खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
१. प्रथम परिच्छेद: अनिर्वचनीयता-सिद्धि, प्रमाण-लक्षण खण्डन एवं सत्ता-विमर्श
न च सत्ताभेदानन्त्यमस्त्येवेत्यपि पादप्रसारिका निस्ताराय । सत्ताभेदे हि सद्बुद्धिव्यवहारानुगम¹-समर्थनलंघिनः प्रथमापि सत्ता न स्यादिति वृद्धिमित्छतो मूलमपि ते नष्टमिति हा² कष्टतरम् । न च स्वरूपसत्तोपगमाय स्वस्ति, भिन्नानपि अनुगतबुद्ध्याधानपदेऽभिपिप्सता हुआ। रही द्वितीय सत्ता, उसका कारण-कोटि में निवेश है या नहीं ? यदि नहीं, तो असत् ही कारण रहा। क्योंकि जैसे धूम में विद्यमान भी कृष्णत्व हेतुदल में अनिविष्ट होने से हेतुता में अनुपयोगी है, वैसे ही प्रथम सत्ता से विशिष्ट कारण में विद्यमान भी द्वितीय सत्ता—कारणकोटि में निविष्ट न होने से—कारण के सत् होने में उपयोगी नहीं है। यदि द्वितीय सत्ता का कारण- कोटि में निवेश करें, तो यह विकल्प होता है कि द्वितीय सत्ता से विशिष्ट कारण में सत्ता है या नहीं ? यदि नहीं, तो कारण असत् ही रहा। यदि है, तो पूछा जा सकता है कि द्वितीय सत्ता से विशिष्ट में द्वितीय सत्ता ही रहती है अथवा प्रथम सत्ता या तृतीय सत्ता ? यदि द्वितीय सत्ता ही रहती है, तो आत्माश्रय, प्रथम सत्ता रहती है तो अन्योन्याश्रय³ और तृतीय सत्ता रहती हो, तो इस तरह अनन्त सत्ता मानने से अनवस्था होगी । समर्थन—⁴सत्ता में सत्ता इस प्रकार अनन्त सत्ताएँ इष्ट ही हैं अर्थात् अनुभवसिद्ध होने के कारण बीजांकुर के तुल्य यहाँ अनवस्था दोष नहीं है। खण्डन—इस तरह पैर फैलाने से भी निर्वाह नहीं होगा। क्योंकि अनन्त सत्ताएँ मानने पर 'सत्' इत्याकारक अनुगत प्रतीति प्रमाण न होने से प्रथम सत्ता भी सिद्ध नहीं हुई। शोक ! व्याज चाहनेवाले आपका मूल-धन भी नष्ट हुआ । समर्थन—हम जातिरूप सत्ता को नहीं, स्वरूपसत्ता को मानते हैं। अर्थात् घटादि स्वरूप से ही सत् हैं। अतएव अनवस्था दोष नहीं है। खण्डन— १ 'अनुगमननिबन्धने'ति विद्यासागरीपाठः । २ 'हा' विद्यासागर्यां इति नास्ति । ३ अन्योन्य की स्थिति या ज्ञान में अन्योन्य का आश्रय 'अन्योन्याश्रय' है । 'भूतल में घट है और उसी घट में वही भूतल है' ऐसा प्रयोग न होना ही इसके दोषत्व का कारण है । ४ यद्यपि इस शास्त्रार्थ में नैयायिक प्रतिवादी हैं और वे सत्ता में सत्ता अथवा स्वरूप- सत्ता को नहीं मानते । अतः उनके द्वारा ऐसी शंकाएं नहीं हो सकतीं । यदि वे ऐसी शंकाएँ करें, तो 'अपसिद्धान्त' कहकर ही उनका खण्डन उचित है । फिर भी खण्डनकार ने अपनी विद्वत्ता दिखलाने के लिए ही स्वयं शंका कर उनका खण्डन किया है ।
परिच्छेद ] शून्यवाद-विचार २१ त्वया हि जातिमात्राय जलाञ्जलिर्वितीर्येत । मा भूदनुगतिः स्वरूपसत्त्वस्येति वदन् तद्गर्भिणीं कारणतां कथमनुगमयिताऽसीति । किञ्च स्वरूपसत्त्वं स्वरूपाद् घटाद्यात्मनो नाधिकम्, असतोऽपि स्वरूपं स्वरूपमेव । न हि असन् घटादिर्न घटादिः; तथा सति ‘घटादिर्न’ इत्यपि न स्यात्, असतोऽघटादित्वात् । अथ सदपि सत्तामनन्तर्भाव्य कारणम्, तदानीमसपि तत्तथास्तु, सत्त्वासत्त्वयोः कारणकोट्यप्रवेशाविशेषात् । स्वरूपसत्ता प्रतिव्यक्ति भिन्न होने से ‘इदं सत्’, ‘इदं सत्’ इत्याकारक अनुगत प्रतीति न होगी । यदि अनेक में एक अनुगत रूप के न होने पर भी अनुगत प्रतीति मानी जाय, तो गौ आदि व्यक्तियों में गोत्वादि न मानने पर भी ‘गौः’ इत्याकारक अनुगत प्रतीति का निर्वाह होने लगेगा, फलतः इस तरह जातिमात्र को तिलाञ्जलि दे दी जायगी । समर्थन—सत्ता का सर्वत्र अनुगम न हो, स्वरूपभूत सत्ता प्रतिव्यक्ति भिन्न ही रहे, तब भी स्वरूपसत्ता से कारण तो सत् ही सिद्ध हुआ । खण्डन—स्वरूपसत्त्व प्रतिव्यक्ति भिन्न-भिन्न होने से उसमें घटित कारणत्व भी प्रतिव्यक्ति भिन्न-भिन्न हो जायगा । फिर कारणत्व का भी अनुगम कैसे करोगे ? किञ्च --- स्वरूपसत्त्व स्वरूप ( घटादि ) से अधिक तो है नहीं और असत् का स्वरूप भी स्वरूप ही है, क्योंकि असत् घटादि ‘घटादि नहीं हैं’ ऐसा नहीं है, किन्तु वे भी घटादि ही हैं । यदि असत् घटादि न होते, तो “घटादिर्न” यह प्रयोग भी न होता; क्योंकि निषेध किसका होगा ? जो वस्तु एकरूप से या एकदेश में रहती है, उसीका अन्य रूप से या अन्य देश में निषेध होता है । ‘असन् घटः’ यह प्रयोग भी नहीं होता, क्योंकि जब घट है नहीं, तो असत्त्व का विधान कहां होगा ? समर्थन—सत्ता कारण-कोटि में विशेषण नहीं, उपलक्षण है, यद्यपि घट का दण्ड कारण है, ऐसा ही कार्य-कारणभाव है, तब भी सत्ता के उपलक्षण होने से कारण सत् है । खण्डन—यदि ऐसा है, तो हम भी कह सकते हैं कि असत्ता का कारण-दल में प्रवेश न होने से कारण असत् है । क्योंकि सत्त्व- असत्त्व का कारणकोटि में निवेश न होनेपर दोनों मतों में कोई विशेषता न होने से कारण को असत् ही क्यों न मानें ? ।
२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथ सत्ता न कारणकोटिनिविष्टा, किन्तु कारणत्वं सत्त्वम्, नियतपूर्वसत्ता हि कारणतां मन्ये इति मन्यसे; तर्हि मत्पक्षेऽपि सैव कारणताऽस्तु । तर्हि कारणस्य सत्तामभ्युपगतवानसीति घट्टकुट्यां प्रभातमिति चेन्न । भावानवबोधात् । सत्तामसतीमभ्युपगच्छताऽपि सत्ता मयाऽभ्युपगतैव । अन्यथा काऽसौ असतीति । त्वमपि किं सत्तां तत्सत्तामन्तर्भाव्य कारणत्वमिच्छसि ? न त्वेवम्; पूर्ववत् क्वापि सत्तात्यागो वा अनवस्थायां वा पर्यवसानं स्यात् । असत्त्वाविशेषात् कारणनियमः कथं स्यादिति चेन्न । सत्त्वाविशेषेऽपि तुल्यत्वात् । समर्थन—सत्ता कारणता में उपलक्षणत्व या विशेषणत्व से प्रविष्ट नहीं है। कारणत्व ही सत्त्व है, क्योंकि नियत-पूर्व-सत्त्व को ही कारण मानते हैं। खण्डन —यदि ऐसा मानते हैं, तब हमारे मत में भी नियत-पूर्व-सत्त्व ही कारणत्व है। समर्थन—तब आपने कारण की सत्ता मान ली, इससे घट्ट-कुटी में प्रभात हुआ। अर्थात् राज-कर के भय से छिपे मनुष्य का दैववश तहसील में प्रभात होने से जैसी गति होती है, वसी ही आपकी गति हुई । सद्वाद खंडन—आपने मेरे भाव को नहीं जाना। सत्ता को असती मानने पर भी मैं उसे मानता ही हूँ। यदि सत्ता को न मानूँ, तो असत् किसे कहूँगा ? आप भी 'नियतपूर्व-सत्त्वरूप कारणत्व' में अन्य सत्ता को मानते हैं या नहीं ? यदि नहीं, तो असत् ही कारण हुआ ।. यदि मानते हैं, तो उस द्वितीय सत्ता को कारणत्व-दल में प्रविष्ट कर कारण मानते हैं या प्रवेश न कर ? यदि प्रवेश न कर, तो असत् ही कारण रहा। यदि प्रवेश कर, तो सत्ता में सत्ता और उसमें अन्य सत्ता, इस रीति से अनवस्था हो जायगी । यदि किसी सत्ता में सत्ता न मानें, तो जड़ ( मूल-कारण ) तक सब असत् ( सत्तारहित या मिथ्या ) ही हो जायगा । शङ्का—यदि कारण असत् है, तो असत्त्व में कोई अन्तर नहीं है। फिर 'घट का दण्ड कारण है, रासभ नहीं' यह नियम कैसे होगा ? समाधान—यदि कारण सत् हो, तब भी सत्त्व में कोई विशेषता नहीं रहती । दण्ड, रासभ सबकी सत्ता एक सी ही है। फिर तुम्हारे मत में भी 'दण्ड कारण है और रासभ नहीं' यह नियम कैसे होगा ?
