कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
२६ हिन्दी कुलार्णव कारिणी है। ऐन्दवी विद्याप्रदा, द्राक्षा राज्यदायिनी है। तालजा स्तम्भन में प्रशस्त है और खार्जूरी शत्रुनाशिनी है। नारिकेल की बनी लक्ष्मीदायिनी और पानसी शुभकारिणी है। मधु की बनी ज्ञानदायिनी और दारिद्र्य तथा शत्रुनाशिनी है। मैरेय सदा पापहारिणी होती है। मदिरा ब्रह्मगा और चित्त का शोधन करनेवाली कही गई है। अतः उपर्युक्त में से एक को लेकर पूजाकर्म का प्रारम्भ करना चाहिये। मद्य, मांस और विजया को अष्टगन्ध के साथ मर्दित कर साधक वटिका बना ले और मद्य के अभाव में इसी वटिका को जल में मिलाकर उससे तर्पण किया करे। अथवा गुड़ मिले दही से अथवा मधुयुक्त सौवीर से कर्म करे। किन्तु क्रिया का लोप कदापि न करे। मांस तीन प्रकार का कहा गया है--खेचर का, भूचर का और जलचर का। तर्पण के लिए इन्हीं की यथा सम्भव कल्पना करे। गन्ध-पुष्पाक्षत से पशु की पूजा कर निम्न मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित कर उसकी बलि दे-- शिवोत्कृत्तमिदं चाशु अतस्तां शिवतां व्रजेत्। तद्बुद्ध्वाशु पशो ! त्वं हि माशिवस्त्वं शिवोसि हि ॥ उसके जल में ब्रह्मा, गन्ध में विष्णु, रस में रुद्र और आनन्द में परमात्मा का वास है। अतः वह सेवनीय है। मांस का अभाव होने पर लहसुन और अदरक से देवी की पूजा करे, अन्यथा पूजा निष्फल होती है। मत्स्य, मांस और मद्य से रहित तर्पण नहीं करना चाहिये। तिल मात्र ही मांस और केवल आधे तिल मात्र मद्यबिन्दु से एक बार भी तर्पण करने से समस्त यज्ञों का फल प्राप्त होता है। कुलपूजा के समान तीनों जगत् में कोई पुण्य नहीं है। अतएव जो भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह भुक्ति और मुक्ति-
साधनमाला २७४ को प्राप्त करता है। हे देवि ! जो भक्ति के साथ हम दोनों को मांस और आसव अर्पित कर अन्तर्याग में तत्पर होकर आनन्द का उद्भाव करते हैं, वे कौलिक हम दोनों ही के सच्चिदानन्द लक्षण से युक्त स्वरसवाले होते हैं। अन्तःस्थित उल्लास का अनुभव मन और वाणी के परे है। वह कुलद्रव्य के उपभोग से ही परिस्फुरित होता है, किसी अन्य उपाय से नहीं। अतः कुलद्रव्य का सेवन करने से कुलतत्त्व का अर्थ ज्ञात होता है और भैरवावेश का उद्रेक होकर साधक सर्वत्र समदर्शी होता है। मन्त्र-संस्कार से शोधित अमृत-पान के द्वारा हे पार्वति ! संसार बन्धन से छुड़ानेवाला देवता भाव जाग्रत् होता है। ब्राह्मण के लिए यह अमृत सदा पेय है, क्षत्रिय के लिए युद्ध के आसन्न होने पर, वैश्य के लिए यज्ञ के अवसर पर और शूद्र के लिए श्रमसाध्य कार्य होने पर यह पेय है। देवताओं और पितरों की पूजा कर गुरुदेव का स्मरण करते हुए शास्त्रोक्त विधि से मद्यपान और मांस-भोजन करने से कोई दोष नहीं होता। मन्त्रार्थ के स्मरण और मन की स्थिरता के लिए तथा संसार बन्धन से मुक्ति पाने के लिए ज्ञानपूर्वक पान करना चाहिए। अन्यथा जो केवल सुख के लिए इसका सेवन करता है, वह पापी होता है। कौलोपदेश से हीन व्यक्ति यदि मद्य, स्त्री आदि में आसक्त होता है, तो वह अक्षय नरक को प्राप्त होता है। हे कुलेशि ! ब्रह्मनिष्ठ योगी भी निन्दनीय होता है। अतः लिङ्गत्रय का जाननेवाला और षट्चक्रों का भेदक योगी पीठस्थानों में आकर महापद्मवन में स्थित हो। मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक बारम्बार जाकर चिच्चन्द्रकुण्डलीशक्ति रूपी आसव के सुख का अनुभव करे। व्योमपङ्कज से निकलते हुए अमृतपान में संलग्न योगी ही मधुपान करता है। अन्य लोग तो मद्यप हैं। पुण्य और
-२८ हिन्दी कुलार्णव पापरूपी पशु को ज्ञानरूपी खड्ग से मारकर मन से इन्द्रियों को आत्मा में संयुक्त कर चित्त को परतत्त्व में लगानेवाला योगी मांसभोजक है। शेष लोग तो प्राणिहिंसक मात्र हैं। शक्तियों का जो सेवक योगी परशक्ति और अपनी आत्मा के संयोग से होनेवाले आनन्द का अनुभव करता है, वही मैथुन का मर्मज्ञ है। अन्य लोग तो स्त्री सेवी मात्र हैं। इस प्रकार गुरु मुख से पाँचों द्रव्यों की भावना जानकर जो साधना करता है, वह मुक्त होता है। यह मैंने संक्षेप में तुमसे कहा। अब हे कुलेशादि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?
