भारतकोश
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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

और दुःखी दोनों प्रकारके मनुष्य उसपर क्रोध नहीं करते ॥ २५ ॥
प्रागेव तु धनादानमनुभाष्य ततः पुनः ।
संनिपत्य स्वविषये भयं राष्ट्रे प्रदर्शयेत् ॥ २६ ॥
राजा पहले ही धन लेनेकी आवश्यकता बताकर फिर अपने राज्यमें सर्वत्र दौरा करे और राष्ट्रपर आनेवाले भयकी ओर सबका ध्यान आकर्षित करे ॥ २६ ॥
इयमापत्समुत्पन्ना परचक्रभयं महत् ।
अपि चान्ताय कल्पन्ते वेणोरिव फलागमाः ॥ २७ ॥
अरयो मे समुत्थाय बहुभिर्दस्युभिः सह ।
इदमात्मवधायैव राष्ट्रमिच्छन्ति बाधितुम् ॥ २८ ॥
वह लोगोंसे कहे—'सज्जनो! अपने देशपर यह बहुत बड़ी आपत्ति आ पहुँची है। शत्रुदलके आक्रमणका महान् भय उपस्थित है। जैसे बाँसमें फलका लगना बाँसके विनाशका ही कारण होता है, उसी प्रकार मेरे शत्रु बहुत-से लुटेरोंको साथ लेकर अपने ही विनाशके लिये उठकर मेरे इस राष्ट्रको सताना चाहते हैं ॥
अस्यामापदि घोरायां सम्प्राप्ते दारुणे भये ।
परित्राणाय भवतः प्रार्थयिष्ये धनानि वः ॥ २९ ॥
'इस घोर आपत्ति और दारुण भयके समय मैं आप लोगोंकी रक्षाके लिये (ऋणके रूपमें) धन माँग रहा हूँ ॥ २९ ॥
प्रतिदास्ये च भवतां सर्वं चाहं भयक्षये ।
नारयः प्रतिदास्यन्ति यद्धरेयुर्बलादितः ॥ ३० ॥
'जब यह भय दूर हो जायगा, उस समय सारा धन मैं आपलोगोंको लौटा दूँगा। शत्रु आकर यहाँसे बलपूर्वक जो धन लूट ले जायँगे, उसे वे कभी वापस नहीं करेंगे ॥ ३० ॥
कलत्रमादितः कृत्वा सर्वं वो विनशेदिति ।
अपि चेत् पुत्रदारार्थमर्थसंचय इष्यते ॥ ३१ ॥
'शत्रुओंका आक्रमण होनेपर आपकी स्त्रियोंपर पहले संकट आयगा। उनके साथ ही आपका सारा धन नष्ट हो जायगा। स्त्री और पुत्रोंकी रक्षाके लिये ही धनसंग्रहकी आवश्यकता होती है ॥ ३१ ॥
नन्दामि वः प्रभावेण पुत्राणामिव चोदये ।
यथाशक्त्युपगृह्णामि राष्ट्रस्यापीडया च वः ॥ ३२ ॥
'जैसे पुत्रोंके अभ्युदयसे पिताको प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार मैं आपके प्रभावसे—आप लोगोंकी बढ़ती हुई समृद्धिशक्तिसे आनन्दित होता हूँ। इस समय राष्ट्रपर आये हुए संकटको टालनेके लिये मैं आप लोगोंसे आपकी शक्तिके अनुसार ही धन ग्रहण करूँगा, जिससे राष्ट्रवासियोंको किसी प्रकारका कष्ट न हो ॥ ३२ ॥
आपत्स्वेव च वोढव्यं भवद्भिः पुङ्गवैरिव ।

न च प्रियतरं कार्यं धनं कस्याञ्चिदापदि ॥ ३३ ॥
‘जैसे बलवान् बैल दुर्गम स्थानोंमें भी बोझ ढोकर पहुँचाते हैं, उसी प्रकार आप लोगोंको भी देशपर आयी हुई इस आपत्तिके समय कुछ भार उठाना ही चाहिये। किसी विपत्तिके समय धनको अधिक प्रिय मानकर छिपाये रखना आपके लिये उचित न होगा' ॥ ३३ ॥
इति वाचा मधुरया श्लक्ष्णया सोपचारया ।
स्वरश्मीनभ्यवसृजेद् योगमाधाय कालवित् ॥ ३४ ॥
समयकी गतिविधिको पहचाननेवाले राजाको चाहिये कि वह इसी प्रकार स्नेहयुक्त और अनुनयपूर्ण मधुर वचनोंद्वारा समझा-बुझाकर उपयुक्त उपायका आश्रय ले अपने पैदल सैनिकों या सेवकोंको प्रजाजनोंके घरपर धनसंग्रहके लिये भेजे ॥ ३४ ॥
प्राकारं भृत्यभरणं व्ययं संग्रामतो भयम् ।
योगक्षेमं च सम्प्रेक्ष्य गोमिनः कारयेत् करम् ॥ ३५ ॥
नगरकी रक्षाके लिये चहारदिवारी बनवानी है, सेवकों और सैनिकोंका भरण-पोषण करना है, अन्य आवश्यक व्यय करने हैं, युद्धके भयको टालना है तथा सबके योग-क्षेमकी चिन्ता करनी है, इन सब बातोंकी आवश्यकता दिखाकर राजा धनवान् वैश्योंसे कर वसूल करे ॥ ३५ ॥
उपेक्षिता हि नश्येयुर्गोमिनोऽरण्यवासिनः ।
तस्मात् तेषु विशेषेण मृदुपूर्वं समाचरेत् ॥ ३६ ॥
यदि राजा वैश्योंके हानि-लाभकी परवा न करके उन्हें करभारसे विशेष कष्ट पहुँचाता है तो वे राज्य छोड़कर भाग जाते और वनमें जाकर रहने लगते हैं; अतः उनके प्रति विशेष कोमलताका बर्ताव करना चाहिये ॥ ३६ ॥
सान्त्वनं रक्षणं दानमवस्था चाप्यभीक्ष्णशः ।
गोमिनां पार्थ कर्तव्यः संविभागः प्रियाणि च ॥ ३७ ॥
कुन्तीनन्दन! वैश्योंको सान्त्वना दे, उनकी रक्षा करे, उन्हें धनकी सहायता दे, उनकी स्थितिको सुदृढ़ रखनेका बारंबार प्रयत्न करे, उन्हें आवश्यक वस्तुएँ अर्पित करे और सदा उनके प्रिय कार्य करता रहे ॥ ३७ ॥
अजस्रमुपयोक्तव्यं फलं गोमिषु भारत ।
प्रभावयन्ति राष्ट्रं च व्यवहारं कृषिं तथा ॥ ३८ ॥
भारत! व्यापारियोंको उनके परिश्रमका फल सदा देते रहना चाहिये; क्योंकि वे ही राष्ट्रके वाणिज्य, व्यवसाय तथा खेतीकी उन्नति करते हैं ॥ ३८ ॥
तस्माद् गोमिषु यत्नेन प्रीतिं कुर्याद् विचक्षणः ।
दयावानप्रमत्तश्च करान् सम्प्रणयन् मृदून् ॥ ३९ ॥

