महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
देवताओंके अनन्तर समस्त पापोंसे मुक्त करनेवाले तपस्यामें बढ़े-चढ़े तपःसिद्ध ब्रह्मर्षियोंके प्रख्यात नाम बतलाता हूँ॥ ३६ ½ ॥
यवक्रीतोऽथ रैभ्यश्च कक्षीवानौशिजस्तथा ॥ ३७ ॥
भृग्वङ्गिरास्तथा कण्वो मेधातिथिरथ प्रभुः ।
बर्ही च गुणसम्पन्नः प्राचीं दिशमुपाश्रिताः ॥ ३८ ॥
यवक्रीत, रैभ्य, कक्षीवान्, औशिज, भृगु, अंगिरा, कण्व, प्रभावशाली मेधातिथि और सर्वगुणसम्पन्न बर्हि—ये पूर्व दिशामें रहते हैं॥ ३७-३८॥
भद्रां दिशं महाभागा उल्मुचुः प्रमुचुस्तथा ।
मुमुचुश्च महाभागः स्वस्त्यात्रेयश्च वीर्यवान् ॥ ३९ ॥
मित्रावरुणयोः पुत्रस्तथागस्त्यः प्रतापवान् ।
दृढायुश्चोर्ध्वबाहुश्च विश्रुतावृषिसत्तमौ ॥ ४० ॥
पश्चिमां दिशमाश्रित्य य एधन्ते निबोध तान् ।
उषङ्गुः सह सोदर्यैः परिव्याधश्च वीर्यवान् ॥ ४१ ॥
ऋषिर्दीर्घतमाश्चैव गौतमः काश्यपस्तथा ।
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चैव महानृषिः ॥ ४२ ॥
अत्रेः पुत्रश्च धर्मात्मा तथा सारस्वतः प्रभुः ।
उल्मुचु, प्रमुचु, महाभाग मुमुचु, शक्तिशाली स्वस्त्यात्रेय, मित्रवरुणके पुत्र महाप्रतापी अगस्त्य और परम प्रसिद्ध ऋषिश्रेष्ठ दृढ़ायु तथा ऊर्ध्वबाहु—ये महाभाग दक्षिण दिशामें निवास करते हैं। अब जो पश्चिम दिशामें रहकर सदा अभ्युदयशील होते हैं, उन ऋषियोंके नाम सुनो—अपने सहोदर भाइयोंसहित उषंगु, शक्तिशाली परिव्याध, दीर्घतमा, ऋषि गौतम, काश्यप, एकत, द्वित, महर्षि त्रित, अत्रिके धर्मात्मा पुत्र दुर्वासा और प्रभावशाली सारस्वत ॥ ३९—४२ ½ ॥
उत्तरां दिशमाश्रित्य य एधन्ते निबोध तान् ॥ ४३ ॥
अत्रिर्वसिष्ठः शक्तिश्च पाराशर्यश्च वीर्यवान् ।
विश्वामित्रो भरद्वाजो जमदग्निस्तथैव च ॥ ४४ ॥
ऋचीकपुत्रो रामश्च ऋषिरौद्दालकिस्तथा ।
श्वेतकेतुः कोहलश्च विपुलो देवलस्तथा ॥ ४५ ॥
देवशर्मा च धौम्यश्च हस्तिकाश्यप एव च ।
लोमशो नाचिकेतश्च लोमहर्षण एव च ॥ ४६ ॥
ऋषिरुग्रश्रवाश्चैव भार्गवश्च्यवनस्तथा ।
अब जो उत्तर दिशाका आश्रय लेकर अपनी उन्नति करते हैं, उनके नाम सुनो—अत्रि, वसिष्ठ, शक्ति, पराशरनन्दन शक्तिशाली व्यास, विश्वामित्र, भरद्वाज, ऋचीकपुत्र जमदग्नि, परशुराम, उद्दालकपुत्र श्वेतकेतु, कोहल, विपुल, देवल, देवशर्मा, धौम्य, हस्तिकाश्यप, लोमश, नाचिकेत, लोमहर्षण, उग्रश्रवा ऋषि और भृगुनन्दन च्यवन ।। ४३-४६ १/२ ।। एष वै समवायश्च ऋषिदेवसमन्वितः ।। ४७ ।। आद्यः प्रकीर्तितो राजन् सर्वपापप्रमोचनः । राजन्! यह आदिमें होनेवाले देवता और ऋषियोंका मुख्य समुदाय अपने नामका कीर्तन करनेपर मनुष्यको सब पापोंसे मुक्त करता है ।। ४७ १/२ ।। नृगो ययातिर्नहुषो यदुः पूरुश्च वीर्यवान् ।। ४८ ।। धुन्धुमारो दिलीपश्च सगरश्च प्रतापवान् । कृशाश्वो यौवनाश्वश्च चित्राश्वः सत्यवांस्तथा ।। ४९ ।। दुष्यन्तो भरतश्चैव चक्रवर्ती महायशाः । पवनो जनकश्चैव तथा दृष्टरथो नृपः ।। ५० ।। रघुर्नरवरश्चैव तथा दशरथो नृपः । रामो राक्षसहा वीरः शशबिन्दुर्भगीरथः ।। ५१ ।। हरिश्चन्द्रो मरुत्तश्च तथा दृढरथो नृपः । महोदयो ह्यलर्कश्च ऐलश्चैव नराधिपः ।। ५२ ।। करन्धमो नरश्रेष्ठः कध्मोरश्च नराधिपः । दक्षोऽम्बरीषः कुकुरो रैवतश्च महायशाः ।। ५३ ।। कुरुः संवरणश्चैव मान्धाता सत्यविक्रमः । मुचुकुन्दश्च राजर्षिर्जह्नुर्जाह्नविसेवितः ।। ५४ ।। आदिराजः पृथुर्वैन्यो मित्रभानुः प्रियङ्करः । त्रसदस्युस्तथा राजा श्वेतो राजर्षिसत्तमः ।। ५५ ।। महाभिषश्च विख्यातो निमिराजा तथाष्टकः । आयुः क्षुपश्च राजर्षिः काक्षेयुश्च नराधिपः ।। ५६ ।। प्रतर्दनो दिवोदासः सुदासः कोसलेश्वरः । ऐलो नलश्च राजर्षिर्मनुश्चैव प्रजापतिः ।। ५७ ।। हविर्ध्रश्च पृषध्रश्च प्रतीपः शान्तनुस्तथा । अजः प्राचीनबर्हिश्च तथैक्ष्वाकुर्महायशाः ।। ५८ ।। अनरण्यो नरपतिर्जानुजंघस्तथैव च । कक्षसेनश्च राजर्षिर्ये चान्ये चानुकीर्तिताः ।। ५९ ।। कल्यमुत्थाय यो नित्यं संध्ये द्वेऽस्तमयोदये । पठेच्छुचिरनावृत्तः स धर्मफलभाग् भवेत् ।। ६० ।।
