लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
॥ श्रीः ॥ लीलावती। श्रीयुतगणकचक्रचूडामणि- भास्कराचार्य्यविरचिता । मुरादाबादवास्तव्यपण्डितभोलानाथात्मजेन काशिक- राजकीयसंस्कृतपाठशालायामधीतन्यायादिशास्त्रेण पण्डितरामस्वरूपशर्म्मणा विरचितयान्वयस- नार्थीकृतया भाषाटीकया समलंकृता । सेयम् अस्यामावृत्तौ गणकवर्य्य-मैथिल-झोपाङ्क- श्रीबब्बू-शर्म्मद्वारा संशोध्य, खेमराज श्रीकृष्णदास श्रेष्ठिना मुम्बय्यां स्वकीये 'श्रीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशिता । (तृतीयावृत्तिः) माघ संवत् १९६४, शके १८२९. इस पुस्तकके सब हक़ १८६७ वार्षिक २५ ऐक्टके बमूजिब प्रकाशकने अपने आधीन रक्खे हैं।
॥ पिङ्गलरुचिः ॥ [अस्पष्ट / Faded text]
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धन्यवादपत्रम् । संतु भूयांसो धन्यवादाः पंडितवर्येभ्यः श्रीमुरादाबादनगरनि- वासिभ्यः गौडवंशावतंसेभ्यः काशिकराजकीयपाठशालायाम- धीतन्यायादिशास्त्रेभ्यः श्रीरामस्वरूपशास्त्रिभ्यः । यदेभिः शा- स्त्रिभिर्महता परिश्रमेण श्रीभास्कराचार्यविरचितसिद्धांतशिरोम- णिग्रंथैकदेशभूतस्य "लीलावती" नामकव्यक्तगणिताध्यायस्य सकलविद्यार्थिजनोपकृतये सुस्पष्टतयार्थावबोधाय विशदा हिंदी भाषाटीका व्यरचि । यस्यां च भाषाटीकायां नियमोदाहरणा- दीनामनायासतो बोधो जायते । स एष टीकाविरचनारूप उक्त- पंडितानां नव्यतया गणितशास्त्रविद्याबुभुत्सूनामुपरि भूयानेवा- नुग्रहः । एभिः पंडितैरेतल्लीलावतीपुस्तकमस्मत्प्रेरणया भाषा- टीकया समलंकृत्यास्माकं समीपे परमादरणे प्रहितम् । तदेत- दस्माभिर्महता समुत्साहेन स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर" मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशमनीयत । ये चैतत्पुस्तकं संगृह्य पठिष्यंति संतु तेभ्यो विद्यार्थिभ्यो धन्यवादाः । यत एतादृक्सविस्तरभा- षाविभूषितमेतत्पुस्तकं क्वाप्यद्यावधि नामुद्र्यत न प्राकाश्यत चात इदं पुस्तकमवश्यं संगृह्य कृतार्थयंतु पण्डितवर्यपरिश्रमा- नित्याशास्महे । भवदीयकृपाकांक्षी- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम्-मुद्रणालयाध्यक्ष-मुंबई.
भूमिका । ज्योतिषं नयनं स्मृतम् । प्रियपाठक गण ! आप सब महाशयोंको विदित ही होगा कि, चारों वर्णोंकी शिक्षाप्रणाली बतलानेवाली दिव्य पुस्तक वेद है और उसके शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष यह छ अङ्ग हैं और षडङ्गवेद पढना ब्राह्मणोंसे लेकर वैश्यों पर्यन्त तीनों वर्णोंका धर्म है। उस ही हमारे शिरोधा- र्य्य वेदका एक अङ्ग जो ज्योतिष है उसके दो भाग हैं फलित और गणित और उसमेंसे गणित भाग आजपर्य्यन्त इसी द्वीपमें नहीं किन्तु द्वीपान्तरोंमें भी परम प्रतिष्ठाका स्थान है, यद्यपि उस सनातन गणितको जाननेवालोंकी संख्या भारतवर्षमें बहुत थोडी है तथापि कोटिशः धन्यवाद हैं उस ईश्वरको जिसने अपनी दयालुतासे परम पुनीत विश्वेशपुरी श्रीकाशीक्षेत्रमें गणितशास्त्रके पारङ्गम चन्द्रमाके समान अपनी कौशल्यकलाओंसे गणितसमुद्रके प्रवाहको बढानेवाले अद्यश्वः काशिक राजकीय संस्कृत विद्यालयमें गणितशास्त्रके अध्यापक महामहोपाध्याय श्रीविद्वद्वर्य्य सुधाकरजीको प्रकट किया है और इनहीके कारण मिथिलादेशमें भी गणितशास्त्रका प्रचार है परन्तु अन्य देशोंपर यदि दृष्टि डालकर देखा जाय तो हमारे सनातन गणितशास्त्रकों परिपूर्ण रीतिसे जाननेवालोंको मिलना अति कठिन पड जाता है। यदि कोई गणितके चतुर मिल भी जायं तो प्रायः पढानेमें ध्यान नहीं देते हैं इस कारण सनातन गणित जाननेकी इच्छा करने वालोंके मनोरथ उत्पन्न होकर हृदयमें ही लीन हो जातेहैं इस कारण यह दारुण प्रचार दूर करनेके निमित्त मेरे द्वारा श्रीयुत सेठ-खेमराज श्रीकृष्णदासजीने लीलावतीकी टीका बनवाई है। प्रियवर! लीलावती वह पुस्तक है, जिसको इस ही द्वीपके नहीं किन्तु द्वीपान्तरके भी आबाल वृद्ध सब ही विज्ञ पुरुष नामसे जानते हैं। यह पुस्तक आजकल सनातन गणितका प्रथम सोपान है। इसी कारण सर्वत्र प्रचार करनेके निमित्त उक्त सेठजीके पत्रानुसार मैंने इस लीलावती ग्रन्थका "स्वरूपप्रकाश" नामकी सान्वय भाषाटीका निर्माण