परिच्छेद ] शून्यवाद-विचार २३ सत्त्वेऽस्त्यन्वयव्यतिरेकानुविधानं तस्य तज्जातीयस्य वा । त्वत्पक्षे तु असत्त्वा- विशेषाद् व्यतिरेकः । परं सोऽप्यनियतः, यदा कारणाभावस्तदा कार्याभावा- वश्यम्भावानभ्युपगमात्, नित्यासतः कारणस्यासत्त्व एव कदाचित्कार्योत्पादात् । अन्वयस्तु न क्वचिदपीति चेन्न । तुल्यत्वात् । अन्वयो नास्तीत्यभ्युपगच्छता- ऽप्यन्वयोपगमात् । अन्वयस्यापि सत्तान्तर्भावने कथितदोषापत्तेः । एतेन— ‘आशामोदकतृप्ता ये ये चोपार्जितमोदकाः । रस-वीर्य-विपाकादि तुल्यं तेषां प्रसज्यते ॥’ सद्वाद-समर्थन—सत्त्व-पक्ष में दण्ड या दण्डजातीय के साथ घट का यह अन्वय-व्यतिरेक है—‘जब दण्ड रहेगा, तब घट होगा और जब दण्ड का अभाव होगा, तब घट का भी अभाव होगा।’ यही अन्वय-व्यतिरेक घट के प्रति ‘दण्ड कारण है, रासभ नहीं’ इसमें नियामक है । तुम्हारे मत में केवल व्यतिरेक ( अभाव ) है और वह भी नियत नहीं, क्योंकि जब ‘कारण का अभाव हो, तो कार्य का अभाव अवश्य होगा’ ऐसा नहीं है, असत् कारण के अभाव में भी कभी कभी कार्य की उत्पत्ति देखी जाती है । अन्वय तो कहीं भी नहीं है । खंडन—‘जहाँ दण्ड है, वहाँ घट है और जहाँ दण्डाभाव है, वहाँ घटाभाव है’ यह अन्वय-व्यतिरेक दोनों मतों में एक-सा है । क्योंकि असत्-वादी भी वस्तु को स्वरूप-सत् ( प्रातिभासिक ) मानते ही हैं । यदि स्वरूप से भी सत् न मानें, तो उनके मत में ‘असन् घट:’, ‘घटो न’ आदि व्यवहार ही न होगा । यह अलग बात है कि प्रमाण से परमार्थतः दण्डादि सिद्ध नहीं होते, पर व्यवहार में तो हैं ही । किञ्च, ‘अन्वय नहीं है’ यह कहनेवाले तुम्हें भी अन्वय अवश्य मानना पड़ेगा । क्योंकि यदि असत् का भी अन्वय न हो, तो निषेध किसका होगा ? समर्थन—सत् अन्वय ही कार्य-कारण-भाव का नियामक है और असत्-पक्ष में वह नहीं है । खंडन—तुम्हें ‘सत् अन्वय’ से क्या अभिप्रेत है—सत्ता से विशिष्ट या उपलक्षित अन्वय कार्य-कारण-भाव का नियामक है ? दोनों पक्ष बन नहीं सकते, कारण उक्त रीति से ( अन्तर्भावितसत्त्वं चेत्’ इस रीति से ) वे अयुक्त हैं । शङ्का— ‘आशा-मोदक विपणि के, मोदक से सममोद । चहिए तुम्हरे मलहि में, तुष्टि-पुष्टि अरु तोंद ॥’
२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम इत्यस्यापि बाधकत्वमाशामोदकायते। सत्तान्तर्भावानन्तर्भावाभ्यां प्रत्यादेशात्, आशामोदकादिनाऽपि च रसवीर्य्यविपाकादिजननात् । तदसत्कथं कार्य्यं स्यादिति चेन्न । सत्तामन्तर्भाव्य कार्य्यत्वोपगमे कारणवत्कार्येऽपि उक्तदोषस्य, अनन्तर्भावे वाऽविशेषस्य पूर्व्वदावृत्तेः । तस्मात्— 'पूर्वसम्बन्धनियमे हेतुत्वे तुल्य एव नौ । हेतुतत्त्वबहिर्भूत-सत्त्वासत्त्वकथा वृथा ॥' अर्थात् जब सब • वस्तुएँ असत् (प्रातिभासिक) हैं, तो मनोमोदक और बाजार के मोदक से एक सा रस-वीर्य-विपाक होना चाहिए । समाधान—यह तर्क भी मनोमोदक के तुल्य आभास ही है। क्योंकि तर्क विपर्यय (अभाव) में पर्यवसायी हुआ करता है। यहाँ विपर्यय में इस प्रकार पर्यवसान होगा कि 'तुल्य रसादि दोनों से नहीं होता, अतः कारण सत् है।' परन्तु सत्-पक्ष का पूर्वोक्त युक्ति से खण्डन होने के कारण-विपर्यय में पर्यवसान नहीं बनता। सच तो यह है कि स्वप्न के मनोमोदक से भी जाग्रत्कालीन मोदक के समान ही रसादि देखा जाता है। इसी तरह गुञ्जा-पुञ्ज में कल्पित अग्नि से भी बानर की शीत-निवृत्ति देखी जाती है। अतः 'दोनों से तुल्य रसादि नहीं होता' यह कथन नहीं बनता। शङ्का—उत्पत्ति से पहले असत् घटादि में भी सत्ता-सम्बन्धरूप कार्यत्व रहता ही है। इससे कार्य असत् कैसे हो सकता है ? समाधान—यदि सत्ता के अन्तर्भाव से कार्यत्व मानें, तो कारण के तुल्य कार्य में भी उक्त दोष आयेगा। यदि सत्ता का कार्यत्व में अन्तर्भाव न मानें, तो सत्ता के अनन्तर्भाव से असत् ही कार्य क्यों न हो ? पूर्वोक्त युक्ति से सत्त्व कारण-कोटि में निविष्ट नहीं है। अतः दोनों मतों में नियत-सम्बन्धरूप हेतुत्व तुल्य है। फिर इस प्रसङ्ग में हेतुत्व से पृथग्भूत कारण के सत्त्व-असत्त्व का विचार व्यर्थ है। यदि कारणत्व के सत्त्व-असत्त्व का विचार ही करना हो, तो स्वतन्त्र रूप से ही करना चाहिए। पूर्व नियम से कार्य के, जो सो कारण यार । इस प्रसङ्ग में क्यों करो, कारण-सत्त्व-विचार ॥' १ पूर्वेण = कार्यपूर्वक्षणेन नियमेन, संबन्धः = वृत्तित्वम् । राजदन्तादित्वात् नियमशब्दस्य पूर्वनिपातः।
परिच्छेद ] शून्य॒वाद-विचार २५ आस्तां प्रतिबन्दिग्रहाऽऽग्रहः। कथं पुनरसतः कारणत्वमवसेयम्, प्राक्सत्त्व- नियमस्य विशेषस्यानभ्युपगमात्; असत्त्वस्य चाविशेषादिति चेन्न । 'इदमस्मा- नियतप्राक् सत्' इति बुद्ध्या विशेषात् । भ्रान्तैवं बुद्धिगोचरेऽतिप्रसङ्ग इति चेन्न । यादृश्या हि धिया त्रिचतुरकक्षा- बाधाऽनवबोधविश्रान्त्या वस्तुसत्त्वनिश्चयस्ते, तादृश्यैव विषयीकृतस्य ममापि कारणतानिश्चयः । केवलं ततः परास्वपि कक्षासु बाधात् पूर्वपूर्वभ्रान्तिसम्भवेन न तावता सत्त्वावधारणं वयं मन्यामह इति विशेषः । परदर्शनसिद्धान्तस्य भूरिकक्षाधाविनोऽपि ततः परकक्षाबाध्यमानत्वेन अतथाभावोपगमात् । अन्यथा एकदर्शनपरिशेषः स्यात् । शङ्का—प्रतिबन्दीरूप राहु का ग्रहण भले ही रहे, क्योंकि प्रतिबन्दी को वक्ष्यमाण रीति से आप दोष मानते नहीं। फिर असत् कारण होता है, यह कैसे जानें, क्योंकि कारण में नियत-प्राक्सत्त्वरूप विशेष तो आप मानते नहीं और असत्त्व में कोई विशेषता है नहीं । समाधान—'दण्ड घट से नियमतः प्राक्क्षण में रहता है' यह बुद्धि ही विशेष है । शङ्का—यदि बुद्धि ही विशेष है, तो 'रासभ घट से पूर्व है' इस बुद्धि से रासभ को कारण क्यों न मानें ? समाधान--तीन या चार ज्ञान की कक्षाओं में बाध के अदर्शन से विश्रान्त जैसी बुद्धि से तुम्हें वस्तु का निश्चय होता है, वैसी ही बुद्धि से हमें भी कारणता का ज्ञान होता है । भेद यही है कि तीन या चार कक्षाओं से अग्रिम कक्षाओं में बाध की सम्भावना से सम्भव है कि पूर्व-पूर्व ज्ञान भ्रम हो, इसलिए हम तीन-चार कक्षाओं में बाध न होने पर भी वस्तुसत्त्व का निश्चय नहीं करते । शङ्का—तीन-चार ज्ञान-कक्षाओं में बाध न होने से अनुमान से अग्रिम कक्षा में भी अबाध सिद्ध होगा । समाधान—यह नियम नहीं है कि जो तीन-चार कक्षाओं में अबाधित हो, वह अग्रिम कक्षाओं में अबाधित ही रहेगा। क्योंकि नैयायिक मीमांसकाभिमत शब्द-नित्यत्व-सिद्धान्त को, तीन चार ज्ञान-कक्षाओं में बाध न होने पर भी, अग्रिम कक्षा में बाधित मानते ही हैं। यदि तीन-चार कक्षाओं में अबाधित होने से किसी के सिद्धान्त को प्रामाणिक मानें; तो सब दर्शनों के सिद्धान्त आपाततः अबाधित होने से प्रामाणिक होने लगेंगे । फिर तो प्रामाणिकत्व- अप्रामाणिकत्वकृत दर्शनों के भेद भी न होंगे, सब दर्शन मिलकर एकदर्शन हो जायेंगे । ४