छठा उल्लास पूजा-रहस्य और द्रव्य-संस्कार देवी बोली—हे कुलेश ! मैं पूजन का लक्षण सुनना चाहती हूँ। हे शिव ! मुझे कुलद्रव्यादि का संस्कार और अर्चन बताओ। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो, जो तुमने पूछा है, उसे मैं कहूँगा। पूर्णाभिषेक से युक्त साधक गुरुभक्तिपूर्वक आत्म- निष्ठ होकर मन्त्रयोग से श्रीचक्रार्चन करे। 'मैं भैरव हूँ'—इस प्रकार की अनुभूति के साथ साधक कुलपूजा करे। एकान्त स्थान में, किसी वन-प्रदेश में या बाधारहित स्थान में सूक्ष्मा- सन पर पूर्व या उत्तर मुख बैठकर अमृतसागर में स्थित मणि- द्वीप में कल्पवृक्ष के नीचे वज्रप्राकार से सुरक्षित माणिक्य- मण्डप का ध्यान करे, जो पुष्पमालाओं के वितान से सुशो- भित है और कर्पूरदीप से प्रकाशमान तथा धूपादि से सुगन्धित है। उस मण्डप को सुधास्वरूप ध्यानकर कुलपूजा करे। पहले आत्म, स्थान, मनु (मन्त्र), द्रव्य और देव इन पञ्च- शुद्धियों को कर ले। सुन्दर स्नान, भूतशुद्धि, प्राणायाम, षडङ्गादि समस्त- न्यासों से आत्मशुद्धि होती है। पूजास्थल को सम्मार्जन, अनु- लेपन आदि के द्वारा दर्पणवत् स्वच्छ करना, वितान-धूप-दीप- पुष्पमाला, पञ्चरङ्गों से सजाना ही स्थानशुद्धि कही गई है। मूलमन्त्रों के अक्षरों को मातृकावर्णों से ग्रथित कर क्रमपूर्वक द्विरावृत्ति करने से मन्त्रशुद्धि होती है। पूजा-द्रव्य और आसन का मूलमन्त्र से प्रोक्षण कर धेनुमुद्रा दिखावे—यह द्रव्यशुद्धि है। पीठ में देवता की प्राणप्रतिष्ठा कर उसके विग्रह का
३० हिन्दी कुलार्णव सकलीकरण कर मूलमन्त्र से दीप्तात्मा हो न्यासद्रव्योदक से तीन बार उसका प्रोक्षण करे—यह देवशुद्धि कही गई है । इस प्रकार पञ्चशुद्धि कर पूजन करे । तभी पूजन सफल होता है । मण्डल के बिना पूजा निष्फल होती है । अतः मण्डल की रचना कर विधिपूर्वक उसमें पूजा करे । चतुरस्र उद्यान है, वृत्त कामरूप है, चन्द्रार्द्ध जालन्धर है और त्रिकोण पूर्णगिरि है । ऐसे मण्डल की पूजा कर उस पर आधार रखे । आधार पर शंख, अर्घ्य, भोग, पूजा और बलि ये पाँच पात्र क्रमशः स्थापित करे । पात्र का मूलमन्त्र से पूजन कर उसमें माष-बराबर मत्स्य और मांसखण्ड छोड़े । अमृत-वत् स्वादिष्ट, सुगन्धित और मनोहर द्रव्य द्वारा जो तर्पण किया जाता है, वही सिद्धिदायक होता है । बासी, जूठे, दुर्गन्धयुक्त या गन्धहीन द्रव्य से स्थापित पात्रों से जो पूजन- तर्पण किया जाता है, वह निष्फल होता है । असंस्कृत सुरा का पान करने से कलह, व्याधि और दुःख की प्राप्ति होती है । अतः कुलद्रव्य का सविधि संस्कार कर ले । तब अर्चन करे । द्रव्यों की प्रतिष्ठा किए बिना न जप करे, न स्मरण करे । आसव के बिना मन्त्र मन्त्र नहीं होता और मन्त्र के बिना आसव निरर्थक होता है । वीक्षण, प्रोक्षण, ध्यान, मन्त्र और मुद्रा से शोधित द्रव्य द्वारा तर्पण करने से देवता प्रसन्न होता है । पहले अग्नि की धूम्रार्चि आदि १०, सूर्य की तपनी आदि १२, चन्द्र की अमृतादि १६, ब्रह्मा की सृष्टि आदि १०, विष्णु की जरादि १०, रुद्र की तीक्ष्णादि १०, ईश्वर की पीतादि ४, और सदाशिव की निवृत्यादि १६ कलाओं का पूजन द्रव्य में करे । ब्रह्मकलाओं के पूजन के बाद ‘हंसश्शुचि०’ इत्यादि मन्त्र से, विष्णुकलाओं के बाद ‘प्रतद्विष्णु०’ इत्यादि से, रुद्रकलाओं के बाद ‘त्र्यम्बकं०’ इत्यादि से, ईश्वरकलाओं के बाद ‘तद्विष्णोः’
