भारतकोश
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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2328)

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अष्टादशोऽध्यायः

पाण्डवोंका स्त्रियोंसहित निराश लौटना, कुन्तीसहित गान्धारी और धृतराष्ट्र आदिका मार्गमें गंगातटपर निवास करना

वैशम्पायन उवाच

कुन्त्यास्तु वचनं श्रुत्वा पाण्डवा राजसत्तम ।
व्रीडिताः संन्यवर्तन्त पाञ्चाल्या सहिताऽनघाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ! कुन्तीकी बात सुनकर निष्पाप पाण्डव बहुत लज्जित हुए और द्रौपदीके साथ वहाँसे लौटने लगे ॥ १ ॥
ततः शब्दो महानेव सर्वेषामभवत् तदा ।
अन्तःपुराणां रुदतां दृष्ट्वा कुन्तीं तथागताम् ॥ २ ॥
प्रदक्षिणमथावृत्य राजानं पाण्डवास्तदा ।
अभिवाद्य न्यवर्तन्त पृथां तामनिवर्त्य वै ॥ ३ ॥
कुन्तीको इस प्रकार वनवासके लिये उद्यत देख रनिवासकी सारी स्त्रियाँ रोने लगीं। उन सबके रोनेका महान् शब्द सब ओर गूँज उठा। उस समय पाण्डव कुन्तीको लौटानेमें सफल न हो राजा धृतराष्ट्रकी परिक्रमा और अभिवादन करके लौटने लगे ॥ २-३ ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
गान्धारीं विदुरं चैव समाभाष्यावगृह्य च ॥ ४ ॥
तब महातेजस्वी अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने गान्धारी और विदुरको सम्बोधित करके उनका हाथ पकड़कर कहा— ॥
युधिष्ठिरस्य जननी देवी साधु निवर्त्यताम् ।
यथा युधिष्ठिरः प्राह तत् सर्वं सत्यमेव हि ॥ ५ ॥
‘गान्धारी और विदुर! तुमलोग युधिष्ठिरकी माता कुन्तीदेवीको अच्छी तरह समझा-बुझाकर लौटा दो। युधिष्ठिर जैसा कह रहे हैं, वह सब ठीक ही है ॥ ५ ॥
पुत्रैश्वर्यं महदिदमपास्य च महाफलम् ।
का नु गच्छेद वनं दुर्गं पुत्रानुत्सृज्य मूढवत् ॥ ६ ॥
पुत्रोंका महान् फलदायक यह महान् ऐश्वर्य छोड़कर और पुत्रोंका त्याग करके कौन नारी मूढ़की भाँति दुर्गम वनमें जायगी? ॥ ६ ॥
राज्यस्थया तपस्तप्तुं कर्तुं दानव्रतं महत् ।
अनया शक्यमेवाद्य श्रूयतां च वचो मम ॥ ७ ॥

यह राज्यमें रहकर भी तपस्या कर सकती है और महान् दान-व्रतका अनुष्ठान करनेमें समर्थ हो सकती है; अतः यह आज मेरी बात ध्यान देकर सुने ।। ७ ।। गांधारि परितुष्टोऽस्मि वध्वाः शुश्रूषणेन वै । तस्मात् त्वमेनां धर्मज्ञे समनुज्ञातुमर्हसि ।। ८ ।। ‘धर्मको जाननेवाली गान्धारी! मैं बहू कुन्तीकी सेवा-शुश्रूषासे बहुत संतुष्ट हूँ; अतः आज तुम इसे घर लौटनेकी आज्ञा दे दो’ ।। ८ ।। इत्युक्ता सौबलेयी तु राज्ञा कुन्तीमुवाच ह । तत् सर्वं राजवचनं स्वं च वाक्यं विशेषवत् ।। ९ ।। राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर सुबलकुमारी गान्धारीने कुन्तीसे राजाकी आज्ञा कह सुनायी और अपनी ओरसे भी उन्हें लौटनेके लिये विशेष जोर दिया ।। ९ ।। न च सा वनवासाय देवी कृतमतिं तदा । शक्नोत्युपावर्तयितुं कुन्तीं धर्मपरां सतीम् ।। १० ।। परंतु धर्मपरायणा सती-साध्वी कुन्तीदेवी वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय कर चुकी थीं; अतः गान्धारीदेवी उन्हें घरकी ओर लौटा न सकीं ।। १० ।। तस्यास्तां तु स्थितिं ज्ञात्वा व्यवसायं कुरुस्त्रियः । निवृत्तांश्च कुरुश्रेष्ठान् दृष्ट्वा प्ररुरुदुस्तदा ।। ११ ।। कुन्तीकी यह स्थिति और वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय जान कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको निराश लौटते देख कुरुकुलकी सारी स्त्रियाँ फूट-फूटकर रोने लगीं ।। ११ ।। उपावृत्तेषु पार्थेषु सर्वास्वेव वधूषु च । ययौ राजा महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो वनं तदा ।। १२ ।। कुन्तीके सभी पुत्र और सारी बहुएँ जब लौट गयीं, तब महाज्ञानी राजा धृतराष्ट्र वनकी ओर चले ।। पाण्डवाश्चातिदीनास्ते दुःखशोकपरायणाः । यानैः स्त्रीसहिताः सर्वे पुरं प्रविविशुस्तदा ।। १३ ।। उस समय पाण्डव अत्यन्त दीन और दुःख-शोकमें मग्न हो रहे थे। उन्होने वाहनोंपर बैठकर स्त्रियोंसहित नगरमें प्रवेश किया ।। १३ ।। तदहृष्टमनानन्दं गतोत्सवमिवाभवत् । नगरं हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम् ।। १४ ।। उस दिन बालक, वृद्ध और स्त्रियोंसहित सारा हस्तिनापुर नगर हर्ष और आनन्दसे रहित तथा उत्सवशून्य-सा हो रहा था ।। १४ ।। सर्वे चासन् निरुत्साहाः पाण्डवा जातमन्यवः । कुन्त्या हीनाः सुदुःखार्ता वत्सा इव विनाकृताः ।। १५ ।।

समस्त पाण्डवोंका उत्साह नष्ट हो गया था। वे दीन एवं दुखी हो गये थे। कुन्तीसे बिछुड़कर अत्यन्त दुःखसे आतुर हो वे बिना गायके बछड़ोंके समान व्याकुल हो गये थे॥ १५॥

धृतराष्ट्रस्तु तेनाह्ना गत्वा सुमहदन्तरम् । ततो भागीरथीतीरे निवासमकरोत् प्रभुः ॥ १६ ॥ उधर राजा धृतराष्ट्रने उस दिन बहुत दूरतक यात्रा करके संध्याके समय गंगाके तटपर निवास किया॥ १६॥

