भारतकोश
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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

ग्यारहवां अध्याय । ४३३

ग्यारहवां अध्याय । ४३३ अनुक्तनिष्कृतीनां तु पापानामपनुत्तये। शक्तिं चावेक्ष्य पापं च प्रायश्चित्तं प्रकल्पयेत्॥२१०॥ यैरभ्युपायैरेनांसि मानवो व्यपकर्षति । तान्वोऽभ्युपायानूवक्ष्यामिदेवर्षिपितृसेवितान् ॥२११॥ त्र्यहं प्रातस्त्र्यहं सायं त्र्यहमद्यादयाचितम् । त्र्यहं परं च नाश्नीयात्प्राजापत्यं चरन् द्विजः ॥२१२॥ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् । एकरात्रोपवासश्च कृच्छ्रं सान्तपनं स्मृतम् ॥ २१३ ॥ एकैकं ग्रासमश्नीयात् त्र्यहाणि त्रीणि पूर्ववत् । त्र्यहं चोपवसेदन्त्यमतिकृच्छ्रं चरन् द्विजः ॥ ॥ २१४॥ तप्तकृच्छ्रं चरन् विप्रो जलक्षीरघृतानिलान् । प्रतित्र्यहं पिबेदुष्णान् सकृत्स्नायी समाहितः ॥२१५॥ यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम् । पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः ॥ २१६ ॥ ब्राह्मण के ऊपर मारने के लिए लकड़ी उठाकर प्राजापत्य, मारने पर अतिकृच्छ्र और रुधिर निकलने पर कृच्छ्रातिकृच्छ्र व्रत करे। जिन दोषों का प्रायश्चित्त नहीं कहा है उनका शक्ति और पाप विचार कर प्रायश्चित्त नियत करे। मनुष्य जिन उपायों से पाप नष्ट करता है उन देवर्षि और पितरों के सेवित उपायों को तुम से कहता हूं । प्राजापत्य-व्रत करनेवाला द्विज तीन दिन प्रातः- काल और तीन दिन सायंकाल और तीन दिन बिना मांगा अन्न खावे और तीन दिन व्रत करे यों बारह दिनका होता है। एक दिन गोमूत्र, गोबर, दूध, दही, घी और कुशका जल मिलाकर खाय और एक रात्रिका उपवास करे तब 'कृच्छ्र-सान्तपन' होता है। तीन ५५

४३४ मनुस्मृति । दिन प्रातःकाल एक एक ग्रास खाय, दूसरे दिन सायंकाल को एक एक ग्रास खाय, तीसरे दिन बिना मांगा एक एक ग्रास खाय और अन्त के तीन दिन उपवास करे यह अतिकृच्छ्र कहलाता है। तप्तकृच्छ्र करनेवाला द्विज एक बार स्नान करे और तीन दिन गरम जल तीन दिन गरम दूध तीन दिन गरम घी और तीन दिन वायु का पान करे। जितेन्द्रिय होकर बारह दिन भोजन न करना 'पराक' नामक कृच्छ्र है। यह सब पापों को दूर कर देता है॥२०६-२१६॥ एकैकं ह्रासयेत् पिण्डं कृष्णे शुक्ले च वर्धयेत् । उपस्पृशंस्त्रिषवणमेतच्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ २१७ ॥ एतमेव विधिं कृत्स्नमाचरेद्यवमध्यमे । शुक्लपक्षादिनियतश्चरंश्चान्द्रायणं व्रतम् ॥ २१८ ॥ अष्टावष्टौ समश्नीयात् पिण्डान् मध्यंदिने स्थिते । नियतात्मा हविष्याशी यतिश्चान्द्रायणं चरन् ॥ २१९॥ चतुरः प्रातरश्नीयात् पिण्डान् विप्रः समाहितः । चतुरोऽस्तमिते सूर्ये शिशुश्चान्द्रायणं स्मृतम् ॥ २२०॥ यथाकथंचित् पिण्डानां तिस्रोऽशीतीः समाहितः । मासेनाश्नन् हविष्यस्य चन्द्रस्यैति सलोकताम् ॥ २२१॥ एतद्रुद्रास्तथादित्या वसवश्चाचरन् व्रतम् । सर्वाकुशलमोक्षाय मरुतश्च महर्षिभिः ॥ २२२ ॥ महाव्याहृतिभिर्होमः कर्तव्यः स्वयमन्वहम् । अहिंसा सत्यमक्रोधमार्जवं च समाचरेत् ॥ २२३ ॥ त्रिरहस्त्रिर्निशायां च सवासा जलमाविशेत् । स्त्रीशूद्रपतितांश्चैव नाभिभाषेत कर्हिचित् ॥ २२४ ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४३५

