्वात्कस्यचिद्ब्रह्मणः । | किसीका भी विषय नहीं है ।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९ पद-भाष्य किमनेकानि ब्रह्मणो रूपाणि | पूर्व०-क्या ब्रह्मके बड़े और महान्त्यर्भकाणि च, येनाह दहर- | छोटे अनेकों रूप हैं, जिससे कि मेवेत्यादि ? | गुरु 'तू ब्रह्मके अल्प रूपको ही | जानता है' ऐसा कह रहे हैं ? बाढम्; अनेकानि हि | सिद्धान्ती-हाँ, नाम-रूपात्मक ब्रह्मण नामरूपोपाधिकृतानि | उपाधिके किये हुए तो ब्रह्मके अनेक औपाधिकभेद- ब्रह्मणो रूपाणि, न | रूप हैं, किन्तु स्वतः नहीं हैं। स्वतः निरूपणम् स्वतः । स्वतस्तु | तो "जो अशब्द, अस्पर्श, रूपरहित, "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा- | अव्यय, रसहीन, नित्य और गन्ध- रसं नित्यमगन्धवच्च यत्" ( क० | हीन है" इस श्रुतिके अनुसार उ० १ । ३ । १५, नृसिंहोत्तर० | शब्दादिके सहित उसके सभी रूपों- ९, मुक्तिक० २ । ७२ ) इति | का प्रतिषेध किया जाता है । शब्दादिभिः सह रूपाणि प्रति- | षिध्यन्ते । | पूर्व०-जिस धर्मके द्वारा जिसका ननु येनैव धर्मेण यद्रूप्यते | निरूपण किया जाता है वही उसका तदेव तस्य स्वरूपमिति ब्रह्मणोऽपि | रूप हुआ करता है; अतः ब्रह्मका भी येन विशेषेण निरूपणं तदेव | जिस विशेषणसे निरूपण होता है वही तस्य स्वरूपं स्यात् । अत उच्यते- | उसका स्वरूप होना चाहिये । अतः चैतन्यम् पृथिव्यादीनामन्य- | कहते हैं—चैतन्य पृथिवी आदिका तमस्य सर्वेषां विपरिणतानां वा | अथवा परिणामको प्राप्त हुए अन्य वाक्य-भाष्य अथवाल्पमेवास्याध्यात्मिकं | अथवा इसका इस प्रकार सम्बन्ध मनुष्येषु देवेषु च आधिदैविक- | लगाना चाहिये कि इस ब्रह्मका जो मस्य ब्रह्मणो यद्रूपं तदिति | मनुष्योंमें आध्यात्मिक और देवताओंमें सम्बन्धः । अथ न्विति हेतु- | आधिदैविक रूप है वह बहुत तुच्छ ही मीमांसायाः । यस्माद्दहरमेव सु | है। 'अथ नु' ऐसा कहकर ब्रह्मके विदितं ब्रह्मणो रूपमन्यदेव तद्विदि- | -विचारमें हेतु प्रदर्शित करते हैं। क्योंकि | 'ब्रह्म विदितसे पृथक् ही है'—ऐसा कहे | जानेके कारण ब्रह्मका अच्छी प्रकार | जाना हुआ रूप तो अल्प ही है। केनो० ३—