प्रादुष्कृता यथान्यायमनयो वेदपारगैः । व्यराजन्त द्विजश्रेष्ठैस्तत्र तत्र तपोवने ॥ १७ ॥ वहाँके तपोवनमें वेदोंके पारंगत श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने जहाँ-तहाँ विधिपूर्वक जो आग प्रकट करके प्रज्वलित की थी, वह बड़ी शोभा पा रही थी ॥ १७॥

प्रादुष्कृताग्निरभवत् स च वृद्धो नराधिपः । स राजाग्नीन् पर्युपास्य हुत्वा च विधिवत् तदा ॥ १८ ॥ संध्यागतं सहस्त्रांशुमुपातिष्ठत भारत । भरतनन्दन! फिर बूढ़े राजा धृतराष्ट्रने भी अग्निको प्रकट एवं प्रज्वलित किया। त्रिविध अग्नियोंकी उपासना करके उनमें विधिपूर्वक आहुति दे राजाने संध्याकालिक सूर्यदेवका उपस्थान किया ॥ १८ १/२ ॥

विदुरः संजयश्चैव राज्ञः शय्यां कुशैस्ततः ॥ १९ ॥ चक्रतुः कुरुवीरस्य गान्धार्याश्चाविदूरतः । तदनन्तर विदुर और संजयने कुरुप्रवीर राजा धृतराष्ट्रके लिये कुशोंकी शय्या बिछा दी। उनके पास ही गान्धारीके लिये एक पृथक् आसन लगा दिया ॥ १९ १/२ ॥

गान्धार्याःसंनिकर्षे तु निषसाद कुशे सुखम् ॥ २० ॥ युधिष्ठिरस्य जननी कुन्ती साधुव्रते स्थिता । गान्धारीके निकट ही उत्तम व्रतमें स्थित हुई युधिष्ठिरकी माता कुन्ती भी कुशासनपर सोयीं और उसीमें उन्होंने सुख माना ॥ २० १/२ ॥

तेषां संश्रवणे चापि निषेदुर्विदुरादयः ॥ २१ ॥ याजकाश्च यथोद्देशं द्विजा ये चानुयायिनः । विदुर आदि भी राजासे उतनी ही दूरपर सोये, जहाँसे उनकी बोली सुनायी दे सके। यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण तथा राजाके साथ आये हुए अन्य द्विज यथायोग्य स्थानपर सोये ॥ २१ १/२ ॥

प्राधीतद्विजमुख्या सा सम्प्रज्वलितपावका ॥ २२ ॥ बभूव तेषां रजनी ब्राह्मीव प्रीतिवर्धिनी ।

उस रातमें मुख्य-मुख्य ब्राह्मण स्वाध्याय करते थे और जहाँ-तहाँ अग्निहोत्रकी आग प्रज्वलित हो रही थी। इससे वह रजनी उन लोगोंके लिये ब्राह्मी निशाके समान आनन्द बढ़ानेवाली हो रही थी ॥ २२ १/२ ॥
ततो रात्र्यां व्यतीतायां कृतपूर्वाह्निकक्रियाः ॥ २३ ॥
हुत्वाग्निं विधिवत् सर्वे प्रययुस्ते यथाक्रमम् ।
उदङ्मुखा निरीक्षन्त उपवासपरायणाः ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् रात बीतनेपर पूर्वाह्निककालकी क्रिया पूरी करके विधिपूर्वक अग्निमें आहुति देनेके पश्चात् वे सब लोग क्रमशः आगे बढ़ने लगे। उन सबने रात्रिमें उपवास किया था और सभी उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके उधर ही देखते हुए चले जा रहे थे ॥ २३-२४ ॥
स तेषामतिदुःखोऽभून्निवासः प्रथमेऽहनि ।
शोचतां शोच्यमानानां पौरजानपदैर्जनैः ॥ २५ ॥
नगर और जनपदके लोग जिनके लिये शोक कर रहे थे तथा जो स्वयं भी शोकमग्न थे, उन धृतराष्ट्र आदिके लिये यह पहले दिनका निवास बड़ा ही दुःखदायी प्रतीत हुआ ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2332)

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एकोनविंशोऽध्यायः

धृतराष्ट्र आदिका गङ्गातटपर निवास करके वहाँसे कुरुक्षेत्रमें जाना और शतयूपके आश्रमपर निवास करना

वैशम्पायन उवाच

ततो भागीरथीतीरे मेध्ये पुण्यजनोचिते ।
निवासमकरोद् राजा विदुरस्य मते स्थितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर दूसरा दिन व्यतीत होनेपर राजा धृतराष्ट्रने विदुरजीकी बात मानकर पुण्यात्मा पुरुषोंके रहनेयोग्य भागीरथीके पावन-तटपर निवास किया ॥ १ ॥

तत्रैनं पर्युपातिष्ठन् ब्राह्मणा वनवासिनः ।
क्षत्रविट्शूद्रसंघाश्च बहवो भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ वनवासी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बहुत बड़ी संख्यामें एकत्र होकर राजासे मिलनेको आये ॥ २ ॥

स तैः परिवृतो राजा कथाभिः परिनन्द्य तान् ।
अनुजज्ञे सशिष्यान् वै विधिवत् प्रतिपूज्य च ॥ ३ ॥
उन सबसे घिरे हुए राजा धृतराष्ट्रने अनेक प्रकारकी बातें करके सबको प्रसन्न किया और शिष्योंसहित ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन करके उन्हें जानेकी अनुमति दी ॥ ३ ॥

सायाह्ने स महीपालस्ततो गङ्गामुपेत्य च ।
चकार विधिवच्छौचं गान्धारी च यशस्विनी ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् सायंकालमें राजा तथा यशस्विनी गान्धारीदेवीने गङ्गाजीके जलमें प्रवेश करके विधिपूर्वक स्नान-कार्य सम्पन्न किया ॥ ४ ॥

ते चैवान्ये पृथक् सर्वे तीर्थेष्वाप्लुत्य भारत ।
चक्रुः सर्वाः क्रियास्तत्र पुरुषा विदुरादयः ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! वे तथा विदुर आदि पुरुषवर्गके लोग सबने पृथक्-पृथक् घाटोंमें गोता लगाकर संध्योपासन आदि समस्त शुभ कार्य पूर्ण किये ॥ ५ ॥

कृतशौचं ततो वृद्धं श्वशुरं कुन्तिभोजजा ।
गान्धारीं च पृथा राजन् गङ्गातीरमुपानयत् ॥ ६ ॥
राजन्! स्नानादि कर लेनेके पश्चात् अपने बूढ़े श्वशुर धृतराष्ट्र और गान्धारीदेवीको कुन्तीदेवी गङ्गाके किनारे ले आयीं ॥ ६ ॥