ग्यारहवां अध्याय । ४३५ तीन समय स्नान करे, कृष्णपक्ष में एक एक ग्रास घटावे, शुक्लपक्ष में एक एक ग्रास बढ़ावे यह चान्द्रायण व्रत कहलाता है। 'यवमध्यम' व्रत में शुक्लपक्ष से नियमपूर्वक चान्द्रायणव्रत करता हुआ इन्हीं सब विधियों को करे। 'यतिचान्द्रायण' करनेवाला, नित्य दोपहर में हविष्यान्न के आठ आठ ग्रास खावे और नियमसे रहे। चार ग्रास प्रातःकाल और चार ग्रास सूर्यास्त में खाय, यह 'शिशुचान्द्रायण' व्रत है। एक मास में हविष्यान्न के दोसौ चालीस २४० ग्रास खाने से चन्द्रलोक प्राप्त होता है। रुद्र, आदित्य, वसु, मरुत और महर्षियों ने सब पापों के नाशार्थ इस व्रत को किया था। यह व्रत करनेवाला पुरुष प्रतिदिन स्वयं महाव्याहृतियों से हवन करे। और अहिंसा, सत्यभाषण, क्रोध- त्याग और सरलता का बर्ताव करे। तीन बार दिन में और तीन बार रात में सवस्त्र स्नान करे। स्त्री, शूद्र और पतितों से कभी बातचीत न करे ॥ २१७-२२४ ॥ स्थानासनाभ्यां विहरेदशक्तोऽधः शयीत वा । ब्रह्मचारी व्रती च स्याद्गुरुदेव द्विजार्थकः ॥ २२५ ॥ सावित्रीं च जपेन्नित्यं पवित्राणि च शक्तितः । सर्वेष्वेव व्रतेष्वेवं प्रायश्चित्तार्थमाहृतः ॥ २२६ ॥ एतैर्द्विजातयः शोध्या व्रतैराविष्कृतैनसः । अनाविष्कृतपापांस्तु मन्त्रैर्होमैश्च शोधयेत् ॥ २२७ ॥ ख्यापनेनानुतापेन तपसाऽध्ययनेन च । पापकृन्मुच्यते पापात् तथा दानेन चापदि ॥ २२८ ॥ यथा यथा नरो धर्मं स्वयं कृतवानुभाषते । तथा तथा त्वचेवाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ २२६ ॥ यथा यथा मनस्तस्य दुष्कृतं कर्म गर्हति ।

४३६ मनुस्मृति। तथा तथा शरीरं तत्तेनाधर्मेण मुच्यते ॥ २३० ॥ कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात् प्रमुच्यते । नैवं कुर्यां पुनरिति निवृत्या पूयते तु सः ॥ २३१ ॥ एवं संचिन्त्य मनसा प्रेत्य कर्मफलोदयम् । मनोवाङ्मूर्तिभिर्नित्यं शुभं कर्म समाचरेत् ॥ २३२ ॥ आसन पर उठा बैठा करे, अशक्त हो तो भूमि पर सोवे और ब्रह्मचारी, व्रती, गुरु, देवता और द्विजोंका पूजक होवे । नित्य यथाशक्ति गायत्री और अघमर्षणादि पवित्र मन्त्रों का जप करे । प्रायश्चित्त के सभी व्रतों में यह विधि मान्य है । पापी द्विजों को इन व्रतों से शुद्ध करे और गुप्त पापियों को ब्राह्मणसभा, मन्त्र जप और होम कराकर शुद्ध करे। पाप करनेवाला पाप प्रकट करने, पश्चात्ताप करने और तप स्वाध्याय करने से और आपत्ति में दानही करने से पाप से छूटता है। मनुष्य जैसे जैसे अपने अधर्म प्रकट करता है वैसे वैसेही उससे छूटता है जैसे सांप केंचुल से अलग होजाता है। जैसे जैसे उसका मन दुष्कृत-कर्म की निंदा करता है वैसे वैसे उसका शरीर अधर्म से छूटता है। पाप करने के बाद संताप करके उससे छूटता है और फिर ऐसा न करूंगा-इस संकल्प से पवित्र होता है। परलोक में कर्म- फल मिलता है, ऐसा मन से विचार कर नित्य मन, वाणी और शरीर से शुभकर्म किया करे ॥ २२५-२३२ ॥ अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानात्कृत्वा कर्म विगर्हितम् । तस्माद्विमुक्तिमन्विच्छन् द्वितीयं न समाचरेत् ॥२३३॥ यस्मिन् कर्मण्यस्य कृते मनसः स्यादलाघवम् । तस्मिंस्तावत्तपः कुर्याद्यावत्तुष्टिकरं भवेत् ॥ २३४ ॥ तपो मूलमिदं सर्वं दैवं मानुषकं सुखम् ।

ग्यारहवां अध्याय । ४३७

ग्यारहवां अध्याय । ४३७ तपो मध्यं बुधैः प्रोक्तं तपोऽन्तं वेददर्शिभिः ॥ २३५ ॥ ब्राह्मणस्य तपो ज्ञानं तपः क्षत्रस्य रक्षणम् । वैश्यस्य तु तपो वार्त्ता तपः शूद्रस्य सेवनम् २३६ ॥ ऋषयः संयतात्मानः फलमूलानिलाशनाः । तपसैव प्रपश्यन्ति त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ २३७ ॥ औषधान्यगदो विद्या दैवी च विविधा स्थितिः । तपसैव प्रसिद्ध्यन्ति तपस्तेषां हि साधनम् ॥ २३८ ॥ यद्दुस्तरं यद्दुरापं यद्दुर्गं यच्च दुष्करम् । सर्वं तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम् ॥ २३६ ॥ महापातकिनश्चैव शेषाश्चाकार्यकारिणः । तपसैव सुतप्तेन मुच्यन्ते किल्विषायततः ॥ २४० ॥ जानकर वा न जानकर निंदित कर्म करके उससे छुटकारा चाहनेवाला फिर दूसरा पापकर्म न करे। पापी के मन में यदि प्रायश्चित्त से संतोष न हो तो जबतक सन्तोष हो तबतक तप करे। देवलोक और मनुष्यलोक के सब सुख तपोमूलक हैं। तप से ही मध्य में और अन्त में सुख मिलता है, यह ऋषियों का मत है। ब्राह्मण का ज्ञान तप है, क्षत्रिय का तप रक्षा है, वैश्य का तप व्यापार है और शूद्र का तप सेवा है। संयमी फल, मूल, पवन का आहार करनेवाले ऋषि तप से ही चराचर विश्व को प्रत्यक्ष देखते हैं। रसायन, औषध, ब्रह्मविद्या और स्वर्गादि लोक में निवास ये सब तप से ही सिद्ध होते हैं। उनके साधन तपही हैं। जो दुस्तर है, दुर्लभ है, दुर्गम है, दुष्कर है, वह सब तप से सिद्ध होजाता है। क्योंकि तप की शक्ति अलङ्घ्य है। महापातकी और उपपातकी सब तप करने सेही उस पाप से छूटते हैं ॥२३३-२४०॥ कीटाश्चाहि पतङ्गाश्च पशवश्च वयांसि च ।

