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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

२१०

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * घमंडमें आकर तुम युद्धकी अभिलाषा रखते हो तो आओ। मेरी शिवाएँ (योगिनियाँ) तुम्हारे कच्चे मांससे तृप्त हों' ॥२७॥ चूँकि उस देवीने भगवान् शिवको दूतके कार्यमें नियुक्त किया था, इसलिये वह 'शिवदूती' के नामसे संसारमें विख्यात हुई ॥ २८ ॥ वे महादैत्य भी भगवान् शिवके मुँहसे देवीके वचन सुनकर क्रोधमें भर गये और जहाँ कात्यायनी विराजमान थीं, उस ओर बढ़े ॥ २९ ॥ तदनन्तर वे दैत्य अमर्षमें भरकर पहले ही देवीके ऊपर बाण, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्रोंकी वृष्टि करने लगे ॥ ३० ॥ तब देवीने भी खेल-खेलमें ही धनुषकी टंकार की और उससे छोड़े हुए बड़े- बड़े बाणोंद्वारा दैत्योंके चलाये हुए बाण, शूल, शक्ति और फरसोंको काट डाला ॥ ३१ ॥ फिर काली उनके आगे होकर शत्रुओंको शूलके प्रहारसे विदीर्ण करने लगी और खट्वाङ्गसे उनका कचूमर निकालती हुई रणभूमिमें विचरने लगी ॥ ३२ ॥ ब्रह्माणी भी जिस जिस ओर दौड़ती, उसी-उसी ओर अपने कमण्डलुका जल छिड़ककर शत्रुओंके ओज और पराक्रमको नष्ट कर देती थी ॥ ३३ ॥ माहेश्वरीने त्रिशूलसे तथा वैष्णवीने चक्रसे और अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई कुमार कार्तिकेयकी शक्तिने शक्तिसे दैत्योंका संहार आरम्भ किया ॥ ३४ ॥ इन्द्रशक्तिने वज्रप्रहारसे विदीर्ण हो सैकड़ों दैत्य- दानव रक्तकी धारा बहाते हुए पृथ्वीपर सो गये ॥ ३५ ॥ वाराही शक्तिने कितनोंको अपनी थूथुनकी मारसे नष्ट किया, दाढ़ोंके अग्रभागसे कितनोंकी छाती छेद डाली तथा कितने ही दैत्य चक्रकी चोटसे विदीर्ण हो गये ॥ ३६ ॥ नारसिंही भी दूसरे-दूसरे महादैत्योंको अपने नखोंसे विदीर्ण करके खाती और सिंहनादसे दिशाओं एवं आकाशको गुँजाती हुई युद्ध-क्षेत्रमें विचरने लगी ॥ ३७ ॥ कितने ही असुर शिवदूतीके प्रचण्ड अट्टहाससे अत्यन्त भयभीत हो पृथ्वीपर गिर पड़े और गिरनेपर उन्हें शिवदूतीने उस समय अपना ग्रास बना लिया ॥ ३८ ॥ इति मातृगणं क्रुद्धं मर्दयन्तं महासुरान्। दृष्ट्वाभ्युपायैर्विविधैर्नेशुर्देवारिसैनिकाः ॥ ३९ ॥ पलायनपरान् दृष्ट्वा दैत्यान् मातृगणार्दितान्। योद्धुमभ्याययौ क्रुद्धो रक्तबीजो महासुरः ॥ ४० ॥ रक्तबिन्दुर्यदा भूमौ पतत्यस्य शरीरतः। समुत्पतति मेदिन्यां१ तत्प्रमाणस्तदासुरः ॥ ४१ ॥ युयुधे स गदापाणिरिन्द्रशक्त्या महासुरः। ततश्चैन्द्री स्ववज्रेण रक्तबीजमताडयत् ॥ ४२ ॥ कुलिशेनाहतस्याशु बहु२ सुस्राव शोणितम्। समुत्तस्थुस्ततो योधास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः ॥ ४३ ॥ यावन्तः पतितास्तस्य शरीराद्रक्तबिन्दवः। तावन्तः पुरुषा जातास्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥ ४४ ॥ ते चापि युयुधुस्तत्र पुरुषा रक्तसम्भवाः। समं मातृभिरत्युग्रशस्त्रपातातिभीषणम् ॥ ४५ ॥ १. पा०—न्यास्तो। २. पा०—तस्य।

७. सूर्यवंश, नाभाग, मरुत्त चरित्र व उपसंहार

  • रक्तबीज-वध * २२१ पुनश्च वज्रपातेन क्षतमस्य शिरो यदा। ववाह रक्तं पुरुषास्ततो जाताः सहस्रशः ॥४६॥ वैष्णवी समरे चैनं चक्रेणाभिजघान ह। गदया ताडयामास ऐन्द्री तमसुरेश्वरम् ॥४७॥ वैष्णवीचक्रभिन्नस्य रुधिरस्रावसम्भवैः। सहस्रशो जगद्व्याप्तं तत्प्रमाणैर्महासुरैः ॥४८॥ शक्त्या जघान कौमारी वाराही च तथासिना। माहेश्वरी त्रिशूलेन रक्तबीजं महासुरम् ॥ ४९ ॥ स चापि गदया दैत्यः सर्वा एवाह्नत् पृथक्। मातृः कोपसमाविष्टो रक्तबीजो महासुरः ॥५०॥ तस्याहतस्य बहुधा शक्तिशूलादिभिर्भुवि। पपात यो वै रक्तौघस्तेनासञ्छतशोऽसुराः ॥५१॥ तैश्चासुरासृक्सम्भूतैरसुरैः सकलं जगत्। व्याप्तमासीत्ततो देवा भयमाजग्मुरुत्तमम् ॥५२॥ तान् विषण्णान् सुरान् दृष्ट्वा चण्डिका प्राह सत्वरा। उवाच कालीं चामुण्डे विस्तीर्णं' वदनं कुरु ॥ ५३ ॥ मच्छस्त्रपातसम्भूतान् रक्तबिन्दून्महासुरान् । रक्तबिन्दोः प्रतीच्छ त्वं वक्त्रेणानेन वेगिना ॥५४॥ भक्षयन्ती चर रणे तदुत्पन्नान्महासुरान् । एवमेष क्षयं दैत्यः क्षीणरक्तो गमिष्यति ॥५५॥ भक्ष्यमाणास्त्वया चोग्रा न चोत्पत्स्यन्ति चापरे । इत्युक्त्वा तां ततो देवी शूसेनाभिजघान तम् ॥५६॥ मुखेन काली जगृहे रक्तबीजस्य शोणितम्। ततोऽसावाजघानाथ गदया तत्र चण्डिकाम् ॥५७॥ न चास्या वेदनां चक्रे गदापातोऽल्पिकामपि । तस्याहतस्य देहात्तु बहु सुस्राव शोणितम् ॥५८॥ यतस्ततस्तद्वक्त्रेण चामुण्डा सम्प्रतीच्छति । मुखे समुद्गता येऽस्या रक्तपातान्महासुराः । तांश्चखादाथ चामुण्डा पपौ तस्य च शोणितम् ॥५९॥ देवी शूलेन वज्रेण बाणैरसिभिर्ऋष्टिभिः। जघान रक्तबीजं तं चामुण्डापीतशोणितम् ॥६०॥ स पपात महीपृष्ठे शस्त्रसङ्घसमाहतः ५। नीरक्तश्च महीपाल रक्तबीजो महासुरः ॥६१॥ ततस्ते हर्षमतुलमवापुस्त्रिदशा नृप ॥६२॥ तेषां मातृगणो जातो ननर्तासृङ्मदोद्धतः ॥ॐ॥ ६३ ॥ इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए मातृगणोंको नाना प्रकारके उपायोंसे बड़े-बड़े असुरोंका मर्दन करते देख दैत्यसैनिक भाग खड़े हुए ॥३९॥ मातृगणोंसे पीड़ित दैत्योंको युद्धसे भागते देख रक्तबीज नामका महादैत्य क्रोधमें भरकर युद्धके लिये आया ॥४०॥ उसके शरीरसे जब रक्तकी बूँद पृथ्वीपर गिरती, तब उसीके समान शक्तिशाली एक दूसरा महादैत्य पृथ्वीपर पैदा हो जाता ॥४१॥ महासुर रक्तबीज हाथमें गदा लेकर इन्द्रशक्तिके साथ युद्ध करने लगा। तब ऐन्द्रीने अपने वज्रसे रक्तबीजको मारा ॥४२॥ वज्रसे घायल होनेपर उसके शरीरसे बहुत सा रक्त चूने लगा और उससे उसीके समान रूप तथा पराक्रमवाले योद्धा उत्पन्न होने लगे ॥४३॥ उसके शरीरसे रक्तकी जितनी बूँदें गिरीं, उतने ही पुरुष उत्पन्न हो गये। वे सब रक्तबीजके समान ही वीर्यवान्, बलवान् तथा पराक्रमी थे ॥४४॥ ये रक्तसे उत्पन्न होनेवाले पुरुष भी अत्यन्त भयङ्कर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए वहाँ मातृगणोंके साथ घोर युद्ध करने लगे ॥४५॥ पुनः वज्रके प्रहारसे जब उसका मस्तक घायल हुआ तो रक्त बहने लगा और उससे हजारों पुरुष उत्पन्न हो गये ॥४६॥ वैष्णवीने युद्धमें रक्तबीजपर चक्रका प्रहार किया तथा ऐन्द्रीने उस दैत्य-सेनापतिको गदासे चोट पहुँचायी ॥ ४७ ॥ वैष्णवीके चक्रसे घायल होनेपर उसके शरीरसे जो रक्त बहा और उससे जो उसीके बराबर आकारवाले सहस्रों महादैत्य प्रकट १. पा०-विस्तरं। २. पा०-योगिना। ३. इसके बाद कहीं कहीं 'ऋषिरुवाच' इतना अधिक पाठ है। ४. पा०- चक्रेण । ५. पा०-शस्त्रैरगणितैर्हतः ।

