कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
भूमिका 'कुलार्णव तन्त्र' की गणना आगम ग्रन्थों में हुई है। अतः इसका महत्व यहाँ स्पष्ट करने का आवश्यकता नहीं है। किन्तु यह अवश्य उल्लेखनीय है कि यह तन्त्र कौलधर्म के सिद्धान्तो की स्पष्ट अभिव्यक्ति करने में अग्रगण्य है। इससे इसकी उपयोगिता बहुत अधिक मानी गई है और सभी साधक बड़े आदर के साथ इसका मनन किया करते हैं। इसके सत्रह उल्लासों में विविध विषयों का जो विवेचन किया गया है, वह बहुत कुछ सूत्रात्मक है। उसका स्पष्टीकरण सुचारु रूप से करना अधिकारी विद्वानों का काम है। इन पंक्तियों का लेखक न तो विद्वान् है और न ही ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की रहस्यपूर्ण उक्तियों की व्याख्या करने का अधिकारी है। उसने किसी प्रकार इस ग्रन्थ का सारांश हिन्दी भाषा में लिखकर अध्यात्म प्रेमियों के समक्ष इस उद्देश्य से प्रस्तुत किया है कि वे इस अनूठे आगम साहित्य की विशेषता को अनुभव करें और अधिकारी विद्वानों से इसकी बातों को विस्तार के साथ समझने को सचेष्ट हों। बहुत संभव है कि एक ओर अपनी अल्पज्ञता और दूसरी ओर विषय की रहस्यात्मकता के कारण लेखक ने सारांश प्रस्तुत करने में कहीं कुछ त्रुटियाँ भी की हों। इसके लिये वह क्षमाप्रार्थी है और आशा करता है कि जो पाठक बन्धु
( ख ) अधिकारी विद्वानों की सहायता से इस ग्रन्थ का मनन करने को सक्रिय होंगे, वे सहज ही उन त्रुटियों का संशोधन कर लेने की कृपा करेंगे। वैसे यथाशक्ति यह प्रयत्न किया गया है कि मूल ग्रन्थ की कोई भी महत्त्वपूर्ण बात छूटने न पावे और सारांश करने में कहीं कोई त्रुटि न रह जाय। तथापि वास्तविक जिज्ञासु बन्धुओं से हमारा यहो अनुरोध है कि वे इस ग्रन्थ के मूल संस्करण का अध्ययन किसी योग्य अधिकारी की सहायता से करें। तभी वे इसके महत्व को भले प्रकार समझ सकेंगे और इसमें निहित ज्ञान से लाभान्वित हो सकेंगे। मूल 'कुलार्णव तन्त्र' भी कल्याण मन्दिर द्वारा 'गुप्तावतार दुर्लभ तन्त्रमाला' के अन्तर्गत प्रकाशित किया जा चुका है। आशा है कि इस संक्षिप्त 'हिन्दी कुलार्णव' से उक्त प्रसिद्ध आगम ग्रन्थ के महत्त्व की कुछ झाँकी अध्यात्म-प्रेमियों को मिल सकेगी। यही लेखक को अभीष्ट है। —लेखक
हिन्दी कुलार्णव पहला उल्लास जीव की स्थिति श्री देवी ने ईश्वर से कहा—हे भगवन् ! इस सारहीन कठिन संसार में नाना प्रकार के शरीरों से अनन्त जीवराशियाँ स्थित होकर उत्पन्न होती हैं और मरती हैं और उनका कोई अन्त नहीं है । घोर दुःख से व्याकुल होकर वे कभी सुखी नहीं होतीं । हे प्रभो ! किस उपाय से वे मुक्त हो सकती हैं, यह आप मुझे बतलाइये । ईश्वर ने उत्तर दिया—हे देवि ! सुनो। तुमने मुझसे जो पूछा है, उसे बताता हूँ। इसके सुनने मात्र से मनुष्य संशय से मुक्त हो जायगा । हे देवि ! परब्रह्मस्वरूपी शिव निष्कल है । वह सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सर्वेश और निर्मलहृदय है। वह आदि- अन्त से रहित एक ज्योति है तथा निर्विकार, पर से भी परे, निर्गुण और सच्चिदानन्द है। जीव-संज्ञावाले उसी के अंश हैं, जो असत्य विद्या के द्वारा भिन्न हुए हैं जैसे कि अग्नि में से चिन- गारियाँ फूटती हैं। वे विभिन्न उपाधियों और अनादि कर्मों आदि के कारण उससे पृथक् रहते हैं तथा अपने सुख एवं दुखदायक पुण्य-पापों से नियन्त्रित रहते हैं। अपने कर्मा-