अतः बुद्धिमान् राजा सदा उन वैश्योंपर यत्नपूर्वक प्रेमभाव बनाये रखे। सावधानी रखकर उनके साथ दयालुताका बर्ताव करे और उनपर हलके कर लगावे ।।
सर्वत्र क्षेमचरणं सुलभं नाम गोमिषु ।
न ह्यतः सदृशं किंचिद् वरमस्ति युधिष्ठिर ॥ ४० ॥
युधिष्ठिर! राजाको वैश्योंके लिये ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये, जिससे वे देशमें सब ओर कुशलपूर्वक विचरण कर सकें। राजाके लिये इससे बढ़कर हितकर काम दूसरा नहीं है ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राष्ट्रगुप्त्यादिकथने सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राष्ट्रकी रक्षा आदिका वर्णनविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 598)

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः

प्रजासे कर लेने तथा कोश-संग्रह करनेका प्रकार

युधिष्ठिर उवाच
यदा राजा समर्थोऽपि कोषार्थी स्यान्महामते ।
कथं प्रवर्तेत तदा तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**परम बुद्धिमान् पितामह! जब राजा पूर्णतः समर्थ हो—उसपर कोई संकट न आया हो, तो भी यदि वह अपना कोश बढ़ाना चाहे तो उसे किस तरहका उपाय काममें लाना चाहिये, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच
यथादेशं यथाकालं यथाबुद्धि यथाबलम् ।
अनुशिष्यात् प्रजा राजा धर्मार्थी तद्धिते रतः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! धर्मकी इच्छा रखनेवाले राजाको देश और कालकी परिस्थितिका ध्यान रखते हुए अपनी बुद्धि और बलके अनुसार प्रजाके हितसाधनमें संलग्न रहकर उसे अपने अनुशासनमें रखना चाहिये ॥ २ ॥

यथा तासां च मन्येत श्रेय आत्मन एव च ।
तथा कर्माणि सर्वाणि राजा राष्ट्रेषु वर्तयेत् ॥ ३ ॥
जिस प्रकारसे काम करनेपर प्रजाओंकी तथा अपनी भी भलाई समझमें आवे, वैसे ही समस्त कार्योंका राजा अपने राष्ट्रमें प्रचार करे ॥ ३ ॥

मधुदोहं दुहेद् राष्ट्रं भ्रमरा इव पादपम् ।
वत्सापेक्षी दुहेच्चैव स्तनांश्च न विकुट्टयेत् ॥ ४ ॥
जैसे भौंरा धीरे-धीरे फूल एवं वृक्षका रस लेता है, वृक्षको काटता नहीं है, जैसे मनुष्य बछड़ेको कष्ट न देकर धीरे-धीरे गायको दुहता है, उसके थनोंको कुचल नहीं डालता है, उसी प्रकार राजा कोमलताके साथ ही राष्ट्ररूपी गौका दोहन करे, उसे कुचले नहीं ॥ ४ ॥

जलौकावत् पिबेद् राष्ट्रं मृदुनैव नराधिपः ।
व्याघ्रीव च हरेत् पुत्रान् संदशेन्न च पीडयेत् ॥ ५ ॥
जैसे जोंक धीरे-धीरे शरीरका रक्त चूसती है, उसी प्रकार राजा भी कोमलताके साथ ही राष्ट्रसे कर वसूल करे। जैसे बाघिन अपने बच्चेको दाँतसे पकड़कर इधर-उधर ले जाती है; परंतु न तो उसे काटती है और न उसके शरीरमें पीड़ा ही पहुँचने देती है, उसी तरह राजा कोमल उपायोंसे ही राष्ट्रका दोहन करे ॥ ५ ॥

यथा शल्यकवानाखुः पदं धूनयते सदा ।

अतीक्ष्णेनाभ्युपायेन तथा राष्ट्रं समापिबेत् ।। ६ ।।
जैसे तीखे दाँतोंवाला चूहा सोये हुए मनुष्यके पैरके मांसको ऐसी कोमलतासे काटता है कि वह मनुष्य केवल पैरको कम्पित करता है, उसे पीड़ाका ज्ञान नहीं हो पाता। उसी प्रकार राजा कोमल उपायोंसे ही राष्ट्रसे कर ले, जिससे प्रजा दुखी न हो ।। ६ ।।
अल्पेनाल्पेन देयेन वर्धमानं प्रदापयेत् ।
ततो भूयस्ततो भूयः क्रमवृद्धिं समाचरेत् ।। ७ ।।
वह पहले थोड़ा-थोड़ा कर लेकर फिर धीरे-धीरे उसे बढ़ावे और उस बढ़े हुए करको वसूल करे। उसके बाद समयानुसार फिर उसमें थोड़ी-थोड़ी वृद्धि करते हुए क्रमशः बढ़ाता रहे (ताकि किसीको विशेष भार न जान पड़े) ।। ७ ।।
दमयन्निव दम्यानि शश्वद् भारं विवर्धयेत् ।
मृदुपूर्वं प्रयत्नेन पाशानभ्यवहारयेत् ।। ८ ।।
जैसे बछड़ोंको पहले-पहल बोझ ढोनेका अभ्यास करानेवाला पुरुष उन्हें प्रयत्नपूर्वक नाथता है और धीरे-धीरे उनपर अधिक भार लादता ही रहता है, उसी प्रकार प्रजापर भी करका भार पहले कम रखे; फिर उसे धीरे-धीरे बढ़ावे ।। ८ ।।
सकृत्पाशावकीर्णास्ते न भविष्यन्ति दुर्द्दमाः ।
उचितेनैव भोक्तव्यास्ते भविष्यन्ति यत्नतः ।। ९ ।।
यदि उनको एक साथ नाथकर उनपर भारी भार लादना चाहे तो उन्हें काबूमें लाना कठिन हो जायगा; अतः उचित ढंगसे प्रयत्नपूर्वक एक-एकको नाथकर उन्हें भार ढोनेके उपयोगमें लाना चाहिये। ऐसा करनेसे वे पूरा भार वहन करनेके योग्य हो जायेंगे ।। ९ ।।
तस्मात् सर्वसमारम्भो दुर्लभः पुरुषं प्रति ।
यथामुख्यान् सान्त्वयित्वा भोक्तव्य इतरो जनः ।। १० ।।
अतः राजाके लिये भी सभी पुरुषोंको एक साथ वशमें करनेका प्रयत्न दुष्कर है, इसलिये उसे चाहिये कि प्रधान-प्रधान मनुष्योंको मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना देकर वशमें कर ले; फिर अन्य साधारण मनुष्योंको यथेष्ट उपयोगमें लाता रहे ।। १० ।।
ततस्तान् भेदयित्वा तु परस्परविवक्षितान् ।
भुञ्जीत सान्त्वयंश्चैव यथासुखमयतन्तः ।। ११ ।।
तदनन्तर उन परस्पर विचार करनेवाले मनुष्योंमें भेद डलवाकर राजा सबको सान्त्वना प्रदान करता हुआ बिना किसी प्रयत्नके सुखपूर्वक सबका उपभोग करे ।। ११ ।।
न चास्थाने न चाकाले करांस्तेभ्यो निपातयेत् ।
आनुपूर्व्येण सान्त्वेन यथाकालं यथाविधि ।। १२ ।।
राजाको चाहिये कि परिस्थिति और समयके प्रतिकूल प्रजापर करका बोझ न डाले। समयके अनुसार प्रजाको समझा-बुझाकर उचित रीतिसे क्रमशः कर वसूल करे ।। १२ ।।
उपायान् प्रब्रवीम्येतान् न मे माया विवक्षिता ।

