महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
'जो योगी सिद्धलोकसे गिरकर मृत्युलोकमें आये हैं, उनके समान साधनबलसे सम्पन्न जो अन्य योगी हैं, वे भी एक लोकसे दूसरे लोकमें ऊपर उठते हुए क्रमशः उन सिद्ध पुरुषोंकी ही गतिको प्राप्त होते हैं। परंतु जो वैसे नहीं हैं, वे विपरीतभावके कारण अपनी-अपनी गतिको प्राप्त होते हैं ।। ५३ ।। स यावदेवास्ति सशेषभुक् ते प्रजाश्च देव्यौ च तथैव शुक्ले । तावत् तदङ्गेषु विशुद्धभावः संयम्य पञ्चेन्द्रियरूपमेतत् ।। ५४ ।। 'विशुद्धभावसे सम्पन्न सिद्ध पुरुष जबतक पंचेन्द्रियरूप इस करणसमुदायका संयम करके शेष प्रारब्ध कर्मका उपभोग करता है, तबतक उसके शरीरमें समस्त प्रजागणोंका अर्थात् इन्द्रियोंके देवताओंका तथा अपरा और परा विद्याका निवास रहता है ।। ५४ ।। शुद्धां गतिं तां परमां परैति शुद्धेन नित्यं मनसा विचिन्वन् । ततोऽव्ययं स्थानमुपैति ब्रह्म दुष्प्रापमभ्येति स शाश्वतं वै ।। ५५ ।। 'जो साधक सदा शुद्ध मनसे उस विशुद्ध परमगतिका अनुसंधान करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर अविकारी, दुर्लभ एवं सनातन ब्रह्मपदको प्राप्त करके वह उसीमें प्रतिष्ठित हो जाता है ।। ५५ ।। इत्येतदाख्यातमहीनसत्त्व नारायणस्येह बलं मया ते ।। ५६ ।। 'उत्कृष्ट बलशाली दैत्यराज! इस प्रकार यहाँ मैंने तुमसे यह भगवान् नारायणका बल एवं प्रभाव बताया है' ।। ५६ ।।
वृत्र उवाच एवं गते मे न विषादोऽस्ति कश्चित् सम्यक् च पश्यामि वचस्तथैतत् । श्रुत्वा तु ते वाचमदीनसत्त्व विकल्मषोऽस्म्यद्य तथा विपाप्मा ।। ५७ ।। **वृत्रासुर बोला—**उदारचित्त महात्मा सनत्कुमारजी! यदि ऐसी बात है तो मुझे कोई विषाद नहीं है। मैं आपके वचनको अच्छी तरह समझता और इसे यथार्थ मानता हूँ। आज मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि आपकी इस वाणीको सुनकर मेरे सारे पाप और कलुष दूर हो गये ।। ५७ ।। प्रवृत्तमेतद् भगवन् महर्षे
महाद्युतेश्चक्रमनन्तवीर्यम् । विष्णोरनन्तस्य सनातनं तत् स्थानं सर्गा यत्र सर्वे प्रवृत्ताः । स वै महात्मा पुरुषोत्तमो वै तस्मिन् जगत् सर्वमिदं प्रतिष्ठितम् ॥ ५८ ॥ भगवन्! महर्षे! महातेजस्वी, अनन्त एवं सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका यह अमित शक्तिशाली संसारचक्र चल रहा है। यह भगवान् विष्णुका वह सनातन स्थान है, जहाँसे सारी सृष्टियोंका आरम्भ होता है। महात्मा विष्णु पुरुषोत्तम हैं। उन्हींमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ॥ ५८ ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा स कौन्तेय वृत्रः प्राणानवासृजत् । योजयित्वा तथाऽऽत्मानं परं स्थानमवाप्तवान् ॥ ५९ ॥ भीष्मजी कहते हैं—कुन्तीनन्दन! ऐसा कहकर वृत्रासुरने अपने आत्माको परमात्मामें लगाकर उन्हींका ध्यान करते हुए प्राण त्याग दिये और परमेश्वरके परमधामको प्राप्त कर लिया ॥ ५९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अयं स भगवान् देवः पितामह जनार्दनः । सनत्कुमारो वृत्राय यत्तदाख्यातवान् पुरा ॥ ६० ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! पूर्वकालमें महात्मा सनत्कुमारने वृत्रासुरसे जिनके स्वरूपका वर्णन किया था, वे भगवान् विष्णु—ये हमारे जनार्दन श्रीकृष्ण ही तो हैं? ॥ ६० ॥
भीष्म उवाच
मूलस्थायी महादेवो भगवान् स्वेन तेजसा । तत्स्थःसृजति तान् भावान् नानारूपान् महामनाः ॥ ६१ ॥ भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! मूल-कारणरूपसे स्थित, महान् देव, महामनस्वी भगवान् नारायण हैं। वे अपने उस चिन्मय स्वरूपमें स्थित होकर अपने प्रभावसे नाना प्रकारके सम्पूर्ण पदार्थोंकी सृष्टि करते हैं ॥ ६१ ॥ तुरीयांशेन तस्येमं विद्धि केशवमच्युतम् । तुरीयार्धेन लोकांस्त्रीन् भावयत्येव बुद्धिमान् ॥ ६२ ॥ अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले इन भगवान् श्रीकृष्णको तुम उस श्रीनारायणके एक चतुर्थ अंशसे सम्पन्न समझो। बुद्धिमान् श्रीकृष्ण अपने उस चतुर्थ अंशसे
ही तीनों लोकोंकी रचना करते हैं ।। ६२ ।। अवाक् स्थितस्तु यः स्थायी कल्पान्ते परिवर्तते । स शेते भगवानप्सु योऽसावतिबलः प्रभुः । तान् विधाता प्रसन्नात्मा लोकांश्चरति शाश्वतान् ।। ६३ ।। जो परवर्ती सनातन नारायण प्रलयकालमें भी विद्यमान हैं, वे ही अत्यन्त बलशाली और सबके अधीश्वर भगवान् श्रीहरि कल्पान्तमें जलके भीतर शयन करते हैं तथा वे प्रसन्नात्मा सृष्टिकर्ता ईश्वर उन समस्त शाश्वत लोकोंमें विचरण करते हैं ।। ६३ ।। सर्वाण्यशून्यानि करोत्यनन्तः सनातनः संचरते च लोकान् । स चानिरुद्धः सृजते महात्मा तत्स्थं जगत् सर्वमिदं विचित्रम् ।। ६४ ।। अनन्त एवं सनातन भगवान् श्रीहरि समस्त कारणोंको सत्ता और स्फूर्ति देकर परिपूर्ण करते और लीलावपु धारण करके लोकोंमें विचरण करते हैं। उन महापुरुषकी गतिको कोई रोक नहीं सकता। वे ही इस जगत्की सृष्टि करते हैं। उन्हींमें यह सम्पूर्ण विचित्र विश्व प्रतिष्ठित है ।। ६४ ।।