२ हिन्दी कुलार्णव नुसार प्राप्त अमुक-अमुक जाति से युक्त देह, आयु और प्रारब्ध का वे जन्म-जन्मान्तरों में भोग करते रहते हैं, जिसका कोई अन्त नहीं है। अच्छे कर्मों के फलस्वरूप वे मानव होकर जब ज्ञानी होते हैं, तब मोक्ष को प्राप्त करते हैं और मोक्ष का कारण हे महेश्वरि ! साक्षात् तत्त्वज्ञान है। न तो वेदों के अध्ययन से मुक्ति मिलती है, न दर्शनों के मनन से। यही बात सभी शास्त्रों पर लागू होती है। ज्ञान ही से मुक्ति मिलती है। मुक्तिदायिनी एकमात्र गुरुवाणी है, शेष सभी विद्याएँ विडम्बना मात्र हैं। शिव के द्वारा कथित अद्वैत तत्त्व तो क्रियारूपी परि- श्रम से रहित है। उसे गुरुमुख से प्राप्त करना चाहिये। ज्ञान दो प्रकार का बताया गया है—एक तो आगम से प्राप्त होता है और दूसरा विवेक से। आगम से प्राप्त ज्ञान शब्दब्रह्म-परक होता है और विवेक से प्राप्त ज्ञान परब्रह्म का निदर्शक होता है। कुछ लोग द्वैत को चाहते हैं तो कुछ अद्वैत को, किन्तु मेरे तत्त्व को जाननेवाले द्वैत-अद्वैत से रहित होते हैं। 'मेरा है' और 'मेरा नहीं है'—ये दो पद क्रमशः बन्धन और मोक्षकारक हैं। वही वास्तव में कर्म है, जो बन्धनकारक न हो और वही विद्या है, जो मुक्तिकारिणी हो। जब तक कामना उत्तेजित रहती है, सांसारिक इच्छाएँ बनी रहती हैं, इन्द्रियाँ चञ्चल रहती हैं, तब तक तत्त्व की बात कहाँ ? जब तक प्रयत्नरूपी रोग है, संकल्प की कल्पना बनी है, मन में स्थिरता नहीं है, तब तक तत्त्व की बात कहाँ ? जब तक देहाभिमान है, ममता बनी है, गुरु की दया प्राप्त नहीं है, तब तक तत्त्व की कथा कहाँ ? जब तक तप, व्रत, तीर्थ, जप, होम, अर्चन आदि हैं और वेद-शास्त्र-आगम की चर्चा है, तब तक तत्त्व की कथा कहाँ ? अतएव हे देवि ! यदि आत्मसिद्धि की इच्छा है तो सभी प्रयत्नों से सभी अवस्थाओं में सदैव तत्त्वनिष्ठ रहे। तापत्रय के कष्ट से
साधनमाला ३ पीड़ित स्वधर्मज्ञान रूपी पुष्प और स्वकुलोक्त ( अर्थात् अपने कुल में जो बातें प्रचलित हैं, ऐसे ) फलवाले कल्पवृक्ष की छाया का आश्रय ग्रहण करे । हे पार्वति ! अधिक कहने से क्या लाभ । रहस्य की बात सुनो । कुलधर्म के सिवा मुक्ति नहीं है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है । गुरुमुख से उस तत्त्व को जानकर हे देवि ! इस घोर संसार के बन्धन से जीव सहज ही मुक्त हो जाता है ।
दूसरा उल्लास कुलधर्म का माहात्म्य श्री देवी ने पूछा—हे कुलेश ! आपने कुलधर्म के सम्बन्ध में तो बताया, किन्तु उसे पर प्रकाश नहीं डाला। उस सर्व- धर्मोत्तम धर्म का माहात्म्य बताने की कृपा करें। ईश्वर ने उत्तर दिया—हे देवि ! सुनो, जो तुम पूछती हो, उसे मैं कहूँगा। परम्परा के क्रम से आनेवाला और एक मुख से दूसरे मुख में स्थित होनेवाला वह तत्त्व यद्यपि अकथनीय है, तथापि परमार्थ की दृष्टि से मैं उसे कहता हूँ। सबसे उत्तम वेद हैं, वेदों से उत्तम वैष्णव हैं, वैष्णव से उत्तम शैव, शैव से उत्तम दक्षिण, दक्षिण से उत्तम वाम, वाम से उत्तम सिद्धान्त, सिद्धान्त से उत्तम कौल और कौल से उत्तम कोई नहीं है। वेद और आगम रूपी महा समुद्र को ज्ञानरूपी मथानी से मथकर मैंने इस कुलधर्म को प्रकट किया है। कुलधर्म का आश्रय लेकर श्रेष्ठ मनुष्य स्वर्ग से दूसरे लोक को जाकर मोक्षरूपी रत्न को प्राप्त करता है। जो योगी होता है, वह भोगी नहीं होता और जो भोगी होता है, वह योग को नहीं जानता किन्तु कौल भोग और योग दोनों से युक्त है। अतः हे प्रिये ! वह सबसे श्रेष्ठ है। भोग साक्षात् योग का रूप ले लेता है, पातक सुकृत बन जाता है और संसार मोक्ष का साधन हो जाता है; हे कुलेश्वरि ! यही कुलधर्म है। कुलधर्म के महामार्ग से जाकर अविलम्ब ही मुक्तिपुरी में पहुँचा जाता है, इसमें संदेह नहीं। अतएव कौल मार्ग का आश्रय ग्रहण करना चाहिये। लोग चाहे प्रशंसा