४३८ मनुस्मृति । स्थावराणि च भूतानि दिवं यान्ति तपोबलात्॥२४१॥ यत्किञ्चिदेनः कुर्वन्ति मनोवाङ्‌मूर्त्तिभिर्जनाः । तत्सर्वं निर्दहन्त्याशु तपसैव तपोधनाः ॥ २४२ ॥ तपसैव विशुद्धस्य ब्राह्मणस्य दिवौकसः । इज्याश्च प्रतिगृह्णन्ति कामान् संवर्धयन्ति च॥२४३॥ प्रजापतिरिदं शास्त्रं तपसैवासृजत् प्रभुः । तथैव वेदानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ॥ २४४ ॥ इत्येतत्तपसो देवा महाभाग्यं प्रचक्षते । सर्वस्यास्य प्रपश्यन्तस्तपसः पुण्यमुत्तमम् ॥ २४५ ॥ वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा । नाशयन्त्याशु पापानि महापातकजान्यपि ॥ २४६ ॥ यथैधस्तेजसा वह्निः प्राप्तं निर्दहति क्षणात् । तथा ज्ञानाग्निना पापं सर्वं दहति वेदवित् ॥ २४७ ॥ कीट, सर्प, पतंग, पशु, पक्षी और स्थावर प्राणी भी तपोबल से स्वर्ग को जाते हैं। मनुष्य मन, वाणी और शरीर से जो कुछ पाप करते हैं उन सब को तपोधन ऋषि तप से शीघ्र ही भस्म करदेते हैं। तप से शुद्ध ब्राह्मण के यज्ञबलि को देवता ग्रहण करते हैं और कामनाओं को पूर्ण करते हैं। तपोबल से ही प्रजापति ने इस शास्त्र को रचाथा और ऋषियों ने वेद भी तप से पाया था। सब प्राणियों का तप से उत्तम योनि में जन्म होता है यह देख कर देवगण तप का माहात्म्य करते हैं। प्रतिदिन वेदाध्ययन, पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान, अपराध सहन ये महापातक के भी पापों का शीघ्र नाश कर देते हैं। जैसे अग्नि तेज से ईंधन को जला देता है वैसे वेदविशारद, ज्ञानरूपी अग्नि से सब पाप को जला देता है ॥ २४१-२४७ ॥

ग्यारहवां अध्याय । ४३६

ग्यारहवां अध्याय । ४३६ इत्येतदेत सा मुक्तं प्रायश्चित्तं यथाविधि । अत ऊर्ध्वं रहस्यानां प्रायश्चित्तं निबोधत ॥ २४८ ॥ सव्याहृतिप्रणवकाः प्राणायामास्तु षोडश । अपि भ्रूणहणं मासात्पुनन्त्यहरहः कृताः ॥ २४६ ॥ कौत्सं जप्त्वाप इत्येतद्द्वाशिष्ठं च प्रतीत्यृचम् । माहित्रं शुद्धवत्यश्च सुरापोऽपि विशुद्ध्यति ॥ २५० ॥ सकृज्जप्त्वास्य वामीयं शिवसङ्कल्पमेव च । अपहृत्य सुवर्णं तु क्षणाद्भवति निर्मलः ॥ २५१ ॥ हविष्यन्तीयमभ्यस्य नतमंह इतीति च । जपित्वा पौरुषं सूक्तं मुच्यते गुरुतल्पगः ॥ २५२ ॥ एनसां स्थूलसूक्ष्माणां चिकीर्षन्नपनोदनम् । अवेत्यृचं जपेदब्दं यत्किञ्चेदमितीति वा ॥ २५३ ॥ प्रतिगृह्याप्रतिग्राह्यं भुक्त्वा चान्नं विगर्हितम् । जपंस्तरत्समन्दीयं पूयते मानवस्त्र्यहात् ॥ २५४॥ इस प्रकार पापों का यथाविधि प्रायश्चित्त कहा गया है । अब गुप्त पापों का प्रायश्चित्त सुनो । एक मास तक ॐकार और व्याहृति के साथ सोलह प्राणायाम करने से भ्रूणहत्या से मनुष्य छूट जाता है । 'अपन्नःशुशोचदघम्' इत्यादि ऋग्वेद का कौत्स- सूक्त और 'प्रतिस्तोमेतिरुषसंचशिष्ठा०' इत्यादि वाशिष्ठमंत्र, 'महित्रीणाम्' इत्यादि सूक्त और 'शुद्धवत्य०' इत्यादि ऋचाओं का पाठ करने से सुरापान दोष से मुक्त होजाता है। 'अस्य वां मस्य०' इत्यादि ऋचा के सूक्त और 'शिवसंकल्प०' इत्यादि सूक्त के पाठ से, सुवर्णचोरी के पाप से तुरंत छूट जाता है। 'हविष्याङ्गमजरं०' इत्यादि उन्नीस ऋचा, 'नतमंहोन दुरितं०'