साधनमाला ३१ इत्यादि से और सदाशिवकलाओं के पूजन के बाद 'विष्णुर्यो- र्न०' इत्यादि मन्त्र से पूजन करे। फिर 'अखण्डैकरसानन्द०' इत्यादि दीपनी मन्त्रों से पूजा कर धेनुमुद्रा दिखाकर 'ब्रह्माण्ड- सम्भूत०' इत्यादि मन्त्र पढ़कर पात्र को नमस्कार करे। इस प्रकार शुद्ध किए गए द्रव्य से और उसी से शुद्धीकृत पुष्पाक्षतों से न्यासोक्त सभी मन्त्रों द्वारा हे प्रिये ! अपनी पूजा करे। मूर्ध्नि में श्रीगुरुपंक्ति की और मूलाधार में श्रीपादुका की पूजा करे। तदनन्तर पीठपूजा कर देवी का 'महापद्मवनान्तस्थे०' इत्यादि मन्त्र से आवाहन कर, ध्यानपूर्वक, मुद्राएँ दिखाकर गन्धपुष्पाक्षतों से उनकी पूजा करे। यन्त्र में प्राणप्रतिष्ठा कर अर्चन करे, अन्यथा कोई फल नहीं होता। पूजन के बाद 'मन्त्रहीनं क्रियाहीनं' इत्यादि प्रार्थना द्वारा क्षमायाचना करे। ✽ देवता को, यन्त्र के स्वरूप को और मन्त्र की व्यापकता को जाने बिना जो अर्चन किया जाता है, वह हे शाम्भवि ! व्यर्थ होता है। 'यन्त्र' साक्षात् देवता का रूप और मन्त्रमय होता है। कामक्रोधादि दोषों और सभी प्रकार के दुःखों पर नियन्त्रण रखने के कारण इसका नाम 'यन्त्र' पड़ा है। यन्त्र में पूजा करने से देवता प्रसन्न होता है। जीव के लिए जैसे शरीर है और दीपक के लिए जैसे तेल या घी है, उसी प्रकार सभी देवताओं के लिए उनका प्रतिष्ठित यन्त्र होता है। अतः यन्त्र रचना कर देवता की पूजा करे। एक पीठ में पृथक् देवताओं की पूजा उनके अलग यन्त्रों में उनकी पद्धति से उनके आवरणों के सहित करे। एक देवता का आवाहन करे ✽ देवता का यह पूजाविधान तत्तद्देवताओं की पूजा- पद्धतियों में विस्तार से दिया है। जिज्ञासु पाठक वहाँ देखने की कृपा करें।
२२ हिन्दी कुलार्णव और पूजन अन्य देवता का करे तो दोनों ही देवताओं का शाप साधक को प्राप्त होता है। इन सब बातों को गुरुदेव से जानकर शास्त्रीय विधि से अङ्गों और आवरणों सहित देवता की षोडशोपचारों से पूजा करे, तो वह प्रसन्न होता है। मूलमन्त्र और पादुका का जपकर अन्तःशक्ति का स्मरण कर अंगुष्ठ और अनामिका के संयुक्त नख से पात्रस्थ द्रव्य को ऊपर निकाल कर वीर साधक विधिपूर्वक तर्पण करे। अंगुष्ठ भैरव-रूप है और अनामा चण्डिकारूपा है। अनामा अंगुष्ठ के योग से वश्यकर्म में, तर्जनी-अंगुष्ठ के योग से अभिचार में और कनिष्ठांगुष्ठ से स्तम्भन में तर्पण करे। इस प्रकार पूजा-रहस्य और कुलद्रव्य का संस्कार मैंने संक्षेप में कहा। अब हे देवि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?
सातवाँ उल्लास बटुक और शक्ति-पूजन देवी बोलीं—हे कुलेश ! बटुकादि को बलिप्रदान और शक्ति के लक्षणों के सम्बन्ध में अब मुझे बताइए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो, जब तक बटुक को बलि अर्पित नहीं की जाती, तब तक किसी देवता को तृप्ति नहीं होती । अतः बटुकादि को उनके मन्त्र-विधान से गन्ध-पुष्प- आसव और आमिष प्रदान कर देवता की प्रसन्नता को प्राप्त करे । 'ॐ ॐ ॐ देवीपुत्र बटुकनाथ कपिलजटाभारभासुर पिङ्गल त्रिनेत्र ज्वालामुख इमां ०पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा'—इस मन्त्र से बटुक को बलि देकर यह प्रार्थना करे— 'बलिदानेन सन्तुष्टो वटुकः सर्वसिद्धिदः । शान्तिं करोतु मे नित्यं भूतवेतालसेवितः ।' 'ॐ ॐ ॐ सर्वयोगिनीभ्यः सर्वभूतेभ्यः सर्वभूताधिपाय डाकिनीभ्यः शाकिनीभ्यः त्रैलोक्यविपद्वासिनीभ्य इमां पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा'—से योगिनियों को बलि देकर यह प्रार्थना करे— या काचित् योगिनी रौद्रा सौम्या सौम्यतरा यदि । खेचरी भूचरी व्योमचरी प्रीतास्तु मे सदा ॥ 'ॐ ॐ ॐ सर्वभूतेभ्यः सर्वभूतपतिभ्यो हुँ फट्'—से फा० ३