६० केनोपनिषद् [ खण्ड २

६० केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य धर्मो न भवति, तथा श्रोत्रादी- | समस्त पदार्थोंमेंसे किसीका धर्म नहीं नामन्तःकरणस्य च धर्मो न | है और न वह श्रोत्रादि इन्द्रिय अथवा भवतीति ब्रह्मणो रूपमिति ब्रह्म | अन्तःकरणका ही धर्म है, अतएव रूप्यते चैतन्येन । तथा चोक्तम् । | वह ब्रह्मका रूप है, इसीलिये “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० | ब्रह्मका चैतन्यरूपसे निरूपण किया ३।९।२८) “विज्ञानघन एव” | जाता है। ऐसा ही कहा भी है— (बृ० उ० २।४।१२) “सत्यं | “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है” ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० | “वह विज्ञानघन ही है” “ब्रह्म सत्य २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” | ज्ञान और अनन्तस्वरूप है” “प्रज्ञान (ऐ० उ० ५ । ३) इति च | ब्रह्म है” इस प्रकार श्रुतियोंमें भी ब्रह्मणो रूपं निर्दिष्टं श्रुतिषु । | ब्रह्मके रूपका निरूपण किया गया है । सत्यमेवम्; तथापि तदन्तः- | सिद्धान्ती—यह ठीक है, तथापि करणदेहेन्द्रियोपाधिद्वारेणैव वि- | वह अन्तःकरण, शरीर और इन्द्रिय- रूप उपाधिके द्वारा ही विज्ञानादि ज्ञानादिशब्दैर्निर्दिश्यते, तदनु- | शब्दोंसे निरूपण किया जाता है, कारित्वाद् देहादिवृद्धिसङ्कोच- | क्योंकि देहादिके वृद्धि, संकोच, वाक्य-भाष्य तादित्युक्तत्वात्। सुवेदेति च मन्य- | और तू यह मानता ही है कि मैं उसे अच्छी सेऽतोऽल्पमेव वेत्थ त्वं ब्रह्मणो | तरह जानता हूँ। इसलिये तू ब्रह्मके अल्प स्वरूपको ही जानता है। क्योंकि ऐसी रूपं यत्साद्य नु तत्सान्मीमांस्यम् | बात है, इसलिये जबतक तुझे विदित और अविदितका प्रतिषेध करनेवाले एवाद्यापि ते तव ब्रह्म विचार्यमेव | शास्त्रवचनका अनुभव न हो तबतक तो अब भी मैं तेरे लिये ब्रह्मको मीमांसा यावद्विदिताविदितप्रतिषेधागमा- | यानी विचारके योग्य ही समझता हूँ; र्थानुभव इत्यर्थः । | यह इसका तात्पर्य है ।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

पद-भाष्य च्छेदादिषु नाशेषु च, न स्वतः । | उच्छेद और नाश आदिमें वह स्वतस्तु "अविज्ञातं विजानतां | उनका अनुकरण करनेवाला है; विज्ञातमविजानताम्" (के० उ० | परन्तु स्वतः वैसा नहीं है । स्वतः २।३) इति स्थितं भविष्यति । | तो वह "जाननेवालोंके लिये अज्ञात | है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात | है" इस प्रकार निश्चय किया जायगा । यदस्य ब्रह्मणो रूपमिति पूर्वेण | 'यदस्य' इस पदसमूहका पूर्व- सम्बन्धः । न केवलमध्यात्मो- | वर्ती 'ब्रह्मणो रूपम्' के साथ सम्बन्ध | है । तू केवल आध्यात्मिक उपाधिसे पाधिपरिच्छिन्नस्यास्य ब्रह्मणो | परिच्छिन्न हुए इस ब्रह्मके ही रूपं त्वमल्पं वेत्थ; यदप्यधि- | अल्प रूपको नहीं जानता बल्कि | अधिदैवत उपाधिसे परिच्छिन्न हुए दैवतोपाधिपरिच्छिन्नस्यास्य | इस ब्रह्मके भी जिस रूपको तू ब्रह्मणो रूपं देवेषु वेत्थ त्वम् | देवताओंमें जानता है वह भी | निश्चय तू इसके अल्प रूपको ही तदपि नूनं दहरमेव वेत्थ इति | जानता है—ऐसा मैं मानता हूँ । मन्येऽहम् । यदध्यात्मं यदपि | इसका जो अध्यात्मरूप है और जो | देवताओंमें है वह भी उपाधि- देवेषु तदपि चोपाधिपरिच्छिन्न- | परिच्छिन्न होनेके कारण दहरत्व त्वादहरत्वान्न निवर्तते । यत्तु | ( अल्पत्व ) से दूर नहीं है । किन्तु वाक्य-भाष्य मन्ये विदितमिति शिष्यस्य | 'मन्ये विदितम्' यह शिष्यकी | मीमांसा (विचार) करनेके अनन्तरकी मीमांसानन्तरोक्तिः प्रत्ययत्रय- | उक्ति है—क्योंकि ऐसा माननेपर ही | तीन प्रकारकी प्रतीतियोंकी सङ्गति सङ्गतेः । सम्यग्वस्तुनिश्चयाय | होती है । सम्यक् वस्तुके निश्चयके | लिये विचलित किये हुए शिष्यसे जब विचालितः शिष्य आचार्येण | आचार्यने कहा कि 'तुम्हारे लिये अभी मीमांस्यमेव त इति चोक्त एकान्ते | ब्रह्म विचारणीय ही है' तब शिष्यने

