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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

‘किंतु एक बार यज्ञमें प्रजापतिने उनके इस बर्तावको देखकर कहा—‘देवताओ! तुमने यह अनुचित किया है। वास्तवमें उदारका अन्न उसकी श्रद्धाके कारण पवित्र होता है और कंजूसका अश्रद्धाके कारण अपवित्र एवं नष्टप्राय समझा जाता है* ॥ १२ १/२ ॥
भोज्यमन्नं वदान्यस्य कदर्यस्य न वार्धुषेः ॥ १३ ॥
अश्रद्दधान एवैको देवानां नार्हते हविः ।
तस्यैवान्नं न भोक्तव्यमिति धर्मविदो विदुः ॥ १४ ॥
‘सारांश यह कि उदारका ही अन्न भोजन करना चाहिये; कृपण, श्रोत्रिय एवं केवल सूदखोरका नहीं। जिसमें श्रद्धा नहीं है, एकमात्र वही देवताओंको हविष्य अर्पण करनेका अधिकार नहीं रखता है। उसीका अन्न नहीं खाना चाहिये। धर्मज्ञ पुरुष ऐसा ही मानते हैं ॥
अश्रद्धा परमं पापं श्रद्धा पापप्रमोचिनी ।
जहाति पापं श्रद्धावान् सर्पो जीर्णामिव त्वचम् ॥ १५ ॥
‘अश्रद्धा सबसे बड़ा पाप है और श्रद्धा पापसे छुटकारा दिलानेवाली है। जैसे साँप अपने पुरानी केंचुलको छोड़ देता है, उसी प्रकार श्रद्धालु पुरुष पापका परित्याग कर देता है ॥ १५ ॥
ज्यायसी या पवित्राणां निवृत्तिः श्रद्धया सह ।
निवृत्तशीलदोषो यः श्रद्धावान् पूत एव सः ॥ १६ ॥
‘श्रद्धा होनेके साथ-ही-साथ पापोंसे निवृत्त हो जाना समस्त पवित्रताओंसे बढ़कर है। जिसके शील-सम्बन्धी दोष दूर हो गये हैं, वह श्रद्धालु पुरुष सदा पवित्र ही है ॥ १६ ॥
किं तस्य तपसा कार्यं किं वृत्तेन किमात्मना ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ १७ ॥
‘उसे तपस्याद्वारा क्या लेना है? आचार-व्यवहार अथवा आत्मचिन्तनद्वारा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करना है? यह पुरुष श्रद्धामय है, जिसकी जैसी सात्त्विकी, राजसी या तामसी श्रद्धा होती है, वह वैसा सात्त्विक, राजस या तामस होता है ॥ १७ ॥
इति धर्मः समाख्यातः सद्भिर्धर्मार्थदर्शिभिः ।
वयं जिज्ञासमानास्तु सम्प्राप्ता धर्मदर्शनात् ॥ १८ ॥
‘धर्म और अर्थका साक्षात्कार करनेवाले सत्पुरुषोंने इसी प्रकार धर्मकी व्याख्या की है। हमलोगोंनें धर्मदर्शन नामक मुनिसे जिज्ञासा प्रकट करनेपर उस धर्मका ज्ञान प्राप्त किया है ॥ १८ ॥
श्रद्धां कुरु महाप्राज्ञ ततः प्राप्स्यसि यत् परम् ।
श्रद्धावान् श्रद्दधानश्च धर्मश्चैव हि जाजले ।
स्ववर्त्मनि स्थितश्चैव गरीयानेव जाजले ॥ १९ ॥
महाज्ञानी जाजलि! तुम इसपर श्रद्धा करो। तदनन्तर इसके अनुसार आचरण करनेसे तुम्हें परमगतिकी प्राप्ति होगी। श्रद्धा करनेवाला श्रद्धालु पुरुष साक्षात् धर्मका स्वरूप है।

जाजले! जो श्रद्धापूर्वक अपने धर्मपर स्थित है, वही सबसे श्रेष्ठ माना गया है'* ।। १९ ।।
भीष्म उवाच
ततोऽचिरेण कालेन तुलाधारः स एव च ।
दिवं गत्वा महाप्राज्ञौ विहरेतां यथासुखम् ॥ २० ॥
स्वं स्वं स्थानमुपागम्य स्वकर्मफलनिर्जितम् ।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर थोड़े ही समयमें तुलाधार और जाजलि दोनों महाज्ञानी पुरुष परमधाममें जाकर अपने शुभ कर्मोंके फलस्वरूप अपने-अपने स्थानको पाकर वहाँ सुखपूर्वक विहार करने लगे ।। २० १/२ ।।
एवं बहुविधार्थं च तुलाधारेण भाषितम् ।। २१ ।।
सम्यक् चेदमुपालब्धो धर्मश्चोक्तः सनातनः ।
तस्य विख्यातवीर्यस्य श्रुत्वा वाक्यानि स द्विजः ।। २२ ।।
इस प्रकार तुलाधारने नाना प्रकारके वक्तव्य विषयोंसे युक्त उत्तम भाषण किया। उन्होंने सनातन धर्मका भी वर्णन किया। ब्राह्मण जाजलिने विख्यात प्रभावशाली तुलाधारके वे वचन सुनकर उनके इस तात्पर्यको भलीभाँति हृदयंगम किया ।। २१-२२ ।।
तुलाधारस्य कौन्तेय शान्तिमेवान्वपद्यत ।
एवं बहुमतार्थं च तुलाधारेण भाषितम् ।
यथौपम्योपदेशेन किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। २३ ।।
कुन्तीनन्दन! तुलाधारने जो उपदेश दिया था, वह बहुजनसम्मत अर्थसे युक्त था। उसे सुनकर जाजलिको परम शान्ति प्राप्त हुई। उसे यथावत् दृष्टान्तपूर्वक समझाया गया है। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि तुलाधारजाजलिसंवादे
चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २६४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तुलाधार-जाजलि-संवादविषयक दो सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २६४ ।।


* अतः श्रद्धाहीन पवित्रकी अपेक्षा पवित्रताहीन श्रद्धालुका ही अन्न ग्रहण करनेयोग्य है। इसी प्रकार कृपण वेदवेत्ता और दानी सूदखोरमेंसे दानी सूदखोरका ही अन्न श्रद्धापूत एवं ग्राह्य है। केवल सूदखोर और केवल कृपणका अन्न तो त्याज्य है ही।

राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा

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पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
प्रजानामनुकम्पार्थं गीतं राज्ञा विचख्नुना ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा—राजन्! प्राचीन कालमें राजा विचख्नुने समस्त प्राणियोंपर दया करनेके लिये जो उद्गार प्रकट किया था, उस प्राचीन इतिहासका इस प्रसंगमें जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते हैं ॥ १ ॥

