भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

राजमहलके भीतर प्रवेश करके श्रीमान् नरेशने कुलदेवताओंका दर्शन किया और रत्न, चन्दन तथा माला आदिसे सर्वथा उनकी पूजा की ।। १४ ।।
निष्चक्राम ततः श्रीमान् पुनरेव महायशाः ।
ददर्श ब्राह्मणांश्चैव सोऽभिरूपानवस्थितान् ॥ १५ ॥
इसके बाद महायशस्वी श्रीमान् राजा युधिष्ठिर महलसे बाहर निकले। वहाँ उन्हें बहुत-से ब्राह्मण खड़े दिखायी दिये, जो हाथमें मङ्गलद्रव्य लिये खड़े थे ।। १५ ।।
स संवृतस्तदा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभिः ।
शुशुभे विमलश्चन्द्रस्तारागणवृतो यथा ॥ १६ ॥
जैसे तारोंसे घिरे हुए निर्मल चन्द्रमाकी शोभा होती है, उसी प्रकार आशीर्वाद देनेकी इच्छावाले ब्राह्मणोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरकी उस समय बड़ी शोभा हो रही थी ।। १६ ।।
तांस्तु वै पूजयामास कौन्तेयो विधिवद् द्विजान् ।
धौम्यं गुरुं पुरस्कृत्य ज्येष्ठं पितरमेव च ॥ १७ ॥
कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने गुरु धौम्य तथा ताऊ धृतराष्ट्रको आगे करके उन सभी ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन किया ।। १७ ।।
सुमनोमोदकै रत्नैर्हिरण्येन च भूरिणा ।
गोभिर्वस्त्रैश्च राजेन्द्र विविधैश्च किमिच्छकैः ॥ १८ ॥
राजेन्द्र! इन्होंने फूल, मिठाई, रत्न, बहुत-से सुवर्ण, गौओं, वस्त्रों तथा उनकी इच्छा पूछ-पूछ कर मँगाये हुए नाना प्रकारके मनोवाञ्छित पदार्थोंद्वारा उन सबका यथोचित सत्कार किया ।। १८ ।।
ततः पुण्याहघोषोऽभूद् दिवं स्तब्ध्वेव भारत ।
सुहृदां प्रीतिजननः पुण्यः श्रुतिसुखावहः ॥ १९ ॥
भारत! इसके बाद पुण्याहवाचनका गम्भीर घोष होने लगा, जो आकाशको स्तब्ध-सा किये देता था। वह पवित्र शब्द कानोंको सुख देनेवाला तथा सुहृदोंको प्रसन्नता प्रदान करनेवाला था ।। १९ ।।
हंसवद् विदुषां राजन् द्विजानां तत्र भारती ।
शुश्रुवे वेदविदुषां पुष्कलार्थपदाक्षरा ॥ २० ॥
राजन्! उस समय वेदवेत्ता विद्वान् ब्राह्मणोंने हंसके समान हर्ष-गद्गद स्वरसे जो प्रचुर अर्थ, पद एवं अक्षरोंसे युक्त वाणी कही थी, वह वहाँ सबको स्पष्ट सुनायी दे रही थी ।। २० ।।
ततो दुन्दुभिनिर्घोषः शंखानां च मनोरमः ।
जयं प्रवदतां तत्र स्वनः प्रादुरभून्नृप ॥ २१ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर दुन्दुभियों और शंखोंकी मनोरम ध्वनि होने लगी, जय-जयकार करनेवालोंका गम्भीर घोष वहाँ प्रकट होने लगा ।। २१ ।।

निःशब्दे च स्थिते तत्र ततो विप्रजने पुनः । राजानं ब्राह्मणच्छद्मा चार्वाको रक्षसोऽब्रवीत् ॥ २२ ॥ जब सब ब्राह्मण चुपचाप खड़े हो गये, तब ब्राह्मणका वेष बनाकर आया हुआ चार्वाक नामक राक्षस राजा युधिष्ठिरसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ ॥ २२ ॥ तत्र दुर्योधनसखा भिक्षुरूपेण संवृतः । साक्षः शिखी त्रिदण्डी च धृष्टो विगतसाध्वसः ॥ २३ ॥ वह दुर्योधनका मित्र था। उसने संन्यासी ब्राह्मणके वेषमें अपने असली रूपको छिपा रखा था। उसके हाथमें अक्षमाला थी और मस्तकपर शिखा। उसने त्रिदण्ड धारण कर रखा था। वह बड़ा ढीठ और निर्भय था ॥ २३ ॥ वृतः सर्वैस्तथा विप्रैराशीर्वादविवक्षुभिः । परःसहस्रै राजेन्द्र तपोनियमसंवृतैः ॥ २४ ॥ स दुष्टः पापमाशंसुः पाण्डवानां महात्मनाम् । अनामन्त्र्यैव तान् विप्रंस्तमुवाच महीपतिम् ॥ २५ ॥ राजेन्द्र! तपस्या और नियममें लगे रहनेवाले और आशीर्वाद देनेके इच्छुक उन समस्त ब्राह्मणोंसे, जिनकी संख्या हजारसे भी अधिक थी, घिरा हुआ वह दुष्ट राक्षस महात्मा पाण्डवोंका विनाश चाहता था। उसने उन सब ब्राह्मणोंसे अनुमति लिये बिना ही राजा युधिष्ठिरसे कहा ॥ २४-२५ ॥

चार्वाक उवाच इमे प्राहुर्द्विजाः सर्वे समारोप्य वचो मयि । धिग् भवन्तं कुनृपतिं ज्ञातिघातिनमस्तु वै ॥ २६ ॥ किं तेन स्याद्धि कौन्तेय कृत्वेमं ज्ञातिसंक्षयम् । घातयित्वा गुरूंच्छैव मृतं श्रेयो न जीवितम् ॥ २७ ॥ चार्वाक बोला— राजन्! ये सब ब्राह्मण मुझपर अपनी बात कहनेका भार रखकर मेरेद्वारा ही तुमसे कह रहे हैं—'कुन्तीनन्दन! तुम अपने भाई-बन्धुओंका वध करनेवाले एक दुष्ट राजा हो। तुम्हें धिक्कार है! ऐसे पुरुषके जीवनसे क्या लाभ? इस प्रकार यह बन्धु-बान्धवोंका विनाश करके गुरुजनोंकी हत्या करवाकर तो तुम्हारा मर जाना ही अच्छा है, जीवित रहना नहीं' ॥ २६-२७ ॥ इति ते वै द्विजाः श्रुत्वा तस्य दुष्टस्य रक्षसः । विव्यथुश्चक्रुशुश्चैव तस्य वाक्यप्रधर्षिताः ॥ २८ ॥ वे ब्राह्मण उस दुष्ट राक्षसकी यह बात सुनकर उसके वचनोंसे तिरस्कृत हो व्यथित हो उठे और मन-ही-मन उसके कथनकी निन्दा करने लगे ॥ २८ ॥ ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे स च राजा युधिष्ठिरः ।