२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम एतेन—असत्त्वाविशेषेऽपि कथं कस्यचित्पक्षस्य त्रिचतुरकक्षाधावित्वाधावित्व- मास्तामित्यपि निरस्तम् । अनेवं बुद्धिविषयतादशायां को विशेष इति चेत्, यदा कदापि तादृशबुद्धि- विषयतैव । अन्यथा कथमन्यदातनतादृशबुद्धिविषयतया अन्यदा सत्त्वं स्यात् । तदा सत्त्वमन्यदास्थेन गृह्यत इति चेत्, अन्यकालिकमेव तर्हि तत् तदातनकारणत्वोपयोगीति समानम् । तदेतत् संवृतिसत्त्वमिति गीयते । असती सा न विशेषिका, सती सा नेष्टेत्यभिसन्धानेन संवृतिरपि सती शङ्का—यदि शुक्तिस्थ रजत और यथार्थ रजत दोनों की प्रातिभासिक सत्ता एक-सी है, तो शुक्ति-रजत झटिति बाधित होता है और यथार्थ रजत देर से, इस भेद में क्या हेतु है ? समाधान—यद्यपि आप अन्य दर्शनों के सिद्धान्तों और शुक्ति-रजत में एक-सी सत्ता मानते हैं; फिर भी जैसे अन्य सिद्धान्तों में बाधोदय देर से होता है, और शुक्ति-रजत में अतिशीघ्र, वैसे ही यहाँ भी जानिये । शङ्का—यदि कारण में वस्तुभूत 'नियत-प्राक्-सत्त्व' नहीं, किन्तु प्रातिभासिक है, तब जिस काल और जिस बीज में "इदम् अस्मात् नियत-प्राक्-सत्' यह बुद्धि नहीं है, उस काल या उस बीज में कारणत्व की व्यवस्था कैसे होगी ? समाधान— उस काल में भी रासभादि में जो 'इदम् अस्मात् नियतप्राक्-सत्' इस बुद्धि की विषयता के अभाव का अधिकरणत्व है, उसका अभाव ही व्यवस्थापक है । अथवा यदा- कदा (अन्य देश या काल में) या अन्य पुरुष में जायमान 'इदम् अस्मात् नियतप्राक् सत्' यह बुद्धि ही नियामक है। यदि अन्य काल की बुद्धि नियामक न हो, तो सद्वादी के मत में भी 'इदम् अस्मात् प्राक् आसीत्' इस बुद्धि से भूत दण्डादि में कारणत्व की व्यवस्था कैसे होगी ? शङ्का—सद्वादी के मत में कारण सत् है । अतः अन्य काल के ज्ञान से गृहीत होता है। खंडन—तब अन्य काल की बुद्धि ही वर्तमान कारणत्व-व्यवहार में उपयोगी (कारण) है। इसी को आचार्य लोग संवृतिसत्त्व' कहते हैं। ज्ञान अपने सत्त्व से विषय के असत्त्व (अभाव) का संवरण कर लेता है। अतएव ज्ञान को 'संवृति' और उसके सत्त्व को 'संवृतिसत्त्व' कहते हैं। शङ्का—असत् या मिथ्या संवृति व्यवहार का कारण नहीं हो सकती और शून्यवाद की हानि के भय से आप विज्ञान की सत मानेंगे नहीं। फिर व्यवहार
परिच्छेद ] शून्यवाद-विचार २७ नैवेति पृच्छन् प्रतिवक्तव्यः । विज्ञानं तावत् व्यवहारोपपादकतया द्वाभ्यामप्यनुमतम् । तस्यापि जिज्ञासायां त्रिचतुरकक्षाविश्रान्तगवेषणस्य यदि सत्तोपपन्ना भविष्यति, तदा सता तेनेदमुपपादितं भविष्यति । अथासत्ता तस्य पर्यवसास्यति, तदाऽसतैव तेनेदमुपपाद्यत इति स्वीकर्तव्यम् । असद्विषयेणैव भ्रमे विशिष्टतान्यवहारः । अविचार्यैव तावत्तस्य सदसत्त्वं विचार आरब्धव्यः । अन्यथा प्रथममेव मतिकर्दमे कथारम्भणमशक्यमापद्येत । स्वीकृतं च भवताऽपि भविष्यादादिविषये विज्ञाने विशिष्टव्यवहारनिदानत्वमसतो विषयस्य, कारणशक्तेश्च विशेषक- मसदेव कार्यम् । न च कालान्तरसम्बन्धिनी सत्ता तस्यैकत्र, अन्यत्र नान्यदाऽपीति वैधर्म्य- मेतयोरपीति वक्तव्यम्; विशिष्टव्यवहारप्रवृत्तिसमये द्वयोरप्यसत्त्वाविशेषात् । कैसे होगा ? समाधान--ज्ञान व्यवहार का कारण है, यह दोनों को इष्ट है । उसकी भी सत्ता की जिज्ञासा होने पर विचार होना चाहिए । विचार में तीन या चार कक्षाओं में सत्ता का अन्वेषण समाप्त होने पर यदि युक्ति से असत्ता निश्चित हो, तो व्यवहार की अन्यथानुपपत्ति से मानना पड़ेगा कि 'असत् ही ज्ञान व्यवहार का निमित्त है' । क्योंकि दृष्ट में कोई अनुपपत्ति की शंका नहीं होती । जैसे आपके मत में 'इदं रजतम्' इस भ्रमस्थल में असत् रजत ही 'रजतीयं ज्ञानम् इस व्यवहार का प्रयोजक है, वैसे ही मेरे मत में भी असत् विज्ञान ही व्यवहार-कारण है । अतः ज्ञान के सत्त्व का विचार न कर के ही कारण की सत्ता का विचार करना चाहिए । यदि नियम किया जाय कि ज्ञान की सत्ता के विचार के बिना विचार का आरम्भ नहीं हो सकता, तो ज्ञान के सत्त्व-असत्त्व के विचार का आरम्भ भी न होगा । क्योंकि यह भी विचार स्व से पूर्व स्व के न होने से ज्ञान के सत्त्व-असत्त्व-विचार- पूर्वक नहीं है । अर्थात् यदि ऐसा नियम करें, तो ज्ञानरूप कीचड़ में गौ के तुल्य फँस जाने से विचार का आरंभ असंभव हो जायगा । आप भी 'पुत्र होगा', 'बिजली चमक गयी' आदि भूत-भविष्यत्-विषयक ज्ञानस्थल में असत्-विषय को ही व्यवहार का कारण मानते हैं तथा असत् कार्य ही 'कार्यपूर्ववर्ति-कारणम्' यहाँ कारणत्व का निश्चायक होता है । शङ्का-सद्वादी के मत में अन्य काल में सत् घटादि ही ज्ञान के विषय होते हैं और असद्वादी के मत में घटादि अन्य काल में भी असत् हैं, यही दोनों मतों में विशेष है । समाधान - जिस काल में व्यवहार होता है, उस काल में असत्त्व