६२ केनोपनिषद् [ खण्ड २

६२ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य विध्वस्तसर्वोपाधिविशेषं शान्तम् | जो सम्पूर्ण उपाधि और विशेषणोंसे अनन्तमेकमद्वैतं भूमाख्यं नित्यं | रहित शान्त अनन्त एक अद्वितीय | भूमासंज्ञक नित्य ब्रह्म है वह ब्रह्म, न तत्सुवेद्यमित्यभिप्रायः। | सुगमतासे जाननेयोग्य नहीं है— | यह इसका अभिप्राय है। यत एवम् अथ नु तस्मात् | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये मन्ये अद्यापि मीमांस्यं विचार्यमेव | अभी तो मैं तेरे लिये ब्रह्मको ते तव ब्रह्म। एवमाचार्योक्तः | विचारणीय ही समझता हूँ। शिष्य एकान्ते उपविष्टः समा- | आचार्यके ऐसा कहनेपर शिष्यने हितः सन्, यथोक्तमाचार्येण | एकान्तमें बैठकर समाहित हो आगममर्थतो विचार्य, तर्कतश्च | आचार्यके बतलाये हुए आगमको निर्धार्य, स्वानुभवं कृत्वा, | अर्थसहित विचारकर और तर्कद्वारा आचार्यसकाशमुपगम्य उवाच— | निश्चयकर आत्मानुभव करनेके मन्येऽहमथेदानीं विदितं | अनन्तर आचार्यके समीप आकर ब्रह्मेति ॥१॥ | कहा—मैं ऐसा मानता हूँ कि अब | मुझे ब्रह्म विदित हो गया है ॥ १ ॥ वाक्य-भाष्य समाहितो भूत्वा विचार्य यथोक्तं | एकान्त देशमें समाहित चित्तसे पूर्वोक्त सुपरिनिश्चितः सन्नाहागमाचा- | प्रकारसे ब्रह्मको विचारनेके अनन्तर र्यात्मानुभवप्रत्ययत्रयस्यैकविषय- | भलीभाँति निश्चय करके शास्त्र, | आचार्य और अपना अनुभव—इन त्वेन सङ्गत्यर्थम् । एवं हि सुपरि- | तीनों प्रतीतियोंकी एक ही विषयमें निश्चिता विद्या सफला स्यान्न | संगति करनेके लिये कहा [ मैं ब्रह्मको अनिश्चितेति न्यायः प्रदर्शितो | ज्ञात हुआ ही मानता हूँ ] । इससे यह | न्याय दिखलाया गया है कि इस भवति; मन्ये विदितमिति | प्रकार खूब निश्चित किया हुआ ज्ञान ही परिनिश्चितनिश्चितविज्ञानप्रतिज्ञा- | सफल होता है—अनिश्चित नहीं, क्योंकि | 'मन्ये विदितम्' इस उक्तिसे परि- हेतूकेः ॥ १ ॥ | निश्चित—निश्चित विज्ञानकी प्रतिज्ञाके | हेतुका ही प्रतिपादन किया गया है ॥१॥