अनुपायेन दमयन् प्रकोपयति वाजिनः ।। १३ ।। राजन्! मैं ये उत्तम उपाय बतला रहा हूँ। मुझे छल-कपट या कूटनीतिकी बात बताना यहाँ अभीष्ट नहीं है। जो लोग उचित उपायका आश्रय न लेकर मनमाने तौरपर घोड़ोंका दमन करना चाहते हैं, वे उन्हें कुपित कर देते हैं (इसी तरह जो अयोग्य उपायसे प्रजाको दबाते हैं, वे उनके मनमें रोष उत्पन्न कर देते हैं) ।। १३ ।। पानागारनिवेशाश्च वेश्याः प्रापणिकास्तथा । कुशीलवाः सकितवा ये चान्ये केचिदीदृशाः ।। १४ ।। नियम्याः सर्व एवैते ये राष्ट्रस्योपघातकाः । एते राष्ट्रेऽभितिष्ठन्तो बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः ।। १५ ।। शराबखाना खोलनेवाले, वेश्याएँ, कुट्टनियाँ, वेश्याओंके दलाल, जुआरी तथा ऐसे ही बुरे पेशे करनेवाले और भी जितने लोग हों, वे समूचे राष्ट्रको हानि पहुँचानेवाले हैं; अतः इन सबको दण्ड देकर दबाये रखना चाहिये। यदि ये राज्यमें टिके रहते हैं तो कल्याणमार्गपर चलनेवाली प्रजाको बड़ी बाधाएँ पहुँचाते हैं ।। १४-१५ ।। न केनचिद् याचितव्यः कश्चित्किञ्चिदनापदि । इति व्यवस्था भूतानां पुरस्तान्मनुना कृता ।। १६ ।। मनुजीने बहुत पहलेसे समस्त प्राणियोंके लिये यह नियम बना दिया है कि आपत्तिकालको छोड़कर अन्य समयमें कोई किसीसे कुछ न माँगे ।। १६ ।। सर्वे तथानुजीवेयुर्न कुर्युः कर्म चेदिह । सर्व एव इमे लोका न भवेयुरसंशयम् ।। १७ ।। यदि ऐसी व्यवस्था न होती तो सब लोग भीख माँगकर ही गुजारा करते, कोई भी यहाँ कर्म नहीं करता। ऐसी दशामें ये सम्पूर्ण जगत्के लोग निःसंदेह नष्ट हो जाते ।। १७ ।। प्रभुर्नियमने राजा य एतान् न नियच्छति । भुङ्क्ते स तस्य पापस्य चतुर्भागमिति श्रुतिः ।। १८ ।। जो राजा इन सबको नियमके अंदर रखनेमें समर्थ होकर भी इन्हें काबूमें नहीं रखता, वह इनके किये हुए पापका चौथाई भाग स्वयं भोगता है, ऐसा श्रुतिका कथन है ।। १८ ।। भोक्ता तस्य तु पापस्य सुकृतस्य यथा तथा । नियन्तव्याः सदा राज्ञा पापा ये स्युर्नराधिप ।। १९ ।। नरेश्वर! राजा जैसे प्रजाके पापका चतुर्थांश भोगता है उसी प्रकार पुण्यका भी चतुर्थांश उसे प्राप्त होता है; अतः राजाको चाहिये कि वह सदा पापियोंको दण्ड देकर उन्हें दबाये रखे ।। १९ ।। कृतपापस्त्वसौ राजा य एतान् न नियच्छति । तथा कृतस्य धर्मस्य चतुर्भागमुपाश्नुते ।। २० ।।

जो राजा इन पापियोंको नियन्त्रणमें नहीं रखता, वह स्वयं भी पापाचारी माना जाता है तथा जो पापियोंका दमन करता है, वह प्रजाके किये हुए धर्मका चौथाई भाग स्वयं प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥ स्थानान्येतानि संयम्य प्रसंगो भूतिनाशनः । कामे प्रसक्तः पुरुषः किमकार्यं विवर्जयेत् ॥ २१ ॥ ऊपर जो मदिरालय तथा वेश्यालय आदि स्थान बताये गये हैं, उनपर रोक लगा देनी चाहिये; क्योंकि इससे कामविषयक आसक्ति बढ़ती है। जो धन-वैभव तथा कल्याणका नाश करनेवाली है। काममें आसक्त हुआ पुरुष कौन-सा ऐसा न करनेयोग्य काम है, जिसे छोड़ दे? ॥ २१ ॥ मद्यमांसपरस्वानि तथा दारा धनानि च । आहरेद् रागवशगस्तथा शास्त्रं प्रदर्शयेत् ॥ २२ ॥ आसक्तिके वशीभूत हुआ मानव मांस खाता, मदिरा पीता और परधन तथा परस्त्रीका अपहरण करता है। साथ ही दूसरोंको भी यही सब करनेका उपदेश देता है ॥ २२ ॥ आपद्येव तु याचन्ते येषां नास्ति परिग्रहः । दातव्यं धर्मतस्तेभ्यस्त्वनुक्रोशाद् भयान्न तु ॥ २३ ॥ जिन लोगोंके पास कुछ भी संग्रह नहीं है, वे यदि आपत्तिके समय ही याचना करें तो उन्हें धर्म समझकर और दया करके ही देना चाहिये, किसी भय या दबावमें पड़कर नहीं ॥ २३ ॥ मा ते राष्ट्रे याचनका भूवन्मा चापि दस्यवः । एषां दातार एवैते नैते भूतस्य भावकाः ॥ २४ ॥ तुम्हारे राज्यमें भिखमंगे और लुटेरे न हों; क्योंकि ये प्रजाके धनको केवल छीननेवाले हैं, उनके ऐश्वर्यको बढ़ानेवाले नहीं हैं ॥ २४ ॥ ये भूतान्यनुगृह्णन्ति वर्धयन्ति च ये प्रजाः । ते ते राष्ट्रेषु वर्तन्तां मा भूतानामभावकाः ॥ २५ ॥ जो सब प्राणियोंपर दया करते और प्रजाकी उन्नतिमें योग देते हैं, वे तुम्हारे राष्ट्रमें निवास करें। जो लोग प्राणियोंका विनाश करनेवाले हैं, वे न रहें ॥ दण्ड्यास्ते च महाराज धनादानप्रयोजकाः । प्रयोगं कारयेयुस्तान् यथाबलिकरांस्तथा ॥ २६ ॥ महाराज! जो राजकर्मचारी उचितसे अधिक कर वसूल करते या कराते हों, वे तुम्हारे हाथसे दण्ड पानेके योग्य हैं। दूसरे अधिकारी आकर उन्हें ठीक-ठीक भेंट या कर लेनेका अभ्यास करावें ॥ २६ ॥ कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं यच्चान्यत् किंचिदीदृशम् । पुरुषैः कारयेत् कर्म बहुभिः कर्मभेदतः ॥ २७ ॥