४४० । मनुस्मृति ।

इत्यादि आठ ऋचा और पुरुषसूक्त का एक मास नित्य पाठ करने से गुरुपत्नी संभोग का पाप दूर हो जाता है। महापातक और उपपातकों को दूर करने के लिए 'अव ते हेड़ वरुण०' इत्यादि ऋचा, अथवा 'यत्किञ्चेदं वरुण दैव्ये जने०' इत्यादि ऋचाका एक वर्ष तक जप करे। प्रतिग्रह के अयोग्य का लेने और निंदित अन्न के भोजन का पाप, 'तरत्समन्दिधावति०' इत्यादि चार मंत्र का पाठ तीन दिन करने से दूर होता है ॥ २४८-२५४ ॥

सोमारौद्रं तु बहेना मासमभ्यस्य शुद्धयति । स्रवन्त्यामाचरन्स्नानमर्यम्णामिति चऋचम्॥२५५॥ अब्दार्धमिन्द्रमित्येतदेनस्वी सप्तकं जपेत् । अप्रशस्तं तु कृत्वाप्सु मासमासीत भैक्षभुक्॥२५६॥ मन्त्रैः शाकलहोमीयैरब्दं हुत्वा घृतं द्विजः । सुगुर्वप्यपहन्त्येनो जप्त्वा वा नम इत्यृचम् ॥२५७ ॥ महापातकसंयुक्तोऽनुगच्छेद्गाः समाहितः । अभ्यस्याब्दं पावमानीर्भैक्षाहारो विशुद्ध्यति ॥२५८॥ अरण्ये वा त्रिरभ्यस्य प्रयतो वेदसंहिताम् । मुच्यते पातकैः सर्वैः पराकैः शोधितास्त्रिभिः ॥ २५६ ॥ त्र्यहं तूपवसेद्युक्तस्त्रिरह्नोऽभ्युपयन्नपः । मुच्यते पातकैः सर्वैस्त्रिर्जपित्वाऽघमर्षणम् ॥ २६० ॥

अधिक पाप करनेवाला नदी में स्नान करके 'सोमा रुद्रा धारयेथा०' इत्यादि और 'अर्यमणं वरुणं मित्रं०' इत्यादि तीन ऋचाओंका एक मास तक नित्य पाठ करे तो शुद्ध होता है। पापी पुरुष, छः मास तक, 'इन्द्रं मित्रं वरुणमग्नि०' इत्यादि सात ऋचा का नित्य पाठ करे और जल में मल-मूत्र डालनेवाला एक

ग्यारहवां अध्याय। ४४१

[Header] ग्यारहवां अध्याय। ४४१

मास तक भीख मांगकर निर्वाह करे। द्विज, 'देवकृतस्य०' इत्यादि शाकल होम के मन्त्रों से, एक वर्ष तक घी का होम करे अथवा 'नम इन्द्रश्च०' इत्यादि मन्त्रका एक वर्षतक पाठ करे तो महापाप से भी छूट जाता है। महापातकी एक वर्षतक भीख मांगकर खाय, सावधानी से नित्य गौओं के पीछे फिरे। और पवमान देवता के सूक्तों का पाठ करे तो शुद्ध होता है। तीन पराक व्रतों से शुद्ध, जितेन्द्रिय होकर, वन में वेदसंहिता का तीन बार पाठ करे तो सब पापों से छूटता है। तीन दिन उप- वास करे, तीनों समय में स्नान करे और अघमर्षण-सूक्त का पाठ करे तो सब पापों से छूट जाता है ॥ २५५-२६०॥ यथाश्वमेधः क्रतुराट् सर्वपापापनोदनम्। तथाघमर्षणं सूक्तं सर्वपापापनोदनम् ॥ २६१ ॥ हत्वा लोकानपीमांस्त्रीनश्नन्नपि यतस्ततः । ऋग्वेदं धारयन् विप्रो नैनः प्राप्नोति किञ्चन ॥ २६२॥ ऋक्संहितां त्रिश्भ्यस्य यजुषां वा समाहितः । साम्नां वा सरहस्यानां सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २६३ ॥ यथा महाह्रदं प्राप्य क्षिप्तं लोष्ठं विनश्यति । तथा दुश्चरितं सर्वं वेदे त्रिवृति मज्जति ॥ २६४ ॥ ऋचो यजूंषि चान्यानि सामानि विविधानि च । एष ज्ञेयस्त्रिवृद्वेदो यो वेदैनं स वेदवित् ॥ २६५ ॥ आद्यं यत्त्र्यक्षरं ब्रह्म त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता । स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद्वेदो यस्तं वेद स वेदवित् ॥ २६६ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ ५६

४४२ मनुस्मृति । जैसे यज्ञों का राजा अश्वमेध सब पापों का नाशक है, वैसे अघमर्षण-सूक्त सब पापों का नाशक है। ऋग्वेद को धारण करने वाला ब्राह्मण चाहे तीनों लोकों का संहार करे या मनमाने भोजन करे तो भी उसको पातक नहीं लगता। जो द्विज, साव- धानी से, ऋक्संहिता या यजुःसंहिता अथवा सामसंहिता की ब्राह्मण-उपनिषदों के सहित तीन बार आवृत्ति करे तो सब पापों से मुक्त होजाता है। जैसे बड़ी नदी में डाला हुआ ढेला गल जाता है वैसे सब पाप तीन आवृत्ति वेद में डूब जाते हैं। ऋक्, यजु और साम वेद और विविध मन्त्रों को त्रिवृत् वेद जानना चाहिए। जो इनको जानता है वही वेदवेत्ता है। सब वेदों में प्रधान तीन अक्षर का-जिसमें तीनों वेद अन्तर्गत हैं, वह गोपनीय प्रणव 'ओं' कार, दूसरा त्रिवृत् वेद है। जो उसके स्वरूप और अर्थ को जानता है वह वेदविशारद है॥ २६१-२६६॥ : ग्यारहवां अध्याय पूरा हुआ।