अब राजर्षियोंके नाम सुनो—राजा नृग, ययाति, नहुष, यदु, शक्तिशाली पूरु, धुन्धुमार, दिलीप, प्रतापी सगर, कृशाश्व, यौवनाश्व, चित्राश्व, सत्यवान्, दुष्यन्त, महायशस्वी चक्रवर्ती राजा भरत, पवन, जनक, राजा दृष्टरथ, नरश्रेष्ठ रघु, राजा दशरथ, राक्षसहन्ता वीरवर श्रीराम, शशबिन्दु, भगीरथ, हरिश्चन्द्र, मरुत्त, राजा दृढरथ, महोदर्य, अलर्क, नराधिप ऐल (पुरूरवा), नरश्रेष्ठ करन्धम, राजा कध्मोर, दक्ष, अम्बरीष, कुकुर, महायशस्वी रैवत, कुरु, संवरण, सत्यपराक्रमी मान्धाता, राजर्षि मुचुकुन्द, गंगाजीसे सेवित राजा जह्नु आदिराजा वेननन्दन पृथु, सबका प्रिय करनेवाले मित्रभानु, राजा त्रसदस्यु, राजर्षिश्रेष्ठ श्वेत, प्रसिद्ध राजा महाभिष, राजा निमि, अष्टक, आयु, राजर्षि क्षुप, राजा कक्षेयु, प्रतर्दन, दिवोदास, कोसलनरेश सुदास, पुरूरवा, राजर्षि नल, प्रजापति मनु, हविध्र, पृषध्र, प्रतीप, शान्तनु, अज, प्राचीनबर्हि, महायशस्वी इक्ष्वाकु, राजा अनरण्य, जानुजंघ, राजर्षि कक्षसेन तथा इनके अतिरिक्त पुराणोंमें जिनका अनेक बार वर्णन हुआ है, वे सब पुण्यात्मा राजा स्मरण करने योग्य हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन सबेरे उठकर स्नान आदिसे शुद्ध हो प्रातःकाल और सांयकाल इन नामोंका पाठ करता है, वह धर्मके फलका भागी होता है।। ४८—६०।।
देवा देवर्षयश्चैव स्तुता राजर्षयस्तथा ।
पुष्टिमायुर्यशः स्वर्गं विधास्यन्ति ममेश्वराः ॥ ६१ ॥
देवता, देवर्षि और राजर्षि—इनकी स्तुति की जानेपर ये मुझे पुष्टि, आयु, यश और स्वर्ग प्रदान करेंगे; क्योंकि ये ईश्वर (सर्वसमर्थ स्वामी) हैं ।। ६१ ।।
मा विघ्नं मा च मे पापं मा च मे परिपन्थिनः ।
ध्रुवो जयो मे नित्यः स्यात् परत्र च शुभा गतिः ॥ ६२ ॥
इनके स्मरणसे मुझपर किसी विघ्नका आक्रमण न हो, मुझसे पाप न बने। मेरे ऊपर चोरों और बटमारोंका जोर न चले। मुझे इस लोकमें सदा चिरस्थायी जय प्राप्त हो और परलोकमें भी शुभ गति मिले ।। ६२ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि वंशानुकीर्तनं नाम
पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवता आदिके वंशका वर्णन नामक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६५ ।।
१६६-
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्मकी अनुमति पाकर युधिष्ठिरका सपरिवार हस्तिनापुरको प्रस्थान
जनमेजय उवाच
शरत्तल्पगते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे ।
शयाने वीरशयने पाण्डवैः समुपस्थिते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरो महाप्राज्ञो मम पूर्वपितामहः ।
धर्माणामगमं श्रुत्वा विदित्वा सर्वसंशयान् ॥ २ ॥
दानानां च विधिं श्रुत्वा च्छिन्नधर्मार्थसंशयः ।
यदन्यदकरोद् विप्र तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ ३ ॥
जनमेजयने पूछा— विप्रवर! कुरुकुलके धुरन्धर वीर भीष्मजी जब वीरोंके सोनेयोग्य बाणशय्यापर सो गये और पाण्डवलोग उनकी सेवामें उपस्थित रहने लगे, तब मेरे पूर्व पितामह महाज्ञानी राजा युधिष्ठिरने उनके मुखसे धर्मोंका उपदेश सुनकर अपने समस्त संशयोंका समाधान जान लेनेके पश्चात् दानकी विधि श्रवण करके धर्म और अर्थविषयक सारे संदेह दूर हो जानेपर जो और कोई कार्य किया हो, उसे मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १—३ ॥
वैशम्पायन उवाच
अभून्मुहूर्तं स्तिमितं सर्वं तद्राजमण्डलम् ।
तूष्णींभूते ततस्तस्मिन् पटे चित्रमिवार्पितम् ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! सब धर्मोंका उपदेश करनेके पश्चात् जब भीष्मजी चुप हो गये, तब दो घड़ीतक सारा राजमण्डल पटपर अंकित किये हुए चित्रके समान स्तब्ध-सा हो गया ॥ ४ ॥
मुहूर्तमिव च ध्यात्वा व्यासः सत्यवतीसुतः ।
नृपं शयानं गाङ्गेयमिदमाह वचस्तदा ॥ ५ ॥
तब दो घड़ीतक ध्यान करनेके पश्चात् सत्यवती-नन्दन व्यासने वहाँ सोये हुए गङ्गानन्दन महाराज भीष्मजीसे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
राजन् प्रकृतिमापन्नः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
सहितो भ्रातृभिः सर्वैः पार्थिवैश्चानुयायिभिः ॥ ६ ॥
उपास्ते त्वां नरव्याघ्र सह कृष्णेन धीमता ।
तमिमं पुरयानाय समनुज्ञातुमर्हसि ॥ ७ ॥
'राजन्! नरश्रेष्ठ! अब कुरुराज युधिष्ठिर प्रकृतिस्थ (शान्त और संदेहरहित) हो चुके हैं और अपना अनुसरण करनेवाले समस्त भाइयों, राजाओं तथा बुद्धिमान् श्रीकृष्णके साथ आपकी सेवामें बैठे हैं। अब आप इन्हें हस्तिनापुरमें जानेकी आज्ञा दीजिये' ।। ६-७ ।।
एवमुक्तो भगवता व्यासेन पृथिवीपतिः ।
युधिष्ठिरं सहामात्यमनुजज्ञे नदीसुतः ।। ८ ।।
भगवान् व्यासके ऐसा कहनेपर पृथ्वीपालक गंगापुत्र भीष्मने मन्त्रियोंसहित राजा युधिष्ठिरको जानेकी आज्ञा दी ।। ८ ।।
उवाच चैनं मधुरं नृपं शान्तनवो नृपः ।
प्रविशस्व पुरीं राजन् व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ९ ।।
उस समय शान्तनुकुमार भीष्मने मधुर वाणीमें राजासे इस प्रकार कहा—'राजन्! अब तुम पुरीमें प्रवेश करो और तुम्हारे मनकी सारी चिन्ता दूर हो जाय ।। ९ ।।
यजस्व विविधैर्यज्ञैर्बह्वन्नैः स्वाप्तदक्षिणैः ।
ययातिरिव राजेन्द्र श्रद्धादमपुरःसरः ।। १० ।।