२८ सानुवाद-खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रयोजनानुपयुक्ते काले तस्य स्वरूपतोऽवस्थानं पाटच्चरलुण्ठिते वेश्मनि यामिक- जागरणावरत्तान्तमनुहरति । तथापि कालान्तरस्थित्या घटादिकं स्वरूपतः विशेषणतश्च व्यवच्छिन्नं तद्विज्ञानेन स्वभावबलाद् स्वविशेषणत्वेनोपादीयते । न त्वेवमन्यन्ताऽसद् भवितुमर्हति, तस्य स्वरूपतो विशेषणतश्चव्यवच्छिन्नतयाऽनंगीकारात् कुत्र स्वभावतो विज्ञानं सम्बन्धि निरूप्येत ? न; उक्तमत्राऽसतोऽपि तदेव स्वरूपं, तस्य नियतस्वरूपस्यैव नियत- विशेषणस्यैवासत्त्वात् । अन्यथाऽतिप्रसङ्गात्, भ्रान्तिविषयेण दत्तोत्तरत्वाच्च इत्यलमतिप्रपञ्चेन । स्वप्रकाश-वाद-विचार अपरे पुनः चेतसोऽपि शून्यताऽङ्गीकारे मनःप्रत्ययमनासादयन्तः सर्वमिदमस- देव विश्वमित्यभिधातुं सहसैवानुत्सहमाना मन्यन्ते— विज्ञानं तावत् दोनों मतों में एक-सा है । जिस काल में व्यवहार नहीं होता, उस काल में सत्त्व चोरों से घर लुट जाने पर पहरेवालों के जागने के तुल्य व्यर्थ है । शङ्का—व्यवहार-काल में दोनों मतों में एक-सा असत्त्व होने पर भी सद्वादी के मत में अन्य काल में घटादि के सत् होने से स्वरूप और विशेषण से युक्त घटादि हैं, अतः विज्ञान स्वभाव से उसे विषय करता है । किन्तु असद्वादी के मत में अत्यन्त याने कालान्तर में भी असत् घटादि विज्ञान के विषय कैसे हो सकते हैं, क्योंकि शून्यवाद में घटादि स्वरूप और विशेषण से युक्त नहीं हैं । फिर स्वभाव से विज्ञान का सम्बन्ध कहाँ होगा ? समाधान—मैंने इस विषय में कहा है कि असत् का स्वरूप भी स्वरूप ही है । अर्थात् नियत-स्वरूप और विशेषण से युक्त ही घटादि का असत्त्व है । यदि सर्वथा असत् मानें, तो 'घटः असन्, घटो न' इत्यादि प्रयोग भी न होंगे । 'इदं रजतम्' इस भ्रम का विषय असत् रजत ही जैसे रजतीयं ज्ञानम्' इस व्यवहार का कारण होता है, वैसे ही सब जगह असत् ही व्यवहार का कारण होता है । विद्वान् के लिए इतना ही बहुत है, अतः विस्तार व्यर्थ है । स्वप्रकाशवाद-विचार शून्यवाद खंडन—विज्ञान को शून्य मानने में सन्तोष न करनेवाले तथा सारे संसार को असत् कहने में उत्साहरहित वेदान्ताचार्य मानते हैं कि स्वप्रकाश अपने- १ 'घटः' ऐसा ज्ञान होने पर जैसे घट में सन्देह-विपर्ययादि नहीं होते, वैसे ही घटज्ञान
परिच्छेद ] स्वप्रकाशवाद-विचार २६ स्वप्रकाशं स्वत एव सिद्धस्वरूपम् । न खलु विज्ञाने सति जिज्ञासोरपि कस्यचित् जानामि न वेति संशयः, न जानामीति वा विपर्ययः, व्यतिरेकप्रमा वा । तेन जिज्ञासितस्य असत्त्वज्ञानव्यतिरेकप्रमाणांमभावसमुदायः स्वव्यापकं जिज्ञासि- तस्य प्रमितत्वमानयति । अन्यथा हि जिज्ञासितप्रमितत्वव्यतिरेकव्यापकं जिज्ञासितव्यतिरेकोल्लेखि ज्ञानमविदितजिज्ञासस्य स्यात् । अतः सर्वजनस्वात्म- संवेदनसिद्धमेवास्य बोधस्य स्वरूपम् । व्यवसायस्य अनुव्यवसायनियमान्न तत्र संशयादिरिति चेन्न । यत्रैवानुव्यवसाये ज्ञेयता नोपेया, तत्र जिज्ञासायामात्मधर्मिकं तत्संशयमारभ्य व्यवसायविषयपर्यन्तं संशयाक्रान्तेर्दुष्परिहरत्वात् । विषयिसद्भावसंशये तद्विषयेऽपि संशयस्य सम्भवात् । एवं त्रिचतुरसंवेदनकक्षानध्रौव्यनियमाभ्युपगमेऽपीति । आप ही सिद्ध स्वरूप-विज्ञान है। क्योंकि विज्ञान होने पर किसी जिज्ञासु को भी 'मैं जानता हूँ या नहीं' ऐसा सन्देह नहीं होता; ज्ञान में 'यह ज्ञान नहीं, इच्छा है' ऐसा भ्रम नहीं होता या 'मैं नहीं ही जानता' ऐसी अभाव-प्रमा ही नहीं होती है। इसलिए जिज्ञासित विज्ञान में सन्देह, मिथ्याज्ञान और व्यतिरेक-प्रमा के अभाव का समूह अपने व्यापक जिज्ञासित विषय की प्रमिति ( यथार्थ-ज्ञान ) का आक्षेप करेगा। यदि विज्ञान की प्रमिति न हो, तो विज्ञान के अभाव के व्यापक, जिज्ञासित विज्ञान के अभाव को विषय करनेवाला— ज्ञान ( सन्देहादि ) अवश्य होने चाहिए, किन्तु होते नहीं। इसलिए यह जानना चाहिए कि सब मनुष्यों के अपने ज्ञान से बोध का स्वरूप सिद्ध ही है। शून्यवाद समर्थन—व्यवसाय ( ज्ञान ) का अनुव्यवसाय ( द्वितीय ज्ञान ) होता है, इसीलिए ज्ञान में सन्देह आदि नहीं होते। खंडन—जिस ज्ञान का ज्ञान न हो, उसकी जिज्ञासा होने पर सन्देह आदि हो जायेंगे। ज्ञान में सन्देह होने पर प्रथम ज्ञान के विषय तक सन्देह हो जायगा। क्योंकि विषयी ( ज्ञान ) के सन्देह में भी सन्देहादि नहीं होते। इससे अनुमान होता है कि घट के साथ-साथ घट-ज्ञान भी ज्ञात होता है। अर्थात् सूर्य के तुल्य ज्ञान अपने विषय घटादि के साथ-साथ अपना भी प्रकाश करता है, अतः स्व-प्रकाश है। यदि ज्ञान को स्व-प्रकाश न मानें, तो सन्निकर्षादि कारण रहते जिज्ञासा होने पर घट-ज्ञान में सन्देहादि होने चाहिए, क्योंकि यह व्याप्ति है कि 'यत्र यत्र सन्निकर्षादिकारणसत्त्वे जिज्ञासायामज्ञातत्वं ,तत्र तत्र सन्देहादिः'। अतः स्वप्रकाश-विज्ञान के स्वतःसिद्ध होने से शून्यवाद ठीक नहीं, विज्ञानवाद ही ठीक है—यह वेदान्त-मत है। यहाँ संक्षेप से उस मत का विचार करते हैं।
३० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम स्वप्रकाशे तु मानमेयभावव्यवस्थाया अभावादेव तदाश्रया दोषा निरवकाशाः। अन्यथा तु बोधस्वरूपमेव न सिद्ध्येत्, यदि हि विज्ञानं परतः सिद्ध्येत् तदाऽनवस्था स्यात् । न च वाच्यम्—अवश्यवेद्यताविस्तेर्नाभ्युपेयते, स्वार्थव्यवहारस्तु स्वरूपसत्तया प्रसूत इति क्वानवस्थेति ? यतस्तस्यां प्रमाणानु- पन्यासे स्वरूपसत्ताऽपि कुतः, यया व्यवहारोपपत्तिः । को ब्रूते सती मा वित्तिः ? असत्येव न कुतः ? सामान्यतो वित्तेस्तथात्वविधावपेक्षितसिद्ध्या यत्र विशेषरूपायां प्रमाणाऽ- प्रवृत्तिः, तदा तत्र सत्त्वसाधनासत्त्वेऽपि जिज्ञासायां सत्यां पश्चाद् व्यवहारमत्तैव वा अन्यद् वा प्रमाणमस्त्येवेति चेन्न ।। तस्यापि कथं सत्त्वमित्यनवस्था वा स्यात्, से विषय में सन्देह अवश्य होता है। इसी तरह जो वादी तीन या चार ज्ञान-प्रवाह का ज्ञान होना आवश्यक मानते हैं, उनके मत में भी सन्देह आदि दोष जानने चाहिए। प्रश्न—स्वप्रकाश मानने पर वही ज्ञान कर्म और क्रिया दोनों कैसे होगा, क्योंकि क्रिया-कर्मभाव और विषय-विषयीभाव भेद में होते हैं। उत्तर विज्ञानवाद में विज्ञान से पृथक् किसी भी बाह्य पदार्थ का स्वीकार न होने से विषय-विषयीभाव ही नहीं होता। यदि भेद में ही विषय-विषयीभाव मानें, तो विज्ञान सिद्ध ही न होगा यदि विज्ञान की सिद्धि अन्य विज्ञान से मानी