व्रीडिताः परमोद्विग्नास्तूष्णीमासन् विशाम्पते ॥ २९ ॥ प्रजानाथ! इसके बाद वे सभी ब्राह्मण तथा राजा युधिष्ठिर अत्यन्त उद्विग्न और लज्जित हो गये। प्रतिवादके रूपमें उनके मुँहसे एक शब्द भी नहीं निकला। वे सभी कुछ देरतक चुप रहे ॥ २९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

प्रसीदन्तु भवन्तो मे प्रणतस्याभियाचतः । प्रत्यासन्नव्यसनिनं न मां धिक्कर्तुमर्हथ ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने कहा—ब्राह्मणो! मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करके विनीतभावसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आपलोग मुझपर प्रसन्न हों। इस समय मुझपर सब ओरसे बड़ी भारी विपत्ति आ गयी है; अतः आपलोग मुझे धिक्कार न दें ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

ततो राजन् ब्राह्मणास्ते सर्व एव विशाम्पते । ऊचुर्नैतद् वचोऽस्माकं श्रीरस्तु तव पार्थिव ॥ ३१ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! प्रजानाथ! उनकी यह बात सुनकर सब ब्राह्मण बोल उठे—'महाराज! यह हमारी बात नहीं कह रहा है। हम तो यह आशीर्वाद देते हैं कि 'आपकी राजलक्ष्मी सदा बनी रहे' ॥ ३१ ॥

जज्ञुश्चैव महात्मानस्ततस्तं ज्ञानचक्षुषा । ब्राह्मणा वेदविद्वांसस्तपोभिर्विमलीकृताः ॥ ३२ ॥ उन वेदवेत्ता ब्राह्मणोंका अन्तःकरण तपस्यासे निर्मल हो गया था। उन महात्माओंने ज्ञानदृष्टिसे उस राक्षसको पहचान लिया ॥ ३२ ॥

ब्राह्मणा ऊचुः

एष दुर्योधनसखा चार्वाको नाम राक्षसः । परिव्राजकरूपेण हितं तस्य चिकीर्षति ॥ ३३ ॥ वयं ब्रूमो न धर्मात्मन् व्येतु ते भयमीदृशम् । उपतिष्ठतु कल्याणं भवन्तं भ्रातृभिः सह ॥ ३४ ॥ ब्राह्मण बोले—धर्मात्मन्! यह दुर्योधनका मित्र चार्वाक नामक राक्षस है, जो संन्यासीके रूपमें यहाँ आकर उसका हित करना चाहता है। हमलोग आपसे कुछ नहीं कहते हैं। आपका इस तरहका भय दूर हो जाना चाहिये। हम आशीर्वाद देते हैं कि 'भाइयोंसहित आपको कल्याणकी प्राप्ति हो' ॥ ३३-३४ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे हुंकारैः क्रोधमूर्च्छिताः ।

निर्भर्त्सयन्तः शुचयो निजघ्नुः पापराक्षसम् ॥ ३५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर क्रोधसे आतुर हुए उन सभी शुद्धात्मा ब्राह्मणोंने उस पापात्मा राक्षसको बहुत फटकारा और अपने हुङ्कारोंसे उसे नष्ट कर दिया ॥ ३५ ॥
स पपात विनिर्दग्धस्तेजसा ब्रह्मवादिनाम् ।
महेन्द्राशनिनिर्दग्धः पादपोऽङ्कुरवानिव ॥ ३६ ॥
ब्रह्मवादी महात्माओंके तेजसे दग्ध होकर वह राक्षस गिर पड़ा, मानो इन्द्रके वज्रसे जलकर कोई अंकुरयुक्त वृक्ष धराशायी हो गया हो ॥ ३६ ॥
पूजिताश्च ययुर्विप्रा राजानमभिनन्द्य तम् ।
राजा च हर्षमापेदे पाण्डवः ससुहृज्जनः ॥ ३७ ॥
तत्पश्चात् राजाद्वारा पूजित हुए वे ब्राह्मण उनका अभिनन्दन करके चले गये और पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपने सुहृदोंसहित बड़े हर्षको प्राप्त हुए ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि चार्वाकवधेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें चार्वाकका वधविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८ ॥

चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका श्रीकृष्णद्वारा वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका श्रीकृष्णद्वारा वर्णन

वैशम्पायन उवाच

ततस्तत्र तु राजानं तिष्ठन्तं भ्रातृभिः सह ।
उवाच देवकीपुत्रः सर्वदर्शी जनार्दनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर सर्वदर्शी देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने वहाँ भाइयोंसहित खड़े हुए राजा युधिष्ठिरसे कहा ॥ १ ॥

वासुदेव उवाच

ब्राह्मणास्तात लोकेऽस्मिन्नर्चनीयाः सदा मम ।
एते भूमिचरा देवा वाग्विषाः सुप्रसादकाः ॥ २ ॥
**श्रीकृष्ण बोले—**तात! इस संसारमें ब्राह्मण मेरे लिये सदा ही पूजनीय हैं। ये पृथ्वीपर विचरनेवाले देवता हैं। कुपित होने पर इनकी वाणीमें विषका-सा प्रभाव होता है। ये सहज ही प्रसन्न होते और दूसरोंको भी प्रसन्न करते हैं ॥ २ ॥

पुरा कृतयुगे राजंश्चार्वाको नाम राक्षसः ।
तपस्तेपे महाबाहो बदर्यां बहुवार्षिकम् ॥ ३ ॥
राजन्! महाबाहो! पहले सत्ययुग की बात है, चार्वाक राक्षसने बहुत वर्षोंतक बद्रिकाश्रममें तपस्या की ॥ ३ ॥

वरेण च्छन्द्यमानश्च ब्रह्मणा च पुनः पुनः ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो वरयामास भारत ॥ ४ ॥
भरतनन्दन! जब ब्रह्माजीने उससे बारंबार वर माँगनेका अनुरोध किया, तब उसने यही वर माँगा कि मुझे किसी भी प्राणीसे भय न हो ॥ ४ ॥