साधनमाला ५ करें, चाहे निन्दा करें; लक्ष्मी चाहे जाए, चाहे रहे; मृत्यु चाहे आज हो, चाहे युग के अन्त में; कौल मार्ग को कभी न छोड़े। न तो धन के लोभ से, न क्रोधवश, न द्वेष के कारण, न ईर्ष्या से, न कामवश और न भय से ही प्राप्त कुलधर्म का त्याग करे। गुरु की दया से युक्त, दीक्षा-द्वारा पाप-मुक्त, कुलपूजा में तल्लीन-यह हे देवि ! कौल ही है, कोई अन्य नहीं। वे पुण्य- कर्मवाले धन्य हैं, वे ही सन्त और योगी हैं, जिन्हें भाग्यवश कुल का ज्ञान प्राप्त होता है। हे महादेवि ! जीवन्मुक्ति का सरल उपाय कुलशास्त्रों में छिपा हुआ है। कुल के ज्ञाताओं में भी जो ऊर्ध्वाम्नाय से प्रसिद्ध हैं, उनका ज्ञान श्रेष्ठ है। हे पार्वति ! सभी कुलशास्त्रों को मैंने ही कहा है। अतः वे स्वतः प्रमाण हैं, इसमें संदेह नहीं। देवताओं और पितरों के लिए समर्पित किया जानेवाला मद्य अमृतस्वरूप हो जाता है और पुरुष पशु की बलि देकर उसके मांस को विधिवत् स्वर्णपात्र में रखकर प्रसाद रूप में ग्रहण करने से अविलम्ब ही सर्व पापों का नाश होकर तत्त्वज्ञान की उपलब्धि होती है। हे अम्बिके ! कुल का यह कुछ माहात्म्य मैंने संक्षेप में यहाँ कहा है। अब क्या सुनना चाहती हो ?
तीसरा उल्लास ऊर्ध्वाम्नाय और प्रासादपरा मन्त्र की महिमा श्री देवी ने कहा—हे प्रभो ! मैं सर्वोत्तम ऊर्ध्वाम्नाय की महिमा सुनना चाहती हूँ। आप उसके मन्त्र को बताइये। ईश्वर बोले—हे देवि ! सुनो। मैंने अपने पाँच मुखों से— पूर्वाम्नाय, पश्चिमाम्नाय, दक्षिणाम्नाय, उत्तराम्नाय और ऊर्ध्वा- म्नाय—ये पाँच आम्नाय कहे हैं। ये पाँचों मोक्ष-मार्ग के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनमें से प्रत्येक आम्नाय के मन्त्र भुक्ति और मुक्ति के देनेवाले हैं तथा उसके उपमन्त्र भी तत्त्वदायक होने से प्रसिद्ध हैं। संसार के कल्याण की इच्छा से मैंने ही उन सबको कहा है। उन सब मन्त्रों के देवता उन उन फलों को देते हैं। केवल एक आम्नाय को जो जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है,इसमें संदेह नहीं। फिर चार आम्नायों के ज्ञाता की क्या बात; साक्षात् शिव हो जाता है। चार आम्नायों के विशेष ज्ञान से भी श्रेष्ठ ऊर्ध्वाम्नाय है। अतएव यदि आत्मसिद्धि की इच्छा है, तो उसी को जानना चाहिये। सब धर्मों से ऊर्ध्व होने के कारण ऊर्ध्वाम्नाय श्रेष्ठ है। निम्न स्थित व्यक्ति को ऊर्ध्वगामी करने से यह ऊर्ध्वाम्नाय कहलाता है। इसका तत्त्व उच्चस्तर का है, यह संसार-सागर को नष्ट करता है और ऊर्ध्वलोक इसकी सेवा करते हैं—अतएव यह ऊर्ध्वाम्नाय कहलाता है। इसलिये हे देवेशि ! मोक्ष के एकमात्र साक्षात् साधन-स्वरूप ऊर्ध्वाम्नाय का ज्ञान प्राप्त करे, जो सब आम्नायों से अधिक फल देनेवाला और पर से भी परे है। पूर्वाम्नाय सृष्टिरूप है
साधनमाला ७ और दक्षिणाम्नाय स्थितिरूप; पश्चिमाम्नाय संहाररूप है और उत्तराम्नाय अनुग्रहरूप है। दूसरे प्रकार से पूर्वाम्नाय मन्त्रयोग है और दक्षिणाम्नाय भक्तियोग; पश्चिमाम्नाय कर्मयोग है और उत्तराम्नाय ज्ञानयोग है। हे कुलनायिके ! ये सब तत्व ऊर्ध्वा- म्नाय में विद्यमान हैं। साक्षात् ज्ञान-स्वरूप होने से इस आम्नाय में कुछ भी कर्म शेष नहीं रहता। ऊर्ध्वाम्नाय की यह कुछ महिमा मैंने संक्षेप में यहाँ कही है। अब इसके उत्तम मन्त्र का माहात्म्य कहता हूँ— ऊर्ध्वाम्नाय में 'पराप्रासाद मन्त्र' अधिष्ठित है, जो हम दोनों का परमस्वरूप है। उसे जो जानता है, वह