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संक्षिप्त मार्कण्डेय पुराण

Markandeya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ
  • अदितिके गर्भसे भगवान् सूर्यका अवतार * २५७

अदितिके गर्भसे भगवान् सूर्यका अवतार

मार्कण्डेयजी कहते हैं—मुने ! इस जगत्‌की सृष्टि करके ब्रह्माजीने पूर्वकल्पोंके अनुसार वर्ण, आश्रम, समुद्र, पर्वत और द्वीपोंका विभाग किया। देवता, दैत्य तथा सर्प आदिके रूप और स्थान भी पहलेकी ही भाँति बनाये। ब्रह्माजीके मरीचि नामसे विख्यात जो पुत्र थे, उनके पुत्र कश्यप हुए। उनकी तेरह पत्नियाँ हुईं, वे सब-की-सब प्रजापति दक्षकी कन्याएँ थीं। उनसे देवता, दैत्य और नाग आदि बहुत-से पुत्र उत्पन्न हुए। अदितिने त्रिभुवनके स्वामी देवताओंको जन्म दिया। दितिने दैत्योंको तथा दनुने महापराक्रमी एवं भयानक दानवोंको उत्पन्न किया। विनतासे गरुड और अरुण—दो पुत्र हुए। खसाके पुत्र यक्ष और राक्षस हुए। कद्रूने नागोंको और मुनिने गन्धर्वोंको जन्म दिया। क्रोधासे कुल्याएँ तथा अरिष्टासे अप्सराएँ उत्पन्न हुईं। इराके ऐरावत आदि हाथियोंको उत्पन्न किया। ताम्राके गर्भसे श्येनी आदि कन्याएँ पैदा हुईं। उन्हींके पुत्र श्येन (बाज), भास और शुक आदि पक्षी हुए। इलासे वृक्ष तथा प्रथासे जलजन्तु उत्पन्न हुए। कश्यप मुनिके अदितिके गर्भसे जो सन्तानें हुईं, उनके पुत्र-पौत्र, दौहित्र तथा उनके भी पुत्रों आदिसे यह सारा संसार व्याप्त है। कश्यपके पुत्रोंमें देवता प्रधान हैं। इनमें कुछ तो सात्त्विक हैं, कुछ राजस हैं और कुछ तामस हैं। ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजीने देवताओंको यज्ञभागका भोक्ता तथा त्रिभुवनका स्वामी बनाया; परन्तु उनके सौतेले भाई दैत्यों, दानवों और राक्षसोंने एक साथ मिलकर उन्हें कष्ट पहुँचाना आरम्भ कर दिया। इस कारण एक हजार दिव्य वर्षोंतक उनमें बड़ा भयङ्कर युद्ध हुआ। अन्तमें देवता पराजित हुए और बलवान् दैत्यों तथा दानवोंकी विजय प्राप्त हुई। अपने पुत्रोंको दैत्यों और दानवोंके द्वारा पराजित एवं त्रिभुवनके राज्याधिकारसे वञ्चित तथा उनका यज्ञभाग छिन गया देख माता अदिति अत्यन्त शोकसे पीड़ित हो गयीं। उन्होंने भगवान् सूर्यकी आराधनाके लिये महान् यत्न आरम्भ किया। वे नियमित आहार करती हुई कठोर नियमोंका पालन और आकाशमें स्थित तेजोराशि भगवान् सूर्यका स्तवन करने लगीं।

अदिति बोलीं—भगवन्! आप अत्यन्त सूक्ष्म सुनहरी आभासे युक्त दिव्य शरीर धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप तेजःस्वरूप, तेजस्वियोंके ईश्वर, तेजके आधार एवं सनातन पुरुष हैं; आपको प्रणाम है। गोपते! आप जगत्‌का उपकार करनेके लिये जब अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल ग्रहण करते हैं, उस समय आपका जो तीव्र रूप प्रकट होता है, उसे मैं नमस्कार करती हूँ। आठ महीनोंतक सोममय रसको ग्रहण करनेके लिये आप जो अत्यन्त तीव्र-रूप धारण करते हैं, उसे मैं प्रणाम करती हूँ। भास्कर! उसी सम्पूर्ण रसको बरसानेके लिये जब आप छोड़नेको उद्यत होते हैं, उस समय आपका जो तृप्तिकारक मेघरूप प्रकट होता है, उसको मेरा नमस्कार है। इस प्रकार जलकी वर्षासे उत्पन्न हुए सब प्रकारके अन्नोंको पकानेके लिये आप जो भास्कर-रूप धारण करते हैं, उसे मैं प्रणाम करती हूँ। तरणे! जड़हन धानकी वृद्धिके लिये जो आप पाला गिराने आदिके कारण अत्यन्त शीतल रूप धारण करते हैं, उसको मेरा नमस्कार है। सूर्यदेव! वसन्त ऋतुमें जो आपका सौम्य रूप प्रकट होता है, जिसमें न अधिक गर्मी होती है न अधिक सर्दी, उसे मेरा बारंबार नमस्कार है। जो सम्पूर्ण देवताओं तथा पितरोंको तृप्त करनेवाला और