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३ पद-भाष्य कथमिति, शृणु— | कैसे विदित हुआ है सो सुनिये— अनुभूतिका उल्लेख नाहं* मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २॥ मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्मको अच्छी तरह जान गया और न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता । इसलिये मैं उसे जानता हूँ और नहीं भी जानता । हम शिष्योंमेंसे जो इस प्रकार [ उसे विदिता- विदितसे अन्य ] जानता है वही जानता है ॥ २ ॥ पद-भाष्य न अहं मन्ये सुवेदेति, नैवाहं | मैं अच्छी तरह जानता हूँ— | ऐसा नहीं मानता अर्थात् ब्रह्मको मन्ये सुवेद ब्रह्मेति । नैव तर्हि | अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा भी | मैं निश्चयपूर्वक नहीं मानता । 'तब विदितं त्वया ब्रह्मेत्युक्ते आह— | तो तुझे ब्रह्म विदित ही नहीं | हुआ'—ऐसा कहनेपर शिष्य कहता | है—'मैं नहीं जानता, सो भी बात नो न वेदेति वेद च । वेद | नहीं है, जानता भी हूँ । मूलके 'वेद | च' इस पदसमूहके 'च' शब्दसे 'नहीं चेति चशब्दान्न वेद च । | भी जानता' ऐसा अर्थ लेना चाहिये । वाक्य-भाष्य परिनिष्ठितं सफलं विज्ञानं | आचार्यका और अपना निश्चय | समान ही है—यह दिखलानेके लिये प्रतिजानीत आचार्यात्मनिश्चययोः | शिष्य अपने अच्छी प्रकार निश्चित | किये हुए सफल विज्ञानकी प्रतिज्ञा तुल्यतायै यस्माद्धेतुमाह नाह | करता है, क्योंकि 'नाह मन्ये सुवेद'— | ऐसा कहकर वह उसका हेतु मन्ये सुवेद इति । | बतलाता है ।


  • यहाँ 'नाह' ऐसा भी पाठ है, वाक्य-भाष्य इसी पाठके अनुसार है।

६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २

६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य ननु विप्रतिषिद्धं नाहं मन्ये | गुरु—'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा नहीं मानता' सुवेदेति, नो न वेदेति, वेद च | तथा 'मैं नहीं जानता—सो भी बात नहीं है बल्कि जानता ही हूँ' इति। यदि न मन्यसे सुवेदेति, | ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। यदि तू यह नहीं मानता कि 'उसे कथं मन्यसे वेद चेति। अथ | अच्छी तरह जानता हूँ' तो ऐसा कैसे समझता है कि 'उसे जानता मन्यसे वेदैवेति, कथं न मन्यसे | भी हूँ' और यदि तू मानता है कि 'मैं जानता ही हूँ' तो ऐसा क्यों नहीं सुवेदेति। एकं वस्तु येन ज्ञायते, | मानता कि 'उसे अच्छी तरह जानता हूँ'। संशययुक्त और तेनैव तदेव वस्तु न सुविज्ञायत | विपरीत ज्ञानको छोड़कर एक वस्तु जिसके द्वारा जानी जाती है इति विप्रतिषिद्धं, संशयविपर्ययौ | उसीसे वही वस्तु अच्छी तरह नहीं जानी जाती—ऐसा कहना तो वर्जयित्वा। न च ब्रह्म संशयित- | ठीक नहीं है। और ऐसा भी कोई नियम नहीं बनाया जा सकता कि त्वेन ज्ञेयं विपरीतत्वेन वेति | ब्रह्म संशययुक्त अथवा विपरीतरूपसे वाक्य-भाष्य अहेत्यवधारणार्थो निपातो | 'अह' यह निश्चयार्थक निपात नैव मन्य इत्येतत्। यावद- | है। इसका यह तात्पर्य है कि मैं [ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ ] ऐसा परिनिश्चितं विज्ञानं तावत्सुवेद | मानता ही नहीं। जबतक मुझे सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति विपरीतो | ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था तबतक ही मुझे 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता मम निश्चय आसीत् । | हूँ'—ऐसा विपरीत निश्चय था। आपके द्वारा [उस निश्चयसे ] विचलित किये स उपजगाम भवद्भिर्विचालितस्य; | जानेपर अब मेरा यह निश्चय दूर हो गया,