३४ हिन्दी कुलार्णव सर्वभूतों को बलि देकर यह प्रार्थना करे—'भूता ये विविधा- कारा दिक्षु भौमान्तरीक्षगाः। पातालसंस्था ये केचिच्छ्लवे ! ये च न भाविताः ॥ ब्रह्माद्याः सत्यसन्धाश्च भृत्याः शक्त्युप- वृंहिताः। तृप्यन्तु प्रीतमनसः प्रतिगृह्णन्त्विमं बलिं ।' 'ॐ ॐ ॐ देवी-पुत्र सर्वविघ्नान्नाशय नाशय सर्वोपचार- सहितामिमां पूजां बलिं गृह गृह स्वाहा, अयं भैरवाधिष्ठिताय अक्षोभ्यवन्दितः हृदयाधिष्ठितं सिद्धार्थं अवतर अवतर क्षेत्रपाल क्षेत्रपाल महाक्षेत्र ग्रामाधिपतेऽदेशाधिपते वटुकनाथ देवीपुत्र मेघनाद प्रचण्डोग्र कपाली भीषण सर्वविघ्नाधिपते इमां पूजां बलिं गृह गृह कुरु कुरु मम दूरय दूरय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल सर्वविघ्नान् नाशय नाशय क्षां क्षीं क्षूं क्षैं क्षौं क्षं मातृपुत्र कुलपुत्र क्षेत्रपालाय वौषट् हुं । ॐ ॐ ॐ अमुक क्षेत्रपाल राजराजेश्वर इमां पूजा बलिं गृह गृह स्वाहा' से क्षेत्रपाल को बलि देकर यह प्रार्थना करे—'अनेन बलिदानेन बटुबद्ध-समन्वितः राजराजेश्वरो देवो मे प्रसीदतु सर्वदा ।' वटुक को पश्चिम में, योगिनी को उत्तर में, सर्वभूत को पूर्व में और क्षेत्रपाल को दक्षिण में बलि प्रदान कर मध्य में राजराजेश्वर की पूजा करे। अंगुष्ठ-अनामिका से बटुक को, तर्जनी-मध्यमा-अनामा-अंगुष्ठ से योगिनी को, सभी अँगुलियां से सर्वभूत को, अंगुष्ठ-तर्जनी से क्षेत्रपाल को और अंगुष्ठ- मध्यमा से राजराजेश्वर को बलि दे । इस प्रकार वटुकादि की पूजा कर कुलदीपों की पूजा करे । चार अंगुल बड़े डमरु के आकार के तीन कोनेवाले दीपक आटे से बनावे । दीपक ऐसे हों कि उनमें एक कर्ष घी आ
साधनमाला २५ जाय । नौ, सात या पाँच दीपकों की योजना कर अन्तस्तेज को बहिस्तेज से मिलाते हुए अमितप्रभा वाले दीपकों को तीन बार देवी के ऊपर घुमाकर कुलदीपकों को इस मन्त्र से निवेदित करे—समस्त चक्रचक्रेशियुते ! देवि ! कुलात्मिके ! आरात्रिकामिदं देवि ! गृहाण मम सिद्धये ॥ अब शक्तिपूजा करे । स्वशक्ति या वीरशक्ति या विशेष कर दीक्षिता शक्ति का, जो सुलक्षणा हो, देवता समझकर गन्ध-पुष्पाक्षत से पूजन करे और उसे भोगपात्र दे । फिर कन्याओं और मनोहर स्त्रियों की देवता-बुद्धि से पूजा करे और उनमें से प्रत्येक को अलग अलग पात्र दे । इसके बाद निम्न मन्त्र पढ़कर समर्पण करे—ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ इतः पूर्वं प्राणबुद्धी देहधर्माधिकारजाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु मनसा वाचा कर्मणा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना च यत्कृतं यदुक्तं यत्कृतं तत्सर्वं गुरुदेव मत्समर्पितमस्तु स्वाहा । फिर यह प्रार्थना करे— ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि यन्मया क्रियते सदा । तव कृत्यमिदं सर्वमिति मातः ! क्षमस्व मे ॥ इस प्रकार प्रार्थना कर प्रधान देवता-स्वरूप में परिवारों को समर्पित करे । इस प्रकार सावरणा देवी का ध्यान हृदय- कमल में करे । इसके बाद कौलिकमोहिनी देवी उच्छिष्टमातङ्गी का ध्यान करे । यथा— वीणावाद्यविनोदवाद्यनिरतां नीलांशुकोल्लासिनीं । विम्बोष्ठीं नवयावकाद्र् चरणामाकीर्णकेशाननाम् ॥