'राजेन्द्र! तुम राजा ययातिकी भाँति श्रद्धा और इन्द्रिय-संयमपूर्वक बहुत-से अन्न और पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त भाँति-भाँतिके यज्ञोंद्वारा यजन करो ।। १० ।।
क्षत्रधर्मरतः पार्थ पितॄन् देवांश्च तर्पय ।
श्रेयसा योक्ष्यसे चैव व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। ११ ।।
'पार्थ! क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहकर देवताओं और पितरोंको तृप्त करो। तुम अवश्य कल्याणके भागी होओगे; अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। ११ ।।
रञ्जयस्व प्रजाः सर्वाः प्रकृतीः परिसान्त्वय ।
सुहृदः फलसत्कारैरर्चयस्व यथार्हतः ।। १२ ।।
'समस्त प्रजाओंको प्रसन्न रखो। मन्त्री आदि प्रकृतियोंको सान्त्वना दो। सुहृदोंका फल और सत्कारोंद्वारा यथायोग्य सम्मान करते रहो ।। १२ ।।
अनु त्वां तात जीवन्तु मित्राणि सुहृदस्तथा ।
चैत्यस्थाने स्थितं वृक्षं फलवन्तमिव द्विजाः ।। १३ ।।
'तात! जैसे मन्दिरके आस-पासके फले हुए वृक्षपर बहुत-से पक्षी आकर बसेरे लेते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे मित्र और हितैषी तुम्हारे आश्रयमें रहकर जीवन-निर्वाह करें ।। १३ ।।
आगन्तव्यं च भवता समये मम पार्थिव ।
विनिवृत्ते दिनकरे प्रवृत्ते चोत्तरायणे ।। १४ ।।
'पृथ्वीनाथ! जब सूर्यनारायण दक्षिणायनसे निवृत्त हो उत्तरायणपर आ जायँ, उस समय तुम फिर हमारे पास आना' ।। १४ ।।
तथेत्युक्त्वा च कौन्तेयः सोऽभिवाद्य पितामहम् ।
प्रययौ सपरीवारो नगरं नागसाह्वयम् ।। १५ ।।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर पितामहको प्रणाम करके परिवारसहित हस्तिनापुरकी ओर चल दिये ।। १५ ।।
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गान्धारीं च पतिव्रताम् ।
सह तैर्ऋषिभिः सर्वैर्भ्रातृभिः केशवेन च ।। १६ ।।
पौरजानपदैश्चैव मन्त्रिवृद्धैश्च पार्थिव ।
प्रविवेश कुरुश्रेष्ठः पुरं वारणसाह्वयम् ।। १७ ।।
राजन्! उन कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने राजा धृतराष्ट्र और पतिव्रता गान्धारी देवीको आगे करके समस्त ऋषियों, भाइयों, श्रीकृष्ण, नगर और जनपदके लोगों तथा बड़े-बूढ़े मन्त्रियोंके साथ हस्तिनापुरमें प्रवेश किया ।। १६-१७ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि भीष्मानुज्ञायां षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भीष्मकी अनुमतिविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६६ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1551)
शर-शय्यापर पड़े भीष्मकी युधिष्ठिरसे बातचीत
(भीष्मस्वर्गारोहणपर्व)
(भीष्मस्वर्गारोहणपर्व)
सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्मके अन्त्येष्टि-संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देहत्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना
वैशम्पायन उवाच
ततः कुन्तीसुतो राजा पौरजानपदं जनम् ।
पूजयित्वा यथान्यायमनुजज्ञे गृहान् प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! हस्तिनापुरमें जानेके बाद कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरने नगर और जनपदके लोगोंका यथोचित सम्मान करके उन्हें अपने-अपने घर जानेकी आज्ञा दी ॥ १ ॥
सान्त्वयामास नारीश्च हतवीरा हतेश्वराः ।
विपुलैरर्थदानैः स तदा पाण्डुसुतो नृपः ॥ २ ॥
इसके बाद जिन स्त्रियोंके पति और वीर पुत्र युद्धमें मारे गये थे, उन सबको बहुत-सा धन देकर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने धैर्य बँधाया ॥ २ ॥
सोऽभिषिक्तो महाप्राज्ञः प्राप्य राज्यं युधिष्ठिरः ।
अवस्थाप्य नरश्रेष्ठः सर्वाः स्वप्रकृतीस्तथा ॥ ३ ॥
द्विजेभ्यो गुणमुख्येभ्यो नैगमेभ्यश्च सर्वशः ।
प्रतिगृह्याशिषो मुख्यास्तथा धर्मभृतां वरः ॥ ४ ॥
महाज्ञानी और धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने राज्याभिषेक हो जानेके पश्चात् अपना राज्य पाकर मन्त्री आदि समस्त प्रकृतियोंको अपने-अपने पदपर स्थापित करके वेदवेत्ता एवं गुणवान् ब्राह्मणोंसे उत्तम आशीर्वाद ग्रहण किया ॥ ३-४ ॥
उषित्वा शर्वरीः श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे ।
समयं कौरवाग्र्यस्य सस्मार पुरुषर्षभः ॥ ५ ॥
पचास राततक उस उत्तम नगरमें निवास करके श्रीमान् पुरुषप्रवर युधिष्ठिरको कुरुकुल-शिरोमणि भीष्मजीके बताये हुए समयका स्मरण हो आया ॥ ५ ॥
स निर्ययौ गजपुराद् याजकैः परिवारितः । दृष्ट्वा निवृत्तमादित्यं प्रवृत्तं चोत्तरायणम् ॥ ६ ॥ उन्होंने यह देखकर कि सूर्यदेव दक्षिणायनसे निवृत्त हो गये और उत्तरायणपर आ गये, याजकोंसे घिरकर हस्तिनापुरसे बाहर निकले ॥ ६ ॥