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५

पद-भाष्य नियन्तुं शक्यम् । संशयविप- | ही जाननेयोग्य है, क्योंकि संशय र्ययौ हि सर्वत्रानर्थकरत्वेनैव | और विपर्यय तो सर्वत्र अनर्थकारी प्रसिद्धौ । | रूपसे ही प्रसिद्ध हैं । एवमाचार्येण विचाल्य- | आचार्यद्वारा इस प्रकार विचलित मानोऽपि शिष्यो न विचचाल, | किये जानेपर भी 'वह विदितसे 'अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | अन्य ही है और अविदितसे भी दितादधि' इत्याचार्योक्तागम- | ऊपर है' इस आचार्यके कहे हुए सम्प्रदायबलात् उपपत्त्यनुभव- | शास्त्रसम्प्रदायके बलसे तथा उपपत्ति बलाच्च; जगर्ज च ब्रह्मविद्यायां | और अपने अनुभवके बलसे शिष्य | विचलित न हुआ; बल्कि वह ब्रह्म- दृढनिश्चयतां दर्शयन्नात्मनः । | विद्यामें अपनी दृढनिश्चयता दिखलाते | हुए गर्जने लगा । किस प्रकार वाक्य-भाष्य यथोक्तार्थमीमांसाफलभूतात् | क्योंकि वह पूर्वोक्त अर्थकी मीमांसा स्वात्मब्रह्मत्वनिश्चयरूपात्सम्यक्- | (विचार) के फलस्वरूप अपने आत्मा- प्रत्ययाद्विरुद्धत्वात् । अतो नाह | के ब्रह्मत्वनिश्चयरूप सम्यक् प्रत्ययके | विरुद्ध है । अतः 'मैं अच्छी तरह मन्ये सु वेदेति । | जानता हूँ' ऐसा तो मानता ही नहीं। यस्मान्नैतन्मैव न वेद नो न वेदेति | तथा, उस ब्रह्मको मैं नहीं | जानता-ऐसा भी नहीं मानता मन्य इत्यनुवर्तते; अविदित- | क्योंकि अविदित ब्रह्मका प्रतिषेध | किया गया है। यहाँ 'नो न वेदेति' इस ब्रह्मप्रतिषेधात् । कथं तर्हि | वाक्यके आगे 'मन्ये' इस क्रिया-पदकी | अनुवृत्ति होती है। फिर यह पूछनेपर कि मन्यसे इत्युक्त आह-वेद च । | 'तुम किस प्रकार मानते हो ?' | शिष्य बोला-'वेद च' । यहाँ 'च' | शब्दसे 'वेद च न वेद च' अर्थात् चशब्दाद्वेद च न वेद चेत्यभिप्रायः | जानता भी हूँ और नहीं भी जानता-

६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २

६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य

कथमित्युच्यते-यो यः कश्चिद् | गर्जने लगा, सो बतलाते हैं— नः अस्माकं सब्रह्मचारिणां मध्ये | ब्रह्मचारियोंके सहित 'हम शिष्योंमें तन्मदुक्तं वचनं तत्त्वतो वेद, | जो-जो मेरे कहे हुए उस वचनको स तद्ब्रह्म वेद । | तत्त्वतः जानता है—वही उस | ब्रह्मको जानता है।' किंपुनस्तद्वचनमित्यत आह— | अच्छा तो वह वचन है क्या ? | ऐसा प्रश्न करनेपर [ शिष्य ] कहता नो न वेदेति वेद च इति । | है—'मैं नहीं जानता—ऐसा भी | नहीं है, जानता भी हूँ।' जो बात यदेव 'अन्यदेव तद्विदितादथो | [ आचार्यने ] 'वह विदितसे अन्य अविदितादधि' इत्युक्तम्, तदेव | ही है और अविदितसे भी ऊपर है' | इस वाक्यद्वारा कही थी उसी वस्तु- वस्तु अनुमानानुभवाभ्यां | को अपने अनुमान और अनुभवसे

वाक्य-भाष्य

विदिताविदिताभ्यामन्यत्वाद्ब्रह्मणः | ऐसा अभिप्राय है। क्योंकि ब्रह्म विदित | और अविदित—दोनोंसे ही भिन्न है। तस्मान्मया विदितं ब्रह्मेति मन्य | अतः 'ब्रह्म मुझे विदित है—यह मानता इति वाक्यार्थः । | हूँ'—यही इस वाक्यका अर्थ है। अथवा वेद चेति नित्यविज्ञान- | अथवा 'वेद च' इसका यह | अभिप्राय है कि मैं नित्यविज्ञान-ब्रह्म- ब्रह्मस्वरूपतया नो न वेद वेदैव | स्वरूप होनेके कारण 'नहीं जानता' | —ऐसी बात नहीं है बल्कि जानता चाहं स्वरूपविक्रियाभावात् । | ही हूँ, क्योंकि अपने स्वरूपमें कोई | विकार नहीं है। तथा विशेष विज्ञान विशेषविज्ञानं च पराध्यस्तं न | भी दूसरोंका आरोपित किया हुआ ही स्वत इति परमार्थतो न च | है स्वरूपसे नहीं है—इसलिये वेदेति । | परमार्थतः नहीं भी जानता।