छिन्नस्थूणं वृषं दृष्ट्वा विलापं च गवां भृशम् ।
गोग्रहे यज्ञवाटस्य प्रेक्षमाणः स पार्थिवः ॥ २ ॥
एक समय किसी यज्ञशालामें राजाने देखा कि एक बैलकी गर्दन कटी हुई है और वहाँ बहुत-सी गौएँ आर्तनाद कर रही हैं। यज्ञशालाके प्रांगणमें कितनी ही गौएँ खड़ी हैं। यह सब देखकर राजा बोले— ॥ २ ॥

स्वस्ति गोभ्योऽस्तु लोकेषु ततो निर्वचनं कृतम् ।
हिंसायां हि प्रवृत्तायामाशीरेषा तु कल्पिता ॥ ३ ॥
'संसारमें समस्त गौओंका कल्याण हो।' जब हिंसा आरम्भ होने जा रही थी, उस समय उन्होंने गौओंके लिये यह शुभ कामना प्रकट की और उस हिंसाका निषेध करते हुए कहा— ॥ ३ ॥

अव्यवस्थितमर्यादैर्विमूढैर्नास्तिकैर्नरैः ।
संशयात्मभिरव्यक्तैर्हिंसा समनुवर्णिता ॥ ४ ॥
'जो धर्मकी मर्यादासे भ्रष्ट हो चुके हैं, मूर्ख हैं, नास्तिक हैं तथा जिन्हें आत्माके विषयमें संदेह है एवं जिनकी कहीं प्रसिद्धि नहीं है, ऐसे लोगोंने ही हिंसाका समर्थन किया है ॥ ४ ॥

सर्वकर्मस्वहिंसा हि धर्मात्मा मनुरब्रवीत् ।
कामकाराद् विहिंसन्ति बहिर्वेद्यां पशून् नराः ॥ ५ ॥
धर्मात्मा मनुने सम्पूर्ण कर्मोंमें अहिंसाका ही प्रतिपादन किया है। मनुष्य अपनी ही इच्छासे यज्ञकी बाह्यवेदीपर पशुओंका बलिदान करते हैं ॥ ५ ॥

तस्मात् प्रमाणतः कार्यों धर्मः सूक्ष्मो विजानता ।
अहिंसा सर्वभूतेभ्यो धर्मेभ्यो ज्यायसी मता ॥ ६ ॥
अतः विज्ञ पुरुषको उचित है कि वह वैदिक प्रमाणसे धर्मके सूक्ष्म स्वरूपका निर्णय करे। सम्पूर्ण भूतोंके लिये जिन धर्मोंका विधान किया गया है, उनमें अहिंसा ही सबसे बड़ी

मानी गयी है ।। ६ ।।
उपोष्य संशितो भूत्वा हित्वा वेदकृताः श्रुतीः ।
आचार इत्यनाचारः कृपणाः फलहेतवः ।। ७ ।।
उपवासपूर्वक कठोर नियमोंका पालन करे। वेदकी फलश्रुतियोंका परित्याग कर दे अर्थात् काम्य कर्मोंको छोड़ दे, सकाम कर्मोंके आचरणको अनाचार समझकर उनमें प्रवृत्त न हो। कृपण (क्षुद्र) मनुष्य ही फलकी इच्छासे कर्म करते हैं ।। ७ ।।
यदि यज्ञांश्च वृक्षांश्च यूपांश्चोद्दिश्य मानवाः ।
वृथा मांसं न खादन्ति नैष धर्मः प्रशस्यते ।। ८ ।।
यदि कहें कि मनुष्य यूपनिर्माणके उद्देश्यसे जो वृक्ष काटते और यज्ञके उद्देश्यसे पशुबलि देकर जो मांस खाते हैं, वह व्यर्थ नहीं है। अपितु धर्म ही है तो यह ठीक नहीं; क्योंकि ऐसे धर्मकी कोई प्रशंसा नहीं करते ।। ८ ।।
सुरा मत्स्या मधु मांसमासवं कृसरौदनम् ।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ।। ९ ।।
सुरा, आसव, मधु, मांस और मछली तथा तिल और चावलकी खिचड़ी—इन सब वस्तुओंको धूर्तोंने यज्ञमें प्रचलित कर दिया है। वेदोंमें इनके उपयोगका विधान नहीं है ।। ९ ।।
मानान्मोहाच्च लोभाच्च लौल्यमेतत्प्रकल्पितम् ।
उन धूर्तोंने अभिमान, मोह और लोभके वशीभूत होकर उन वस्तुओंके प्रति अपनी यह लोलुपता ही प्रकट की है ।। ९ १/२ ।।
विष्णुमेवाभिजानन्ति सर्वयज्ञेषु ब्राह्मणाः ।। १० ।।
पायसैः सुमनोभिश्च तस्यापि यजनं स्मृतम् ।
ब्राह्मण तो सम्पूर्ण यज्ञोंमें भगवान् विष्णुका ही आदरभाव मानते हैं और खीर तथा फूल आदिसे ही उनकी पूजाका विधान है ।। १० १/२ ।।
यज्ञियाश्चैव ये वृक्षा वेदेषु परिकल्पिताः ।। ११ ।।
यच्चापि किंचित् कर्तव्यमन्यच्चोक्षैः सुसंस्कृतम् ।
महासत्त्वैः शुद्धभावैः सर्वं देवार्हमेव तत् ।। १२ ।।
वेदोंमें जो यज्ञ-सम्बन्धी वृक्ष बताये गये हैं, उन्हींका यज्ञोंमें उपयोग होना चाहिये। शुद्ध आचार-विचारवाले महान् सत्त्वगुणी पुरुष अपनी विशुद्ध भावनासे प्रोक्षण आदिके द्वारा उत्तम संस्कार करके जो कोई भी हविष्य या नैवेद्य तैयार करते हैं, वह सब देवताओंको अर्पण करनेके योग्य ही होता है ।। ११-१२ ।।

युधिष्ठिर उवाच
शरीरमापदश्चापि विवदन्त्यविहिंसतः ।

कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यते ॥ १३ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो हिंसासे अत्यन्त दूर रहनेवाला है, उस पुरुषका शरीर और आपत्तियाँ परस्पर विवाद करने लगती हैं—आपत्तियाँ शरीरका शोषण करती हैं और शरीर आपत्तियोंका नाश चाहता है; अतः सूक्ष्म हिंसाके भयसे कृषि आदि किसी कार्यका आरम्भ न करनेवाले पुरुषकी शरीरयात्राका निर्वाह कैसे होगा? ॥ १३ ॥

भीष्म उवाच
यथा शरीरं न ग्लायेन्नेयान्मृत्युवशं यथा ।
तथा कर्मसु वर्तेत समर्थो धर्ममाचरेत् ॥ १४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! कर्मोंमें इस प्रकार प्रवृत्त होना चाहिये, जिससे शरीरकी शक्ति सर्वथा क्षीण न हो जाय, जिससे वह मृत्युके अधीन न हो जाय; क्योंकि मनुष्य शरीरके समर्थ होनेपर ही धर्मका पालन कर सकता है ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि विचख्नुगीतायां
पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें विचख्नुगीताविषयक दो सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६५ ॥

महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा

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षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा

युधिष्ठिर उवाच

कथं कार्यं परीक्षेत शीघ्रं वाथ चिरेण वा ।
सर्वथा कार्यदुर्गेऽस्मिन् भवान् नः परमो गुरुः ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! आप मेरे परम गुरु हैं। कृपया यह बतलाइये कि यदि कभी सर्वथा ऐसा कार्य उपस्थित हो जाय, जो गुरुजनोंकी आज्ञाके कारण अवश्य कर्तव्य हो, परंतु हिंसायुक्त होनेके कारण दुष्कर एवं अनुचित प्रतीत होता हो तो ऐसे अवसरपर उस कार्यकी परख कैसे करनी चाहिये? उसे शीघ्र कर डाले या देरतक उसपर विचार करता रहे ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
चिरकारेस्तु यत् पूर्वं वृत्तमाङ्गिरसे कुले ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**बेटा! इस विषयमें जानकार लोग इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, जो पहले आंगिरस-कुलमें उत्पन्न चिरकारीपर बीत चुका है ॥ २ ॥

चिरकारिक भद्रं ते भद्रं ते चिरकारिक ।
चिरकारी हि मेधावी नापराध्यति कर्मसु ॥ ३ ॥

‘चिरकारी! तुम्हारा कल्याण हो। चिरकारी! तुम्हारा मंगल हो। चिरकारी बड़ा बुद्धिमान् है। चिरकारी कर्तव्योंके पालनमें कभी अपराध नहीं करता है।’ (यह बात चिरकारीकी प्रशंसा करते हुए उसके पिताने कही थी) ॥ ३ ॥

चिरकारी महाप्राज्ञो गौतमस्याभवत् सुतः ।
चिरेण सर्वकार्याणि विमृश्यार्थान् प्रपद्यते ॥ ४ ॥

कहते हैं, महर्षि गौतमके एक महाज्ञानी पुत्र था, जिसका नाम था चिरकारी। वह कर्तव्य-विषयोंका भलीभाँति विचार करके सारे कार्य विलम्बसे किया करता था ॥ ४ ॥

चिरं स चिन्तयत्यर्थांश्चिरं जाग्रच्चिरं स्वपन् ।
चिरं कार्याभिपत्तिं च चिरकारी तथोच्यते ॥ ५ ॥

वह सभी विषयोंपर बहुत देरतक विचार करता था, चिरकालतक जागता था और चिरकालतक सोता था तथा चिर-विलम्बके बाद ही कार्य पूर्ण करता था; इसलिये सब लोग उसे चिरकारी कहने लगे ॥ ५ ॥

अलसग्रहणं प्राप्तो दुर्मेधावी तथोच्यते ।
बुद्धिलाघवयुक्तेन जनेनादीर्घदर्शिना ॥ ६ ॥
जो दूरतककी बात नहीं सोच सकते, ऐसे मन्दबुद्धि मानवोंने उसे आलसीकी उपाधि दे दी। उसे दुर्बुद्धि कहा जाने लगा ॥ ६ ॥

व्यभिचारे तु कस्मिंश्चिद् व्यतिक्रम्यापरान् सुतान् ।
पित्रोक्तः कुपितेनाथ जहीमां जननीमिति ॥ ७ ॥
एक दिनकी बात है, गौतमने अपनी स्त्रीके द्वारा किये गये किसी व्यभिचारपर कुपित हो अपने दूसरे पुत्रोंको न कहकर चिरकारीसे कहा—बेटा! तू अपनी इस पापिनी माताको मार डाल' ॥ ७ ॥

इत्युक्त्वा स तदा विप्रो गौतमो जपतां वरः ।
अविमृश्य महाभागो वनमेव जगाम सः ॥ ८ ॥
उस समय बिना बिचारे ही ऐसी आज्ञा देकर जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि महाभाग गौतम वनमें चले गये ॥ ८ ॥

स तथेति चिरेणोक्त्वा स्वभावाच्चिरकारिकः ।
विमृश्य चिरकारित्वाच्चिन्तयामास वै चिरम् ॥ ९ ॥
चिरकारीने अपने स्वभावके अनुसार देर करके कहा, 'बहुत अच्छा'। चिरकारी तो वह था ही, चिरकालतक उस बातपर विचार करता रहा ॥ ९ ॥

पितुराज्ञां कथं कुर्यां न हन्यां मातरं कथम् ।
कथं धर्मच्छलेनास्मिन् निमज्जेयमसाधुवत् ॥ १० ॥
उसने सोचा कि 'मैं किस उपायसे काम लूँ जिससे पिताकी आज्ञाका पालन भी हो जाय और माताका वध भी न करना पड़े। धर्मके बहाने यह मेरे ऊपर महान् संकट आ गया है। भला, अन्य असाधु पुरुषोंकी भाँति मैं भी इसमें डूबनेका कैसे साहस करूँ? ॥ १० ॥

पितुराज्ञा परो धर्मः स्वधर्मो मातृरक्षणम् ।
अस्वतन्त्रं च पुत्रत्वं किं तु मां नानुपीडयेत् ॥ ११ ॥
'पिताकी आज्ञाका पालन परम धर्म है और माताकी रक्षा करना पुत्रका प्रधान धर्म है। पुत्र कभी स्वतन्त्र नहीं होता, वह सदा माता-पिताके अधीन ही रहता है, अतः क्या करूँ जिससे मुझे धर्मकी हानिरूप पीड़ा न हो ॥ ११ ॥

स्त्रियं हत्वा मातरं च को हि जातु सुखी भवेत् ।
पितरं चाप्यवज्ञाय कः प्रतिष्ठामवाप्नुयात् ॥ १२ ॥
'एक तो स्त्री-जाति, दूसरे माताका वध करके कौन पुत्र कभी भी सुखी हो सकता है? पिताकी अवहेलना करके भी कौन प्रतिष्ठा पा सकता है? ॥ १२ ॥

अनवज्ञा पितुर्युक्ता धारणं मातृरक्षणम् ।
युक्तक्षमावुभावेतौ नातिवर्तेत मां कथम् ॥ १३ ॥