३६ हिन्दी कुलार्णव मृदङ्गीं सितशङ्खकुण्डलधरां माणिक्यपुष्पोज्ज्वलां । मातङ्गीं प्रणमामि सस्मितमुखीं देवीं शुकश्यामलां ॥ तदनन्तर दोनों हाथों से पात्र उठाकर द्वितीय तत्व के साथ साक्षात् पर शिव श्री गुरुदेव को प्रदान करे। तदनन्तर सत्सम्प्रदाय वाले वीरों के साथ पूजन कर परस्पर वन्दनपूर्वक गुरुदेव की अनुमति से पान करे। दाहने हाथ से पात्र ले बाएँ से मुद्रा कर द्वितीय तत्व के साथ यथा- विधि मन्त्रोच्चारण करते हुए उसे ग्रहण करे। हे देवेशि ! निम्न मन्त्र और मूलमन्त्र का उच्चारण कर स्थिर मन से धीरे-धीरे साधक अलि-पान करे— इदं पवित्रममृतं जगतां परभेषजम् । पशुपाशभवोच्छेदकारणं भैरवोदितम् ॥ चित्तेः स्वातन्त्र्यरूपत्वात्तदानन्दमयः स्वतः । तन्मयत्वाच्च भावानां भावाश्चान्तरितासवे ॥ स्व-स्वातन्त्र्यविकाशाय स्वरसस्तेन पीयते । तस्मादिमां सुरां देवीं पूर्णोऽहं त्वां पिबाम्यतः ॥ मूलाधार के त्रिकोण में स्थित कोटि सूर्यों के समान प्रभा- वती कुण्डलाकृतिवाली चिद्रूपा में द्रव्य का निम्न मन्त्र से हवन करे— अहन्तापात्रभरितमिदन्ता परमामृतम् । पराहन्तामये वह्नौ होमे स्वीकारलक्षणम् ॥ गुरु, दैवत और मन्त्र में ऐक्य भाव का चिन्तन करते हुए, जब तक उल्लास उत्पन्न न हो, तब तक मधु-पान करे। भोजन के बाद मद्य विष है और मद्य के बाद भोजन विष है। जो अन्न मधु के साथ ग्रहण किया जाता है, वह अमृत के
साधनमाला ३७ समान है। चर्वण-युक्त पान को ही अमृत कहा गया है। पान तीन प्रकार का होता है—१ दिव्य, २ वीर और ३ पशु। देवी के सामने किया जानेवाला दिव्य, मृद्धासन पर ग्रहण किया जानेवाला वीर और स्वेच्छा से पशुवत् किया जानेवाला पशु- पान कहलाता है। दिव्य पान भुक्ति और मुक्ति का देनेवाला है, वीरपान मुक्तिदायक है और पशुपान नरक को पहुँचाता है। दृष्टि, मन, वाणी और शरीर में जब तक भ्रम नहीं होता, तभी तक पान करे। इससे अधिक होने पर पशुपान में गणना होती है। आनन्द के उद्रेक से देवी तृप्त होती है, मूर्च्छा होने से स्वयं भैरव और वमन से सभी देवता तृप्त होते हैं। कुल- द्रव्य के सेवन से कुलपरायण लोगों को जो सुख मिलता है, वह मोक्ष-स्वरूप ही है, यह हे देवि ! सर्वथा सत्य है। इस प्रकार वटु, शक्ति आदि का पूजन संक्षेप में कहा गया है। अब हे कुलेशानि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?
उल्लास एवं पान-भेद
आठवाँ उल्लास उल्लास एवं पान-भेद देवी ने कहा—हे कुलेश ! द्रव्य के उल्लास, द्रव्यपात्रादि की संगति, रत्युल्लास, श्री चक्र की स्थिति और कौलिक- शक्तियों की चेष्टा के विषय में बताइए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो, उल्लास सात प्रकार के हैं—१ आरम्भ, २ तरुण, ३ यौवन, ४ प्रौढ़, ५ प्रौढ़ान्त, ६ उन्मना और ७ मनोल्लास । तीन तत्वों के होने से 'आरम्भ' कहा जाता है, तरुण सुख के होने पर तरुणोल्लास माना जाता है, मन के सम्यक् उल्लास की स्थिति को यौवन कहा जात । और दृष्टि, मन, वचन का स्खलन होने पर प्रौढ़ उल्लास स्पष्ट होता है । चक्र में समुल्लास की स्थिति होने पर यदि पात्र- मेलन की इच्छा हो, तो इस बात का ध्यान रखे कि अदीक्षित अनाचारी, प्रपञ्ची, स्त्री-द्वेषी, गुरुओं से अभिशप्त, कुलाचार से अनभिज्ञ व्यक्ति से द्रव्यपात्र की संगति न हो । सङ्केतयोग के बिना द्रव्य-सङ्गति न करे । एकपात्र न करे और अपने पात्र के कारण को भैरव को न प्रदान करे । आसन, भोजन पात्र, उपानत्, शयन—इन सबकी संगति अनभिज्ञ और अयोग्य व्यक्ति के साथ नहीं करनी चाहिए । स्त्रियों का उच्छिष्ट तो ग्रहण करे, किन्तु उन्हें अपना उच्छिष्ट न दे । कनिष्ठ शिष्यों को ही उच्छिष्ट दे । जो स्नेह, लोभ या भयवश अन्य किसी को उच्छिष्ट देता-लेता है, वह आपत्ति को प्राप्त होता है। प्रौढोल्लास होने पर हे देवि ! 'अलि' का त्याग करे ।