जाय, तो अनवस्था हो जायगी । समर्थन—वित्ति (ज्ञान) का ज्ञान अवश्य हो, ऐसा नहीं मानते, किन्तु ज्ञान स्वरूपसत्ता से ही स्वविषय (घटादि) के व्यवहार का निमित्त होता है। इससे अनवस्था नहीं होती। खंडन—उस वित्ति में प्रमाण के न होने से उसकी स्वरूपसत्ता कैसे सिद्ध होगी, जिससे व्यवहार की प्रवृत्ति हो सके। कौन प्रमाण कहेगा कि वित्ति सत् है, वह असत् ही क्यों न हो ? समर्थन—व्यवहार में कारण होने से सामान्यरूपेण ज्ञान के सिद्ध होने पर व्यवहारकाल में जिस ज्ञान में प्रमाण नहीं है, उसमें भी पीछे जिज्ञासा होने पर विशेष-व्यवहार या स्मरण ही प्रमाण हो सकता है। खंडन—जिस सामान्य या विशेष व्यवहार से ज्ञान की सिद्धि होती है, उसकी सिद्धि भी ज्ञान के अधीन ही है तथा उस ज्ञान की सिद्धि भी अन्य ज्ञान के अधीन है, इस तरह अनवस्था हो जायगी। अथवा जिस ज्ञान का ज्ञान न होगा, उसकी असिद्धि से सभीकी असिद्धि हो जायगी और इस तरह अर्थ की असिद्धि तक, की आपत्ति आ जायगी। 'जो
परिच्छेद ] स्वप्रकाशवाद-विचार ३१ शेषासिद्ध्या सर्वसिद्धिर्वा प्रसज्येतेत्यर्थाऽसिद्धिपर्यन्तस्य व्यसनस्य दुरुत्तरत्वात् । सेयम् 'अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थदृष्टिः प्रसिद्ध्यती'ति ॥ घटसत्तां हि व्यवहरता प्रामाणिकेन तत्र प्रमाणसद्भावो वाच्यः । यदि प्रमाणमनुपन्यस्य साऽस्तीत्यङ्गीक्रियते, तदा वैपरीत्यमेव वा किं न स्यात् । ततश्च घटसत्तायां प्रमाणसत्ता दर्शनीया । तथा च प्रमाणसत्ताऽपि तत्प्रमाण- सत्तामन्तरेण प्रामाणिकस्य नाङ्गीकारार्हा, सर्वप्रमाणसत्तानिवृत्तेर्वस्तुसत्तानिवृत्ति- नियतत्त्वात् । अन्यथा सप्तमरसादेरप्यापत्तेरिति व्यक्तमनवस्थादौस्थ्यमस्वप्रकाश- वादिनः स्यात् । यदि हि विनैव प्रमाणसत्तां परोऽङ्गीकारयेत्, तदा घटसत्तामपि तथैवाङ्गीकारयतामिति घटेऽपि वृथा प्रमाणोपन्यासः । अथ नाव्यवधानलग्नवित्तिद्वित्तिधाराऽभ्युपगम्यते किं नाम कदाचित् कुतश्चित् काचित् वित्तिः प्रमीयत इति सर्वा वित्तिः प्रमाणसिद्धैवेत्यभ्युपेयत इति चेन्न । स्यादप्येवं यदि घट इति घटं जानामीत्यतोऽधिका [ घटवित्तिद्वित्ति- परीक्षक उपलम्भ ( ज्ञान ) का प्रत्यक्ष नहीं मानते, उनके मत में अर्थ ही सिद्ध न होगा', धर्मकीर्ति के इस वचन का भी यही अभिप्राय है । घट-व्यवहार करनेवाले प्रामाणिक को घट में प्रमाण अवश्य कहना चाहिये । यदि प्रमाण न देकर 'घट है' ऐसा स्वीकार करें, तो उलटा 'घट नहीं है' यही क्यों न स्वीकार किया जाय ? तस्मात् घट में प्रमाण अवश्य दिखाना चाहिए । तब तो प्रमाण भी प्रमाण के बिना स्वीकार-योग्य नहीं । क्योंकि सब प्रमाणों के अभाव से वस्तु का अभाव अवश्य होता है । यदि प्रमाण न होने पर भी वस्तु की सिद्धि हो, तो छः रसों के अतिरिक्त सातवाँ रस भी मानना पड़ेगा । इस प्रकार ज्ञान को जो स्व-प्रकाश नहीं मानते, उनके मत में अनवस्था स्पष्ट ही है । यदि वादी प्रमाण के बिना ही प्रमाण को स्वीकार कराना चाहें तो प्रमाण के बिना ही घट का भी स्वीकार कराये, फिर घट में प्रमाण देना व्यर्थ ही है । समर्थन—अन्य विषय का ज्ञान होने के कारण धाराप्रवाह के तुल्य अव्यवधान से ज्ञान और उस ज्ञान की ज्ञान-धारा नहीं होती । किन्तु जिज्ञासा होने पर व्यवहार आदि कारणों से कोई-कोई वित्ति प्रतीत होती है । अतः सामान्य लक्षण से सब वित्तियाँ प्रमाण-सिद्ध ही हैं, ऐसा माना जाता है । खंडन—'जिज्ञासा होने पर···' इत्यादि कथन से ज्ञात होता है कि आप भी व्यवधान से उत्पन्न ज्ञान और उस ज्ञान की धारा मानते हैं । किन्तु आप वैसा मान नहीं सकते । वैसा तभी मान पाते,
२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम वारया विषयभावेन प्रविष्टया तादृग्विषयशतभारमन्थरा ] वित्तिरस्मदादेरुत्पद्य- मानाऽनुभूयेत । यद्यस्मदादिविलक्षणजन्मनि सा सम्भाव्यते, तदाऽपि यस्या वित्तेस्तावद्- विषयगर्भिंता धीर्विषयः साऽप्यन्यया कयाचिदुल्लिख्येत्यत्र प्रमाणाभावश्च, अनिर्मोक्षापत्तिश्च । न हि स्वमन्तर्भाव्य कयाचिद् धिया स प्रवाहो ग्राह्यः, तथा सति स्वप्रकाशतासिद्धेः । अत एवान्योन्यविषयता निरस्ता, स्वविषयकान्योन्यग्रहे स्वग्रहापत्तेः । न च पुरुषान्तरेण सा प्रमास्यते, न तु तदभाव इति प्रमा तेऽस्ति; तदर्थमपि प्रमाणान्तरसद्भावपरम्परापत्तेः । चैव 'घटः' और 'ज्ञातो घटः' से अधिक ज्ञान-प्रवाह अनुभव-गोचर होना, जिसमें वैषयरूप से अनेक ज्ञान प्रविष्ट हों । परन्तु वैसा नहीं है । समर्थन—हम लोगों से विलक्षण जन्मवाले योगियों की बुद्धि का विषय— विच्छिद्य उत्पन्न—विषयभार से मन्थर—ज्ञान भी होता है। खण्डन—तत्र भी जिस योगी के ज्ञान का विषय—विच्छिद्य उत्पन्न (व्यवधान रखकर उत्पन्न )--विषय भार से मन्थर (अनेक ज्ञानरूप विषयों के पड़ने से मन्द )—पूर्वोक्त ज्ञान होता है, वह योगिज्ञान भी किसी ज्ञान का विषय होता है, इसमें कोई प्रमाण नहीं। समर्थन—वह योगिज्ञान भी योगी के अन्य ज्ञान का विषय होता है । खण्डन—ज्ञानधारा के अविश्रान्त होने से अन्य विषय का अज्ञान और मोक्ष का अभाव हो जायगा । समर्थन—उस ज्ञानप्रवाह का ग्रहण करनेवाला ज्ञान अपना भी ग्रहण करता है। खंडन—ऐसा मानने पर तो ज्ञान स्व-प्रकाश सिद्ध हो गया । समर्थन—योगी के ज्ञान के प्रवाह में अन्त का ज्ञान अन्त के समीप के ज्ञान को और समीप का ज्ञान अन्त के ज्ञान को विषय करता है । इससे न अनवस्था होती और न स्वप्रकाशतापत्ति ही आती है। खंडन—अन्त्य-ज्ञान अपने को विषय करनेवाले उपान्त्य-ज्ञान ( अन्त के ज्ञान के समीपवर्ती ज्ञान) को विषय करता हुआ स्व को भी ग्रहण करेगा । इसी तरह उपान्त्य-ज्ञान, स्व के ग्रहण करनेवाले अन्त्य- ज्ञान को ग्रहण करता हुआ स्व का भी ग्रहण करता है। इस तरह अन्योन्य-ग्रह में स्वप्रकाश ही सिद्ध हुआ । समर्थन—अन्य-विषय का सञ्चार और मोक्ष होने से विश्रान्त भी एक पुरुष के ज्ञानप्रवाह का अन्त्यज्ञान अन्य पुरुष से गृहीत होता है । अतः अन्त्य की
परिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ३३ नचैवं घटसामग्री-तत्सामग्रीगवेषणेऽप्यनवस्था स्यात् ? वैषम्यात्, यदि हि घटसामग्री-तत्सामग्रीधारा कुत्रचिद् विच्छिद्येत, तदा घटः सदातनः स्यादित्यर्था- पत्त्यैव घटः सामग्रीपरम्पराविच्छेदरहित एव प्रमीयते । यदि तु ज्ञानेऽप्येवं स्यात् तदा स्वस्य प्रवेशात् स्वप्रकाशापत्तिः, अप्रवेशादनवस्था, अवेदने शेषा- सिद्ध्या सर्वोसिद्धिरिति व्यसनं दुरुत्तरमेव । ये च मानमेयाश्रया दोषाः कीर्त्तनीयाः तेऽपि प्रसज्येरन् । असिद्धि से सबकी असिद्धि नहीं है । खण्डन—अन्य पुरुष का अन्त्य-ज्ञान अन्य पुरुष के ज्ञान का गोचर होता है, इसमें भी आप प्रमाण अवश्य देंगे । किन्तु उसमें भी अन्य प्रमाण की अपेक्षा होने से अनवस्था वैसी ही सुस्थिर है । किञ्च, अन्य पुरुष से भी अन्त्य-ज्ञान ही गृहीत होता है, उसका अभाव नहीं, इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । शङ्का—यदि ज्ञान का ज्ञान तथा उस ज्ञान का अन्य ज्ञान, इस प्रकार ज्ञान- प्रवाह को अनवस्थित न मानें, तो की सिद्धि ही न होगी। फलतः ज्ञान की अन्यथा असिद्धिरूप अर्थापत्ति प्रमाण से अनवस्था सप्रमाण है, अतः दोष नहीं है । यदि अनवस्था को सर्वत्र दोष मानें, तो घट के अनित्यत्व की अन्यथानुपपत्ति से घट-सामग्री- प्रवाह की अनवस्था भी दोष कही जायगी । समाधान—यदि घट की सामग्री और उस सामग्री की सामग्री, इस प्रकार पीछे दौड़ती अनवस्था का कहीं अन्त मानें, तो घट अनित्य सिद्ध न होगा । अतः घट के अनित्यत्व की अन्यथानुपपत्तिरूप प्रमाण-सामर्थ्य से अनवस्था-दोष नहीं है । १ किन्तु ज्ञान की सिद्धि तो स्व-प्रकाश मानने पर भी हो जाती है। अतः ज्ञानसिद्धि की अन्यथानुपपत्तिरूप प्रमाण के न होने से ज्ञान-प्रवाह की अनवस्था दोष है। यदि प्रवाह का कहीं विच्छेद मानें, तो अन्त्य की असिद्धि से सबकी असिद्धि होती है। यदि अन्त्य-ज्ञान को स्व-विषयक मानें, तो ज्ञान स्वप्रकाश सिद्ध होता है। यदि ज्ञान को अन्य ज्ञान का विषय मानें, तो अन्य ज्ञान के साथ ज्ञान का सम्बन्ध कहना होगा । किन्तु वह सम्बन्ध उसके सम्बन्धी ज्ञान के द्रव्य न होने से संयोग नहीं हो सकता, दोनों के गुण होने से समवाय नहीं और भिन्न होने से तादात्म्य भी नहीं हो सकता । द्रव्य आदि सात १ यहाँ शंकाकर्ता नैयायिक हैं और समाधान-कर्ता वेदान्ती । दोनों घट-सामग्री को परमाणु और प्रकृति ( माया ) में विश्रान्त मानते हैं । घटादि के अनित्यत्व का कारण सामग्री का अविश्राम नहीं, किन्तु जन्यत्व है । अतः शंका-समाधान दोनों समझ में नहीं आते ।
३४ ] सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न च तैर्दोषैर्नास्त्येव ज्ञानमित्यास्थेयम्, स्वतः सर्वसिद्धस्य दुरुपह्नवत्वात् । स्वप्रकाशाङ्गीकारादेव चाऽनुभवस्य सर्वदोषहानेर्वक्ष्यमाणत्वात् । प्रकाशात्ममात्रस्यैव स्वतःसिद्धिसम्भवे जडात्मनां धर्माणां केषामपि तदन्तर्भावानुपपत्तिः । अत एव धर्मोपग्रहप्रवर्त्तिष्णुवाग्व्यवहाराविषयत्वम्, कालानवच्छेदमादाय च नित्यत्वोपचारः । देशानवच्छेदमादाय विभुत्वव्यपदेशः । प्रकारावच्छेदविग्रह- निबन्धनश्च सर्वात्मत्वाऽद्वैतादिव्यवहारः । सौगतप्राभाकरादिवद् भावे, नैयायिक- वच्च अभावे अभावानतिरेकस्वीकारादेव चाद्वैताऽव्याघातः । भ्रमविषयनिषेधस्य च प्रतियोगिनः सर्वथैवासिद्ध्याऽपि न काचित् क्षतिः । तदेतत्तु श्रुत्या प्रमाणेनोपलक्षणन्यायात् तात्पर्यतः प्रकाश्यते । तेन पदार्थों में अन्तर्भाव न होने से विषय-विषयीभाव असम्भव है, अतः वह भी नहीं हो सकता । ज्ञान असम्बद्ध का ही ग्रहण करता है, यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि यदि ज्ञान असम्बद्ध का ग्रहण करे, तो अन्य का भी ग्रहण हो जाय । प्रश्न — उक्त दोषों से ज्ञान भी नहीं है, ऐसा ही क्यों न मानें ? उत्तर — ज्ञान सब मनुष्यों के अपने अनुभव से ही सिद्ध है, अतः उसका अस्वीकार नहीं हो सकता । स्वप्रकाश होने से ही अनवस्था, असम्बन्ध आदि दोष नहीं होते, यह आगे ‘तत्स्वप्रकाशपरमार्थचिदेव’ आदिसे ( २६ वीं कारिका से ) कहेंगे; एकमात्र अभानापादक अज्ञान का विरोधी ज्ञान ही स्वतःसिद्ध हो सकता है और जडात्मक कोई भी अन्तःकरणधर्म उपर्युक्त प्रकाशात्मक ज्ञानसे अभिन्न नहीं । फलतः उन धर्मों से रहित स्वतः सिद्ध ज्ञानमात्र के रहने में कोई अनुपपत्ति नहीं है । मानमेय खण्डन प्रकरणोक्त दोष पराधीनसिद्धिक वस्तुओंका ही निरास कर सकते हैं, स्वतः सिद्ध वस्तु के निरास में उनकी सामर्थ्य ही नहीं, यह भाव है । इसीलिए ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सत्ता, गुणत्व, ज्ञानत्व आदि जड़धर्मों के सम्बन्ध से प्रवृत्त वाग्व्यवहार का अगोचर कहा गया है । प्रश्न—यदि ब्रह्म में कोई धर्म नहीं, तो ‘सत्यं ज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ इस श्रुति में नित्यत्व धर्म का व्यवहार कैसे होता है ? उत्तर—काल के सम्बन्ध से वस्तु में अनित्यत्व का व्यवहार होता है और वह ब्रह्म में नहीं है । अतः अनित्यत्व के अभाव को मानकर उपचार ( आरोप से ) नित्यत्व-व्यवहार होता है । जैसे लाल, पीले आदि रूपों का अभाव के होने से आकाश में नीलरूपता का व्यवहार होता है ।
परिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ३५ परमार्थतोऽभिधानाभिधेयभावविरहे तात्पर्यतः श्रुतिस्तस्मिन्नविद्यादशायां पराभ्यु- पगमरीत्या प्रमाणमित्युच्यते । वस्तुतस्तु स्वात्मसिद्धमेव चिद्रूपम् । प्रश्न—'जगद् बृंहयति ( व्याप्नोति ) इति ब्रह्म' इस व्युत्पत्ति से तथा 'महतो महीयान्' इस श्रुति से ब्रह्म में परममहत् परिमाण अवश्य मानना पड़ेगा । उत्तर—देश के सम्बन्ध से मूर्त्तत्व ( परिमितत्व ) का व्यवहार होता है । ब्रह्म में मूर्त्तत्व नहीं है, अतः आरोप से ही विभुत्व ( व्यापकत्व ) का व्यवहार होता है । प्रश्न—घटत्वादि एक-एक धर्म के सम्बन्ध से घटादि घटत्वाद्यात्मक एवं द्वैत हैं, परन्तु ब्रह्म सर्वधर्मों के सम्बन्ध से सर्वात्मक तथा अद्वैत है । इस रीति से ब्रह्म में सर्वधर्मों का सम्बन्ध मानना पड़ेगा । उत्तर—घटत्वादि एक-एक धर्म के सम्बन्ध से घटादि असर्व-धर्मात्मक हैं । किन्तु ब्रह्म में असर्व-धर्मात्मकत्व का अभाव होने से आरोपित सर्वधर्मात्मकत्व का व्यवहार होता है । प्रश्न—द्वैत के अभाव को 'अद्वैत' कहते हैं । ब्रह्म में द्वैत का अभाव है और वह अधिकरणरूप नहीं है । अतः निर्धर्मक ब्रह्म सिद्ध नहीं हुआ । उत्तर—जैसे बौद्ध तथा प्राभाकर अभावमात्र को और नैयायिक अभाव में स्थित अभाव को अधिकरणरूप मानते हैं, वैसे ही हम भी अभाव को अधिकरणरूप ही मानते हैं । प्रश्न—यदि द्वैत के अभाव को 'अद्वैत' कहते हैं, तब तो प्रतियोगी रूप से द्वैत भी मानना पड़ेगा । अतः ब्रह्म अद्वैत है, यह कथन नहीं बनता । उत्तर—जैसे भ्रमस्थल में असत् रजत का ही 'नेदं रजतम्' निषेध होता है, वैसे ही असत् या कल्पित द्वैत का ही निषेध होता है । अभाव-ज्ञान में प्रतियोगी का सामान्य ज्ञान अपेक्षित है, प्रतियोगी की प्रमा नहीं । यहां द्वैत का भ्रमात्मक ज्ञान है ही । प्रश्न—ब्रह्म यदि वाणी का अगोचर है, तो उसमें श्रुति-प्रमाण कैसे हो सकती है ? उत्तर—यद्यपि धर्म का सम्बन्ध न होने से ब्रह्म 'पद-वाच्य' नहीं और योग्यता-ज्ञान न होने से वाक्यार्थ भी नहीं है; तथापि जैसे 'काकवन्तो देवदत्तस्य गृहाः' इस वाक्य में काकपद उपलक्षण रूप से तृणाच्छादन ( छप्पर ) का प्रतिपादन करता है, वैसे ही श्रुति भी जगत्कर्तृत्वादि विशेषणों को त्यागकर तात्पर्य-बल से ब्रह्म का ही प्रतिपादन करती है । तस्मात् वाच्य-वाचकभाव से रहित उस ब्रह्म में अविद्या-दशा में नैयायिकादि की रीति से श्रुति प्रमाण है । वास्तव में अपने आप सिद्ध चिद्रूप ब्रह्म है ।
३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ननु च स्वप्रकाशत्वं ज्ञानस्येत्यनुपपन्नमिदम्, क्रियाकर्मभावस्य भेदव्यति- रेकेणानुपपत्तेः । कार्या क्रिया हि कर्मणो भवति, कर्म च कारणं क्रियायाः । न च स्वेनैव स्वनिष्पादनं शक्यम्, पूर्वापरभावविशेषस्य हेतुहेतुमद्भावरूपत्वात् । न च तस्मादेव तदेव पूर्वमपरं च सम्भवति, तदनवच्छिन्नकालविशेषस्य तत्पूर्व- शब्दार्थत्वात् । तदा च तस्य सद्भावस्वीकारे स एव कालस्तदवच्छिन्नः, तदन- वच्छिन्नश्चेति विरोधात् । मैवम्; क्रियायाः कर्मजन्यतानियमानङ्गीकारात् । भवत्येव अनागतविषयविज्ञाने तदसम्भवात् । क्वचिज्जनकतामादाय च कर्मणि कारकत्वव्यपदेशात् । करण- व्यापारविषयत्वाद् वा परसमवेतक्रियाफलभागित्वाद्वा कर्मलक्षणात् विनापि क्रियाजनकत्वेन कर्मव्यवहारोपपत्तेः । किञ्च तत्कर्मत्वं यत्स्वं प्रति विरुद्धयते ? परसमवेतक्रियाफलभागित्वमिति प्रश्न—ज्ञान स्व-प्रकाश है, यह बात युक्त नहीं; क्योंकि क्रिया-कर्मभाव भेद के विना नहीं होता। क्रिया कर्म का कार्य है और कर्म क्रिया का कारण। स्व से स्व की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि पूर्व-परभाव कार्य-कारणभावरूप है और अपने से आप पूर्व तथा पर नहीं हो सकता। अपने से अनवच्छिन्न (रहित) काल 'पूर्व' शब्द का अर्थ है। यदि पूर्वकाल में भी कार्य को मानें, तो वही काल उस कार्य से युक्त और अयुक्त है, ऐसा विरोध हो जायगा। उत्तर—'क्रिया कर्म से जन्य है'- यह नियम हम नहीं मानते; क्योंकि 'घटं ज्ञास्यति' इस भावी स्थल में व्यभिचार है। प्रश्न—यदि कर्म क्रिया का कारण नहीं, तो कर्म की कारक में गणना क्यों होती है ? उत्तर—'आत्मानं जानाति' आदि किसी- किसी स्थल में कर्म क्रिया का जनक होता है, अतएव कर्म की कारक में गणना की जाती है। प्रश्न—अतीत और अनागत कर्मों में भी रहनेवाले किसी एक शक्यताव- च्छेदक (कर्म-लक्षण) के न होने से अनुगत कर्म-व्यवहार कैसे होगा ? उत्तर— करण के व्यापार का जो विषय हो, उसे 'कर्म' कहते हैं। अथवा अन्य में रहनेवाली क्रिया के फल से युक्त को 'कर्म' कहते हैं। इन्हीं लक्षणों के अनुसार 'घटं ज्ञास्यति' आदि स्थल में क्रिया का जनक न होने पर भी घट में कर्मत्व का व्यवहार होता है। प्रश्न—वह कर्मत्व क्या है, जो स्व का स्व में विरुद्ध है ? निबंधकर्ता—अन्य में विद्यमान क्रिया-फल से युक्तत्व ही वह है। खंडनकर्ता—तब तो 'वृक्षात् पर्ण
परिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ३७
चेन्न । अपादानस्यापि व्याप्तेः अपादानं कर्मापीति चेन्न । 'वृक्षात्पतति पर्णमि'तिवत् 'वृक्षं पर्णं पतती'त्यपि स्यात् । विवक्षातः कारकाणि भवन्तीति तदविवक्षया नैवमिति चेन्न । वस्तुतः सतस्ता- द्रूप्यस्य यदि विवक्षा स्यात्तदा तदपि स्यात् । अपादानस्य कर्मत्वं न विवक्ष्यत इति शाब्दिकसम्प्रदायोऽयमिति चेत्, तर्हि तत्र निवृत्तसर्वकर्मव्यवहारेऽपि स्वकृत- कर्मलक्षणानुरोधेन कर्मत्वमभ्युपगच्छता वस्तुमात्रं कर्मेत्यपि लक्षणं सावकाशितं स्यात् । कथञ्च लोकोत्तरप्रज्ञेन निवृत्तसर्वकर्मव्यवहारेऽपि स्वकृतकर्मत्वमस्तीत्यधिगतम् ? अपादानेतरद् ईदृशं कर्मेति चेन्न । तत्रापि 'नदी वर्धते' इत्यादौ तद्वृद्धे- रप्राप्ततीरभागादिप्राप्तिफलायाः सकर्मकत्वापत्तेः । अपादानेतरदिति स्थाने क्रिया- पतति' यहाँ वृक्षरूप अपादान पर्णनिष्ठ-पतन-क्रिया के विभागरूप फल से युक्त है, अतः उसमें भी कर्म-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । निर्वचन—अपादान कर्म भी है । खंडन—फिर तो जैसे 'वृक्षात् पतति' प्रयोग होता है, वैसे ही 'वृक्षं पतति' यह भी प्रयोग हो जायगा । निर्वचन—कारक वक्ता की इच्छा से होते हैं । यहाँ वक्ता को कर्मत्व की इच्छा नहीं है, अतः द्वितीया नहीं होती । खंडन—यदि वस्तुतः अपादान भी कर्म हो, तब तो जिस काल में उसे कर्मत्वरूप से कहने की इच्छा हो, उस काल में 'वृक्षं पतति' ऐसा भी प्रयोग हो जायगा । निर्वचन—अपादान की कर्मत्वरूप से विवक्षा नहीं होती, ऐसा वैयाकरणों का सम्प्रदाय है । खंडन—जिसमें कर्मत्व का कभी भी व्यवहार नहीं होता, उसमें भी स्वकल्पित लक्षण के अनुरोध से कर्मत्व माननेवाले आप 'वस्तुमात्र कर्म है' ऐसे ही लक्षण की कल्पना क्यों न करें ? जब कोई दोष दे, तो वैयाकरणों के सम्प्रदाय का आश्रयण कीजिये । इसके अतिरिक्त जिसमें कर्मत्वकृत कोई भी व्यवहार नहीं होता, उस अपादान में कर्मत्व को लोकोत्तर बुद्धिवाले आपने कैसे जाना ? अर्थात् जब कि अपादान में वृद्धों द्वारा कर्मत्वव्यवहार नहीं होता, तब उसे कर्म मानना ठीक नहीं । निर्वचन---'अपादान से इतर जो पर-समवेत क्रिया के फल का आश्रय हो, वह कर्म है' ऐसा निवेश करने पर कोई दोष नहीं होगा । खंडन---फिर भी 'नदी वर्धते' इस स्थल में तीर को कर्मत्व होने लगेगा, क्योंकि वह नदीवृद्धिरूप क्रिया के फल ( अप्राप्त तीरभाग में प्राप्ति ) का आश्रय है । निर्वचन—'क्रिया का नाशक जो पर-समवेतक्रियाफल है, उसका भागी कर्म है' ऐसा लक्षण करेंगे । इससे 'वृक्षं पतति'