अथ द्वादशोऽध्यायः। चातुर्वर्ण्यस्य कृत्स्नोऽयमुक्तो धर्मस्त्वयानघ । कर्मणां फलनिर्वृत्तिं शंस नस्तत्त्वतः पराम् ॥ १ ॥ स तानुवाच धर्मात्मा महर्षीन् मानवो भृगुः । अस्य सर्वस्य शृणुत कर्मयोगस्य निर्णयम् ॥ २ ॥ शुभाशुभफलं कर्म मनोवाग्देहसम्भवम् । कर्मजा गतयो नृणामुत्तमाधममध्यमाः ॥ ३ ॥ तस्येह त्रिविधस्यापि त्र्यधिष्ठानस्य देहिनः । दशलक्षणयुक्तस्य मनो विद्यात्प्रवर्तकम् ॥ ४ ॥ परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् । वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ॥ ५ ॥ पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः । असंबद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥ ६ ॥ अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः । परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ॥ ७ ॥ बारहवां अध्याय। कर्मफल-निर्णय। हे पापरहित ! यह चारों वर्णों का संपूर्ण धर्म तुमने कहा। अब शुभाशुभ कर्मों के दूसरे जन्म में होनेवाले फलों को यथार्थरूप से हम से कहिये। इस प्रकार महर्षियोंने भृगु से पूँछा। यह सुनकर

४४४ मनुस्मृति । मनुपुत्र-धर्मात्मा भृगुने ऋषियों से कहा, इस सम्पूर्ण कर्मयोग के निर्णय को सुनो:-मन, वाणी और शरीर से होनेवाला कर्म शुभ, अशुभ फल देता है और उसी कर्म के अनुसार मनुष्यों का उ- त्तम-मध्यम और अधम योनि में जन्म होता है। उस देही के उत्तम-मध्यम-अधम और मन-वाणी-शरीर के आश्रित फल देने वाले तीन प्रकार के दश लक्षणयुक्त धर्म का मनप्रवर्तक-चलाने वाला है। अन्याय से परधन हरने का विचार, दूसरे का अनभल चाहना और परलोक में अश्रद्धा ये तीन प्रकार के मानस पाप- कर्म हैं। कठोर वचन कहना, झूठ बोलना, सब भांति की चुगली और व्यर्थ बकवाद करना ये चार वाणी के पापकर्म हैं । बिना दी हुई वस्तु लेना, शास्त्रविरुद्ध हिंसा और परस्त्री-गमन ये तीन शरीर के पापकर्म हैं ॥ १-७ ॥ मानसं मनसैवायमुपभुङ्क्ते शुभाशुभम् । वाचावाचाकृतं कर्म कायेनैव च कायिकम् ॥ ८ ॥ शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः । वाचिकैः पक्षिमृगतां मानसैरन्त्यजातिताम् ॥ ६ ॥ वाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च । यस्यैते निहिता बुद्धौ त्रिदण्डीति स उच्यते ॥ १० ॥ त्रिदण्डमेतान्निक्षिप्य सर्वभूतेषु मानवः । कामक्रोधौ तु संयम्य ततः सिद्धिं नियच्छति ॥ ११ ॥ योऽस्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते । यः करोति तु कर्माणि स भूतात्मोच्यते बुधैः ॥ १२ ॥ जीवसंज्ञोऽन्तरात्मान्यः सहजः सर्वदेहिनाम् । येन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु ॥ १३ ॥

बारहवां अध्याय । ४५५

बारहवां अध्याय । ४५५ तावुभौ भूतसंपृक्तौ महान् क्षेत्रज्ञ एव च । उच्चावचेषु भूतेषु स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः ॥ १४ ॥ मनुष्य मन से किए शुभाशुभ कर्मफल को मन से ही, वाणी से किये, वाणी ही और शरीर से किए कर्म का शरीर से ही फल भो- गता है। मनुष्य शारीरक कर्मदोषों से वृक्षादियोनि, वाणी के कर्मदोषों से पक्षी और मृग की योनि और मानसिक कर्मदोषों से चाण्डाल आदि हीनयोनि में जन्म पाता है। वाणी को नियम में रखना वाग्दण्ड, मन को वश में रखना मनोदण्ड और शरीर को वश में रखना कायदण्ड ये तीनों जिसकी बुद्धि में स्थित हैं वह पुरुष 'त्रिदण्डी' कहाजाता है। मनुष्य संपूर्ण जीवों पर इन तीनों दण्डों को स्थापित करने और काम-क्रोध को वश में रखने से, सिद्धि-कृतार्थता को पाता है। जो इस शरीर को कर्म में प्रे- रित करता है उसको 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं। और जो कर्म करता है उसे 'भूतात्मा' कहते हैं। जीव नामक दूसरा अन्तरात्मा (सूक्ष्म श- रीर) सब शरीरधारी क्षेत्रज्ञों के साथ पैदा होता है। जिससे जन्मों में सम्पूर्ण सुख-दुःख जाना जाता है। वे दोनों महान्-सूक्ष्म शरीर और क्षेत्रज्ञ-जीवात्मा पञ्चभूतों के साथ मिलकर ऊंचे-नीचे प्राणियों में स्थित होकर परमात्मा के आश्रय से रहते हैं ॥ ८-१४ ॥ असंख्या मूर्त्तयस्तस्य निष्पतन्ति शरीरतः । उच्चावचानि भूतानि सततं चेष्टयन्ति याः ॥ १५ ॥ पञ्चभ्य एव मात्राभ्यः प्रेत्य दुष्कृतिनां नृणाम् । शरीरं यातनार्थीयमन्यदुत्पद्यते ध्रुवम् ॥ १६ ॥ तेनानुभूय ता यामीः शरीरेणेह यातनाः । तास्वेव भूतमात्रासु प्रलीयन्ते विभागशः ॥ १७ ॥ सोऽनुभूयासुखोदर्कान् दोषान् विषयसङ्गजान् ।