२२२

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * हुए, उनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया ॥४८॥ कौमारीने शक्तिसे, वाराहीने खड्गसे और माहेश्वरीने त्रिशूलसे महादैत्य रक्तबीजको घायल किया ॥ ४९ ॥ क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्य रक्तबीजने भी गदासे सभी मातृ-शक्तियोंपर पृथक्-पृथक् प्रहार किया ॥५०॥ शक्ति और शूल आदिसे अनेक बार घायल होनेपर जो उसके शरीरसे रक्तकी धारा पृथ्वीपर गिरी, उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न हुए ॥ ५१ ॥ इस प्रकार उस महादैत्यके रक्तसे प्रकट हुए असुरोंद्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो गया। इससे देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ५२ ॥ देवताओंको उदास देख चण्डिकाने कालीसे शीघ्रतापूर्वक कहा- 'चामुण्डे ! तुम अपना मुख और भी फैलाओ ॥ ५३ ॥ तथा मेरे शस्त्रपातसे गिरनेवाले रक्तबिन्दुओं और उनसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योंको तुम अपने इस उतावले मुखसे खा जाओ ॥ ५४॥ इस प्रकार रक्तसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योंका भक्षण करती हुई तुम रणमें विचरती रहो। ऐसा करनेसे उस दैत्यका सारा रक्त क्षीण हो जानेपर वह स्वयं भी नष्ट हो जायगा ॥५५॥ उन भयङ्कर दैत्योंको जब तुम खा जाओगी तो दूसरे नये दैत्य उत्पन्न नहीं हो सकेंगे।' कालीसे यों कहकर चण्डिका देवीने शूलसे रक्तबीजको मारा ॥५६ ॥ और कालीने अपने मुखमें उसका रक्त ले लिया। तब उसने वहाँ चण्डिकापर गदासे प्रहार किया ॥ ५७ ॥ किंतु उस गदापातने देवीको तनिक भी वेदना नहीं पहुँचायी। रक्तबीजके घायल शरीरसे बहुत-सा रक्त गिरा ॥ ५८ ॥ किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही चामुण्डा ने उसे अपने मुखमें ले लिया। रक्त गिरनेसे कालीके मुखमें जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें भी वह चट कर गयी और उसने रक्तबीजका रक्त भी पी लिया ॥ ५९ ॥ तदनन्तर देवीने रक्तबीजको, जिसका रक्त चामुण्डा ने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदिसे मार डाला ॥ ६० ॥ राजन् ! इस प्रकार शस्त्रोंके समुदायसे आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वीपर गिर पड़ा। नरेश्वर ! इससे देवताओंको अनुपम हर्षकी प्राप्ति हुई ॥ ६१-६२ ॥ और मातृगण उन असुरोंके रक्तपानके मदसे उद्धत-सा होकर नृत्य करने लगा ॥ ६३ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये रक्तबीजवधो नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ उवाच १, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः ६१, एवम् ६३, एवमादितः ॥५०२॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'रक्तबीज-वध' नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥८॥

निशुम्भ-वध २२३


नवमोऽध्यायः

निशुम्भ-वध

ध्यानसंदष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः ॥ ७ ॥
( ॐ बन्धूककाञ्चननिभं रुचिराक्षमालांआजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः।
पाशाङ्कुशौ च वरदां निजबाहुदण्डैः।निहन्तुं चण्डिकां कोपात्कृत्वा युद्धं तु मातृभिः ॥ ८ ॥
बिभ्राणमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र-ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः।
मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि ॥शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः ॥ ९ ॥
मैं अर्धनारीश्वरके श्रीविग्रहकी निरन्तर शरण लेता हूँ। उसका वर्ण बन्धूकपुष्प और सुवर्णके समान रक्त-पीतमिश्रित है। वह अपनी भुजाओंमें सुन्दर अक्षमाला, पाश, अङ्कुश और वरद-मुद्रा धारण करता है; अर्धचन्द्र उसका आभूषण है तथा वह तीन नेत्रोंसे सुशोभित है।)चिच्छेदास्ताञ्शरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः१।<br>ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ ॥ १० ॥<br>निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम्।<br>अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम् ॥ ११ ॥<br>ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम्।<br>निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम् ॥ १२ ॥<br>छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः।
राजोवाच ॥ १ ॥तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम् ॥ १३ ॥
' ॐ' विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम।कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः।
देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजसमाश्रितम् ॥ २ ॥आयातं २ मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत् ॥ १४ ॥
भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते।आविद्ध्याथ ३ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति।
चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः ॥ ३ ॥सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता ॥ १५ ॥
राजाने कहा-॥ १ ॥ भगवन् ! आपने रक्तबीजके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला देवी-चरित्रका यह अद्भुत माहात्म्य मुझे बतलाया ॥ २ ॥ अब रक्तबीजके मारे जानेपर अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए शुम्भ और निशुम्भने जो कर्म किया, उसको मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम्।<br>आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले ॥ १६ ॥<br>तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे।<br>भ्रातर्यतीव संक्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम् ॥ १७ ॥<br>स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः।
ऋषिरुवाच ॥ ४ ॥भुजैरष्टाभिरतुलैर्र्व्याप्याशेषं बभौ नभः ॥ १८ ॥
चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते।तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत्।
शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे ॥ ५ ॥ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम् ॥ १९ ॥
हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन्।पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च।
अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया ॥ ६ ॥समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना ॥ २० ॥
तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः।ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः।<br>पूरयामास गगनं गां तथैव ४ दिशो दश ॥ २१ ॥