राज्ञस्तु याजकैस्तत्र कृतो वेदीपरिस्तरः ।

जुहाव तत्र वह्निं स नृपतिः सत्यसङ्गरः ॥ ७ ॥
वहाँ यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणोंने राजाके लिये एक वेदी तैयार की, जिसपर अग्नि-स्थापना करके उस सत्यप्रतिज्ञ नरेशने विधिवत् अग्निहोत्र किया ॥ ७ ॥
ततो भागीरथीतीरात् कुरुक्षेत्रं जगाम सः ।
सानुगो नृपतिर्वृद्धो नियतः संयतेन्द्रियः ॥ ८ ॥
इस प्रकार नित्यकर्मसे निवृत्त हो बूढ़े राजा धृतराष्ट्र इन्द्रियसंयमपूर्वक नियमपरायण हो सेवकों-सहित गङ्गातटसे चलकर कुरुक्षेत्रमें जा पहुँचे ॥ ८ ॥
तत्राश्रमपदं धीमानभिगम्य स पार्थिवः ।
आससादाथ राजर्षिं शतयूपं मनीषिणम् ॥ ९ ॥
वहाँ बुद्धिमान् भूपाल एक आश्रमपर जाकर वहाँके मनीषी राजर्षि शतयूपसे मिले ॥ ९ ॥
स हि राजा महानासीत् केकयेषु परंतपः ।
स्वपुत्रं मनुजैश्वर्ये निवेश्य वनमाविशत् ॥ १० ॥
वे परंतप राजा शतयूप कभी केकय देशके महाराज थे। अपने पुत्रको राजसिंहासनपर बिठाकर वनमें चले आये थे ॥ १० ॥
तेनासौ सहितो राजा ययौ व्यासाश्रमं प्रति ।
तत्रैनं विधिवद् राजा प्रत्यगृह्णात् कुरूद्वहः ॥ ११ ॥
राजा धृतराष्ट्र उन्हें साथ लेकर व्यास-आश्रमपर गये। वहाँ कुरुश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने विधिपूर्वक व्यासजीकी पूजा की ॥ ११ ॥
स दीक्षां तत्र सम्प्राप्य राजा कौरवनन्दनः ।
शतयूपाश्रमे तस्मिन् निवासमकरोत् तदा ॥ १२ ॥
तत्पश्चात् उन्हींसे वनवासकी दीक्षा लेकर कौरवनन्दन राजा धृतराष्ट्र पूर्वोक्त शतयूपके आश्रममें लौट आये और वहीं निवास करने लगे ॥ १२ ॥
तस्मै सर्वं विधिं राज्ञे राजाऽऽचचक्षौ महामतिः ।
आरण्यकं महाराज व्यासस्यानुमते तदा ॥ १३ ॥
महाराज! वहाँ परम बुद्धिमान् राजा शतयूपने व्यासजीकी आज्ञासे धृतराष्ट्रको वनमें रहनेकी सम्पूर्ण विधि बतला दी ॥ १३ ॥
एवं स तपसा राजन् धृतराष्ट्रो महामनाः ।
योजयामास चात्मानं तांश्चाप्यनुचरांस्तदा ॥ १४ ॥
राजन्! इस प्रकार महामनस्वी राजा धृतराष्ट्रने अपने-आपको तथा साथ आये हुए लोगोंको भी तपस्यामें लगा दिया ॥ १४ ॥
तथैव देवी गान्धारी वल्कलाजिनधारिणी ।
कुन्त्या सह महाराज समानव्रतचारिणी ॥ १५ ॥

महाराज! इसी प्रकार वल्कल और मृगचर्म धारण करनेवाली गान्धारीदेवी भी कुन्तीके साथ रहकर धृतराष्ट्रके समान ही व्रतका पालन करने लगीं ॥ १५ ॥
कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषा चैव ते नृप ।
संनियम्येन्द्रियग्राममास्थिते परमं तपः ॥ १६ ॥
नरेश्वर! वे दोनों नारियाँ इन्द्रियोंको अपने अधीन करके मन, वाणी, कर्म तथा नेत्रोंके द्वारा भी उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गयीं ॥ १६ ॥
त्वगस्थिभूतः परिशुष्कमांसो
जटाजिनी वल्कलसंवृताङ्गः ।
स पार्थिवस्तत्र तपश्चचार
महर्षिवत्तीव्रमपेतमोहः ॥ १७ ॥
राजा धृतराष्ट्रके शरीरका मांस सूख गया। वे अस्थिचर्मावशिष्ट होकर मस्तकपर जटा और शरीरपर मृगछाला एवं वल्कल धारण किये महर्षियोंकी भाँति तीव्र तपस्यामें प्रवृत्त हो गये। उनके चित्तका सम्पूर्ण मोह दूर हो गया था ॥ १७ ॥
क्षत्ता च धर्मार्थविदग्र्यबुद्धिः
ससंजयस्तं नृपतिं सदारम् ।
उपाचरद् घोरतपो जितात्मा
तदा कृशो वल्कलचीरवासाः ॥ १८ ॥
धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा उत्तम बुद्धिवाले विदुरजी भी संजयसहित वल्कल और चीरवस्त्र धारण किये गान्धारी और धृतराष्ट्रकी सेवा करने लगे। वे मनको वशमें करके अपने दुर्बल शरीरसे घोर तपस्यामें संलग्न रहते थे ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि शतयूपाश्रमनिवासे
एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका शतयूपके आश्रमपर निवासविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥

नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपःसिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी

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विंशोऽध्यायः

नारदजीका प्राचीन राजर्षियोंकी तपःसिद्धिका दृष्टान्त देकर धृतराष्ट्रकी तपस्याविषयक श्रद्धाको बढ़ाना तथा शतयूपके पूछनेपर धृतराष्ट्रको मिलनेवाली गतिका भी वर्णन करना

वैशम्पायन उवाच

ततस्तत्र मुनिश्रेष्ठा राजानं द्रष्टुमभ्ययुः ।
नारदः पर्वतश्चैव देवलश्च महातपाः ॥ १ ॥
द्वैपायनः सशिष्यश्च सिद्धाश्चान्ये मनीषिणः ।
शतयूपश्च राजर्षिर्वृद्धः परमधार्मिकः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर वहाँ राजा धृतराष्ट्रसे मिलनेके लिये नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, शिष्योंसहित महर्षि व्यास तथा अन्यान्य सिद्ध, मनीषी, श्रेष्ठ मुनिगण आये। उनके साथ परम धर्मात्मा वृद्ध राजर्षि शतयूप भी पधारे थे ॥ १-२ ॥

तेषां कुन्ती महाराज पूजां चक्रे यथाविधि ।
ते चापि तुतुषुस्तस्यास्तापसाः परिचर्यया ॥ ३ ॥
महाराज! कुन्तीदेवीने उन सबकी यथायोग्य पूजा की। वे तपस्वी ऋषि भी कुन्तीकी सेवासे बहुत संतुष्ट हुए ॥ ३ ॥

तत्र धर्म्याः कथास्तात चक्रुस्ते परमर्षयः ।
रमयन्तो महात्मानं धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ॥ ४ ॥
तात! वहाँ उन महर्षियोंने महात्मा राजा धृतराष्ट्रका मन लगानेके लिये अनेक प्रकारकी धार्मिक कथाएँ कहीं ॥