घृतं माल्यं च गन्धांश्च क्षौमाणि च युधिष्ठिरः । चन्दनागुरुमुख्यानि तथा कालीयकान्यपि ॥ ७ ॥ प्रस्थाप्य पूर्वं कौन्तेयो भीष्मसंस्करणाय वै । माल्यानि च वरार्हाणि रत्नानि विविधानि च ॥ ८ ॥ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भीष्मजीका दाह-संस्कार करनेके लिये पहले ही घृत, माल्य, गन्ध, रेशमी वस्त्र, चन्दन, अगुरु, काला चन्दन, श्रेष्ठ पुरुषके धारण करनेयोग्य मालाएँ तथा नाना प्रकारके रत्न भेज दिये थे ॥ ७-८ ॥
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गान्धारीं च यशस्विनीम् । मातरं च पृथां धीमान् भ्रातृंश्च पुरुषर्षभान् ॥ ९ ॥ जनार्दनेनानुगतो विदुरेण च धीमता । युयुत्सुना च कौरव्यो युयुधानेन वा विभो ॥ १० ॥ विभो! कुरुकुलनन्दन बुद्धिमान् युधिष्ठिर राजा धृतराष्ट्र, यशस्विनी गान्धारी देवी, माता कुन्ती तथा पुरुषप्रवर भाइयोंको आगे करके पीछेसे भगवान् श्रीकृष्ण, बुद्धिमान् विदुर, युयुत्सु तथा सात्यकिको साथ लिये चल रहे थे ॥ ९-१० ॥
महता राजभोगेन पारिबर्हेण संवृतः । स्तूयमानो महातेजा भीष्मस्याग्नीननुव्रजन् ॥ ११ ॥ वे महातेजस्वी नरेश विशाल राजोचित उपकरण तथा वैभवके भारी ठाट-बाटसे सम्पन्न थे, उनकी स्तुतिकी जा रही थी और वे भीष्मजीके द्वारा स्थापित की हुई त्रिविध अग्नियोंको आगे रखकर स्वयं पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ ११ ॥
निश्चक्राम पुरात् तस्माद् यथा देवपतिस्तथा । आससाद कुरुक्षेत्रे ततः शान्तनवं नृपः ॥ १२ ॥ वे देवराज इन्द्रकी भाँति अपनी राजधानीसे बाहर निकले और यथासमय कुरुक्षेत्रमें शान्तनुनन्दन भीष्मजीके पास जा पहुँचे ॥ १२ ॥
उपास्यमानं व्यासेन पाराशर्येण धीमता । नारदेन च राजर्षे देवलेनासितेन च ॥ १३ ॥ राजर्षे! उस समय वहाँ पराशरनन्दन बुद्धिमान् व्यास, देवर्षि नारद और असित देवल ऋषि उनके पास बैठे थे ॥ १३ ॥
हतशिष्टैर्नृपैश्चान्यैर्नानादेशसमागतैः । रक्षिभिश्च महात्मानं रक्ष्यमाणं समन्ततः ॥ १४ ॥
नाना देशोंसे आये हुए नरेश, जो मरनेसे बच गये थे, रक्षक बनकर चारों ओरसे महात्मा भीष्मकी रक्षा करते थे ॥ १४ ॥
शयानं वीरशयने ददर्श नृपतिस्ततः ।
ततो रथादवातीर्य भ्रातृभिः सह धर्मराट् ॥ १५ ॥
धर्मराज राजा युधिष्ठिर दूरसे ही बाणशय्यापर सोये हुए भीष्मजीको देखकर भाइयोंसहित रथसे उतर पड़े ॥ १५ ॥
अभिवाद्याथ कौन्तेयः पितामहमरिंदम ।
द्वैपायनादीन् विप्रांश्च तैश्च प्रत्यभिनन्दितः ॥ १६ ॥
शत्रुदमन नरेश! कुन्तीकुमारने सबसे पहले पितामहको प्रणाम किया। उसके बाद व्यास आदि ब्राह्मणोंको मस्तक झुकाया। फिर उन सबने भी उनका अभिनन्दन किया ॥ १६ ॥
ऋत्विग्भिर्ब्रह्मकल्पैश्च भ्रातृभिः सह धर्मजः ।
आसाद्य शरतल्पस्थमृषिभिः परिवारितम् ॥ १७ ॥
अब्रवीद् भरतश्रेष्ठं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भ्रातृभिः सह कौरव्यः शयानं निम्नगासुतम् ॥ १८ ॥
तदनन्तर कुरुनन्दनके धर्मपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ब्रह्माजीके समान तेजस्वी ऋत्विजों, भाइयों तथा ऋषियोंसे घिरे और बाण-शय्यापर सोये हुए भरतश्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्मजीसे भाइयोंसहित इस प्रकार बोले— ॥ १७-१८ ॥
युधिष्ठिरोऽहं नृपते नमस्ते जाह्नवीसूत ।
शृणोषि चेन्महाबाहो ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ १९ ॥
‘गंगानन्दन! नरेश्वर! महाबाहो! मैं युधिष्ठिर आपकी सेवामें उपस्थित हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। यदि आपको मेरी बात सुनायी देती हो तो आज्ञा दीजिये कि मैं आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ १९ ॥
प्राप्तोऽस्मि समये राजन्नग्नीनादाय ते विभो ।
आचार्यान् ब्राह्मणांश्चैव ऋत्विजो भ्रातरश्च मे ॥ २० ॥
‘राजन्! प्रभो! आपकी अग्नियों और आचार्यों, ब्राह्मणों तथा ऋत्विजोंको साथ लेकर मैं अपने भाइयोंके साथ ठीक समयपर आ पहुँचा हूँ ॥ २० ॥
पुत्रश्च ते महातेजा धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।
उपस्थितः सहामात्यो वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥ २१ ॥
‘आपके पुत्र महातेजस्वी राजा धृतराष्ट्र भी अपने मन्त्रियोंके साथ उपस्थित हैं और महापराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण भी यहाँ पधारे हुए हैं ॥ २१ ॥
हतशिष्टाश्च राजानः सर्वे च कुरुजांगलाः ।
तान् पश्य नरशार्दूल समुन्मीलय लोचने ॥ २२ ॥