स्वयं शिव हो जाता है। पराप्रासाद मन्त्र का ज्ञाता सर्वकर्मविहीन होते हुए भी सहज ही जिस गति को प्राप्त करता है, उसे कोई भी धार्मिक व्यक्ति प्राप्त नहीं कर पाता। उसके घर में चिन्तामणि, कामधेनु और कल्पतरु सदैव विद्यमान रहते हैं। पराप्रासाद का जप करनेवालों की साक्षात् कुबेर सेवा करते हैं। परा- प्रासाद मन्त्र का ज्ञाता जो करता है, जो चाहता है और जो बोलता है, वह सब हे महेशानि ! तप, ध्यान, जप स्वरूप ही होता है। दीक्षापूर्वक क्रमयुक्त जो पराप्रासाद मन्त्र को जानता है, वह 'मैं' ही हूँ, इसमें संदेह नहीं। चाहे ब्राह्मण हो या अन्त्यज, चाहे पवित्र हो या अपवित्र—जो पराप्रासाद का जप करनेवाला है, वह निस्सन्देह मुक्त है। चाहे चलते हुए जपे या बैठे हुए, चाहे जगते हुए जपे या सोते हुए, यह पराप्रासाद मन्त्र हे देवेशि ! कभी निष्फल नहीं होता। प्रचलित सहस्रों मन्त्रों में से प्रत्येक पर्याप्त विलम्ब से केवल एक फल प्रदान करता है। किन्तु हे कुलेशि ! यह मन्त्रराज शीघ्र ही सर्व फलों को प्रदान करता है। यह पराप्रासाद मन्त्र सब मन्त्रों में श्रेष्ठ है। चाहे ज्ञानपूर्वक भजन करे या अज्ञानपूर्वक, यह मन्त्र सदैव
प्रकाशित होता है। इसी से हे देवि ! इस मन्त्र का नाम 'परा-
८ हिन्दी कुलार्णव अभीष्ट प्रदान करता है। इन्द्र और शची, चन्द्र और रोहिणी, स्वाहा और अग्नि, प्रभा और सूर्य, लक्ष्मी और नारायण, वाणी और ब्रह्मा, रात्रि और दिन, बिन्दु और नाद, प्रकृति और पुरुष, आधार और आधेय, भोग और मोक्ष, प्राण और अपान, शब्द और अर्थ, विधि और निषेध, सुख और दुःख इत्यादि जितने द्वन्द्व समस्त लोकों में दिखाई या सुनाई देते हैं, वे सब हे कुलेश्वरि ! हम दोनों के ही स्वरूप हैं। पुरुष और स्त्री के समस्त रूप हम दोनों के ही अंशों से उत्पन्न हुए हैं। अतएव यह पराप्रासाद मन्त्र सर्वात्मक है। हे देवि ! यह अरूप, भावना-गम्य, परंब्रह्म, निष्कल, निर्मल, नित्य, निर्गुण, आकाशवत् अनन्त और मनवाणी से परे है। इस पराप्रासाद मन्त्र का अर्थ केवल ध्यान से ही प्रकाशित होता है। इसी से हे देवि ! इस मन्त्र का नाम 'परा- प्रासाद' है। यह परतत्त्व का स्वरूप है, सत्-चित् आनन्द इसके लक्षण हैं, शिव-शक्ति से यह ओत-प्रोत है, भुक्ति और मुक्ति का यह देनेवाला है, सकर्मा होते हुए भी यह निष्कर्म है, सगुण होते हुए भी निर्गुण है—अतएव यह श्री प्रासादपरा मन्त्र सब मन्त्रों का शिरोमणि है। ऐसा मानकर जो इस श्रेष्ठ मन्त्र में निष्ठा रखकर आगमोक्त विधि से क्रमपूजा-सहित इसका (श्री प्रासाद परा मन्त्र का) एक सौ आठ बार जप करता है, वह ब्रह्महत्यादि महापापों से मुक्त हो जाता है। दो सौ बार जो जप करता है, वह सब प्रकार की दशाओं में पूर्व जन्मार्जित समस्त पापराशि से छुटकारा पा जाता है। जो तीन सौ बार जपता है, वह समस्त प्रकार के यज्ञों, दानों, व्रतों और तीर्थों का फल प्राप्त करता है। चार सौ बार जो जप करता है, उसके द्वार पर अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ सदैव प्रस्तुत रहती हैं, धर्मार्थकाममोक्ष उसके हाथ में साक्षात्
साधनमाला ६ स्थित रहते हैं और चारों प्रकार की मुक्ति वह प्राप्त करता है। जो पाँच सौ बार जप करता है, उसके फल का वर्णन करने में मैं समर्थ नहीं हूं। अतएव हे कुलनायिके ! सब प्रयत्न करके, सब अवस्थाओं में, सदैव श्रीप्रासादपरा मन्त्र का भुक्ति एवं मुक्ति के लिए जप करना चाहिये । इस प्रकार हे देवि ! ऊर्ध्वाम्नाय और श्रीप्रासादपरा मन्त्र की कुछ महिमा मैंने तुमसे कही। अब तुम क्या सुनना चाहती हो ?