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अनाजको पकानेवाला है, आपके उस रूपको नमस्कार है। जो रूप लताओं और वृक्षोंका एकमात्र जीवनदाता तथा अमृतमय है, जिसे देवता और पितर पान करते हैं, आपके उस सोम-रूपको नमस्कार है। आपका यह विश्वमय स्वरूप ताप एवं तृप्ति प्रदान करनेवाले अग्नि और सोमके द्वारा व्याप्त है, आपको नमस्कार है। विभावसो! आपका जो रूप ऋक्, यजु और साममय तेजोंकी एकतासे इस विश्वको तपाता है तथा जो वेदत्रयीस्वरूप है, उसको मेरा नमस्कार है। तथा जो उससे भी उत्कृष्ट रूप है, जिसे 'ॐ' कहकर पुकारा जाता है, जो स्थूल, अनन्त और निर्मल है, उस सदात्माको नमस्कार है।

इस प्रकार देवी अदिति नियमपूर्वक रहकर दिन-रात सूर्यदेवकी स्तुति करने लगीं। उनकी आराधनाकी इच्छासे वे प्रतिदिन निराहार ही रहती थीं। तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर भगवान् सूर्यने दक्षकन्या अदितिको आकाशमें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। अदितिने देखा, आकाशसे पृथ्वीतक तेजका एक महान् पुञ्ज स्थित है। उदीप्त ज्वालाओंके कारण उसकी ओर देखना कठिन हो रहा है। उन्हें देखकर देवी अदितिको बड़ा भय हुआ। वे बोलीं—गोपते! आप मुझपर प्रसन्न हों। मैं पहले आकाशमें आपको जिस प्रकार देखती थी, वैसे आज नहीं देख पाती। इस समय यहाँ भूतलपर मुझे केवल तेजका समुदाय दिखायी दे रहा है। दिवाकर! मुझपर कृपा कीजिये, जिससे आपके रूपका दर्शन कर सकूँ। भक्तवत्सल प्रभो! मैं आपकी भक्त हूँ, आप मेरे पुत्रोंकी रक्षा कीजिये। आप ही ब्रह्मा होकर इस विश्वकी सृष्टि करते हैं, आप ही पालन करनेके लिये उद्यत होकर इसकी रक्षा करते हैं तथा अन्तमें यह सब कुछ आपमें ही लीन होता है। सम्पूर्ण लोकमें आपके सिवा दूसरी कोई गति नहीं है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण, वायु, चन्द्रमा, अग्नि, आकाश, पर्वत और समुद्र हैं। आपका तेज सबका आत्मा है। आपकी क्या स्तुति की जाय। यज्ञेश्वर! प्रतिदिन अपने कर्ममें लगे हुए ब्राह्मण भाँति-भाँतिके पदोंसे आपकी स्तुति करते हुए यजन करते हैं। जिन्होंने अपने चित्तको वशमें कर लिया है, वे योगनिष्ठ पुरुष योगमार्गसे आपका ही ध्यान करते हुए परमपदको प्राप्त होते हैं। आप विश्वको ताप देते, उसे पकाते, उसकी रक्षा करते और उसे भस्म कर डालते हैं; फिर आप ही जलगर्भित शीतल किरणोंद्वारा इस विश्वको प्रकट करते और आनन्द देते हैं। कमलयोनि ब्रह्माके रूपमें आप ही सृष्टि करते हैं। अच्युत (विष्णु) नामसे आप ही पालन करते हैं तथा कल्पान्तमें रुद्र-रूप धारण करके आप ही सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—तदनन्तर भगवान् सूर्य अपने उस तेजसे प्रकट हुए। उस समय वे तपाये हुए ताँबेके समान कान्तिमान् दिखायी देते थे। देवी अदिति उनका दर्शन करके चरणोंमें गिर पड़ीं। तब भगवान् सूर्यने कहा—'देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मुझसे माँग लो।' तब देवी अदिति घुटनेके बलसे पृथ्वीपर बैठ गयीं और मस्तक नवाकर प्रणाम करके वरदायक भगवान् सूर्यसे बोलीं—'देव! आप प्रसन्न हों। अधिक बलवान् दैत्यों और दानवोंने मेरे पुत्रोंके हाथसे त्रिभुवनका राज्य और यज्ञभाग छीन लिये हैं। गोपते! उन्हें प्राप्त करानेके निमित्त आप मुझपर कृपा करें। आप अपने अंशसे देवताओंके बन्धु होकर उनके शत्रुओंका नाश करें। प्रभो! आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे पुत्र पुनः यज्ञभागके भोक्ता तथा त्रिभुवनके स्वामी हो जायें।'

तब भगवान् सूर्यने अदितिसे प्रसन्न होकर कहा—'देवि! मैं अपने सहस्र अंशोंसहित तुम्हारे गर्भसे अवतीर्ण होकर तुम्हारे पुत्रके शत्रुओंका नाश करूँगा।' इतना कहकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो

अदितिके गर्भसे भगवान् सूर्यका अवतार २५१

गये और अदिति भी सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जानेके कारण तपस्यासे निवृत्त हो गयीं। तदनन्तर सूर्यकी सुषुम्णा नामवाली किरण, जो सहस्र किरणोंका समुदाय थी, देवमाता अदितिके गर्भमें अवतीर्ण हुई। देवमाता अदिति एकाग्रचित्त हो कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि व्रतोंका पालन करने लगीं और अत्यन्त पवित्रतापूर्वक उस गर्भको धारण किये रहीं, यह देख महर्षि कश्यपने कुछ कुपित होकर कहा—'तुम नित्य उपवास करके अपने गर्भके बच्चेको क्यों मारे डालती हो?' यह सुनकर उसने कहा—'देखिये,

यह रहा गर्भका बच्चा; मैंने इसे मारा नहीं है, यह स्वयं ही अपने शत्रुओंको मारनेवाला होगा।'

यों कहकर देवी अदितिने उस गर्भको उदरसे बाहर कर दिया। वह अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी उस गर्भको देखकर कश्यपने प्रणाम किया और आदि ऋचाओंके द्वारा आदरपूर्वक उसकी स्तुति की। उनके स्तुति करनेपर शिशुरूपधारी सूर्य उस अण्डाकार गर्भसे प्रकट हो गये। उनके शरीरकी कान्ति कमलपत्रके समान श्याम थी। वे अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंका मुख उज्ज्वल कर रहे थे। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ कश्यपको सम्बोधित करके मेघके समान गम्भीर वाणीमें आकाशवाणी हुई—"मुने! तुमने अदितिसे कहा था कि इस अण्डेको क्यों मार रही है-उस समय तुमने 'मारितम् अण्डम्' का उच्चारण किया था, इसलिये तुम्हारा यह पुत्र 'मार्तण्ड'के नामसे विख्यात होगा और शक्तिशाली होकर सूर्यके अधिकारका पालन करेगा; इतना ही नहीं, यह यज्ञभागका अपहरण करनेवाले देवशत्रु असुरोंका संहार भी करेगा।'

यह आकाशवाणी सुनकर देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ और दानव बलहीन हो गये; तब इन्द्रने दैत्योंको युद्धके लिये ललकारा। दानव भी उनका सामना करनेके लिये आ पहुँचे। फिर तो देवताओंका असुरोंके साथ घोर संग्राम हुआ। उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी चमकसे तीनों लोकोंमें प्रकाश छा गया। उस युद्धमें भगवान् सूर्यकी क्रूर दृष्टि पड़ने तथा उनके तेजसे दग्ध होनेके कारण सब असुर जलकर भस्म हो गये। अब तो देवताओंके हर्षकी सीमा न रही। उन्होंने तेजके उत्पत्तिस्थान भगवान् सूर्य और अदितिका स्तवन किया। उन्हें पूर्ववत् अपने अधिकार और यज्ञके भाग प्राप्त हो गये! भगवान् सूर्य भी अपने अधिकारका पालन करने लगे। वे नीचे और ऊपर फैली हुई किरणोंके कारण कदम्बपुष्पके समान सुशोभित हो रहे थे। उनका मण्डल गोलाकार अग्निपिण्डके समान है।

तदनन्तर भगवान् सूर्यको प्रसन्न करके प्रजापति विश्वकर्माने विनयपूर्वक अपनी संज्ञा नामकी कन्या उनको ब्याह दी। विवस्वान्‌से संज्ञाके गर्भसे वैवस्वत मनुका जन्म हुआ। वैवस्वत मनुकी विशेष कथा पहले ही बतलायी जा चुकी है।

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सूर्यकी महिमाके प्रसङ्गमें राजा राज्यवर्धनकी कथा

क्रौष्टुकि बोले— भगवन्! आपने आदिदेव भगवान् सूर्यके माहात्म्य और स्वरूपका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। अब मैं उनकी महिमाका वर्णन सुनना चाहता हूँ। आप प्रसन्न होकर बतानेकी कृपा करें।