युधिष्ठिर उवाच
वृत्रेण परमार्थज्ञ दृष्टा मन्येऽऽत्मनो गतिः । शुभा तस्मात् स सुखितो न शोचति पितामह ।। ६५ ।। युधिष्ठिरने कहा— परमार्थतत्त्वके ज्ञाता पितामह! मैं समझता हूँ कि वृत्रासुरने आत्माके शुभ एवं यथार्थ स्वरूपका साक्षात्कार कर लिया था; इसीलिये वह सुखी था, शोक नहीं करता था ।। ६५ ।। शुक्लः शुक्लाभिजातीयः साध्यो नावर्ततेऽनघ । तिर्यग्गतेश्च निर्मुक्तो निर्याच्च पितामह ।। ६६ ।। निष्पाप पितामह! वह शुद्ध कुलमें उत्पन्न हुआ था और स्वभावसे भी शुद्ध था। जान पड़ता है वह साध्य नामक देवता ही था; इसीलिये पुनः संसारमें नहीं लौटा। वह पशु-पक्षियोंकी योनि तथा नरकसे छुटकारा पा गया ।। ६६ ।। हारिद्रवर्णे रक्ते वा वर्तमानस्तु पार्थिव । तिर्यगेवानुपश्येत कर्मभिस्तामसैर्वृतः ।। ६७ ।। पृथ्वीनाथ! पीतवर्णवाले देवसर्गमें तथा रक्तवर्णवाले अनुग्रहसर्गमें विद्यमान प्राणी कभी तामस कर्मोंसे आवृत होकर तिर्यग्योनिका भी दर्शन कर सकता है ।। ६७ ।। वयं तु भृशमापन्ना रक्ता दुःखसुखेऽसुखे । कां गतिं प्रतिपत्स्यामो नीलां कृष्णाधमामथ ।। ६८ ।।
हमलोग तो और भी अधिक आपत्तिसे घिरे हुए हैं। दुःख-सुखसे मिश्रित भावमें अथवा केवल दुःखमय भावमें आसक्त हैं। ऐसी दशामें पता नहीं हमें किस गतिकी प्राप्ति होगी। हम नीलवर्णवाली मानव-योनिमें पड़ेंगे या कृष्णवर्णवाली स्थावर योनिसे भी हीन दशाको जा पहुँचेंगे ॥ ६८ ॥
भीष्म उवाच
शुद्धाभिजनसम्पन्नाः पाण्डवाः संशितव्रताः ।
विहृत्य देवलोकेषु पुनर्मानुषमेष्यथ ॥ ६९ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! तुम सभी पाण्डव विशुद्ध कुलसे सम्पन्न और तीक्ष्ण व्रतोंका भलीभाँति पालन करनेवाले हो; अतः देवताओंके लोकोंमें विहार करके पुनः मनुष्य-शरीरको ही प्राप्त करोगे ॥ ६९ ॥
प्रजाविसर्गं च सुखेन काले
प्रत्येत्य देवेषु सुखानि भुक्त्वा ।
सुखेन संयास्यथ सिद्धसंख्यां
मा वो भयं भूद् विमलाः स्थ सर्वे ॥ ७० ॥
तुम सब लोग यथासमय सुखसे सन्तानोत्पादन करके देवलोकोंमें जाकर सुख भोगोगे। तत्पश्चात् सुखपूर्वक सिद्धि प्राप्त करके सिद्धोंमें गिने जाओगे। तुम्हारे मनमें दुर्गतिका भय नहीं होना चाहिये; क्योंकि तुम सब लोग निर्मल एवं निष्पाप हो ॥ ७० ॥
इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रगीतासु
अशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वृत्रगीताविषयक दो सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३/४ श्लोक मिलाकर कुल ७० ३/४ श्लोक हैं)
* श्रीविष्णुपुराणमें तीन प्रकारकी प्राकृत सृष्टि बतायी गयी है—पहली महत्तत्त्वकी सृष्टि है, जिसे यहाँ 'क्षर' शब्दसे कहा गया है। दूसरी भूत-सृष्टि मानी गयी है, जो तन्मात्राओंकी सृष्टि है। यहाँ 'भूतेषु' पदके द्वारा उसीकी ओर संकेत किया गया है। 'एकादशविकारात्मा' इस पदके द्वारा तीसरी सृष्टिका निर्देश किया गया है, जिसे वैकारिक अथवा ऐन्द्रियक सर्ग भी कहते हैं। इसमें पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक मन—इन ग्यारह तत्त्वोंकी रचना हुई है।
* सोलह ऋत्विजोंके नाम इस प्रकार हैं—१-ब्रह्मा, २-ब्राह्मणाच्छंसी, ३-आग्नीध्र और ४-पोता—ये चार ऋत्विज सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता होते हैं। ५-होता, ६-मैत्रावरुण, ७-अच्छावाक और ८-ग्रावस्तुता—ये चार ऋत्विज ऋग्वेदी होते हैं। ९-अध्वर्यु, १०-प्रतिप्रस्थाता, ११-नेष्टा और १२-उन्नेता—ये चार यजुर्वेदी होते हैं। १३-उद्गाता, १४-प्रस्तोता, १५-प्रतिहर्ता तथा १६-सुब्रह्मण्य—ये सामवेदके गायक होते हैं।
* जब तमोगुणकी अधिकता, सत्त्वगुणकी न्यूनता और रजोगुणकी सम अवस्था हो, तब कृष्णवर्ण होता है। यह स्थावर सृष्टिका रंग माना गया है। तमोगुणकी अधिकता, रजोगुणकी न्यूनता और सत्त्वगुणकी सम अवस्था होनेपर धूम्रवर्ण होता
है। यह पशु-पक्षीकी योनिमें जन्म लेनेवाले प्राणियोंका वर्ण माना गया है। रजोगुणकी अधिकता, सत्त्वगुणकी न्यूनता और तमोगुणकी सम अवस्था होनेपर नीलवर्ण होता है। यह मानवसर्गका वर्ण बताया गया है। इसीमें जब सत्त्वगुणकी सम अवस्था और तमोगुणकी न्यूनावस्था हो तो मध्यमवर्ण होता है। उसका रंग लाल होता है। इसे अनुग्रह सर्ग कहते हैं। जब सत्त्वगुणकी अधिकता, रजोगुणकी न्यूनता और तमोगुणकी सम अवस्था हो तो हरिद्राके समान पीतवर्ण होता है। यही देवताओंका वर्ण है, अतः इसे देवसर्ग कहते हैं। उसीमें जब रजोगुणकी सम अवस्था और तमोगुणकी न्यूनता हो तो शुक्लवर्ण होता है। इसीको कौमारसर्ग कहा गया है।
