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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

भीष्मेण समरे गुप्तां प्रविवेश महाचमूम् ॥ ९ ॥ दुःशासन, दुर्विषह, दुःसह, दुर्मद, जय, जयत्सेन, विकर्ण, चित्रसेन, सुदर्शन, चारुचित्र, सुवर्मा, दुष्कर्ण तथा कर्ण—ये तथा और भी बहुत-से आपके जो महारथी पुत्र समीप खड़े थे, उन्हें कुपित देखकर महारथी भीमसेनने समरभूमिमें भीष्मके द्वारा सुरक्षित विशाल कौरवसेनामें प्रवेश किया ॥ ७—९ ॥

अथालोक्य प्रविष्टं तमूचुस्ते सर्व एव तु । जीवग्राहं निगृह्णीमो वयमेनं नराधिपाः ॥ १० ॥ भीमसेनको सेनाके भीतर प्रविष्ट हुआ देख उन सब नरेशोंने आपसमें कहा कि हमलोग इन्हें जीवित ही पकड़ कर बंदी बना लें ॥ १० ॥

स तैः परिवृतः पार्थो भ्रातृभिः कृतनिश्चयैः । प्रजासंहरणे सूर्यः क्रूरैरिव महाग्रहैः ॥ ११ ॥ ऐसा निश्चय करके उन सब भाइयोंने कुन्ती-कुमार भीमसेनको घेर लिया, मानो प्रजाके संहारकालमें सूर्यदेवको बड़े-बड़े क्रूर ग्रहोंने घेर रखा हो ॥ ११ ॥

सम्प्राप्य मध्यं सैन्यस्य न भीः पाण्डवमाविशत् । यथा देवासुरे युद्धे महेन्द्रं प्राप्य दानवान् ॥ १२ ॥ कौरवसेनाके भीतर पहुँच जानेपर भी पाण्डुनन्दन भीमसेनको तनिक भी भय नहीं हुआ, जैसे देवासुर-संग्राममें दानवोंकी सेनामें घुसनेपर देवराज इन्द्रको भयका स्पर्श नहीं होता है ॥ १२ ॥

ततः शतसहस्राणि रथिनां सर्वशः प्रभो । उद्यतानि शरैस्तीव्रैस्तमेकं परिवव्रिरे ॥ १३ ॥ प्रभो! तदनन्तर एकमात्र भीमसेनको उनपर तीव्र बाणोंकी वर्षा करते हुए सैकड़ों-हजारों रथियोंने युद्धके लिये उद्यत होकर सब ओरसे घेर लिया ॥ १३ ॥

स तेषां प्रवरान् योधान् हस्त्यश्वरथसादिनः । जघान समरे शूरो धार्तराष्ट्रानचिन्तयन् ॥ १४ ॥ शूरवीर भीमसेन आपके पुत्रोंकी तनिक भी परवा न करते हुए हाथी, घोड़े एवं रथपर बैठकर युद्ध करनेवाले कौरवोंके मुख्य-मुख्य योद्धाओंको समर-भूमिमें मारने लगे ॥ १४ ॥

तेषां व्यवसितं ज्ञात्वा भीमसेनो जिघृक्षताम् । समस्तानां वधे राजन् मतिं चक्रे महामनाः ॥ १५ ॥ राजन्! उन्हें कैद करनेकी इच्छावाले क्षत्रियोंके उस निश्चयको जानकर महामना भीमसेनने उन सबके वधका विचार कर लिया ॥ १५ ॥

ततो रथं समुत्सृज्य गदामादाय पाण्डवः । जघान धार्तराष्ट्राणां तं बलौघं महार्णवम् ॥ १६ ॥

तदनन्तर पाण्डुनन्दन भीमसेन हाथमें गदा ले रथको त्यागकर उस विशाल सेनामें घुसकर उस महासागरतुल्य सैन्यसमुदायका विनाश करने लगे ॥ १६ ॥ (गदया भीमसेनेन ताडिता वारणोत्तमाः । भिन्नकुम्भा महाकाया भिन्नपृष्ठास्तथैव च ॥ भिन्नगात्राः सहारोहाः शेरते पर्वता इव । भीमसेनकी गदाके आघातसे बड़े-बड़े विशालकाय गजराजोंके कुम्भस्थल फट गये, पृष्ठभाग विदीर्ण हो गये तथा उनका एक-एक अंग छिन्न-भिन्न हो गया और उसी अवस्थामें वे सवारोंसहित धराशायी हो गये, मानो पर्वत ढह गये हों। रथाश्च भग्नास्तिलशः सयोधाः शतशो रणे ॥ अश्वाश्च सादिनश्चैव पदातैः सह भारत । भारत! उन्होंने उस रणक्षेत्रमें सैकड़ों रथोंको उनके सवारोंसहित तिल-तिल करके तोड़ डाला। घोड़ों, घुड़सवारों तथा पैदलोंकी भी धज्जियाँ उड़ा दीं। तत्राद्भुतमपश्याम भीमसेनस्य विक्रमम् ॥ यदेकः समरे राजन् बहुभिः समयोधयत् । अन्तकाले प्रजाः सर्वा दण्डपाणिरिवान्तकः ॥) राजन्! उस युद्धमें हमलोगोंने भीमसेनका अद्भुत पराक्रम देखा, जैसे प्रलयकालमें यमराज हाथमें दण्ड लिये समस्त प्रजाका संहार करते हैं, उसी प्रकार वे अकेले आपके बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ युद्ध कर रहे थे। भीमसेने प्रविष्टे तु धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः । द्रोणमुत्सृज्य तरसा प्रययौ यत्र सौबलः ॥ १७ ॥ भीमसेनके कौरवसेनामें प्रवेश करनेपर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न भी द्रोणाचार्यको छोड़कर बड़े वेगसे उस स्थानपर गये, जहाँ शकुनि युद्ध कर रहा था ॥ १७ ॥ निवार्य महतीं सेनां तावकानां नरर्षभः । आससाद रथं शून्यं भीमसेनस्य संयुगे ॥ १८ ॥ वहाँ आपकी विशाल सेनाको आगे बढ़नेसे रोककर नरश्रेष्ठ धृष्टद्युम्न युद्धस्थलमें भीमसेनके सूने रथके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥ दृष्ट्वा विशोकं समरे भीमसेनस्य सारथिम् । धृष्टद्युम्नो महाराज दुर्मना गतचेतनः ॥ १९ ॥ महाराज! भीमसेनके सारथि विशोकको समर-भूमिमें अकेला खड़ा देख धृष्टद्युम्न मन-ही-मन बहुत दुःखी और अचेत हो गये ॥ १९ ॥ अपृच्छद् बाष्पसंरुद्धो निःश्वसन् वाचमीरयन् । मम प्राणैः प्रियतमः क्व भीम इति दुःखितः ॥ २० ॥

वे लंबी साँस खींचते और आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठसे पूछने लगे—‘विशोक! मेरे प्राणोंसे भी अधिक प्यारे भीमसेन कहाँ हैं?’ इतना कहते-कहते वे बहुत दुःखी हो गये॥ २०॥

विशोकस्तमुवाचेदं धृष्टद्युम्नं कृताञ्जलिः।
संस्थाप्य मामिह बली पाण्डवेयः पराक्रमी॥ २१॥
प्रविष्टो धार्तराष्ट्राणामेतद् बलमहार्णवम्।
तब विशोकने हाथ जोड़कर धृष्टद्युम्नसे कहा—'प्रभो! पराक्रमी और बलवान् पाण्डुनन्दन मुझे यहीं खड़ा करके कौरवोंके इस सैन्यसागरमें घुस गये हैं॥