द्विजावमानादन्यत्र प्रादाद् वरमनुत्तमम् ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददौ तस्मै जगत्पतिः ॥ ५ ॥
जगदीश्वर ब्रह्माजीने उसे यह परम उत्तम वर देते हुए कहा कि 'तुम्हें ब्राह्मणका अपमान करनेके सिवा और कहीं किसीसे भय नहीं है' इस तरह उन्होंने उसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी ओरसे अभयदान दे दिया ॥ ५ ॥

स तु लब्धवरः पापो देवानमितविक्रमः ।
राक्षसस्तापयामास तीव्रकर्मा महाबलः ॥ ६ ॥
वर पाकर वह अमित पराक्रमी महाबली और दुःसह कर्म करनेवाला पापात्मा राक्षस देवताओंको संताप देने लगा ॥ ६ ॥

ततो देवाः समेताश्च ब्रह्माणमिदमब्रुवन् । वधाय रक्षसस्तस्य बलविप्रकृतास्तदा ॥ ७ ॥ तब उसके बलसे तिरस्कृत हुए सब देवताओंने एकत्र हो ब्रह्माजीसे उसके वधके लिये प्रार्थना की ॥ ७ ॥ तानुवाच ततो देवो विहितस्तत्र वै मया । यथास्य भविता मृत्युरचिरेणेति भारत ॥ ८ ॥ भरतनन्दन! तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा—'मैंने ऐसा विधान कर दिया है जिससे शीघ्र ही उस राक्षसकी मृत्यु हो जायगी ॥ ८ ॥ राजा दुर्योधनो नाम सखास्य भविता नृषु । तस्य स्नेहावबद्धोऽसौ ब्राह्मणानवमंस्यते ॥ ९ ॥ 'मनुष्योंमें राजा दुर्योधन उसका मित्र होगा और उसीके स्नेहसे बँधकर वह राक्षस ब्राह्मणोंका अपमान कर बैठेगा ॥ ९ ॥ तत्रैनं रुषिता विप्रा विप्रकारप्रधर्षिताः । धक्ष्यन्ति वाग्बलाः पापं ततो नाशं गमिष्यति ॥ १० ॥ 'उसके विरुद्धाचरणसे तिरस्कृत हो रोषमें भरे हुए वाक्शक्तिसे सम्पन्न ब्राह्मण वहीं उस पापीको जला देंगे। इससे उसका नाश हो जायगा' ॥ १० ॥ स एष निहतः शेते ब्रह्मदण्डेन राक्षसः । चार्वाको नृपतिश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ ॥ ११ ॥ नृपश्रेष्ठ! भरतभूषण! अब आप शोक न करें। यह वही राक्षस चार्वाक ब्रह्मदण्डसे मारा जाकर पृथ्वीपर पड़ा है ॥ ११ ॥ हतास्ते क्षत्रधर्मेण ज्ञातयस्तव पार्थिव । स्वर्गताश्च महात्मानो वीराः क्षत्रियपुङ्गवाः ॥ १२ ॥ राजन्! आपने क्षत्रियधर्मके अनुसार भाई-बन्धुओंका वध किया है। वे महामनस्वी क्षत्रियशिरोमणि वीर स्वर्गलोकमें चले गये हैं ॥ १२ ॥ स त्वमातिष्ठ कार्याणि मा तेऽभूद् ग्लानिरच्युत । शत्रून् जहि प्रजा रक्ष द्विजांश्च परिपूजय ॥ १३ ॥ अच्युत! अब आप अपने कर्तव्यका पालन करें। आपके मनमें ग्लानि न हो। आप शत्रुओंको मारिये, प्रजाकी रक्षा कीजिये और ब्राह्मणोंका आदर सत्कार करते रहिये ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि चार्वाकवरदानादिकथने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें चार्वाकको प्राप्त हुए वरदान आदिका वर्णनविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३९ ।।

अध्याय (पृष्ठ 272)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चत्वारिंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरका राज्याभिषेक

वैशम्पायन उवाच

ततः कुन्तीसुतो राजा गतमन्युर्गतज्वरः ।
काञ्चने प्राङ्मुखो हृष्टो न्यषीदत् परमासने ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर खेद और चिन्तासे रहित हो पूर्वकी ओर मुँह करके प्रसन्नतापूर्वक सुवर्णके सुन्दर सिंहासनपर विराजमान हुए ॥ १ ॥

तमेवाभिमुखो पीठे प्रदीप्ते काञ्चने शुभे ।
सात्यकिर्वासुदेवश्च निषीदतूररिंदमौ ॥ २ ॥
तत्पश्चात् शत्रुओंका दमन करनेवाले सात्यकि और भगवान् श्रीकृष्ण सोनेके जगमगाते हुए सुन्दर आसनपर उन्हींकी ओर मुँह करके बैठे ॥ २ ॥

मध्ये कृत्वा तु राजानं भीमसेनार्जुनावुभौ ।
निषीदतुर्महात्मानौ श्लक्ष्णयोर्मणिपीठयोः ॥ ३ ॥
राजा युधिष्ठिरको बीचमें करके महामनस्वी भीमसेन और अर्जुन दो मणिमय मनोहर पीठोंपर विराजमान हुए ॥

दान्ते सिंहासने शुभ्रे जाम्बूनदविभूषिते ।
पृथापि सहदेवेन सहास्ते नकुलेन च ॥ ४ ॥
एक ओर हाथी दाँतके बने हुए स्वर्णविभूषित शुभ्र सिंहासनपर नकुल और सहदेवके साथ माता कुन्ती भी बैठ गयीं ॥ ४ ॥

सुधर्मा विदुरो धौम्यो धृतराष्ट्रश्च कौरवः ।
निषेदुर्ज्वलनाकारेष्वासनेषु पृथक् पृथक् ॥ ५ ॥
इसी प्रकार सुधर्मा, विदुर, धौम्य और कुरुराज धृतराष्ट्र अग्निके समान तेजस्वी पृथक्-पृथक् सिंहासनोंपर विराजमान हुए ॥ ५ ॥

युयुत्सुः संजयश्चैव गान्धारी च यशस्विनी ।
धृतराष्ट्रो यतो राजा ततः सर्वे समाविशन् ॥ ६ ॥
युयुत्सु, संजय और यशस्विनी गान्धारी—ये सब लोग उधर ही बैठे जिस ओर राजा धृतराष्ट्र थे ॥ ६ ॥

तत्रोपविष्टो धर्मात्मा श्वेताः सुमनसोऽस्पृशत् ।
स्वस्तिकानक्षतान् भूमिं सुवर्णं रजतं मणिम् ॥ ७ ॥

धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने सिंहासनपर बैठकर श्वेत पुष्प, स्वस्तिक, अक्षत, भूमि, सुवर्ण, रजत एवं मणिका स्पर्श किया ॥ ७ ॥ ततः प्रकृतयः सर्वाः पुरस्कृत्य पुरोहितम् । ददृशुर्धर्मराजानमादाय बहुमङ्गलम् ॥ ८ ॥ इसके बाद मन्त्री, सेनापति आदि सभी प्रकृतियोंने पुरोहितको आगे करके बहुत-सी माङ्गलिक सामग्री साथ लिये धर्मराज युधिष्ठिरका दर्शन किया ॥ ८ ॥ पृथिवीं च सुवर्णं च रत्नानि विविधानि च । आभिषेचनिकं भाण्डं सर्वसम्भारसम्भृतम् ॥ ९ ॥ काञ्चनोदुम्बरास्तत्र राजताः पृथिवीमयाः । पूर्णकुम्भाः सुमनसो लाजा बर्हीषि गोरसम् ॥ १० ॥ शमीपिप्पलपालाशसमिधो मधुसर्पिषी । स्रुव औदुम्बरः शंखस्तथा हेमविभूषितः ॥ ११ ॥ मिट्टी, सुवर्ण, तरह-तरहके रत्न, राज्याभिषेककी सामग्री, सब प्रकारके आवश्यक सामान, सोने, चाँदी, ताँबे और मिट्टीके बने हुए जलपूर्ण कलश, फूल, लाजा (खील), कुशा, गोरस, शमी, पीपल और पलाशकी समिधाएँ, मधु, घृत, गूलरकी लकड़ीका स्रुवा तथा स्वर्णजटित शंख—ये सब वस्तुएँ वे संग्रह करके लाये थे ॥ ९—११ ॥ दाशार्हेणाभ्यनुज्ञातस्तत्र धौम्यः पुरोहितः । प्रागुदक्प्रवणां वेदीं लक्षणेनोपलिख्य च ॥ १२ ॥ व्याघ्रचर्मोत्तरे शुक्ले सर्वतोभद्र आसने । दृढपादप्रतिष्ठाने हुताशनसमत्विषि ॥ १३ ॥ उपवेश्य महात्मानं कृष्णां च द्रुपदात्मजाम् । जुहाव पावकं धीमान् विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ॥ १४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे पुरोहित धौम्यजीने एक वेदी बनायी जो पूर्व और उत्तर दिशाकी ओर नीची थी। उसे गोबरसे लीपकर कुशके द्वारा उसपर रेखा की। इस प्रकार वेदीका संस्कार करके सर्वतोभद्र नामक एक चौकीपर बाघम्बर एवं श्वेत वस्त्र बिछाकर उसके ऊपर महात्मा युधिष्ठिर तथा द्रुपदकुमारी कृष्णाको बिठाया। उस चौकीके पाये और बैठनेके आधार बहुत मजबूत थे। सुवर्णजटित होनेके कारण वह आसन प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। बुद्धिमान् पुरोहितने वेदीपर अग्निको स्थापित करके उसमें विधि और मन्त्रके साथ आहुति दी ॥ १२—१४ ॥ तत उत्थाय दाशार्हः शंखमादाय पूजितम् । अभ्यषिञ्चत् पतिं पृथ्व्याः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ १५ ॥ धृतराष्ट्रश्च राजर्षिः सर्वाः प्रकृतयस्तथा ।

तत्पश्चात् दशार्हवंशी श्रीकृष्णने उठकर जिसकी पूजा की गयी थी, वह पाञ्चजन्य शंख हाथमें ले उसके जलसे पृथिवीपति कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरका अभिषेक किया। फिर राजा धृतराष्ट्र तथा प्रकृतिवर्गके अन्य सब लोगोंने भी अभिषेकका कार्य सम्पन्न किया ॥ १५ १/२ ॥

अनुज्ञातोऽथ कृष्णेन भ्रातृभिः सह पाण्डवः ॥ १६ ॥
पाञ्चजन्याभिषिक्तश्च राजामृतमुखोऽभवत् ।
श्रीकृष्णकी आज्ञासे पाञ्चजन्य शंखद्वारा अभिषेक हो जानेपर भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरका मुख इतना सुन्दर दिखायी देने लगा, मानो नेत्रोंसे अमृतकी वर्षा कर रहा हो ॥ १६ १/२ ॥

ततोऽनुवादयामासुः पणवानकदुन्दुभीन् ॥ १७ ॥
धर्मराजोऽपि तत् सर्वं प्रतिजग्राह धर्मतः ।
तदनन्तर वहाँ बाजा बजानेवाले लोग पणव, आनक तथा दुन्दुभिकी ध्वनि करने लगे। धर्मराज युधिष्ठिरने भी धर्मानुसार वह सारा स्वागत सत्कार स्वीकार किया ॥ १७ १/२ ॥

पूजयामास तांश्चापि विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ १८ ॥
ततो निष्कसहस्रेण ब्राह्मणान्स्वस्ति वाचयन् ।
वेदाध्ययनसम्पन्नान् धृतिशीलसमन्वितान् ॥ १९ ॥
बहुत दक्षिणा देनेवाले राजा युधिष्ठिरने वेदाध्ययनसे सम्पन्न तथा धैर्य और शीलसे संयुक्त ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर उनका विधिपूर्वक पूजन किया और उन्हें एक हजार अशर्फियाँ दान कीं ॥ १८-१९ ॥

ते प्रीता ब्राह्मणा राजन् स्वस्त्यूचुर्जयमेव च ।
हंसा इव च नर्दन्तः प्रशशंसुर्युधिष्ठिरम् ॥ २० ॥
राजन्! इससे प्रसन्न होकर उन ब्राह्मणोंने उनके कल्याणका आशीर्वाद दिया और जय-जयकार की। वे सभी ब्राह्मण हंसके समान गम्भीर स्वरमें बोलते हुए राजा युधिष्ठिरकी इस प्रकार प्रशंसा करने लगे— ॥ २० ॥

युधिष्ठिर महाबाहो दिष्ट्या जयसि पाण्डव ।
दिष्ट्या स्वधर्मं प्राप्तोऽसि विक्रमेण महाद्युते ॥ २१ ॥
‘पाण्डुनन्दन महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हारी विजय हुई—यह बड़े भाग्यकी बात है। महातेजस्वी नरेश! तुमने पराक्रमसे अपना धर्मानुकूल राज्य प्राप्त कर लिया—यह भी सौभाग्यका ही सूचक है ॥ २१ ॥