‘पिताका अनादर उचित नहीं है, साथ ही माताकी रक्षा करना भी पुत्रका धर्म है। ये दोनों ही धर्म उचित और योग्य हैं। मैं किस प्रकार इनका उल्लंघन न करूँ? ।। पिता ह्यात्मानमाधत्ते जायायां जज्ञिवानिति । शीलचारित्रगोत्रस्य धारणार्थं कुलस्य च ॥ १४ ॥ ‘पिता स्वयं अपने शील, सदाचार, कुल और गोत्रकी रक्षाके लिये स्त्रीके गर्भमें अपना ही आधान करता और पुत्ररूपमें उत्पन्न होता है ॥ १४ ॥ सोऽहं मात्रा स्वयं पित्रा पुत्रत्वे प्रकृतः पुनः । विज्ञानं मे कथं न स्याद् द्वौ बुद्धये चात्मसम्भवम् ॥ १५ ॥ ‘अतः मुझे माता और पिता—दोनोंने ही पुत्रके रूपमें जन्म दिया है। मैं इन दोनोंको ही अपनी उत्पत्तिका कारण समझता हूँ। मेरा ऐसा ही ज्ञान क्यों न सदा बना रहे? ॥ १५ ॥ जातकर्मणि यत् प्राह पिता यच्चोपकर्मणि । पर्याप्तः स दृढीकारः पितुर्गौरवनिश्चये ॥ १६ ॥ ‘जातकर्म-संस्कार और उपनयन-संस्कारके समय पिताने जो आशीर्वाद दिया है, वह पिताके गौरवका निश्चय करानेमें पर्याप्त एवं सुदृढ़ प्रमाण है ॥ १६ ॥ गुरुरग्र्यः परो धर्मः पोषणाध्यापनान्वितः । पिता यदाह धर्मः स वेदेष्वपि सुनिश्चितः ॥ १७ ॥ ‘पिता भरण-पोषण करने तथा शिक्षा देनेके कारण पुत्रका प्रधान गुरु है। वह परम धर्मका साक्षात् स्वरूप है। पिता जो कुछ आज्ञा दे, उसे ही धर्म समझकर स्वीकार करना चाहिये। वेदोंमें भी उसीको धर्म निश्चित किया गया है ॥ १७ ॥ प्रीतिमात्रं पितुः पुत्रः सर्वं पुत्रस्य वै पिता । शरीरादीनि देयानि पिता त्वेकः प्रयच्छति ॥ १८ ॥ ‘पुत्र पिताकी सम्पूर्ण प्रीतिरूप है और पिता पुत्रका सर्वस्व है। केवल पिता ही पुत्रको देह आदि सम्पूर्ण देने योग्य वस्तुओंको देता है ॥ १८ ॥ तस्मात् पितुर्वचः कार्यं न विचार्यं कदाचन । पातकान्यपि पूयन्ते पितुः शासनकारिणः ॥ १९ ॥ ‘इसलिये पिताके आदेशका पालन करना चाहिये। उसपर कभी कोई विचार नहीं करना चाहिये। जो पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाला है, उसके पातक भी नष्ट हो जाते हैं ॥ १९ ॥ भोग्ये भोज्ये प्रवचने सर्वलोकनिदर्शने । भर्त्रा चैव समायोगे सीमन्तोन्नयने तथा ॥ २० ॥ ‘पुत्रके भोग्य (वस्त्र आदि), भोज्य (अन्न आदि), प्रवचन (वेदाध्ययन), सम्पूर्ण लोक-व्यवहारकी शिक्षा तथा गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन आदि समस्त संस्कारोंके सम्पादनमें पिता ही प्रभु है ॥ २० ॥

पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः ।
पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवताः ॥ २१ ॥
‘इसलिये पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है और पिता ही सबसे बड़ी तपस्या है। पिताके प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हो जाते हैं॥ २१ ॥

आशिषस्ता भजन्त्येनं परुषं प्राह यत् पिता ।
निष्कृतिः सर्वपापानां पिता यच्चाभिनन्दति ॥ २२ ॥
‘पिता पुत्रसे यदि कुछ कठोर बातें कह देता है तो वे आशीर्वाद बनकर उसे अपना लेती हैं और पिता यदि पुत्रका अभिनन्दन करता है—मीठे वचन बोलकर उसके प्रति प्यार और आदर दिखाता है तो इससे पुत्रके सम्पूर्ण पापोंका प्रायश्चित्त हो जाता है॥ २२ ॥

मुच्यते बन्धनात् पुष्पं फलं वृक्षात् प्रमुच्यते ।
क्लिश्यन्नपि सुतं स्नेहैः पिता पुत्रं न मुञ्चति ॥ २३ ॥
‘फूल डंठलसे अलग हो जाता है, फल वृक्षसे अलग हो जाता है; परंतु पिता कितने ही कष्टमें क्यों न हो, लाड़-प्यारसे पाले हुए अपने पुत्रको कभी नहीं छोड़ता है अर्थात् पुत्र कभी पितासे अलग नहीं हो सकता॥ २३ ॥

एतद् विचिन्तितं तावत् पुत्रस्य पितृगौरवम् ।
पिता नाल्पतरं स्थानं चिन्तयिष्यामि मातरम् ॥ २४ ॥
‘पुत्रके निकट पिताका कितना गौरव होना चाहिये, इस बातपर पहले विचार किया है। विचार करनेसे यह बात स्पष्ट हो गयी कि पिता पुत्रके लिये कोई छोटा-मोटा आश्रय नहीं है। अब मैं माताके विषयमें सोचता हूँ॥ २४ ॥

यो ह्ययं मयि संघातो मर्त्यत्वे पाञ्चभौतिकः ।
अस्य मे जननी हेतुः पावकस्य यथारणिः ॥ २५ ॥
‘मेरे लिये जो यह पाञ्चभौतिक मनुष्यशरीर मिला है, इसके उत्पन्न होनेमें मेरी माता ही मुख्य हेतु है। जैसे अग्निके प्रकट होनेका मुख्य आधार अरणी-काष्ठ है॥ २५ ॥

माता देहारणिः पुंसां सर्वस्यार्तस्य निर्वृतिः ।
मातृलाभे सनाथत्वमनाथत्वं विपर्यये ॥ २६ ॥
‘माता मनुष्योंके शरीररूपी अग्निको प्रकट करनेवाली अरणी है। संसारके समस्त आर्त प्राणियोंको सुख और सान्त्वना प्रदान करनेवाली माता ही है। जबतक माता जीवित रहती है, मनुष्य अपनेको सनाथ समझता है और उसके न रहनेपर वह अनाथ हो जाता है॥ २६ ॥

न च शोचति नाप्येनं स्थाविर्यमपकर्षति ।
श्रिया हीनोऽपि यो गेहमम्बेति प्रतिपद्यते ॥ २७ ॥
‘माताके रहते मनुष्यको कभी चिन्ता नहीं होती है, बुढ़ापा उसे अपनी ओर नहीं खींचता है। जो अपनी माँको पुकारता हुआ घरमें जाता है, वह निर्धन होनेपर भी मानो