४४६ : मनुस्मृति । व्यपेत कल्मषोऽभ्येति तावेवोभौ महौजसौ ॥ १८ ॥ तौ धर्म पश्यतस्तस्य पापं चातन्द्रितौ सह । याभ्यां प्राप्नोति संपृक्तः प्रेत्येह च सुखासुखम् ॥ १९ ॥ यद्याचरति धर्म स प्रायशो धर्ममल्पशः । तैरेव चावृतो भूतैः स्वर्गे सुखमुपाश्नुते ॥ २० ॥ यदि तु प्रायशो धर्मं सेवते धर्ममल्पशः । तैर्भूतैः स परित्यक्तो यामीः प्राप्नोति यातनाः ॥ २१ ॥ यामीस्ता यातनाः प्राप्य स जीवो वीतकल्मषः । तान्येव पञ्चभूतानि पुनरप्येति भागशः॥ २२ ॥ उस परमात्मा के शरीर से क्षेत्रज्ञ नामक असंख्य जीव उत्पन्न होते हैं। जो उत्तम-अधम प्राणियों से निरन्तर कर्म कराते हैं। पापीमनुष्यों का शरीर यमयातना के लिए दूसरा सूक्ष्म-पञ्चत- न्मात्रा से उत्पन्न होता है। वह पापी उस शरीर से यमयातना को भोगकर फिर उन पञ्चभूतों की मात्राओं में विभाग के अनु- सार लीन होजाता है। वह सूक्ष्मशरीरी जीव, दुःखों को भोग चुकने पर पापरहित होकर महान् और क्षेत्रज्ञ का आश्रय क- रता है। वे महान् और क्षेत्रज्ञ साथ में उस प्राणी के पुण्य-पाप का विचार करते हैं, जिनसे मिला हुआ यहां और परलोक में सुख-दुःख भोगता है। मनुष्यजन्म में यदि वह धर्म अधिक और अधर्म थोड़ा किए रहता है तो उन्हीं पञ्चभूतों से युक्त होकर स्वर्ग में सुख भोगता है। यदि अधर्म अधिक रहता है तो मरकर यमयातना भोगता है । उन यातनाओं को भोगने के बाद निष्पाप होकर वह जीव फिर विभाग के अनुसार पञ्चभूतों का आश्रय लेकर जन्म लेता है ॥ १८-२२ ॥ एता दृष्ट्वास्य जीवस्य गतीः स्वेनैव चेतसा ।

बारहवां अध्याय। ४४७

बारहवां अध्याय। ४४७ धर्मतोऽधर्मतश्चैव धर्मे दध्यात्सदा मनः ॥ २३ ॥ सत्त्वं रजस्तमश्चैव त्रीन् विद्यादात्मनो गुणान् । यैर्व्याप्येमान् स्थितो भावान्महान्सर्वानशेषतः ॥ २४॥ यो यदैषां गुणो देहे साकल्येनातिरिच्यते । स तदा तद्गुणप्रायं तं करोति शरीरिणम् ॥ २५ ॥ सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रागद्वेषौ रजः स्मृतम् । एतद्व्याप्तिमदे तेषां सर्वभूताश्रितं वपुः ॥ २६ ॥ तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं किञ्चिदात्मनि लक्षयेत् । प्रशान्तमिव शुद्धाभं सत्त्वं तदुपधारयेत् ॥ २७ ॥ यत्तु दुःखसमायुक्तमप्रीतिकरमात्मनः । तद्रजोऽप्रतिघं विद्यात्सततं हारि देहिनाम् ॥ २८ ॥ यत्तु स्यान्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयात्मकम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ २९ ॥ त्रयाणामपि चैतेषां गुणानां यः फलोदयः । अग्र्यो मध्यो जघन्यश्च तं प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ ३० ॥ गुणों का प्रभाव । इन जीवगतियों का जोकि धर्म-अधर्म से होनेवाली हैं अपने मन से विचार करके पुरुष को सदा धर्म में मन टिकाना चा- हिए। सत्त्व, रज और तम ये तीनों आत्मा प्रकृति के गुण हैं। इन्हीं गुणों से व्याप्त महत्तत्त्व, सारे विश्व में स्थित है। इन गुणों में जो गुण जब देह में अधिक होता है तब उस प्राणी को अपने भाव का कर डालता है। वस्तु का वास्तविक ज्ञान सत्त्व- गुण का उलटा ज्ञान तमोगुण का और राग-द्वेष रजोगुण का लक्षण