दिष्ट्या गाण्डीवधन्वा च भीमसेनश्च पाण्डवः ।
त्वं चापि कुशली राजन् माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ २२ ॥
मुक्ता वीरक्षयात् तस्मात् संग्रामाद् विजितद्विषः ।
क्षिप्रमुत्तरकार्याणि कुरु सर्वाणि भारत ॥ २३ ॥

‘गाण्डीवधारी अर्जुन, पाण्डुपुत्र भीमसेन, तुम और माद्रीपुत्र पाण्डुकुमार नकुल-सहदेव—ये सभी शत्रुओंपर विजय पाकर इस वीरविनाशक संग्रामसे कुशलपूर्वक बच गये, इसे भी महान् सौभाग्यकी ही बात समझनी चाहिये। भारत! अब आगे जो कार्य करने हैं, उन सबको शीघ्र पूर्ण कीजिये’ ।। २२-२३ ।।
ततः प्रत्यर्चितः सद्भिर्धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
प्रतिपेदे महद् राज्यं सुहृद्भिः सह भारत ।। २४ ।।
भरतनन्दन! तत्पश्चात् समागत सज्जनोंने धर्मराज युधिष्ठिरका पुनः सत्कार किया। फिर उन्होंने सुहृदोंके साथ अपने विशाल राज्यका भार हाथोंमें ले लिया ।। २४ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिराभिषेके
चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिरका राज्याभिषेकविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४० ।।

अध्याय (पृष्ठ 276)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकचत्वारिंशोऽध्यायः

राजा युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रके अधीन रहकर राज्यकी व्यवस्थाके लिये भाइयों तथा अन्य लोगोंको विभिन्न कार्योंपर नियुक्त करना

वैशम्पायन उवाच

प्रकृतीनां च तद् वाक्यं देशकालोपबृंहितम् ।
श्रुत्वा युधिष्ठिरो राजा चोत्तरं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मन्त्री, प्रजा आदिके उस देशकालोचित वचनको सुनकर राजा युधिष्ठिरने उसका उत्तर देते हुए कहा— ॥ १ ॥
धन्याः पाण्डुसुता नूनं येषां ब्राह्मणपुङ्गवाः ।
तथ्यान् वाप्यथवातथ्यान् गुणानाहुः समागताः ॥ २ ॥
'निश्चय ही हम सभी पाण्डव धन्य हैं, जिनके गुणोंका बखान यहाँ पधारे हुए सभी ब्राह्मण कर रहे हैं। हममें वास्तवमें वे गुण हों या न हों, आपलोग हमें गुणवान् बता रहे हैं ॥ २ ॥
अनुग्राह्या वयं नूनं भवतामिति मे मतिः ।
यदेवं गुणसम्पन्नानस्मान् ब्रूथ विमत्सराः ॥ ३ ॥
'हमारा विश्वास है कि आपलोग निश्चय ही हमें अपने अनुग्रहका पात्र समझते हैं, तभी तो ईर्ष्या और द्वेष छोड़कर हमें इस प्रकार गुणसम्पन्न बता रहे हैं ॥
धृतराष्ट्रो महाराजः पिता मे दैवतं परम् ।
शासनेऽस्य प्रिये चैव स्थेयं मत्प्रियकांक्षिभिः ॥ ४ ॥
'महाराज धृतराष्ट्र मेरे पिता (ताऊ) और श्रेष्ठ देवता हैं। जो लोग मेरा प्रिय करना चाहते हों उन्हें सदा उनकी आज्ञाके पालन तथा हित-साधनमें लगे रहना चाहिये ॥
एतदर्थं हि जीवामि कृत्वा ज्ञातिवधं महत् ।
अस्य शुश्रूषणं कार्यं मया नित्यमतन्द्रिणा ॥ ५ ॥
'अपने भाई-बन्धुओंका इतना बड़ा संहार करके मैं इन्हीं महाराजके लिये जी रहा हूँ। मुझे नित्य-निरन्तर आलस्य छोड़कर इनकी सेवा-शुश्रूषामें संलग्न रहना है ॥ ५ ॥
यदि चाहमनुग्राह्यो भवतां सुहृदां तथा ।
धृतराष्ट्रे यथापूर्वं वृत्तिं वर्तितुमर्हथ ॥ ६ ॥
'यदि आप सब सुहृदोंका मुझपर अनुग्रह हो तो आपलोग महाराज धृतराष्ट्रके प्रति वैसा ही भाव और बर्ताव बनाये रखें, जैसा पहले रखते थे ॥ ६ ॥

एष नाथो हि जगतो भवतां च मया सह ।
अस्यैव पृथिवी कृत्स्ना पाण्डवाः सर्व एव च ॥ ७ ॥
एतन्मनसि कर्तव्यं भवद्भिर्वचनं मम ।
‘ये ही सम्पूर्ण जगत्‌के, आपलोगोंके और मेरे भी स्वामी हैं। यह सारी पृथ्वी और ये समस्त पाण्डव इन्हींके अधिकारमें हैं। आप सब लोग मेरी इस प्रार्थनाको अपने हृदयमें स्थान दें' ॥ ७ ½ ॥

अनुज्ञाप्याथ तान् राजा यथेष्टं गम्यतामिति ॥ ८ ॥
पौरजानपदान् सर्वान् विसृज्य कुरुनन्दनः ।
यौवराज्येन कौन्तेयं भीमसेनमयोजयत् ॥ ९ ॥
इसके बाद राजा युधिष्ठिरने नगर और जनपदके निवासियोंको यह आज्ञा दी कि आपलोग इच्छानुसार अपने-अपने स्थानको पधारें। इस प्रकार उन सबको विदा करके कुरुनन्दन युधिष्ठिरने कुन्तीकुमार भीमसेनको युवराजके पदपर प्रतिष्ठित किया ॥ ८-९ ॥

मन्त्रे च निश्चये चैव षाड्गुण्यस्य च चिन्तने ।
विदुरं बुद्धिसम्पन्नं प्रीतिमान् स समादिशत् ॥ १० ॥
फिर उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ बुद्धिमान् विदुरजीको मन्त्रणा³, कर्तव्यनिश्चय तथा छहों³ गुणोंके चिन्तनके कार्यमें नियुक्त किया ॥ १० ॥

कृताकृतपरिज्ञाने तथाऽऽयव्ययचिन्तने ।
संजयं योजयामास वृद्धं सर्वगुणैर्युतम् ॥ ११ ॥
कौन-सा कार्य हुआ और कौन-सा नहीं हुआ, इसकी जाँच करने तथा आय और व्ययपर विचार करनेके कार्यमें उन्होंने सर्वगुणसम्पन्न वयोवृद्ध संजयको लगाया ॥ ११ ॥

