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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
पृष्ठ 702स्थायी लिंक
४४४
किरातार्जुनीयम्
| प्रतीक | स० | श्लो० | प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| विपत्रलेखा निरक्तका | ८ | ४० | विहस्य पाणौ विधृते | ८ | ५० |
| विपदेति तावदवसाद | १८ | २३ | विहाय वाञ्छामुदिते | ४ | २५ |
| विपदोऽभिभवन्त्य | २ | १४ | विहाय शान्तिं नृप | १ | ४२ |
| विपाण्डुभिर्म्लानतया | ४ | २४ | विहारभूमेरभिघोष | ४ | ३० |
| विपाण्डु संध्यानमिव | ४ | २८ | विहितां प्रियया | २ | १ |
| विफलीकृतयत्नस्य | १३ | ४६ | वीक्ष्य रत्नचयके | ९ | ५२ |
| विद्रावितस्य ध्वनिना | १७ | ४६ | वीक्ष्य रन्तुमनसः | ९ | १ |
| विमिश्रपर्यन्तगभीर | ८ | ३० | वीतजन्मजरसं परं | ५ | २२ |
| विमिश्रपातिताश्वीय | १५ | २४ | वीतप्रभावतनुरुप्य | १६ | ६४ |
| विभेदमन्तः पदवी | १७ | २७ | वीतौजसः सन्निधि | ३ | ४९ |
| विमुक्तमाशंसित | १४ | ५१ | वीर्यप्रदानेषु कृता | ३ | ५३ |
| विमुच्यमानैरपि तस्य | ४ | १२ | वेत्रशाककुजे | १५ | १८ |
| वियद्वि वेगपरिप्लुत | १८ | १२ | व्यक्तोदितस्मितमयूख | २ | ५९ |
| विरचय्य काननविभाग | १२ | ४४ | व्यथितमपि भृशं मनो | १० | २२ |
| विरोधि सिद्धेरिति | १४ | ८ | व्यथितसिन्धुमनीरशनैः | ५ | ११ |
| विलङ्घ्य पत्रिणां | १५ | ४४ | व्यधत्त यस्मिन्पुरमुच्च | ५ | ३५ |
| विलम्बमानाकुलकेश | ८ | १८ | व्यपोहितुं लोचनतो | ८ | १९ |
| विवरेऽपि नैवमनिगूढ | १२ | ३७ | व्यानशे शशधरेण | ९ | १७ |
| विवस्वदंशुसंश्लेष | १५ | ९ | व्याहृत्य महतां पत्या | ११ | ६७ |
| विविक्तवर्णभरणा | १४ | ३ | व्रज जय रिपुलोक | १८ | ८८ |
| विविक्तेऽस्मिन्मगे | ११ | ३६ | व्रजति शुचि पदं त्वयि | १८ | २६ |
| विशङ्कमानो भवतः | १ | ७ | व्रजतोऽस्य बृहत्पतन | १३ | २१ |
| विशदभ्रूयुगच्छन्त | ११ | ४ | व्रजन्ति ते मूढधियः | १ | ३० |
| विषमोऽपि विगाह्यते | २ | ३ | व्रजाजिरेष्वम्बुदनाद | ४ | १६ |
| विस्तारिताश्ममणि | ८ | २३ | व्रणमुखच्युतशोणित | १८ | ४ |
| विस्फारिताङ्गस्य ततो | १७ | २४ | व्रीडानतैरासजनोप | ३ | ४२ |
| विस्मयः क इव वा | १३ | ४० | श | ||
| विशिखतः सपदि तेन | १८ | १३ | शक्तिरर्थपतिषु स्वयं | १३ | १६ |
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श्लोकानुक्रमणिका
४४५
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| शक्तिवैकल्यनम्रस्य | ११ | ५९ | श्रद्धेया विप्रलम्भारः | ११ | ६५ |
| शङ्किताय कृतबाष्प | ९ | ४६ | श्रियः कुरुणामधिपस्य | १ | १ |
| शतशो विशिखानवयते | १५ | ४८ | श्रियं विकल्पत्यपहस्त्य | ३ | ७ |
| शमयन्घृतेन्द्रियशमैक | ६ | २० | श्रिया हसद्भिः कमलानि | ८ | ४४ |
| शरणं भवन्तमति | १८ | २२ | श्रीमद्भिनियमितकन्धरा | ७ | ३७ |
| शरदम्बुधरच्छाया | ११ | १२ | श्रीमद्भिः प्ररयगजैः | ७ | १ |
| शरवृष्टि विषूयोर्वी | १५ | ४१ | श्रीमल्लताभवनमोषधयः | ५ | २८ |
| शरानवद्यन्ननवद्य | १७ | ५६ | श्रुतमप्यधिगम्य | २ | ४१ |
| शशधर इव लोचनाभि | १० | ११ | श्रुतिसुखमुपवीणितं | १० | ३८ |