( २ ) भूमिका । की और ईश्वरकी कृपादृष्टिसे छपकर भी तयार होगयी । इस पुस्तकके पुनर्मुद्र- णादि सब अधिकार मैंने सेठ खेमराजजीको समर्पण करादिये हैं। अब आशा है कि गुणग्राहक सज्जन पुरुष इसको अवलोकन कर मेर परिश्रमको सफल करेंगे और वैदिक धर्मावलम्बियोंको तो इसको स्वाध्याय करना अत्यन्त ही आवश्यक है, क्योंकि ज्योतिषशास्त्र वेदका नेत्र है “ज्योतिषं नयनं स्मृतम्” ॥ आशा है कि, सज्जन पुरुष मत्सरताको छोडकर मुझसे मनुष्यधर्मानुसार जो भूल हुई हो उसको क्षमा करेंगे ॥ ग्रन्थकर्त्ताके समयादिका निर्णय. “लीलावती” के बनानेवाले श्रीभास्कराचार्य्य सह्यकुलपर्वतके समीप विज्जड़ विड (जो कि आजकल बीजापुर नामसे प्रसिद्ध है) नामक नगरमें वास करते थे इनका जन्म शाण्डिल्यगोत्र श्रीमद्महेश्वरोपाध्यायके यहां शाके १०३६ में हुआ था यह बात भास्कराचार्य्यने स्वयं गोलाध्यायके प्रश्नाध्यायमें लिखी है। यह कर्णा- टक ब्राह्मण और वैष्णवसम्प्रदायके थे। इनके रचना किये हुए लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय, गणिताध्याय, करणकुतूहल इत्यादि ग्रन्थ मिलते हैं। जिस प्रकार इस समय भास्कराचार्य्यके सिद्धान्तशिरोमणि ग्रन्थका अधिक प्रचार है इसी प्रकार भास्कराचार्य्यके समय लल्लसिद्धान्तका प्रचार था और भास्कराचार्य्य- ने भी लल्लसिद्धान्तको ही पढकर पाण्डित्यका लाभ कियाथा तदनन्तर ब्रह्मगुप्तके मतको स्वीकार करके लल्लमतके अनेक विषयोंका खण्डन किया था। इस लीलावती ग्रन्थ पर गंगाधर, गणेशदैवज्ञ, सूर्यदास, लक्ष्मीदास, मुनीश्वर, रामकृष्ण और कृपानाथादि महाशयोंकी टीकाएँ हैं और श्रीबापूदेव शास्त्रीकी टिप्पणी तथा श्रीयुत महामहो- पाध्याय काशिक प्रधान संस्कृतकालेजके गणितशास्त्राध्यापक श्रीसुधाकर द्विवेदी- जीकी बनाई हुई टिप्पणी भी छपी है और सन् १५८७ इस्वीमें अकबर बादशाहकी आज्ञानुसार इसी लीलावतीका अनुवाद फैजीने फारसीमें तथा सन् १८१६ इस्वीमें जे. टेलर ( J. Tayler ) साहबने और सन् १८१७ ई. में हेनरीटामस कोलब्रूक (Henry Thomas Colebrooke ) साहबने अंग्रेजीमें किया था। कोई २ ऐसा
भूमिका। ( ३ ) कहते हैं कि, भास्कराचार्य्यने अपनी पुत्री लीलावतीकी जन्मकुण्डलीमें बाल- विधवा योग देखकर उसका विवाह नहीं किया और संसारमें उसके नामकी प्रसिद्धि रहनेके लिये उसीके नामसे इस पाटीगणितको बनाया और कोई २ ऐसा भी कहते हैं कि, भास्कराचार्यके कोई सन्तान नहीं थी इस कारण सन्तानके बिना अतिदुःखित अपनी स्त्री लीलावतीका बहुत काल पर्य्यन्त संसारमें नाम रहनेके लिये उसके नामसे यह पाटी गणित रचना कियाथा परन्तु डॉक्टर भाऊदाजीको नाशिकक्षेत्रके समीप जो ताम्रपत्र मिलाहै उससे यह प्रतीत होता है कि भास्करा- चार्यके पुत्रपौत्रादि सब थे उस ताम्रपत्रकी नकल इतिहाससिकोंकी प्रसन्नताके अर्थ लिखते हैं । ताम्रपत्रकी नकल. १ नमो गणाधिपतये-सिद्धि-सुधाकरभूमि-स्य-दू-त्वसंरक्षणानिगगने- चरवास्तोतः । श्लोक-उद्भटबुद्धिर्भट्टे सांख्ये संख्यः स्वतन्त्रधीस्तन्त्रे ॥ वेदेऽनवद्यविद्योऽनलपः शिल्पादिषु कलासु ॥ १ ॥ स्वच्छन्दोऽथ च्छन्दसि शास्त्रे वैशेषिके विशेषज्ञः ॥ यः श्रीप्रभाकरसमः प्रभाकरदर्शने कविः काव्ये ॥ २ ॥ बहुगुणगणितप्रभृतिस्कन्धत्रितये त्रिनेत्रसमः ॥ विबुधाभिवन्दितपदो जयति श्रीभास्कराचार्य्यः ॥ ३ ॥ श्रीमद्यदुवंशाय स्वस्त्यस्तु समस्तवस्तुसहिताय ॥ विश्वं यत्र त्रातुं जातो विष्णुः स्वतन्त्रस्तु ॥ ४ ॥ गर्जद्गूर्जरकुञ्जरोत्कटघटासंघट्टकण्ठीरवो लाटोरस्ककपाटपाटनपटुः कर्णाटहृत्कण्टकः ॥ श्रीमान् भिल्लमभूपतिः समभवद्भूपालचूडामणि- स्त्रस्तात्तन्ध्रपुरन्ध्रिकान्तसुखहृच्छ्रीजैत्रपालोऽभवत् ॥ ५ ॥