‘पुरुषसिंह! युद्धमें मरनेसे बचे हुए समस्त राजा और कुरुजांगल देशकी प्रजा भी उपस्थित है। आप आँखें खोलिये और इन सबको देखिये ।। २२ ।। यच्चेह किंचित् कर्तव्यं तत्सर्वं प्रापितं मया । यथोक्तं भवता काले सर्वमेव च तत् कृतम् ।। २३ ।। ‘आपके कथनानुसार इस समयके लिये जो कुछ संग्रह करना आवश्यक था, वह सब जुटाकर मैंने यहाँ पहुँचा दिया है। सभी उपयोगी वस्तुओंका प्रबन्ध कर लिया गया है’ ।। २३ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु गाङ्गेयः कुन्तीपुत्रेण धीमता । ददर्श भारतान् सर्वान् स्थितान् सम्परिवार्य ह ।। २४ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! परम बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर गंगानन्दन भीष्मजीने आँखें खोलकर अपनेको सब ओरसे घेरकर खड़े हुए सम्पूर्ण भरतवंशियोंको देखा ।। २४ ।। ततश्च तं बली भीष्मः प्रगृह्य विपुलं भुजम् । उद्यन्मेघस्वरो वाग्मी काले वचनमब्रवीत् ।। २५ ।। फिर प्रवचनकुशल बलवान् भीष्मने युधिष्ठिरकी विशाल भुजा हाथमें लेकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें यह समयोचित वचन कहा— ।। २५ ।। दिष्ट्या प्राप्तोऽसि कौन्तेय सहामात्यो युधिष्ठिर । परिवृत्तो हि भगवान् सहस्रांशुर्दिवाकरः ।। २६ ।। ‘कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! सौभाग्यकी बात है कि तुम मन्त्रियोंसहित यहाँ आ गये। सहस्र किरणोंसे सुशोभित भगवान् सूर्य अब दक्षिणायनसे उत्तरायणकी ओर लौट चुके हैं ।। २६ ।। अष्टपञ्चाशतं रात्र्यः शयानस्याद्य मे गताः । शरेषु निशिताग्रेषु यथा वर्षशतं तथा ।। २७ ।। ‘इन तीखे अग्रभागवाले बाणोंकी शय्यापर शयन करते हुए आज मुझे अट्ठावन दिन हो गये; किंतु ये दिन मेरे लिये सौ वर्षोंके समान बीते हैं ।। २७ ।। माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर । त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ।। २८ ।। ‘युधिष्ठिर! इस समय चान्द्रमासके अनुसार माघका महीना प्राप्त हुआ है। इसका यह शुक्लपक्ष चल रहा है, जिसका एक भाग बीत चुका है और तीन भाग बाकी है (शुक्लपक्षसे मासका आरम्भ माननेपर आज माघ शुक्ला अष्टमी प्रतीत होती है)’ ।। २८ ।। एवमुक्त्वा तु गाङ्गेयो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
धृतराष्ट्रमामन्त्र्य काले वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥ धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर गंगानन्दन भीष्मने धृतराष्ट्रको पुकारकर उनसे यह समयोचित वचन कहा— ॥ २९ ॥
भीष्म उवाच
राजन् विदितधर्मोऽसि सुनिर्णीतार्थसंशयः । बहुश्रुता हि ते विप्रा बहवः पर्युपासिताः ॥ ३० ॥ **भीष्मजी बोले—**राजन्! तुम धर्मको अच्छी तरह जानते हो। तुमने अर्थतत्त्वका भी भलीभाँति निर्णय कर लिया है। अब तुम्हारे मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है; क्योंकि तुमने अनेक शास्त्रोंका ज्ञान रखनेवाले बहुत-से विद्वान् ब्राह्मणोंकी सेवा की है—उनके सत्संगसे लाभ उठाया है ॥ ३० ॥
वेदशास्त्राणि सर्वाणि धर्मांश्च मनुजेश्वर । वेदांश्च चतुरः सर्वान् निखिलेनानुबुद्ध्यसे ॥ ३१ ॥ मनुजेश्वर! तुम चारों वेदों, सम्पूर्ण शास्त्रों और धर्मोंका रहस्य पूर्णरूपसे जानते और समझते हो ॥ ३१ ॥
न शोचितव्यं कौरव्य भवितव्यं हि तत् तथा । श्रुतं देवरहस्यं ते कृष्णद्वैपायनादपि ॥ ३२ ॥ कुरुनन्दन! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। जो कुछ हुआ है, वह अवश्यम्भावी था। तुमने श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजीसे देवताओंका रहस्य भी सुन लिया है (उसीके अनुसार महाभारतयुद्धकी सारी घटनाएँ हुई हैं) ॥ ३२ ॥
यथा पाण्डोः सुता राजंस्तथैव तव धर्मतः । तान् पालय स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतान् ॥ ३३ ॥ ये पाण्डव जैसे राजा पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही धर्मकी दृष्टिसे तुम्हारे भी हैं। ये सदा गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहते हैं। तुम धर्ममें स्थित रहकर अपने पुत्रोंके समान ही इनका पालन करना ॥ ३३ ॥
धर्मराजो हि शुद्धात्मा निदेशे स्थास्यते तव । आनृशंस्यपरं ह्येनं जानामि गुरुवत्सलम् ॥ ३४ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरका हृदय बहुत ही शुद्ध है। ये सदा तुम्हारी आज्ञाके अधीन रहेंगे। मैं जानता हूँ, इनका स्वभाव बहुत ही कोमल है और ये गुरुजनोंके प्रति बड़ी भक्ति रखते हैं ॥ ३४ ॥
तव पुत्रा दुरात्मानः क्रोधलोभपरायणाः । ईर्ष्याभिभूता दुर्वृत्तास्तान् न शोचितुमर्हसि ॥ ३५ ॥
तुम्हारे पुत्र बड़े दुरात्मा, क्रोधी, लोभी, ईर्ष्याके वशीभूत तथा दुराचारी थे। अतः उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥ ३५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा वचनं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ।