४४८ मनुस्मृति । है। सब प्राणियों के शरीर इन्हीं के प्रभावों से व्याप्त हो रहे हैं। जिस से आत्मा को सुख का ज्ञान हो शान्त शुद्ध और प्रकाश- भाव पैदा हो वह सत्त्वगुण है। आत्मा को अप्रीतिकर दुःख से मिला विषयों में खींचनेवाला रजोगुण होता है। जो मोह- युक्त हो प्रकट न हो विषयी हो और तर्क या बुद्धि से न जाना जाय वह तमोगुण है। इन तीनों गुणों का जो उत्तम-मध्यम-अ- धम फल होता है वह सब आगे कहा जाता है ॥ २३-३० ॥ वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धर्मक्रियात्मचिन्ता च सात्त्विकं गुणलक्षणम् ॥ ३१ ॥ आरम्भरुचिताऽधैर्यमसत्कार्यपरिग्रहः । विषयोपसेवा चाजस्रं राजसं गुणलक्षणम् ॥ ३२ ॥ लोभः स्वप्नोऽधृतिः क्रौर्यं नास्तिक्यं भिन्नवृत्तिता । याचिष्णुता प्रमादश्च तामसं गुणलक्षणम् ॥ ३३ ॥ त्रयाणामपि चैतेषां गुणानां त्रिषु तिष्ठताम् । इदं सामासिकं ज्ञेयं क्रमशो गुणलक्षणम् ॥ ३४ ॥ यत्कर्म कृत्वा कुर्वंश्च करिष्यंश्चैव लज्जति । तज्ज्ञेयं विदुषा सर्वं तामसं गुणलक्षणम् ॥ ३५ ॥ येनास्मिन्कर्मणा लोके ख्यातिमिच्छति पुष्कलाम् । न च शोचत्यसंपत्तौ तद्विज्ञेयं तु राजसम् ॥ ३६ ॥ यत्सर्वेणेच्छति ज्ञातुं यन्न लज्जति चाचरन् । येन तुष्यति चात्मास्य तत्सत्त्वगुणलक्षणम् ॥ ३७ ॥ तमसो लक्षणं कामो रजसस्त्वर्थ उच्यते । सत्त्वस्य लक्षणं धर्मः श्रैष्ठ्यमेषां यथोत्तरम् ॥ ३८ ॥

बारहवां अध्याय। ४४६

बारहवां अध्याय। ४४६ वेद का अभ्यास, तप, ज्ञान, शौच, इन्द्रियों का निग्रह, धर्म- कर्म और आत्मचिन्तन ये सब सत्त्वगुण के काम हैं। आरम्भ में रुचि होना, फिर अधैर्य, बुरे कामों में फँसना और विषय- भोग ये रजोगुण के काम हैं। लोभ, नींद, अधीरता, क्रूरता, नास्तिकता, अनाचार, मांगने की आदत और प्रमाद ये तमो- गुण के काम हैं। इन तीनों गुणों का संक्षेप से लक्षण यों हैः- जिस कर्म को करके करते हुए या आगे करने में लज्जा आती है वह तमोगुण का लक्षण है। जिस कर्म से लोक में प्रसिद्धि चाहे, पर फल न होने पर शोक न पैदा हो, वह रजोगुण का लक्षण है। जिससे ज्ञान प्राप्त करना चाहे, जिसको करने में लज्जा न आवे और जिस कर्म से मन प्रसन्न सन्तुष्ट रहे, उसको सत्त्वगुण का लक्षण जानना चाहिए। तम का काम, रज का अर्थ और सत्त्व का धर्म ये मुख्य लक्षण हैं। इनमें क्रम से अगला अगला श्रेष्ठ माना जाता है॥ ३१-३८॥ येन यस्तु गुणेनैषां संसारान् प्रतिपद्यते । तान् समासेन वक्ष्यामि सर्वस्यास्य यथाक्रमम् ॥३६॥ देवत्वं सात्त्विका यान्ति मनुष्यत्वं च राजसाः । तिर्यक्त्वं तामसा नित्यमित्येषां त्रिविधा गतिः ॥ ४० ॥ त्रिविधा त्रिविधैषा तु विज्ञेया गौणिकी गतिः । अधमा मध्यमाग्र्या च कर्मविद्याविशेषतः ॥ ४१ ॥ स्थावराः क्रमिकीटाश्च मत्स्याः सर्पाः सकच्छपाः । पशवश्च मृगाश्चैव जघन्या तामसी गतिः ॥ ४२ ॥ हस्तिनश्च तुरङ्गाश्च शूद्रा म्लेच्छाश्च गर्हिताः । सिंहा व्याघ्रा वराहाश्च मध्यमा तामसी गतिः ॥४३॥ चारणाश्च सुपर्णाश्च पुरुषाश्चैव दाम्भिकाः । ५७

४५० मनुस्मृति । रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः ॥ ४४ ॥ झल्ला मल्ला नटाश्चैव पुरुषाः शस्त्रवृत्तयः । द्यूतपानप्रसक्ताश्च जघन्या राजसी गतिः ॥ ४५ ॥ राजानः क्षत्रियाश्चैव राज्ञश्चैव पुरोहिताः । वादयुद्धप्रधानाश्च मध्यमा राजसी गतिः ॥ ४६ ॥ इन गुणों में जिस गुण से जीव जिन जिन गतियों को पाता है, उन गतियों को संक्षेप से कहताहूं-सात्त्विक गुणवाले देव- भाव, रजोगुणी मनुष्यत्व और तमोगुणी पक्षीपनको पाते हैं- यह तीन प्रकार की गति है। सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों से होनेवाली गति, कर्म और विद्या के अनुसार, उत्तम-मध्यम-अ- धम होती है । वृक्षादि स्थावर, कृमि, कीट, मछली, साँप, क- छुवा, पशु और मृग, ये तमोगुणी अधम गति है। हाथी, घोड़ा, शूद्र, म्लेच्छ, सिंह, व्याघ्र और शूकर ये तमोगुणी मध्यमगति है। चारण-भाँट, गरुड़ादि पक्षी, पाखंडी पुरुष, राक्षस और पि- शाच ये तमोगुण की उत्तम गति जाननी चाहिए। झल्ल, मल्ल, नट, शस्त्र से जीनेवाले, जुआ-मद्यपान में आसक्त पुरुष ये रजो- गुण की अधमगति हैं । राजा, क्षत्रिय, राजपुरोहित, विवाद करनेवाले ये रजोगुणी मध्यमगति है ॥ ३६-४६ ॥ गन्धर्वा गुह्यका यक्षा विबुधानुचराश्च ये । तथैवाप्सरसः सर्वा राजसीषूत्तमा गतिः ॥ ४७ ॥ तापसा यतयो विप्रा ये च वैमानिका गणाः । नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्त्विकी गतिः ॥ ४८ ॥ यज्वान ऋषयो देवा वेदा ज्योतींषि वत्सराः । पितरश्चैव साध्याश्च द्वितीया सात्त्विकी गतिः ॥ ४६ ॥