* दस इन्द्रिय, पाँच प्राण और चार अन्तःकरण—ये उन्नीस भोगके साधन हैं, विषय और वृत्तियोंके भेदसे इन्हींके उतने ही सौ और उतने ही हजार प्रकार हो जाते हैं।
* पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय—ये दस इन्द्रियाँ सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिके भेदसे प्रत्येक छः-छः प्रकारकी होती हैं। इस प्रकार इनके साठ भेद हो जाते हैं।
इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन
एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
इन्द्र और वृत्रासुरके युद्धका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
अहो धर्मिष्ठता तात वृत्रस्यामिततेजसः ।
यस्य विज्ञानमतुलं विष्णोर्भक्तिश्च तादृशी ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**दादाजी! अमित तेजस्वी वृत्रासुरकी धर्मनिष्ठा अद्भुत थी। उसका विज्ञान भी अनुपम था और भगवान् विष्णुके प्रति उसकी भक्ति भी वैसी ही उच्चकोटिकी थी ॥ १ ॥
दुर्विज्ञेयं पदं तात विष्णोरमिततेजसः ।
कथं वा राजशार्दूल पदं तु ज्ञातवानसौ ॥ २ ॥
तात! अनन्त तेजस्वी श्रीविष्णुके स्वरूपका ज्ञान तो अत्यन्त कठिन है। नृपश्रेष्ठ! उस वृत्रासुरने उस परमपदका ज्ञान कैसे प्राप्त कर लिया? यह बड़े आश्चर्यकी बात है ॥ २ ॥
भवता कथितं ह्येतच्छ्रद्दधे चाहमच्युत ।
भूयस्तु मे समुत्पन्ना बुद्धिरव्यक्तदर्शनात् ॥ ३ ॥
आपने इस घटनाका वर्णन किया है; इसलिये मैं इसे सत्य मानता और इसपर विश्वास करता हूँ; क्योंकि आप कभी सत्यसे विचलित नहीं होते हैं तथापि यह बात स्पष्टरूपसे मेरी समझमें नहीं आयी है; अतः पुनः मेरी बुद्धिमें प्रश्न उत्पन्न हो गया ॥ ३ ॥
कथं विनिहतो वृत्रः शक्रेण पुरुषर्षभ ।
धार्मिको विष्णुभक्तश्च तत्त्वज्ञश्च पदान्वये ॥ ४ ॥
पुरुषप्रवर! वृत्रासुर धर्मात्मा, भगवान् विष्णुका भक्त और वेदान्तके पदोंका अन्वय करके उनके तात्पर्यको ठीक-ठीक समझनेमें कुशल था तो भी इन्द्रने उसे कैसे मार डाला? ॥ ४ ॥
एतन्मे संशयं ब्रूहि पृच्छते भरतर्षभ ।
वृत्रस्तु राजशार्दूल यथा शक्रेण निर्जितः ॥ ५ ॥
भरतभूषण! नृपश्रेष्ठ! मैं यह बात आपसे पूछता हूँ, आप मेरे इस संशयका समाधान कीजिये। इन्द्रने वृत्रासुरको कैसे परास्त किया? ॥ ५ ॥
यथा चैवाभवद् युद्धं तच्चाचक्ष्व पितामह ।
विस्तरेण महाबाहो परं कौतूहलं हि मे ॥ ६ ॥
महाबाहु पितामह! इन्द्र और वृत्रासुरमें किस प्रकार युद्ध हुआ था, यह विस्सारपूर्वक बताइये; इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्सुकता हो रही है ॥ ६ ॥
भीष्म उवाच
रथेनेन्द्रः प्रयातो वै सार्धं देवगणैः पुरा ।
ददर्शाथाग्रतो वृत्रं धिष्ठितं पर्वतोपमम् ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! प्राचीन कालकी बात है, इन्द्र रथपर आरूढ़ हो देवताओंको साथ ले वृत्रासुरसे युद्ध करनेके लिये चले। उन्होंने अपने सामने खड़े हुए पर्वतके समान विशालकाय वृत्रको देखा ॥ ७ ॥
योजनानां शतान्यूर्ध्वं पञ्चोच्छ्रितमरिंदम ।
शतानि विस्तरेणाथ त्रीण्येवाभ्यधिकानि वै ॥ ८ ॥
शत्रुदमन नरेश! वह पाँच सौ योजन ऊँचा था और कुछ अधिक तीन सौ योजन उसकी मोटाई थी ॥ ८ ॥
तत् प्रेक्ष्य तादृशं रूपं त्रैलोक्येनापि दुर्जयम् ।
वृत्रस्य देवाः संत्रस्ता न शान्तिमुपलेभिरे ॥ ९ ॥
वृत्रासुरका वह वैसा रूप, जो तीनों लोकोंके लिये भी दुर्जय था, देखकर देवतालोग डर गये। उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ९ ॥
शक्रस्य तु तदा राजन्नूरुस्तम्भो व्यजायत ।
भयाद् वृत्रस्य सहसा दृष्ट्वा तद्रूपमुत्तमम् ॥ १० ॥
राजन्! उस समय वृत्रासुरका वह उत्तम एवं विशाल रूप देखकर सहसा भयके मारे इन्द्रकी दोनों जाँघें अकड़ गयीं ॥ १० ॥
ततो नादः समभवद् वादित्राणां च निःस्वनः ।
देवासुराणां सर्वेषां तस्मिन् युद्धे ह्युपस्थिते ॥ ११ ॥
तदनन्तर वह युद्ध उपस्थित होनेपर समस्त देवताओं और असुरोंके दलोंमें रणवाद्योंका भीषण नाद होने लगा ॥ ११ ॥
अथ वृत्रस्य कौरव्य दृष्ट्वा शक्रमवस्थितम् ।
न संभ्रमो न भीः काचिदास्था वा समजायत ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! इन्द्रको खड़ा देखकर भी वृत्रासुरके मनमें न तो घबराहट हुई, न कोई भय हुआ और न इन्द्रके प्रति उसकी कोई युद्धविषयक चेष्टा ही हुई ॥ १२ ॥
ततः समभवद् युद्धं त्रैलोक्यस्य भयंकरम् ।
शक्रस्य च सुरेन्द्रस्य वृत्रस्य च महात्मनः ॥ १३ ॥
फिर तो देवराज इन्द्र और महामनस्वी वृत्रासुरमें भारी युद्ध छिड़ गया, जो तीनों लोकोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाला था ॥ १३ ॥
असिभिः पट्टिशैः शूलैः शक्तितोमुद्गरैः ।