मामुक्त्वा पुरुषव्याघ्रः प्रीतियुक्तमिदं वचः॥ २२॥
प्रतिपालय मां सूत नियम्याश्वांन् मुहूर्तकम्।
यावदेतान् निहन्म्यद्य य इमे मद्वधोद्यताः॥ २३॥
‘जाते समय पुरुषसिंह भीमसेनने मुझसे प्रेमपूर्वक यह बात कही कि सूत! तुम दो घड़ीतक इन घोड़ोंको रोककर यहीं मेरी प्रतीक्षा करो। जबतक कि ये जो लोग मेरा वध करनेके लिये उद्यत हैं, इन्हें अभी मार न डालूँ॥ २२-२३॥

ततो दृष्ट्वा प्रधावन्तं गदाहस्तं महाबलम्।
सर्वेषामेव सैन्यानां संहर्षः समजायत॥ २४॥
‘तदनन्तर गदा हाथमें लिये महाबली भीमसेनको धावा करते देख समस्त सैनिकोंके रोंगटे खड़े हो गये॥

तस्मिन् सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके।
भित्त्वा राजन् महाव्यूहं प्रविवेश वृकोदरः॥ २५॥
‘राजन्! उस भयंकर एवं तुमुल युद्धमें भीमसेनने इस महाव्यूहका भेदन करके इसके भीतर प्रवेश किया था’॥

विशोकस्य वचः श्रुत्वा धृष्टद्युम्नोऽथ पार्षतः।
प्रत्युवाच ततः सूतं रणमध्ये महाबलः॥ २६॥
विशोककी यह बात सुनकर महाबली द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने उस समरांगणमें उनके सारथिसे इस प्रकार कहा—॥ २६॥

न हि मे जीवितेनापि विद्यतेऽद्य प्रयोजनम्।
भीमसेनं रणे हित्वा स्नेहमुत्सृज्य पाण्डवैः॥ २७॥
‘सारथे! युद्धस्थलमें भीमसेनको छोड़कर और पाण्डवोंसे स्नेह तोड़कर अब मेरे जीवनसे कोई प्रयोजन नहीं है॥ २७॥

यदि यामि विना भीमं किं मां क्षत्रं वदिष्यति।
एकायनगते भीमे मयि चावस्थिते युधि॥ २८॥

‘भीम एकमात्र युद्धके पथपर गये हैं और मैं भी युद्धस्थलमें उपस्थित हूँ। ऐसी दशामें यदि भीमसेनके बिना ही लौट जाऊँ तो क्षत्रियसमाज मुझे क्या कहेगा? ॥ २८ ॥ अस्वस्ति तस्य कुर्वन्ति देवाः शक्रपुरोगमाः । यः सहायान् परित्यज्य स्वस्तिमानाब्रजेद् गृहम् ॥ २९ ॥ ‘जो अपने सहायकोंको छोड़कर स्वयं कुशल-पूर्वक घरको लौट आता है, उसका इन्द्र आदि देवता अनिष्ट करते हैं’ ॥ २९ ॥ मम भीमः सखा चैव सम्बन्धी च महाबलः । भक्तोऽस्मान् भक्तिमांश्चाहं तमप्यरिनिषूदनम् ॥ ३० ॥ ‘महाबली भीम मेरे सखा और सम्बन्धी हैं। वे हम लोगोंके भक्त हैं और मैं भी उन शत्रुसूदन भीमका भक्त हूँ ॥ सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र यातो वृकोदरः । निघ्नन्तं मां रिपून् पश्य दानवानिव वासवम् ॥ ३१ ॥ ‘अतः मैं भी वहीं जाऊँगा जहाँ भीमसेन गये हैं। देखो जैसे इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार मैं भी शत्रुसेनाका विनाश कर रहा हूँ’ ॥ ३१ ॥ एवमुक्त्वा ततो वीरो ययौ मध्येन भारत । भीमसेनस्य मार्गेषु गदाप्रमथितैर्गजैः ॥ ३२ ॥ भारत! ऐसा कहकर वीरवर धृष्टद्युम्न भीमसेनके बनाये हुए मार्गोंसे कौरव-सेनाके भीतर गये। उन मार्गोंपर गदाके मारे हुए हाथी पड़े थे ॥ ३२ ॥ स ददर्श तदा भीमं दहन्तं रिपुवाहिनीम् । वातो वृक्षानिव बलात् प्रभञ्जन्तं रणे रिपून् ॥ ३३ ॥ उस समय कुछ दूर जाकर धृष्टद्युम्नने शत्रुसेनाको दग्ध करते हुए भीमसेनको देखा। जैसे आँधी वृक्षोंको बलपूर्वक तोड़ देती या उखाड़ डालती है, उसी प्रकार भीमसेन भी रणभूमिमें शत्रुओंका संहार कर रहे थे ॥ ते वध्यमानाः समरे रथिनः सादिनस्तथा । पादाता दन्तिनश्चैव चक्रुरार्तस्वरं महत् ॥ ३४ ॥ समरांगणमें भीमसेनके मारे हुए रथी, घुड़सवार, पैदल और सवारोंसहित हाथी बड़े जोरसे आर्तनाद कर रहे थे ॥ ३४ ॥ हाहाकारश्च संजज्ञे तव सैन्यस्य मारिष । वध्यतो भीमसेनेन कृतिना चित्रयोधिना ॥ ३५ ॥ आर्य! विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले विद्वान् भीमसेनके द्वारा मारी जाती हुई आपकी सेनामें हाहाकार मच गया ॥ ३५ ॥ ततः कृतास्त्रास्ते सर्वे परिवार्य वृकोदरम् । अभीताः समवर्तन्त शस्त्रवृष्ट्या परंतप ॥ ३६ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तदनन्तर अस्त्रोंके ज्ञाता समस्त कौरव-सैनिक

भीमसेनको सब ओरसे घेरकर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए बिना किसी भयके उनपर चढ़

आये ।। ३६ ।।

अभिद्रुतं शस्त्रभृतां वरिष्ठं

समन्ततः पाण्डवं लोकवीरः ।

सैन्येन घोरेण सुसंहितेन

दृष्ट्वा बली पार्षतो भीमसेनम् ।। ३७ ।।

अथोपगच्छच्छरविक्षताङ्गं

पदातिनं क्रोधविषं वमन्तम् ।

आश्वासयन् पार्षतो भीमसेनं

गदाहस्तं कालमिवान्तकाले ।। ३८ ।।

विश्वके विख्यात वीर बलवान् द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने देखा—शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ

पाण्डुनन्दन भीमसेनपर सब ओरसे धावा हो रहा है। अत्यन्त संगठित हुई भयंकर सेनाने

उनपर आक्रमण किया है। यह देखकर धृष्टद्युम्न भीमसेनको आश्वासन देते हुए उनके पास

गये। उनका प्रत्येक अंग बाणोंसे क्षत-विक्षत हो रहा था। वे पैदल ही क्रोधरूपी विष उगल

रहे थे और गदा हाथमें लिये प्रलयकालके यमराजके समान जान पड़ते थे ।।

विशल्यमेनं च चकार तूर्णं-

मारोपयच्चात्मरथे महात्मा ।

भृशं परिष्वज्य च भीमसेन-

माश्वासयामास स शत्रुमध्ये ।। ३९ ।।

महामना धृष्टद्युम्नने तुरंत ही उन्हें अपने रथपर बिठा लिया और उनके शरीरमें धँसे हुए

बाणोंको निकाल दिया। शत्रुओंके बीचमें ही भीमसेनको हृदयसे लगाकर उन्हें पूर्णतः

सान्त्वना दी ।। ३९ ।।

भ्रातॄनथोपेत्य तवापि पुत्र-

स्तस्मिन् विमर्दे महति प्रवृत्ते ।

अयं दुरात्मा द्रुपदस्य पुत्रः

समागतो भीमसेनेन सार्धम् ।। ४० ।।

तं याम सर्वे महता बलेन

मा वो रिपुः प्रार्थयतामनीकम् ।

वह महान् संघर्ष आरम्भ होनेपर आपका पुत्र दुर्योधन भाइयोंके पास आकर बोला

—'यह दुरात्मा द्रुपदपुत्र आकर भीमसेनसे मिल गया है। हम सब लोग बहुत बड़ी सेनाके

साथ इसपर आक्रमण करें, जिससे हमारा और तुम्हारा यह शत्रु हमलोगोंकी इस सेनाको

हानि पहुँचानेका विचार न कर सके' ।। ४० १/२ ।।

श्रुत्वा तु वाक्यं तममृष्यमाणा ज्येष्ठाज्ञया नोदिता धार्तराष्ट्राः ।। ४१ ।। वधाय निष्पेतुरुदायुधास्ते युगक्षये केतवो यद्वदुग्राः । प्रगृह्य चास्त्राणि धनूंषि वीरा ज्यां नेमिघोषैः प्रविकम्पयन्तः ।। ४२ ।।