खेती, गोरक्षा, वाणिज्य तथा इस तरहके अन्य व्यवसायोंको जो जिस कर्मको करनेमें कुशल हो, तदनुसार अधिक आदमियोंके द्वारा सम्पन्न कराना चाहिये ॥ २७ ॥ नरश्चेत्कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं चाप्यनुष्ठितः । संशयं लभते किंचित् तेन राजा विगर्ह्यते ॥ २८ ॥ मनुष्य यदि कृषि, गोरक्षा और वाणिज्य आरम्भ कर दे तथा चारों ओर लुटेरोंके आक्रमणसे कुछ-कुछ प्राण-संशयकी-सी स्थितिमें पहुँच जाय तो इससे राजाकी बड़ी निन्दा होती है ॥ २८ ॥ धनिनः पूजयेन्नित्यं पानाच्छादनभोजनैः । वक्तव्याश्चानुगृह्णीध्वं प्रजाः सह मयेति वै ॥ २९ ॥ राजाको चाहिये कि वह देशके धनी व्यक्तियोंका सदा भोजन-वस्त्र और अन्नपान आदिके द्वारा आदर-सत्कार करे और उनसे विनयपूर्वक कहे, ‘आपलोग मेरे सहित मेरी इन प्रजाओंपर कृपादृष्टि रखें’ ॥ २९ ॥ अङ्गमेतन्महद् राज्ये धनिनो नाम भारत । ककुदं सर्वभूतानां धनस्थो नात्र संशयः ॥ ३० ॥ भरतनन्दन! धनीलोग राष्ट्रके मुख्य अंग हैं। धनवान् पुरुष समस्त प्राणियोंमें प्रधान होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३० ॥ प्राज्ञः शूरो धनस्थश्च स्वामी धार्मिक एव च । तपस्वी सत्यवादी च बुद्धिमांश्चापि रक्षति ॥ ३१ ॥ विद्वान्, शूरवीर, धनी, धर्मनिष्ठ, स्वामी, तपस्वी, सत्यवादी तथा बुद्धिमान् मनुष्य ही प्रजाकी रक्षा करते हैं ॥ तस्मात् सर्वेषु भूतेषु प्रीतिमान् भव पार्थिव । सत्यमार्जवमक्रोधमानृशंस्यं च पालय ॥ ३२ ॥ अतः भूपाल! तुम समस्त प्राणियोंसे प्रेम रखो तथा सत्य, सरलता, क्रोधहीनता और दयालुता आदि सद्धर्मोंका पालन करो ॥ ३२ ॥ एवं दण्डं च कोशं च मित्रं भूमिं च लप्स्यसि । सत्यार्जवपरो राजन् मित्रकोशबलान्वितः ॥ ३३ ॥ नरेश्वर! ऐसा करनेसे तुम्हें दण्डधारणकी शक्ति, खजाना, मित्र तथा राज्यकी भी प्राप्ति होगी। तुम सत्य और सरलतामें तत्पर रहकर मित्र, कोश और बलसे सम्पन्न हो जाओगे ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कोशसंचयप्रकारकथने अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें कोशसंग्रहके प्रकारका वर्णनविषयक अट्ठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥

राजाके कर्तव्यका वर्णन

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एकोननवतितमोऽध्यायः

राजाके कर्तव्यका वर्णन

भीष्म उवाच

वनस्पतीन् भक्ष्यफलान् न च्छिन्द्युर्विषये तव ।
ब्राह्मणानां मूलफलं धर्म्यमाहुर्मनीषिणः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! जिन वृक्षोंके फल खानेके काम आते हैं, उनको तुम्हारे राज्यमें कोई काटने न पावे, इसका ध्यान रखना चाहिये। मनीषी पुरुष मूल और फलको धर्मतः ब्राह्मणोंका धन बताते हैं। इसलिये भी उनको काटना ठीक नहीं है ॥ १ ॥

ब्राह्मणेभ्योऽतिरिक्तं च भुञ्जीरन्नितरे जनाः ।
न ब्राह्मणापराधेन हरेदन्यः कथंचन ॥ २ ॥
ब्राह्मणोंसे जो बच जाये, उसीको दूसरे लोग अपने उपभोगमें लावें। ब्राह्मणका अपराध करके अर्थात् उसे भोग वस्तु न देकर दूसरा कोई किसी प्रकार भी उसका अपहरण न करे ॥ २ ॥

विप्रश्चेत् त्यागमातिष्ठेदात्मार्थे वृत्तिकर्शितः ।
परिकल्प्यास्य वृत्तिः स्यात् सदारस्य नराधिप ॥ ३ ॥
राजन्! यदि ब्राह्मण अपने लिये जीविकाका प्रबन्ध न होनेसे दुर्बल हो जाय और उस राज्यको छोड़कर अन्यत्र जाने लगे तो राजाका कर्तव्य है कि परिवारसहित उस ब्राह्मणके लिये जीविकाकी व्यवस्था करे ॥ ३ ॥

स चेन्नोपनिवर्तेत वाच्यो ब्राह्मणसंसदि ।
कस्मिन्निदानीं मर्यादामयं लोकः करिष्यति ॥ ४ ॥
इतनेपर भी यदि वह ब्राह्मण न लौटे तो ब्राह्मणोंके समाजमें जाकर राजा उससे यों कहे—‘ब्रह्मन्! यदि आप यहाँसे चले जायँगे तो ये प्रजावर्गके लोग किसके आश्रयमें रहकर धर्ममर्यादाका पालन करेंगे?’ ॥ ४ ॥

असंशयं निवर्तेत न चेद् वक्ष्यत्यतः परम् ।
पूर्वं परोक्षं कर्तव्यमेतत् कौन्तेय शाश्वतम् ॥ ५ ॥
इतना सुनकर वह निश्चय ही लौट आयेगा। यदि इतनेपर भी वह कुछ न बोले तो राजाको इस प्रकार कहना चाहिये—‘भगवन्! मेरे द्वारा जो पहले अपराध बन गये हों, उन्हें आप भूल जायँ, कुन्तीनन्दन! इस प्रकार विनयपूर्वक ब्राह्मणको प्रसन्न करना राजाका सनातन कर्तव्य है ॥ ५ ॥

आहरेतज्जना नित्यं न चैतच्छ्रद्दधाम्यहम् ।
निमन्त्र्यश्च भवेद् भोगैर्वृत्त्या च तदाचरेत् ॥ ६ ॥

लोग कहते हैं कि ब्राह्मणको भोग-सामग्रीका अभाव हो तो उसे भोग अर्पित करनेके लिये निमन्त्रित करे और यदि उसके पास जीविकाका अभाव हो तो उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करे, परंतु मैं इस बातपर विश्वास नहीं करता; (क्योंकि ब्राह्मणमें भोगेच्छाका होना सम्भव नहीं है) ।। ६ ।।

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं लोकानामिह जीवनम् ।
ऊर्ध्वं चैव त्रयी विद्या सा भूतान् भावयत्युत ।। ७ ।।
खेती, पशुपालन और वाणिज्य—ये तो इसी लोकमें लोगोंकी जीविकाके साधन हैं; परंतु तीनों वेद ऊपरके लोकोंमें भी रक्षा करते हैं। वे ही यज्ञोंद्वारा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धिमें हेतु हैं ।। ७ ।।