शिलाभिर्विविधाभिश्च कार्मुकैश्च महास्वनैः ॥ १४ ॥
शस्त्रैश्च विविधैर्दिव्यैः पावकोल्काभिरेव च ।
देवासुरैस्ततः सैन्यैः सर्वमासीत् समाकुलम् ॥ १५ ॥ उस समय तलवार, पट्टिश, त्रिशूल, शक्ति, तोमर, मुद्गर, नाना प्रकारकी शिला, भयानक टंकार करनेवाले धनुष, अनेक प्रकारके दिव्य अस्त्र-शस्त्र तथा आगकी ज्वालाओंसे एवं देवताओं और असुरोंकी सेनाओंसे यह सारा आकाश व्याप्त हो गया ॥ १४-१५ ॥ पितामहपुरोगाश्च सर्वे देवगणास्तथा । ऋषयश्च महाभागास्तद् युद्धं द्रष्टुमागमन् ॥ १६ ॥ विमानाग्र्यैर्महाराज सिद्धाश्च भरतर्षभ । गन्धर्वाश्च विमानाग्र्यैरप्सरोभिः समागमन् ॥ १७ ॥ भरतभूषण महाराज! ब्रह्मा आदि समस्त देवता, महाभाग ऋषि, सिद्धगण तथा अप्सराओंसहित गन्धर्व—ये सबके सब श्रेष्ठ विमानोंपर आरूढ़ हो उस अद्भुत युद्धका दृश्य देखनेके लिये वहाँ आ गये थे ॥ १६-१७ ॥ ततोऽन्तरिक्षमावृत्य वृत्रो धर्मभृतां वरः । अश्मवर्षेण देवेन्द्रं समाकिरदतिद्रुतम् ॥ १८ ॥ तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ वृत्रासुरने आकाशको घेरकर बड़ी उतावलीके साथ देवराज इन्द्रपर पत्थरोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १८ ॥ ततो देवगणाः क्रुद्धाः सर्वतः शरवृष्टिभिः । अश्मवर्षमपोहन्त वृत्रप्रेरितमाहवे ॥ १९ ॥ यह देख देवगण कुपित हो उठे। उन्होंने युद्धमें सब ओरसे बाणोंकी वर्षा करके वृत्रासुरके चलाये हुए पत्थरोंकी वर्षाको नष्ट कर दिया ॥ १९ ॥ वृत्रस्तु कुरुशार्दूल महामायो महाबलः । मोहयामास देवेन्द्रं मायायुद्धेन सर्वशः ॥ २० ॥ तस्य वृत्रार्दितस्याथ मोह आसीच्छतक्रतोः । रथन्तरेण तं तत्र वसिष्ठः समबोधयत् ॥ २१ ॥ कुरुश्रेष्ठ! महामायावी महाबली वृत्रासुरने सब ओरसे मायामय युद्ध छेड़कर देवराज इन्द्रको मोहमें डाल दिया। वृत्रासुरसे पीड़ित हुए इन्द्रपर मोह छा गया। तब वसिष्ठजीने रथन्तर सामद्वारा वहाँ इन्द्रको सचेत किया ॥ २०-२१ ॥
वसिष्ठ उवाच
देवश्रेष्ठोऽसि देवेन्द्र दैत्यासुरनिबर्हण । त्रैलोक्यबलसंयुक्तः कस्माच्छक्र विषीदसि ॥ २२ ॥ वसिष्ठजीने कहा—देवेन्द्र! तुम सब देवताओंमें श्रेष्ठ हो। दैत्यों तथा असुरोंका संहार करनेवाले शक्र! तुम तो त्रिलोकीके बलसे सम्पन्न हो; फिर इस प्रकार विषादमें क्यों पड़े
हो? ॥ २२ ॥ एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवश्चैव जगत्पतिः । सोमश्च भगवान् देवः सर्वे च परमर्षयः ॥ २३ ॥ (समुद्विग्नं समीक्ष्य त्वां स्वस्तीत्यूचुर्जयाय ते ।) ये जगदीश्वर ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा भगवान् सोमदेव और समस्त महर्षि तुम्हें उद्विग्न देखकर तुम्हारी विजयके लिये स्वस्तिवाचन कर रहे हैं ॥ २३ ॥ मा कार्षीः कश्मलं शक्र कश्चिद्देवेतरो यथा । आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा जहि शत्रून् सुराधिप ॥ २४ ॥ इन्द्र! किसी साधारण मनुष्यके समान तुम कायरता न प्रकट करो। सुरेश्वर! युद्धके लिये श्रेष्ठ बुद्धिका सहारा लेकर अपने शत्रुओंका संहार करो ॥ २४ ॥ एष लोकगुरुस्त्र्यक्षः सर्वलोकनमस्कृतः । निरीक्षते त्वां भगवांस्त्यज मोहं सुराधिप ॥ २५ ॥ देवराज! ये सर्वलोकवन्दित लोकगुरु भगवान् त्रिलोचन शिव तुम्हारी ओर कृपापूर्ण दृष्टिसे देख रहे हैं। तुम मोहको त्याग दो ॥ २५ ॥ एते ब्रह्मर्षयश्चैव बृहस्पतिपुरोगमाः । स्तवेन शक्र दिव्येन स्तुवन्ति त्वां जयाय वै ॥ २६ ॥ शक्र! ये बृहस्पति आदि ब्रह्मर्षि तुम्हारी विजयके लिये दिव्य स्तोत्रद्वारा स्तुति कर रहे हैं ॥ २६ ॥
भीष्म उवाच एवं सम्बोध्यमानस्य वसिष्ठेन महात्मना । अतीव वासवस्यासीद् बलमुत्तमतेजसः ॥ २७ ॥ भीष्मजी कहते हैं—राजन्! महात्मा वसिष्ठके द्वारा इस प्रकार सचेत किये जानेपर महातेजस्वी इन्द्रका बल बहुत बढ़ गया ॥ २७ ॥ ततो बुद्धिमुपागम्य भगवान् पाकशासनः । योगेन महता युक्तस्तां मायां व्यपकर्षत ॥ २८ ॥ तब भगवान् पाकशासनने उत्तम बुद्धिका आश्रय ले महान् योगसे युक्त हो उस मायाको नष्ट कर दिया ॥ २८ ॥ ततोऽङ्गिरःसुतः श्रीमांस्ते चैव सुमहर्षयः । दृष्ट्वा वृत्रस्य विक्रान्तमुपागम्य महेश्वरम् ॥ २९ ॥ ऊचुर्वृत्रविनाशार्थं लोकानां हितकाम्यया ।
तदनन्तर अंगिराके पुत्र श्रीमान् बृहस्पति तथा बड़े-बड़े महर्षियोंने जब वृत्रासुरका पराक्रम देखा, तब महादेवजीके पास आकर लोकहितकी कामनासे वृत्रासुरके विनाशके लिये उनसे निवेदन किया ।। २९ १/२ ।। ततो भगवतस्तेजो ज्वरो भूत्वा जगत्पतेः ।। ३० ।। समाविशत् तदा रौद्रो वृत्रं लोकपतिं तदा । तब जगदीश्वर भगवान् शिवका तेज रौद्र ज्वर होकर लोकेश्वर वृत्रके शरीरमें समा गया ।। ३० १/२ ।। विष्णुश्च भगवान् देवः सर्वलोकाभिपूजितः ।। ३१ ।। ऐन्द्रं समाविशद् वज्रं लोकसंरक्षणे रतः । फिर लोकरक्षापरायण सर्वलोकपूजित देवेश्वर भगवान् विष्णुने भी इन्द्रके वज्रमें प्रवेश किया ।। ३१ १/२ ।। ततो बृहस्पतिर्धीमानुपागम्य शतक्रतुम् । वसिष्ठश्च महातेजाः सर्वे च परमर्षयः ।। ३२ ।। ते समासाद्य वरदं वासवं लोकपूजितम् । ऊचुरेकाग्रमनसो जहि वृत्रमिति प्रभो ।। ३३ ।। तत्पश्चात् बुद्धिमान् बृहस्पति, महातेस्वी वसिष्ठ तथा सम्पूर्ण महर्षि वरदायक, लोकपूजित शतक्रतु इन्द्रके पास जाकर एकाग्रचित्त हो इस प्रकार बोले—‘प्रभो! वृत्रासुरका वध करो’ ।। ३२-३३ ।।