| शाम्भोर्धनुर्मण्डलतः | १५ | ४९ | श्रेयसों तव सम्प्राप्ता | ११ | ११ |
| शाखावसक्तकमनीय | ७ | ४० | श्रेयसोऽप्यस्य ते तात | ११ | ४४ |
| शान्तता विनययोगि | १३ | ३७ | श्लिष्यतः प्रियवधूरूप | ९ | ६७ |
| शारतां गमितया शशि | ९ | २९ | श्वसनचलितपल्लवा | १० | ३४ |
| शिरसा हरिमणिप्रभः | ६ | २३ | श्वस्त्वया मुखसंवित्तिः | १० | ३४ |
| शिलाघनेनीकसदा | ८ | ३२ | स | ||
| शिवध्वजिन्यः प्रतियोध | १४ | ५८ | स किंसखा साधु न | १ | ५ |
| शिवप्रणुन्नेन शिली | १७ | ५८ | सक्ति जवानपनयत्य | ५ | ४६ |
| शिवभुजाहूतिभिन्न | १८ | ३ | स क्षत्रियस्त्राणसहः | ३ | ४८ |
| शिवमौपयिकं गरी | २ | ३५ | स खण्डनं प्राप्य पराद | १७ | ६० |
| शीधुपानविधुरासु | ९ | ४२ | सखा स युक्ताः कथितः | १४ | २१ |
| शीधुपानविधुरेष | ९ | ७३ | सखि दयितमिहानयेति | १० | ४७ |
| शुष्वितेर्मूलनिचयै | ५ | ४२ | सखीजनं प्रेम गुरुकृता | ८ | ११ |
| शुचि भूषयति श्रुतं | २ | ३२ | सखीनिव प्रीतियुजो | १ | १० |
| शुचिरप्सु विद्रुमलता | ६ | १३ | स गतः क्षितिमूष्ण | १३ | ३१ |
| शुचिवल्कवीततनुरम्य | ६ | ६१ | सचकितमिव विस्मया | १० | ७ |
| शुभाननाः साम्बुरुहेषु | ८ | ४२ | स जगाम विस्मयमुदीक्ष्य | ६ | १५ |
| शून्यामाकीर्णतामेति | ११ | २७ | सजलजलधरं नभो | १० | १९ |
| श्योतन्मयूखेऽपि हिम | ३ | ८ | सजनोऽसि विजहीहि | १३ | ६६ |
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४४६ | किरातार्जुनीयम्
| पद / पाद | स० | श्लो० | पद / पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| सज्यं धनुर्वहति यो | १३ | ७१ | समुज्झिता यावदराति | १४ | ५६ |
| स ततार संकटवतो | ६ | १६ | समुन्नतः काशदुकूल | ८ | ९ |
| स तदोजसा विजित | १२ | २९ | समुल्लसत्प्रासमहोभि | १६ | ४ |
| स तमालनिभे रिपो | १३ | २४ | स यौवराज्ये नवयौवन | १ | २२ |
| स तमाससाद घननील | १२ | ५३ | सरजसमपहाय | १० | २६ |
| सदृशमतनुमाकृतेः | १० | १३ | सरभसमवलम्ब्य | १० | ५४ |
| सद्मनां विरचनाहित | ९ | ३४ | सरोजपत्रे नु विलीन | ८ | ३५ |
| सद्भावितेवाभिनिविष्ट | १७ | ११ | सललितचलित | १० | ५२ |
| स धनुर्महेषुधि | १२ | २७ | सलोलयासक्तलता | ८ | १६ |
| स ध्वानं निपतितनिर्झरासु | ७ | २२ | सलेनमुल्लिङ्गितशात्रवे | १४ | २ |
| सनादक्वनितं नितम्ब | ५ | २७ | स वशस्यावदातस्य | ११ | ७५ |
| सपदि प्रियरूपमंवरखः | १३ | २५ | सविनयमपरानिसृत्य | १० | ५७ |
| सपदि हरिसखैवधू | ११ | १८ | सवृषध्वजसायकावभिन्नं | १३ | २८ |
| स पिङ्गलः श्रीमान् | १८ | ४५ | सव्यलीकमवधोरित | ९ | ४५ |
| स विशङ्कजटावलिः | १५ | ४७ | सव्यासव्यध्वनितो | १७ | २५ |
| स पुमानर्थवज्जन्मा | ११ | ६२ | सब्रीडमन्दैरिव | ३ | ४६ |
| स प्रच्छदनयाम्बुदनादि | १७ | १० | ससस्वरतिदे नित्यं | १५ | २७ |
| स प्रयुज्य तनये | १३ | ३६ | स समुद्धरता विचित्त्य | १३ | ३४ |
| स बभार रणापेता | १५ | ३३ | स सम्प्रधायैवमहार्य | १६ | २५ |
| सविभति भीषण | ६ | ३२ | स सायकान्साध्वस | १७ | २१ |
| स भवस्य भवक्षयैक | १३ | १९ | स सासिः सासुसूः | १५ | ५ |
| स भोगिसंघः शम | १६ | ४८ | ससुरचापमनेकमणि | ५ | १२ |
| समदशिखिरुतानि | १० | २५ | सहशरधि निजं तथा | १८ | १६ |