वासुदेवं महाबाहुमभ्यभाषत कौरवः ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मनीषी धृतराष्ट्रसे ऐसा वचन कहकर कुरुवंशी भीष्मने महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा ॥ ३६ ॥
भीष्म उवाच
भगवन् देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत ।
त्रिविक्रम नमस्तुभ्यं शङ्खचक्रगदाधर ॥ ३७ ॥
भीष्मजी बोले—भगवन्! देवदेवेश्वर! देवता और असुर सभी आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापनेवाले तथा शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले नारायणदेव! आपको नमस्कार है ॥ ३७ ॥
वासुदेवो हिरण्यात्मा पुरुषः सविता विराट् ।
जीवभूतोऽनुरूपस्त्वं परमात्मा सनातनः ॥ ३८ ॥
आप वासुदेव, हिरण्यात्मा, पुरुष, सविता, विराट्, अनुरूप, जीवात्मा और सनातन परमात्मा हैं ॥ ३८ ॥
त्रायस्व पुण्डरीकाक्ष पुरुषोत्तम नित्यशः ।
अनुजानीहि मां कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम ॥ ३९ ॥
कमलनयन श्रीकृष्ण! पुरुषोत्तम! वैकुण्ठ! आप सदा मेरा उद्धार करें। अब मुझे जानेकी आज्ञा दें ॥ ३९ ॥
रक्ष्याश्च ते पाण्डवेया भवान् येषां परायणम् ।
उक्तवानस्मि दुर्बुद्धिं मन्दं दुर्योधनं तदा ॥ ४० ॥
‘यतः कृष्णस्ततो धर्मो’ यतो धर्मस्ततो जयः ।
वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवैः ॥ ४१ ॥
संधानस्य परः कालस्तवेति च पुनः पुनः ।
न च मे तद् वचो मूढः कृतवान् स सुमन्दधीः ।
घातयित्वेह पृथिवीं ततः स निधनं गतः ॥ ४२ ॥
प्रभो! आप ही जिनके परम आश्रय हैं, उन पाण्डवोंकी सदा आपको रक्षा करनी चाहिये। मैंने दुर्बुद्धि एवं मन्द दुर्योधनसे कहा था कि ‘जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, उसी पक्षकी जय होगी; इसलिये बेटा दुर्योधन! तुम भगवान् श्रीकृष्णकी सहायतासे पाण्डवोंके साथ सन्धि कर लो। यह सन्धिके लिये बहुत उत्तम अवसर आया
है।' इस प्रकार बार-बार कहनेपर भी उस मन्दबुद्धि मूढ़ने मेरी वह बात नहीं मानी और सारी पृथ्वीके वीरोंका नाश कराकर अन्तमें वह स्वयं भी कालके गालमें चला गया ॥ ४०—४२ ॥
त्वां तु जानाम्यहं देवं पुराणमृषिसत्तमम् । नरेण सहितं देव बदर्यां सुचिरोषितम् ॥ ४३ ॥ देव! मैं आपको जानता हूँ। आप वे ही पुरातन ऋषि नारायण हैं, जो नरके साथ चिरकालतक बदरिकाश्रममें निवास करते रहे हैं ॥ ४३ ॥
तथा मे नारदः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः । नरनारायणावेतौ सम्भूतौ मनुजेष्विति ॥ ४४ ॥ देवर्षि नारद तथा महातपस्वी व्यासजीने भी मुझसे कहा था कि ये श्रीकृष्ण और अर्जुन साक्षात् भगवान् नारायण और नर हैं, जो मानव-शरीरमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४४ ॥
स मां त्वमनुजानीहि कृष्ण मोक्ष्ये कलेवरम् । त्वयाहं समनुज्ञातो गच्छेयं परमां गतिम् ॥ ४५ ॥ श्रीकृष्ण! अब आप आज्ञा दीजिये, मैं इस शरीरका परित्याग करूँगा। आपकी आज्ञा मिलनेपर मुझे परम गतिकी प्राप्ति होगी ॥ ४५ ॥
वासुदेव उवाच
अनुजानामि भीष्म त्वां वसून् प्राप्नुहि पार्थिव । न तेऽस्ति वृजिनं किंचिदिहलोके महाद्युते ॥ ४६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पृथ्वीपालक महातेजस्वी भीष्मजी! मैं आपको (सहर्ष) आज्ञा देता हूँ। आप वसुलोकको जाइये। इस लोकमें आपके द्वारा अणुमात्र भी पाप नहीं हुआ है ॥ ४६ ॥
पितृभक्तोऽसि राजर्षे मार्कण्डेय इवापरः । तेन मृत्युस्तव वशे स्थितो भृत्य इवानतः ॥ ४७ ॥ राजर्षे! आप दूसरे मार्कण्डेयके समान पितृभक्त हैं; इसलिये मृत्यु विनीत दासीके समान आपके वशमें हो गयी है ॥ ४७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु गाङ्गेयः पाण्डवानिदमब्रवीत् । धृतराष्ट्रमुखांश्चापि सर्वांश्च सुहृदस्तथा ॥ ४८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान्के ऐसा कहनेपर गंगानन्दन भीष्मने पाण्डवों तथा धृतराष्ट्र आदि सभी सुहृदोंसे कहा— ॥ ४८ ॥
प्राणानुत्स्रष्टुमिच्छामि तत्रानुज्ञातुमर्हथ । सत्येषु यतितव्यं वः सत्यं हि परमं बलम् ॥ ४९ ॥
‘अब मैं प्राणोंका परित्याग करना चाहता हूँ। तुम सब लोग इसके लिये मुझे आज्ञा दो। तुम्हें सदा सत्य धर्मके पालनका प्रयत्न करते रहना चाहिये; क्योंकि सत्य ही सबसे बड़ा बल है ।। ४९ ।।
आनृशंस्यपरैर्भाव्यं सदैव नियतात्मभिः ।
ब्रह्मण्यैर्धर्मशीलैश्च तपोनित्यैश्च भारताः ।। ५० ।।
‘भरतवंशियो! तुमलोगोंको सबके साथ कोमलताका बर्ताव करना, सदा अपने मन और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखना तथा ब्राह्मणभक्त, धर्मनिष्ठ एवं तपस्वी होना चाहिये’ ।। ५० ।।
इत्युक्त्वा सुहृदः सर्वान् सम्परिष्वज्य चैव ह ।
पुनरेवाब्रवीद् धीमान् युधिष्ठिरमिदं वचः ।। ५१ ।।