(४) भूमिका । लक्ष्मीकान्तलवः प्रतारितभवः श्रीजैत्रपालोद्भवः सङ्ग्रामाङ्गणसञ्चितातिविभव शास्ता भुवः सिंघणः ॥ पृथ्वीशो मधुराधिपो रणमुखे काशीपतिः पातितो येनासावपि यस्य भृत्यबटुना हम्मीरवीरो जितः ॥ ६ ॥ अवततार पुरा पुरुषोत्तमो यदुकुले जगतीहितहेतवे ॥ जयति सोऽयमिमां सकलामिलामवति मामपि सिद्धमहीपतिः॥७॥ शाण्डिल्यवंशे कविचक्रवर्ती त्रिविक्रमोऽभूत्तनयोस्य जातः ॥ यो भोजराजेन कृताभिधानो विद्यापतिर्भास्करभट्टनामा ॥ ८ ॥ तस्माद्गोविन्दसर्वज्ञो जातो गोविन्दसन्निभः ॥ प्रभाकरः सुतस्तस्मात्प्रभाकर इवापरः ॥ ९ ॥ तस्मान्मनोरथो जातः सतां पूर्णमनोरथः । श्रीमान्महेश्वराचार्य्यस्ततोऽजनि कवीश्वरः ॥ १० ॥ तत्सूनुः कविवृन्दवन्दितपदः सद्द्वेदविद्यालता- कन्दः कंसरिपुप्रसादितपदः सर्वज्ञविप्रासदः ॥ यच्छिष्यैः सह कोऽपि नो विवदितुं दक्षो विवादी क्वचित् श्रीमान् भास्करकोविदः समभवत्सत्कीर्त्तिपुण्यान्वितः ॥ ११ ॥ लक्ष्मीधराख्योऽखिलसूरिमुख्यो वेदार्थवित्तार्किकचक्रवर्ती ॥ क्रतुक्रियाकाण्डविचारसारो विशारदो भास्करनन्दनोऽभूत् ॥ १२॥ सर्वशास्त्रार्थदक्षोयमिति मत्वा पुरादतः ॥ जैत्रपालेन यो नीतः कृतश्च विबुधाग्रणीः ॥ १३ ॥ श्लोकः- तस्मात्सुतः सिंघणचक्रवर्ती दैवज्ञवर्य्योऽजनि चङ्गदेवः ॥ श्रीभास्कराचार्य्यनिबद्धशास्त्रविस्तारहेतोः कुरुते मठं यः ॥ १४ ॥ भास्कररचितग्रन्थाः सिद्धान्तशिरोमणिप्रमुखाः ॥ तद्वंश्यकृताश्चान्ये व्याख्येया मन्मठे नियतम् ॥ १५ ॥
भूमिका । ( ६ ) श्रीसोन्हदेवेन मढाय दत्तं हेमादिना किञ्चिदिहापरैश्च ॥ भूम्यादि सर्वं परिपालनीयं भविष्यभूपैर्बहुपुण्यवृद्धयै ॥ १६ ॥ स्वस्ति श्रीशके ११२८ प्रभवनामसंवत्सरे श्रीश्रावणे मासे पौर्णमास्यां चन्द्रग्रह- णसमये श्रीसोन्हदेवेन सर्वजनसन्निधौ हस्तोदकपूर्वकं निजगुरुरचितमढायाग्रस्थानं दत्तं तद्यथा- इयां पाटणीं जे कणे उघटे तेहाचा जो सिन्दू जी राउला होता ग्रोहका प्रासीं तो मठा दिन्हला ब्राह्मणाजें दिकहे ब्रह्मोत्तरतं ब्राह्मणी दिन्हले ग्राहकापासि दाह्माचा वीसोवा असुपाठी गिधवग्राहकापासि । पत्र पोफासि ग्राहकापासि पहिवाहिले आधीं आदाणा चीलोमठा दिन्हला जेति घाणे वाहति तेतियां प्रतिपालि पलीत ठा जेम विजेने मंटीचे नमाय-नवावे मापा उगठा अर्द्ध अर्द्ध मापाचे हरिभूपाचे स्तक तथा भूमिः चतुराघाटविशुद्धः ३०६ ग्राम- वाले-कामतामध्यथाकल पण्डिता- कालतु-मीचउरा धामोजीची सोढीआ ॥ कोई ऐसा कहते हैं कि भास्कराचार्य अपने गुरुकुलमें पढतेथे तब इनके गुरुने इनकों सर्वशास्त्रप्रवीण रूपवानोंमें धुरीण और कुलीन देखकर अपनी कन्याके संग विवाह करनेको निश्चय किया था और कन्याकी भी इच्छा इनहीके सङ्ग विवाहकी थी, परन्तु विद्या पढनेके अनन्तर जब भास्कराचार्यने गृहको जानेका यत्न किया तब गुरुने अपनी कन्याके साथ विवाहके अर्थ कहा परन्तु भास्कराचार्यने गुरुपुत्री जान- कर विवाह न किया और अपने गृहको चले आये तब इनकी गुरुपुत्रीने अन्य पुरुष के साथ विवाह करना स्वीकार न किया और अपना समय बिताने लगी तब भास्क- राचार्यजीने संसारमें उसके नामकी प्रसिद्धि रहनेके निमित्त उसीके नामानुसार यह लीलावती ग्रन्थ निर्माण किया । यद्यपि इस प्रकार संसारमें किम्वदन्ती है और कारणवश भी ग्रन्थ बनाये जाते हैं, तथापि विद्वान पुरुषोंका स्वभाव ही लोकोप- कारक होता है ॥ पं०-रामस्वरूपशास्त्री-मुरादाबाद:
श्रीः । अथ लीलावतीस्थ विषयानुक्रमणिका ।
विषय | पृष्ठ. || विषय. | पृष्ठ. १ मंगलाचरण .... १ || २४ भिन्नगुणाकारकरणसूत्र.... ३५ २ परिभाषाप्रकरण .... २ || २५ भिन्नभागाकारकरणसूत्र.... ३६ ३ तौलकापरिमाण .... " || २६ भिन्नवर्गघनसूत्र.... ३७ ४ मार्गकापरिमाण .... ३ || २७ वर्गमूलतथाघनमूलकरणसूत्र- " ५ धान्यादिकोंकापरिमाण .... " || २८ शून्यपरिकर्माष्टक ... ३९ ६ कालकापरिमाण .... ४ || २९ व्यस्तविधिप्रकार .... ४१ ७ संज्ञाप्रकरण ... " || ३० इष्टकर्मप्रकार .... ४३ ८ तहाँ गणेशजीकोनमस्कार " || ३१ संक्रमणप्रकार .... ५३ ९ संख्यास्थानसंज्ञाकोष्ठक.... ५ || ३२ वर्गकर्मप्रकार .... ५४ १० परिकर्माष्टक .... " || ३३ गुणकर्मप्रकार .... ५९ ११ संकलितऔरव्यवकलितअर्थात् || ३४ त्रैराशिकविधि .... ६६ (जोड और वजाबाकी) " || ३५ व्यस्तत्रैराशिकप्रकार .... ६९ १२ गुणकारकरणसूत्र .... ७ || ३६ पंचराशिक .... ७१ १३ भागहारकरणसूत्र .... १२ || " सप्तराशिक .... ७६ १४ वर्गकरणसूत्र .... १४ || " नवराशिकादिक सूत्र .... ७८ १५ वर्गमूलकरणसूत्र .... १८ || ३७ भाण्डप्रतिभाण्डकविधि ८० १६ घनकरणसूत्र .... २१ || ३८ मिश्रप्रकरण .... ८१ १७ घनमूलकरणसूत्र .... २६ || ३९ मिश्रांतरप्रकारवर्णन .... ८२ १८ भिन्नपरिकर्माष्टक .... २७ || ४० वापीपूरणप्रकार.... ८५ १९ तहाँजातिचतुष्टय .... " || ४१ क्रयविक्रयविधि .... ८६ २० भागजातिकरणसूत्र .... २८ || ४२ रत्नमिश्रकरणप्रकार .... ९० २१ प्रभागजातिकरणसूत्र .... २९ || ४३ सुवर्णगणितप्रकार .... ९३ २२ भागानुबन्धऔरभागापवाह || ४४ सुवर्णवर्णज्ञानप्रकार .... ९५ करणसूत्र .... ३१ || ४५ सुवर्णज्ञानप्रकार ... ९६ २३ भिन्नसंकलितऔरव्यवकलित || ४६ अन्यप्रकारसेसुवर्णज्ञानविधि ९७ करणसूत्र .... ३४ || ४७ छंदश्चित्यादिकोंकाप्रकरण ९९
अनुक्रमणिका। (७)
| विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|
| ४८ श्रेढीव्यवहारविधि .... १०४ | |
| ४९ कृत्यादियोगविधि .... १०६ | |
| ५० उत्तरचयज्ञानप्रकार .... १०७ | |
| ५१ मुखज्ञान .... .... १०९ | |
| ५२ चयफलज्ञानप्रकार .... ११० | |
| ५३ समवृत्तज्ञानविधि .... ११४ | |
| ५४ क्षेत्रव्यवहार .... .... ११७ | |
| ५५ भुजकोटिकर्णज्ञान .... ,, | |
| ५६ अन्यप्रकारवर्णन .... ११९ | |
| ५७ आसन्नमूलजाननेका उपाय १२१ | |
| ५८ त्र्यस्रजातिवर्णन .... १२२ | |
| ५९ इष्टकर्णसे कोटिलानेकाप्र० १२५ | |
| ६० प्रकारांतर वर्णन .... १२७ | |
| ६१ इष्टसे भुजकोटिकर्णानयन | |
| विधि ... ... १२८ | |
| ६२ कर्णकोटिमें भुजज्ञान .... १३० | |
| ६३ भुजकर्णयोग और कोटिज्ञान १३२ | |
| ६४ भुजसे कोटि कर्णको | |
| पृथक् करनेका प्रकार .... १३३ | |
| ६५ कोटिके एक देशयुतकर्ण | |
| भुजकोटिकर्णको जानना १३५ | |
| ६६ भुजकोटियोग और | |
| कर्णको पृथक् करनेका प्रकार १३७ | |
| ६७ लंबावबाधाज्ञान .... १३८ | |
| ६८ क्षेत्रका लक्षण .... १४० | |
| ६९ अबाधा ज्ञान वर्णन .... १४२ | |
| ७० चतुर्भुज और त्रिभुज क्षेत्र | |
| में अस्पष्ट तथा स्पष्ट फल- | |
| का लाना .... १४४ | |
| ७१ स्थूलपनानिरूपण .... १४७ |
| विषय. | पृष्ठ. |
|---|---|
| [R1] ७२ तहां विशेष विधिका वर्णन ,, | |
| [R2] ७३ समान चतुर्भुज क्षेत्र और | |
| [R3] आयत क्षेत्रमें फलका लाना १४८ | |
| [R4] ७४ फल लंब और कर्ण ज्ञान १५४ | |
| [R5] ७५ लंबका ज्ञान .... १५५ | |
| [R6] ७६ कर्णका ज्ञान .... १५६ | |
| [R7] ७७ कर्ण ज्ञानका अन्य प्रकार ,, | |
| [R8] ७८ कर्णमें इष्ट कल्पनाका | |
| [R9] निःशेष कथन .... १५७ | |
| [R10] ७९ विषम चतुर्भुज फलानयन १६० | |
| [R11] ८० समान लंब क्षेत्रकी | |
| [R12] आबाधाका ज्ञान .... १६१ | |
| [R13] ८१ समानलंब क्षेत्रमें लघुप्रक्रिया १६७ | |
| [R14] ८२ सूचीक्षेत्र वर्णन .... १७१ | |
| [R15] ८३ संधिआदिका लाना .... १७२ | |
| [R16] ८४ कर्णोंके योगमें अधोलंब | |
| [R17] का ज्ञान वर्णन .... १७४ | |
| [R18] ८५ सूचीके आबाधालंबका ज्ञान १७६ | |
| [R19] ८६ भुजका ज्ञान .... ,, | |
| [R20] ८७ वृत्तक्षेत्र .... १७९ | |
| [R21] ८८ वृत्त दो गोलोंके फलका | |
| [R22] लाना .... १८१ | |
| [R23] ८९ अन्यप्रकार .... १८३ | |
| [R24] ९० शर और जीवाका लाना १८४ | |
| [R25] ९१ वृत्तके भीतर समात्रिकोणा- | |
| [R26] द्विनवकोणपर्यंत क्षेत्रोंकेभुजा- | |
| [R27] ओंलानेका प्रकार .... १८६ | |
| [R28] ९२ स्थूल जीवामें लघु | |
| [R29] क्रिया .... १९१ | |
| [R30] ९३ धनुषका आनयन विधि १९३ |
( ८ ) अनुक्रमणिका ।
| विषय. पृष्ठ. | विषय. पृष्ठ. |
|---|---|
| ९४ खातव्यवहार .... १९६ | १०८ शंकु और भूमिके अंदरकी भूमिका ज्ञान .... २१५ |