तस्यां प्रवर्त्तमानायां ये स्युस्तत्परिपन्थिनः ।
दस्यवस्तद्वधायेह ब्रह्मा क्षत्रमथासृजत् ।। ८ ।।
जो लोग उस वेदविद्याके अध्ययनाध्यापनमें अथवा वेदोक्त यज्ञ-यागादि कर्मोंमें बाधा पहुँचाते हैं, वे डकैत हैं। उन डाकुओंका वध करनेके लिये ही ब्रह्माजीने क्षत्रिय जातिकी सृष्टि की है ।। ८ ।।

शत्रून् जय प्रजा रक्ष यजस्व क्रतुभिर्नृप ।
युध्यस्व समरे वीरो भूत्वा कौरवनन्दन ।। ९ ।।
नरेश्वर! कौरवनन्दन! तुम शत्रुओंको जीतो, प्रजाकी रक्षा करो, नाना प्रकारके यज्ञ करते रहो और समरभूमिमें वीरतापूर्वक लड़ो ।। ९ ।।

संरक्ष्यान् पालयेद् राजा स राजा राजसत्तमः ।
ये केचित् तान् न रक्षन्ति तैरर्थो नास्ति कश्चन ।। १० ।।
जो रक्षा करनेके योग्य पुरुषोंकी रक्षा करता है, वही राजा समस्त राजाओंमें शिरोमणि है। जो रक्षाके पात्र मनुष्योंकी रक्षा नहीं करते, उन राजाओंकी जगत्को कोई आवश्यकता नहीं है ।। १० ।।

सदैव राज्ञा योद्धव्यं सर्वलोकाद् युधिष्ठिर ।
तस्माद्धेतोर्हि युञ्जीत मनुष्यानेव मानवः ।। ११ ।।
युधिष्ठिर! राजाको सब लोगोंकी भलाईके लिये सदा ही युद्ध करना अथवा उसके लिये उद्यत रहना चाहिये। अतः वह मानवशिरोमणि नरेश शत्रुओंकी गतिविधिका जाननेके लिये मनुष्योंको ही गुप्तचर नियत कर दे ।। ११ ।।

आन्तरेभ्यः परान् रक्षन् परेभ्यः पुनरान्तरान् ।
परान् परेभ्यः स्वान् स्वेभ्यः सर्वान् पालय नित्यदा ।। १२ ।।
युधिष्ठिर! जो लोग अपने अन्तरंग हों, उनसे बाहरी लोगोंकी रक्षा करो और बाहरी लोगोंसे सदा अन्तरंग व्यक्तियोंको बचाओ। इसी प्रकार बाहरी व्यक्तियोंकी बाहरके लोगोंसे और समस्त आत्मीयजनोंकी आत्मीयोंसे सदा रक्षा करते रहो ।। १२ ।।

आत्मानं सर्वतो रक्षन् राजन् रक्षस्व मेदिनीम् । आत्ममूलमिदं सर्वमाहुर्वै विदुषो जनाः ॥ १३ ॥ राजन्! तुम सब ओरसे अपनी रक्षा करते हुए ही इस सारी पृथिवीकी रक्षा करो; क्योंकि विद्वान् पुरुषोंका कहना है कि इन सबका मूल अपना सुरक्षित शरीर ही है ॥ १३ ॥ किं छिद्रं को नु सङ्गो मे किं वास्त्यविनिपातितम् । कुतो मामाश्रयेद् दोष इति नित्यं विचिन्तयेत् ॥ १४ ॥ मुझमें कौन-सी दुर्बलता है, किस तरहकी आसक्ति है और कौन-सी ऐसी बुराई है, जो अबतक दूर नहीं हुई है और किस कारणसे मुझपर दोष आता है? इन सब बातोंका राजाको सदा विचार करते रहना चाहिये ॥ १४ ॥ अतीतदिवसे वृत्तं प्रशंसन्ति न वा पुनः । गुप्तैश्चारैरनुमतैः पृथिवीमनुसारयेत् ॥ १५ ॥ कलतक मेरा जैसा बर्ताव रहा है, उसकी लोग प्रशंसा करते हैं या नहीं? इस बातका पता लगानेके लिये अपने विश्वासपात्र गुप्तचरोंको पृथिवीपर सब ओर घुमाते रहना चाहिये ॥ १५ ॥ जानीयुर्यदि ते वृत्तं प्रशंसन्ति न वा पुनः । कच्चिद् रोचेज्जनपदे कच्चिद् राष्ट्रे च मे यशः ॥ १६ ॥ उनके द्वारा यह भी पता लगाना चाहिये कि यदि अबसे लोग मेरे बर्तावको जान लें तो उसकी प्रशंसा करेंगे या नहीं। क्या बाहरके गाँवोंमें और समूचे राष्ट्रमें मेरा यश लोगोंको अच्छा लगता है? ॥ १६ ॥ धर्मज्ञानां धृतिम तां संग्रामेष्वपलायिनाम् । राष्ट्रे तु येऽनुजीवन्ति ये तु राज्ञोऽनुजीविनः ॥ १७ ॥ अमात्यानां च सर्वेषां मध्यस्थानां च सर्वशः । ये च त्वाभिप्रशंसेयुर्निन्देयुरथवा पुनः ॥ १८ ॥ सर्वान् सुपरिणीतांस्तान् कारयेथा युधिष्ठिर । युधिष्ठिर! जो धर्मज्ञ, धैर्यवान् और संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले शूरवीर हैं, जो राज्यमें रहकर जीविका चलाते हैं अथवा राजाके आश्रित रहकर जीते हैं तथा जो मन्त्रिगण और तटस्थवर्गके लोग हैं, वे सब तुम्हारी प्रशंसा करें या निन्दा, तुम्हें सबका सत्कार ही करना चाहिये ॥ १७-१८ १/२ ॥ एकान्तेन हि सर्वेषां न शक्यं तात रोचितुम् । मित्रामित्रमथो मध्यं सर्वभूतेषु भारत ॥ १९ ॥ तात! किसीका कोई भी काम सबको सर्वथा अच्छा ही लगे, ऐसा सम्भव नहीं है, भरतनन्दन! सभी प्राणियोंके शत्रु, मित्र और मध्यस्थ होते हैं ॥ १९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

तुल्यबाहुबलानां च तुल्यानां च गुणैरपि। कथं स्यादधिकः कश्चित् स च भुञ्जीत मानवान्॥ २०॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो बाहुबलमें एक समान हैं और गुणोंमें भी एक समान हैं, उनमेंसे कोई एक मनुष्य सबसे अधिक कैसे हो जाता है, जो अन्य सब मनुष्योंपर शासन करने लगता है?॥ २०॥

भीष्म उवाच

यच्चरा ह्यचरानद्युर्दंष्ट्रान् दंष्ट्रिणस्तथा। आशीविषा इव क्रुद्धा भुजङ्गान् भुजगा इव॥ २१॥ **भीष्मजीने कहा—**राजन्! जैसे क्रोधमें भरे हुए बड़े-बड़े विषधर सर्प दूसरे छोटे सर्पोंको खा जाते हैं, जिस प्रकार पैरोंसे चलनेवाले प्राणी न चलनेवाले प्राणियोंको अपने उपभोगमें लाते हैं और दाढ़वाले जन्तु बिना दाढ़वाले जीवोंको अपना आहार बना लेते हैं (उसी प्राकृतिक नियमके अनुसार बहुसंख्यक दुर्बल मनुष्योंपर एक सबल मनुष्य शासन करने लगता है)॥ २१॥