चौथा उल्लास श्री प्रसादपरा मन्त्र एवं महाषोढा श्री देवी ने कहा--हे ईशान ! मैं श्रीप्रसादपरा मन्त्र को सुनना चाहती हूँ। आप न्यास, ध्यान आदि के सहित उसे बताइये । ईश्वर बोले—हे देवि ! सुनो ! 'अनन्तचन्द्रभुवनमिन्दुविन्दु- युगान्वित' अर्थात् अनन्तचन्द्र है नादविन्दु (ँ), भुवन है औकार, विन्दु है हकार और विन्दुयुग है सकार। इस प्रकार 'ह्सौं' सिद्ध हुआ। यही सादि होने पर 'स्हौं' सिद्ध होता है। श्री प्रसादपरा मन्त्र भुक्ति और मुक्ति का देनेवाला है। पराप्रासाद मन्त्र हे कुलेश्वरि ! 'सादि' कहा गया है। शीघ्र प्रसन्न होकर फल देता है, इसलिए 'प्रासाद' मन्त्र कहलाता है और सब मन्त्रों से परे होने तथा परतत्त्व का निदर्शक होने के कारण इसे 'परा' मन्त्र कहा जाता है। हे देवि ! यह कुल- मन्त्र है। अब इसका न्यास सुनो। प्रातःकाल उठकर गुरुदेव का ध्यान करने के बाद एक बार मूलमन्त्र का स्मरण कर शौचादि से निवृत्त हो। फिर स्नान, संध्या, तर्पण आदि करे। एकान्त में द्वारपूजा, तीनों विघ्नों का उत्सारण (विनाश) कर पूजास्थान में प्रवेश कर आसन पर बैठे। फिर देवीपूजा के पूर्व ध्यान, शिवादि गुरु की वन्दना, आसन शोधन और गणपति-क्षेत्रपाल की वन्दना रे । तदनन्तर गुरुपादुका के मन्त्र का स्मरण कर दीपनाथ
साधनमाला ११ का अर्चन करे। फिर कर और षडङ्गों का शोधन, प्राणायाम, दिग्बन्धन कर दोनों अङ्गन्यास और दस प्रकार के मातृका- न्यास (अन्तर्मातृका, सृष्टि-स्थिति संहार ये तीन बहिर्मातृका, कला मातृका, श्रीकण्ठमातृका, केशवमातृका, लज्जाबीज- मातृका, रमाबीजमातृका, कामबीजमातृका) आदि करे। तब— अस्य श्रीपराप्रासादमन्त्रस्य परशम्भुः ऋषिः, अव्यक्ता गायत्री छन्दः, मन्त्रेश्वरी परा देवता, ह्सां स्हां बीजं, ह्सीं स्हीं शक्तिः, ह्सूं स्हूं कीलकं श्रीपरादेवताप्रसादसिद्ध्यर्थे विनियोगः । करन्यास— ह्सांस्हां अंगुष्ठाभ्यां नमः। ह्सींस्हीं तर्जनीभ्यां नमः। ह्सूंस्हूं मध्यमाभ्यां नमः। ह्सैं स्हैं अनामिकाभ्यां नमः। ह्सौं स्हौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ह्सः स्हः करतलकर- पृष्ठाभ्यां नमः। षडङ्गन्यास— ह्सांस्हां हृदयाय नमः। ह्सीं स्हीं शिरसे स्वाहा। ह्सूं स्हूं शिखायै वषट्। ह्सैं स्हैं कवचाय हुं। ह्सौंस्हौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ह्सः स्हः अस्त्राय फट्। मूर्तिन्यास — ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौं स्हौं हों ईशानाय नमः—अंगुष्ठयोः। ,, ,, हैं तत्पुरुषाय नमः—तर्जन्यौः। ,, ,, हूं अघोराय नमः—मध्यमयोः। ,, ,, हिं वामदेवाय नमः—अनामिकयोः ,, ,, हं सद्योजाताय नमः—कनिष्ठिकयोः
:१२ हिन्दी कुलार्णव इसी प्रकार क्रमशः मूर्धा, मुख, हृदय, गुह्य और पाद देश में क्रमशः अंगुष्ठ, तर्जनी आदि अँगुलियों से न्यास करे । तब उक्त क्रम से क्रमशः ऊर्ध्व, प्राक्, दक्षिण, उदीच्य और पश्चिम मुखों में क्रमशः अंगुष्ठ, तर्जनी आदि अँगुलियों से न्यास करे । तदनन्तर 'ह्सां ह्सीं' इत्यादि से षडङ्गन्यास कर 'स्हां स्हीं' इत्यादि से भी षडङ्गन्यास करे । इसके बाद निम्न प्रकार षडङ्ग न्यास करे— ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौं स्हौं सर्वज्ञाय नमः—अंगुष्ठयोः । ,, ,, अमृते तेजोमालिनि