३८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नाशकेति करणेऽप्यस्य दोषस्य तादवस्थ्यात् । विनाशलक्षणायां 'वृद्धौ तदसम्भ- वाच्च । 'वृक्षं त्यजती'त्यादौ अकर्मत्वप्रसङ्गाच्च । 'आत्मानं जानामी'त्यत्र परत्वाभावादव्याप्तेः । तत्राप्युपाधिभेदात्परत्वम्, कर्तृत्वभोक्तृत्वादुपहितस्यैवात्मनो ज्ञेयत्वाम्युपगमादिति चेन्न । यतोऽस्तु तावद्व यथा कथंचिदेवम्, तथाप्यध्यात्मविदो निरुपाधिमात्मानं जानतो ज्ञानं नात्मकर्मकं स्यात् । 'पच्यते फलं स्वयमेवेत्यादौ कर्मकर्तरि का गतिः स्यात् ? सर्वज्ञमीश्वरं मन्यमानेन च नित्यज्ञाने तस्मिन् भगवति फलनाशकत्वस्या- ऐसे प्रयोग की आपत्ति भी न होगी, क्योंकि वृक्षनिष्ठ विभाग पतन-क्रिया का नाशक नहीं, किन्तु अधःसंयोग ही नाशक है । खंडन — इस लक्षण में भी 'नदी वर्धते' इसी स्थल में दोष है, क्योंकि नीर-तीर-संयोगरूप फल वृद्धिरूप क्रिया का नाशक है, अतः तद्-भागी ( उसका आश्रय ) होने से तीर कर्म होने लगेगा । किञ्च, जहाँ नाशरूप वृद्धि है, वहाँ असम्भव हो जायगा । अर्थात् जहाँ 'वृध' धातु का छेदन अर्थ है, उस स्थल ( 'वृक्षं वर्धते वर्धकिः' ) में नाशरूप फल क्रिया का अनाशक है, अतः वृक्ष कर्म न होने पायेगा । किञ्च 'वृक्षं त्यजति' में विभागरूप फल क्रिया का नाशक नहीं है, अतः वृक्ष में कर्मत्व नहीं होगा । 'आत्मानं जानाति' यहाँ भी इतर के न होने से कर्मत्व न होगा । निर्वचन— शरीर-इन्द्रिय ( स्थूलशरीर ) से युक्त आत्मा कर्ता है और कर्तृत्वादिविशिष्ट ( सूक्ष्मशरीरयुक्त ) आत्मा कर्म है, इस प्रकार औपाधिक भेद हो जाने से दोष न होगा । खंडन—यद्यपि उपाधि भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी उपहित आत्मा एक ही है । अतः कर्ता और कर्म दोनों में भेद दुर्लभ ही है । किञ्च, निरुपाधि आत्मतत्त्व को जाननेवाले अध्यात्मविदों के अभिप्राय से 'आत्मानं' ज्ञान का कर्म नहीं होगा । किञ्च, 'पच्यते फलं स्वयमेव' इस प्रयोग में जहाँ कर्म की कर्तृत्व रूप से विवक्षा है अर्थात् कर्म को ही कर्ता मान लिया है, वहाँ 'पर' न होने से फल में कर्मत्व नहीं बनेगा । किञ्च, जो ईश्वर को सर्वज्ञ मानते हैं, उनके मत में ईश्वर का ज्ञान नित्य है, फलनाश्य नहीं । अतः 'ईश्वरः सर्वं जानाति' यहाँ 'सर्व' को कर्मत्व न होगा । इस तरह स्पष्ट है कि कर्म का कोई निर्दुष्ट लक्षण बन नहीं सकता । अतः यही मानना उचित है वैयाकरणों ने 'नदी, वृद्धि' आदि के तुल्य 'कर्म' का भी शब्दसिद्धयर्थ केवल संकेत किया है कर्म के अनुगत लक्षण का अन्वेषण व्यर्थ है । १. 'वर्ध छेदने' चुरादिगणीय धातु है । वहाँ 'वृध' इस पाठान्तर के अनुसार यह ग्रन्थ है ।
परिच्छेद ] स्वप्रकाश-विज्ञानवाद-विचार ३६ नभ्युपगमात् तं प्रत्येतानल्लक्षणाऽसिद्धेः । तस्माद् व्याकरणकारैः शब्दसिद्धयर्थं नदीवृद्ध्यादिवत् कर्मापि परिभाषितमित्यलं तदनुगतलक्षणगवेषणया । करणव्यापारविषयः कर्म इति चेन्न । 'हस्तेन रामेण शरेण' इत्यादावति- प्रसङ्गात् । लक्षणं विनापि क्रियाजनकत्वे सति व्यापारोद्देश्यत्वेन कर्मव्यवहारोपपत्तेः। शेषञ्च ईश्वराभिसन्धौ स्वप्रकाशवादे १निर्वक्ष्यामः । ननु चाऽभेदे विषयविषयिभावस्यैवासङ्गतत्वम्, विषयित्वं हि विषयसम्बन्धिता, सम्बन्धश्च भेदमन्तरेणासम्भवदवस्थितिः, सम्बन्धमितेः सम्बन्धिस्वरूपभेदमिति व्यतिरेके वैपरीत्यावधारणात् । मैवम्; विषयविषयिभावसम्बन्धो हि न सम्बन्धिरूपाद्भिन्नः तथाभूतत्वेऽपि चान्ततः तत्सम्बन्धस्यापि स्वाश्रयात्मकत्वमभ्युपगम्यम्, अनवस्थाभयात् । तथा सति च सैव यथा सम्बन्धमितिः सम्बन्धस्वरूपात् सम्बन्धिनोर्भेदमानादायैव पर्यवस्यती- त्यभ्युपगन्तव्यं स्वभावसम्बन्धस्य इतरसम्बन्धमर्यादातिशायित्वात् । तथा विनाऽपि निर्वचन—करण के व्यापार का विषय कर्म है। खण्डन—‘हस्तेन रामेण शरेण बाली हतः' यहाँ हस्तरूप करण के व्यापार का विषय होने से शर कर्म हो जायगा । किञ्च, लक्षण के बिना भी ‘क्रियाजनकत्वे सति व्यापारोद्देश्यत्व'-रूप ( सब कर्मों में रहनेवाले ) अनुगत धर्मत्व से ही कर्म का व्यवहार हो जायगा । शेष ‘ईश्वराभिसन्धि’ ग्रन्थ के स्वप्रकाश-प्रकरण में कहेंगे । शङ्का—अभेद में विषय-विषयिभाव असङ्गत है, क्योंकि विषयित्व विषय की सम्बन्धिता है और सम्बन्ध की स्थिति सम्बन्धियों के भेद के बिना हो नहीं सकती । क्योंकि जहाँ-जहाँ सम्बन्धी के भेद की प्रमा है, वहीं सम्बन्ध की प्रमा होती है । स्व-प्रकाश-ज्ञानस्थल में सम्बन्धी के भेद की प्रमा नहीं है, अतः विषय-विषयि- भाव भी नहीं होगा । समाधान—विषय-विषयिभाव सम्बन्धी के स्वरूप से भिन्न नहीं है। यदि उसे सम्बन्धी के रूप से भिन्न मानें, तब भी अन्त में उसके सम्बन्ध को अवश्यमेव सम्बन्धीरूप मानना पड़ेगा। यदि उसे सम्बन्धीरूप न मानें, तो सम्बन्ध का सम्बन्ध, १ यहाँ भविष्यत्कालिक प्रयोगकर आगे 'अवोचाम च जल्पे' इत्यादि भूतकालिक प्रयोग किया गया है। इससे यह सन्देह होता है कि ग्रन्थकार ने प्रथम 'ईश्वराभिसन्धि' का निर्माणकर फिर 'खण्डन' का निर्माण किया, 'खण्डन' का निर्माणकर ईश्वराभिसन्धि' रची या दोनों का निर्माण एककाल में हुआ ? मेरे विचार में तो दोनों का निर्माण एक साथ ही हुआ है ।