साधनमाला ३६ पूजागृह से बाहर या भीतर एक त्रिकोण बनाकर गन्ध- पुष्पाक्षतों से शिष्य उच्छिष्टभैरव का ध्यान करे— गदात्रिशूलडमरुपात्रहस्तं त्रिलोचनम् । कृष्णाभं भैरवं ध्यायेत् सर्व्वाविघ्नंनिवारणम् ॥ इसके बाद 'ॐ ॐ ॐ डांउच्छिष्टभैरव एहि एहि बलिं गृह्ण गृह्ण फट् स्वाहा' से बलि प्रदान करे। फिर शान्तिस्तव का पाठ कर अलविन्दुओ से तर्पण करे। यथा— यजन्ति देव्यो हरपादपङ्कजं प्रसन्नवामस्थितमोक्षदायकम्। अनन्तसिद्धान्तमतिप्रबोधकं नमामि चक्राष्टकयोगिनीशम् ॥ योगिनीचक्रमध्यस्थं मातृमण्डलवेष्टितम् । नमामि शिरसा नाथं भैरवं भैरवीप्रियम् ॥ अनादिघोरसंसारपरिक्ष्वंसैकहेतवे । नमः श्रीनाथवेद्याय कुलौषधिविधायिने ॥ आपदो दुरितं रोगाः समयाचारलङ्घनात् । तत्सर्वाणि व्यपोहन्तु दिव्य वक्रस्य मेलनात् ॥ नन्दन्तु साधककुलान्यलिमात्मनिष्ठाम् पापा जहन्तु समयाद्दिशि योगिनीनाम् । सा शाम्भवी स्फुरतु कापि ममाप्यवस्था यस्यां गुरोश्चरणपङ्कजमेव सेव्यम् । नन्दन्तु सिद्धगुरवस्तदनुक्रमौघाः ज्येष्ठाऽनुगाः समयिनो वटुकाः कुमार्य्यः । यद्योगिनीप्रवरवीरकुलप्रसूता आचार्य्य भूमिपतयो द्विजसाधुलोकाः ॥ नन्दन्तु साधुकुलधर्मरताः परे ये चान्ये विशेषपदभेदकशाम्भत्राय ॥
४० हिन्दी कुलार्णव नन्दन्तु साधकाः सर्वे नश्यन्तु कुलदूषकाः । अवस्था शाम्भवीयास्तु प्रसन्नोऽस्तु गुरुः सदा ॥ यद्येषा भैरवी देवी यदि भैरवशासनम् । यद्येष कुलधर्मः स्यात्तदा नश्यन्तु दूषकाः ॥ यासामाज्ञाप्रभावेण स्वास्थितं भुवनत्रयम् । नमस्ताभ्यः समस्ताभ्यो योगिनीभ्यो निरन्तरम् ॥ याश्चक्रमभूमिकावसतयो नाड़ीषु याः संस्थिताः याः कायोद्गतरोगकूपनिलया याः संस्थिता धातुषु । उच्छ्वासोर्मिमहातरङ्गनिलया निःश्वासवासाश्च या- स्ता देव्यो रिपुपक्षभक्षणपरास्तृप्यन्तु मन्त्रार्चिताः ॥ या देव्यः कुलसम्भवाः क्षितिगता या देवतास्तोयगा या नित्या मुदितप्रभा निधिगता या या भुवि प्रस्थिताः । या व्योमाहितमण्डलामृतमया याः सर्वगाः सर्वदाः ता देव्यः कुलमार्गपालनपराः शान्तिं प्रयच्छन्तु मे ॥ ब्रह्मा श्रीः शेषदुर्गागुहवटुकगणा भैरवाः क्षेत्रपाद्या रुद्रादित्या ग्रहास्ते वसुपितृमुनयः सिद्धयो गुह्यकाद्याः । भूता गन्धर्वविद्याधरऋषिपितरः किन्नरा । यक्षनागा योगीशाश्चारणाद्याः सुरकरनिकराः पूजने सन्तु तुष्टाः ॥ देहस्थाखिलदेवता गजमुखाः क्षेत्राधिपा भैरवा योगिन्यो वटुकाश्च यक्षपितरो भूताः पिशाचा ग्रहाः । अन्ये भूचरखेचरा दिशिचरा वेतालकाश्चेटका- स्तृप्यन्तां कुलपुत्रकस्य पितरः पीत्वा समीपे चरुम् । ऊर्ध्वे ब्रह्माण्डतो वा दिवि गगनतले भूतले निष्कले वा पाताले वा तले वा सलिलपवनयोर्यत्र कुत्र स्थितो वा । तीर्थे पीठोपपीठादिषु च कृतपदास्ते सुराः सर्वपूज्या— स्तृप्यन्तु ज्ञानदेव्यस्त्वलिबलिपिशितैर्धूपदीपादिकेन ॥
साधनमाला ४१ सत्यं चेद्गुरुवाक्यमेव चतुरो वेदागमा योगिनी मन्त्राश्चेत् परदेवता यदि भवेद्ब्रह्मप्रमाणं हि चेत् । शाक्तीयं यदि दर्शनं भवति चेदाज्ञाप्यमायान्ति चेत् सत्यञ्चापि च कौलधर्मपरमं स्यान्मे जयः सर्वदा ॥ पिबन्तु मातरः सर्वाः पिबन्तु कुलसत्तमाः । पिबन्तु भैरवाः सर्वे मम देहे व्यवस्थिताः ॥ पिबन्तु मातरः सर्वाः समुद्राः स गणाधिपाः । योगिन्यः क्षेत्रपालाश्च मम देहे व्यवस्थिताः ॥ शिवाद्यवनिपर्यन्तं ब्रह्मादिस्तम्बसंयुक्तम् । कालाग्न्यादिशिवान्तश्च जगद् यज्ञेन तृप्यतु ॥ अब पूजापात्र को उठाकर गुरुदेव शिष्य को प्रसाद दे । अपनी अभीष्ट चेष्टा का करना 'प्रौढान्त' उल्लास है । इस उल्लास के होने पर वीरों में कार्याकार्य का विचार नहीं रहता । इच्छा ही शास्त्र-सम्पत्ति है अतः उक्त अवस्था में जो भी शुभ या अशुभ कर्म होते हैं, वे सब देवता-प्रीति के लिए होते हैं । उस समय का वार्तालाप ( जल्पं ) जप होता है, विक्रियायें पूजा होती हैं, शक्ति-संयोग मोक्ष और भाषण स्तोत्र होता है । अंगों का स्पर्श न्यास, भोजन हवन की क्रिया, वीक्षण ध्यान और शयन वन्दना के समान होता है । इस प्रकार उक्त उल्लास से युक्त साधक की सभी चेष्टायें सत्क्रियायें ही होती हैं । उनमें कार्याकार्य का विचार जो करता है, वह पापभागी होता है । इस सम्बन्ध की वार्ता का चक्र के बाहर वर्णन करने से भी पाप लगता है । चक्र में सदाकुल साधकों को देखकर देवता-बुद्धि से ध्यान करे और प्रसन्न होकर भक्ति- पूर्वक वन्दना करे । इस प्रकार जो चक्र का दर्शन करता है, वह करोड़ों व्रत-तीर्थ-तपदान-यज्ञादि का फल प्राप्त करता है ।
४२ हिन्दी कुलार्णव छठवें 'उन्मना' उल्लास से युक्त होने पर बारम्बार मूर्छा, गिर-गिर कर उठना आदि क्रियायें होती हैं। बाह्य दृष्टि निमेष और उन्मेष से रहित होकर लक्ष्य अन्तर्मुख हो जाता है। यही शिव की कामदायिनी शाम्भवी मुद्रा है। लोभ-रहित होकर उल्लास-युक्त होनेवाले वीर साक्षात् शिव ही हैं, इसमें संदेह नहीं। अपने अनुष्ठान में तल्लीन होकर वे और सब कुछ भूल जाते हैं। इस अवस्था में वे मन- वचन से परे परम सुख को प्राप्त करते हैं। यह सुख शर्करा और दुग्ध के स्वाद के समान स्वयं ही अनुभव द्वारा ज्ञेय है। वह सुख किस प्रकार का होता है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। पुलक आदि के द्वारा जो सुखपूर्ण अवस्था दिखाई देती है, वह 'ब्रह्मध्यान' कहलाती है। यह सुखपूर्ण अवस्था सातवें 'मनोल्लास' से युक्त महात्माओं की होती है। भैरवी चक्र में सभी वर्ण द्विजातिवत् माननीय होते हैं। जाति-भेद नहीं रहता। चक्र के समाप्त होने पर सामाजिक अनुशासन पुनः लागू हो जाता है। चक्र में चाहे स्त्रियों को अलग बैठावे या पुरुषों के साथ दम्पति के रूप में पंक्ति अथवा चक्राकार स्थान दे। शिव-शक्ति के रूप में उन सबकी चक्र में पूजा करे। जिस समय शिव-शक्ति का समायोग होता है, वही-कुल साधकों की समाधिस्था सन्ध्या है। इस प्रकार मैंने तत्त्वत्रयोल्लास और पान-भेदादि का वर्णन संक्षेप में किया। अब हे कुलेशानि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?
नवाँ उल्लास योग-योगीश-लक्षण और कौलपूजा देवीबोली — हे कुलेश ! योग-योगीश का लक्षण और कुल- भक्त की पूजा का फल बताइए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! ध्यान दो प्रकार का है—१ स्थूल, २ सूक्ष्म । साकार ध्यान स्थूल और निराकार ध्यान सूक्ष्म कहा जाता है। स्थूल से बुद्धि निश्चित होती है और सूक्ष्म से सुस्थिति । हाथ-पैर, पेटादि अंग और अस्थि से रहित, सर्वतेजोमय, सच्चिदानन्द परमेश्वर का ध्यान करे । न उसका उदय होता है, न अस्त । न बढ़ता है, न घटता । वह अवस्था- रहित और स्वयं-प्रकाश है। सत्तामात्र उस अदृश्य तत्त्व का वाणी द्वारा आत्मा में जो सायुज्य प्राप्त होता है, उस ज्ञान को 'ब्रह्मज्ञान' कहा जाता है। वायु-संचार को रोककर पत्थर के समान स्थिर हो परजीव के एक धाम को जाननेवाला 'योगी' कहलाता है। जिस ध्यानावस्था में पदार्थ मात्र भासित हो और रूप का अभाव हो जाय, वह 'समाधि' कही जाती है। हे देवि ! किसी भी चिन्तन से स्वयं तत्त्व का प्रकाश नहीं होता और स्वयं तत्त्व का प्रकाश होने पर साधक तत्क्षण तन्मय हो जाता है। स्वप्न-जाग्रदवस्था में जो स्वप्नवत् निश्वास- श्वासहीन रहता है वह निश्चय ही 'मुक्त' है। इन्द्रिय-समूह को निष्क्रिय रखकर आत्मा से निश्चय हो जो मृतवत् रहता है, वह साक्षात् 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है। न सुनता है, न देखता है, न बैठता है, न जाता है, न सुख-दुःख को जानता है, न मन उनमें लिप्त होता है—इस प्रकार संसार से विरक्त हो जो