दुर्योधनका यह कथन सुनकर आपके सभी वीर पुत्र, जो धृष्टद्युम्नका आगमन नहीं सह सके थे, बड़े भाईकी आज्ञासे प्रेरित हो प्रलयकालके भयंकर केतुओंकी भाँति हाथमें आयुध लिये धृष्टद्युम्नके वधके लिये उनपर टूट पड़े। उन्होंने अपने हाथोंमें धनुष-बाण ले रखे थे और वे रथके पहियोंकी घरघराहटके साथ-साथ धनुषकी प्रत्यंचाको भी कँपाते हुए उसकी टंकार फैला रहे थे ।। ४१-४२ ।।

शरैरवर्षन् द्रुपदस्य पुत्रं यथाम्बुदा भूधरं वारिजालैः । निहत्य तांश्चापि शरैः सुतीक्ष्णै- र्न विव्यथे समरे चित्रयोधी ।। ४३ ।।

जैसे मेघ पर्वतपर जलकी बूँदें बरसाते हैं, उसी प्रकार वे द्रुपदपुत्रपर बाणोंकी वृष्टि करने लगे। परंतु विचित्र युद्ध करनेवाले धृष्टद्युम्न उस समरांगणमें अपने पैने बाणोंद्वारा उन सबको अत्यन्त घायल करके स्वयं तनिक भी व्यथित नहीं हुए ।। ४३ ।।

समभ्युदीर्णांश्च तवात्मजांस्तथा निशम्य वीरानभितः स्थितान् रणे । जिघांसुरुग्रं द्रुपदात्मजो युवा प्रमोहनास्त्रं युयुजे महारथः ।। ४४ ।।

युद्धमें सामने खड़े हुए आपके वीर पुत्रोंको आगे बढ़ते और प्रचण्ड होते देख नवयुवक महारथी द्रुपदकुमारने उनके वधके लिये भयंकर प्रमोहनास्त्रका प्रयोग किया ।। ४४ ।।

क्रुद्धो भृशं तव पुत्रेषु राजन् दैत्येषु यद्वत् समरे महेन्द्रः । ततो व्यमुह्यन्त रणे नृवीराः प्रमोहनास्त्राहतबुद्धिसत्त्वाः ।। ४५ ।।

राजन्! जैसे युद्धमें देवराज इन्द्र दैत्योंपर कुपित होते हैं, उसी प्रकार आपके पुत्रोंपर धृष्टद्युम्नका क्रोध बहुत बढ़ा हुआ था। उसके मोहनास्त्रके प्रयोगसे अपनी चेतना और धैर्य खोकर आपके नरवीर पुत्र रणभूमिमें मोहित हो गये ।।

प्रदुद्रुवुः कुरवश्चैव सर्वे सवाजिनागाः सरथाः समन्तात् ।

परीतकालानिव नष्टसंज्ञान्
मोहोपेतांस्तव पुत्रान् निशम्य ॥ ४६ ॥
आपके पुत्रोंको मोहसे युक्त एवं मरे हुएके समान अचेत हुआ देख समस्त कौरव-सैनिक हाथी, घोड़े तथा रथसहित सब ओर भाग चले ॥ ४६ ॥

एतस्मिन्नेव काले तु द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ।
द्रुपदं त्रिभिरासाद्य शरैर्विव्याध दारुणैः ॥ ४७ ॥
इसी समय दूसरी ओर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यने द्रुपदके पास जाकर उनको तीन भयंकर बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ ४७ ॥

सोऽतिविद्धस्ततो राजन् रणे द्रोणेन पार्थिवः ।
अपायाद् द्रुपदो राजन् पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥ ४८ ॥
राजन्! तब रणभूमिमें द्रोणके द्वारा अत्यन्त घायल हो राजा द्रुपद पहलेके वैरका स्मरण करते हुए वहाँसे दूर हट गये ॥ ४८ ॥

जित्वा तु द्रुपदं द्रोणः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ।
तस्य शङ्खस्वनं श्रुत्वा वित्रेसुः सर्वसोमकाः ॥ ४९ ॥
द्रुपदको जीतकर प्रतापी द्रोणाचार्यने अपना शंख बजाया। उस शंखनादको सुनकर समस्त सोमक क्षत्रिय अत्यन्त भयभीत हो गये ॥ ४९ ॥

अथ शुश्राव तेजस्वी द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ।
प्रमोहनास्त्रेण रणे मोहितान्नात्मजांस्तव ॥ ५० ॥
तदनन्तर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तेजस्वी द्रोणाचार्यने सुना कि आपके पुत्र रणभूमिमें प्रमोहनास्त्रसे मोहित होकर पड़े हैं ॥ ५० ॥

ततो द्रोणो महाराज त्वरितोऽभ्याययौ रणात् ।
तत्रापश्यन्महेष्वासो भारद्वाजः प्रतापवान् ॥ ५१ ॥
धृष्टद्युम्नं च भीमं च विचरन्तौ महारणे ।
मोहाविष्टांश्च ते पुत्रानपश्यत् स महारथः ॥ ५२ ॥
महाराज! यह सुनते ही महाधनुर्धर प्रतापी भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य तुरंत उस युद्धस्थलसे चलकर वहाँ आ पहुँचे। आकर उन महारथीने देखा कि धृष्टद्युम्न और भीमसेन उस महायुद्धमें विचर रहे हैं और आपके पुत्र मोहाविष्ट होकर पड़े हुए हैं ॥ ५१-५२ ॥

ततः प्रज्ञास्त्रमादाय मोहनास्त्रं व्यनाशयत् ।
अथ प्रत्यागतप्राणास्तव पुत्रा महारथाः ॥ ५३ ॥
तब उन्होंने प्रज्ञास्त्र लेकर उसके द्वारा मोहनास्त्रका नाश कर दिया। इससे आपके महारथी पुत्रोंमें पुनः चेतनाशक्ति लौट आयी ॥ ५३ ॥

पुनर्युद्धाय समरे प्रययुर्भीमपार्षतौ ।
ततो युधिष्ठिरः प्राह समाहूय स्वसैनिकान् ॥ ५४ ॥

गच्छन्तु पदवीं शक्त्या भीमपार्षतयोर्युधि । सौभद्रप्रमुखा वीरा रथा द्वादश दंशिताः ॥ ५५ ॥ प्रवृत्तिमधिगच्छन्तु न हि शुद्ध्यति मे मनः । वे समरभूमिमें पुनः युद्धके लिये भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नकी ओर चले। तब राजा युधिष्ठिरने अपने सैनिकोंको बुलाकर कहा—'तुमलोग पूरी शक्ति लगाकर युद्धस्थलमें भीमसेन और धृष्टद्युम्नके पथका अनुसरण करो। अभिमन्यु आदि बारह वीर महारथी कवच आदिसे सुसज्जित हो भीमसेन और धृष्टद्युम्नका समाचार प्राप्त करें। मेरा मन उनके विषयमें निश्चिन्त नहीं हो रहा है' ॥ ५४-५५ १/२ ॥

त एवं समनुज्ञाताः शूरा विक्रान्तयोधिनः ॥ ५६ ॥ बाढमित्येवमुक्त्वा तु सर्वे पुरुषमानिनः । मध्यन्दिनगते सूर्ये प्रययुः सर्व एव हि ॥ ५७ ॥ युधिष्ठिरकी ऐसी आज्ञा पाकर पराक्रमपूर्वक युद्ध करनेवाले वे पुरुषमानी समस्त शूरवीर 'बहुत अच्छा' कहकर दोपहर होते-होते वहाँसे चल दिये ॥ ५६-५७ ॥