कथान्तरे तु कस्मिंश्चिद् देवर्षिर्नारदस्ततः ।
कथामिमामकथयत् सर्वप्रत्यक्षदर्शिवान् ॥ ५ ॥
सब कुछ प्रत्यक्ष देखनेवाले देवर्षि नारदने किसी कथाके प्रसंगमें यह कथा कहनी आरम्भ की ॥ ५ ॥

नारद उवाच

केकयाधिपतिः श्रीमान् राजाऽऽसीदकुतोभयः ।
सहस्रचित्य इत्युक्तः शतयूपपितामहः ॥ ६ ॥
**नारदजी बोले—**राजन्! पूर्वकालमें सहस्रचित्य नामसे प्रसिद्ध एक तेजस्वी राजा थे, जो केकयदेशकी प्रजाका पालन करते थे। उन्हें कभी किसीसे भय नहीं होता था। यहाँ जो ये राजर्षि शतयूप विराज रहे हैं, इनके वे पितामह थे ॥ ६ ॥

स पुत्रे राज्यमासज्य ज्येष्ठे परमधार्मिके । सहस्रचित्यो धर्मात्मा प्रविवेश वनं नृपः ॥ ७ ॥ धर्मात्मा राजा सहस्रचित्य अपने परम धर्मात्मा ज्येष्ठ पुत्रको राज्यका भार सौंपकर तपस्याके लिये इसी वनमें प्रविष्ट हुए ॥ ७ ॥

स गत्वा तपसः पारं दीप्तस्य वसुधाधिपः । पुरंदरस्य संस्थानं प्रतिपेदे महाद्युतिः ॥ ८ ॥ ये महातेजस्वी भूपाल अपनी उद्दीप्त तपस्या पूरी करके इन्द्रलोकको प्राप्त हुए ॥ ८ ॥

दृष्टपूर्वः स बहुशो राजन् सम्पतता मया । महेन्द्रसदने राजा तपसा दग्धकिल्बिषः ॥ ९ ॥ तपस्यासे उनके सारे पाप भस्म हो गये थे। राजन्! इन्द्रलोकमें आते-जाते समय मैंने उन राजर्षिको अनेक बार देखा है ॥ ९ ॥

तथा शैलालयो राजा भगदत्तपितामहः । तपोबलेनैव नृपो महेन्द्रसदनं गतः ॥ १० ॥ इसी प्रकार भगदत्तके पिता महाराजा शैलालय भी तपस्याके बलसे ही इन्द्रलोकको गये हैं ॥ १० ॥

तथा पृषध्रो राजाऽऽसीद् राजन् वज्रधरोपमः । स चापि तपसा लेभे नाकपृष्ठमितो गतः ॥ ११ ॥ महाराज! राजा पृषध्र वज्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी थे। उन्होंने भी तपस्याके बलसे इस लोकसे जानेपर स्वर्गलोक प्राप्त किया था ॥ ११ ॥

अस्मिन्नरण्ये नृपते मान्धातुरपि चात्मजः । पुरुकुत्सो नृपः सिद्धिं महतीं समवाप्तवान् ॥ १२ ॥ भार्या समभवद् यस्य नर्मदा सरितां वरा । सोऽस्मिन्नरण्ये नृपतिस्तपस्तप्त्वा दिवं गतः ॥ १३ ॥ नरेश्वर! मान्धाताके पुत्र पुरुकुत्सने भी, सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा जिनकी पत्नी हुई थी, इसी वनमें तपस्या करके बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त की थी। यहीं तपस्या करके वे नरेश स्वर्गलोकमें गये थे ॥ १२-१३ ॥

शशलोमा च राजाऽऽसीद् राजन् परमधार्मिकः । सम्यगस्मिन् वने तप्त्वा ततो दिवमवाप्तवान् ॥ १४ ॥ राजन्! परम धर्मात्मा राजा शशलोमाने भी इसी वनमें उत्तम तपस्या करके स्वर्ग प्राप्त किया था ॥ १४ ॥

द्वैपायनप्रसादाच्च त्वमपीदं तपोवनम् । राजन्नवाप्य दुष्प्रापां गतिमग्र्यां गमिष्यसि ॥ १५ ॥

नरेश्वर! व्यासजीकी कृपासे तुम भी इसी तपोवनमें आ पहुँचे हो। अब यहाँ तपस्या करके दुर्लभ सिद्धिका आश्रय ले श्रेष्ठ गति प्राप्त कर लोगे ॥ १५ ॥ त्वं चापि राजशार्दूल तपसोऽन्ते श्रिया वृतः । गान्धारीसहितो गन्ता गतिं तेषां महात्मनाम् ॥ १६ ॥ नृपश्रेष्ठ! तुम भी तपस्याके अन्तमें तेजसे सम्पन्न हो गान्धारीके साथ उन्हीं महात्माओंकी गति प्राप्त करोगे ॥ १६ ॥ पाण्डुः स्मरति ते नित्यं बलहन्तुः समीपगः । त्वां सदैव महाराज श्रेयसा स च योक्ष्यति ॥ १७ ॥ महाराज! तुम्हारे छोटे भाई पाण्डु इन्द्रके पास ही रहते हैं। वे सदा तुम्हें याद करते रहते हैं। निश्चय ही वे तुम्हें कल्याणके भागी बनायेंगे ॥ १७ ॥ तव शुश्रूषया चैव गान्धार्याश्च यशस्विनी । भर्तुः सलोकतामेषा गमिष्यति वधूस्तव ॥ १८ ॥ युधिष्ठिरस्य जननी स हि धर्मः सनातनः । तुम्हारी और गान्धारीदेवीकी सेवा करनेसे यह तुम्हारी यशस्विनी बहू युधिष्ठिरजननी कुन्ती अपने पतिके लोकमें पहुँच जायगी। युधिष्ठिर साक्षात् सनातन धर्मस्वरूप हैं (अतः उनकी माता कुन्तीकी सद्गतिमें कोई संदेह ही नहीं है) ॥ १८ १/२ ॥ वयमेतत् प्रपश्यामो नृपते दिव्यचक्षुषा ॥ १९ ॥ प्रवेक्ष्यति महात्मानं विदुरश्च युधिष्ठिरम् । संजयस्तदनुध्यानादितः स्वर्गमवाप्स्यति ॥ २० ॥ नरेश्वर! यह सब हम अपनी दिव्य दृष्टिसे देख रहे हैं। विदुर महात्मा युधिष्ठिरके शरीरमें प्रवेश करेंगे और संजय उन्हींका चिन्तन करनेके कारण यहाँसे सीधे स्वर्गको जायँगे ॥ १९-२० ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा कौरवेन्द्रो महात्मा सार्धं पत्न्या प्रीतिमान् सम्बभूव । विद्वान् वाक्यं नारदस्य प्रशस्य चक्रे पूजां चातुलां नारदाय ॥ २१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर महात्मा कौरवराज धृतराष्ट्र अपनी पत्नीके साथ बहुत प्रसन्न हुए। उन विद्वान् नरेशने नारदजीके वचनोंकी प्रशंसा करके उनकी अनुपम पूजा की ॥ २१ ॥ ततः सर्वे नारदं विप्रसंघाः सम्पूजयामासुरतीव राजन् ।