१. पा०—ऽऽशु शरोत्करैः। २. पा०—आधान्तं। ३ पा०—अभ्रान्त। ४. पा०—तथोपदिशो।

२२४ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत्। कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः ॥ २२॥ अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह। तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ ॥ २३ ॥ दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा। तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः ॥ २४॥ शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा। आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया ॥ २५ ॥ सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम्। निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते ॥ २६॥ शुम्भमुक्ताञ्छरान्देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान्। चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २७॥ ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम्। स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह ॥ २८ ॥ ऋषि कहते हैं - ॥४॥ राजन् ! युद्धमें रक्तबीज तथा अन्य दैत्योंके मारे जानेपर शुम्भ और निशुम्भके क्रोधकी सीमा न रही ॥ ५॥ अपनी विशाल सेना इस प्रकार मारी जाती देख निशुम्भ अमर्षमें भरकर देवीकी ओर दौड़ा। उसके साथ असुरोंकी प्रधान सेना थी ॥६॥ उसके आगे, पीछे तथा पार्श्वभागमें बड़े-बड़े असुर थे, जो क्रोधसे ओठ चबाते हुए देवीको मार डालनेके लिये आये ॥७॥ महापराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेनाके साथ मातृगणोंसे युद्ध करके क्रोधवश चण्डिकाको मारनेके लिये आ पहुँचा ॥८॥ तब देवीके साथ शुम्भ और निशुम्भका घोर संग्राम छिड़ गया। वे दोनों दैत्य मेघोंकी भाँति बाणोंकी भयंकर वृष्टि कर रहे थे ॥ ९॥ उन दोनोंके चलाये हुए बाणोंको चण्डिकाने अपने बाणोंके समूहसे तुरंत काट डाला और शस्त्रसमूहोंकी वर्षा करके उन दोनों दैत्यपतियोंके अङ्गोंमें भी चोट पहुँचायी ॥ १० ॥ निशुम्भने तीखी तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर देवीके श्रेष्ठ वाहन सिंहके मस्तकपर प्रहार किया ॥ ११ ॥ अपने वाहनको चोट पहुँचनेपर देवीने क्षुरप्र नामक बाणसे निशुम्भकी श्रेष्ठ तलवार तुरंत ही काट डाली और उसकी ढालको भी, जिसमें आठ चाँद जड़े थे, खण्ड-खण्ड कर दिया ॥ १२ ॥ ढाल और तलवारके कट जानेपर उस असुरने शक्ति चलायी, किंतु सामने आनेपर देवीने चक्रसे उसके भी दो टुकड़े कर दिये ॥ १३ ॥ अब तो निशुम्भ क्रोधसे जल उठा और उस दानवने देवीको मारनेके लिये शूल उठाया; किंतु देवीने समीप आनेपर उसे भी मुक्केसे मारकर चूर्ण कर दिया ॥ १४॥ तब उसने गदा घुमाकर चण्डीके ऊपर चलायी, परंतु वह भी देवीके त्रिशूलसे कटकर भस्म हो गयी ॥ १५ ॥ तदनन्तर दैत्यराज निशुम्भको फरसा हाथमें लेकर आते देख देवीने बाणसमूहोंसे घायलकर धरतीपर सुला दिया ॥ १६ ॥ उस भयंकर पराक्रमी भाई निशुम्भके धराशायी हो जानेपर शुम्भको बड़ा क्रोध हुआ और अम्बिकाका वध करनेके लिये वह आगे बढ़ा ॥ १७ ॥ रथपर बैठे-बैठे ही उत्तम

  • निशुम्भ-वध * २२५

आयुधोंसे सुशोभित अपनी बड़ी-बड़ी आठ अनुपम भुजाओंसे समूचे आकाशको ढककर वह अद्भुत शोभा पाने लगा ॥ १८ ॥ उसे आते देख देवीने शङ्ख बजाया और धनुषकी प्रत्यञ्चाका भी अत्यन्त दुस्सह शब्द किया ॥ १९ ॥ साथ ही अपने घंटेके शब्दसे, जो समस्त दैत्य-सैनिकोंका तेज नष्ट करनेवाला था, सम्पूर्ण दिशाओंको व्याप्त कर दिया ॥ २० ॥ तदनन्तर सिंहने भी अपनी दहाड़से, जिसे सुनकर बड़े-बड़े गजराजोंका महान् मद दूर हो जाता था, आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाओंको गुँजा दिया ॥ २१ ॥ फिर कालीने आकाशमें उछलकर अपने दोनों हाथोंसे पृथ्वीपर आघात किया। उससे ऐसा भयंकर शब्द हुआ, जिससे पहलेके सभी शब्द शान्त हो गये ॥ २२ ॥ तत्पश्चात् शिवदूतीने दैत्योंके लिये अमङ्गलजनक अट्टहास किया, इन शब्दोंको सुनकर समस्त असुर थर्रा उठे; किंतु शुम्भको बड़ा क्रोध हुआ ॥ २३ ॥ उस समय देवीने जब शुम्भको लक्ष्य करके कहा- 'ओ दुरात्मन् ! खड़ा रह, खड़ा रह,' तभी आकाशमें खड़े हुए देवता बोल उठे, 'जय हो, जय हो' ॥ २४ ॥ शुम्भने वहाँ आकर ज्वालाओंसे युक्त अत्यन्त भयानक शक्ति चलायी। अग्निमय पर्वतके समान आती हुई उस शक्तिको देवीने बड़े भारी लुकेसे दूर हटा दिया ॥ २५ ॥ उस समय शुम्भके सिंहनादसे तीनों लोक गूँज उठे। राजन् ! उसकी प्रतिध्वनिसे वज्रपातके समान भयानक शब्द हुआ, जिसने अन्य सब शब्दोंको जीत लिया ॥ २६ ॥ शुम्भके चलाये हुए बाणोंके देवीने और देवीके चलाये हुए बाणोंके शुम्भने अपने भयंकर बाणोंद्वारा सैंकड़ों और हजारों टुकड़े कर दिये ॥ २७ ॥ तब क्रोधमें भरी हुई चण्डिकाने शुम्भको शूलसे मारा। उसके आघातसे मूच्छित हो वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २८ ॥ ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः । आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा ॥ २९ ॥ पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः । चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम् ॥ ३० ॥ ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी । चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान् ॥ ३१ ॥ ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम् । अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः ॥ ३२ ॥ तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका । खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे ॥ ३३ ॥ शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममराईनम् । हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका ॥ ३४ ॥ भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः । महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन् ॥ ३५ ॥ तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः । शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद्भुवि ॥ ३६ ॥ ततः सिंहश्चखादोग्रं १ दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् । असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान् ॥ ३७ ॥ कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः । ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः ॥ ३८ ॥ माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे । वाराहीतण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि ॥ ३९ ॥ खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः । वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथापरे ॥ ४० ॥ केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात् । भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः ॥ ॐ ॥ ४१ ॥ इतनेमें ही निशुम्भको चेतना हुई और उसने धनुष हाथमें लेकर बाणोंद्वारा देवी, काली तथा सिंहको घायल कर डाला ॥ २९ ॥ फिर उस दैत्यराजने दस हजार बाहें बनाकर चक्रोंके प्रहारसे चण्डिकाको आच्छादित कर दिया ॥ ३० ॥ तब दुर्गम पीड़ाका नाश करनेवाली भगवती दुर्गाने कुपित होकर अपने बाणोंसे उन चक्रों तथा १. पा०-दोग्रदंष्ट्रो । २. पा०-खण्डशखण्डं ।

२३६ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण > बाणोंको काट गिराया ॥ ३१ ॥ यह देख निशुम्भ दैत्यसेनाके साथ चण्डिकाका वध करनेके लिये हाथमें गदा ले बड़े वेगसे दौड़ा ॥ ३२ ॥ उसके आते ही चण्डीने तीखी धारवाली तलवारसे उसकी गदाको शीघ्र ही काट डाला। तब उसने शूल हाथमें लिया ॥ ३३ ॥ देवताओंको पीड़ा देनेवाले निशुम्भको शूल हाथमें गर्दन कुचलकर खाने लगा, वह बड़ा भयंकर दृश्य था। उधर काली तथा शिवदूतीने भी अन्यान्य दैत्योंका भक्षण आरम्भ किया ॥ ३७ ॥ कौमारीकी लिये आते देख चण्डिकाने वेगसे चलाये हुए अपने शूलसे उसकी छाती छेद डाली ॥ ३४ ॥ शूलसे विदीर्ण हो जानेपर उसकी छातीसे एक दूसरा महाबली एवं महापराक्रमी पुरुष 'खड़ी रह, खड़ी रह' कहता हुआ निकला ॥ ३५ ॥ उस निकलते हुए पुरुषकी बात सुनकर देवी ठठाकर हंस पड़ीं और खड्गसे उन्होंने उसका मस्तक काट डाला। फिर तो वह पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३६ ॥ तदनन्तर सिंह अपनी दाढ़ोंसे असुरोंकी शक्तिसे विदीर्ण होकर कितने ही महादैत्य नष्ट हो गये। ब्रह्माणीके मन्त्रपूत जलसे निस्तेज होकर कितने ही भाग खड़े हुए ॥ ३८ ॥ कितने ही दैत्य माहेश्वरीके त्रिशूलसे छिन्न-भिन्न हो धराशायी हो गये। वाराहीके थूथुनके आघातसे कितनोंका पृथ्वीपर कचूमर निकल गया ॥ ३९ ॥ वैष्णवीने भी अपने चक्रसे दानवोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। ऐन्द्रीके हाथसे छूटे हुए वज्रसे भी कितने ही प्राणोंसे हाथ धो बैठे ॥ ४० ॥ कुछ असुर नष्ट हो गये, कुछ उस महायुद्धसे भाग गये तथा कितने ही काली, शिवदूती तथा सिंहके ग्रास बन गये ॥ ४१ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये निशुम्भवधो नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ उवाच २, श्लोकाः ३९, एवम् ४१, एवमादितः ॥ ५४३ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'निशुम्भ-वध' नामक नवां अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