केकया द्रौपदेयाश्च धृष्टकेतुश्च वीर्यवान् । अभिमन्युं पुरस्कृत्य महत्या सेनयावृताः ॥ ५८ ॥ ते कृत्वा समर्व्यूहं सूचीमुखमरिंदमाः । बिभिदुर्धार्तराष्ट्राणां तद् रथानीकमाहवे ॥ ५९ ॥ अभिमन्युको आगे करके विशाल सेनासे घिरे हुए पाँच केकयराजकुमार, द्रौपदीके पाँचों पुत्र और पराक्रमी धृष्टकेतु—ये शत्रुओंका दमन करनेवाले शूरवीर सूचीमुख नामक समर्व्यूह बनाकर आपके पुत्रोंकी उस सेनाको रणक्षेत्रमें विदीर्ण करने लगे ॥ ५८-५९ ॥

तान् प्रयातान् महेष्वासानभिमन्युपुरोगमान् । भीमसेनभयाविष्टा धृष्टद्युम्नविमोहिता ॥ ६० ॥ न संवारयितुं शक्ता तव सेना जनाधिप । मदमूर्च्छान्वितात्मा वै प्रमदेवाध्वनि स्थिता ॥ ६१ ॥ जनेश्वर! आपकी सेना भीमसेनके भयसे व्याकुल और धृष्टद्युम्नके बाणोंसे मोहित हो रही थी। अतः आक्रमण करनेवाले अभिमन्यु आदि महाधनुर्धर वीरोंको वह रोकनेमें समर्थ न हो सकी। मद और मूर्च्छाके वशीभूत हुई मतवाली स्त्रीकी भाँति वह मार्गमें चुपचाप खड़ी रही ॥ ६०-६१ ॥

तेऽभिजाता महेष्वासाः सुवर्णविकृतध्वजाः । परीप्सन्तोऽभ्यधावन्त धृष्टद्युम्नवृकोदरौ ॥ ६२ ॥ सुवर्णनिर्मित ध्वजाओंसे सुशोभित होनेवाले वे महाधनुर्धर कुलीन योद्धा धृष्टद्युम्न और भीमसेनकी रक्षाके लिये बड़े वेगसे दौड़े ॥ ६२ ॥

तौ च दृष्ट्वा महेष्वासावभिमन्युपुरोगमान् ।

बभूवतुर्मुदा युक्तौ निघ्नन्तौ तव वाहिनीम् ॥ ६३ ॥
वे दोनों महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न और भीमसेन भी अभिमन्यु आदि वीरोंको सहायताके लिये आते देख हर्ष और उत्साहमें भर गये और आपकी सेनाका विनाश करने लगे ॥ ६३ ॥

(द्रोणमिष्वस्त्रकुशलं सर्वविद्यासु पारगम् ।)
दृष्ट्वा तु सहसाऽऽयान्तं पाञ्चाल्यो गुरुमात्मनः ।
नाशंसत वधं वीरः पुत्राणां तव भारत ॥ ६४ ॥
भारत! पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने धनुर्वेदमें कुशल और समस्त विद्याओंके पारंगत विद्वान् अपने गुरु द्रोणाचार्यको सहसा वहाँ आये देख आपके पुत्रोंके वधकी इच्छा छोड़ दी ॥ ६४ ॥

ततो रथं समारोप्य कैकेयस्य वृकोदरम् ।
अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो द्रोणमिष्वस्त्रपारगम् ॥ ६५ ॥
फिर भीमसेनको केकयके रथपर बिठाकर क्रोधमें भरे हुए धृष्टद्युम्नने अस्त्रविद्याके पारगामी विद्वान् द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ ६५ ॥

तस्याभिपततस्तूर्णं भारद्वाजः प्रतापवान् ।
क्रुद्धश्चिच्छेद बाणेन धनुः शत्रुनिबर्हणः ॥ ६६ ॥
तब शत्रुओंका नाश करनेवाले प्रतापी द्रोणाचार्यने कुपित होकर अपनी ओर आनेवाले धृष्टद्युम्नके धनुषको एक बाणसे तुरंत काट दिया ॥ ६६ ॥

अन्यांश्च शतशो बाणान् प्रेषयामास पार्षते ।
दुर्योधनहितार्थाय भर्तृपिण्डमनुस्मरन् ॥ ६७ ॥
उसके बाद दुर्योधनके हितके लिये स्वामीके अन्नका विचार करते हुए धृष्टद्युम्नपर और भी सैकड़ों बाण चलाये ॥ ६७ ॥

अथान्यद् धनुरदाय पार्षतः परवीरहा ।
द्रोणं विव्याध विंशत्या रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ॥ ६८ ॥
तत्पश्चात् शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले धृष्टद्युम्नने दूसरा धनुष लेकर पत्थरपर रगड़कर तेज किये हुए सोनेकी पाँखवाले बीस बाणोंसे द्रोणाचार्यको घायल कर दिया ॥ ६८ ॥

तस्य द्रोणः पुनश्चापं चिच्छेदमित्रकर्शनः ।
हयांश्च चतुरस्तूर्णं चतुर्भिः सायकोत्तमैः ॥ ६९ ॥
वैवस्वतक्षयं घोरं प्रेषयामास भारत ।
सारथिं चास्य भल्लेन प्रेषयामास मृत्यवे ॥ ७० ॥
तब शत्रुसूदन द्रोणने पुनः धृष्टद्युम्नका धनुष काट दिया और चार उत्तम सायकोंद्वारा उनके चारों घोड़ोंको तुरंत ही भयानक यमलोकको भेज दिया। भारत! फिर एक भल्लके द्वारा उनके सारथिको भी मृत्युके हवाले कर दिया ॥ ६९-७० ॥

हताश्वात् स रथात् तूर्णमवप्लुत्य महारथः ।
आरुरोह महाबाहुरभिमन्योर्महारथम् ॥ ७१ ॥
घोड़ों और सारथिके मारे जानेपर महारथी महाबाहु धृष्टद्युम्न तुरंत उस रथसे कूद पड़े और अभिमन्युके विशाल रथपर आरूढ़ हो गये ॥ ७१ ॥

ततः सरथनागाश्वा समकम्पत वाहिनी ।
पश्यतो भीमसेनस्य पार्षतस्य च पश्यतः ॥ ७२ ॥
तदनन्तर भीमसेन और धृष्टद्युम्नके देखते-देखते रथ, हाथी और घुड़सवारोंसहित सारी पाण्डव-सेना काँपने लगी ॥ ७२ ॥

तत्प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा द्रोणेनामिततेजसा ।
नाशक्नुवन् वारयितुं समस्तास्ते महारथाः ॥ ७३ ॥
अमिततेजस्वी आचार्य द्रोणके द्वारा अपनी सेनाका व्यूह भंग हुआ देख वे सम्पूर्ण महारथी प्रयत्न करनेपर भी उसे रोकनेमें सफल न हो सके ॥ ७३ ॥

वध्यमानं तु तत् सैन्यं द्रोणेन निशितैः शरैः ।
व्यभ्रमत् तत्र तत्रैव क्षोभ्यमाण इवार्णवः ॥ ७४ ॥
द्रोणाचार्यके पैने बाणोंसे पीड़ित हुई वह सेना विक्षुब्ध महासागरके समान वहीं चक्कर काटने लगी ॥

तथा दृष्ट्वा च तत्सैन्यं जहृषे तावकं बलम् ।
दृष्ट्वाऽऽचार्यं सुसंक्रुद्धं पतन्तं रिपुवाहिनीम् ।
चुक्रुशुः सर्वतो योधाः साधु साध्विति भारत ॥ ७५ ॥
द्रोणाचार्यको अत्यन्त कुपित होकर शत्रुसेनापर टूटते और पाण्डव-सेनाको भागते देख आपके सैनिकोंको बड़ा हर्ष हुआ। भारत! आपके सभी योद्धा सब ओरसे द्रोणाचार्यको साधुवाद देने लगे ॥ ७५ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे द्रोणपराक्रमे
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें संकुलयुद्धमें द्रोणपराक्रमविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७९ १/३ श्लोक हैं।]