राज्ञः प्रीत्या धृतराष्ट्रस्य ते वै
पुनः पुनः सम्प्रहृष्टास्तदानीम् ॥ २२ ॥
राजन्! तदनन्तर समस्त ब्राह्मण-समुदायने नारदजीका विशेष पूजन किया। राजा धृतराष्ट्रकी प्रसन्नतासे उस समय उन सब लोगोंको बारंबार हर्ष हो रहा था ॥ २२ ॥
नारदस्य तु तद् वाक्यं शशंसुर्द्विजसत्तमाः ।
शतयूपस्तु राजर्षिर्नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ २३ ॥
उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने नारदजीके पूर्वोक्त वचनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। तत्पश्चात् राजर्षि शतयूपने नारदजीसे इस प्रकार कहा— ॥ २३ ॥
अहो भगवता श्रद्धा कुरुराजस्य वर्धिता ।
सर्वस्य च जनस्यास्य मम चैव महाद्युते ॥ २४ ॥
‘महातेजस्वी देवर्षे! बड़े हर्षकी बात है कि आपने कुरुराज धृतराष्ट्रकी, यहाँ आये हुए सब लोगोंकी और मेरी भी तपस्याविषयक श्रद्धाको अधिक बढ़ा दिया है ॥ २४ ॥
अस्ति काचिद् विवक्षा तु तां मे निगदतः शृणु ।
धृतराष्ट्रं प्रति नृपं देवर्षे लोकपूजित ॥ २५ ॥
‘लोकपूजित देवर्षे! राजा धृतराष्ट्रके विषयमें मुझे कुछ कहने या पूछनेकी इच्छा हो रही है। अपनी उस इच्छाको मैं बता रहा हूँ, सुनिये ॥ २५ ॥
सर्ववृत्तान्ततत्त्वज्ञो भवान् दिव्येन चक्षुषा ।
युक्तः पश्यसि विप्रर्षे गतिर्या विविधा नृणाम् ॥ २६ ॥
‘ब्रह्मर्षे! आप सम्पूर्ण वृत्तान्तोंके तत्त्वज्ञ हैं। आप योगयुक्त होकर अपनी दिव्य दृष्टिसे मनुष्योंको जो नाना प्रकारकी गति प्राप्त होती है, उसे प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ २६ ॥
उक्तवान् नृपतीनां त्वं महेन्द्रस्य सलोकताम् ।
न त्वस्य नृपतेर्लोकाः कथितास्ते महामुने ॥ २७ ॥
‘महामुने! आपने अनेक राजाओंकी इन्द्रलोक-प्राप्तिका वर्णन किया; किंतु यह नहीं बताया कि ये राजा धृतराष्ट्र किस लोकको जायँगे ॥ २७ ॥
स्थानमप्यस्य नृपतेः श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो ।
त्वत्तः कीदृक् कदा चेति तन्ममाख्याहि तत्त्वतः ॥ २८ ॥
‘प्रभो! इन नरेशको जो स्थान प्राप्त होनेवाला है, उसे भी मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ। वह स्थान कैसा होगा और कब प्राप्त होगा—यह मुझे ठीक-ठीक बताइये’ ॥ २८ ॥
इत्युक्तो नारदस्तेन वाक्यं सर्वमनोऽनुगम् ।
व्याजहार सभामध्ये दिव्यदर्शी महातपाः ॥ २९ ॥
शतयूपके इस प्रकार प्रश्न करनेपर दिव्यदर्शी महातपस्वी देवर्षि नारदने उस सभामें सबके मनको प्रिय लगनेवाली यह बात कही ॥ २९ ॥

नारद उवाच

यदृच्छया शक्रसदो गत्वा शक्रं शचीपतिम्।
दृष्टवानस्मि राजर्षे तत्र पाण्डुं नराधिपम्॥ ३०॥
नारदजी बोले— राजर्षे! एक दिन मैं दैवेच्छासे घूमता-फिरता इन्द्रलोकमें चला गया और वहाँ जाकर शचीपति इन्द्रसे मिला। वहीं मैंने राजा पाण्डुको भी देखा था॥ ३०॥

तत्रेयं धृतराष्ट्रस्य कथा समरभवन्नृप।
तपसो दुष्करस्यास्य यदयं तपते नृपः॥ ३१॥
नरेश्वर! वहाँ राजा धृतराष्ट्रकी ही बातचीत चल रही थी। वे जो तपस्या करते हैं, इनके इस दुष्कर तपकी ही चर्चा हो रही थी॥ ३१॥

तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम्।
वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोऽस्य परमायुषः॥ ३२॥
उस सभामें साक्षात् इन्द्रके मुखसे मैंने सुना था कि इन राजा धृतराष्ट्रकी आयुकी जो अन्तिम सीमा है, उसके पूर्ण होनेमें अब केवल तीन वर्ष ही शेष रह गये हैं॥ ३२॥

ततः कुबेरभवनं गान्धारीसहितो नृपः।
प्रयाता धृतराष्ट्रोऽयं राजराजाभिसत्कृतः॥ ३३॥
कामगेन विमानेन दिव्याभरणभूषितः।
ऋषिपुत्रो महाभागस्तपसा दग्धकिल्बिषः॥ ३४॥
संचरिष्यति लोकांश्च देवगन्धर्वरक्षसाम्।
स्वच्छन्देनेति धर्मात्मा यन्मां त्वमनुपृच्छसि॥ ३५॥
उसके समाप्त होनेपर ये राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके साथ कुबेरके लोकमें जायँगे और वहाँ राजाधिराज कुबेरसे सम्मानित हो इच्छानुसार चलनेवाले विमानपर बैठकर दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो देव, गन्धर्व तथा राक्षसोंके लोकोंमें स्वेच्छानुसार विचरते रहेंगे। ऋषिपुत्र महाभाग धर्मात्मा धृतराष्ट्रके सारे पाप इनकी तपस्याके प्रभावसे भस्म हो जायँगे। राजन्! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, उसका उत्तर यही है॥ ३३—३५॥

देवगुह्यमिदं प्रीत्या मया वः कथितं महत्।
भवन्तो हि श्रुतधनास्तपसा दग्धकिल्बिषाः॥ ३६॥
यह देवताओंका अन्यन्त गुप्त विचार है। परंतु आप लोगोंपर प्रेम होनेके कारण मैंने इसे आपके सामने प्रकट कर दिया है। आपलोग वेदके धनी हैं और तपस्यासे निष्पाप हो चुके हैं (अतः आपके सामने इस रहस्यको प्रकट करनेमें कोई हर्ज नहीं है)॥ ३६॥