महेश्वर उवाच
एष वृत्रो महान् शक्र बलेन महता वृतः । विश्वात्मा सर्वगश्चैव बहुमायश्च विश्रुतः ।। ३४ ।। **महेश्वर बोले—**इन्द्र! यह महान् वृत्रासुर बड़ी भारी सेनासे घिरा हुआ तुम्हारे सामने खड़ा है। ज्ञाननिष्ठ होनेके कारण यह सम्पूर्ण विश्वका आत्मा है। इसमें सर्वत्र गमन करनेकी शक्ति है। यह अनेक प्रकारकी मायाओंका सुविख्यात ज्ञाता भी है ।। ३४ ।। तदेनमसुरश्रेष्ठं त्रैलोक्येनापि दुर्जयम् । जहि त्वं योगमास्थाय मावमंस्थाः सुरेश्वर ।। ३५ ।। सुरेश्वर! यह श्रेष्ठ असुर तीनों लोकोंके लिये भी दुर्जय है। तुम योगका आश्रय लेकर इसका वध करो। इसकी अवहेलना न करो ।। ३५ ।। अनेन हि तपस्तप्तं बलार्थममराधिप । षष्टिं वर्षसहस्राणि ब्रह्मा चास्मै वरं ददौ ।। ३६ ।। अमरेश्वर! इस वृत्रासुरने बलकी प्राप्तिके लिये ही साठ हजार वर्षोंतक तप किया था और तब ब्रह्माजीने इसे मनोवाञ्छित वर दिया था ।। ३६ ।।
महत्त्वं योगिनां चैव महामायत्वमेव च ।
महाबलत्वं च तथा तेजश्चाग्र्यं सुरेश्वर ।। ३७ ।।
सुरेन्द्र! उन्होंने इसे योगियोंकी महिमा, महा-मायावीपन, महान् बल-पराक्रम तथा सर्वश्रेष्ठ तेज प्रदान किया है ।। ३७ ।।
एतत् त्वां मामकं तेजः समाविशति वासव ।
व्यग्रमेनं त्वमप्येनं वज्रेण जहि दानवम् ।। ३८ ।।
वासव! लो, यह मेरा तेज तुम्हारे शरीरमें प्रवेश करता है। इस समय दानव वृत्र ज्वरके कारण बहुत व्यग्र हो रहा है; इसी अवस्थामें तुम वज्रसे इसे मार डालो ।। ३८ ।।
शक्र उवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादेन दितिजं सुदुरासदम् ।
वज्रेण निहनिष्यामि पश्यतस्ते सुरर्षभ ।। ३९ ।।
इन्द्रने कहा—भगवन्! सुरश्रेष्ठ! आपकी कृपासे इस दुर्धर्ष दैत्यको मैं आपके देखते-देखते वज्रसे मार डालूँगा ।।
भीष्म उवाच
आविश्यमाने दैत्ये तु ज्वरेणाथ महासुरे ।
देवतानामृषीणां च हर्षान्नादो महानभूत् ।। ४० ।।
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! जब महादैत्य वृत्रासुरके शरीरमें ज्वरने प्रवेश किया, तब देवता और ऋषियोंका महान् हर्षनाद वहाँ गूँज उठा ।। ४० ।।
ततो दुन्दुभयश्चैव शङ्खाश्च सुमहास्वनाः ।
मुरजा डिण्डिमाश्चैव प्रावाद्यन्त सहस्रशः ।। ४१ ।।
फिर तो दुन्दुभियाँ, जोर-जोरसे बजनेवाले शंख, ढोल और नगाड़े आदि सहस्रों बाजे बजाये जाने लगे ।।
असुराणां तु सर्वेषां स्मृतिलोपो महानभूत् ।
मायानाशश्च बलवान् क्षणेन समपद्यत ।। ४२ ।।
समस्त असुरोंकी स्मरण-शक्तिका बड़ा भारी लोप हो गया। क्षणभरमें उनकी सारी मायाओंका पूर्णरूपसे विनाश हो गया ।। ४२ ।।
तथाविष्टमथो ज्ञात्वा ऋषयो देवतास्तथा ।
स्तुवन्तः शक्रमीशानं तथा प्राचोदयन्नपि ।। ४३ ।।
इस प्रकार वृत्रासुरमें महादेवजीके ज्वरका आवेश हुआ जान देवता और ऋषि देवेश्वर इन्द्रकी स्तुति करते हुए उन्हें वृत्रवधके लिये प्रेरणा देने लगे ।। ४३ ।।
रथस्थस्य हि शक्रस्य युद्धकाले महात्मनः ।
ऋषिभिः स्तूयमानस्य रूपमासीत् सुदुर्दर्शम् ।। ४४ ।।
युद्धके समय रथपर बैठकर ऋषियोंके द्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए महामना इन्द्रका रूप ऐसा तेजस्वी प्रतीत होता था कि उसकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन जान पड़ता था ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रवधे
एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वृत्रासुरका वधविषयक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुछ ४४ १/२ श्लोक हैं)
२८२-
द्व्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
वृत्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन
भीष्म उवाच
वृत्रस्य तु महाराज ज्वराविष्टस्य सर्वशः।
अभवन् यानि लिङ्गानि शरीरे तानि मे शृणु ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— महाराज! ज्वरसे आविष्ट हुए वृत्रासुरके शरीरमें जो लक्षण प्रकट हुए थे, उन्हें मुझसे सुनो ॥ १ ॥
ज्वलितास्योऽभवद् घोरो वैवर्ण्यं चागमत् परम्।
गात्रकम्पश्च सुमहान् श्वासश्चाप्यभवन्महान् ॥ २ ॥
उसके मुखमें विशेष जलन होने लगी। उसकी आकृति बड़ी भयानक हो गयी। अंगकान्ति बहुत फीकी पड़ गयी। शरीर जोर-जोरसे काँपने लगा तथा बड़े वेगसे साँस चलने लगी ॥ २ ॥