बारहवां अध्याय। ४५१

बारहवां अध्याय। ४५१ ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च । उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः ॥ ५० ॥ एष सर्वः समुद्दिष्टस्त्रिप्रकारस्य कर्मणः । त्रिविधस्त्रिविधः कृत्स्नः संसारः सार्वभौतिकः ॥ ५१ ॥ इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन धर्मस्यासेवनेन च । पापान् संयान्ति संसारानविद्वांसो नराधमाः ॥ ५२ ॥ यां यां योनिं तु जीवोऽयं येन येनेह कर्मणा । क्रमशो याति लोकेऽस्मिंस्तत्तत्सर्वं निबोधत ॥ ५३ ॥ बहून् वर्षगणान् घोरान् नरकान् प्राप्य तत्क्षयात् । संसारान् प्रतिपद्यन्ते महापातकिनस्त्विमान् ॥ ५४ ॥

गन्धर्व, गुह्यक, यक्ष, विद्याधर और अप्सरा ये रजोगुणी उत्तमगति है। वानप्रस्थ, संन्यासी, ब्राह्मण, विमानचारी देवता; नक्षत्र और दैत्य ये सत्त्वगुण की अधमगति है। यजमान, ऋषि, देवता, वेद, ज्योति, वर्ष, पितर और साध्यदेव यह सत्त्वगुण की मध्यमगति है। ब्रह्मा, प्रजापति, धर्म, महत्तत्त्व और प्रधान इसको सत्त्वगुण की उत्तमगति विद्वान् लोग कहते हैं। इस प्रकार मन, वाणी और शरीर के तीन प्रकार के कर्मों से होने वाली, त्रिगुणमयी, उत्तम-मध्यम-अधम तीन प्रकार की सब प्रा- णियों की गति कही गई है। इन्द्रियों में आसक्ति और धर्माचरण न करने से मूर्ख-अधम मनुष्य पापयोनि को प्राप्त होते हैं। इस लोक में यह जीव जिस जिस कर्म से जिस जिस योनि में जन्म लेता है, उन सब को क्रम से सुनो—महापातकी पुरुष बहुत वर्षों तक भयानक नरकों में पड़कर, पाप कट जाने पर बांकी भोग भोगने के लिए इन नीच योनियों में जन्मता है ॥ ४७-५४ ॥

श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम् ।

४५२ मनुस्मृति । चाण्डालपुक्कसानां च ब्रह्महा योनिमृच्छति ॥ ५५ ॥ कृमिकीटपतङ्गानां विड्भुजां चैव पक्षिणाम् । हिंस्राणां चैव सत्त्वानां सुरापो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥ ५६ ॥ लूताऽहि सरटानां च तिरश्चां चाम्बुचारिणाम् । हिंस्राणां च पिशाचानां स्तेनो विप्रः सहस्रशः ॥ ५७ ॥ तृणगुल्मलतानां च क्रव्यादां दंष्ट्रिणामपि । क्रूरकर्मकृतां चैव शतशो गुरुतल्पगः ॥ ५८ ॥ हिंस्रा भवन्ति क्रव्यादः कृमयोऽभक्ष्यभक्षिणः । परस्परादिनः स्तेनाः प्रेतान्त्यस्त्रीनिषेविणः ॥ ५९ ॥ संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम् । अपहृत्य च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः ॥ ६० ॥ मणिमुक्ताप्रवालानि हृत्वा लोभेन मानवः । विविधानि च रत्नानि जायते हेमकर्तृषु ॥ ६१ ॥ धान्यं हृत्वा भवत्याखुः कांस्यं हंसो जलं प्लवः । मधु दंशः पयः काको रसं श्वा नकुलो घृतम् ॥ ६२ ॥ ब्रह्महत्या करनेवाला, कुत्ता, सुअर, गधा, ऊँट, बैल, बकरा, मेंढ़ा, मृग, पक्षी, चाण्डाल और पुक्कस की जाति में जन्मता है। मद्यपान करनेवाला ब्राह्मण कृमि, कीड़ा, पतंग, मैला खानेवाले पक्षी और हिंसक प्राणियों की जाति में जन्मता है । सोना चुरानेवाला ब्राह्मण मकड़ी, सांप, गिरगट, जलचर पक्षी, हिंसक जीव और पिशाच की योनि में जन्मता है । गुरुपत्नी-गामी पुरुष सैकड़ों बार घास, गुल्म, लता, कच्चा मांस खानेवाले, दाढ़वाले और क्रूर कर्मियों की योनि में जन्म लेता है । हिंसक मनुष्य कच्चा मांस खानेवाले, कृमि और अभक्ष्य-भक्षी होते हैं । चोर