वैशम्पायन उवाच

इति ते तस्य तच्छ्रुत्वा देवर्षेर्मधुरं वचः।
सर्वे सुमनसः प्रीता बभूवुः स च पार्थिवः॥ ३७॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! देवर्षिके ये मधुर वचन सुनकर वे सब लोग बहुत प्रसन्न हुए और राजा धृतराष्ट्रको भी इससे बड़ा हर्ष हुआ।। ३७।। एवं कथाभिरन्वास्य धृतराष्ट्रं मनीषिणः। विप्रजग्मुर्यथाकामं ते सिद्धगतिमास्थिताः।। ३८।। इस प्रकार वे मनीषी महर्षिगण अपनी कथाओंसे धृतराष्ट्रको संतुष्ट करके सिद्ध गतिका आश्रय ले इच्छानुसार विभिन्न स्थानोंको चले गये।। ३८।।

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि नारदवाक्ये विंशोऽध्यायः।। २०।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें नारदजीका वाक्यविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ।। २०।।

अध्याय (पृष्ठ 2341)

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एकविंशोऽध्यायः

धृतराष्ट्र आदिके लिये पाण्डवों तथा पुरवासियोंकी चिन्ता

वैशम्पायन उवाच

वनं गते कौरवेन्द्रे दुःखशोकसमन्विताः ।
बभूवुः पाण्डवा राजन् मातृशोकेन चान्विताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कौरवराज धृतराष्ट्रके वनमें चले जानेपर पाण्डव दुःख और शोकसे संतप्त रहने लगे। माताके विछोहका शोक उनके हृदयको दग्ध किये देता था ॥ १ ॥

तथा पौरजनः सर्वः शोचन्नास्ते जनाधिपम् ।
कुर्वाणाश्च कथास्तत्र ब्राह्मणा नृपतिं प्रति ॥ २ ॥
इसी प्रकार समस्त पुरवासी मनुष्य भी राजा धृतराष्ट्रके लिये निरन्तर शोकमग्न रहते थे तथा ब्राह्मणलोग सदा उन वृद्ध नरेशके विषयमें वहाँ इस प्रकार चर्चा किया करते थे ॥ २ ॥

कथं नु राजा वृद्धः स वने वसति निर्जने ।
गान्धारी च महाभागा सा च कुन्ती पृथा कथम् ॥ ३ ॥
'हाय! हमारे बूढ़े महाराज उस निर्जन वनमें कैसे रहते होंगे? महाभागा गान्धारी तथा कुन्तिभोजकुमारी पृथा देवी भी किस तरह वहाँ दिन बिताती होंगी? ॥ ३ ॥

सुखार्हः स हि राजर्षिरसुखी तद् वनं महत् ।
किमवस्थः समासाद्य प्रज्ञाचक्षुर्हतात्मजः ॥ ४ ॥
'जिनके सारे पुत्र मारे गये, वे प्रज्ञाचक्षु राजर्षि धृतराष्ट्र सुख भोगनेके योग्य होकर भी उस विशाल वनमें जाकर किस अवस्थामें दुःखके दिन बिताते होंगे? ॥ ४ ॥

सुदुष्कृतं कृतवती कुन्ती पुत्रानपश्यती ।
राज्यश्रियं परित्यज्य वनं सा समरोचयत् ॥ ५ ॥
'कुन्तीदेवीने तो बड़ा ही दुष्कर कर्म किया। अपने पुत्रोंके दर्शनसे वंचित हो राज्यलक्ष्मीको ठुकराकर उन्होंने वनमें रहना पसंद किया है ॥ ५ ॥

विदुरः किमवस्थश्च भ्रातुः शुश्रूषुरात्मवान् ।
स च गावलगणिर्धीमान् भर्तृपिण्डानुपालकः ॥ ६ ॥
'अपने भाईकी सेवामें लगे रहनेवाले मनस्वी विदुरजी किस अवस्थामें होंगे? अपने स्वामीके शरीरकी रक्षा करनेवाले बुद्धिमान् संजय भी कैसे होंगे?' ॥ ६ ॥

आकुमारं च पौरास्ते चिन्ताशोकसमाहताः ।
तत्र तत्र कथाश्चक्रुः समासाद्य परस्परम् ॥ ७ ॥

बच्चेसे लेकर बूढ़ेतक समस्त पुरवासी चिन्ता और शोकसे पीड़ित हो जहाँ-तहाँ एक-दूसरेसे मिलकर उपर्युक्त बातें ही किया करते थे॥ ७॥ पाण्डवाश्चैव ते सर्वे भृशं शोकपरायणाः। शोचन्तो मातरं वृद्धामूषुर्नातिचिरं पुरे॥ ८॥ समस्त पाण्डव तो निरन्तर अत्यन्त शोकमें ही डूबे रहते थे। वे अपनी बूढ़ी माताके लिये इतने चिन्तित हो गये कि अधिक कालतक नगरमें नहीं रह सके॥ ८॥ तथैव वृद्धं पितरं हतपुत्रं जनेश्वरम्। गान्धारीं च महाभागां विदुरं च महामतिम्॥ ९॥ नैषां बभूव सम्प्रीतिस्तान् विचिन्तयतां तदा। न राज्ये न च नारीषु न वेदाध्ययनेषु च॥ १०॥ जिनके पुत्र मारे गये थे, उन बूढ़े ताऊ महाराज धृतराष्ट्रकी, महाभागा गान्धारीकी और परम बुद्धिमान् विदुरकी अधिक चिन्ता करनेके कारण उन्हें कभी चैन नहीं पड़ती थी। न तो राजकाजमें उनका मन लगता था न स्त्रियोंमें। वेदाध्ययनमें भी उनकी रुचि नहीं होती थी॥ ९-१०॥ परं निर्वेदमगमंश्चिन्तयन्तो नराधिपम्। तं च ज्ञातिवधं घोरं संस्मरन्तः पुनः पुनः॥ ११॥ राजा धृतराष्ट्रको याद करके वे अत्यन्त खिन्न एवं विरक्त हो उठते थे। भाई-बन्धुओंके उस भयंकर वधका उन्हें बारंबार स्मरण हो आता था॥ ११॥ अभिमन्योश्च बालस्य विनाशं रणमूर्धनि। कर्णस्य च महाबाहो संग्रामेष्वपलायिनः॥ १२॥ महाबाहु जनमेजय! युद्धके मुहानेपर जो बालक अभिमन्युका अन्यायपूर्वक विनाश किया गया, संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले कर्णका (परिचय न होनेसे) जो वध किया गया—इन घटनाओंको याद करके वे बेचैन हो जाते थे॥ १२॥ तथैव द्रौपदेयानामन्येषां सुहृदामपि। वधं संस्मृत्य ते वीरा नातिप्रमनसोऽभवन्॥ १३॥ इसी प्रकार द्रौपदीके पुत्रों तथा अन्यान्य सुहृदोंके वधकी बात याद करके उनके मनकी सारी प्रसन्नता भाग जाती थी॥ १३॥ हतप्रवीरां पृथिवीं हतरत्नां च भारत। सदैव चिन्तयन्तस्ते न शर्म चोपलेभिरे॥ १४॥ भरतनन्दन! जिसके प्रमुख वीर मारे गये तथा रत्नोंका अपहरण हो गया, उस पृथ्वीकी दुर्दशाका सदैव चिन्तन करते हुए पाण्डव कभी थोड़ी देरके लिये भी शान्ति नहीं पाते थे॥ १४॥ द्रौपदी हतपुत्रा च सुभद्रा चैव भाविनी।