बलस्य परिमाणे च भक्तवेतनयोस्तथा ।
नकुलं व्यादिशद् राजा कर्मणां चान्ववेक्षणे ॥ १२ ॥
सेनाकी गणना करना, उसे भोजन और वेतन देना तथा उसके कामकी देखभाल करना—इन सब कार्योंका भार राजा युधिष्ठिरने नकुलको सौंप दिया ॥ १२ ॥

परचक्रोपरोधे च दुष्टानां चावमर्दने ।
युधिष्ठिरो महाराज फाल्गुनं व्यादिदेश ह ॥ १३ ॥
महाराज! शत्रुओंके देशपर चढ़ाई करने और दुष्टोंका दमन करनेके कार्यमें युधिष्ठिरने अर्जुनको नियुक्त किया ॥ १३ ॥

द्विजानां देवकार्येषु कार्येष्वन्येषु चैव ह ।
धौम्यं पुरोधसां श्रेष्ठं नित्यमेव समादिशत् ॥ १४ ॥
ब्राह्मणों और देवताओंसे सम्बन्ध रखनेवाले कार्योंपर तथा अन्यान्य ब्राह्मणोचित कर्तव्योंपर सदाके लिये पुरोहितोंमें श्रेष्ठ धौम्यजीकी नियुक्ति की गयी ॥ १४ ॥

सहदेवं समीपस्थं नित्यमेव समादिशत् । तेन गोप्यो हि नृपतिः सर्वावस्थो विशाम्पते ॥ १५ ॥ प्रजानाथ! सहदेवको राजा युधिष्ठिरने सदा ही अपने पास रहनेका आदेश दिया। उन्हें सभी अवस्थाओंमें राजाकी रक्षाका काम सौंपा गया था ॥ १५ ॥

यान् यानमन्यद् योग्यांश्च येषु येष्विह कर्मसु । तांस्तांस्तेष्वेव युयुजे प्रीयमाणो महीपतिः ॥ १६ ॥ प्रसन्न हुए महाराज युधिष्ठिरने जिन-जिन लोगोंको जिन-जिन कार्योंके योग्य समझा उन-उनको उन्हीं-उन्हीं कार्योंपर नियुक्त किया ॥ १६ ॥

विदुरं संजयं चैव युयुत्सुं च महामतिम् । अब्रवीत् परवीरघ्नो धर्मात्मा धर्मवत्सलः ॥ १७ ॥ उत्थायोत्थाय तत् कार्यमस्य राज्ञः पितुर्मम । सर्वं भवद्भिः कर्तव्यमप्रमत्तैर्यथायथम् ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले धर्मवत्सल धर्मात्मा युधिष्ठिरने विदुर, संजय तथा परम बुद्धिमान् युयुत्सुसे कहा—'आपलोगोंको सदा सावधान रहकर प्रतिदिन उठ-उठकर मेरे ताऊ महाराज धृतराष्ट्रकी सेवाका सारा आवश्यक कार्य यथोचितरूपसे सम्पन्न करना चाहिये ॥ १७-१८ ॥

पौरजानपदानां च यानि कार्याणि सर्वशः । राजानं समनुज्ञाप्य तानि कर्माणि भागशः ॥ १९ ॥ 'पुरवासियों और जनपदनिवासियोंके भी जो-जो कार्य हों, उन्हें इन्हीं महाराजकी आज्ञा लेकर पृथक्-पृथक् पूर्ण करना चाहिये' ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीमादिकर्मनियोगे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें भीमसेन आदिकी भिन्न-भिन्न कार्योंमें नियुक्तिविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 279)

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

राजा युधिष्ठिर तथा धृतराष्ट्रका युद्धमें मारे गये सगे-सम्बन्धियों तथा अन्य राजाओंके लिये श्राद्धकर्म करना

वैशम्पायन उवाच

ततो युधिष्ठिरो राजा ज्ञातीनां ये हता युधि ।
श्राद्धानि कारयामास तेषां पृथगुदारधीः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर उदार बुद्धि राजा युधिष्ठिरने जाति, भाई और कुटुम्बीजनोंमेंसे जो लोग युद्धमें मारे गये थे, उन सबके अलग-अलग श्राद्ध करवाये ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रो ददौ राजा पुत्राणामौर्ध्वदेहिकम् ।
सर्वकामगुणोपेतमन्नं गाश्च धनानि च ॥ २ ॥
रत्नानि च विचित्राणि महार्हाणि महायशाः ।
महायशस्वी राजा धृतराष्ट्रने अपने पुत्रोंके श्राद्धमें समस्त कमनीय गुणोंसे युक्त अन्न, गो, धन और बहुमूल्य विचित्र रत्न प्रदान किये ॥ २ १/२ ॥

युधिष्ठिरस्तु द्रोणस्य कर्णस्य च महात्मनः ॥ ३ ॥
धृष्टद्युम्नाभिमन्युभ्यां हैडिम्बस्य च रक्षसः ।
विराटप्रभृतीनां च सुहृदामुपकारिणाम् ॥ ४ ॥
द्रुपदद्रौपदेयानां द्रौपद्या सहितो ददौ ।
युधिष्ठिरने द्रौपदीको साथ लेकर आचार्य द्रोण, महामना कर्ण, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, राक्षस घटोत्कच, विराट आदि उपकारी सुहृद्, द्रुपद तथा द्रौपदीकुमारोंका श्राद्ध किया ॥ ३—४ १/२ ॥

ब्राह्मणानां सहस्राणि पृथगेकैकमुद्दिशन् ॥ ५ ॥
धनै रत्नैश्च गोभिश्च वस्त्रैश्च समतर्पयत् ।
उन्होंने प्रत्येकके उद्देश्यसे हजारों ब्राह्मणोंको अलग-अलग धन, रत्न, गौ और वस्त्र देकर संतुष्ट किया ॥ ५ १/२ ॥

ये चान्ये पृथिवीपाला येषां नास्ति सुहृज्जनः ॥ ६ ॥
उद्दिश्योद्दिश्य तेषां च चक्रे राजौर्ध्वदेहिकम् ।
इनके सिवा जो दूसरे भूपाल थे, जिनके सुहृद् या सम्बन्धी जीवित नहीं थे, उन सबके उद्देश्यसे राजा युधिष्ठिरने श्राद्ध-कर्म किया ॥ ६ १/२ ॥