| ९५ खातमें लंबाई और चौडाईका ज्ञानवर्णन .... ,, | १०९ छाया और दीपकी उंचाईका ज्ञान .... २१६ |
| ९६ अन्यप्रकारसे खातका प्रकार वर्णन .... १९८ | ११० सब ही भेद त्रैराशिकसे आतेहैं यह वर्णन .... २१८ |
| ९७ चिति व्यवहार वर्णन (चिनाईका क्षेत्रफललानेका प्रकार) .... २०१ | १११ कुट्टकव्यवहार .... २२० |
| ११२ कुट्टकमें अन्यप्रकार वर्णन २२३ | |
| ९८ क्रकचव्यवहार .... २०३ | ११३ तृतीयप्रकारसे कुट्टकविधि वर्णन २२६ |
| ९९ लकडीके चीरनेका प्रकार .... ,, | ११४ अन्यप्रकारसे कुट्टकविधि २२८ |
| १०० प्रकारांतर .... २०४ | ११५ अन्यप्रकार .... २३१ |
| १०१ राशिव्यवहारवर्णन ... २०५ | ११६ स्थिरकुट्टककथन .... २३३ |
| १०२ धान्य राशियोंके व्यवहारका प्रकार २०६ | ११७ कुट्टकका उपयोगवर्णन २३४ |
| १०३ भीतके अंदर और बाहेर लगेहुए धान्य राशिके लानेका प्रकार वर्णन .... २०८ | ११८ संश्लिष्टकुट्टक .... २३६ |
| ११९ अंकपाश प्रकारवणन २३७ | |
| १०४ छायाव्यवहारकथन .... २१२ | १२० अंकोंसे संस्थाभेदका लाना ,, |
| १०५ दो छायाँका अन्तर लानेका प्रकार .... २१३ | १२१ अंकपाशमें विशेषविधि २४० |
| १२२ अनियत और अतुल्यअंकोंमें भेदका लाना .... २४२ | |
| १०६ छायांतरलानेका दूसरा प्रकार .... .... ,, | १२३ अन्यप्रकारसे अंकपाशविधि २४३ |
| १२४ अंकपाशमें स्वानुभव .... ,, | |
| १०७ दीपककी उँचाईका लाना २१४ | १२५ ग्रंथप्रशंसा .... २४४ |
| १२६ ग्रंथकारकी प्रशंसा २४५ | |
| इति लीलावतीस्थविषयानुक्रमणिका समाप्ता । |
श्रीः। लीलावती। सान्वय-भाषाटीकासमेत. ➖➖➖💠➖➖➖ प्रीतिं भक्तजनस्य यो जनयते विघ्नं विनिघ्नन्स्मृत- स्तं वृन्दारकवृन्दवंदितपदं नत्वा मतंगाननम् ॥ पाटीं सद्गणितस्य वच्मि चतुरप्रीतिप्रदां प्रस्फुटां संक्षिप्ताक्षरकोमलामलपदैर्लालित्यलीलावतीम् ॥ १ ॥ व्याख्या-मंगलादीनि मंगलमध्यानि मंगलान्तानि च शास्त्राणि प्रथन्ते वीर- पुरुषकाणि च भवंति तदध्येतार इत्यनादिपरम्पराप्राप्तं नत्यात्मकं मंगलं ग्रंथादौ निबध्नाति प्रीतिमिति-यः स्मृतः सन् विघ्नमारभ्यमाणकर्मप्रतिबंधकीभूतं दुरितं विनिघ्नन् एकांतात्यन्ततो दूरीकुर्वन् भक्तजनस्य स्वास्मिन्प्रासितस्वान्तस्य पुरुषस्य प्रीतिं जनयते । तं वृंदारकवृंदवादितपदं वृंदारकाणां दैवतानां वृंदैर्वन्दिते पदे चरणकमले यस्य तं मतंगाननं मतंगस्य मत्तेभस्यैवाननं यस्य तं श्रीगणेशं नत्वा कायवाङ्मनोभिर्नमस्कृत्येत्यर्थः ॥ अहं भास्कराचार्यः प्रस्फुटां स्फुटतरां चतुर- प्रीतिप्रदां चतुराणां प्राप्तव्याकृत्यादिशास्त्रजन्यबुद्धिप्रकर्षाणां प्रीतिं मनस्तोषं प्रददा- तीति तां संक्षिप्ताक्षरकोमलामलपदैः संक्षिप्तानि बह्वर्थप्रतिपादकानि कोमलानि- अमलानि च तानि पदानि तैः । लालित्यलीलावतीम् ललितस्य भावो लालित्यं तस्य लीला यस्यां ताम् सद्गणितस्य सद्भिः प्राज्ञ्भिः प्रतिपादितस्य गणितस्य पाटीं पाटीगणितमित्यर्थः । वच्मि प्रकटीकरोमि । रामपक्षे तु-विं जटायुषं हंतीति विघ्नो रावणः तं मतंगस्याननमिव महदानन यस्य तं कुंभकर्ण च विनिघ्नन्यः भक्त जनस्य विभीषणस्य प्रीतिं जनयते तं जानकीजानिं नत्वेत्यन्यत्पूर्ववत् ॥ कृष्णपक्षे तु-विघ्नं विघ्नस्वरूपं मतङ्गाननं मतंगेषु आननं मुख्यं कुवलयापीडं विनिघ्नन् यः भक्तजनस्योग्रसेनस्य प्रीतिं जनयते तं नंदनंदनं नत्वेत्यन्यत्पूर्ववत् ॥ १ ॥ अन्वयः- यः स्मृतः सन् विघ्नं विनिघ्नन् भक्तजनस्य प्रीतिं जनयते तम् वृंदारकवृंदवंदितपदं मतंगाननं नत्वा अहं प्रस्फुटां चतुरप्रीतिप्रदां संक्षिप्ताक्षरकोम- लामलपदैः लालित्यलीलावतीं सद्गणितस्य पाटीं वच्मि ॥ १ ॥