नातिप्रीतियुते देव्यौ तदाऽऽस्तामप्रहृष्टवत् ॥ १५ ॥
जिनके बेटे मारे गये थे, वे द्रुपदकुमारी कृष्णा और भाविनी सुभद्रा दोनों देवियाँ निरन्तर अप्रसन्न और हर्षशून्य-सी होकर चुपचाप बैठी रहती थीं ॥ १५ ॥
वैराट्यास्तनयं दृष्ट्वा पितरं ते परीक्षितम् ।
धारयन्ति स्म ते प्राणांस्तव पूर्वपितामहाः ॥ १६ ॥
जनमेजय! उन दिनों तुम्हारे पूर्व पितामह पाण्डव उत्तराके पुत्र और तुम्हारे पिता परीक्षित्को देखकर ही अपने प्राणोंको धारण करते थे ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2344)

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द्वाविंशोऽध्यायः

माताके लिये पाण्डवोंकी चिन्ता, युधिष्ठिरकी वनमें जानेकी इच्छा, सहदेव और द्रौपदीका साथ जानेका उत्साह तथा रनिवास और सेनासहित युधिष्ठिरका वनको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

एवं ते पुरुषव्याघ्राः पाण्डवा मातृनन्दनाः ।
स्मरन्तो मातरं वीरा बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपनी माताको आनन्द प्रदान करनेवाले वे पुरुषसिंह वीर पाण्डव इस प्रकार माताकी याद करते हुए अत्यन्त दुखी हो गये थे ॥ १ ॥
ये राजकार्येषु पुरा व्यासक्ता नित्यशोऽभवन् ।
ते राजकार्याणि तदा नाकार्षुः सर्वतः पुरे ॥ २ ॥
प्रविष्टा इव शोकेन नाभ्यनन्दन्त किंचन ।
सम्भाष्यमाणा अपि ते न किंचित् प्रत्यपूजयन् ॥ ३ ॥
जो पहले प्रतिदिन राजकीय कार्योंमें निरन्तर आसक्त रहते थे, वे ही उन दिनों नगरमें कहीं कोई राजकाज नहीं करते थे। मानो उनके हृदयमें शोकने घर बना लिया था। वे किसी भी वस्तुको पाकर प्रसन्न नहीं होते थे। किसीके बातचीत करनेपर भी वे उस बातकी ओर न तो ध्यान देते और न उसकी सराहना करते थे ॥ २-३ ॥
ते स्म वीरा दुराधर्षा गाम्भीर्ये सागरोपमाः ।
शोकोपहतविज्ञाना नष्टसंज्ञा इवाभवन् ॥ ४ ॥
समुद्रके समान गाम्भीर्यशाली दुर्धर्ष वीर पाण्डव उन दिनों शोकसे सुध-बुध खो जानेके कारण अचेत-से हो गये थे ॥ ४ ॥
अचिन्तयंश्च जननीं ततस्ते पाण्डुनन्दनाः ।
कथं नु वृद्धमिथुनं वहत्यतिकृशा पृथा ॥ ५ ॥
तदनन्तर एक दिन पाण्डव अपनी माताके लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'हाय! मेरी माता कुन्ती अत्यन्त दुबली हो गयी होंगी। वे उन बूढ़े पति-पत्नी गान्धारी और धृतराष्ट्रकी सेवा कैसे निभाती होंगी? ॥
कथं च स महीपालो हतपुत्रो निराश्रयः ।
पत्न्या सह वसत्येको वने श्वापदसेविते ॥ ६ ॥
'शिकारी जन्तुओंसे भरे हुए उस जंगलमें आश्रयहीन एवं पुत्ररहित राजा धृतराष्ट्र अपनी पत्नीके साथ अकेले कैसे रहते होंगे? ॥ ६ ॥

सा च देवी महाभागा गान्धारी हतबान्धवा ।
पतिमन्धं कथं वृद्धमन्वेति विजने वने ॥ ७ ॥
‘जिनके बन्धु-बान्धव मारे गये हैं, वे महाभागा गान्धारी देवी, उस निर्जन वनमें अपने अन्धे और बूढ़े पतिका अनुसरण कैसे करती होंगी? ॥ ७ ॥
एवं तेषां कथयतामौत्सुक्यमभवत् तदा ।
गमने चाभवद् बुद्धिर्धृतराष्ट्रदिदृक्षया ॥ ८ ॥
इस प्रकार बात करते-करते उनके मनमें बड़ी उत्कण्ठा हो गयी और उन्होंने धृतराष्ट्रके दर्शनकी इच्छासे वनमें जानेका विचार कर लिया ॥ ८ ॥
सहदेवस्तु राजानं प्रणिपत्येदमब्रवीत् ।
अहो मे भवतो दृष्टं हृदयं गमनं प्रति ॥ ९ ॥
उस समय सहदेवने राजा युधिष्ठिरको प्रणाम करके कहा—‘भैया, मुझे ऐसा दिखायी देता है कि आपका हृदय तपोवनमें जानेके लिये उत्सुक है—यह बड़े हर्षकी बात है ॥ ९ ॥
न हि त्वां गौरवेणाहमशकं वक्तुमञ्जसा ।
गमनं प्रति राजेन्द्र तदिदं समुपस्थितम् ॥ १० ॥
‘राजेन्द्र! मैं आपके गौरवका खयाल करके संकोचवश वहाँ जानेकी बात स्पष्टरूपसे कह नहीं पाता था। आज सौभाग्यवश वह अवसर अपने-आप उपस्थित हो गया ॥
दिष्ट्या द्रक्ष्यामि तां कुन्तीं
वर्तयन्तीं तपस्विनीम् ।
जटिलां तापसीं वृद्धां
कुशकाशपरिक्षताम् ॥ ११ ॥
‘मेरा अहोभाग्य कि मैं तपस्यामें लगी हुई माता कुन्तीका दर्शन करूँगा। उनके सिरके बाल जटारूपमें परिणत हो गये होंगे! वे तपस्विनी बूढ़ी माता कुश और काशके आसनोंपर शयन करनेके कारण क्षत-विक्षत हो रही होंगी ॥ ११ ॥
प्रासादहर्म्यसंवृद्धामत्यन्तसुखभागिनीम् ।
कदा तु जननीं श्रान्तां द्रक्ष्यामि भृशदुःखिताम् ॥ १२ ॥
‘जो महलों और अट्टालिकाओंमें पलकर बड़ी हुई हैं, अत्यन्त सुखकी भागिनी रही हैं, वे ही माता कुन्ती अब थककर अत्यन्त दुःख उठाती होंगी! मुझे कब उनके दर्शन होंगे? ॥ १२ ॥
अनित्याः खलु मर्त्यानां गतयो भरतर्षभ ।
कुन्ती राजसुता यत्र वसत्यसुखिता वने ॥ १३ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! मनुष्योंकी गतियाँ निश्चय ही अनित्य होती हैं, जिनमें पड़कर राजकुमारी कुन्ती सुखोंसे वञ्चित हो वनमें निवास करती हैं’ ॥ १३ ॥
सहदेववचः श्रुत्वा द्रौपदी योषितां वरा ।