मार्कण्डेयजीने कहा— ब्रह्मन्! मैं तुम्हें आदिदेव सूर्यका माहात्म्य बताता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें दमके पुत्र राज्यवर्धन बड़े विख्यात राजा हो गये हैं। वे अपने राज्यका धर्मपूर्वक पालन करते थे, इसीलिये वहाँके धन-जनकी दिनोंदिन वृद्धि होने लगी। उस राजाके शासनकालमें समस्त राष्ट्र तथा नगरों और गाँवोंके लोग अत्यन्त स्वस्थ एवं प्रसन्न रहते थे। वहाँ कभी कोई उत्पात नहीं होता था, रोग भी नहीं सताता था। साँपोंके काटनेका तथा अनावृष्टिका भय भी नहीं था। राजाने बड़े-बड़े यज्ञ किये। याचकोंको दान दिये और धर्मके अनुकूल रहकर विषयोंका उपभोग किया। इस प्रकार राज्य करते तथा प्रजाका भलीभाँति पालन करते हुए उस राजाके सात हजार वर्ष ऐसे बीत गये, मानो एक ही दिन व्यतीत हुआ हो। दक्षिण देशके राजा विदूरथकी पुत्री मानिनी राज्यवर्धनकी पत्नी थी। एक दिन वह सुन्दरी राजाके मस्तकमें तेल लगा रही थी। उस समय वह राजपरिवारके देखते-देखते आँसू बहाने लगी। रानीके आँसुओंकी बूँदें जब राजाके शरीरपर पड़ीं तो उसे मुखपर आँसू बहाती देख उन्होंने मानिनीसे पूछा—'देवि! यह क्या?' स्वामीके इस प्रकार पूछनेपर उस मनस्विनीने कहा—'कुछ नहीं।' जब राजाने बार-बार पूछा, तब उस सुन्दरीने राजाकी केशराशिमें एक पका बाल दिखाया और कहा—'राजन्! यह देखिये। क्या यह मुझ अभागिनीके लिये खेदका विषय नहीं है?' यह सुनकर राजा हँसने लगे। उन्होंने वहाँ एकत्रित हुए समस्त राजाओंके सामने अपनी पत्नीसे हँसकर कहा—'शुभे! शोककी क्या बात है? तुम्हें रोना नहीं चाहिये। जन्म, वृद्धि और परिणाम आदि विकार सभी जीवधारियोंके होते हैं। मैंने तो समस्त वेदोंका अध्ययन किया, हजारों यज्ञ किये, ब्राह्मणोंको दान दिया और मेरे कई पुत्र भी हुए। अन्य मनुष्योंके लिये जो अत्यन्त दुर्लभ हैं, ऐसे उत्तम भोग भी मैंने तुम्हारे साथ भोग लिये। पृथ्वीका भलीभाँति पालन किया और युद्धमें भलीभाँति अपने धर्मको निभाया। भद्रे! और कौन सा ऐसा शुभ कर्म है, जो मैंने नहीं किया। फिर इन पके बालोंसे तुम क्यों डरती हो। शुभे! मेरे बाल पक जायँ, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जायँ तथा यह देह भी शिथिल हो जाय, कोई चिन्ता नहीं है। मैं अपने कर्तव्यका पालन कर चुका हूँ। कल्याणी! तुमने मेरे मस्तकपर जो पका बाल दिखाया है, अब बनवास लेकर उसकी भी दवा करता हूँ। पहले बाल्यावस्था और कुमारावस्थामें तत्कालोचित कार्य किया जाता है, फिर युवावस्थामें यौवनोचित कार्य होते हैं तथा बुढ़ापेमें वनका आश्रय लेना उचित है। मेरे पूर्वजों तथा उनके भी पूर्वजोंने ऐसा ही किया है, अतः मैं तुम्हारे आँसू बहानेका कोई कारण नहीं देखता। पके बालका दिखायी देना तो मेरे लिये महान् अभ्युदयका कारण है।'

महाराजकी यह बात सुनकर वहाँ उपस्थित हुए अन्य राजा, पुरवासी तथा पार्श्ववर्ती मनुष्य उनसे शान्तिपूर्वक बोले—'राजन्! आपकी इन महारानीको रोनेकी आवश्यकता नहीं है। रोना तो हमलोगोंको अथवा समस्त प्राणियोंको चाहिये,

  • सूर्यकी महिमाके प्रसङ्गमें राजा राज्यवर्धनकी कथा * २६१

क्योंकि आप हमें छोड़कर वनवास लेनेकी बात मुँहसे निकाल रहे हैं। महाराज! आपने हमारा लालन-पालन किया है। आपके चले जानेकी बात सुनकर हमारे प्राण निकले जाते हैं। आपने सात हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन किया है। अब आप वनमें रहकर जो तपस्या करेंगे, वह इस पृथ्वी-पालनजनित पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकती।'

राजाने कहा—'मैंने सात हजार वर्षोंतक इस पृथ्वीका पालन किया, अब मेरे लिये यह वनवासका समय आ गया। मेरे कई पुत्र हो गये। मेरी सन्तानोंको देखकर थोड़े ही दिनोंमें यमराज मेरा यहाँ रहना नहीं सह सकेगा। नागरिको ! मेरे मस्तकपर जो यह सफेद बाल दिखायी देता है, इसे अत्यन्त भयानक कर्म करनेवाली मृत्युका दूत समझो; अतः मैं राज्यपर अपने पुत्रका अभिषेक करके सब भोगोंको त्याग दूँगा और वनमें रहकर तपस्या करूँगा। जबतक यमराजके सैनिक नहीं आते, तभीतक यह सब कुछ मुझे कर लेना है।