नित्यतृप्ताय नमः तर्जन्योः । ,, ,, ब्रह्मशिरसे स्वाहा ज्वलितशिखि- शिखायानादिबोधाय नमः मध्यमयोः । ,, ,, वज्रिणे वज्रहस्ताय स्वतन्त्राय नमः अनामिकयोः । ,, ,, सौं वौं हौं नित्यमलुप्तशक्तये नमः कनिष्ठिकयोः । ,, ,, श्रीं श्लीं पशु हुं फट् नित्यमनन्त- शक्तये नमः करतलयोः । इसी क्रम से हृदयादि षडङ्गों में भी न्यास करे । अब अड़तीस कलाओं का न्यास करे । सब मन्त्रों के पूर्व 'ॐ' लगा ले । यथा— पहले समुष्टि अंगुष्ठ से न्यास करे— ॐ ईशानः सर्वविद्यानां शशिन्यै नमः ऊर्ध्ववक्त्रे । ईश्वरः सर्वभूतानां अङ्गदायै नमः पूर्ववक्त्रे । ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मेष्टदायै नमः दक्षवक्त्रे ।
साधनमाला १३ ब्रह्मा शिवो मे अस्तु मरीच्यै नमः उत्तरवक्त्रे । सदाशिवोम् अंशुमालिन्यै नमः पश्चिमवक्त्रे । अंगुष्ठतर्जनी को मिला उनसे न्यास करे— तत्पुरुषाय विद्महे शान्त्यै नमः पूर्ववक्त्राधः । महादेवाय धीमहि विद्यायै नमः दक्षिणवक्त्राधः । तन्नो रुद्रः प्रतिष्ठायै नमः उत्तरवक्त्राधः । प्रचोदयात् निवृत्यै नमः पश्चिमवक्त्राधः । अंगुष्ठमध्यमा को मिला उनसे न्यास करे— अघोरेभ्यः तमायै नमः हृदि । अथ घोरेभ्यो मोहायै नमः ग्रीवायां । घोर क्षमायै नमः दक्षांसे । घोरतरेभ्यो निद्रायै नमः वामांसे । सर्वतः शर्व व्याध्यै नमः नाभौ । सर्वेभ्यो मृत्यवे नमः कुक्षौ । नमस्ते अस्तु क्षुधायै नमः पृष्ठे । रुद्ररूपेभ्यः तृष्णायै नमः वक्षसि । अंगुष्ठअनामिका को मिलाकर उनसे न्यास करे— वामदेवाय नमो रजायै नमः गुह्ये । ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रक्षायै नमः लिंगे । रुद्राय नमो रत्यै नमः दक्षोरौ । कालाय नमो मालिन्यै नमः वामोरौ । कल विकरणाय नमः काम्यायै नमः दक्षजानुनि । विकरणाय नमः शशिन्यै नमः वामजानुनि । बल विकरणाय नमः क्रियायै नमः दक्षजंघायां । विकरणाय नमः वृद्ध्यै नमः वामजंघायां । बलाय नमः स्थिरायै नमः दक्षस्फिचि । बलप्रमथनाय नमः रात्र्यै नमः वामस्फिचि ।
१४ हिन्दी कुलार्णव सर्वभूतदमनाय नमो भ्रामिण्यै नमः कट्यां । मनोन्मनाय नमः मोहिन्यै नमः दक्षपार्श्वे । उन्मनाय नमो जरायै नमः वामपार्श्वे । अंगुष्ठ-कनिष्ठा को मिलाकर उनसे न्यास करे— सद्योजातं प्रपद्यामि सिद्ध्यै नमः दक्षपादतले । सद्योजाताय वै नमः ऋद्ध्यै नमः वामपादतले । भवे लक्ष्म्यै नमः दक्षहस्ततले । भवे धृत्यै नमः वामहस्ततले । नातिभवे मेधायै नमः नासिकायां । भवस्व माम् प्रज्ञायै नमः शिरसि । ॐ भव प्रभायै नमः दक्षबाहौ । उद्भवाय नमः सुधायै नमः वामबाहौ । अब महाषोढान्यास करे, जिसके अन्तर्गत प्रपञ्च, भुवन, मूर्ति, मन्त्र, दैवत और मातृका—ये छः न्यास हैं । यह महा- षोढान्यास सब न्यासों में उत्तम है । इसका क्रम इस प्रकार है— प्रपञ्चन्यास निम्नलिखित प्रत्येक मन्त्र के आदि में ‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं हसौः’ और अन्त में ‘स्हौः श्रीं ह्रीं ऐं ॐ’ लगाकर न्यास करे— अं प्रपञ्चरूपायै श्रियै नमः शिरसि । आं द्वीपरूपायै मायायै नमः मुखवृत्ते ॥ इं जलधिरूपायै कमलायै नमः दक्षनेत्रे । ईं गिरिरूपायै विष्णुवल्लभायै नमः वामनेत्रे ॥ उं पत्तनरूपायै पद्मधारिण्यै नमः दक्षकर्णे । ऊं पीठरूपायै समुद्रतनयायै नमः वामकर्णे ॥