माता अन्नपूर्णाके पास चला जाता है ।। २७ ।। पुत्रपौत्रोपपन्नोऽपि जननीं यः समाश्रितः । अपि वर्षशतस्यान्ते स द्विहायनवच्चरेत् ।। २८ ।। ‘पुत्र और पौत्रोंसे सम्पन्न होनेपर भी जो अपनी माताके आश्रयमें रहता है, वह सौ वर्षकी अवस्थाके बाद भी उसके पास दो वर्षके बच्चेके समान आचरण करता है ।। २८ ।। समर्थं वासमर्थं वा कृशं वाप्यकृशं तथा । रक्षत्येव सुतं माता नान्यः पोष्टा विधानतः ।। २९ ।। ‘पुत्र असमर्थ हो या समर्थ, दुर्बल हो या हृष्ट-पुष्ट, माता उसका पालन करती ही है। माताके सिवा दूसरा कोई विधिपूर्वक पुत्रका पालन-पोषण नहीं कर सकता ।। २९ ।। तदा स वृद्धो भवति तदा भवति दुःखितः । तदा शून्यं जगत् तस्य यदा मात्रा वियुज्यते ।। ३० ।। ‘जब मातासे विछोह हो जाता है, उसी समय मनुष्य अपनेको बूढ़ा समझने लगता है, दुखी हो जाता है और उसके लिये सारा संसार सूना प्रतीत होने लगता है ।। नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः । नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रिया ।। ३१ ।। ‘माताके समान दूसरी कोई छाया नहीं है अर्थात् माताकी छत्रछायामें जो सुख है, वह कहीं नहीं है। माताके तुल्य दूसरा सहारा नहीं है, माताके सदृश अन्य कोई रक्षक नहीं है तथा बच्चेके लिये माँके समान दूसरी कोई प्रिय वस्तु नहीं है ।। ३१ ।। कुक्षिसंधारणाद् धात्री जननाज्जननी स्मृता । अङ्गानां वर्धनादम्बा वीरसूत्वेन वीरसूः ।। ३२ ।। ‘वह गर्भाशयमें धारण करनेके कारण धात्री, जन्म देनेके कारण जननी, शिशुका अङ्गवर्धन (पालन-पोषण) करनेसे अम्बा तथा वीर-संतानका प्रसव करनेके कारण वीरसू कही गयी है ।। ३२ ।। शिशोः शुश्रूषणाच्छुश्रूर्माता देहमनन्तरम् । चेतनावान् नरो हन्याद् यस्य नासुषिरं शिरः ।। ३३ ।। ‘वह शिशुकी शुश्रूषा करके शुश्रू नाम धारण करती है। माता अपना निकटतम शरीर है। जिसका मस्तिष्क विचार शून्य नहीं हो गया है, ऐसा कोई सचेतन मनुष्य कभी अपनी माताकी हत्या नहीं कर सकता ।। ३३ ।। दम्पत्योः प्राणसंश्लेषे योऽभिसंधिः कृतः किल । तं माता च पिता चेति भूतार्थो मातरि स्थितः ।। ३४ ।। ‘पति और पत्नी मैथुनकालमें सुयोग्य पुत्र होनेके लिये जो अभिलाषा करते हैं, उसे यद्यपि पिता और माता—दोनों धारण करते हैं तथापि वास्तवमें वह अभिलाषा मातामें ही प्रतिष्ठित होती है ।। ३४ ।।

माता जानाति यद्गोत्रं माता जानाति यस्य सः ।
मातुर्भरणमात्रेण प्रीतिः स्नेहः पितुः प्रजाः ॥ ३५ ॥
‘पुत्रका गोत्र क्या है? यह माता जानती है। वह किस पिताका पुत्र है? यह भी माता ही जानती है। माता बालकको अपने गर्भमें धारण करती है, इसलिये उसीका उसपर अधिक स्नेह और प्रेम होता है। पिताका तो अपनी संतानपर प्रभुत्वमात्र है ॥ ३५ ॥
पाणिबन्धं स्वयं कृत्वा सह धर्ममुपेत्य च ।
यदा यास्यन्ति पुरुषाः स्त्रियो नार्हन्ति वाच्यताम् ॥ ३६ ॥
‘जब स्वयं ही पत्नीका पाणिग्रहण करके साथ-साथ धर्माचरण करनेकी प्रतिज्ञा लेकर भी पुरुष परायी स्त्रियोंके पास जायेंगे (और उनपर बलात्कार करेंगे), तब इसके लिये स्त्रियोंको दोषी नहीं ठहराया जा सकता ॥ ३६ ॥
भरणाद्धि स्त्रियो भर्ता पालनाद्धि पतिस्तथा ।
गुणस्यास्य निवृत्तौ तु न भर्ता न पुनः पतिः ॥ ३७ ॥
‘पुरुष अपनी स्त्रीका भरण-पोषण करनेसे भर्ता और पालन करनेके कारण पति कहलाता है। इन गुणोंके न रहनेपर वह न तो भर्ता है और न पति ही कहलाने योग्य है ॥ ३७ ॥
एवं स्त्री नापराध्नोति नर एवापराध्यति ।
व्युच्चरंश्च महादोषं नर एवापराध्यति ॥ ३८ ॥
‘वास्तवमें स्त्रीका कोई अपराध नहीं होता है, पुरुष ही अपराध करता है। व्यभिचारका महान् पाप पुरुष ही करता है, इसलिये वही अपराधी है ॥ ३८ ॥
स्त्रिया हि परमो भर्ता दैवतं परमं स्मृतम् ।
तस्यात्मना तु सदृशमात्मानं परमं ददौ ॥ ३९ ॥
‘स्त्रीके लिये पति ही परम आदरणीय है, वही उसका सबसे बड़ा देवता माना गया है। मेरी माताने ऐसे पुरुषको आत्मसमर्पण किया है, जो शरीरसे, वेशभूषासे पिताजीके समान ही था ॥ ३९ ॥
नापराधोऽस्ति नारीणां नर एवापराध्यति ।
सर्वकार्यापराध्यत्वान्नापराध्यन्ति चाङ्गनाः ॥ ४० ॥
‘ऐसे अवसरोंपर स्त्रियोंका अपराध नहीं होता, पुरुष ही अपराधी होता है। सभी कार्योंमें अबला होनेके कारण स्त्रियोंको अपराधके लिये विवश कर दिया जाता है, अतः पराधीन होनेके कारण वे अपराधिनी नहीं हैं ॥ ४० ॥
यश्च नोक्तोऽथ निर्देशः स्त्रिया मैथुनतृप्तये ।
तस्य स्मारयतो व्यक्तमधर्मो नास्ति संशयः ॥ ४१ ॥
‘स्त्रीके द्वारा मैथुनजनित सुखसे तृप्त होनेके लिये कोई संकेत न करनेपर भी उसके कामको उद्दीप्त करनेवाले पुरुषको स्पष्ट ही अधर्मकी प्राप्ति होती है। इसमें संशय नहीं