(२) लीलावती । अर्थः-जो स्मरण करते ही विघ्नोंको नाश करके अपने भक्तोंकी प्रीतिको उत्पन्न करते हैं; देवताओंके समूहों करके अभिवादन किये गये हैं चरण जिनके; उन ऐसे हस्तीका ही मुखवाले श्रीगणेशजीको नमस्कार करके मैं भास्कराचार्य अत्यन्त स्फुट गणित आदि शास्त्रके जाननेवाले पुरुषोंको प्रसन्नता देनेवाली, बहुत अर्थ- प्रतिपादक थोडे अक्षर और शुद्धपदोंके सौंदर्य्यसे भरी हुई लीलावती नामवाली गणितकी पाटीको प्रकाशित करता हूं ॥ १ ॥ वराटकानां दशकद्वयं यत्सा काकिणी ताश्च पणश्चतस्रः ॥ ते षोडश द्रम्म इहावगम्यो द्रम्मैस्तथा षोडशभिश्च निष्कः ॥२॥ अन्वयः-यत् वराटकानां दशकद्वयं सा काकिणी । ताः च चतस्रः पणः । ते षोडश द्रम्मः । तथा इह षोडशभिः द्रम्मैः निष्कः अवगम्यः ॥ २ ॥ अर्थः-बीस २० वराटक (कौडी) को १ काकिणी कहते हैं, तिन ४ चार काकिणियोंका एक पण होता है, तिन हीं १६ सोलह पणोंका एक द्रम्म होता है तथा इस गणितशास्त्रमें १६ सोलह द्रम्मका एक निष्क होता है ॥ २ ॥ तुल्या यवाभ्यां कथितात्र गुञ्जा वल्लस्त्रिगुञ्जो धरणं च तेऽष्टौ ॥ गद्याणकस्तद्वयमिंद्रतुल्यै १४र्वल्लैस्तथैको घटकः प्रदिष्टः ॥ ३ ॥ अन्वयः-अत्र यवाभ्यां तुल्या गुंजा कथिता । त्रिगुंजः वल्लः कथितः । ते अष्टौ च धरणं कथितम् । तद्वयं गद्याणकः कथितः । तथा इंद्रतुल्यैः वल्लैः एकः घटकः प्रदिष्टः ॥ ३ ॥ अर्थः-इस गणितशास्त्रमें दो २ यव (जौ) के समान एक १ गुंजा (रत्ती) होती है, ३ रत्तीका १ एक वल्ल होता है, ८ आठ वल्लका १ धरण होता है, २ दो धरणका एक गद्याणक कहाता है, १४ चौदह वल्लका १ घटक कहाता है ॥ ३ ॥ दशार्द्धगुंजं प्रवदंति माषं माषाह्वयैः षोडशभिश्च कर्षम् ॥ कर्षैश्चतुर्भिश्च पलं तुलाज्ञाः कर्षं सुवर्णस्य सुवर्णसंज्ञम् ॥ ४॥ अन्वयः-तुलाज्ञाः दशार्द्धगुंजं माषम् प्रवदंति । माषाह्वयैः षोडशभिः च कर्ष प्रवदन्ति । चतुर्भिः कर्षैः च पलं प्रवदंति । सुवर्णस्य कर्ष सुवर्णसंज्ञं प्रवदंति ॥ ४ ॥ अर्थः-तोलके जाननेवाले ५ पांच रत्तीका १ एक माषा कहते हैं, १६ सोलह माषोंका १ कर्ष कहते हैं, ४ कर्षका १ एक पल कहते हैं और कर्षभर सुवर्णको सुवर्ण ही कहते हैं ॥ ४ ॥
परिभाषाप्रकरणम् । ( ३ ) यवोदरैरंगुलमष्टसंख्यैर्हस्तोऽगुलैः षड्गुणितैश्चतुर्भिः ॥ हस्तैश्चतुर्भिर्भवतीह दंडः क्रोशः सहस्रद्वितयेन तेषाम् ॥ ५ ॥ अन्वयः-अष्टसंख्यैः यवोदरैः अंगुलं भवति । षड्गुणितः चतुर्भिः अंगुलैः हस्तः भवति । इह चतुर्भिः हस्तैः दंडः भवति । तेषाम् सहस्रद्वितयेन क्रोशः भवति ॥ ५ ॥ अर्थः-इस गणितशास्त्रमें पेट मिलाकर आठ ८ यवोंके मापका एक अंगुल होता है, २४ चौबीस अंगुलोंका १ एक हाथ होता है, ४ हाथका १ एक दण्ड होता है और २००० दो हजार दण्डका १ क्रोश होता है ॥ ५ ॥ स्याद्योजनं क्रोशचतुष्टयेन तथा कराणां दशकेन वंशः॥ निवर्तनं विंशतिवंशसंख्यैः क्षेत्रं चतुर्भिश्च भुजैर्निबद्धम् ॥६॥ अन्वयः-क्रोशचतुष्टयेन योजनं स्यात् तथा कराणां दशकेन वंशः स्यात् । विंश- तिवंशसंख्यैः चतुर्भिः भुजैः निबद्धं क्षेत्रं निवर्तनं स्यात् ॥ ६ ॥ अर्थः-चार क्रोशका १ योजन होता है और १० दस हाथका १ एक वंश, बीस वंशका लंबा चौडा चौकोर क्षेत्र निवर्तन कहाता है ॥ ६ ॥ हस्तोन्मितैर्विस्तृतिदैर्घ्यपिंडैर्द्वादशास्रं घनहस्तसंज्ञम् ॥ धान्यादिके यद्धनहस्तमानं शास्त्रोदिता मागधखारिका सा॥७॥ अन्वयः-हस्तोन्मितैः विस्तृतिदैर्घ्यपिंडैः यत् द्वादशास्रं तत् घनहस्तसंज्ञम् । धान्यादिके यत् घनहस्तमानं सा शास्त्रोदिता मागधखारिका ॥ ७ ॥ अर्थः-१ एक हाथ चौडा और १ एक ही हाथ लंबा और १ एक ही हाथ गहरा जो १२ बारह कोणका गढा है उसको घनहस्त कहते हैं, धान्यादिके तोलनेमें जो घनहस्तकी तोल है उसको शास्त्रमें मगध देशकी खारी कहते हैं ॥ ७ ॥ द्रोणस्तु खार्याः खलु षोडशांशः स्यादाढको द्रोणचतुर्थभागः ॥ प्रस्थश्चतुर्थांश इहाढकस्य प्रस्थांघ्रिराद्यैः कुडवः प्रदिष्टः ॥ ८ ॥ अन्वयः-खलु खार्याः षोडशांशः तु द्रोणः स्यात् । द्रोणचतुर्थभागः आढकः स्यात् । इह आढकस्य चतुर्थांशः प्रस्थः प्रदिष्टः । आद्यैः प्रस्थांघ्रिः कुडवः प्रदिष्टः ॥ ८ ॥ अर्थः-ऊपर कही हुई खारीका १६ सोलहवाँ भाग द्रोण कहाता है और द्रोणका ४ चौथा भाग आढक कहाता है और इस गणितशास्त्रमें आढकका ४ चौथा भाग प्रस्थ, प्रस्थका ४ चौथा भाग कुडव कहाता है ॥ ८ ॥
(४) लीलावती। अथ क्षेपकम्- पादोनगद्याणकतुल्यटंकैर्द्विसप्ततुल्यैः कथितोऽत्र सेरः ॥ मणाभिधानं खयुगैश्च सेरैर्धान्यादितौल्येषु तुरुष्कसंज्ञा ॥ १ ॥ अन्वयः-पादोनगद्याणकतुल्यटंकैः द्विसप्ततुल्यैः अत्र धान्यादितौल्येषु सेरः कथितः। खयुगैः सेरैः मणाभिधानं कथितम्। एषा तुरुष्कसंज्ञा ॥ १ ॥ अर्थः-पौनेगद्याणक अर्थात् ३६ छत्तीस रत्ती (गुञ्जा) का एक १ टंक होता है और ७२ बहत्तर टंकका धान्यादिकी तोलमें १ सेर होता है और ४० चालीस सेरका १ मण होता है, यह यवनोंकी करी हुई संज्ञा है ॥ १ ॥ द्व्यंकेंदुसंख्यैर्धटकैश्च सेरस्तैः पंचभिः स्याद्धटिका च ताभिः ॥ मणोऽष्टभिस्त्वालमगीरशाहकृतात्र संज्ञा निजराज्यपूर्षु ॥ २ ॥ अन्वयः-अत्र निजराज्यपूर्षु आलमगीरशाहकृता संज्ञा। एषा द्व्यङ्केन्दुसंख्यैः धटकैः सेरः स्यात्। पञ्चभिः सेरैः धटिका स्यात् । ताभिः अष्टभिः मणः स्यात् ॥ २ ॥ अर्थः-आलमगीरबादशाहके समय राज्यमें प्रचलित तोलमें १९२ एकसौ बानवे धटकका १ एक सेर और ५ पांच सेरकी १ एक धडी; ८ आठ धडी का १ एक मण होता था, यह संज्ञा अब भी मध्यदेशमें प्रचलित है ॥ २ ॥ शेषाः कालादिपरिभाषा लोकतः प्रसिद्धा ज्ञेयाः ॥ अर्थः-बाकी काल आदिकी परिभाषा लोकसे प्रसिद्ध जानना. जैसे-६० साठ सेकंडका १ मिनट. ६० मिनटका १ घंटा. २४ चौबीस घंटका एक १ दिन रात. १५ पंद्रह दिनरातका १ एक पक्ष. २ पक्षका १ एक महीना. १२ बारह महीनोंका एक वर्ष. साठ ६० पलकी १ घडी. २॥ ढाई घडीका १ घण्टा. १२ बारह घंटेका १ दिन. ७ सात दिनका १ एक सप्ताह. इत्यादि ॥ इति परिभाषा । लीलाललुलल्लोलकालव्यालविलासिने ॥ गणेशाय नमो नीलकमलामलकान्तये ॥ १ ॥ अन्वयः-लीलागललुलल्लोलकालव्यालविलासिने नीलकमलामलकान्तये गणेशाय नमः ॥ १ ॥ अर्थः-लीलाकरके गलेमें लटकते हुए चंचल सर्पसे क्रीडा करनेवाले, चिकणनील- कांतिवाले गणेशजीको नमस्कार है ॥ १ ॥
परिकर्माष्टकम् । (५) एकदशशतसहस्रायुतलक्षप्रयुतकोटयः क्रमशः ॥ अर्बुदमब्जं खर्वनिखर्वमहापद्मशंकवस्तस्मात् ॥ २ ॥ जलधिश्चान्त्यं मध्यं परार्धमिति दशगुणोत्तराः संज्ञाः ॥ संख्यायाः स्थानानां व्यवहारार्थं कृताः पूर्वैः ॥ ३ ॥ अन्वयः--एकदशशतसहस्रायुतलक्षप्रयुतकोटयः । अर्बुदम् । अब्जम् खर्व निखर्वमहापद्मशंकवः। तस्मात् जलधिः। तस्मात् अन्त्यम् । तस्मात् मध्यम् । तस्मात् परार्द्धम् । इति संख्यायाः स्थानानां व्यवहारार्थं पूर्वैः क्रमशः दशगुणोत्तराः संज्ञाः कृताः ॥ २ ॥ ३ ॥ अर्थः--एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, महापद्म, शंकु, जलधि, अंत्य, मध्य, परार्द्ध इस प्रकार पूर्वाचार्योने संख्याके व्यवहारके वास्ते पूर्वपूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दशगुणी संज्ञा कही है। जैसे-एकसे दश गुणा दश, दशसे दशगुणा शत; शतसे दशगुणा सहस्र इत्यादि ॥ २ ॥ ३ ॥ अथ संकलितव्यवकलितयोः करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- अब जोड और घटाव करनेकी रीति आधे श्लोकसे कहते हैं- (सूत्रम् १)कार्यः क्रमादुत्क्रमतोऽथवांकयोगो यथास्थानकमंतरं वा॥ अन्वयः-क्रमात् अथवा उत्क्रमतः यथास्थानकम् योगः कार्यः वा अन्तरम् कार्यम् ॥ अर्थः-क्रमकी रीतिसे अथवा उत्क्रमकी रीतिसे यथास्थानमें अर्थात् एकस्थानी अङ्कमें; एकस्थानी अङ्कका दशस्थानी अङ्कमें, दशस्थानी अङ्कका शतस्थानी अङ्कमें, शतस्थानी अंकका जोड अथवा घटाव करना॥ अत्रोद्देशकः-जोडके विषयमें अथवा घटावके विषयमें उदाहरण- अये बाले लीलावति मतिमति ब्रूहि सहितान् द्विपंचद्वात्रिंशत्त्रिनवतिशताऽष्टादशदश ॥ शतोपेतानेतानयुतवियुतांश्चापि वद मे यदि व्यक्ते युक्तिव्यवकलनमार्गेऽसि कुशला ॥ १ ॥ अन्वयः--अये बाले मतिमति लीलावति ! यदि व्यक्ते युक्तिव्यवकलनमार्गे कुशला असि तदा मे द्विपंचद्वात्रिंशत्त्रिनवतिशताष्टादशदश शतोपेतान् एतान् सहितान् ब्रूहि अयुतवियुतान् च अपि वद ॥ १ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