रोमहर्षश्च तीव्रोऽभून्निःश्वासश्च महान् नृप।
शिवा चाशिवसंकाशा तस्य वक्त्रात् सुदारुणा ॥ ३ ॥
निष्पपात महाघोरा स्मृतिः सा तस्य भारत।
नरेश्वर! उसके सारे शरीरमें तीव्र रोमांच हो आया। वह लंबी साँस खींचने लगा। भरतनन्दन! वृत्रासुरके मुखसे अत्यन्त भयंकर अकल्याणस्वरूपा महाघोर गीदड़ीके रूपमें उसकी स्मरणशक्ति ही बाहर निकल पड़ी ॥ ३ १/२ ॥
उल्काश्च ज्वलितास्तस्य दीप्ताः पार्श्वे प्रपेदिरे ॥ ४ ॥
गृध्राः कङ्का बलाकाश्च वाचोऽमुञ्चन् सुदारुणाः।
वृत्रस्योपरि संसृष्टाश्चक्रवत् परिबभ्रमुः ॥ ५ ॥
उसके पार्श्वभागमें प्रज्वलित एवं प्रकाशित उल्काएँ गिरने लगीं। गीध, कंक, बगले आदि भयंकर पक्षी अपनी बोली सुनाने लगे और एक-दूसरेसे सटकर वृत्रासुरके ऊपर चक्रकी भाँति घूमने लगे ॥ ४-५ ॥
ततस्तं रथमास्थाय देवाप्यायित आहवे।
वज्रोद्यतकरः शक्रस्तं दैत्यं समवैक्षत ॥ ६ ॥
तदनन्तर महादेवजीके तेजसे परिपुष्ट हो वज्र हाथमें लिये हुए इन्द्रने रथपर बैठकर युद्धमें उस दैत्यकी ओर देखा ॥ ६ ॥
अमानुषमथो नादं स मुमोच महासुरः।
व्यजृम्भच्चैव राजेन्द्र तीव्रज्वरसमन्वितः ॥ ७ ॥
राजेन्द्र! इसी समय तीव्र ज्वरसे पीड़ित हो उस महान् असुरने अमानुषी गर्जना की और बारंबार जँभाई ली ॥ ७ ॥
अथास्य जृम्भतः शक्रस्ततो वज्रमवासृजत् ।
स वज्रः सुमहातेजाः कालाग्निसदृशोपमः ॥ ८ ॥
जँभाई लेते समय ही इन्द्रने उसके ऊपर वज्रका प्रहार किया। वह महातेजस्वी वज्र कालाग्निके समान जान पड़ता था ॥ ८ ॥
क्षिप्रमेव महाकायं वृत्रं दैत्यमपातयत् ।
ततो नादः समभवत् पुनरेव समन्ततः ॥ ९ ॥
वृत्रं विनिहतं दृष्ट्वा देवानां भरतर्षभः ।
उसने उस महाकाय दैत्य वृत्रासुरको तुरंत ही धराशायी कर दिया*। भरतश्रेष्ठ! फिर तो वृत्रासुरको मारा गया देख चारों ओरसे देवताओंका सिंहनाद वहाँ 'बारबार गूँजने लगा ॥ ९ १/२ ॥
वृत्रं तु हत्वा मघवा दानवारिर्महायशाः ॥ १० ॥
वज्रेण विष्णुयुक्तेन दिवमेव समाविशत् ।
दानवशत्रु महायशस्वी इन्द्रने विष्णुके तेजसे व्याप्त हुए वज्रके द्वारा वृत्रासुरका वध करके पुनः स्वर्गलोकमें ही प्रवेश किया ॥ १० १/२ ॥
अथ वृत्रस्य कौरव्य शरीरादभिनिःसृता ॥ ११ ॥
ब्रह्मवध्या महाघोरा रौद्रा लोकभयावहा ।
करालदशना भीमा विकृता कृष्णपिङ्गला ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! तदनन्तर वृत्रासुरके मृत शरीरसे सम्पूर्ण जगत्को भय देनेवाली महाघोर एवं क्रूर स्वभाववाली ब्रह्महत्या प्रकट हुई। उसके दाँत बड़े विकराल थे। उसकी आकृति कृष्ण और पिंगल वर्णकी थी। वह देखनेमें बड़ी भयानक और विकृत रूपवाली थी ॥
प्रकीर्णमूर्धजा चैव घोरनेत्रा च भारत ।
कपालमालिनी चैव कृत्येव भरतर्षभ ॥ १३ ॥
भरतनन्दन! उसके बाल बिखरे हुए थे, नेत्र बड़े भयावने थे। उसके गलेमें नरमुण्डोंकी माला थी। भरतश्रेष्ठ! वह कृत्या-सी जान पड़ती थी ॥ १३ ॥
रुधिराद्री च धर्मज्ञ चीरवल्कलवासिनी ।
साभिनिष्क्रम्य राजेन्द्र तादृग्रूपा भयावहा ॥ १४ ॥
वज्रिणं मृगयामास तदा भरतसत्तम ।
धर्मज्ञ राजेन्द्र! भरतसत्तम! उसके सारे अंग रक्तसे भींगे हुए थे। उसने चीर और वल्कल पहन रखे थे। ऐसे विकराल रूपवाली वह भयानक ब्रह्महत्या वृत्रके शरीरसे
निकलकर तत्काल ही वज्रधारी इन्द्रको खोजने लगी ।। १४२ ।।
कस्यचित् त्वथ कालस्य वृत्रहा कुरुनन्दन ।। १५ ।।
स्वर्गायाभिमुखः प्रायाल्लोकानां हितकाम्यया ।
सा विनिःसरमाणं तु दृष्ट्वा शक्रं महौजसम् ।। १६ ।।
कुरुनन्दन! उस समय वृत्रविनाशक इन्द्र लोक-हितकी कामनासे स्वर्गकी ओर जा रहे थे। महातेजस्वी इन्द्रको युद्धभूमिसे निकलकर जाते देख ब्रह्महत्या कुछ ही कालमें उनके पास जा पहुँची ।। १५-१६ ।।
जग्राह वध्या देवेन्द्रं सुलग्ना चाभवत् तदा ।
स हि तस्मिन् समुत्पन्ने ब्रह्मवध्याकृते भये ।। १७ ।।
नलिन्या बिसमध्यस्थ उवासाब्दगणान् बहून् ।
उस ब्रह्महत्याने देवेन्द्रको पकड़ लिया और वह तुरंत ही उनके शरीरसे सट गयी। वह ब्रह्महत्याजनित भय उपस्थित होनेपर इन्द्र उससे पिण्ड छुड़ानेके लिये भागे और कमलकी नालके भीतर घुसकर उसीमें बहुत वर्षोंतक छिपे रहे ।। १७ १/२ ।।
अनुसृत्य तु यत्नात् स तथा वै ब्रह्महत्यया ॥ १८ ॥
तदा गृहीतः कौरव्य निस्तेजाः समपद्यत ।
परंतु उस ब्रह्महत्याने यत्नपूर्वक उनका पीछा करके वहाँ भी उन्हें जा पकड़ा। कुरुनन्दन! ब्रह्महत्याद्वारा पकड़ लिये जानेपर इन्द्र निस्तेज हो गये ॥ १८ १/२ ॥
तस्या व्यपोहने शक्रः परं यत्नं चकार ह ॥ १९ ॥
न चाशकत् तां देवेन्द्रो ब्रह्मवध्यां व्यपोहितुम् ।
देवेन्द्रने उसके निवारणके लिये महान् प्रयत्न किया; परंतु किसी तरह भी वे उसे दूर न कर सके ॥
गृहीत एव तु तया देवेन्द्रो भरतर्षभ ॥ २० ॥
पितामहमुपागम्य शिरसा प्रत्यपूजयत् ।