अध्याय (पृष्ठ 1972)

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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

उभय पक्षकी सेनाओंका संकुल युद्ध

संजय उवाच

ततो दुर्योधनो राजा मोहात् प्रत्यागतस्तदा ।
शरवर्षैः पुनर्भीमं प्रत्यवारयदच्युतम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं—महाराज! तदनन्तर (मोहनास्त्र-जनित) मोहसे जगनेपर राजा दुर्योधनने युद्धभूमिसे पीछे न हटनेवाले भीमसेनको पुनः बाणोंकी वर्षासे रोक दिया ॥ १ ॥

एकीभूतास्ततश्चैव तव पुत्रा महारथाः ।
समेत्य समरे भीमं योधयामासुरुद्यताः ॥ २ ॥

फिर आपके सभी महारथी पुत्र समरभूमिमें एकत्र होकर पूर्ण प्रयत्नपूर्वक भीमसेनके साथ युद्ध करने लगे ॥ २ ॥

भीमसेनोऽपि समरे सम्प्राप्य स्वरथं पुनः ।
समारुह्य महाबाहुर्ययौ येन तवात्मजः ॥ ३ ॥

महाबाहु भीमसेन भी समरभूमिमें पुनः अपने रथपर सवार हो उधर ही चल दिये, जिस मार्गसे आपका पुत्र दुर्योधन गया था ॥ ३ ॥

प्रगृह्य च महावेगं परासुकरणं दृढम् ।
सज्जं शरासनं संख्ये शरैर्विव्याध ते सुतम् ॥ ४ ॥

उन्होंने युद्धस्थलमें मृत्युकी प्राप्ति करानेवाले महान् वेगशाली सुदृढ़ धनुषको लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी और अनेक बाणोंद्वारा आपके पुत्रको घायल कर दिया ॥ ४ ॥

ततो दुर्योधनो राजा भीमसेनं महाबलम् ।
नाराचेन सुतीक्ष्णेन भृशं मर्मण्यताडयत् ॥ ५ ॥

तब राजा दुर्योधनने महाबली भीमसेनके मर्मस्थलोंमें अत्यन्त तीखे नाराचसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ५ ॥

सोऽतिविद्धो महेष्वासस्तव पुत्रेण धन्विना ।
क्रोधसंरक्तनयनो वेगेनाक्षिप्य कार्मुकम् ॥ ६ ॥
दुर्योधनं त्रिभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ।
स तत्र शुशुभे राजा शिखरैर्गिरिराडिव ॥ ७ ॥

आपके धनुर्धर पुत्रके द्वारा चलाये हुए बाणसे अत्यन्त पीड़ित हो महाधनुर्धर भीमसेनने क्रोधसे लाल आँखें करके वेगपूर्वक धनुषको खींचा और तीन बाणोंसे दुर्योधनकी दोनों भुजाओं तथा छातीमें चोट पहुँचाई। उन बाणोंद्वारा राजा दुर्योधन तीन शिखरोंसे युक्त गिरिराजकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ ६-७ ॥

तौ दृष्ट्वा समरे क्रुद्धौ विनिघ्नन्तौ परस्परम् । दुर्योधनानुजाः सर्वे शूराः संत्यक्तजीविताः ॥ ८ ॥ संस्मृत्य मन्त्रितं पूर्वं निग्रहे भीमकर्मणः । निश्चयं परमं कृत्वा निग्रहीतुं प्रचक्रमुः ॥ ९ ॥ क्रोधमें भरे हुए इन दोनों वीरोंको समरभूमिमें एक-दूसरेपर प्रहार करते देख दुर्योधनके सभी शूरवीर छोटे भाई प्राणोंका मोह छोड़कर भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनको जीवित पकड़नेके विषयमें की हुई पहली सलाहको याद करके एक दृढ़ निश्चयपर पहुँचकर उन्हें पकड़नेका उद्योग करने लगे ॥ ८-९ ॥

तानापतत एवाजौ भीमसेनो महाबलः । प्रत्युद्ययौ महाराज गजः प्रतिगजानिव ॥ १० ॥ महाराज! उन्हें युद्धमें आक्रमण करते देख जैसे हाथी अपने विपक्षी हाथियोंकी ओर दौड़ता है, उसी प्रकार महावली भीमसेन उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़े ॥ १० ॥

भृशं क्रुद्धश्च तेजस्वी नाराचेन समार्पयत् । चित्रसेनं महाराज तव पुत्रं महायशाः ॥ ११ ॥ नरेश्वर! महायशस्वी और तेजस्वी भीमसेन अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए थे। उन्होंने आपके पुत्र चित्रसेनपर एक नाराचके द्वारा प्रहार किया ॥ ११ ॥

तथेतरांस्तव सुतांस्ताडयामास भारत । शरैर्बहुविधैः संख्ये रुक्मपुङ्खैः सुतेजनैः ॥ १२ ॥ भारत! इसी प्रकार रणभूमिमें सोनेकी पाँखवाले अत्यन्त तीखे और बहुसंख्यक बाणोंद्वारा उन्होंने आपके अन्य पुत्रोंको भी पीड़ित किया ॥ १२ ॥

ततः संस्थाप्य समरे तान्यनीकानि सर्वशः । अभिमन्युप्रभृतयस्ते द्वादश महारथाः ॥ १३ ॥ प्रेषिता धर्मराजेन भीमसेनपदानुगाः । प्रतिजग्मुर्महाराज तव पुत्रान् महाबलान् ॥ १४ ॥ महाराज! तत्पश्चात् अपनी सेनाओंको सब प्रकारसे समरभूमिमें स्थापित करके भीमसेनके पद-चिह्नोंपर चलनेवाले उन अभिमन्यु आदि बारह महारथियोंने, जिन्हें धर्मराज युधिष्ठिरने भेजा था, आपके महाबली पुत्रोंपर धावा किया ॥ १३-१४ ॥

दृष्ट्वा रथस्थांस्तान् शूरान् सूर्याग्निसमतेजसः । सर्वानैव महेष्वासान् भ्राजमानान् श्रिया वृतान् ॥ १५ ॥ महाहवे दीप्यमानान् सुवर्णमुकुटोज्ज्वलान् । तत्यजुः समरे भीमं तव पुत्रा महाबलाः ॥ १६ ॥ वे सब-के-सब रथपर बैठे हुए शूरवीर, सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी, महाधनुर्धर, उत्तम शोभासे प्रकाशमान, सुवर्णमय मुकुटसे जगमग प्रतीत होनेवाले और अत्यन्त