साधनमाला १५ ऋं क्षेत्ररूपायै लोकमात्रे नमः दक्षनासापुटे । ॠं वनरूपायै कमलवासिन्यै नमः वामनासापुटे ॥ लूं आश्रमरूपायै इन्दिरायै नमः दक्षगण्डे । लूं गुहारूपायै मायायै नमः वामगण्डे । एं नदीरूपायै रमायै नमः ऊर्ध्वोष्ठे ॥ ऐं चत्वररूपायै लक्ष्म्यै नमः अधरोष्ठे । ओं उद्भिज्जरूपायै नारायणप्रियायै नमः ऊर्ध्वदन्तपंक्तौ ॥ स्वेदजरूपायै सिद्धिलक्ष्म्यै नमः अधोदन्तपंक्तौ । अं अंडजरूपायै राजलक्ष्म्यै नमः जिह्वामूले ॥ अः जरायुजरूपायै महालक्ष्म्यै नमः जिह्वाधः । कं लवरूपायै आर्यायै नमः दक्षबाहुमूले ॥ खं त्रुटिरूपायै उमायै नमः दक्षकूर्परे । गं कलारूपायै चण्डिकायै नमः दक्षमणिबन्धे ॥ घं काष्ठारूपायै दुर्गायै नमः दक्षांगुलिमूले । ङं निमेषरूपायै शिवायै नमः दक्षांगुल्यग्रे ॥ चं श्वासरूपायै अपर्णायै नमः वामबाहुमूले । छं घटिकारूपायै अम्बिकायै नमः वामकूर्परे ॥ जं मुहूर्तरूपायै सत्यै नमः वाममणिबन्धे । झं प्रहररूपायै ईश्वर्यै नमः वामागुलिमूले ॥ ञं दिवसरूपायै शाम्भव्यै नमः वामांगुल्यग्रे । टं सन्ध्यारूपायै ईशान्यै नमः दक्षपादमूले ॥ ठं रात्रिरूपायै पार्वत्यै नमः दक्षजंघायाम् । डं तिथिरूपायै सर्वमङ्गलायै नमः दक्षगुल्फे ॥ ढं वाररूपायै दाक्षायण्यै नमः दक्षपादांगुलिमूले । णं नक्षत्ररूपायै हैमवत्यै नमः दक्षपादाङ्गुल्यग्रे । तं योगरूपायै महामायायै नमः वामपादमूले ॥
१६ हिन्दी कुलार्णव थं करणरूपायै माहेश्वर्यै नमः वामजंघायाम् । दं पक्षरूपायै मृडान्यै नमः वामगुल्फे ॥ धं मासरूपायै रुद्राण्यै नमः वामपादांगुलिमूले । नं राशिरूपायै शर्वाण्यै नमः वामपादांगुल्यग्रे ॥ पं ऋतुरूपायै परमेश्वर्यै नमः दक्षकुक्षौ । फं अयनरूपायै काल्यै नमः वामकुक्षौ ॥ बं वत्सररूपायै कात्यायन्यै नमः पृष्ठवंशे । भं युगरूपायै गौर्यै नमः नाभौ ॥ मं प्रलयरूपायै भवान्यै नमः हृदये । यं पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाख्यपञ्चभूतरूपायै ब्राह्म्यै नमः दक्षांसे ॥ रं शब्दस्पर्शरूपरसगंधाख्यपञ्चतन्मात्ररूपायै वागीश्वर्यै नमः वामांसे । लं वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यपञ्चकर्मेन्द्रियरूपायै वाण्यै नमः अपरगले ॥ वं श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाख्यपञ्चज्ञानेन्द्रियरूपायै सावित्र्यै नमः दक्षकक्षे । शं प्राणापानव्यानोदानसमानाख्यपञ्चप्राणरूपायै सरस्वत्यै नमः वामकक्षे । षं सत्त्वरजस्तमाख्यगुणत्रयरूपायै गायत्र्यै नमः हृदयादि- दक्षपाणिपर्यन्तं । सं मनोबुद्ध्यहंकारचित्ताख्यान्तःकरणचतुष्टयरूपायै वाक्प्रदायै नमः हृदयादिवामपाणिपर्यन्तं ॥ हं जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयावस्थाचतुष्टय रूपायै शारदायै नमः हृदयादिदक्षपादान्तं । ळं त्वगसृग्मांसमेदोस्थिमज्जाशुक्राख्यसप्तधातुरूपायै भारत्यै नमः हृदयादि वामपादान्तं ।