ब्राह्मणाश्चैव ते नित्यं प्राज्ञाश्चैव विशेषतः ।
आचार्या ऋत्विजश्चैव पूजनीया जनाधिप ।। ५२ ।।
ऐसा कहकर बुद्धिमान् भीष्मजीने अपने सब सुहृदोंको गले लगाया और युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार कहा—‘युधिष्ठिर! तुम्हें सामान्यतः सभी ब्राह्मणोंकी विशेषतः विद्वानोंकी और आचार्य तथा ऋत्विजोंकी सदा ही पूजा करनी चाहिये’ ।। ५१-५२ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि भीष्मस्वर्गारोहणपर्वणि दानधर्मे
सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत भीष्मस्वर्गारोहणपर्वमें दानधर्मविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६७ ।।
१६८-
अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
भीष्मजीका प्राणत्याग, धृतराष्ट्र आदिके द्वारा उनका दाह-संस्कार, कौरवोंका गंगाके जलसे भीष्मको जलांजलि देना, गंगाजीका प्रकट होकर पुत्रके लिये शोक करना और श्रीकृष्णका उन्हें समझाना
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा कुरून् सर्वान् भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
तूष्णीं बभूव कौरव्यः स मुहूर्तमरिंदम ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुदमन जनमेजय! समस्त कौरवोंसे ऐसा कहकर कुरुश्रेष्ठ शान्तनुनन्दन भीष्मजी दो घड़ीतक चुपचाप पड़े रहे ॥ १ ॥
धारयामास चात्मानं धारणासु यथाक्रमम् ।
तस्योर्ध्वमगमन् प्राणाः संनिरुद्धा महात्मनः ॥ २ ॥
तदनन्तर वे मनसहित प्राणवायुको क्रमशः भिन्न-भिन्न धारणाओंमें स्थापित करने लगे। इस तरह यौगिक क्रियाद्वारा रोके हुए महात्मा भीष्मजीके प्राण क्रमशः ऊपर चढ़ने लगे ॥ २ ॥
इदमाश्चर्यमासीच्च मध्ये तेषां महात्मनाम् ।
सहितैर्ऋषिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिः प्रभो ॥ ३ ॥
यद्यन्मुञ्चति गात्रं हि स शान्तनुसुतस्तदा ।
तत् तद् विशल्यं भवति योगयुक्तस्य तस्य वै ॥ ४ ॥
प्रभो! उस समय वहाँ एकत्र हुए सभी संत-महात्माओंके बीच एक बड़े आश्चर्यकी घटना घटी। व्यास आदि सब महर्षियोंने देखा कि योगयुक्त हुए शान्तनुनन्दन भीष्मके प्राण उनके जिस-जिस अंगको त्यागकर ऊपर उठते थे, उस-उस अंगके बाण अपने-आप निकल जाते और उनका घाव भर जाता था ॥ ३-४ ॥
क्षणेन प्रेक्षतां तेषां विशल्यः सोऽभवत् तदा ।
तद् दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे वासुदेवपुरोगमाः ॥ ५ ॥
सह तैर्मुनिभिः सर्वैस्तदा व्यासादिभिर्नृप ।
नरेश्वर! इस प्रकार सबके देखते-देखते भीष्मजीका शरीर क्षणभरमें बाणोंसे रहित हो गया। यह देखकर व्यास आदि समस्त मुनियोंसहित भगवान् श्रीकृष्ण आदिको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ५ ½ ॥
संनिरुद्धस्तु तेनात्मा सर्वेष्वायतनेषु च ॥ ६ ॥
जगाम भित्त्वा मूर्धानं दिवमभ्युत्पपात ह ।
भीष्मजीने अपने देहके सभी द्वारोंको बंद करके प्राणोंको सब ओरसे रोक लिया था; इसलिये वह उनका मस्तक (ब्रह्मरन्ध्र) फोड़कर आकाशमें चला गया ॥ ६ १/२ ॥
देवदुन्दुभिनादश्च पुष्पवर्षैः सहाभवत् ॥ ७ ॥
सिद्धा ब्रह्मर्षयश्चैव साधु साध्विति हर्षिताः ।
उस समय देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और साथ ही दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। सिद्धों तथा ब्रह्मर्षियोंको बड़ा हर्ष हुआ। वे भीष्मजीको साधुवाद देने लगे ॥ ७ १/२ ॥
महोल्केव च भीष्मस्य मूर्धदेशाज्जनाधिप ॥ ८ ॥
निःसृत्याकाशमाविश्य क्षणेनान्तरधीयत ।
जनेश्वर! भीष्मजीका प्राण उनके ब्रह्मरन्ध्रसे निकलकर बड़ी भारी उल्काकी भाँति आकाशमें उड़ा और क्षणभरमें अन्तर्धान हो गया ॥ ८ १/२ ॥
एवं स राजशार्दूल नृपः शान्तनवस्तदा ॥ ९ ॥
समयुज्यत कालेन भरतानां कुलोद्वहः ।
नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार भरतवंशका भार वहन करनेवाले शान्तनुनन्दन राजा भीष्म कालके अधीन हुए ॥ ९ १/२ ॥
ततस्त्वादाय दारूणि गन्धांश्च विविधान् बहून् ॥ १० ॥
चितां चक्रमहात्मानः पाण्डवा विदुरस्तथा ।
युयुत्सुश्चापि कौरव्य प्रेक्षकास्त्वितरेऽभवन् ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! तदनन्तर बहुत-से काष्ठ और नाना प्रकारके सुगन्धित द्रव्य लेकर महात्मा पाण्डव, विदुर और युयुत्सुने चिता तैयार की और शेष सब लोग अलग खड़े होकर देखते रहे ॥ १०-११ ॥
युधिष्ठिरश्च गाङ्गेयं विदुरश्च महामतिः ।
छादयामासतुरुभौ क्षौमैर्माल्यैश्च कौरवम् ॥ १२ ॥
राजा युधिष्ठिर और परम बुद्धिमान् विदुर इन दोनोंने रेशमी वस्त्रों और मालाओंसे कुरुनन्दन गंगापुत्र भीष्मको आच्छादित किया और चितापर सुलाया ॥ १२ ॥
धारयामास तस्याथ युयुत्सुश्छत्रमुत्तमम् ।
चामरव्यजने शुभ्रे भीमसेनार्जुनावुभौ ॥ १३ ॥