कान्तिमान् थे। उस महासमरमें उन्हें आते देखकर आपके महाबली पुत्र भीमसेनको छोड़कर वहाँसे दूर हट गये ॥ १५-१६ ॥ तान् नामृष्यत कौन्तेयो जीवमाना गता इति । अन्वीय च पुनः सर्वांस्तव पुत्रानपीडयत् ॥ १७ ॥ परंतु वे जीवित लौट गये; यह बात भीमसेनसे नहीं सही गयी। उन्होंने पुनः आपके उन सब पुत्रोंका पीछा करके उन्हें अपने बाणोंसे पीड़ित कर दिया ॥ १७ ॥ अथाभिमन्युं समरे भीमसेनेन संगतम् । पार्षतेन च सम्प्रेक्ष्य तव सैन्ये महारथाः ॥ १८ ॥ दुर्योधनप्रभृतयः प्रगृहीतशरासनाः । भृशमश्वैः प्रजवितैः प्रययुर्यत्र ते रथाः ॥ १९ ॥ इधर, उस समरभूमिमें अभिमन्युको भीमसेन तथा धृष्टद्युम्नसे मिला हुआ देख आपकी सेनाके दुर्योधन आदि महारथी हाथोंमें धनुष लिये अत्यन्त वेगशाली अश्वोंद्वारा वहाँ जा पहुँचे, जहाँ वे बारह पाण्डवपक्षीय महारथी विद्यमान थे ॥ १८-१९ ॥ अपराह्ने महाराज प्रावर्तत महारणः । तावकानां च बलिनां परेषां चैव भारत ॥ २० ॥ महाराज! भरतनन्दन! तब अपराह्नकालमें आपके और पाण्डवपक्षके अत्यन्त बलवान् योद्धाओंमें बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हुआ ॥ २० ॥ अभिमन्युर्विकर्णस्य हयान् हत्वा महाहवे । अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् ॥ २१ ॥ अभिमन्युने उस महायुद्धमें विकर्णके घोड़ोंको मारकर स्वयं विकर्णको भी पचीस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ २१ ॥ हताश्वं रथमुत्सृज्य विकर्णस्तु महारथः । आरुरोह रथं राजंश्चित्रसेनस्य भारत ॥ २२ ॥ भरतवंशी नरेश! घोड़ोंके मारे जानेपर महारथी विकर्ण अपना रथ छोड़कर चित्रसेनके रथपर जा बैठा ॥ २२ ॥ स्थितावेकरथे तौ तु भ्रातरौ कुलवर्धनौ । आर्जुनिः शरजालेन च्छादयामास भारत ॥ २३ ॥ भरतनन्दन! अभिमन्युने एक रथपर बैठे हुए उन दोनों वंशवर्धक भ्राताओंको अपने बाणोंके जालसे आच्छादित कर दिया ॥ २३ ॥ चित्रसेनो विकर्णश्च कार्ष्णिं पञ्चभिरायसैः । विव्याध तेन चाकम्पत् कार्ष्णिर्मेरुरिव स्थितः ॥ २४ ॥ चित्रसेन और विकर्णने भी लोहेके पाँच बाणोंसे अभिमन्युको बींध डाला। उस आघातसे अर्जुनकुमार अभिमन्यु विचलित नहीं हुआ। मेरु पर्वतकी भाँति अडिग खड़ा

रहा ॥ २४ ॥ दुःशासनस्तु समरे केकयान् पञ्च मारिष । योधयामास राजेन्द्र तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २५ ॥ आर्य! राजेन्द्र! दुःशासनने अकेले ही समरभूमिमें पाँच केकयराजकुमारोंके साथ युद्ध किया। वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ २५ ॥ द्रौपदेया रणे क्रुद्धा दुर्योधनमवारयन् । शरैराशीविषाकारैः पुत्रं तव विशाम्पते ॥ २६ ॥ प्रजानाथ! युद्धमें कुपित हुए द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंने विषधर सर्पके समान आकारवाले भयंकर बाणोंद्वारा आपके पुत्र दुर्योधनको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ २६ ॥ पुत्रोऽपि तव दुर्धर्षो द्रौपद्यास्तनयान् रणे । सायकैर्निशितै राजन्नाजघान पृथक् पृथक् ॥ २७ ॥ राजन्! तब आपके दुर्धर्ष पुत्रने भी तीखे सायकों-द्वारा रणभूमिमें द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंपर पृथक्-पृथक् प्रहार किया ॥ २७ ॥ तैश्चापि विद्धः शुशुभे रुधिरेण समुक्षितः । गिरिः प्रस्रवणैर्यद्वद् गैरिकादिविमिश्रितैः ॥ २८ ॥ फिर उनके द्वारा भी अत्यन्त घायल किये जानेपर आपका पुत्र रक्तसे नहा उठा और गेरु आदि धातुओंसे मिश्रित झरनोंके जलसे युक्त पर्वतकी भाँति शोभा पाने लगा ॥ २८ ॥ भीष्मोऽपि समरे राजन् पाण्डवानामनीकिनीम् । कालयामास बलवान् पालः पशुगणानिव ॥ २९ ॥ राजन्! तदनन्तर बलवान् भीष्म भी संग्रामभूमिमें पाण्डव-सेनाको उसी प्रकार खदेड़ने लगे, जैसे चरवाहा पशुओंको हाँकता है ॥ २९ ॥ ततो गाण्डीवनिर्घोषः प्रादुरासीद् विशाम्पते । दक्षिणेन वरूथिन्याः पार्थस्यारीन् विनिघ्नतः ॥ ३० ॥ प्रजानाथ! तदनन्तर शत्रुओंका संहार करते हुए अर्जुनके गाण्डीवधनुषका घोष सेनाके दक्षिणभागसे प्रकट हुआ ॥ ३० ॥ उत्तस्थुः समरे तत्र कबन्धानि समन्ततः । कुरुणां चैव सैन्येषु पाण्डवानां च भारत ॥ ३१ ॥ भारत! वहाँ समरमें कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंमें चारों ओर कबन्ध उठने लगे ॥ ३१ ॥ शोणितोदं शरावर्तं गजद्वीपं हयोर्मिणम् । रथनौभिर्नरव्याघ्राः प्रतेरुः सैन्यसागरम् ॥ ३२ ॥ वह सेना एक समुद्रके समान थी। रक्त ही वहाँ जलके समान था। बाणोंकी भँवर उठती थी। हाथी द्वीपके समान जान पड़ते थे और घोड़े तरंगकी शोभा धारण करते थे। रथरूपी

नौकाओंके द्वारा नरश्रेष्ठ वीर उस सैन्य-सागरको पार करते थे ॥ ३२ ॥ छिन्नहस्ता विकवचा विदेहाश्च नरोत्तमाः । दृश्यन्ते पतितास्तत्र शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३३ ॥ वहाँ सैकड़ों और हजारों नरश्रेष्ठ धरतीपर पड़े दिखायी देते थे। उनमेंसे कितनोंके हाथ कट गये थे, कितने ही कवचहीन हो रहे थे और बहुतोंके शरीर छिन्न-भिन्न हो गये थे ॥ ३३ ॥ निहतैर्मत्तमातङ्गैः शोणितौघपरिप्लुतैः । भूर्भाति भरतश्रेष्ठ पर्वतैराचिता यथा ॥ ३४ ॥ भरतश्रेष्ठ! मरकर गिरे हुए मतवाले हाथी खूनसे लथपथ हो रहे थे। उनसे ढकी हुई वहाँकी भूमि पर्वतोंसे व्याप्त-सी जान पड़ती थी ॥ ३४ ॥ तत्राद्भुतमपश्याम तव तेषां च भारत । न तत्रासीत् पुमान् कश्चिद् यो युद्धं नाभिकाङ्क्षति ॥ ३५ ॥ भारत! हमने वहाँ आपके और पाण्डवोंके सैनिकोंका अद्भुत उत्साह देखा। वहाँ ऐसा कोई पुरुष नहीं था, जो युद्ध न चाहता हो ॥ ३५ ॥ एवं युयुधिरे वीराः प्रार्थयाना महद् यशः । तावकाः पाण्डवैः सार्धमाकाङ्क्षन्तो जयं युधि ॥ ३६ ॥ इस प्रकार महान् यशकी अभिलाषा रखते और युद्धमें विजय चाहते हुए आपके वीर सैनिक पाण्डवोंके साथ युद्ध करते थे ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1977)

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एकोनाशीतितमोऽध्यायः

भीमसेनके द्वारा दुर्योधनकी पराजय, अभिमन्यु और द्रौपदीपुत्रोंका धृतराष्ट्रपुत्रोंके साथ युद्ध तथा छठे दिनके युद्धकी समाप्ति

संजय उवाच

ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे ।
संग्रामरभसो भीमं हन्तुकामोऽभ्यधावत ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! तदनन्तर जब सूर्यदेवपर संध्याकी लाली छाने लगी, उस समय संग्रामके लिये उत्साह रखनेवाले राजा दुर्योधनने भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर धावा किया ॥ १ ॥