एतेभ्यश्चाप्रमत्तः स्यात् सदा शत्रोर्युधिष्ठिर। भारुण्डसदृशा ह्येते निपतन्ति प्रमादतः॥ २२॥ युधिष्ठिर! इन सभी हिंसक जन्तुओं तथा शत्रु की ओरसे राजाको सदा सावधान रहना चाहिये; क्योंकि असावधान होनेपर ये गिद्ध पक्षियोंके समान सहसा टूट पड़ते हैं॥ २२॥

कच्चित् ते वणिजो राष्ट्रे नोद्विजन्ति करार्दिताः। क्रीणन्तो बहुनाल्पेन कान्तारकृतविश्रमाः॥ २३॥ ऊँचे या नीचे भावसे माल खरीदनेवाले और व्यापारके लिये दुर्गम प्रदेशोंमें विचरनेवाले वैश्य तुम्हारे राज्यमें करके भारी भारसे पीड़ित हो उद्विग्न तो नहीं होते हैं?॥ २३॥

कच्चित् कृषिकरा राष्ट्रं न जहत्यतिपीडिताः। ये वहन्ति धुरं राज्ञां ते भरन्तीतरानपि॥ २४॥ किसानलोग अधिक लगान लिये जानेके कारण अत्यन्त कष्ट पाकर तुम्हारा राज्य छोड़कर तो नहीं जा रहे हैं। क्योंकि किसान ही राजाओंका भार ढोते हैं और वे ही दूसरे लोगोंका भी भरण-पोषण करते हैं॥ २४॥

इतो दत्तेन जीवन्ति देवाः पितृगणास्तथा। मानुषोरगरक्षांसि वयांसि पशवस्तथा॥ २५॥ इन्हींके दिये हुए अन्नसे देवता, पितर, मनुष्य, सर्प, राक्षस और पशु-पक्षी—सबकी जीविका चलती है॥ २५॥

एषा ते राष्ट्रवृत्तिश्च राज्ञां गुप्तिश्च भारत।

एतमेवार्थमाश्रित्य भूयो वक्ष्यामि पाण्डव ॥ २६ ॥ भरतनन्दन! यह मैंने राजाके राष्ट्रके साथ किये जानेवाले बर्तावका वर्णन किया। इसीसे राजाओंकी रक्षा होती है। पाण्डुकुमार! इसी विषयको लेकर मैं आगेकी भी बात कहूँगा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राष्ट्रगुप्तौ एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राष्ट्रकी रक्षाविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥

उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता

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नवतितमोऽध्यायः

उतथ्यका मान्धाताको उपदेश—राजाके लिये धर्मपालनकी आवश्यकता

भीष्म उवाच

यानङ्गिराः क्षत्रधर्मानुत्तथ्यो ब्रह्मवित्तमः ।
मान्धात्रे यौवनाश्वाय प्रीतिमानभ्यभाषत ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ अंगिरापुत्र उतथ्यने युवनाश्वके पुत्र मान्धातासे प्रसन्नतापूर्वक जिन क्षत्रिय-धर्मोंका वर्णन किया था, उन्हें सुनो ॥ १ ॥

स यथानुशशासैनमुत्तथ्यो ब्रह्मवित्तमः ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि निखिलेन युधिष्ठिर ॥ २ ॥
युधिष्ठिर! ब्रह्मज्ञानियोंमें शिरोमणि उतथ्यने जिस प्रकार उन्हें उपदेश दिया था, वह सब प्रसंग पूरा-पूरा तुम्हें बता रहा हूँ, श्रवण करो ॥ २ ॥

उतथ्य उवाच

धर्माय राजा भवति न कामकरणाय तु ।
मान्धातरिति जानीहि राजा लोकस्य रक्षिता ॥ ३ ॥
**उतथ्य बोले—**मान्धाता! राजा धर्मका पालन और प्रचार करनेके लिये ही होता है, विषय-सुखोंका उपभोग करनेके लिये नहीं। तुम्हें यह जानना चाहिये कि राजा सम्पूर्ण जगत्का रक्षक है ॥ ३ ॥

राजा चरति चेद् धर्मं देवत्वायैव कल्पते ।
स चेदधर्मं चरति नरकायैव गच्छति ॥ ४ ॥
यदि राजा धर्माचरण करता है तो देवता बन जाता है, और यदि वह अधर्माचरण करता है तो नरकमें ही गिरता है ॥ ४ ॥

धर्मे तिष्ठन्ति भूतानि धर्मो राजनि तिष्ठति ।
तं राजा साधु यः शास्ति स राजा पृथिवीपतिः ॥ ५ ॥
सम्पूर्ण प्राणी धर्मके ही आधारपर स्थित हैं और धर्म राजाके ऊपर प्रतिष्ठित है। जो राजा अच्छी तरह धर्मका पालन और उसके अनुकूल शासन करता है वही दीर्घकालतक इस पृथ्वीका स्वामी बना रहता है ॥

राजा परमधर्मात्मा लक्ष्मीवान् धर्म उच्यते ।
देवाश्च गर्हा गच्छन्ति धर्मो नास्तीति चोच्यते ॥ ६ ॥

परम धर्मात्मा और श्रीसम्पन्न राजा धर्मका साक्षात् स्वरूप कहलाता है। यदि वह धर्मका पालन नहीं करता तो लोग देवताओंकी भी निन्दा करते हैं और वह धर्मात्मा नहीं, पापात्मा कहलाता है ॥ ६ ॥

स्वधर्मे वर्तमानानामर्थसिद्धिः प्रदृश्यते । तदेव मङ्गलं लोकः सर्वः समनुवर्तते ॥ ७ ॥ जो अपने धर्मके पालनमें तत्पर रहते हैं, उन्हींसे अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि होती देखी जाती है। सारा संसार उसी मंगलमय धर्मका अनुसरण करता है ॥ ७ ॥

उच्छिद्यते धर्मवृत्तमधर्मो वर्तते महान् । भयमाहुर्दिवारात्रं यदा पापो न वार्यते ॥ ८ ॥ जब पापको रोका नहीं जाता, तब जगत्में धार्मिक बर्तावका उच्छेद हो जाता है और सब ओर महान् अधर्म फैल जाता है, जिससे प्रजाको दिन-रात भय बना रहता है ॥ ८ ॥

ममेदमिति नैवैतत् साधूनां तात धर्मतः । न वै व्यवस्था भवति यदा पापो न वार्यते ॥ ९ ॥ तात! यदि पापकी प्रवृत्तिका निवारण न किया जाय तो यह मेरी वस्तु है, ऐसा कहना श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये असम्भव हो जाता है और उस समय कोई भी धार्मिक व्यवस्था टिकने नहीं पाती है ॥ ९ ॥