  • शुम्भ-वध * २२७ दशमोऽध्यायः शुम्भ-वध ध्यान ('ॐ' उत्तप्तहेमरुचिरां रविचन्द्रवह्नि- नेत्रां धनुश्शरयुताङ्कुशपाशशूलम्। रम्यैर्भुजैश्च दधतीं शिवशक्तिरूपां कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम् ॥ मैं मस्तकपर अर्द्धचन्द्र धारण करनेवाली शिवशक्तिस्वरूपा भगवती कामेश्वरीका हृदयमें चिन्तन करता हूँ। वे तपाये हुए सुवर्णके समान सुन्दर हैं। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि-ये ही तीन उनके नेत्र हैं तथा वे अपने मनोहर हाथोंमें धनुष-बाण, अङ्कुश, पाश और शूल धारण किये हुए हैं।) ऋषिरुवाच ॥ १ ॥ 'ॐ' निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम्। हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ॥ २ ॥ बलावलेपाद्दुष्टे १ त्वं मा दुर्गे गर्वमावह। अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी ॥ ३ ॥ ऋषि कहते हैं— ॥ १ ॥ राजन् ! अपने प्राणोंके समान प्यारे भाई निशुम्भको मारा गया देख तथा सारी सेनाका संहार होता जान शुम्भने कुपित होकर कहा— ॥ २ ॥ 'दुष्ट दुर्गे ! तू बलके अभिमानमें आकर झूठ-मूठका घमंड न दिखा। तू बड़ी मानिनी बनी हुई है, किन्तु दूसरी स्त्रियोंके बलका सहारा लेकर लड़ती है' ॥ ३ ॥ देव्युवाच ॥४॥ एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः २ ॥ ५ ॥ देवी बोलीं— ॥ ४ ॥ ओ दुष्ट ! मैं अकेली ही हूँ। इस संसारमें मेरे सिवा दूसरा कौन है। देख, वे मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतः मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं ॥ ५ ॥ ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम्। तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका ॥ ६ ॥ तदनन्तर ब्रह्माणी आदि समस्त देवियाँ अम्बिका देवीके शरीरमें लीन हो गयीं। उस समय केवल अम्बिका देवी ही रह गयीं ॥ ६ ॥ देव्युवाच ॥ ७ ॥ अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता। तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥ ८ ॥ देवी बोलीं— ॥ ७ ॥ मैं अपनी ऐश्वर्यशक्तिसे अनेक रूपोंमें यहाँ उपस्थित हुई थी। उन सब रूपोंको मैंने समेट लिया। अब अकेली ही युद्धमें खड़ी हूँ। तुम भी स्थिर हो जाओ ॥ ८ ॥ १. पा०-पदु० । २. इसके बाद किसी-किसी प्रतिमें 'ऋषिरुवाच' इतना अधिक पाठ है।

२२८ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •


(संस्कृत श्लोक)(संस्कृत श्लोक)
ऋषिरुवाच ॥ ९ ॥स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः<sup></sup>
ततः प्रवृत्ते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः ।अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥ २५ ॥
पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥ १० ॥तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् ।
शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथास्त्रैश्चैव दारुणैः ।जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥ २६ ॥
तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥ ११ ॥स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः ।
दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका ।चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ॥ २७ ॥
बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥ १२ ॥ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि ।
मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी ।जगत्स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥ २८ ॥
बभञ्ज लीलयैवो<sup></sup>ग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः ॥ १३ ॥उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः ।
ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः ।सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥ २९ ॥
सापि<sup></sup> तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ॥ १४ ॥ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ।
छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे ।बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥ ३० ॥
चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥ १५ ॥अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् ।ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ॥ ३१ ॥
अभ्यधावत्तदा<sup></sup> देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ॥ १६ ॥जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ॥ ॐ ॥ ३२ ॥
तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका ।(हिन्दी अनुवाद)
धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम्<sup></sup> ॥ १७ ॥ऋषि कहते हैं— ॥ ९ ॥ तदनन्तर देवी और
हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः ।शुम्भ दोनोंमें सब देवताओं तथा दानवोंके देखते-
जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः ॥ १८ ॥देखते भयङ्कर युद्ध छिड़ गया ॥ १० ॥ बाणोंकी
चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः ।वर्षा तथा तीखे शस्त्रों एवं दारुण अस्त्रोंके प्रहारके
तथापि सोऽभ्यधावन्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥ १९ ॥कारण उन दोनोंका युद्ध सब लोगोंके लिये बड़ा
स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः ।भयानक प्रतीत हुआ ॥ ११ ॥ उस समय अम्बिका
देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥ २० ॥देवीने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज
तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले ।शुम्भने उनके निवारक अस्त्रोंद्वारा काट डाला ॥ १२ ॥
स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥ २१ ॥इसी प्रकार शुम्भने भी जो दिव्य अस्त्र चलाये,
उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः ।उन्हें परमेश्वरीने भयङ्कर हुङ्कार शब्दके उच्चारण
तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥ २२ ॥आदिद्वारा खिलवाड़में ही नष्ट कर डाला ॥ १३ ॥
नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् ।तब उस असुरने सैकड़ों बाणोंसे देवीको आच्छादित
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥ २३ ॥कर दिया। यह देख क्रोधमें भरी हुई उन देवीने
ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह ।भी बाण मारकर उसका धनुष काट डाला ॥ १४ ॥
उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥ २४ ॥धनुष कट जानेपर फिर दैत्यराजने शक्ति हाथमें ली, किन्तु देवीने चक्रसे उसके हाथकी शक्तिको

१. पा०—हू० । २. पा०—सा च । ३. पा०—वत तां हन्तुं दैत्या० । ४. इसके बाद किसी-किसी प्रतिमें—‘अश्वांश्च पातयामास रथं सारथिना सह।’ इतना अधिक पाठ है। ५. पा०—वेगवान् ।

• शुम्भ-वध • २२५ भी काट गिराया ॥ १५ ॥ तत्पश्चात् दैत्योंके स्वामी शुम्भने सौ चाँदवाली चमकती हुई ढाल और तलवार हाथमें ले उस समय देवीपर धावा किया ॥ १६ ॥ उसके आते ही चण्डिकाने अपने धनुषसे छोड़े हुए तीखे बाणोंद्वारा उसकी सूर्य-किरणोंके समान उज्ज्वल ढाल और तलवारको तुरंत काट दिया ॥ १७॥ फिर उस दैत्यके घोड़े और सारथि मारे गये, धनुष तो पहले ही कट चुका था, अब उसने अम्बिकाको मारनेके लिये उद्यत हो भयंकर मुद्गर हाथमें लिया ॥१८॥ उसे आते देख देवीने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसका मुद्गर भी काट डाला, तिसपर भी वह असुर मुक्का तानकर बड़े वेगसे देवीकी ओर झपटा ॥ १९ ॥ उस दैत्यराजने देवीकी छातीमें मुक्का मारा, तब उन देवीने भी उसकी छातीमें एक चाँटा जड़ दिया ॥ २० ॥ देवीका थप्पड़ खाकर दैत्यराज शुम्भ पृथ्वीपर गिर पड़ा, किन्तु पुनः सहसा पूर्ववत् उठकर खड़ा हो गया ॥ २१ ॥ फिर वह उछला और देवीको ऊपर ले जाकर आकाशमें खड़ा हो गया; तब चण्डिका आकाशमें भी बिना किसी आधारके ही शुम्भके साथ युद्ध करने लगी ॥ २२ ॥ उस समय दैत्य और चण्डिका आकाशमें एक-दूसरेसे लड़ने लगे। उनका वह युद्ध पहले सिद्ध और मुनियोंको विस्मयमें डालनेवाले हुआ ॥ २३ ॥ फिर अम्बिकाने शुम्भके साथ बहुत देरतक युद्ध करनेके पश्चात् उसे उठाकर घुमाया और पृथ्वीपर पटक दिया ॥ २४ ॥ पटके जानेपर पृथ्वीपर आनेके बाद वह दुष्टात्मा दैत्य पुनः चण्डिकाका वध करनेके लिये उनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा ॥ २५ ॥ तब समस्त दैत्योंके राजा शुम्भको अपनी ओर आते देख देवीने त्रिशूलसे उसकी छाती छेदकर उसे पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ २६ ॥ देवीके शूलकी धारसे घायल होनेपर उसके प्राण पखेरू उड़ गये और वह समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीको कँपाता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ २७ ॥ तदनन्तर उस दुरात्माके मारे जानेपर सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया। आकाश स्वच्छ दिखायी देने लगा ॥ २८ ॥ पहले जो उत्पातसूचक मेघ और उल्कापात होते थे, वे सब शान्त हो गये तथा उस दैत्यके मारे जानेपर नदियाँ भी ठीक मार्गसे बहने लगीं ॥ २९ ॥ उस समय शुम्भकी मृत्युके बाद सम्पूर्ण देवताओंका हृदय हर्षसे भर गया और गन्धर्वगण मधुर गीत गाने लगे ॥ ३० ॥ दूसरे गन्धर्व बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं। पवित्र वायु बहने लगी। सूर्यकी प्रभा उत्तम हो गयी ॥ ३१ ॥ अग्निशालाकी बुझी हुई आग अपने- आप प्रज्वलित हो उठी तथा सम्पूर्ण दिशाओंके भयंकर शब्द शान्त हो गये ॥ ३२ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये शुम्भवधो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ उवाच ४, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः २३, एवम् ३२, एवमादितः ॥ ५७५ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'शुम्भ-वध' नामक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥

२३० • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •


एकादशोऽध्यायः

देवताओं द्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा देवताओंको वरदान

ध्यान (बालरविद्युतिमिन्दुकरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम् । स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् ॥ मैं भुवनेश्वरी देवीका ध्यान करता हूँ। उनके श्रीअङ्गोंकी आभा प्रभातकालके सूर्यके समान है। मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट है। वे उभरे हुए स्तनों और तीन नेत्रोंसे युक्त हैं। उनके मुखपर मुसकानकी छटा छायी रहती है और हाथोंमें वरद, अङ्कुश, पाश एवं अभय-मुद्रा शोभा पाते हैं।)

ऋषिरुवाच ॥ १ ॥

'ॐ' देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् । कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्<sup></sup> विकाशिवक्त्राब्जविकासिताशाः<sup></sup> ॥ २ ॥

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य । प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥ ३ ॥

आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैत- दाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥ ४ ॥

त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया । सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥ ५ ॥

विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु । त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥ ६ ॥

सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी<sup></sup> । त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ॥ ७ ॥

सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते । स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥

कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि । विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥

सर्वमङ्गलमङ्गल्ये<sup></sup> शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥

सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि । गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे । सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥

हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि । कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १३ ॥

त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि । माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥

मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे । कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १५ ॥

शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे । प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १६ ॥

गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे । वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १७ ॥

नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे । त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १८ ॥

किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले । वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ १९ ॥


१. पा०—लाभात् । २. पा०—वक्त्राब्ज वि० । ३. पा०—भुक्ति । ४. पा०—माङ्गल्ये ।

  • देवताओं‌द्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा देवताओंको वरदान * २३१ शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले। घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २० ॥ दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे। चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २१ ॥ लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टिस्वधे ध्रुवे। महारात्रि महाऽविद्ये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २२ ॥ मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि। नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥ २३ ॥ सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥ २४ ॥ एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्। पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥ २५ ॥ ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् । त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते ॥ २६ ॥ हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् । सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव ॥ २७॥ असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः । शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम् ॥ २८ ॥ रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् । त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ २९ ॥ एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य धर्मद्विषां देवि महासुराणाम् । रूपैरनेकैर्बहुधाऽऽत्ममूर्ति कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या ॥ ३० ॥ विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपे- ष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या। ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम् ॥ ३१ ॥ रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र। दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम् ॥ ३२ ॥ विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्। विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥ ३३ ॥ देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते- र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः। पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥ ३४ ॥ प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि। त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥ ३५ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ १॥ देवोंके द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुम्भके मारे जानेपर इन्द्र आदि देवता अग्निको आगे करके उन कात्यायनी देवीकी स्तुति करने लगे। उस समय अभीष्टकी प्राप्ति होनेसे उनके मुख-कमल दमक उठे थे और उनके प्रकाशसे दिशाएँ भी जगमगा उठी थीं ॥ २ ॥ देवता बोले- शरणागतकी पीड़ा दूर करनेवाली देवि ! हमपर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत्‌की माता ! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि ! विश्वकी रक्षा करो। देवि ! तुम्हीं चराचर जगत्की अधीश्वरी हो ॥ ३ ॥ तुम इस जगत्‌का एकमात्र आधार हो, क्योंकि पृथ्वीरूपमें तुम्हारी ही स्थिति है। देवि ! तुम्हारा पराक्रम अलङ्घनीय है। तुम्हीं जलरूपमें स्थित होकर सम्पूर्ण जगत्‌को तृप्त करती हो ॥ ४ ॥ तुम अनन्त बलसम्पन्न वैष्णवी शक्ति हो। इस विश्वकी कारणभूता परा माया हो। देवि ! तुमने इस समस्त जगत्‌को १. पा०-पुष्टे। २. पा०-रात्रे। ३. पा०-महामाये। ४. शान्तनवी टीकाकारने यहाँ एक श्लोक अधिक पाठ माना है, जो इस प्रकार है- 'सर्वतःपाणिपादान्ते सर्वतोऽक्षिशिरोमुखे । सर्वतः श्रवणघ्राणे नारायणि नमोऽस्तु ते॥'

२३२ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • मोहित कर रखा है। तुम्हीं प्रसन्न होनेपर इस पृथ्वीपर मोक्षकी प्राप्ति कराती हो ॥ ५॥ देवि! सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत्में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्ब! एकमात्र तुमने ही इस विश्वको व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थोंसे परे एवं परा वाणी हो ॥ ६ ॥ देवि ! जब तुम सर्वस्वरूप एवं स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हो, तब इसी रूपमें तुम्हारी स्तुति हो गयी। तुम्हारी स्तुतिके लिये इससे अच्छी उक्तियाँ और क्या हो सकती हैं? ॥ ७ ॥ बुद्धिरूपसे सब लोगोंके हृदयमें विराजमान रहनेवाली तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली नारायणी देवि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ ८ ॥ कला, काष्ठा आदिके रूपसे क्रमशः परिणाम (अवस्था-परिवर्तन)- की ओर ले जानेवाली तथा विश्वका उपसंहार करनेमें समर्थ नारायणी ! तुम्हें नमस्कार है ॥ ९ ॥ नारायणी ! तुम सब प्रकारका मङ्गल प्रदान करनेवाली मङ्गलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थोंको सिद्ध करनेवाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है ॥ १०॥ तुम सृष्टि, पालन और संहारकी शक्तिभूता, सनातनी देवी, गुणोंका आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ ११ ॥ शरणमें आये हुए दीनों एवं पीड़ितोंकी रक्षामें संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीड़ा दूर करनेवाली नारायणी देवि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ १२ ॥ नारायणि ! तुम ब्रह्माणीका रूप धारण करके हंसोंसे जुते हुए विमानपर बैठती तथा कुश-मिश्रित जल छिड़कती रहती हो। तुम्हें नमस्कार है ॥ १३ ॥ माहेश्वरीरूपसे त्रिशूल, चन्द्रमा एवं सर्पको धारण करनेवाली तथा महान् वृषभकी पीठपर बैठनेवाली नारायणी देवी ! तुम्हें नमस्कार है ॥ १४ ॥ मोरों और मुर्गोंसे घिरी रहनेवाली तथा महाशक्ति धारण करनेवाली कौमारीरूपधारिणी निष्पापे नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ १५ ॥ शङ्ख, चक्र, गदा और शार्ङ्गधनुरूप उत्तम आयुधोंको धारण करनेवाली वैष्णवी शक्तिरूपा नारायणि ! तुम प्रसन्न होओ। तुम्हें नमस्कार है ॥ १६ ॥ हाथमें भयानक महाचक्र लिये और दाढ़ोंपर धरतीको उठाये वाराहीरूपधारिणी कल्याणमयी नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ १७॥ भयङ्कर नृसिंहरूपसे दैत्योंके वधके लिये उद्योग करनेवाली तथा त्रिभुवनकी रक्षामें संलग्न रहनेवाली नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ १८ ॥ मस्तकपर किरीट और हाथमें महावज्र धारण करनेवाली, सहस्र नेत्रोंके कारण उद्दीप्त दिखायी देनेवाली और वृत्रासुरके प्राणोंका अपहरण करनेवाली इन्द्रशक्तिरूपा नारायणी देवि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ १९ ॥ शिवदूतीरूपसे दैत्योंकी महती सेनाका संहार करनेवाली, भयङ्कर रूप धारण तथा विकट गर्जना करनेवाली नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ २० ॥ दाढ़ोंके कारण विकराल

• देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति तथा देवीद्वारा देवताओंको वरदान • २३३ मुखवाली मुण्डमालासे विभूषित मुण्डमर्दिनी चामुण्डारूपा नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ २१ ॥ लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि तथा महा-अविद्यारूपा नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ २२ ॥ मेधा, सरस्वती, वरा (श्रेष्ठा), भूति (ऐश्वर्यरूपा), बाभ्रवी (भूरे रंगकी अथवा पार्वती), तामसी (महाकाली), नियता (संयमपरायणा) तथा ईशा (सबकी अधीश्वरी) रूपिणी नारायणि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ २३ ॥ सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि ! सब भयोंसे हमारी रक्षा करो; तुम्हें नमस्कार है ॥ २४ ॥ कात्यायनी ! यह तीन लोचनोंसे विभूषित तुम्हारा सौम्य मुख सब प्रकारके भयोंसे हमारी रक्षा करे। तुम्हें नमस्कार है ॥ २५ ॥ भद्रकाली ! ज्वालाओंके कारण विकराल प्रतीत होनेवाला, अत्यन्त भयङ्कर और समस्त असुरोंका संहार करनेवाला तुम्हारा त्रिशूल भयसे हमें बचाये। तुम्हें नमस्कार है ॥ २६ ॥ देवि ! जो अपनी ध्वनिसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके दैत्योंके तेज नष्ट किये देता है, वह तुम्हारा घंटा हमलोगोंकी पापोंसे उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रोंकी बुरे कर्मोंसे रक्षा करती है ॥ २७ ॥ चण्डिके ! तुम्हारे हाथोंमें सुशोभित खड्ग, जो असुरोंके रक्त और चर्बीसे चर्चित है, हमारा मङ्गल करे। हम तुम्हें नमस्कार करते हैं ॥ २८ ॥ देवि ! तुम प्रसन्न होनेपर सब रोगोंको नष्ट कर देती हो और कुपित होनेपर मनोवाञ्छित सभी कामनाओंका नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरणमें जा चुके हैं, उनपर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरणमें गये हुए मनुष्य दूसरोंको शरण देनेवाले हो जाते हैं ॥ २९ ॥ देवि ! अम्बिके !! तुमने अपने स्वरूपको अनेक भागोंमें विभक्त करके नाना प्रकारके रूपोंसे जो इस समय इन धर्मद्रोही महादैत्योंका संहार किया है, वह सब दूसरी कौन कर सकती थी ॥ ३० ॥ विद्याओंमें, ज्ञानको प्रकाशित करनेवाले शास्त्रोंमें तथा आदिवाक्यों (वेदों)-में तुम्हारे सिवा और किसका वर्णन है ? तथा तुमको छोड़कर दूसरी कौन ऐसी शक्ति है, जो इस विश्वको अज्ञानमय घोर अन्धकारसे परिपूर्ण ममतारूपी गढ़ेमें निरन्तर भटका रही हो ॥ ३१ ॥ जहाँ राक्षस, जहाँ भयङ्कर विषवाले सर्प, जहाँ शत्रु, जहाँ लुटेरोंकी सेना और जहाँ दावानल हो, वहाँ तथा समुद्रके बीचमें भी साथ रहकर तुम विश्वकी रक्षा करती हो ॥ ३२ ॥ विश्वेश्वरि ! तुम विश्वका पालन करती हो। विश्वरूपा हो, इसलिये सम्पूर्ण विश्वको धारण करती हो। तुम भगवान् विश्वनाथकी भी वन्दनीया हो। जो लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने मस्तक झुकाते हैं, वे सम्पूर्ण विश्वको आश्रय देनेवाले होते हैं ॥ ३३ ॥ देवि ! प्रसन्न होओ। जैसे इस समय असुरोंका वध करके तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार सदा हमें शत्रुओंके भयसे बचाओ। सम्पूर्ण जगत्का पाप नष्ट कर दो और उत्पात एवं पापोंके फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले महामारी आदि बड़े-बड़े उपद्रवोंको शीघ्र दूर करो ॥ ३४ ॥ विश्वकी पीड़ा दूर करनेवाली देवि ! हम तुम्हारे चरणोंपर पड़े हुए हैं, हमपर प्रसन्न होओ। त्रिलोकनिवासियोंकी पूजनीया परमेश्वरि ! सब लोगोंको वरदान दो ॥ ३५ ॥ देव्युवाच ॥ ३६ ॥ वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ। तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥ ३७ ॥ देवी बोलीं- ॥ ३६ ॥ देवताओ! मैं वर देनेको तैयार हूँ। तुम्हारे मनमें जिसकी इच्छा हो, वह वर माँग लो। संसारके लिये उस उपकारक वरको मैं अवश्य दूँगी ॥ ३७ ॥

२३४

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * देवा ऊचुः ॥३८॥ तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वासंख्येयषट्पदम् । सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ॥ ५३ ॥ एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ ३९ ॥ भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः । देवता बोले- ॥३८॥ सर्वेश्वरि ! तुम इसी इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति ॥ ५४॥ प्रकार तीनों लोकोंकी समस्त बाधाओंको शान्त तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ॥ ॐ ॥ ५५ ॥ करो और हमारे शत्रुओंका नाश करती रहो ॥ ३९ ॥ देवी बोलीं- ॥४०॥ देवताओ! वैवस्वत देवीरुवाच ॥ ४० ॥ मन्वन्तरके अट्ठाईसवें युगमें शुम्भ और निशुम्भ वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे। नामके दो अन्य महादैत्य उत्पन्न होंगे ॥ ४१ ॥ तब शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥ ४१॥ मैं नन्दगोपके घरमें उनकी पत्नी यशोदाके गर्भसे नन्दगोपगृहे १ जाता यशोदागर्भसम्भवा। अवतीर्ण हो विन्ध्याचलमें जाकर रहूँगी और उक्त ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ ४२ ॥ दोनों असुरोंका नाश करूँगी ॥ ४२ ॥ फिर अत्यन्त पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले। भयङ्कर रूपसे पृथ्वीपर अवतार ले मैं वैप्रचित्त अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान् ॥ ४३ ॥ नामवाले दानवोंका वध करूँगी ॥ ४३ ॥ उन भयंकर भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान्महासुरान् । महादैत्योंको भक्षण करते समय मेरे दाँत अनारके रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः ॥ ४४॥ फूलकी भाँति लाल हो जायँगे ॥ ४४ ॥ तब स्वर्गमें ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः । देवता और मर्त्यलोकमें मनुष्य सदा मेरी स्तुति स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम् ॥ ४५ ॥ करते हुए मुझे 'रक्तदन्तिका' कहेंगे ॥ ४५ ॥ फिर भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि । जब पृथ्वीपर सौ वर्षोंके लिये वर्षा रुक जायगी मुनिभिः संस्तुता भूमौ संभविष्याम्ययोनिजा ॥ ४६ ॥ और पानीका अभाव हो जायगा, उस समय ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन् । मुनियोंके स्तवन करनेपर मैं पृथ्वीपर अयोनिया- कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः ॥ ४७॥ रूपमें प्रकट होऊँगी ॥ ४६ ॥ और सौ नेत्रोंसे ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः । मुनियोंकी ओर देखूँगी। अतः मनुष्य 'शताक्षी' भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः ॥ ४८ ॥ इस नामसे मेरा कीर्तन करेंगे ॥४७॥ देवताओ ! शाकाम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि । उस समय मैं अपने शरीरसे उत्पन्न हुए शाकोंद्वारा तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम् ॥ ४९ ॥ समस्त संसारका भरण पोषण करूँगी। जबतक दुर्गा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति । वर्षा नहीं होगी, तबतक वे शाक ही सबके पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले ॥ ५० ॥ प्राणोंकी रक्षा करेंगे ॥ ४८ ॥ ऐसा करनेके कारण रक्षांसि भक्षयिष्यामि २ मुनीनां त्राणकारणात् । पृथ्वीपर 'शाकम्भरी' के नामसे मेरी ख्याति तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः ॥ ५१ ॥ होगी। उसी अवतारमें मैं दुर्गम नामक महादैत्यका भीमा देवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति । वध भी करूँगी ॥ ४९ ॥ इससे मेरा नाम 'दुर्गादेवी' यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति ॥ ५२ ॥ के रूपसे प्रसिद्ध होगा। फिर जब मैं भीमरूप १. पा० - कुले। २. पा०- भक्षयिष्ये। (शमयिष्यामि इति वा)।