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य नृवीरं दृढवैरिणम् ।
भीमसेनः सुसंक्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥ २ ॥
अपने पक्के वैरी नरवीर दुर्योधनको आते देख भीमसेनका क्रोध बहुत बढ़ गया और वे उससे यह वचन बोले— ॥ २ ॥

अयं स कालः सम्प्राप्तो वर्षपूगाभिवाञ्छितः ।
अद्य त्वां निहनिष्यामि यदि नोत्सृजसे रणम् ॥ ३ ॥
‘दुर्योधन! मैं बहुत वर्षोंसे जिसकी अभिलाषा और प्रतीक्षा कर रहा था, वही यह अवसर आज प्राप्त हुआ है। यदि तू युद्ध छोड़कर भाग नहीं जायगा तो आज तुझे अवश्य मार डालूँगा ॥ ३ ॥

अद्य कुन्त्याः परिक्लेशं वनवासं च कृत्स्नशः ।
द्रौपद्याश्च परिक्लेशं प्रणेण्यामि हते त्वयि ॥ ४ ॥
‘माता कुन्तीको जो क्लेश उठाना पड़ा है, हमने वनवासका जो कष्ट भोगा है और सभामें द्रौपदीको जो अपमानका दुःख सहन करना पड़ा है, उन सबका बदला आज मैं तेरे मारे जानेपर चुका लूँगा ॥ ४ ॥

यत् पुरा मत्सरी भूत्वा पाण्डवानवमन्यसे ।
तस्य पापस्य गान्धारे पश्य व्यसनमागतम् ॥ ५ ॥
‘गान्धारीपुत्र! पूर्वकालमें डाह रखकर तू जो हम पाण्डवोंका तिरस्कार करता आया है, उसी पापके फलस्वरूप यह संकट तेरे ऊपर आया है। तू आँख खोलकर देख ले ॥ ५ ॥

कर्णस्य मतमास्थाय सौबलस्य च यत् पुरा ।
अचिन्त्य पाण्डवान् कामाद् यथेष्टं कृतवानसि ॥ ६ ॥

याचमानं च यन्मोहाद् दाशार्हमवमन्यसे ।
उलूकस्य समादेशं यद् ददासि च हृष्टवत् ॥ ७ ॥
तेन त्वां निहनिष्यामि सानुबन्धं सबान्धवम् ।
समीकरिष्ये तत् पापं यत् पुरा कृतवानसि ॥ ८ ॥
‘पहले कर्ण और शकुनिके बहकावेमें आकर पाण्डवोंको कुछ भी न गिनते हुए जो तूने इच्छानुसार मनमाना बर्ताव किया है, भगवान् श्रीकृष्ण संधिके लिये प्रार्थना करने आये थे, परंतु तूने मोहवश जो उनका भी तिरस्कार किया और बड़े हर्षमें भरकर उलूकके द्वारा जो तूने यह संदेश दिया था कि तुम मुझे और मेरे भाइयोंको मारकर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो, उसके अनुसार तुझे भाइयों तथा सगे-सम्बन्धियोंसहित अवश्य मार डालूँगा। पहले तूने जो-जो पाप किये हैं, उन सबका बदला चुकाकर बराबर कर दूँगा’ ॥ ६—८ ॥
एवमुक्त्वा धनुर्घोरं विकृष्योद्भ्राम्य चासकृत् ।
समाधत्त शरान् घोरान् महाशनिसमप्रभान् ॥ ९ ॥
ऐसा कहकर भीमसेनने अपने भयंकर धनुषको बारंबार घुमाकर उसे बलपूर्वक खींचा और वज्रके समान तेजस्वी भयंकर बाणोंको उसके ऊपर रखा ॥ ९ ॥
षड्विंशतिमथ क्रुद्धो मुमोचाशु सुयोधने ।
ज्वलिताग्निशिखाकारान् वज्रकल्पानजिह्मगान् ॥ १० ॥
वे सीधे जानेवाले बाण वज्र तथा प्रज्वलित आगकी लपटोंके समान जान पड़ते थे। उनकी संख्या छब्बीस थी। कुपित हुए भीमसेनने उन सबको शीघ्रतापूर्वक दुर्योधनपर छोड़ दिया ॥ १० ॥
ततोऽस्य कार्मुकं द्वाभ्यां सूतं द्वाभ्यां च विव्यधे ।
चतुर्भिरश्वाञ् जवनाननयद् यमसादनम् ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् भीमसेनने दो बाणोंसे दुर्योधनका धनुष काट दिया, दोसे उसके सारथिको पीड़ित किया और चार बाणोंसे उसके वेगशाली घोड़ोंको यमलोक भेज दिया ॥
द्वाभ्यां च सुविकृष्टाभ्यां शराभ्यामरिमर्दनः ।
छत्रं चिच्छेद समरे राज्ञस्तस्य नरोत्तम ॥ १२ ॥
नरश्रेष्ठ! फिर शत्रुमर्दन भीमने धनुषको अच्छी तरह खींचकर छोड़े हुए दो बाणोंद्वारा समरभूमिमें राजा दुर्योधनके छत्रको काट दिया ॥ १२ ॥
षड्भिश्च तस्य चिच्छेद ज्वलन्तं ध्वजमुत्तमम् ।
छित्त्वा तं च ननादोच्चैस्तव पुत्रस्य पश्यतः ॥ १३ ॥
इसके बाद अपनी प्रभासे प्रकाशित होनेवाले उसके उत्तम ध्वजको छः बाणोंसे खण्डित कर दिया। आपके पुत्रके देखते-देखते उस ध्वजको काटकर भीमसेन उच्चस्वरसे सिंहनाद करने लगे ॥ १३ ॥
रथाच्च स ध्वजः श्रीमान् नानारत्नविभूषितात् ।

पपात सहसा भूमौ विद्युज्ज्वलधरादिव ॥ १४ ॥ दुर्योधनके नाना रत्नविभूषित रथसे वह शोभाशाली ध्वज सहसा कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो मेघोंकी घटासे भूमिपर बिजली गिरी हो ॥ १४ ॥ ज्वलन्तं सूर्यसंकाशं नागं मणिमयं शुभम् । ध्वजं कुरुपतेश्छिन्नं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ॥ १५ ॥ कुरुराज दुर्योधनके उस सूर्यके समान प्रज्वलित नागचिह्नित मणिमय सुन्दर ध्वजको कटकर गिरते समय समस्त राजाओंने देखा ॥ १५ ॥ अथैनं दशभिर्बाणैस्तोत्रैरिव महाद्विपम् । आजघान रणे वीरं स्मयन्निव महारथः ॥ १६ ॥ इसके बाद महारथी भीमने मुसकराते हुए-से रणभूमिमें वीरवर दुर्योधनको दस बाणोंसे उसी तरह घायल किया, जैसे महावत अंकुशोंसे महान् गजराजको पीड़ा देता है ॥ १६ ॥ ततः स राजा सिंधूनां रथश्रेष्ठो महारथः । दुर्योधनस्य जग्राह पार्ष्णिं सत्पुरुषैर्वृतः ॥ १७ ॥ तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ सिन्धुराज महारथी जयद्रथने कुछ सत्पुरुषोंके साथ आकर दुर्योधनके पृष्ठभागकी रक्षाका कार्य सँभाला ॥ १७ ॥ कृपश्च रथिनां श्रेष्ठः कौरव्यममितौजसम् । आरोपयद् रथं राजन् दुर्योधनममर्षणम् ॥ १८ ॥ राजन्! इसी प्रकार रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यने अमर्षमें भरे हुए अमिततेजस्वी कुरुवंशी दुर्योधनको अपने रथपर चढ़ा लिया ॥ १८ ॥ स गाढविद्धो व्यथितो भीमसेनेन संयुगे । निषसाद रथोपस्थे राजन् दुर्योधनस्तदा ॥ १९ ॥ नरेश्वर! भीमसेनने उस युद्धमें दुर्योधनको बहुत घायल कर दिया था। अतः उस समय वह व्यथासे व्याकुल होकर रथके पिछले भागमें जा बैठा ॥ १९ ॥ परिवार्य ततो भीमं जेतुकामो जयद्रथः । रथैरनेकसाहस्रैर्भीमस्यावारयद् दिशः ॥ २० ॥ तत्पश्चात् जयद्रथने भीमसेनको जीतनेकी इच्छा रखकर कई हजार रथोंके द्वारा उन्हें घेर लिया और उनकी सम्पूर्ण दिशाओंको अवरुद्ध कर दिया ॥ २० ॥ धृष्टकेतुस्ततो राजन्नभिमन्युश्च वीर्यवान् । केकया द्रौपदेयाश्च तव पुत्रानयोधयन् ॥ २१ ॥ महाराज! इसी समय धृष्टकेतु, पराक्रमी अभिमन्यु, पाँच केकयराजकुमार तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र आपके पुत्रोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ २१ ॥ चित्रसेनः सुचित्रश्च चित्राङ्गश्चित्रदर्शनः । चारुचित्रः सुचारुश्च तथा नन्दोपनन्दकौ ॥ २२ ॥