उस समय युयुत्सुने उनके ऊपर उत्तम छत्र लगाया और भीमसेन तथा अर्जुन श्वेत चँवर एवं व्यजन डुलाने लगे ॥ १३ ॥
उष्णीषे परिगृह्णीतां माद्रीपुत्रावुभौ तथा ।
स्त्रियः कौरवनाथस्य भीष्मं कुरुकुलोद्वहम् ॥ १४ ॥
तालवृन्तान्युपादाय पर्यवीजन्त सर्वशः ।
माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने पगड़ी हाथमें लेकर भीष्मजीके मस्तकपर रखी। कौरवराजके रनिवासकी स्त्रियाँ ताड़के पंखे हाथमें लेकर कुरुकुलधुरन्धर भीष्मजीके शवको सब ओरसे हवा करने लगीं ॥ १४ १/२ ॥
ततोऽस्य विधिवच्चक्रुः पितृमेधं महात्मनः ॥ १५ ॥
यजनं बहुशश्चाग्नौ जगुः सामानि सामगाः ।
ततश्चन्दनकाष्ठैश्च तथा कालीयकैरपि ॥ १६ ॥
कालागुरुप्रभृतिभिर्गन्धैश्चोच्चावचैस्तथा ।
समवच्छाद्य गाङ्गेयं सम्प्रज्वाल्य हुताशनम् ॥ १७ ॥
अपसव्यमकुर्वन्त धृतराष्ट्रमुखाश्चिताम् ।
तदनन्तर पाण्डवोंने विधिपूर्वक महात्मा भीष्मका पितृमेध कर्म सम्पन्न किया। अग्निमें बहुत-सी आहुतियाँ दी गयीं। साम-गान करनेवाले ब्राह्मण साममन्त्रोंका गान करने लगे तथा धृतराष्ट्र आदिने चन्दनकी लकड़ी, कालीचन्दन और सुगन्धित वस्तुओंसे भीष्मके शरीरको आच्छादित करके उनकी चितामें आग लगा दी। फिर धृतराष्ट्र आदि सब कौरवोंने इस जलती हुई चिताकी प्रदक्षिणा की ॥ १५—१७ १/२ ॥
संस्कृत्य च कुरुश्रेष्ठं गाङ्गेयं कुरुसत्तमाः ॥ १८ ॥
जग्मुर्भागीरथीं पुण्यामृषिजुष्टां कुरूद्वहाः ।
अनुगम्यमाना व्यासेन नारदेनासितेन च ॥ १९ ॥
कृष्णेन भरतस्त्रीभिर्ये च पौराः समागताः ।
उदकं चक्रिरे चैव गाङ्गेयस्य महात्मनः ॥ २० ॥
विधिवत् क्षत्रियश्रेष्ठाः स च सर्वो जनस्तदा ।
इस प्रकार कुरुश्रेष्ठ भीष्मजीका दाह-संस्कार करके समस्त कौरव अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर ऋषि-मुनियोंसे सेवित परम पवित्र भागीरथीके तटपर गये। उनके साथ महर्षि व्यास, देवर्षि नारद, असित, भगवान् श्रीकृष्ण तथा नगरनिवासी मनुष्य भी पधारे थे। वहाँ पहुँचकर उन क्षत्रियशिरोमणियों और अन्य सब लोगोंने विधिपूर्वक महात्मा भीष्मको जलांजलि दी ॥ १८—२० १/२ ॥
ततो भागीरथी देवी तनयस्योदके कृते ॥ २१ ॥
उत्थाय सलिलात् तस्माद् रुदती शोकविह्वला ।
परिदेवयती तत्र कौरवानभ्यभाषत ॥ २२ ॥
निबोधत यथावृत्तमुच्यमानं मयानघाः ।
राजवृत्तेन सम्पन्नः प्रज्ञयाभिजनेन च ॥ २३ ॥
उस समय कौरवोंद्वारा अपने पुत्र भीष्मको जलांजलि देनेका कार्य पूरा हो जानेपर भगवती भागीरथी जलके ऊपर प्रकट हुई और शोकसे विह्वल हो रोदन एवं विलाप करती हुई कौरवोंसे कहने लगी—'निष्पाप पुत्रगण! मैं जो कहती हूँ, उस बातको यथार्थरूपसे
सुनो। भीष्म राजोचित सदाचारसे सम्पन्न थे। वे उत्तम बुद्धि और श्रेष्ठ कुलसे सम्पन्न थे॥ २१—२३॥ सत्कर्ता कुरुवृद्धानां पितृभक्तो महाव्रतः। जामदग्न्येन रामेण यः पुरा न पराजितः॥ २४॥ दिव्यैरस्त्रैर्महावीर्यः स हतोऽद्य शिखण्डिना। ‘महान् व्रतधारी भीष्म कुरुकुलवृद्ध पुरुषोंके सत्कार करनेवाले और अपने पिताके बड़े भक्त थे। हाय! पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुराम भी अपने दिव्य अस्त्रोंद्वारा जिस मेरे महापराक्रमी पुत्रको पराजित न कर सके, वह इस समय शिखण्डीके हाथसे मारा गया। यह कितने कष्टकी बात है॥ २४ १/२॥ अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम पार्थिवाः॥ २५॥ अपश्यन्त्याः प्रियं पुत्रं यन्न दीर्यति मेऽद्य वै। ‘राजाओ! अवश्य ही मेरा हृदय पत्थर और लोहेका बना हुआ है, तभी तो अपने प्रिय पुत्रको जीवित न देखकर भी आज यह फट नहीं जाता है॥ २५ १/२॥ समेतं पार्थिवं क्षत्रं काशिपुर्यां स्वयंवरे॥ २६॥ विजित्यैकरथेनैव कन्याश्चायं जहार ह। ‘काशीपुरीके स्वयंवरमें समस्त भूमण्डलके क्षत्रिय एकत्र हुए थे, किंतु भीष्मने एकमात्र रथकी ही सहायतासे उन सबको जीतकर काशिराजकी तीनों कन्याओंका अपहरण किया था॥ २६ १/२॥ यस्य नास्ति बले तुल्यः पृथिव्यामपि कश्चन॥ २७॥ हतं शिखण्डिना श्रुत्वा न विदीर्येत यन्मनः। ‘हाय! इस पृथ्वीपर बलमें जिसकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है, उसीको शिखण्डीके हाथसे मारा गया सुनकर आज मेरी छाती क्यों नहीं फट जाती॥ २७ १/२॥ जामदग्न्यः कुरुक्षेत्रे युधि येन महात्मना॥ २८॥ पीडितो नातियत्नेन स हतोऽद्य शिखण्डिना। ‘जिस महामना वीरने जमदग्निनन्दन परशुरामको कुरुक्षेत्रके युद्धमें अनायास ही पीड़ित कर दिया था, वही शिखण्डीके हाथसे मारा गया, यह कितने दुःखकी बात है’॥ २८ १/२॥ एवंविधं बहु तदा विलपन्तीं महानदीम्॥ २९॥ आश्वासयामास तदा गङ्गां दामोदरो विभुः।
अध्याय (पृष्ठ 1564)
श्रीकृष्ण और व्यासजीके द्वारा पुत्र-शोकाकुला गङ्गाजीको सान्त्वना