४४ हिन्दी कुलार्णव 'शिव' में अपनी आत्मा को लय रखता है, उसे 'समाधिस्थ' कहते हैं। जिस प्रकार जल में जल, दूध में दूध और घी में घी डालने से कोई अन्तर नहीं पड़ता, उसी प्रकार जीव-आत्मा- परमात्मा के सम्बन्ध में समझे। जिस प्रकार ध्यानशक्ति से कीड़ा भौंरे का रूप ले लेता है, उसी प्रकार ध्यान के द्वारा मनुष्य ब्रह्मभूत हो जाता है। दूध से निकाला हुआ घी जैसे पुनः उसमें फेंकने से पहले जैसा मिश्रित नहीं होता, वैसे ही गुणों के द्वारा पृथक् किया हुआ आत्मा यहाँ कहा जाता है। जिस प्रकार अंधेरे कारागार में बन्दी व्यक्ति कुछ नहीं देख पाता, उसी प्रकार अलक्ष्य योगी प्रपंच को नहीं देखता। जैसे आँख बन्द रहने पर प्रपंच नहीं दिखाई देता, उसी प्रकार आँख खुली होने पर भी वह दृष्टिगत न हो—यही 'ध्यान' का लक्षण है। जीव और आत्मा के ऐक्य को 'योग' कहते हैं। जो एक क्षण के लिए 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार आत्म- चिन्तन करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सहजा- वस्था उत्तम है, ध्यान-धारणा मध्यम है, जप-स्तुति अधम है और होम-पूजा अधमाधम है; तत्त्वचिन्ता उत्तम, जपचिन्ता मध्यम, शास्त्रचिन्ता अधम और लोकचिन्ता अधमाधम है। कोटिपूजा के समान स्तोत्र, कोटिस्तोत्र के समान जप, कोटि- जप के समान ध्यान और कोटिध्यान के समान लय है। नाद से परे मन्त्र नहीं, आत्मा से परे देवता नहीं, अनुसन्धि से परे पूजा नहीं और तृप्ति से परे फल नहीं है। हे देवि ! देह देवालय है और जीव सदाशिव है। अज्ञानरूपी निर्माल्य को छोड़कर 'सोऽहं'-भाव से पूजन करे। जीव शिव है, शिव जीव है— वह जीव केवल शिव है। पाशों से बँधा हुआ 'जीव' है और पाशों से मुक्त 'सदाशिव' कहलाता है। जिस प्रकार भूसी से युक्त धान होता है और भूसी के दूर हो जाने पर चावल कहलाता
साधनमाला ४५ है, उसी प्रकार कर्मों से बँधा हुआ 'जीव' और कर्मों से छूटा हुआ जीव 'सदाशिव' माना जाता है। विप्रों का वेद (ज्ञान) अग्नि में, मनीषियों का हृदय में, अल्पबुद्धि लोगों का मूर्ति में और आत्मज्ञानी का सर्वत्र रहता है। जो निन्दा-स्तु त, सुख-दुःख, शत्रु-मित्र में समान भाव रखता है, वही 'योगीन्द्र' है । निःस्पृह, नित्य सन्तुष्ट, समदर्शी, जितेन्द्रिय, स्वर्गहीन और उसके लिए प्रयत्न न करनेवाला परम तत्व का ज्ञाता योगी है। पञ्च मुद्राओं से उत्पन्न परमा- नन्द में मग्न रहनेवाला योगीन्द्र सर्वत्र आत्मा में अपने को देखता रहता है। अलि, मांस और अंगना-सङ्ग में जो सुख मिलता है, वह विद्वानों के लिए तो पुण्य है किन्तु अधमों के लिए पाप है। हे देवि ! 'मैं', 'तुम' और 'वह' में ऐक्य भाव का चिन्तन करता हुआ संशयरहित हो वह मद्यपायी मांसाहारी हो स्वेच्छाचार-परायण रहता है। मांसाहार की सुरभि से हीन को सुख नहीं है, उसे प्रायश्चित्ती जानना चाहिए। वह पशु ही है, इसमें संदेह नहीं। जब तक आसव-गन्ध है, तब तक पशु भी साक्षात् पशुपति है और अलि-मांस की गन्ध के बिना साक्षात् पशुपति भी पशु के समान हैं। संसार में निकृष्ट को उत्कृष्ट और उत्कृष्ट को निकृष्ट मानना—महात्मा भैरव ने इसी को 'कुलमार्ग' निर्दिष्ट किया है। हे कुलेश्वरि ! कुलयोगीश्वर कौलिकों के लिए न विधि है, न निषेध । न पुण्य है, न पातक । न स्वर्ग है, न नरक । योगी लोकहित के लिए भोगों का भोग करता है, आकांक्षा से नहीं। सभी कुलों से भोजन ग्रहण करता हुआ वह पृथिवी पर क्रीड़ा करता है। सूर्यवत् वह सब कुछ पीता है, अग्निवत् सब कुछ खाता है। सभी भोगों का भोग करके भी योगी पापों से लिप्त नहीं होता ।