• देवी-चरित्रोंके पाठका माहात्म्य * २३५ धारण करके मुनियोंकी रक्षाके लिये हिमालयपर पैरोंवाले असंख्य भ्रमरोंका रूप धारण करके रहनेवाले राक्षसोंका भक्षण करूँगी, उस समय उस महादैत्यका वध करूँगी ॥ ५३॥ उस सब मुनि भक्तिसे नतमस्तक होकर मेरी समय सब लोग 'भ्रामरी' के नामसे चारों ओर स्तुति करेंगे ॥५०-५१ ॥ तब मेरा नाम 'भीमादेवी' मेरी स्तुति करेंगे। इस प्रकार जब-जब के रूपमें विख्यात होगा। जब अरुण नामक संसारमें दानवी बाधा उपस्थित होगी, तब- दैत्य तीनों लोकोंमें भारी उपद्रव मचायेगा ॥ ५२ ॥ तब अवतार लेकर मैं शत्रुओंका संहार तब मैं तीनों लोकोंका हित करनेके लिये छः करूँगी ॥ ५४-५५ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देव्याः स्तुतिर्नामकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ उवाच ४, अर्धश्लोकः १, श्लोकाः ५०, एवम् ५५, एवमादितः ॥ ६३० ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'देवीस्तुति' नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥११॥ द्वादशोऽध्यायः देवी-चरित्रोंके पाठका माहात्म्य ध्यान मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम्। ( ॐ विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद् वधं शुम्भनिशुम्भयोः ॥ ३ ॥ कन्याभिः करवालखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम्। अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः । हस्तैश्चक्रगदासिखेटविशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम् ॥ ४ ॥ बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां भजे ॥ न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद् दुष्कृतोत्था न चापदः । मैं तीन नेत्रोंवाली दुर्गादेवीका ध्यान करता हूँ, भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम् ॥ ५ ॥ उनके श्रीअङ्गोंकी प्रभा बिजलीके समान है। वे शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः । सिंहके कंधेपर बैठी हुई भयङ्कर प्रतीत होती हैं। न शस्त्रानलतोयौघात्कदाचित्सम्भविष्यति ॥ ६ ॥ हाथोंमें तलवार, ढाल लिये अनेक कन्याएँ उनकी तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः । सेवामें खड़ी हैं। वे अपने हाथोंमें चक्र, गदा, श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं हि तत् ॥ ७ ॥ तलवार, ढाल, बाण, धनुष, पाश और तर्जनी मुद्रा उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान् । धारण किये हुए हैं। उनका स्वरूप अग्निमय है तथा तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम ॥ ८ ॥ वे माथेपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करती हैं।) यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम। देव्युवाच ॥ १ ॥ सदा न तद्विमोक्ष्यामि सांनिध्यं तत्र मे स्थितम् ॥ ९ ॥ 'ॐ' एभिः स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः । बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे । तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम् ॥ २॥ सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च ॥ १० ॥ १. पा०-शम०।

२३६

  • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण * जानताऽजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम्। प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथा कृतम् ॥ १२॥ शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी। तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः ॥ १३ ॥ सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥ १४॥ श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयः शुभाः। पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान् ॥ १५ ॥ रिपवः संक्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते। नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम् ॥ १६ ॥ शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने । ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम ॥ १७॥ उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः। दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते ॥ १८ ॥ बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम्। संघातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम् ॥ १९॥ दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम्। रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम् ॥ २० ॥ सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम्। पशुपुष्पार्थ्यधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः ॥ २१ ॥ विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम् । अन्यैश्च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या ॥ २२ ॥ प्रीतिर्मे क्रियते सास्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते। श्रुतं हरति पापानि तथाऽऽरोग्यं प्रयच्छति ॥ २३ ॥ रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम। युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम् ॥ २४ ॥ तस्मिञ्छुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते। युष्माभिः स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिः कृताः ॥ २५ ॥ ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां मतिम्। अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः ॥ २६ ॥ दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः । सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः ॥ २६ ॥ राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा। आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे ॥ २७ ॥ पतत्सु चापि शस्त्रेषु संग्रामे भृशदारुणे। सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा ॥ २८ ॥ स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत सङ्कटात् । मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा ॥ २९ ॥ दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम ॥ ३० ॥ देवी बोलीं- ॥ १ ॥ देवताओ ! जो एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन इन स्तुतियोंसे मेरा स्तवन करेगा, उसकी सारी बाधा मैं निश्चय ही दूर कर दूँगी ॥ २ ॥ जो मधु कैटभका नाश, महिषासुरका वध तथा शुम्भ-निशुम्भके संहारके प्रसङ्गका पाठ करेंगे ॥ ३ ॥ तथा अष्टमी, चतुर्दशी और नवमीको भी जो एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक मेरे उत्तम माहात्म्यका श्रवण करेंगे ॥ ४ ॥ उन्हें कोई पाप नहीं छू सकेगा। उनपर पापजनित आपत्तियाँ भी नहीं आयेंगी। उनके घरमें कभी दरिद्रता नहीं होगी तथा उनको कभी प्रेमी जनोंके विछोहका कष्ट भी नहीं भोगना पड़ेगा ॥ ५ ॥ इतना ही नहीं, उन्हें शत्रुसे, लुटेरोंसे, राजासे, शस्त्रसे, अग्निसे तथा जलकी राशिसे भी कभी भय नहीं होगा ॥ ६ ॥ इसलिये सबको एकाग्रचित्त होकर भक्तिपूर्वक मेरे इस माहात्म्यको सदा पढ़ना और सुनना चाहिये। यह परम कल्याणकारक है ॥ ७॥ मेरा माहात्म्य महामारीजनित समस्त उपद्रवों तथा आध्यात्मिक आदि तीनों प्रकारके उत्पातोंको शान्त करनेवाला है ॥८॥ मेरे जिस मन्दिरमें प्रतिदिन विधिपूर्वक मेरे इस माहात्म्यका पाठ किया जाता १. पा० - प्रतीक्षिष्यामि । २. पा० - सर्वबाधा।
  • दवा-चारत्राक पाठका माहात्म्य * २३७ है, उस स्थानको मैं कभी नहीं छोड़ती। वहाँ सदा ही मेरा संनिधान बना रहता है॥ ९॥ बलिदान, पूजा, होम तथा महोत्सवके अवसरोंपर मेरे इस चरित्रका पूरा-पूरा पाठ और श्रवण करना चाहिये ॥ १० ॥ ऐसा करनेपर मनुष्य विधिको जानकर या बिना जाने भी मेरे लिये जो बलि, पूजा या होम आदि करेगा, उसे मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ ग्रहण करूँगी ॥ ११ ॥ शरत्कालमें जो वार्षिक महापूजा की जाती है, उस अवसरपर जो मेरे इस माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनेगा, वह मनुष्य मेरे प्रसादसे सब बाधाओंसे मुक्त तथा धन, धान्य एवं पुत्रसे सम्पन्न होगा- इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ॥ १२-१३॥ मेरा यह माहात्म्य, मेरे प्रादुर्भावकी सुन्दर कथाएँ तथा युद्धमें किये हुए मेरे पराक्रम सुननेसे मनुष्य निर्भय हो जाता है ॥ १४ ॥ मेरे माहात्म्यका श्रवण करनेवाले पुरुषोंके शत्रु नष्ट हो जाते हैं, उन्हें कल्याणकी प्राप्ति होती तथा उनका कुल आनन्दित रहता है ॥ १५ ॥ सर्वत्र शान्ति-कर्ममें, बुरे स्वप्न दिखायी देनेपर तथा ग्रहजनित भयङ्कर पीड़ा उपस्थित होनेपर मेरा माहात्म्य श्रवण करना चाहिये ॥ १६ ॥ इससे सब विघ्न तथा भयङ्कर ग्रह-पीड़ाएँ शान्त हो जाती हैं और मनुष्योंद्वारा देखा हुआ दुःस्वप्न शुभ-स्वप्नमें परिवर्तित हो जाता है ॥ १७ ॥ बालग्रहोंसे आक्रान्त हुए बालकोंके लिये यह माहात्म्य शान्तिकारक है तथा मनुष्योंके संगठनमें फूट होनेपर यह अच्छी प्रकार मित्रता करानेवाला होता है ॥ १८ ॥ यह माहात्म्य समस्त दुराचारियोंके बलका नाश करनेवाला है। इसके पाठमात्रसे राक्षसों, भूतों और पिशाचोंका नाश हो जाता है ॥ १९ ॥ मेरा यह सब माहात्म्य मेरे सामीप्यकी प्राप्ति करानेवाला है। पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, दीप, गन्ध आदि उत्तम सामग्रियोंद्वारा पूजन करनेसे, ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे, होम करनेसे, प्रतिदिन अभिषेक करनेसे, नाना प्रकारके अन्य भोगोंका अर्पण करनेसे तथा दान देने आदिसे एक वर्षतक जो मेरी आराधना की जाती है और उससे मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी प्रसन्नता मेरे इस उत्तम चरित्रका एक बार श्रवण करनेमात्रसे हो जाती है। यह माहात्म्य श्रवण करनेपर पापोंको हर लेता और आरोग्य प्रदान करता है ॥ २०-२१ ॥ मेरे प्रादुर्भावका कीर्तन समस्त भूतोंसे रक्षा करता है तथा मेरा युद्धविषयक चरित्र दुष्ट दैत्योंका संहार करनेवाला है ॥ २२ ॥ इसके श्रवण करनेपर मनुष्योंको शत्रु का भय नहीं रहता। देवताओ ! तुमने और ब्रह्मर्षियोंने जो मेरी स्तुतियाँ की हैं ॥ २४ ॥ तथा ब्रह्माजीने जो स्तुतियाँ की हैं, वे सभी कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। वनमें, सूने मार्गमें अथवा दावानलसे घिर जानेपर ॥ २५ ॥ निर्जन स्थानमें, लुटेरोंके दावमें पड़ जानेपर या शत्रुओंसे पकड़े जानेपर अथवा जंगलमें सिंह, व्याघ्र या जंगली हाथियोंके पीछा करनेपर ॥ २६ ॥ कुपित राजाके आदेशसे वध या बन्धनके स्थानमें ले जाये जानेपर अथवा महासागरमें नावपर बैठनेके बाद भारी तूफानसे नावके डगमग होनेपर ॥ २७ ॥ और अत्यन्त भयङ्कर युद्धमें शस्त्रोंका प्रहार होनेपर अथवा वेदनासे पीड़ित होनेपर, किंबहुना सभी भयानक बाधाओंके उपस्थित होनेपर ॥ २८ ॥ जो मेरे इस चरित्रका स्मरण करता है, वह मनुष्य संकटसे मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभावसे सिंह आदि हिंसक जन्तु नष्ट हो जाते हैं तथा