उवाच देवी राजानमभिपूज्याभिनन्द्य च ॥ १४ ॥ सहदेवकी बात सुनकर नारियोंमें श्रेष्ठ महारानी द्रौपदी राजाका सत्कार करके उन्हें प्रसन्न करती हुई बोली— ॥

कदा द्रक्ष्यामि तां देवीं यदि जीवति सा पृथा । जीवन्त्या ह्यद्य मे प्रीतिर्भविष्यति जनाधिप ॥ १५ ॥ ‘नरेश्वर! मैं अपनी सास कुन्तीदेवीका दर्शन कब करूँगी? क्या वे अबतक जीवित होंगी? यदि वे जीवित हों तो आज उनका दर्शन पाकर मुझे असीम प्रसन्नता होगी ॥

एषा तेऽस्तु मतिर्नित्यं धर्मे ते रमतां मनः । योऽद्यत्वमस्मान् राजेन्द्र श्रेयसा योजयिष्यसि ॥ १६ ॥ ‘राजेन्द्र! आपकी बुद्धि सदा ऐसी ही बनी रहे। आपका मन धर्ममें ही रमता रहे; क्योंकि आज आप हमलोगोंको माता कुन्तीका दर्शन कराकर परम कल्याणकी भागिनी बनायेंगे ॥ १६ ॥

अग्रपादस्थितं चेमं विद्धि राजन् वधूजनम् । काङ्क्षन्तं दर्शनं कुन्त्या गान्धार्याः श्वशुरस्य च ॥ १७ ॥ ‘राजन्! आपको विदित हो कि अन्तःपुरकी सभी बहुएँ वनमें जानेके लिये पैर आगे बढ़ाये खड़ी हैं। वे सब-की-सब कुन्ती, गान्धारी तथा ससुरजीके दर्शन करना चाहती हैं ॥ १७ ॥

इत्युक्तः स नृपो देव्या द्रौपद्या भरतर्षभ । सेनाध्यक्षान् समानाय्य सर्वानिदमुवाच ह ॥ १८ ॥ ‘भरतभूषण! द्रौपदीदेवीके ऐसा कहनेपर राजा युधिष्ठिरने समस्त सेनापतियोंको बुलाकर कहा— ॥ १८ ॥

निर्यात्यत मे सेनां प्रभूतरथकुञ्जराम् । द्रक्ष्यामि वनसंस्थं च धृतराष्ट्रं महीपतिम् ॥ १९ ॥ ‘तुमलोग बहुत-से रथ और हाथी-घोड़ोंसे सुसज्जित सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दो। मैं वनवासी महाराज धृतराष्ट्रके दर्शन करनेके लिये चलूँगा’ ॥ १९ ॥

स्त्र्यध्यक्षांश्चाब्रवीद् राजा यानानि विविधानि मे । सज्जीक्रियन्तां सर्वाणि शिबिकाश्च सहस्रशः ॥ २० ॥ इसके बाद राजाने रनिवासके अध्यक्षोंको आज्ञा दी—‘तुम सब लोग हमारे लिये भाँति-भाँतिके वाहन और पालकियोंको हजारोंकी संख्यामें तैयार करो ॥ २० ॥

शकटापणवेशाश्च कोशः शिल्पिन एव च । निर्यान्तु कोषपालाश्च कुरुक्षेत्राश्रमं प्रति ॥ २१ ॥ ‘आवश्यक सामानोंसे लदे हुए छकड़े, बाजार, दुकानें, खजाना, कारीगर और कोषाध्यक्ष—ये सब कुरुक्षेत्रके आश्रमकी ओर रवाना हो जायँ ॥ २१ ॥

यश्च पौरजनः कश्चिद् द्रष्टुमिच्छति पार्थिवम् । अनावृतः सुविहितः स च यातु सुरक्षितः ॥ २२ ॥ ‘नगरवासियोंमेंसे जो कोई भी महाराजका दर्शन करना चाहता हो, उसे बेरोक-टोक सुविधापूर्वक सुरक्षितरूपसे चलने दिया जाय ॥ २२ ॥

सूदाः पौरोगवाश्चैव सर्वं चैव महानसम् । विविधं भक्ष्यभोज्यं च शकटैरूह्यतां मम ॥ २३ ॥ ‘पाकशालाके अध्यक्ष और रसोइये भोजन बनानेके सब सामानों तथा भाँति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंको मेरे छकड़ोंपर लादकर ले चलें ॥ २३ ॥

प्रयाणं घुष्यतां चैव श्वोभूत इति मा चिरम् । क्रियतां पथि चाप्यद्य वेश्मानि विविधानि च ॥ २४ ॥ ‘नगरमें यह घोषणा करा दी जाय कि ‘कल सबेरे यात्रा की जायगी; इसलिये चलनेवालोंको विलम्ब नहीं करना चाहिये।’ मार्गमें हमलोगोंके ठहरनेके लिये आज ही कई तरहके डेरे तैयार कर दिये जायँ ॥ २४ ॥

एवमाज्ञाप्य राजा स भ्रातृभिः सहपाण्डवः । श्वोभूते निर्ययौ राजन् सस्त्रीवृद्धपुरःसरः ॥ २५ ॥ राजन्! इस प्रकार आज्ञा देकर सबेरा होते ही अपने भाई पाण्डवोंसहित राजा युधिष्ठिरने स्त्री और वृद्धोंको आगे करके नगरसे प्रस्थान किया ॥ २५ ॥

स बहिर्दिवसानेव जनौघं परिपालयन् । न्यवसन्नृपतिः पञ्च ततोऽगच्छद् वनं प्रति ॥ २६ ॥ बाहर जाकर पुरवासी मनुष्योंकी प्रतीक्षा करते हुए वे पाँच दिनोंतक एक ही स्थानपर टिके रहे। फिर सबको साथ लेकर वनमें गये ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि युधिष्ठिरयात्रायां द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें युधिष्ठिरकी वनको यात्राविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