नैव भार्या न पशवो न क्षेत्रं न निवेशनम् । संदृश्येत मनुष्याणां यदा पापबलं भवेत् ॥ १० ॥ जब जगत्में पापका बल बढ़ जाता है, तब मनुष्योंके लिये अपनी स्त्री, अपने पशु और अपने खेत या घरका भी कुछ ठिकाना दिखायी नहीं देता ॥ १० ॥

देवाः पूजां न जानन्ति न स्वधां पितरस्तदा । न पूज्यन्ते ह्यतिथयो यदा पापो न वार्यते ॥ ११ ॥ जब पापको रोका नहीं जाता, तब देवता पूजाको नहीं जानते हैं, पितरोंको स्वधा (श्राद्ध) का अनुभव नहीं होता है तथा अतिथियोंकी कहीं पूजा नहीं होती है ॥ ११ ॥

न वेदानधिगच्छन्ति व्रतवन्तो द्विजातयः । न यज्ञांस्तन्वते विप्रा यदा पापो न वार्यते ॥ १२ ॥ जब पापका निवारण नहीं किया जाता है, तब ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले द्विज वेदोंका अध्ययन छोड़ देते हैं और ब्राह्मण यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं कर पाते हैं ॥ १२ ॥

वृद्धानामिव सत्त्वानां मनो भवति विह्वलम् । मनुष्याणां महाराज यदा पापो न वार्यते ॥ १३ ॥ महाराज! जब पापका निवारण नहीं किया जाता है, तब बूढ़े जन्तुओंकी भाँति मनुष्योंका मन घबराहटमें पड़ा रहता है ॥ १३ ॥

उभौ लोकावभिप्रेक्ष्य राजानमृषयः स्वयम् ।

असृजन् सुमहद् भूतमयं धर्मो भविष्यति ॥ १४ ॥
लोक और परलोक दोनोंको दृष्टिमें रखकर महर्षियोंने स्वयं ही राजा नामक एक महान् शक्तिशाली मनुष्यकी सृष्टि की। उन्होंने सोचा था कि 'यह साक्षात् धर्मस्वरूप होगा' ॥ १४ ॥

यस्मिन् धर्मो विराजेत तं राजानं प्रचक्षते ।
यस्मिन् विलीयते धर्मस्तं देवा वृषलं विदुः ॥ १५ ॥
अतः जिसमें धर्म विराज रहा हो, उसीको राजा कहते हैं और जिसमें धर्म (वृष) का लय हो गया हो, उसे देवतालोग 'वृषल' मानते हैं ॥ १५ ॥

वृषो हि भगवान् धर्मो यस्तस्य कुरुते ह्यलम् ।
वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं विवर्धयेत् ॥ १६ ॥
वृष नाम है भगवान् धर्मका। जो धर्मके विषयमें 'अलम्' (बस) कह देता है, उसे देवता 'वृषल' समझते हैं; अतः धर्मकी सदा ही वृद्धि करनी चाहिये ॥ १६ ॥

धर्मे वर्धति वर्धन्ति सर्वभूतानि सर्वदा ।
तस्मिन् ह्रसति ह्रीयन्ते तस्माद् धर्मं न लोपयेत् ॥ १७ ॥
धर्मकी वृद्धि होनेपर सदा समस्त प्राणियोंका अभ्युदय होता है और उसका ह्रास होनेपर सबका ह्रास हो जाता है; अतः धर्मका कभी लोप नहीं होने देना चाहिये ॥ १७ ॥

धनात् स्रवति धर्मो हि धारणाद् वेति निश्चयः ।
अकार्याणां मनुष्येन्द्र स सीमान्तकरः स्मृतः ॥ १८ ॥
नरेन्द्र! धनसे धर्मकी उत्पत्ति होती है। सबको धारण करनेके कारण वह निश्चितरूपसे धर्म कहा गया है। वह धर्म अकर्तव्य (पाप) की सीमाका अन्त करनेवाला माना गया है ॥ १८ ॥

प्रभवार्थं हि भूतानां धर्मः सृष्टः स्वयम्भुवा ।
तस्मात् प्रवर्तयेद् धर्मं प्रजानुग्रहकारणात् ॥ १९ ॥
ब्रह्माजीने प्राणियोंके कल्याणार्थ ही धर्मकी सृष्टि की है, इसलिये राजाको चाहिये कि अपने देशमें प्रजा-जनोंपर अनुग्रह करनेके लिये धर्मका प्रचार करे ॥ १९ ॥

तस्माद्धि राजशार्दूल धर्मः श्रेष्ठतरः स्मृतः ।
स राजा यः प्रजाः शास्ति साधुकृत् पुरुषर्षभ ॥ २० ॥
राजसिंह! इसी कारणसे धर्मको सबसे श्रेष्ठ माना गया है। पुरुषप्रवर! जो सद्धर्मके पालनपूर्वक प्रजाका शासन करता है, वही राजा है ॥ २० ॥

कामक्रोधावनादृत्य धर्ममेवानुपालय ।
धर्मः श्रेयस्करतमो राज्ञां भरतसत्तम ॥ २१ ॥
भरतभूषण! तुम भी काम और क्रोधकी अवहेलना करके निरन्तर धर्मका ही पालन करो। धर्म ही राजाओंके लिये सबसे बढ़कर कल्याण करनेवाला है ॥ २१ ॥

धर्मस्य ब्राह्मणो योनिस्तस्मात् तान् पूजयेत् सदा ।
ब्राह्मणानां च मान्धातः कुर्यात् कामानमत्सरी ॥ २२ ॥
मान्धाता! धर्मका मूल है ब्राह्मण; इसलिये ब्राह्मणोंका सदा सम्मान करना चाहिये, ब्राह्मणोंकी प्रत्येक कामनाको ईर्ष्यारहित होकर पूर्ण करना उचित है ॥ २२ ॥
तेषां ह्यकामकरणाद् राज्ञः संजायते भयम् ।
मित्राणि न च वर्धन्ते तथामित्रीभवन्त्यपि ॥ २३ ॥
उनकी इच्छा पूर्ण न करनेसे राजाओंके ऊपर भय आता है। राजाके मित्रोंकी वृद्धि नहीं होती, उलटे शत्रु बनते जाते हैं ॥ २३ ॥
ब्राह्मणानां सदासूयाद् बाल्याद् वैरोचनो बलिः ।
अथास्माच्छ्रीरपाक्रामद् याऽस्मिन्नासीत् प्रतापिनी ॥ २४ ॥
विरोचनकुमार बलि बाल्यकालसे ही सदा ब्राह्मणोंपर दोषारोपण करते थे; इसलिये उनकी राजलक्ष्मी, जो शत्रुओंको संताप देनेवाली थी, उनके पाससे हट गयी ॥ २४ ॥
ततस्तस्मादपाक्रम्य सागच्छत् पाकशासनम् ।
अथ सोऽन्वतपत् पश्चाच्छ्रियं दृष्ट्वा पुरन्दरे ॥ २५ ॥
बलिसे हटकर वह राजलक्ष्मी देवराज इन्द्रके पास चली गयी। फिर इन्द्रके पास उस लक्ष्मीको देखकर राजा बलिको बड़ा पश्चात्ताप होने लगा ॥ २५ ॥
एतत् फलमसूयाया अभिमानस्य वा विभो ।
तस्माद् बुध्यस्व मान्धातर्मा त्वां जह्यात् प्रतापिनी ॥ २६ ॥
प्रभो! यह अभिमान और असूयाका फल है, अतः मान्धाता! तुम सचेत हो जाओ, कहीं तुम्हारी भी शत्रुतापिनी लक्ष्मी तुमको छोड़ न दे ॥ २६ ॥
दर्पो नाम श्रियः पुत्रो जज्ञेऽधर्मादिति श्रुतिः ।
तेन देवासुरा राजन् नीताः सुबहवो व्ययम् ॥ २७ ॥
राजर्षयश्च बहवस्तथा बुध्यस्व पार्थिव ।
राजा भवति तं जित्वा दासस्तेन पराजितः ॥ २८ ॥
राजन्! सम्पत्तिका पुत्र है दर्प, जो अधर्मके अंशसे उत्पन्न हुआ है, यह श्रुतिका कथन है। उस दर्पने बहुतसे देवताओं, असुरों और राजर्षियोंका विनाश कर डाला है। अतः भूपाल! अब भी चेतो। जो दर्पको जीत लेता है, वह राजा होता है और जो उससे पराजित हो जाता है, वह दास बन जाता है ॥ २७-२८ ॥
स यथा दर्पसहितमधर्मं नानुसेवते ।
तथा वर्तस्व मान्धातश्चिरं चेत् स्थातुमिच्छसि ॥ २९ ॥
मान्धाता! यदि तुम चिरकालतक राजसिंहासनपर विराजमान रहना चाहते हो तो ऐसा बर्ताव करो, जिससे तुम्हारे द्वारा दर्प और अधर्मका सेवन न हो ॥ २९ ॥
मत्तात्प्रमत्तात् पौगण्डादुन्मत्ताच्च विशेषतः ।