२३८ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण • लुटेरे और शत्रु भी मेरे चरित्रका स्मरण करनेवाले पुरुषसे दूर भागते हैं॥ २९-३०॥ ऋषिरुवाच ॥ ३१ ॥ इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा ॥ ३२ ॥ पश्यतामेव' देवानां तत्रैवान्तरधीयत । तेऽपि देवा निरातङ्काः स्वाधिकारान् यथा पुरा ॥ ३३ ॥ यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विहततारयः । दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि ॥ ३४ ॥ जगद्विध्वंसिनि तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे । निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः ॥ ३५ ॥ एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः। सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम् ॥ ३६ ॥ तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते । सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति ॥ ३७॥ व्याप्तं तयैतत्स्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर । महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया ॥ ३८ ॥ सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा । स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी ॥ ३९ ॥ भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे । सैवाभावे तथालक्ष्मीर्विनाशायोपजायते ॥ ४० ॥ स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिभिस्तथा । ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥ ॐ ॥ ४१ ॥ ऋषि कहते हैं- ॥ ३१ ॥ यों कहकर प्रचण्ड पराक्रमवाली भगवती चण्डिका सब देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गयीं। फिर समस्त देवता भी शत्रुओंके मारे जानेसे निर्भय हो पहलेकी ही भाँति यज्ञभागका उपभोग करते हुए अपने अपने अधिकारका पालन करने लगे। संसारका विध्वंस करनेवाले महाभयङ्कर अतुलपराक्रमी देवशत्रु शुम्भ तथा महाबली निशुम्भके युद्धमें देवीद्वारा मारे जानेपर शेष दैत्य पाताललोकमें चले आये ॥ ३२-३५॥ राजन् ! इस प्रकार भगवती अम्बिका देवी नित्य होती हुई भी पुनः पुनः प्रकट होकर जगत्की रक्षा करती हैं ॥ ३६ ॥ वे ही इस विश्वको मोहित करतीं, वे ही जगत्को जन्म देतीं तथा वे ही प्रार्थना करनेपर सन्तुष्ट हो विज्ञान एवं समृद्धि प्रदान करती हैं ॥ ३७॥ राजन् ! महाप्रलयके समय महामारीका स्वरूप धारण करनेवाली वे महाकाली ही इस समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त हैं॥ ३८ ॥ वे ही समय-समयपर महामारी होती और वे ही स्वयं अजन्मा होती हुई भी सृष्टिके रूपमें प्रकट होती हैं। वे सनातनी देवी ही समयानुसार सम्पूर्ण भूतोंकी रक्षा करती हैं॥ ३९ ॥ मनुष्योंके अभ्युदयके समय वे ही घरमें लक्ष्मीके रूपमें स्थित हो उन्नति प्रदान करती हैं और वे ही अभावके समय दरिद्रता बनकर विनाशका कारण होती हैं ॥ ४० ॥ पुष्प, धूप और गन्ध आदिसे पूजन करके उनकी स्तुति करनेपर वे धन, पुत्र, धार्मिक बुद्धि तथा उत्तम गति प्रदान करती हैं ॥ ४१ ॥ इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे सावर्णिके मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये फलस्तुतिर्नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ उवाच १, अर्धश्लोकौ २, श्लोकाः ३७, एवम् ४१, एवमादितः ॥ ६७१ ॥ इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत देवीमाहात्म्यमें 'फलस्तुति' नामक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥ १. ना०- तां सर्वदेवानां० २. ग०- तथा।

  • सुरथ और वैश्यको देवीका वरदान * | २३९

त्रयोदशोऽध्यायः

सुरथ और वैश्यको देवीका वरदान

| ध्यान | प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम्। | | ( ॐबालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्। | निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च ॥ ८ ॥ | | पाशाङ्कुशवराभीतीर्धारयन्तीं शिवां भजे॥ | जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने। | | जो उदयकालके सूर्यमण्डलकी-सी कान्ति धारण करनेवाली हैं, जिनके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं तथा जो अपने हाथोंमें पाश, अङ्कुश, वर एवं अभयकी मुद्रा धारण किये रहती हैं, उन शिवा देवीका मैं ध्यान करता हूँ।) | संदर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः ॥ ९ ॥<br>स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन्।<br>तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् ॥ १० ॥<br>अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः।<br>निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ ॥ ११ ॥ | | ऋषिरुवाच॥ १ ॥ | ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम्। | | 'ॐ' एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम्। | एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः ॥ १२ ॥ | | एवं प्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत् ॥ २ ॥ | परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका ॥ १३॥ | | विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया। | मार्कण्डेयजी कहते हैं— ॥ ६॥ क्रौष्टुकिजी! | | तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः ॥ ३ ॥ | मेधामुनिके ये वचन सुनकर राजा सुरथने उत्तम | | मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे। | व्रतका पालन करनेवाले उन महाभाग महर्षिको | | तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ॥ ४ ॥ | प्रणाम किया। वे अत्यन्त ममता और राज्यापहरणसे | | आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥ ५ ॥ | बहुत खिन्न हो चुके थे॥ ७-८॥ महामुने! | | ऋषि कहते हैं— ॥ १॥ राजन्! इस प्रकार | इसलिये विरक्त होकर वे राजा तथा वैश्य | | मैंने तुमसे देवीके अनुपम माहात्म्यका वर्णन | तत्काल तपस्याको चले गये और वे जगदम्बाके | | किया। जो इस जगत्‌को धारण करती हैं, उन | दर्शनके लिये नदीके तटपर रहकर तपस्या करने | | देवीका ऐसा ही प्रभाव है॥२॥ वे ही | लगे ॥ ९ ॥ वे वैश्य उत्तम देवीसूक्तका जप करते | | विद्या (ज्ञान) उत्पन्न करती हैं। भगवान् विष्णुकी | हुए तपस्यामें प्रवृत्त हुए। वे दोनों नदीके तटपर | | मायास्वरूपा उन भगवतीके द्वारा ही तुम, ये | देवीकी मृण्मयी मूर्ति बनाकर पुष्प, धूप और | | वैश्य तथा अन्यान्य विवेकी जन मोहित होते | हवन आदिके द्वारा उनकी आराधना करने लगे। | | हैं, मोहित हुए हैं तथा आगे भी मोहित होंगे। | उन्होंने पहले तो आहारको धीरे-धीरे कम | | महाराज! तुम उन्हीं परमेश्वरीकी शरणमें | किया; फिर बिल्कुल निराहार रहकर देवीमें ही | | जाओ॥ ३-४॥ आराधना करनेपर वे ही | मन लगाये एकाग्रतापूर्वक उनका चिन्तन आरम्भ | | मनुष्योंको भोग, स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान | किया ॥ १०-११ ॥ वे दोनों अपने शरीरके रक्तसे | | करती हैं॥ ५॥ | प्रोक्षित बलि देते हुए लगातार तीन वर्षोंतक | | मार्कण्डेय उवाच॥ ६ ॥ | संयमपूर्वक आराधना करते रहे॥ १२॥ इसपर | | इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः ॥ ७ ॥ | प्रसन्न होकर जगत्‌को धारण करनेवाली चण्डिका |