साधनमाला १७ क्षं वातपित्तश्लेष्माख्यदोषत्रयरूपायै विद्यात्मिकायै पञ्चभूत- व्यापिकाधीश्वर्यै नमः हृदयादिभ्रूयुगान्तं। अं...क्षं मूलं सकलप्रपञ्चरूपायै पराम्बा देव्यै नमः सर्वाङ्गे व्यापकं॥ भुवनन्यास निम्नलिखित प्रत्येक मन्त्र के आदि में 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' जोड़कर न्यास करे। यथा— अं आं इं अतललोकनिलयशतकोटिगुह्याख्ययोगिनीदेवता- युताधारशक्त्यम्बादेव्यै नमः पादयो.। ईं उं ऊं वितललोक- निलयशतकोट्यतिगुह्ययोगिनी-मूलदेवतायुतानन्दशक्त्यम्बादेव्यै नमः गुल्फयोः। ऋं ॠं लूं सुतललोकनिलयशतकोट्यतिगुह्य- योगिनीमूलदेवतायुताचिन्मयशक्त्यम्बादेव्यै नमः जंघयोः। लूँ एं ऐं महातललोकनिलयशतकोटिमहागुह्याख्ययो गनीमूलदेवता- युतस्वातंत्र्यशक्त्यंबादेव्यै नमः जान्वोः। ओं औं तलातललोक- निलयशतकोटिरहस्ययोगिनीमूलदेवतायुतपरमगुह्येच्छाशक्त्यम्बा देव्यै नमः ऊर्वोः। अं अः रसातललोकनिलयशतकोटिरहस्ययो- गिनीमूलदेवतायुतज्ञानशक्त्यम्बादेव्यै नमः गुह्ये। कं-५ पाताल- लोकनिलयशतकोटि-रहस्यातिरहस्ययोगिनी मूलदेवता-युतक्रियाश- क्त्यम्बादेव्यै नमः मूलाधारे। चं-५ भूर्लोकनिलयशतकोट्यतिर- हस्ययोगिनीमूलदेवतायुतश्रीडाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै नमः स्वाधि- ष्ठाने। टं-५ भुवर्लोकनिलयशतकोटिमहारहस्ययोगिनीमूलदेवता- युतश्रीराकिणीशक्त्यम्बादेव्यै नमः नाभौ। तं-५ स्वर्लोकनिलय- शतकोटिपरमरहस्ययोगिनीमूलदेवतायुतलाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै- नमः हृदये। पं-५ महर्लोकनिलयशतकोटिगुप्तयोगिनीमूलदेवता- युतश्रीकाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै नमः तालुमूले। यं-४ जनलोकनिल- यशतकोटिगुप्ततरयोगिनी-मूलदेवतायुत-श्रीशाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै फा २
१८ हिन्दी कुलार्णव नमः आज्ञायाम् । शं-४ तपोलोकनिलयशतकोट्यतिगुप्तयोगिनी- मूलदेवतायुतहाकिनीशक्त्यम्बादेव्यै नमः ललाटे । ळं क्षं सत्य-लोकनिलयशतकोटिमहागुप्तयोगिनीमूलदेवतायुतयाकिनीश- क्त्यम्बादेव्यै नमः ब्रह्मरन्ध्रे । अं...क्षं चतुर्दशभुवनाधिपायै श्रीपराम्बादेव्यै नमः सर्वाङ्गे व्यापकं । मूर्तिन्यास निम्नलिखित प्रत्येक मन्त्र के आदि में पूर्ववत् 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्सौः' जोड़कर न्यास करे । यथा— अं केशवाक्षरशक्तिभ्यां नमः ललाटे । आं नारायणाद्याभ्यां नमः दक्षमुखे । इं माधवेष्टाभ्यां नमः दक्षस्कंधे । ईं गोविन्दे- शानीभ्यां नमः दक्षकुक्षौ । उं विष्णूग्राभ्यां नमः दक्षिणोरौ । ऊं मधुसूदनोध्वनयनाभ्यां नमः दक्षजानुनि । ऋं त्रिविक्रमऋद्धि- भ्यां नमः दक्षजङ्घायाम् । ॠं वामनरूपिणीभ्यां नमः दक्षपादे । लूं श्रीधरलुप्ताभ्यां नमः वामपादे । लूं हृषीकेशसूनदोषाभ्यां नमः वामजङ्घायाम् । एं पद्मनाभैकनायिकाभ्यां नमः वामजानुनि । ऐं दामोदरैङ्कारिणीभ्यां नमः वामोरौ । ओं वासुदेवौघवतीभ्यां नमः वामकुक्षौ । औं संकर्षणसर्वकामाभ्यां नमः वामस्कंधे । अं प्रद्युम्नाञ्जनप्रभाभ्यां नमः वाममुखे । अः अनिरुद्धास्थिमालाधराभ्यां नमः वाममस्तके । कं भं भवकरभद्राभ्यां नमः दक्षपादे । खं बं शवेखगबलाभ्यां नमः वामपादे । गं फं रुद्रगरिमादिफलप्रदाभ्यां नमः दक्षपार्श्वे । घं पं पशुपतिघर्मप्रशमनीभ्यां नमः वामपार्श्वे । ङं नं उग्रपङ्क्तिनासाभ्यां नमः दक्षबाहौ । चं धं महादेवचन्द्रार्ध- धारिणीभ्यां नमः वामबाहौ । छं दं भीमछन्दोमयीभ्यां नमः कंठे । जं थं ईशानजगतस्थानाभ्यां नमः ऊर्ध्वास्ये । झं तं तत्पुरुष- झंत्ताराभ्यां नमः पूर्वास्ये । ञं णं अघोरज्ञानफलप्रदाभ्यां नमः दक्षिणास्ये । टं ढं सद्योजातटङ्कधराभ्यां नमः पश्चिमास्ये । ठं डं