सभाः प्रपाश्च विविधास्तटाकानि च पाण्डवः ॥ ७ ॥

सुहृदां कारयामास सर्वेषामौर्ध्वदेहिकम् ।
साथ ही उनके निमित्त पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने धर्मशालाएँ, प्याऊ-घर और पोखरे बनवाये। इस प्रकार उन्होंने सभी सुहृदोंके श्राद्ध-कर्म सम्पन्न कराये ॥ ७ १/३ ॥
स तेषामनृणो भूत्वा गत्वा लोकेष्ववाच्यताम् ॥ ८ ॥
कृतकृत्योऽभवद् राजा प्रजा धर्मेण पालयन् ।
उन सबके ऋणसे मुक्त हो वे लोकमें किसीकी निन्दा या आक्षेपके पात्र नहीं रह गये। राजा युधिष्ठिर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए कृतकृत्यताका अनुभव करने लगे ॥ ८ १/२ ॥

धृतराष्ट्रं यथापूर्वं गान्धारीं विदुरं तथा ॥ ९ ॥
सर्वांश्च कौरवान् मान्यान् भृत्यांश्च समपूजयत् ।
धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर तथा अन्य आदरणीय कौरवोंकी वे पहलेकी ही भाँति सेवा करते और भृत्यजनोंका भी आदर-सत्कार करते थे ॥ ९ १/२ ॥

याश्च तत्र स्त्रियः काश्चिद् हतवीरा हतात्मजाः ॥ १० ॥
सर्वास्ताः कौरवो राजा सम्पूज्यापालयद् घृणी ।
वहाँ जो कोई भी स्त्रियाँ थीं, जिनके पति और पुत्र मारे गये थे, उन सबका कृपालु कुरुवंशी राजा युधिष्ठिर बड़े आदरके साथ पालन-पोषण करते थे ॥

दीनान्धकृपणानां च गृहाच्छादनभोजनैः ॥ ११ ॥
आनृशंस्यपरो राजा चकारानुग्रहं प्रभुः ।
दीन-दुखियों और अन्धोंके लिये घर एवं भोजन-वस्त्रकी व्यवस्था करके सबके प्रति कोमलताका बर्ताव करनेवाले सामर्थ्यशाली राजा युधिष्ठिर उनपर बड़ी कृपा रखते थे ॥ ११ १/२ ॥

स विजित्य महीं कृत्स्नामानृण्यं प्राप्य वैरिषु ।
निःसपत्नः सुखी राजा विजहार युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥
इस सारी पृथ्वीको जीतकर शत्रुओंसे उऋण हो शत्रुहीन राजा युधिष्ठिर सुखपूर्वक विहार करने लगे ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि श्राद्धक्रियायां
द्विचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्राद्धकर्मविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४२ ॥


१. राज-काजके सम्बन्धमें गुप्त सलाह देना—'मन्त्रणा' है।

३. सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव तथा समाश्रय—ये छः राजाके नीतिसम्बन्धी गुण हैं।

अध्याय (पृष्ठ 282)

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

अभिषिक्तो महाप्राज्ञो राज्यं प्राप्य युधिष्ठिरः ।
दाशार्हं पुण्डरीकाक्षमुवाच प्राञ्जलिः शुचिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! राज्याभिषेकके पश्चात् राज्य पाकर परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने पवित्रभावसे हाथ जोड़कर कमलनयन दशार्हवंशी श्रीकृष्णसे कहा— ॥ १ ॥

तव कृष्ण प्रसादेन नयेन च बलेन च ।
बुद्ध्या च यदुशार्दूल तथा विक्रमणेन च ॥ २ ॥
पुनः प्राप्तमिदं राज्यं पितृपैतामहं मया ।
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष पुनः पुनररिंदम ॥ ३ ॥
'यदुसिंह श्रीकृष्ण! आपकी ही कृपा, नीति, बल, बुद्धि और पराक्रमसे मुझे पुनः अपने बाप-दादोंका यह राज्य प्राप्त हुआ है। शत्रुओंका दमन करनेवाले कमलनयन! आपको बारंबार नमस्कार है ॥ २-३ ॥

त्वामेकमाहुः पुरुषं त्वामाहुः सात्वतां पतिम् ।
नामभिस्त्वां बहुविधैः स्तुवन्ति प्रयता द्विजाः ॥ ४ ॥
'अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले द्विज एकमात्र आपको ही अन्तर्यामी पुरुष एवं उपासना करनेवाले भक्तोंका प्रतिपालक बताते हैं। साथ ही वे नाना प्रकारके नामोंद्वारा आपकी स्तुति करते हैं ॥ ४ ॥

विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।
विष्णो जिष्णो हरे कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥ ५ ॥
'यह सम्पूर्ण विश्व आपकी लीलामयी सृष्टि है। आप इस विश्वके आत्मा हैं। आपहीसे इस जगत्की उत्पत्ति हुई है। आप ही व्यापक होनेके कारण 'विष्णु', विजयी होनेसे 'जिष्णु', दुःख और पाप हर लेनेसे 'हरि', अपनी ओर आकृष्ट करनेके कारण 'कृष्ण', वैकुण्ठ धामके अधिपति होनेसे 'वैकुण्ठ' तथा क्षर-अक्षर पुरुषसे उत्तम होनेके कारण 'पुरुषोत्तम' कहलाते हैं। आपको नमस्कार है ॥ ५ ॥

अदित्याः सप्तधा त्वं तु पुराणो गर्भतां गतः ।
पृश्निगर्भस्त्वमेवैकस्त्रियुगं त्वां वदन्त्यपि ॥ ६ ॥
'आप पुराणपुरुष परमात्माने ही सात प्रकारसे अदितिके गर्भमें अवतार लिया है। आप ही पृश्निगर्भके नामसे प्रसिद्ध हैं। विद्वान्‌लोग तीनों युगोंमें प्रकट होनेके कारण आपको 'त्रियुग' कहते हैं ॥ ६ ॥

शुचिश्रवा हृषीकेशो घृतार्चिर्हंस उच्यते । त्रिचक्षुः शम्भुरेकस्त्वं विभुर्द्दामोदरोऽपि च ॥ ७ ॥ 'आपकी कीर्ति परम पवित्र है। आप सम्पूर्ण इन्द्रियोंके प्रेरक हैं। घृत ही जिसकी ज्वाला है—वह यज्ञपुरुष आप ही हैं। आप ही हंस (विशुद्ध परमात्मा) कहे जाते हैं। त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर और आप एक ही हैं। आप सर्वव्यापी होनेके साथ ही दामोदर (यशोदा मैयाके द्वारा बँध जानेवाले नटवरनागर) भी हैं ॥ ७ ॥