( ६ ) लीलावती । अर्थः-हे सोलहवर्षकी उमरवाली बुद्धिका गर्व रखनेवाली लीलावति ! जो पाटी गणितमें जोड और घटावमें चतुर हो तो यह मुझको बताओ कि, २ दो, ५ पांच, ३२ बत्तीस, १९३ एकसौ तिरानवे, १८ अठारह, १० दस और १०० सौ यह सब जोडनेसे कितने होते हैं ? और सबको १०००० दश हजारमें घटानेसे कितने बाकी रहते हैं ? ॥ १ ॥ न्यासः-२ । ५ । ३२ । १९३ । १८ । १० । १०० संयोजनाज्जातम् ३६० । फैलाव-पूर्वोक्त नियमानुसार क्रमकी रीतिसे पहले एक स्थानी सब अंकोंको २ | जोडा तब अर्थात् २ दो और ५ पांच ७ सात और २ दो ९ नौ और ५ | ३ तीन १२ बारह और ८ आठ २० बीस हुए. इस बीसमें एकस्थानी ३२ | अंक ० शून्यको एकस्थान अर्थात् एकस्थानी अंकोंके नीचे रक्खा फिर १९३ | दशस्थानी शेष २ दोको स्मरण रक्खा और दशस्थानी अंकोंको जोडा १८ | अर्थात् ३ तीन और ९ नौ १२ बारह और १ एक १३ तेरह और १ एक १० | १४ चौदह हुए. इनमें पहले दशस्थानी २ दोको जोडा तब १६ सोलह १०० | हुए इसमेंसे ६छ को पहले स्थापित किये शून्यके वामभागमें दशस्थानी ३६० | अंकोंके नीचे रक्खा तब (६०) हुआ, १६ सोलहमेंसे शेष १ एकको स्मरण रक्खा और शतस्थानी अंकोंको गिना अर्थात् एक १ और १ दो २ हुए. इसमें पहला १ जोड दिया, तब तीन ३ हुए; इनको छके वाम भागमें शतस्थानी अंकके नीचे रक्खा, तब ३६० ऐसा हुआ. अर्थात् ३६० तीनसौ साठ जोड हुआ; इसी प्रकारसे अन्यत्र भी जोड लेना. अयुता १०००० च्छोधिते जातम् ९६४० । ९९१० फैलाव-१०००० पूर्वोक्त नियमानुसार घटाव किया अर्थात् एक स्थानी ३६० शून्यमें एकस्थानी शून्यको घटाया तो शून्य ही शेष रहा. उस ९६४० को एकस्थानी अङ्कके नीचे रक्खा, तदनंतर दशस्थानी अङ्क भी शून्य है. उसमें दशस्थानी ६ का घटाव नहीं हो सका; इस कारणसे शतस्थानी अङ्कमेंसे एक शत लेलिया जाता; सो यहां तौ शतस्थानी और सहस्रस्थानी भी शून्य है इस कारण अयुतस्थानी अङ्कमेंसे एक अयुत लिया; उसके दश सहस्र करे नौ ९ सहस्र स्थानमें रखदिये और १ एक सहस्रके दश शत करे जिसमें नौ ९ शत शतस्थानमें रक्खे और एक शतके दशदश किये तिसमें ६ छ दशस्थानी घटाया
गुणनप्रकारः। (७) तो शेष ४ चार रहे उनको पूर्व रक्खे हुए ० शून्यके वामभागमें दशस्थानी अङ्कके नीचे रक्खा; फिर शतस्थानी नौ ९ में से ३ को घटाया तो शेष ६ रहे, उनको ४ के वामभागमें शतस्थानमें रक्खा; फिर शेष करनेको कोई अंक नहीं रहा; तब ऊपरके अंकोंको घटाये हुए अंकोंके वामभागमें यथास्थानमें रक्खा अर्थात् सहस्र स्थानीको सहस्र स्थानमें रक्खा; तब दशहजारमेंसे ३६० तीनसौ साठ घटानेसे ९६४० नौ हजार छः सौ चालीस शेष रहता है; इसी प्रकार अन्यत्र भी जानना ॥ इति संकलितव्यवकलिते ॥ अथ गुणने करणसूत्रं सार्द्धवृत्तद्वयम्- अब गुणा करनेकी रीति ढाई श्लोकसे कहते हैं. यह गुणा ५ पांच प्रकारका होता है, १ रूपगुणा, २ स्थानगुणा, ३ विभागगुणा, ४ खण्डगुणा, ५ इष्टगुणा. जिससे गुणा किया जाता है वह गुणक कहाता है और जिसको गुणा किया जाता है वह गुण्य कहाता है. (सूत्रम् २) गुण्यान्त्यमंकं गुणकेन हन्या- दुत्सारितेनैवमुपान्त्यमादीन् ॥ ४ ॥ अन्वयः-गुण्यान्त्यम् अंकं गुणकेन हन्यात् । एवम् उत्सारितेन गुणकेन उपान्त्यं हन्यात् । एवम् आदीन् हन्यात् ॥ ४ ॥ अर्थः-गुण्यके अंतके अङ्कको गुणकसे गुणै; फिर उसके समीपके अङ्कको उसी गुणकको उठाकर उससे गुणै. इसी प्रकार उसी गुणकसे आदिके जितने अङ्क हैं सबको क्रमसे गुणै; यह गुणकका जैसा रूप होता है, उससे ही गुणा किया जाता है, इस कारण रूपगुणा कहाता है ॥ ४ ॥ अत्रोद्देशकः-गुणा करनेके विषयमें उदाहरण- बाले बालकुरंगलोलनयने लीलावति प्रोच्यताम् पञ्चत्र्येकमिता दिवाकरगुणा अंकाः कति स्युर्यदि ॥ रूपस्थानविभागखण्डगुणने कल्पास कल्याणिनि छिन्नास्तेन गुणेन ते च गुणिता अंकाः कति स्युर्वद ॥ २ ॥ अन्वयः-हे बाले ! बालकुरंगलोलनयने ! लीलावति ! कल्याणिनि ! यदि रूप- स्थानविभागखण्डगुणने कल्पासि तर्हि पञ्चत्र्येकमिताः अंकाः दिवाकरगुणाः कति स्युः इति प्रोच्यताम् । अथ च ते गुणिताः जाताः तेन गुणेन छिन्नाः कति स्युः । इति च वद ॥ २ ॥