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७ पद-भाष्य संयोज्य निश्चितं वाक्यान्तरेण | मिलाकर निश्चित करके आचार्यकी नो न वेदेति वेद च इत्यवोचत् | बुद्धिको सम्यक् प्रकारसे बतलाने आचार्यबुद्धिसंवादार्थं मन्दबुद्धि- | और मन्दबुद्धियोंकी बुद्धिकी पहुँचसे ग्रहणव्यपोहार्थं च । तथा च | बचानेके लिये एक दूसरे वाक्यसे गर्जितमुपपन्नं भवति 'यो नस्त- | 'मैं नहीं जानता—ऐसा भी नहीं है द्वेद तद्वेद' इति ॥२॥ | जानता भी हूँ' ऐसा कहा है। ऐसा | होनेपर ही 'हममेंसे जो इस [वाक्यके | मर्म ] को जानता है वही जानता | है' यह गर्जना उचित हो सकती | है ॥ २ ॥

वाक्य-भाष्य यो नस्तद्वेद तद्वेदेति पक्षान्तर- | 'यो नस्तद्वेद तद्वेद' यह आगम निरासार्थमाम्नाय उक्तार्थानु- | उपर्युक्त अर्थका अनुवाद होनेके वादात् । यो नोऽस्माकं मध्ये स | कारण इससे अन्य पक्षोंका निषेध एव तद्ब्रह्म वेद नान्यः । उपास्य- | करनेके लिये है । हममेंसे जो ब्रह्मवित्त्वादतोऽन्यस्य यथाहं | उस ब्रह्मको इस प्रकार विदित- वेदेति । वेद चेति पक्षान्तरे ब्रह्म- | अविदितसे भिन्न जानता है वही जानता वित्त्वं निरस्यते । कुतोऽयमर्थोऽ- | है, और कोई नहीं; क्योंकि जैसा वसीयत इत्युच्यते । उक्तार्थानुवा- | मैं जानता हूँ उससे अन्य प्रकार जानने- दादुक्तं ह्यनुवदति नो न वेदेति | वाला तो उपास्य अर्थात् कार्यब्रह्मको ही वेद चेति ॥ २ ॥ | जाननेवाला है । 'वेद च' इस पदसे | अन्य पक्षवालेमें ब्रह्मवित्त्वका निरास | किया जाता है । किस कारण यह | निष्कर्ष निकाला जाता है ? सो बतलाते | हैं । ऊपर कहे हुए अर्थका अनुवाद | करनेके कारण; क्योंकि यहाँ 'नो न | वेदेति वेद च' इस वाक्यसे पूर्वोक्तका | ही अनुवाद करते हैं ॥ २ ॥