वराहोऽग्निर्बृहद्भानुर्वृषभस्तार्क्ष्यलक्षणः । अनीकसाहः पुरुषः शिपिविष्ट उरुक्रमः ॥ ८ ॥ 'वराह, अग्नि, बृहद्भानु (सूर्य), वृषभ (धर्म), गरुडध्वज, अनीकसाह (शत्रुसेनाका वेग सह सकनेवाले), पुरुष (अन्तर्यामी), शिपिविष्ट (सबके शरीरमें आत्मारूपसे प्रविष्ट) और उरुक्रम (वामन)—ये सभी आपके ही नाम और रूप हैं ॥ ८ ॥

वरिष्ठ उग्रसेनानीः सत्यो वाजसनिर्गुहः । अच्युतश्च्यावनोऽरीणां संस्कृतो विकृतिर्वृषः ॥ ९ ॥ 'सबसे श्रेष्ठ, भयंकर सेनापति, सत्यस्वरूप, अन्नदाता तथा स्वामी कार्तिकेय भी आप ही हैं। आप स्वयं कभी युद्धसे विचलित न होकर शत्रुओंको पीछे हटा देते हैं। संस्कार-सम्पन्न द्विज और संस्कारशून्य वर्णसंकर भी आपके ही स्वरूप हैं। आप कामनाओंकी वर्षा करनेवाले वृष (धर्म) हैं ॥ ९ ॥

कृष्णधर्मस्त्वमेवादिर्वृषदभों वृषाकपिः । सिन्धुर्विधर्मस्त्रिककुप् त्रिधामा त्रिदिवाच्युतः ॥ १० ॥ 'कृष्णधर्म (यज्ञस्वरूप) और सबके आदिकारण आप ही हैं। वृषदर्भ (इन्द्रके दर्पका दलन करनेवाले) और वृषाकपि (हरिहर) भी आप ही हैं। आप ही सिन्धु (समुद्र), विधर्म (निर्गुण परमात्मा), त्रिककुप् (ऊपर-नीचे और मध्य—ये तीन दिशाएँ), त्रिधामा (सूर्य, चन्द्र और अग्नि ये त्रिविध तेज) तथा वैकुण्ठधामसे नीचे अवतीर्ण होनेवाले भी हैं ॥ १० ॥

सम्राड् विराट् स्वराट् चैव सुरराजो भवोद्भवः । विभुर्भूरतिभूः कृष्णः कृष्णवर्त्मा त्वमेव च ॥ ११ ॥ 'आप सम्राट्, विराट्, स्वराट् और देवराज इन्द्र हैं। यह संसार आपहीसे प्रकट हुआ है। आप सर्वत्र व्यापक, नित्य सत्तारूप और निराकार परमात्मा हैं। आप ही कृष्ण (सबको अपनी ओर खींचनेवाले) और कृष्णवर्त्मा (अग्नि) हैं ॥ ११ ॥

स्विष्टकृद् भिषजावर्तः कपिलस्त्वं च वामनः । यज्ञो ध्रुवः पतङ्गश्च यज्ञसेनस्त्वमुच्यसे ॥ १२ ॥ 'आपहीको लोग अभीष्टसाधक, अश्विनीकुमारोंके पिता सूर्य, कपिल मुनि, वामन, यज्ञ, ध्रुव, गरुड़ तथा यज्ञसेन कहते हैं ॥ १२ ॥

शिखण्डी नहुषो बभ्रुर्दिवःस्पृक् त्वं पुनर्वसुः ।

सुबभ्रू रुक्मयज्ञश्च सुषेणो दुन्दुभिस्तथा ॥ १३ ॥
‘आप अपने मस्तकपर मोरका पंख धारण करते हैं। आप ही पूर्वकालमें राजा नहुष होकर प्रकट हुए थे। आप सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करनेवाले महेश्वर तथा एक ही पैरमें आकाशको नाप लेनेवाले विराट् हैं। आप ही पुनर्वसु नक्षत्रके रूपमें प्रकाशित हो रहे हैं। सुबभ्रु (अत्यन्त पिङ्गल वर्ण), रुक्मयज्ञ (सुवर्णकी दक्षिणासे भरपूर यज्ञ), सुषेण (सुन्दर सेनासे सम्पन्न) तथा दुन्दुभिस्वरूप हैं ।। १३ ।।
गभस्तिनेमिः श्रीपद्मः पुष्करः पुष्पधारणः ।
ऋभुर्विभुः सर्वसूक्ष्मश्चारित्रं चैव पठ्यसे ॥ १४ ॥
‘आप ही गभस्तिनेमि (कालचक्र), श्रीपद्म, पुष्कर, पुष्पधारी, ऋभु, विभु, सर्वथा सूक्ष्म और सदाचार स्वरूप कहलाते हैं ।। १४ ।।
अम्भोनिधिस्त्वं ब्रह्मा त्वं पवित्रं धाम धामवित् ।
हिरण्यगर्भं त्वामाहुः स्वधा स्वाहा च केशव ॥ १५ ॥
‘आप ही जलनिधि समुद्र, आप ही ब्रह्मा तथा आप ही पवित्र धाम एवं धामके ज्ञाता हैं। केशव! विद्वान् पुरुष आपको ही हिरण्यगर्भ, स्वधा और स्वाहा आदि नामोंसे पुकारते हैं ।। १५ ।।
योनित्वमस्य प्रलयश्च कृष्ण
त्वमेवेदं सृजसे विश्वमग्रे ।
विश्वं चेदं त्वद्वशे विश्वयोने
नमोऽस्तु ते शार्ङ्गचक्रासिपाणे ॥ १६ ॥
‘श्रीकृष्ण! आप ही इस जगत्के आदि कारण हैं और आप ही इसके प्रलयस्थान। कल्पके आरम्भमें आप ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। विश्वके कारण! यह सम्पूर्ण विश्व आपके ही अधीन है। हाथोंमें धनुष, चक्र और खड्ग धारण करनेवाले परमात्मन्! आपको नमस्कार है’ ।। १६ ।।
एवं स्तुतो धर्मराजेन कृष्णः
सभामध्ये प्रीतिमान् पुष्कराक्षः ।
तमभ्यनन्दद् भारतं पुष्कलाभि-
र्वाग्भिर्ज्येष्ठं पाण्डवं यादवाग्र्यः ॥ १७ ॥
इस प्रकार जब धर्मराज युधिष्ठिरने सभामें यदुकुल-शिरोमणि कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर भरतभूषण ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिरका उत्तम वचनोंद्वारा अभिनन्दन किया ।। १७ ।।
(एतन्नामशतं विष्णोर्धर्मराजेन कीर्तितम् ।
यः पठेच्छृणुयाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥)