महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अहो भवत्या मन्त्रस्य गूहनेन वयं हताः ॥ २१ ॥
निधनेन हि कर्णस्य पीडितास्तु सबान्धवाः ।
‘अहो! आपने इस गूढ़ रहस्यको छिपाकर हमलोगोंको मार डाला। कर्णकी मृत्युसे भाइयोंसहित हमें बड़ी पीड़ा हो रही है॥ २१ १/२॥’
अभिमन्योर्विनाशेन द्रौपदेयवधेन च ॥ २२ ॥
पञ्चालानां विनाशेन कुरूणां पतनेन च ।
ततः शतगुणं दुःखमिदं मामस्पृशद् भृशम् ॥ २३ ॥
‘अभिमन्यु, द्रौपदीके पुत्र और पांचालोंके विनाशसे तथा कुरुकुलके इस पतनसे हमें जितना दुःख हुआ था, उससे सौ गुना यह दुःख इस समय मुझे अत्यन्त व्यथित कर रहा है॥ २२-२३॥’
कर्णमेवानुशोचामि दह्याम्यग्नाविवाहितः ।
नेह स्म किंचिदप्राप्यं भवेदपि दिवि स्थितम् ॥ २४ ॥
न चेदं वैशसं घोरं कौरवान्तकरं भवेत् ।
‘अब तो मैं केवल कर्णके ही शोकमें डूब गया हूँ और इस तरह जल रहा हूँ, मानो मुझे किसीने जलती आगमें रख दिया हो। यदि पहले ही यह बात मुझे मालूम हो गयी होती तो कर्णको पाकर हमारे लिये इस जगत्में कोई स्वर्गीय वस्तु भी अलभ्य नहीं होती तथा कुरुकुलका अन्त कर देनेवाला यह घोर संग्राम भी नहीं हुआ होता’॥ २४ १/२॥
एवं विलप्य बहुलं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥
व्यरुदच्छनकै राजंश्चकारास्योदकं प्रभुः ।
ततो विनेदुः सहसा स्त्रियस्ताः खलु सर्वशः ॥ २६ ॥
अभितो याः स्थितास्तत्र तस्मिन्नुदककर्मणि ।
राजन्! इस प्रकार बहुत विलाप करके धर्मराज युधिष्ठिर फूट-फूटकर रोने लगे। रोते-ही-रोते उन्होंने धीरे-धीरे कर्णके लिये जलदान किया। यह सब सुनकर वहाँ एकत्र हुई सारी स्त्रियाँ, जो वहाँ जलांजलि देनेके लिये सब ओर खड़ी थीं, सहसा जोर-जोरसे रोने लगीं॥ २५-२६ १/२॥
तत आनाययामास कर्णस्य सपरिच्छदाः ॥ २७ ॥
स्त्रियः कुरुपतिर्धीमान् भ्रातुः प्रेम्णा युधिष्ठिरः ।
स ताभिः सह धर्मात्मा प्रेतकृत्यमनन्तरम् ॥ २८ ॥
चकार विधिवद् धीमान् धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
तदनन्तर बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिरने भाईके प्रेमसे कर्णकी स्त्रियोंको परिवारसहित बुलवा लिया और उन सबके साथ रहकर उन धर्मात्मा बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने विधिपूर्वक कर्णका प्रेतकृत्य सम्पन्न किया॥ २७-२८ १/२॥
पापेनासौ मया श्रेष्ठो भ्राता ज्ञातिर्निपातितः ।
।। स्त्रीपर्व सम्पूर्णम् ।।
अतो मनसि यद् गुह्यं स्त्रीणां तन्न भविष्यति ॥ २९ ॥ तदनन्तर वे बोले—'मुझ पापीने इस रहस्यको न जाननेके कारण अपने बड़े भाईको मरवा दिया; अतः आजसे स्त्रियोंके मनमें कोई गुप्त रहस्य नहीं छिपा रह सकेगा' ॥ २९ ॥
इत्युक्त्वा स तु गङ्गाया उत्ताराकुलेन्द्रियः । भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्गङ्गातीरमुपेयिवान् ॥ ३० ॥ ऐसा कहकर व्याकुल इन्द्रियोंवाले राजा युधिष्ठिर गंगाजीके जलसे निकले और समस्त भाइयोंके साथ तटपर आये ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि श्राद्धपर्वणि कर्णगूढजत्वकथने सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत श्राद्धपर्वमें कर्णके जन्मके गूढ़ रहस्यका कथनविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
।। स्त्रीपर्व सम्पूर्णम् ।।
| अनुष्टुप्, | बड़े श्लोक | बड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपर | कुल | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये | ८२२ | (५) | ६ ।। । = | ८२८ ।। । = |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये | १ | ..... | ..... | १ |
| स्त्रीपर्वकी कुल श्लोकसंख्या | ८२९ ।। । = |
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