तदभ्यासादुपावर्त संहितानां च सेवनात् ॥ ३० ॥ मतवाले, प्रमादी, बालक तथा विशेषतः पागलोंसे बचो। उनके निकट-सम्पर्कसे भी दूर रहो और यदि वे एक साथ रहकर सेवा करना चाहें तो उनकी उस सेवासे भी सर्वथा बचे रहो ॥ ३० ॥ निगृहीतादमात्याच्च स्त्रीभ्यश्चैव विशेषतः । पर्वताद् विषमाद् दुर्गाद्धस्तिनोऽश्वात् सरीसृपात् ॥ ३१ ॥ एतेभ्यो नित्ययत्तः स्यान्नक्तंचर्यां च वर्जयेत् । अत्यागं चाभिमानं च दम्भं क्रोधं च वर्जयेत् ॥ ३२ ॥ इसी तरह जिसको एक बार कैद किया हो, उस मन्त्रीसे, विशेषतः परायी स्त्रियोंसे, ऊँचे-नीचे और दुर्गम पर्वतसे तथा हाथी, घोड़े और सर्पसे राजाको बचकर रहना चाहिये। इनकी ओरसे सदा सावधान रहे और रातमें घूमना-फिरना छोड़ दे। कृपणता, अभिमान, दम्भ और क्रोधका भी सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ३१-३२ ॥ अविज्ञातासु च स्त्रीषु क्लीबासु स्वैरिणीषु च । परभार्यासु कन्यासु नाचरेन्मैथुनं नृपः ॥ ३३ ॥ अपरिचित स्त्रियों, बाँझ स्त्रियों, वेश्याओं, परायी स्त्रियों तथा कुमारी कन्याओंके साथ राजा मैथुन न करे ॥ कुलेषु पापरक्षांसि जायन्ते वर्णसंकरात् । अपुमांसोऽङ्गहीनाश्च स्थूलजिह्वा विचेतसः ॥ ३४ ॥ एते चान्ये च जायन्ते यदा राजा प्रमाद्यति । तस्माद् राज्ञा विशेषेण वर्तितव्यं प्रजाहिते ॥ ३५ ॥ जब राजा धर्मकी ओरसे प्रमाद करता है, तब वर्णसंकरताके कारण उत्तम कुलोंमें पापी और राक्षस जन्म लेते हैं। नपुंसक, काने, लँगड़े, लूले, गूँगे तथा बुद्धिहीन बालकोंकी उत्पत्ति होती है। ये तथा और भी बहुत-सी कुत्सित संतानें जन्म लेती हैं। इसलिये राजाको विशेषरूपसे धर्मपरायण एवं सावधान होकर प्रजाके हितसाधनमें तत्पर रहना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ क्षत्रियस्य प्रमत्तस्य दोषः संजायते महान् । अधर्माः सम्प्रवर्धन्ते प्रजासंकरकारकाः ॥ ३६ ॥ क्षत्रियके प्रमादसे बड़े-बड़े दोष प्रकट होते हैं। वर्णसंकरोंको जन्म देनेवाले पापकर्मोंकी वृद्धि होती है ॥ अशीते विद्यते शीतं शीते शीतं न विद्यते । अवृष्टिरतिवृष्टिश्च व्याधिश्चाप्याविशेत् प्रजाः ॥ ३७ ॥ गर्मीके मौसममें सर्दी और सर्दीके मौसममें गर्मी पड़ने लगती है। कभी सूखा पड़ जाता है, कभी अधिक वर्षा होती है तथा प्रजामें नाना प्रकारके रोग फैल जाते हैं ॥ ३७ ॥

नक्षत्राण्युपतिष्ठन्ति ग्रहा घोरास्तथागते । उत्पाताश्चात्र दृश्यन्ते बहवो राजनाशनाः ॥ ३८ ॥ आकाशमें भयानक ग्रह और धूमकेतु आदि तारे उगते हैं तथा राष्ट्रके विनाशकी सूचना देनेवाले बहुतसे उत्पात दिखायी देने लगते हैं ॥ ३८ ॥ अरक्षितात्मा यो राजा प्रजाश्चापि न रक्षति । प्रजाश्च तस्य क्षीयन्ते ततः सोऽनुविनश्यति ॥ ३९ ॥ जो राजा अपनी रक्षा नहीं करता, वह प्रजाकी भी रक्षा नहीं कर सकता। पहले उसकी प्रजाएँ क्षीण होती हैं; फिर वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है ॥ ३९ ॥ द्वावाददाते ह्येकस्य द्वयोः सुबहवोऽपरे । कुमार्यः सम्प्रलुप्यन्ते तदाहुर्नृपदूषणम् ॥ ४० ॥ जब दो मनुष्य मिलकर एककी वस्तु छीन लेते हैं, बहुत-से मिलकर दोको लूटते हैं तथा कुमारी कन्याओंपर बलात्कार होने लगता है, उस समय इन सारे अपराधोंका कारण राजाको ही बताया जाता है ॥ ४० ॥ ममेदमिति नैकस्य मनुष्येष्ववतिष्ठति । त्यक्त्वा धर्मं यदा राजा प्रमादमनुतिष्ठति ॥ ४१ ॥ जब राजा धर्म छोड़कर प्रमादमें पड़ जाता है, तब मनुष्योंमेंसे एक भी अपने धनको ‘यह मेरा है’ ऐसा समझकर स्थिर नहीं रह सकता ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि उतथ्यगीतासु नवतितमोऽध्यायः ॥ ९० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें उतथ्यगीताविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९० ॥