भरतभूषण! ब्रह्महत्याने देवराज इन्द्रको अपना बंदी बना ही लिया। वे उसी अवस्थामें ब्रह्माजीके पास गये और मस्तक झुकाकर उन्होंने ब्रह्माजीको प्रणाम किया ॥
ज्ञात्वा गृहीतं शक्रं स द्विजप्रवरवध्यया ॥ २१ ॥
ब्रह्मा स चिन्तयामास तदा भरतसत्तम ।
भरतसत्तम! एक श्रेष्ठ ब्राह्मणके वधसे पैदा हुई ब्रह्महत्याने इन्द्रको पकड़ लिया है—यह जानकर ब्रह्माजी विचार करने लगे ॥ २१ १/२ ॥
तामुवाच महाबाहो ब्रह्मवध्यां पितामहः ॥ २२ ॥
स्वरेण मधुरेणाथ सान्त्वयन्निव भारत ।
महाबाहु भारत! तब ब्रह्माजीने उस ब्रह्महत्याको अपनी मीठी वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए-से उससे कहा— ॥ २२ १/२ ॥
मुच्यतां त्रिदशेन्द्रोऽयं मत्प्रियं कुरु भाविनि ॥ २३ ॥
ब्रूहि किं ते करोम्यद्य कामं किं त्वमिहेच्छसि ॥ २४ ॥
‘भाविनि! ये देवताओंके राजा इन्द्र हैं, इन्हें छोड़ दो। मेरा यह प्रिय कार्य करो। बोलो, मैं तुम्हारी कौन-सी अभिलाषा पूर्ण करूँ। तुम जिस किसी मनोरथको पाना चाहो उसे बताओ’ ॥ २३-२४ ॥
ब्रह्मवध्योवाच
त्रिलोकपूजिते देवे प्रीते त्रैलोक्यकर्तरि ।
कृतमेव हि मन्यामि निवासं तु विधत्स्व मे ॥ २५ ॥
ब्रह्महत्या बोली—तीनों लोकोंकी सृष्टि करने-वाले त्रिभुवनपूजित आप परमदेवके प्रसन्न हो जानेपर मैं अपने सारे मनोरथोंको पूर्ण हुआ ही मानती हूँ। अब आप मेरे लिये केवल निवासस्थानका प्रबन्ध कर दीजिये ॥ २५ ॥
त्वया कृतेयं मर्यादा लोकसंरक्षणार्थिना ।
स्थापना वै सुमहती त्वया देव प्रवर्तिता ॥ २६ ॥ आपने सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये यह धर्मकी मर्यादा बाँधी है। देव! आपहीने इस महत्त्वपूर्ण मर्यादाकी स्थापना करके इसे चलाया है ॥ २६ ॥ प्रीते तु त्वयि धर्मज्ञ सर्वलोकेश्वर प्रभो । शक्रादपगमिष्यामि निवासं संविधत्स्व मे ॥ २७ ॥ धर्मके ज्ञाता सर्वलोकेश्वर प्रभो! जब आप प्रसन्न हैं तो मैं इन्द्रको छोड़कर हट जाऊँगी; परंतु आप मेरे लिये निवास-स्थानकी व्यवस्था कर दीजिये ॥ २७ ॥
भीष्म उवाच
तथेति तां प्राह तदा ब्रह्मवध्यां पितामहः । उपायतः स शक्रस्य ब्रह्मवध्यां व्यपोहत् ॥ २८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! तब ब्रह्माजीने ब्रह्महत्यासे कहा—'बहुत अच्छा, मैं तुम्हारे रहनेकी व्यवस्था करता हूँ' ऐसा कहकर उन्होंने उपायद्वारा इन्द्रकी ब्रह्महत्याको दूर किया ॥ २८ ॥ ततः स्वयम्भुवा ध्यातस्तत्र वह्निर्महात्मना । ब्रह्माणमुपसंगम्य ततो वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥ तदनन्तर महात्मा स्वयम्भूने वहाँ अग्निदेवका स्मरण किया। उनके स्मरण करते ही वे ब्रह्माजीके पास आ गये और इस प्रकार बोले— ॥ २९ ॥ प्राप्तोऽस्मि भगवन् देव त्वत्सकाशमनिन्दित । यत् कर्तव्यं मया देव तद् भवान् वक्तुमर्हसि ॥ ३० ॥ 'भगवन्! अनिन्द्य देव! मैं आपके निकट आया हूँ। प्रभो! मुझे जो कार्य करना हो, उसके लिये आप मुझे आज्ञा दें' ॥ ३० ॥
ब्रह्मोवाच
बहुधा विभजिष्यामि ब्रह्मवध्यामिमामहम् । शक्रस्याघविमोक्षार्थं चतुर्थागं प्रतीच्छ वै ॥ ३१ ॥ **ब्रह्माजीने कहा—**अग्निदेव! मैं इन्द्रको पापमुक्त करनेके लिये इस ब्रह्महत्याके कई भाग करूँगा। इसका एक चतुर्थांश तुम भी ग्रहण कर लो ॥ ३१ ॥
अग्निरुवाच
मम मोक्षस्य कोऽन्तो वै ब्रह्मन् ध्यायस्व वै प्रभो । एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वतो लोकपूजित ॥ ३२ ॥ **अग्निने कहा—**ब्रह्मन्! प्रभो! मेरे लिये आपकी आज्ञा शिरोधार्य है, परंतु मैं भी इस ब्रह्महत्यासे मुक्त हो सकूँ, इसके लिये इसकी अन्तिम अवधि क्या होगी, इसपर आप विचार
करें। विश्ववन्द्य पितामह! मैं इस बातको ठीक-ठीक जानना चाहता हूँ ॥ ३२ ॥
ब्रह्मोवाच
यस्त्वां ज्वलन्तमासाद्य स्वयं वै मानवः क्वचित् ।
बीजौषधिरसैर्वह्ने न यक्ष्यति तमोवृतः ॥ ३३ ॥
तमेषा यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति ।
ब्रह्मवध्या हव्यवाह व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ३४ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**अग्निदेव! यदि किसी स्थानपर तुम प्रज्वलित हो रहे हो, वहाँ पहुँचकर कोई अधिकारी मानव तमोगुणसे आवृत होनेके कारण बीज, ओषधि या रसोंसे स्वयं ही तुम्हारा पूजन नहीं करेगा तो उसीपर तुरंत यह ब्रह्महत्या चली जायगी और उसीके भीतर निवास करने लगेगी; अतः हव्यवाहन! तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ३३-३४ ॥
इत्युक्तः प्रतिजग्राह तद् वचो हव्यकव्यभुक् ।
पितामहस्य भगवांस्तथा च तदभूत् प्रभो ॥ ३५ ॥
प्रभो! ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर हव्य और कव्यके भोक्ता भगवान् अग्निदेवने उन पितामहकी वह आज्ञा स्वीकार कर ली। इस प्रकार ब्रह्महत्याका एक चौथाई भाग अग्निमें चला गया ॥ ३५ ॥