है॥ ४१ ॥ एवं नारीं मातरं च गौरवे चाधिके स्थिताम् । अवध्यां तु विजानीयुः पशवोऽप्यविचक्षणाः ॥ ४२ ॥ 'इस प्रकार विचार करनेसे एक तो वह नारी होनेके कारण ही अवध्य है, दूसरे मेरी पूजनीया माता है। माताका गौरव पितासे भी बढ़कर है, जिसमें मेरी माँ प्रतिष्ठित है। नासमझ पशु भी स्त्री और माताको अवध्य मानते हैं (फिर मैं समझदार मनुष्य होकर भी उसका वध कैसे करूँ?) ॥

देवतानां समावायमेकस्थं पितरं विदुः । मर्त्यानां देवतानां च स्नेहादभ्येति मातरम् ॥ ४३ ॥ 'मनीषी पुरुष यह जानते हैं कि पिता एक स्थानपर स्थित सम्पूर्ण देवताओंका समूह है; परंतु माताके भीतर उसके स्नेहवश समस्त मनुष्यों और देवताओंका समुदाय स्थित रहता है (अतः माताका गौरव पितासे भी अधिक है) ॥ ४३ ॥

एवं विमृशतस्तस्य चिरकारितया बहु । दीर्घः कालो व्यतिक्रान्तस्ततोऽस्याभ्यागमत् पिता ॥ ४४ ॥ विलम्ब करनेका स्वभाव होनेके कारण चिरकारी इस प्रकार सोचता-विचारता रहा। इसी सोच-विचारमें बहुत अधिक समय व्यतीत हो गया। इतनेमें ही उसके पिता वनसे लौट आये ॥ ४४ ॥

मेधातिथिर्महाप्राज्ञो गौतमस्तपसि स्थितः । विमृश्य तेन कालेन पत्न्याः संस्थाव्यतिक्रमम् ॥ ४५ ॥ सोऽब्रवीद् भृशसंतप्तो दुःखैनाश्रूणि वर्तयन् । श्रुतधैर्यप्रसादेन पश्चात्तापमुपागतः ॥ ४६ ॥ महाज्ञानी तपोनिष्ठ मेधातिथि गौतम उस समय पत्नीके वधके अनौचित्यपर विचार करके अधिक संतप्त हो गये। वे दुःखसे आँसू बहाते हुए वेदाध्ययन और धैर्यके प्रभावसे किसी तरह अपनेको सँभाले रहे और पश्चात्ताप करते हुए मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगे — ॥ ४५-४६ ॥

आश्रमं मम सम्प्राप्तस्त्रिलोकेशः पुरंदरः । अतिथिव्रतमास्थाय ब्राह्मणं रूपमास्थितः ॥ ४७ ॥ स मया सान्त्वितो वाग्भिः स्वागतेनाभिपूजितः । अर्घ्यं पाद्यं यथान्यायं मया च प्रतिपादितः ॥ ४८ ॥ 'अहो! त्रिभुवनका स्वामी इन्द्र ब्राह्मणका रूप धारण करके मेरे आश्रमपर आया था। मैंने अतिथि-सत्कारके गृहस्थोचित व्रतका आश्रय लेकर उसे मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना दी, उसका स्वागत-सत्कार किया और यथोचित रूपसे अर्घ्य-पाद्य आदि निवेदन करके मैंने स्वयं ही उसकी विधिवत् पूजा की ॥ ४७-४८ ॥

परवानस्मि चेत्युक्तः प्रणयिष्यति तेन च । अत्र चाकुशले जाते स्त्रिया नास्ति व्यतिक्रमः ॥ ४९ ॥ ‘मैंने विनयपूर्वक कहा—‘भगवन्! मैं आपके अधीन हूँ। आपके पदार्पणसे मैं सनाथ हो गया।’ मुझे आशा थी कि मेरे इस सद्व्यवहारसे संतुष्ट होकर अतिथिदेवता मुझसे प्रेम करेंगे; परंतु यहाँ इन्द्रकी विषयलोलुपताके कारण दुःखद घटना घटित हो गयी। इसमें मेरी स्त्रीका कोई अपराध नहीं ॥ ४९ ॥ एवं न स्त्री न चैवाहं नाध्वगस्त्रिदशेश्वरः । अपराध्यति धर्मस्य प्रमादस्त्वपराध्यति ॥ ५० ॥ ‘इस प्रकार न तो स्त्री अपराधिनी है, न मैं अपराधी हूँ और न एक पथिक ब्राह्मणके वेशमें आया हुआ देवताओंका राजा इन्द्र ही अपराधी है। मेरे द्वारा धर्मके विषयमें जो स्त्रीवधरूप प्रमाद हुआ है, वही इस अपराधकी जड़ है ॥ ५० ॥

अध्याय (पृष्ठ 1716)

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चिरकारी शस्त्र त्यागकर अपने पिताको प्रणाम कर रहे हैं

ईर्ष्याजं व्यसनं प्राहुस्तेन चैवोध्वरेतसः ।
ईर्ष्यया त्वहमाक्षिप्तो मग्नो दुष्कृतसागरे ॥ ५१ ॥
'ऊर्ध्वरेता मुनि उस प्रमादके ही कारण ईर्ष्याजनित संकटकी प्राप्ति बताते हैं; ईर्ष्याने मुझे पापके समुद्रमें ढकेल दिया है और मैं उसमें डूब गया हूँ।। ५१ ।।

हत्वा साध्वीं च नारीं च व्यसनित्वाच्च वासिताम् ।
भर्तव्यत्वेन भार्यां च को नु मां तारयिष्यति ॥ ५२ ॥
'जिसे मैंने पत्नीके रूपमें अपने घरमें आश्रय दिया था। जो एक सती-साध्वी नारी थी और भार्या होनेके कारण मुझसे भरण-पोषण पानेकी अधिकारिणी थी, उसीका मैंने प्रमादरूपी व्यसनके वशीभूत होनेके कारण वध करा डाला। अब इस पापसे मेरा कौन उद्धार करेगा? ।।

अन्तरेण मयाऽऽज्ञप्तश्चिरकारीत्युदारधीः ।
यद्यद्य चिरकारी स्यात् स मां त्रायेत पातकात् ॥ ५३ ॥
'परंतु मैंने उदारबुद्धि चिरकारीको उसकी माताके वधके लिये आज्ञा दी थी। यदि उसने इस कार्यमें विलम्ब करके अपने नामको सार्थक किया हो तो वही मुझे स्त्रीहत्याके पापसे बचा सकता है ।। ५३ ।।

चिरकारिक भद्रं ते भद्रं ते चिरकारिक ।
यद्यद्य चिरकारी त्वं ततोऽसि चिरकारिकः ॥ ५४ ॥
'बेटा चिरकारी! तेरा कल्याण हो। चिरकारी! तेरा मंगल हो। यदि आज भी तूने विलम्बसे कार्य करनेके अपने स्वभावका अनुसरण किया हो तभी तेरा चिरकारी नाम सफल हो सकता है ।। ५४ ।।

त्राहि मां मातरं चैव तपो यच्चार्जितं मया ।
आत्मानं पातकेभ्यश्च भवाद्य चिरकारिकः ॥ ५५ ॥
'बेटा! आज विलम्ब करके तू वास्तवमें चिरकारी बन और मेरी, अपनी माताकी तथा मैंने जो तपका उपार्जन किया है, उसकी भी रक्षा कर। साथ ही अपने-आपको भी पातकोंसे बचा ले ।। ५५ ।।

सहजं चिरकारित्वमतिप्रज्ञतया तव ।
सफलं तत् तथा तेऽस्तु भवाद्य चिरकारिकः ॥ ५६ ॥
'अत्यन्त बुद्धिमान् होनेके कारण तुझमें जो चिरकारिताका सहज गुण है, वह इस समय सफल हो। आज तू वास्तवमें चिरकारी बन ।। ५६ ।।

चिरमाशंसितो मात्रा चिरं गर्भेण धारितः ।
सफलं चिरकारित्वं कुरु त्वं चिरकारिक ॥ ५७ ॥
'तेरी माता चिरकालसे तेरे जन्मकी आशा लगाये बैठी थी। उसने चिरकालतक तुझे गर्भमें धारण किया है, अतः बेटा चिरकारी! आज तू अपनी माताकी रक्षा करके

चिरकारिताको सफल कर ले ॥ ५७ ॥ चिरायते च संतापाच्चिरं स्वपिति वारितः । आवयोश्चिरसंतापादवेक्ष्य चिरकारिकः ॥ ५८ ॥ ‘मेरा बेटा चिरकारी कोई दुःख या संताप प्राप्त होनेपर भी कार्य करनेमें विलम्ब करनेका स्वभाव नहीं छोड़ता है। मना करनेपर भी चिरकालतक सोता रहता है। आज हम दोनों माता-पिताका चिरसंताप देखकर वह अवश्य चिरकारी बने’ ॥ ५८ ॥ एवं स दुःखितो राजन् महर्षिर्गौतमस्तदा । चिरकारिं ददर्शाथ पुत्रं स्थितमथान्तिके ॥ ५९ ॥ राजन्! इस प्रकार दुखी हुए महर्षि गौतमने घर आनेपर अपने पुत्र चिरकारीको पास ही खड़ा देखा ॥ ५९ ॥ चिरकारी तु पितरं दृष्ट्वा परमदुःखितः । शस्त्रं त्यक्त्वा ततो मूर्ध्ना प्रसादायोपचक्रमे ॥ ६० ॥ पिताको उपस्थित देख चिरकारी बहुत दुखी हुआ। वह हथियार फेंककर उनके चरणोंमें मस्तक झुका उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगा ॥ ६० ॥ गौतमस्तं ततो दृष्ट्वा शिरसा पतितं भुवि । पत्नीं चैव निराकारां परामभ्यागमन्मुदम् ॥ ६१ ॥ गौतमने देखा, चिरकारी पृथ्वीपर माथा टेककर पड़ा है और पत्नी लज्जाके मारे निश्चेष्ट खड़ी है। यह देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ६१ ॥ न हि सा तेन सम्भेदं पत्नी नीता महात्मना । विजने चाश्रमस्थेन पुत्रश्चापि समाहितः ॥ ६२ ॥ एकान्त वनमें उस आश्रमके भीतर रहनेवाले महामना गौतमने अपनी पत्नी तथा एकाग्रचित्त पुत्र चिरकारीको कभी अपनेसे अलग नहीं किया ॥ ६२ ॥ हन्या इति समादेशः शस्त्रपाणौ सुते स्थिते । विनीते प्रसवत्यर्थे विवासे चात्मकर्मसु ॥ ६३ ॥ अपने आवश्यक कर्म जप-ध्यान आदिके लिये महर्षि गौतमके बाहर चले जानेपर उनका पुत्र चिरकारी यद्यपि हाथमें हथियार लेकर खड़ा था तथापि माताकी रक्षाके लिये वह विनीतभावसे कुछ सोचता-विचारता रहा। इसीलिये माताको मार डालनेका जो आदेश प्राप्त हुआ था, वह पालित न हो सका ॥ ६३ ॥ बुद्धिश्चासीत् सुतं दृष्ट्वा पितुश्चरणयोर्नतम् । शस्त्रग्रहणचापल्यं संवृणोति भयादिति ॥ ६४ ॥ पुत्रको अपने चरणोंमें नतमस्तक हुआ देख गौतमके मनमें यह विचार हुआ कि सम्भवतः चिरकारी भयके मारे हथियार उठानेकी चपलताको छिपा रहा है ॥ ६४ ॥ ततः पित्रा चिरं स्तुत्वा चिरं चाघ्राय मूर्धनि ।

चिरं दोर्भ्यां परिष्वज्य चिरं जीवेत्युदाहृतः ॥ ६५ ॥
तब पिताने चिरकालतक उसकी प्रशंसा करके देरतक उसका मस्तक सूँघा और चिरकालतक दोनों भुजाओंसे खींचकर उसे हृदयसे लगाये रखा और आशीर्वाद देते हुए कहा—'बेटा! चिरंजीवी हो' ॥ ६५ ॥
एवं स गौतमः पुत्रं प्रीतिहर्षगुणैर्युतः ।
अभिनन्द्य महाप्राज्ञ इदं वचनमब्रवीत् ॥ ६६ ॥
महामते! इस प्रकार प्रेम और हर्षसे भरे हुए गौतमने पुत्रका अभिनन्दन करके यह बात कही— ॥ ६६ ॥
चिरकारिक भद्रं ते चिरकारी चिरं भव ।
चिराय यदि ते सौम्य चिरमस्मि न दुःखितः ॥ ६७ ॥
'बेटा चिरकारी! तेरा कल्याण हो। तू चिरकालतक चिरकारी एवं चिरंजीवी बना रह। सौम्य! यदि तू चिरकालतक ऐसे ही स्वभावका बना रहा तो मैं दीर्घकालतक कभी दुखी नहीं होऊँगा' ॥ ६७ ॥
गाथाश्चाप्यब्रवीद् विद्वान् गौतमो मुनिसत्तमः ।
चिरकारिषु धीरेषु गुणोद्देशसमाश्रयाः ॥ ६८ ॥
तदनन्तर विद्वान् मुनिश्रेष्ठ गौतमने कुछ गाथाएँ गायीं। चिरकालतक सोच-विचारकर काम करनेवाले धीर पुरुषोंमें जो गुण होते हैं, उनसे सम्बन्ध रखनेवाली वे गाथाएँ इस प्रकार हैं— ॥ ६८ ॥
चिरेण मित्रं बध्नीयाच्चिरेण च कृतं त्यजेत् ।
चिरेण हि कृतं मित्रं चिरं धारणमर्हति ॥ ६९ ॥
चिरकालतक सोच-विचार करके किसीके साथ मित्रता जोड़नी चाहिये और जिसे मित्र बना लिया, उसे सहसा नहीं छोड़ना चाहिये। यदि छोड़नेकी आवश्यकता पड़ ही जाय तो उसके परिणामपर चिरकालतक विचार कर लेना चाहिये। दीर्घकालतक सोच-विचार करके बनाया हुआ जो मित्र है, उसीकी मैत्री चिरकालतक टिक पाती है ॥
रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि ।
अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते ॥ ७० ॥
'राग, दर्प, अभिमान, द्रोह, पापाचरण और किसीका अप्रिय करनेमें जो विलम्ब करता है, उसकी प्रशंसा की जाती है ॥ ७० ॥
बन्धूनां सुहृदां चैव भृत्यानां स्त्रीजनस्य च ।
अव्यक्तेष्वपराधेषु चिरकारी प्रशस्यते ॥ ७१ ॥
'बन्धुओं, सुहृदों, सेवकों और स्त्रियोंके छिपे हुए अपराधोंके विषयमें कुछ निर्णय करनेमें भी जो जल्दबाजी न करके दीर्घकालतक सोच-विचार करता है, उसीकी प्रशंसा की जाती है' ॥ ७१ ॥

एवं स गौतमस्तत्र प्रीतः पुत्रस्य भारत ।
कर्मणा तेन कौरव्य चिरकारितया तथा ॥ ७२ ॥
भारत! कुरुनन्दन! इस प्रकार गौतम वहाँ अपने पुत्रके विलम्बपूर्वक कार्य करनेके कारण बहुत प्रसन्न हुए थे ॥

एवं सर्वेषु कार्येषु विमृश्य पुरुषस्ततः ।
चिरेण निश्चयं कृत्वा चिरं न परितप्यते ॥ ७३ ॥
इस प्रकार सभी कार्योंमें विचार करके चिर-कालके पश्चात् किसी निश्चयपर पहुँचनेवाले पुरुषको दीर्घकालतक पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता ॥ ७३ ॥

चिरं धारयते रोषं चिरं कर्म नियच्छति ।
पश्चात्तापकरं कर्म न किंचिदुपपद्यते ॥ ७४ ॥
जो चिरकालतक रोषको अपने भीतर ही दबाये रखता है और रोषपूर्वक किये जानेवाले कर्मको देरतक रोके रहता है, उसके द्वारा कोई कर्म ऐसा नहीं बनता, जो पश्चात्ताप करानेवाला हो ॥ ७४ ॥

चिरं वृद्धानुपासीत चिरमन्वास्य पूजयेत् ।
चिरं धर्मं निषेवेत कुर्याच्चान्वेषणं चिरम् ॥ ७५ ॥
दीर्घकालतक बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करे। दीर्घकालतक उनका संग करके उनकी पूजा (आदर-सत्कार) करे। चिरकालतक धर्मका सेवन और दीर्घकालतक उसका अनुसंधान करे ॥ ७५ ॥

चिरमन्वास्य विदुषश्चिरं शिष्टान् निषेव्य च ।
चिरं विनीय चात्मानं चिरं यात्यनवज्ञताम् ॥ ७६ ॥
अधिक समयतक विद्वानोंका संग करके चिरकालतक शिष्ट पुरुषोंकी सेवामें रहे तथा चिरकालतक अपने मनको वशमें रखे। इससे मनुष्य चिरकालतक अवज्ञाका नहीं किंतु सम्मानका भागी होता है ॥ ७६ ॥

ब्रुवतश्च परस्यापि वाक्यं धर्मोपसंहितम् ।
चिरं पृष्टोऽपि च ब्रूयाच्चिरं न परितप्यते ॥ ७७ ॥
धर्मोपदेश करनेवाले पुरुषसे यदि कोई प्रश्न करे तो उसे देरतक सोच-विचार कर ही उत्तर देना चाहिये। ऐसा करनेसे उसको देरतक पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता है ॥

उपास्य बहुलास्तस्मिन्नाश्रमे सुमहातपाः ।
समाः स्वर्गं गतो विप्रः पुत्रेण सहितस्तदा ॥ ७८ ॥
वे महातपस्वी ब्रह्मर्षि गौतम उस आश्रममें बहुत वर्षोंतक रहकर अन्तमें पुत्र चिरकारीके साथ ही स्वर्गलोकको सिधारे ॥ ७८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चिरकारिकोपाख्याने षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें चिरकारीका उपाख्यानविषयक दो सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६६ ॥

द्युमत्सेन और सत्यवान्‌का संवाद—अहिंसापूर्वक राज्यशासनकी श्रेष्ठताका कथन

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सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

द्युमत्सेन और सत्यवान्‌का संवाद—अहिंसापूर्वक राज्यशासनकी श्रेष्ठताका कथन

युधिष्ठिर उवाच

कथं राजा प्रजा रक्षेन्न च किंचित् प्रघातयेत् ।
पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! मैं आपसे यह पूछ रहा हूँ कि राजा किस प्रकार प्रजाकी रक्षा करे, जिससे उसको किसीकी हिंसा न करनी पड़े, वह आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
द्युमत्सेनस्य संवादं राज्ञा सत्यवता सह ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें राजा सत्यवान्‌के साथ उनके पिता द्युमत्सेनका जो संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥

अव्याहृतं व्याजहार सत्यवानिति नः श्रुतम् ।
वधायोन्नीयमानेषु पितुरेवानुशासनात् ॥ ३ ॥
हमने सुना है कि एक दिन सत्यवान्‌ने देखा कि पिताकी आज्ञासे बहुत-से अपराधी शूलीपर चढ़ा देनेके लिये ले जाये जा रहे हैं। उस समय उन्होंने पिताके पास जाकर ऐसी बात कही, जो पहले किसीने नहीं कही थी ॥ ३ ॥

अधर्मतां याति धर्मो यात्यधर्मश्च धर्मताम् ।
वधो नाम भवेद् धर्मो नैतद् भवितुमर्हति ॥ ४ ॥
‘पिताजी! यह सत्य है कि कभी ऊपरसे धर्म-सा दिखायी देनेवाला कार्य अधर्मरूप हो जाता है और अधर्म भी धर्मके रूपमें परिणत हो जाता है, तथापि किसी प्राणीका वध करना भी धर्म हो—ऐसा कदापि नहीं हो सकता’ ॥ ४ ॥

द्युमत्सेन उवाच

अथ चेदवधो धर्मोऽधर्मः को जातु चिद् भवेत् ।
दस्यवश्चेन्न हन्येरन् सत्यवन् संकरो भवेत् ॥ ५ ॥
**द्युमत्सेनने कहा—**बेटा सत्यवान्! यदि अपराधीका वध न करना भी कभी धर्म हो तो अधर्म क्या हो सकता है? यदि चोर-डाकू मारे न जायें तो प्रजामें वर्णसंकरता और धर्मसंकरता फैल जाय ॥ ५ ॥