तदनन्तर वनमें जानेकी इच्छासे महाराजने ज्योतिर्विदोंको बुलाया और पुत्रके राज्याभिषेकके लिये शुभ दिन एवं लग्न पूछे। राजाकी बात सुनकर वे शास्त्रदर्शी ज्योतिषी व्याकुल हो गये। उन्हें दिन, लग्न और होरा आदिका ठीक ज्ञान न हो सका। तदनन्तर अन्य नगरों, अधीनस्थ राज्यों तथा उस नगरसे भी बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मण आये और वनमें जानेके लिये उत्सुक राजा राज्यवर्धनसे मिले। उस समय उनका माथा काँप उठा। वे बोले—'राजन् ! हमपर प्रसन्न होइये और पहलेकी भाँति अब भी हमारा पालन कीजिये। आपके वन चले जानेपर समस्त जगत् सङ्कटमें पड़ जायगा; अतः आप ऐसा यत्न करें, जिससे जगत्को कष्ट न हो।'

इसके बाद मन्त्रियों, सेवकों, वृद्ध नागरिकों और ब्राह्मणोंने मिलकर सलाह की, 'अब यहाँ क्या करना चाहिये ?' राजा राज्यवर्धन अत्यन्त धार्मिक थे। उनके प्रति सब लोगोंका अनुराग था; इसलिये सलाह करनेवाले लोगोंमें यह निश्चय हुआ कि 'हम सब लोग एकाग्रचित्त एवं भलीभाँति ध्यानपरायण होकर तपस्याद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना करके इन महाराजके लिये आयुकी प्रार्थना करें।' इस प्रकार एक निश्चय करके कुछ लोग अपने घरोंपर विधिपूर्वक अर्घ्य, उपचार आदि उपहारोंसे भगवान् भास्करकी पूजा करने लगे। दूसरे लोग मौन रहकर ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके जपसे सूर्यदेवको सन्तुष्ट करने लगे। अन्य लोग निराहार रहकर नदीके तटपर निवास करते हुए तपस्याके द्वारा भगवान् सूर्यकी आराधनामें लग गये। कुछ लोग अग्निहोत्र करते, कुछ दिन-रात सूर्यसूक्तका पाठ करते और कुछ लोग सूर्यकी ओर दृष्टि लगाकर खड़े रहते थे।

सूर्यकी आराधनाके लिये इस प्रकार यत्न करनेवाले उन लोगोंके समीप आकर सुदामा नामक गन्धर्वने कहा—'द्विजवरो ! यदि आपलोगोंको सूर्यदेवकी आराधना अभीष्ट है तो ऐसा कीजिये, जिससे भगवान् भास्कर प्रसन्न हो सकें। आपलोग यहाँसे शीघ्र ही कामरूप पर्वतपर जाइये। वहाँ गुरुविशाल नामक वन है, जिसमें सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँपर एकाग्रचित्त होकर आपलोग सूर्यकी आराधना करें। वह परम हितकारी सिद्ध क्षेत्र है। वहाँ आपलोगोंकी सब कामनाएँ पूर्ण होंगी।'

सुदामाकी यह बात सुनकर वे समस्त द्विज गुरुविशाल वनमें गये। वहाँ उन्होंने सूर्यदेवका पवित्र एवं सुन्दर मन्दिर देखा। उस स्थानपर ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंके लोग मिताहारी एवं

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एकाग्रचित्त हो पुष्प, चन्दन, धूप, गन्ध, जप, होम, अन्न और दीप आदिके द्वारा भगवान् सूर्यकी पूजा एवं स्तुति करने लगे।

**ब्राह्मण बोले—**देवता, दानव, यक्ष, ग्रह और नक्षत्रोंमें भी जो सबसे अधिक तेजस्वी हैं, उन भगवान् सूर्यकी हम शरण लेते हैं। जो देवेश्वर भगवान् सूर्य आकाशमें स्थित होकर चारों ओर प्रकाश फैलाते तथा अपनी किरणोंसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त किये रहते हैं, उनकी हम शरण लेते हैं। आदित्य, भास्कर, भानु, सविता, दिवाकर, पूषा, अर्यमा, स्वर्भानु तथा दीप्त-दीधिति—ये जिनके नाम हैं, जो चारों युगोंका अन्त करनेवाले कालाग्नि हैं, जिनकी ओर देखना कठिन है, जिनकी प्रलयके अन्तमें भी गति है, जो योगेश्वर, अनन्त, रक्त, पीत, सित और असित हैं, ऋषियोंके अग्निहोत्रों तथा यज्ञके देवताओंमें जिनकी स्थिति है, जो अक्षर, परम गुह्य तथा मोक्षके उत्तम द्वार हैं, जिनके उदयास्तमनरूप रथमें छन्दोमय अश्व जुते हुए हैं तथा जो उस रथपर बैठकर मेरुगिरिकी प्रदक्षिणा करते हुए आकाशमें विचरण करते हैं, अनृत और ऋत दोनों ही जिनके स्वरूप हैं, जो भिन्न-भिन्न पुण्य तीर्थोंके रूपमें विराजमान हैं, एकमात्र जिनपर इस विश्वकी रक्षा निर्भर है, जो कभी चिन्तनमें नहीं आ सकते, उन भगवान् भास्करकी हम शरण लेते हैं। जो ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, प्रजापति, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी, पर्वत, समुद्र, ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा आदि हैं, वनस्पति, वृक्ष और ओषधियाँ जिनके स्वरूप हैं, जो व्यक्त और अव्यक्त प्राणियोंमें स्थित हैं, उन भगवान् सूर्यकी हम शरण लेते हैं। ब्रह्मा, शिव तथा विष्णुके जो रूप हैं, वे आपके ही हैं। जिनके तीन स्वरूप हैं, वे भगवान् भास्कर हमपर प्रसन्न हों। जिन अजन्मा जगदीश्वरके अङ्गमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है तथा जो जगत्के जीवन हैं, वे भगवान् सूर्य हमपर प्रसन्न हों। जिनका एक परम प्रकाशमान रूप ऐसा है, जिसकी ओर प्रभा-पुञ्जकी अधिकताके कारण देखना कठिन हो जाता है तथा जिनका दूसरा रूप चन्द्रमा है, जो अत्यन्त सौम्य है, वे भगवान् भास्कर हमपर प्रसन्न हों।

इस प्रकार भक्तिपूर्वक स्तवन और पूजन करनेवाले उन द्विजोंपर तीन महीनेमें भगवान् सूर्य प्रसन्न हुए और अपने मण्डलसे निकलकर उसीके समान कान्ति धारण किये वे नीचे उतरे और दुर्दर्श होते हुए भी उन सबके समक्ष प्रकट हो गये। तब उन लोगोंने अजन्मा सूर्यदेवके स्पष्ट रूपका दर्शन करके उन्हें भक्तिसे विनीत होकर प्रणाम किया। उस समय उनके शरीरमें रोमाञ्च और कम्प हो रहा था। वे बोले—'सहस्र किरणोंवाले सूर्यदेव! आपको बारंबार नमस्कार है। आप सबके हेतु तथा सम्पूर्ण जगत्के विजयकेतु हैं; आप ही सबके रक्षक, सबके पूज्य, सम्पूर्ण यज्ञोंके आधार तथा योगवेत्ताओंके ध्येय हैं; आप हमपर प्रसन्न हों।'

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**तब भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर सब लोगोंसे कहा—'द्विजगण! आपको जिस वस्तुकी इच्छा हो, वह मुझसे माँगें।' यह सुनकर ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोगोंने उन्हें प्रणाम करके कहा—'अन्धकारका नाश करनेवाले भगवान् सूर्यदेव! यदि आप हमारी भक्तिसे प्रसन्न हैं तो हमारे राजा राज्यवर्धन नीरोग, शत्रुविजयी, सुन्दर केशोंसे युक्त तथा स्थिर यौवनवाले होकर दस हजार वर्षोंतक जीवित रहें।'

  • सूर्यकी महिमाके प्रसङ्गमें राजा राज्यवर्धनकी कथा * २६३

'तथास्तु' कहकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये। वे सब लोग भी मनोवाञ्छित वर पाकर प्रसन्नतापूर्वक महाराजके पास लौट आये। वहाँ उन्होंने सूर्यसे वर पाने आदिकी सब बातें यथावत् कह सुनायीं। यह सुनकर रानी मानिनीको बड़ा हर्ष हुआ, परन्तु राजा बहुत देरतक चिन्तामें पड़े रहे। वे उन लोगोंसे कुछ न बोले। मानिनीका हृदय हर्षसे भरा हुआ था। वह बोली—'महाराज! बड़े भाग्यसे आयुकी वृद्धि हुई है। आपका अभ्युदय हो। राजन्! इतने बड़े अभ्युदयके समय आपको प्रसन्नता क्यों नहीं होती? दस हजार वर्षोंतक आप नीरोग रहेंगे, आपकी जवानी स्थिर रहेगी; फिर भी आपको खुशी क्यों नहीं होती?'

राजा बोले—कल्याणी! मेरा अभ्युदय कैसे हुआ। तुम मेरा अभिनन्दन क्यों करती हो? जब हजार-हजार दुःख प्राप्त हो रहे हैं, उस समय किसीको बधाई देना क्या उचित माना जाता है? मैं अकेला ही तो दस हजार वर्षोंतक जीवित रहूँगा। मेरे साथ तुम तो नहीं रहोगी। क्या तुम्हारे मरनेपर मुझे दुःख नहीं होगा? पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, इष्ट बन्धु बान्धव, भक्त, सेवक तथा मित्रवर्ग—वे सब मेरी आँखोंके सामने मरेंगे। उस समय मुझे अपार दुःखका सामना करना पड़ेगा। जिन लोगोंने अत्यन्त दुर्बल होकर शरीरकी नाड़ियाँ सुखा-सुखाकर मेरे लिये तपस्या की, वे सब तो मरेंगे और मैं भोग भोगते हुए जीवित रहूँगा। ऐसी दशामें क्या मैं धिक्कार देनेयोग्य नहीं हूँ? सुन्दरी! इस प्रकार मुझपर यह आपत्ति आ गयी। मेरा अभ्युदय नहीं हुआ है। क्या तुम इस बातको नहीं समझती? फिर क्यों मेरा अभिनन्दन कर रही हो।

मानिनी बोली—महाराज! आप जो कहते हैं, वह सब ठीक है। मैंने तथा पुरवासियोंने आपके प्रेमवश इस दोषकी ओर नहीं देखा है। नरनाथ! ऐसी अवस्थामें क्या करना चाहिये, यह आप ही सोचें, क्योंकि भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर जो कुछ कहा है, वह अन्यथा नहीं हो सकता।

राजाने कहा—देवि! पुरवासियों और सेवकोंने प्रेमवश मेरे साथ जो उपकार किया है, उसका बदला चुकाये बिना मैं किस प्रकार भोग भोगूँगा। यदि भगवान् सूर्यकी ऐसी कृपा हो कि समस्त प्रजा, भृत्यवर्ग, तुम, अपने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और मित्र भी जीवित रह सकें तो मैं राज्यसिंहासनपर बैठकर प्रसन्नतापूर्वक भोगोंका उपभोग कर सकूँगा। यदि वे ऐसी कृपा नहीं करेंगे तो मैं उसी कामरूप पर्वतपर निराहार रहकर तबतक तपस्या करूँगा, जबतक कि इस जीवनका अन्त न हो जाय।

२६४ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

राजाके यों कहनेपर रानी भामिनीने कहा—'ऐसा ही हो।' फिर वह भी महाराजके साथ कामरूप पर्वतपर चली गयी। वहाँ पहुँचकर राजाने पत्नीके साथ सूर्यमन्दिरमें जाकर सेवापरायण हो भगवान् भानुकी आराधना आरम्भ की। दोनों दम्पति उपवास करते-करते दुर्बल हो गये। सर्दी, गर्मी और वायुका कष्ट सहन करते हुए दोनोंने घोर तपस्या की। सूर्यकी पूजा और भारी तपस्या करते करते जब एक वर्षसे अधिक समय व्यतीत हो गया, तब भगवान् भास्कर प्रसन्न हुए। उन्होंने राजाको समस्त सेवकों, पुरवासियों और पुत्रों आदिके लिये इच्छानुसार वरदान दिया। वर पाकर राजा अपने नगरको लौट आये और धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ राज्य करने लगे। धर्मज्ञ राजाने बहुत-से यज्ञ किये और दिन-रात खुले हाथ दान किया। वे अपने पुत्र, पौत्र और भृत्य आदिके साथ यौवनको स्थिर रखते हुए दस हजार वर्षोंतक जीवित रहे। उनका यह चरित्र देखकर भृगुवंशी प्रमतिने विस्मित होकर यह गाथा गायी—'अहो! भगवान् सूर्यके भजनकी कैसी शक्ति है, जिससे राजा राज्यवर्द्धन अपने तथा स्वजनोंके लिये आयुवर्द्धन बन गये।'

जो मनुष्य ब्राह्मणोंके मुखसे भगवान् सूर्यके इस उत्तम माहात्म्यका श्रवण तथा पाठ करता है, वह सात रातके किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाता है। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रसङ्गमें सूर्यदेवके जो मन्त्र आये हैं, उनमेंसे एक एकका भी यदि तीनों सन्ध्याओंके समय जप किया जाय तो वह समस्त पातकोंका नाश करनेवाला होता है। सूर्यके जिस मन्दिरमें इस समूचे माहात्म्यका पाठ किया जाता है, वहाँ भगवान् सूर्य अपना सान्निध्य नहीं छोड़ते। अतः ब्रह्मन्! यदि तुम्हें महान् पुण्यकी प्राप्ति अभीष्ट हो तो सूर्यके इस उत्तम माहात्म्यको मन-ही-मन धारण एवं जप करते रहो। द्विजश्रेष्ठ! जो सोनेके सींग और अत्यन्त सुन्दर शरीरवाली दुधारू गाय दान करता है तथा जो अपने मनको संयममें रखकर तीन दिनोंतक इस माहात्म्यका श्रवण करता है, उन दोनोंको समान ही पुण्यफलकी प्राप्ति होती है।