६८ केनोपनिषद् [ खण्ड २

६८ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य शिष्याचार्यसंवादात्प्रतिनिवृत्य | अब शिष्य और आचार्यके स्वेन रूपेण श्रुतिः समस्तसंवाद- | संवादसे निवृत्त होकर श्रुति समस्त निर्वृत्तमर्थमेव बोधयति-यस्या- | संवादसे सम्पन्न होनेवाले अर्थको मतमित्यादिना- | ही 'यस्यामतम्' इत्यादि अपने ही रूपसे बतलाती है— ज्ञाता अज्ञ है और अज्ञ ज्ञानी है यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है उसीको ज्ञात है और जिसको ज्ञात है वह उसे नहीं जानता; क्योंकि वह जाननेवालोंका बिना जाना हुआ है और न जाननेवालोंका जाना हुआ है [क्योंकि अन्य वस्तुओंके समान दृश्य न होनेसे वह विषयरूपसे नहीं जाना जा सकता] ॥ ३ ॥ पद-भाष्य यस्य ब्रह्मविदः अमतम् | जिस ब्रह्मवेत्ताका ऐसा मत— अविज्ञातम् अविदितं ब्रह्मेति | अभिप्राय अर्थात् निश्चय है कि मतम् अभिप्रायः निश्चयः, तस्य | ब्रह्म अमत—अविज्ञात यानी मतं ज्ञातं सम्यग्ब्रह्मेत्यभिप्रायः। | अविदित है उसे ब्रह्म ठीक-ठीक यस्य पुनः मतं ज्ञातं विदितं | मत अर्थात् ज्ञात हो गया है—ऐसा इसका तात्पर्य है। और जिसे 'मुझे ब्रह्म मत—ज्ञात अर्थात् विदित हो वाक्य-भाष्य यस्यामतम् इति श्रौतम् | 'यस्यामतम्' इत्यादि श्रुति-वचन आख्यायिकार्थोपसंहारार्थम् । | इस आख्यायिकाका उपसंहार करनेके शिष्याचार्योक्तिप्रत्युक्तिलक्षणया | लिये है। शिष्य और आचार्यकी अनुभवयुक्तिप्रधानया आख्यायि- | उक्ति-प्रत्युक्ति ही जिसका लक्षण है कया योऽर्थः सिद्धः स श्रौतेन | ऐसी इस अनुभव और युक्तिप्रधान आख्यायिकासे जो अर्थ सिद्ध हुआ है

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२

पद-भाष्य मया ब्रह्मेति निश्चयः, न वेदैव | गया है'—ऐसा निश्चय है वह | जानता ही नहीं—उसे ब्रह्मका सः-न ब्रह्म विजानाति सः । | ज्ञान नहीं है । विद्वदविदुषोर्यथोक्तौ पक्षौ | अत्र 'अविज्ञातं विजानताम्' | ऐसा कहकर विद्वान् और अविद्वान्- अवधारयति—अविज्ञातं विजान- | के उपर्युक्त पक्षोंका अवधारण | ( निश्चय ) करते हैं—जाननेवालों तामिति, अविज्ञातम् अमतम् | अर्थात् भली प्रकार समझनेवालों- | को वह ब्रह्म अविज्ञात—अमत अविदितमेव ब्रह्म विजानतां | यानी अविदित ( अज्ञेय ) ही है; सम्यग्विदितवतामित्येतत् । | वाक्य-भाष्य वचनेनागमप्रधानेन निगमन- | वह सबका उपसंहार करनेवाले इस | शास्त्रप्रधान श्रौतवचनसे संक्षेपमें कहा स्थानीयेन संक्षेपत उच्यते। यदुक्तं | जाता है । जिसे वागादि इन्द्रियोंका | अविषय होनेके कारण जाने हुए विदितादन्यद्वागादीनामगोचर- | पदार्थोंसे भिन्न बतलाया था तथा | अनुभव और उपपत्तिसे भी जिसकी त्वात् मीमांसितं चानुभवोप- | मीमांसा की थी उस ब्रह्मको वैसा ही पत्तिभ्यां ब्रह्म तत्तथैव ज्ञातव्यम् । | जानना चाहिये । कस्मात् ? यस्यामतं यस्य | किस कारणसे ? [ सो बतलाते विविदिषाप्रयुक्तप्रवृत्तस्य साधकस्य | हैं—] जिज्ञासासे प्रेरित होकर प्रवृत्त | हुए जिस साधकको ब्रह्म अविज्ञात— अमतमविज्ञातमविदितं ब्रह्म | अविदित है अर्थात् आत्मतत्त्वनिश्चय- इत्यात्मतत्त्वनिश्चयफलावसानाव- | रूप फलमें पर्यवसित होनेवाले ज्ञानरूप- बोधतया विविदिषा निवृत्ता | से जिसकी जिज्ञासा निवृत्त हो गयी इत्यभिप्रायः, तस्य मतं ज्ञातं तेन | है उसीको वह विदित—ज्ञात है। विदितं ब्रह्म । येनाविषयत्वेन | तात्पर्य यह कि जिसने ब्रह्मको