अष्टावेते महेष्वासाः सुकुमारा यशस्विनः ।
अभिमन्युरथं राजन् समन्तात् पर्यवारयन् ॥ २३ ॥
उस युद्धमें चित्रसेन, सुचित्र, चित्रांग, चित्रदर्शन, चारुचित्र, सुचारु, नन्द और उपनन्द— इन आठ यशस्वी सुकुमार एवं महाधनुर्धर वीरोंने अभिमन्युके रथको चारों ओरसे घेर लिया ॥ २२-२३ ॥
आजघान ततस्तूर्णमभिमन्युर्महामनाः ।
एकैकं पञ्चभिर्बाणैः शितैः संनतपर्वभिः ॥ २४ ॥
उस समय महामना अभिमन्युने तुरंत ही झुकी हुई गाँठवाले पाँच-पाँच तीखे बाणोंद्वारा प्रत्येकको बींध डाला ॥ २४ ॥
वज्रमृत्युप्रतीकाशैर्विचित्रायुधनिःसृतैः ।
अमृष्यमाणास्ते सर्वे सौभद्रं रथसत्तमम् ॥ २५ ॥
ववृषुर्बाणैस्तीक्ष्णैर्गिरिं मेरुमिवाम्बुदाः ।
वे सभी बाण विचित्र धनुषद्वारा छोड़े गये थे और सब-के-सब वज्र एवं मृत्युके तुल्य भयंकर थे। उन बाणोंके आघातको आपके पुत्र सहन न कर सके। उन सबने मिलकर रथियोंमें श्रेष्ठ सुभद्राकुमार अभिमन्युपर तीखे बाणोंकी वर्षा आरम्भ की, मानो बादल मेरुगिरिपर जलकी वर्षा कर रहे हों ॥ २५ १/२ ॥
स पीड्यमानः समरे कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः ॥ २६ ॥
अभिमन्युर्महाराज तावकान् समकम्पयत् ।
यथा देवासुरे युद्धे वज्रपाणिर्महासुरान् ॥ २७ ॥
महाराज! अभिमन्यु अस्त्रविद्याका ज्ञाता और युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाला है। उसने समरभूमिमें बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी आपके सैनिकोंमें कँपकँपी उत्पन्न कर दी। ठीक उसी तरह, जैसे देवासुर-संग्राममें वज्रधारी इन्द्रने बड़े-बड़े असुरोंको भयसे पीड़ित कर दिया था ॥ २६-२७ ॥
विकर्णस्य ततो भल्लान् प्रेषयामास भारत ।
चतुर्दश रथश्रेष्ठो घोरानाशीविषोपमान् ॥ २८ ॥
स तैर्विकर्णस्य रथात् पातयामास वीर्यवान् ।
ध्वजं सूतं हयांश्चैव नृत्यमान इवाहवे ॥ २९ ॥
भारत! तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ पराक्रमी अभिमन्युने विकर्णके ऊपर सर्पके समान आकारवाले चौदह भयंकर भल्ल चलाये और उनके द्वारा विकर्णके रथसे ध्वज, सारथि और घोड़ोंको मार गिराया। उस समय वह युद्धमें नृत्य-सा कर रहा था ॥ २८-२९ ॥
पुनश्चान्यान् शरान् पीतानकुण्ठाग्रान् शिलाशितान् ।
प्रेषयामास संक्रुद्धो विकर्णाय महाबलः ॥ ३० ॥

तत्पश्चात् उस महाबली वीरने अत्यन्त कुपित हो शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए अप्रतिहत धारवाले दूसरे पानीदार बाण विकर्णपर चलाये ॥ ३० ॥ ते विकर्णं समासाद्य कङ्कबर्हिणवाससः । भित्त्वा देहं गता भूमिं ज्वलन्त इव पन्नगाः ॥ ३१ ॥ उन बाणोंके पुच्छभागमें मोरके पंख लगे हुए थे। वे विकर्णके शरीरको विदीर्ण करके भीतर घुस गये और वहाँसे भी निकलकर प्रज्वलित सर्पोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३१ ॥ ते शरा हेमपुङ्खाग्रा व्यदृश्यन्त महीतले । विकर्णरुधिरक्लिन्ना वमन्त इव शोणितम् ॥ ३२ ॥ उन बाणोंके पुच्छ और अग्रभाग सुनहरे थे। वे विकर्णके रुधिरमें भीगे हुए बाण पृथ्वीपर रक्त वमन करते हुए-से दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ३२ ॥ विकर्णं वीक्ष्य निर्भिन्नं तस्यैवान्ये सहोदराः । अभ्यद्रवन्त समरे सौभद्रप्रमुखान् रथान् ॥ ३३ ॥ विकर्णको क्षत-विक्षत हुआ देख उसके दूसरे भाइयोंने समरभूमिमें अभिमन्यु आदि रथियोंपर धावा किया ॥ ३३ ॥ अभियात्वा तथैवान्यान् रथांस्तान् सूर्यवर्चसः । अविध्यन् समरेऽन्योन्यं संरम्भाद् युद्धदुर्मदाः ॥ ३४ ॥ वे सब-के-सब युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले थे। उन्होंने दूसरे-दूसरे रथियोंपर भी, जो अभिमन्युकी ही भाँति सूर्यके समान तेजस्वी थे, आक्रमण किया। फिर वे सब लोग अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक-दूसरेको अपने बाणोंद्वारा घायल करने लगे ॥ ३४ ॥ दुर्मुखः श्रुतकर्माणं विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । ध्वजमेकेन चिच्छेद सारथिं चास्य सप्तभिः ॥ ३५ ॥ दुर्मुखने श्रुतकर्माको सात शीघ्रगामी बाणोंद्वारा बींधकर एकसे उसका ध्वज काट डाला और सात बाणोंसे उसके सारथिको घायल कर दिया ॥ ३५ ॥ अश्वान् जाम्बूनदैर्जालैः प्रच्छन्नान् वातरंहसः । जघान षड्भिरासाद्य सारथिं चाभ्यपातयत् ॥ ३६ ॥ उसके घोड़े वायुके समान वेगशाली तथा सोनेकी जालीसे आच्छादित थे। दुर्मुखने उन घोड़ोंको छः बाणोंसे मार डाला और सारथिको भी रथसे नीचे गिरा दिया ॥ ३६ ॥ स हताश्वे रथे तिष्ठन् श्रुतकर्मा महारथः । शक्तिं चिक्षेप संक्रुद्धो महोल्कां ज्वलितामिव ॥ ३७ ॥ महारथी श्रुतकर्मा घोड़ोंके मारे जानेपर भी उसी रथपर खड़ा रहा और अत्यन्त क्रोधमें भरकर उसने दुर्मुखपर प्रज्वलित उल्काके समान एक शक्ति चलायी ॥ ३७ ॥ सा दुर्मुखस्य विमलं वर्म भित्त्वा यशस्विनः ।