| स मन्थरावलित | ४ | १७ | सहसा विदधीत | २ | ३० |
| समवृत्तिरुपैति | २ | १८ | सहसोपगतः स | २ | ५६ |
| समस्य सम्पादयता | १४ | ६ | संक्रान्तचन्दनरसा | ८ | ५७ |
| समानकान्तीनि तुषार | ८ | २५ | सन्ततं निशमयन्त | १३ | ४७ |
| समुच्छ्वसत्पङ्कजकोश | ८ | २४ | सन्निबद्धमपहर्तुं | १८ | ३० |
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श्लोकानुक्रमणिका
| प्रथम पाद | स० | श्लो० | प्रथम पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| सम्पश्यतमिति | १९ | ५३ | सुरकृत्यमेतदवगम्य | १२ | ३६ |
| सम्प्रति लब्धजन्म | ५ | ४३ | सुरसरिति परं तपो | १० | १२ |
| सम्प्रीयमाणोऽनुबभूव | १७ | १३ | सुलभैः सदा नयवता | ५ | २० |
| सम्भिन्नामविरलपातिभिः | ७ | २३ | सृजन्तमाजविषु | ३ | २० |
| सम्भिन्नैरिव तुरगावगाह | ७ | ११ | सुहृदः सहजा | २ | ४५ |
| सम्भोगजमगहनामयो | ७ | २६ | सेतुत्वं दधति पयोमुचां | ७ | १९ |
| सम्मूर्च्छतां रजतभित्ति | ५ | ४१ | सोढवान्नो दशामन्त्यां | ११ | ५३ |
| संरम्भवेगोज्झित | १७ | ४९ | सोढावगीतप्रयमा | १३ | २८ |
| संवाता मुहुरनिलेन | ७ | १४ | सोत्कण्ठेरमरगणैः | ७ | २ |
| संविधातुमभिषेक | ९ | ३२ | स्तुवन्ति गुर्वीमभिधेय | १४ | ५ |
| संसिद्धावितिकरणोय | ७ | १५ | स्थितमुन्नते तुहिन | १२ | २१ |
| संसेवन्ते दानशीला | १८ | २४ | स्थितं विशुद्धे नभसीव | १७ | ४८ |
| संस्कारवत्त्वादप्रयत्सु | १७ | ६ | स्थित्यतिक्रान्तिभीरूणि | ११ | ५४ |
| साचि लोचनयुगं | ९ | ४४ | स्नपितनवलतातह | ५ | ४४ |
| सादृश्यं गतमपनिद्र | ५ | २६ | स्पृहणीयगुणेर्महा | २ | ३४ |
| सादृश्यं दधति गभीर | ७ | ३१ | स्फुटता न पदैरपा | २ | २७ |
| साफल्यमश्नुते रिपु | १६ | ४९ | स्फुःपौरुषमापपात | १३ | ३२ |
| सामोदं कुसुमतरो | ७ | २८ | स्फुटबद्धस्तटोन्नति | १३ | २ |
| साम्यं गतेनाशनिना | १७ | ५१ | स्फुरतिषङ्गमोर्वीकं | १५ | ०९ |
| सावलेपमुपलिप्सिते | १३ | ५६ | स्मर्यते तनुभृतां सनातनं | १३ | ४२ |
| सितच्छदानांमपदिश्य | ४ | ३० | स्यन्दना नो चतुरगाः | ०५ | १६ |
| सितवाजिने निजगाद् | ६ | ९ | स्वकेतुभिः पाण्डुर | १६ | ५८ |
| सिन्दूरैः कृतचयः | ७ | ८ | स्वगोचरे सत्यपि चित्त | ८ | १३ |
| सिषिचुरवनिम्बुवाहाः | १८ | १७ | स्वधर्ममनुरुन्धन्ते | ११ | ७८ |
| सुकुमारमेकमणु मर्म | ६ | ४० | स्वयं संराध्यैवं शतमख | १० | ६३ |
| सुखेन लभ्या दधतः | १ | १७ | स्वदितः स्वयमथैधित | ९ | ५५ |
| सुगेषु दुर्गेषु च तुल्य | १४ | ३२ | ह | ||
| सुता न यूयं किमु | ३ | ५३ | हताहतेत्युद्धतभीम | १६ | ५ |
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४४८ किराताजुंनीयम्
| स० | श्लो० | स० | श्लो० | ||
|---|---|---|---|---|---|
| हरपृथासुतयो | १८ | २ | हृतोत्तरीयां प्रसभं | ११ | ४१ |
| हरसैनिकाः प्रतिभये | १२ | ४८ | ह्रदाम्भसि व्यस्तवधू | ८ | ४३ |
| हरिन्मणीयाममुदग्र | १४ | ४१ | ह्रीतया गलितनीवि | ९ | ४८ |
| हंसा बुहन्तः सुरसद्म | १८ | १९ | ह्रेपयन्नहिमतेजसं | १३ | १५ |
| हता गुणैरस्य भयेन | १४ | ६१ |
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