ततो वृक्षौषधितृणं समाहूय पितामहः ।
इममर्थं महाराज वक्तुं समुपचक्रमे ॥ ३६ ॥
महाराज! इसके बाद पितामह वृक्ष, तृण और ओषधियोंको बुलाकर उनसे भी वही बात कहने लगे ।।
(ब्रह्मोवाच
इयं वृत्रादनुप्राप्ता ब्रह्महत्या महाभया ।
पुरुहूतं चतुर्थांशमस्या यूयं प्रतीच्छथ ॥)
**ब्रह्माजी बोले—**वृत्रासुरके वधसे यह महाभयंकर ब्रह्महत्या प्रकट होकर इन्द्रके पीछे लगी है। तुमलोग उसका एक चौथाई भाग स्वयं ग्रहण कर लो ।।
ततो वृक्षौषधितृणं तथैवोक्तं यथातथम् ।
व्यथितं वह्निवद् राजन् ब्रह्माणमिदमब्रवीत् ॥ ३७ ॥
राजन्! ब्रह्माजीने जब उसी प्रकार सब बातें ठीक-ठीक सामने रख दीं, तब अग्निके ही समान वृक्ष, तृण और ओषधियोंका समुदाय भी व्यथित हो उठा और उन सबने ब्रह्माजीसे इस प्रकार कहा— ॥ ३७ ॥
अस्माकं ब्रह्मवध्यायाः कोऽन्तो लोकपितामह ।
दैवेनाभिहतानस्मान् न पुनर्हन्तुमर्हसि ॥ ३८ ॥
‘लोकपितामह! हमारी इस ब्रह्महत्याका अन्त क्या होगा? हम तो यों ही दैवके मारे हुए स्थावर योनिमें पड़े हैं; अतः अब आप पुनः हमें न मारें॥ ३८॥
वयमग्निं तथा शीतं वर्षं च पवनेरितम्।
सहामः सततं देव तथा छेदनभेदने॥ ३९॥
ब्रह्मवध्यामिमामद्य भवतः शासनाद् वयम्।
ग्रहीष्यामस्त्रिलोकेश मोक्षं चिन्तयतां भवान्॥ ४०॥
‘देव! त्रिलोकीनाथ! हमलोग सदा अग्नि और धूपका ताप, सर्दी, वर्षा, आँधी और अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा भेदन-छेदनका कष्ट सहते रहते हैं। आज आपकी आज्ञासे इस ब्रह्महत्याको भी ग्रहण कर लेंगे; किंतु आप इनसे हमारे छुटकारेका उपाय भी तो सोचिये’॥
ब्रह्मोवाच
पर्वकाले तु सम्प्राप्ते यो वै छेदनभेदनम्।
करिष्यति नरो मोहात् तमेषानुगमिष्यति॥ ४१॥
**ब्रह्माजीने कहा—**संक्रान्ति, ग्रहण, पूर्णिमा, अमावास्या आदि पर्वकाल प्राप्त होनेपर जो मनुष्य मोहवश तुम्हारा भेदन-छेदन करेगा, उसीके पीछे तुम्हारी यह ब्रह्महत्या लग जायगी॥ ४१॥
भीष्म उवाच
ततो वृक्षौषधितृणमेवमुक्तं महात्मना।
ब्रह्माणमभिसम्पूज्य जगामाशु यथागतम्॥ ४२॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! महात्मा ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर वृक्ष, ओषधि और तृणका समुदाय उनकी पूजा करके जैसे आया था, वैसे ही शीघ्र लौट गया॥
आहूयाप्सरसो देवस्ततो लोकपितामहः।
वाचा मधुरया प्राह सान्त्वयन्निव भारत॥ ४३॥
भारत! तत्पश्चात् लोकपितामह ब्रह्माजीने अप्सराओंको बुलाकर उन्हें मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना देते हुए-से कहा—॥ ४३॥
इयमिन्द्रादनुप्राप्ता ब्रह्मवध्या वराङ्गनाः।
चतुर्थमस्या भागांशं मयोक्ताः सम्प्रतीच्छत॥ ४४॥
‘सुन्दरियो! यह ब्रह्महत्या इन्द्रके पाससे आयी है। तुमलोग मेरे कहनेसे इसका एक चतुर्थांश ग्रहण कर लो’॥
अप्सरस ऊचुः
ग्रहणे कृतबुद्धीनां देवेश तव शासनात्।
मोक्षं समयतोऽस्माकं चिन्तयस्व पितामह ॥ ४५ ॥
अप्सराएँ बोलीं— देवेश पितामह! आपकी आज्ञासे हमने इस ब्रह्महत्याको ग्रहण कर लेनेका विचार किया है, किंतु इससे हमारे छुटकारेके समयका भी विचार करनेकी कृपा करें ॥ ४५ ॥
ब्रह्मोवाच
रजस्वलासु नारीषु यो वै मैथुनमाचरेत् ।
तमेषा यास्यति क्षिप्रं व्येतु वो मानसो ज्वरः ॥ ४६ ॥
ब्रह्माजीने कहा— जो पुरुष रजस्वला स्त्रियोंके साथ मैथुन करेगा, उसपर यह ब्रह्महत्या शीघ्र चली जायगी; अतः तुम्हारी यह मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ४६ ॥
भीष्म उवाच
तथेति हृष्टमनस इत्युक्त्वाप्सरसां गणाः ।
स्वानि स्थानानि सम्प्राप्य रेमिरे भरतर्षभ ॥ ४७ ॥
भीष्मजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! यह सुनकर अप्सराओंका मन प्रसन्न हो गया। वे 'बहुत अच्छा' कहकर अपने-अपने स्थानोंमें जाकर विहार करने लगीं ॥
ततस्त्रिलोककृद् देवः पुनरेव महातपाः ।
अपःसंचिन्तयामास ध्यातास्ताश्चाप्यथागमन् ॥ ४८ ॥
तब त्रिभुवनकी सृष्टि करनेवाले महातपस्वी भगवान् ब्रह्माने पुनः जलका चिन्तन किया। उनके स्मरण करते ही तुरंत जलदेवता वहाँ उपस्थित हो गये ॥ ४८ ॥
तास्तु सर्वाः समागम्य ब्रह्माणममितौजसम् ।
इदमूचुर्वचो राजन् प्रणिपत्य पितामहम् ॥ ४९ ॥
राजन्! वे सब अमित तेजस्वी पितामह ब्रह्माजीके पास पहुँचकर उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोले— ॥
इमाः स्म देव सम्प्राप्तास्त्वत्सकाशमरिंदम ।
शासनात् तव लोकेश समाज्ञापय नः प्रभो ॥ ५० ॥
'शत्रुओंका दमन करनेवाले प्रभो! देव! लोकनाथ! हम आपकी आज्ञासे सेवामें उपस्थित हुए हैं। हमें आज्ञा दीजिये, हम कौन-सी सेवा करें?' ॥ ५० ॥
ब्रह्मोवाच
इयं वृत्रादनुप्राप्ता पुरुहूतं महाभया ।
ब्रह्मवध्या चतुर्थांशमस्या यूयं प्रतीच्छत ॥ ५१ ॥