• दिष्टपुत्र नाभागका चरित्र • २६५

दिष्टपुत्र नाभागका चरित्र

मार्कण्डेयजी कहते हैं— इक्ष्वाकु, नाभग, रिष्ट, नरिष्यन्त, नाभाग, पृषध्र और धृष्ट—ये वैवस्वत मनुके पुत्र थे, जो पृथक्-पृथक् राज्यके पालक हुए। इन सबकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई थी और वे सभी शास्त्रविद्या तथा शस्त्रविद्यामें भी पारङ्गत थे। विद्वानोंमें श्रेष्ठ मनुने एक श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे मित्रावरुण नामक यज्ञ किया। उसमें होताके दोषसे विपरीत आहुति पड़नेके कारण पुत्र न होकर इला नामकी सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। कन्या उत्पन्न हुई देख मनुने मित्र और वरुणका स्तवन किया तथा इस प्रकार कहा—'देववरो! मैंने इस उद्देश्यसे यज्ञ किया था कि आप दोनोंकी कृपासे मुझे एक विशिष्ट पुत्रकी प्राप्ति हो; किन्तु यज्ञ सम्पन्न होनेपर कन्याका जन्म हुआ। यदि आप दोनों प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरी यह कन्या ही आप दोनोंके प्रसादसे अत्यन्त गुणवान् पुत्र हो जाय।' उन दोनों देवताओंने 'तथास्तु' कहा। जिससे वही कन्या इला तत्काल ही सुद्युम्न नामक पुत्रके रूपमें परिवर्तित हो गयी। मनुकुमार सुद्युम्न एक दिन वनमें शिकार खेल रहे थे। वहाँ महादेवजीके कोपसे उन्हें पुनः स्त्रीरूपमें हो जाना पड़ा। उस समय चन्द्रमाके पुत्र बुधने इलाके गर्भसे पुरूरवा नामक चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न किया। पुत्र हो जानेके बाद राजा सुद्युम्नने अश्वमेध नामक महान् यज्ञ करके पुनः पुरुष-रूप प्राप्त कर लिया। सुद्युम्नके तीन पुत्र हुए, जो उत्कल, विनय और गयके नामसे प्रसिद्ध थे। उन्होंने धर्ममें मन लगाकर इस पृथ्वीका पालन किया। राजा सुद्युम्न जब स्त्रीके रूपमें थे, तब उनके गर्भसे पुरूरवाका जन्म हुआ। पुरूरवा बुधके पुत्र थे, इसलिये उन्हें सुद्युम्नके राज्यका भाग नहीं मिला। तदनन्तर वसिष्ठजीके कहनेसे पुरूरवाको प्रतिष्ठान नामक उत्तम नगर दे दिया गया।

दिष्ट नामके एक राजा थे, जिनके पुत्रका नाम नाभाग¹ था। यौवनके आरम्भमें ही उसकी दृष्टि एक वैश्य-कन्यापर पड़ी, जो बहुत ही सुन्दरी थी। उसको देखते ही नाभागका मन कामके अधीन हो गया। उसने उसके पिताके पास जाकर वह कन्या माँगी। वैश्यने देखा, राजकुमारका मन अपने वशमें नहीं है, वे कामके अधीन हो चुके हैं। तब उसने हाथ जोड़कर उनसे कहा—'राजकुमार! आपलोग राजा हैं और हमलोग कर देनेवाले भृत्य। मैं आपके बराबर नहीं हूँ, फिर हमारे साथ आप वैवाहिक सम्बन्ध कैसे करना चाहते हैं।

राजकुमारने कहा— काम और मोह आदिने मानव-शरीरकी समानता सिद्ध कर दी है। मुझे तुम्हारी कन्या पसंद है, अतः उसे मुझे दे दो; अन्यथा मेरा यह शरीर जीवित नहीं रह सकता।

वैश्य बोला— हम और आप दोनों ही राजाके अधीन हैं। पहले आप अपने पिताजीसे आज्ञा ले लीजिये; फिर मैं कन्या दूँगा और आप ग्रहण कर लीजियेगा।

राजकुमारने कहा— गुरुजनोंके अधीन रहनेवाले पुत्रोंको उचित है कि वे अन्य सभी कार्योंमें गुरुजनोंसे पूछें, किन्तु ऐसे कार्योंमें पूछना ठीक नहीं। ऐसी बातें तो उनके सामने मुखसे निकालना भी कठिन हैं। कहाँ कामचर्चा और कहाँ गुरुजनोंको सुनाना; ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं। हाँ, अन्य


१. ये 'नाभाग' मनु-पुत्र नाभागसे भिन्न हैं।
[ 539 ] सं० पा० पृ०—१०

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कार्योंके लिये उनसे पूछनेमें कोई हर्ज नहीं।

वैश्य बोला—ठीक है, आप अपने पिताजीसे पूछें तो आपके लिये यह कामचर्चा हो सकती है; किन्तु मेरे लिये यह कामचर्चा नहीं है, अतः मैं ही पूछूँगा।

वैश्यके यों कहनेपर राजकुमार चुप हो गये। तब उसने राजकुमारका जो विचार था, वह सब उसके पितासे कह सुनाया। तब राजकुमारके पिताने ऋचीक आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा राजकुमारको भी महलमें बुलाकर मुनियोंसे सब वृत्तान्त निवेदन किया और कहा—'इस विषयमें जो कर्तव्य हो, उसके लिये आपलोग आज्ञा दें।'

ऋषि बोले—राजकुमार! पहले तुम्हारा विवाह किसी मूर्द्धाभिषिक्त राजाकी कन्यासे होना चाहिये। उसके बाद यह वैश्य-कन्या भी तुम्हारी स्त्री हो सकती है। ऐसा करनेसे दोष न होगा। अन्यथा पहले ही वैश्य-कन्याका अपहरण करनेपर तुम्हारी उत्कृष्ट जाति चली जायगी।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—यह सुनकर नाभागने उन महात्माओंके वचनकी अवहेलना कर दी और घरसे निकलकर तलवार हाथमें ले वह बोला—'मैंने राक्षस-विवाहके अनुसार इस वैश्य-कन्याका अपहरण किया है। जिसकी सामर्थ्य हो, वह इसे मेरे हाथसे छुड़ा ले।' वैश्यने उस कन्याको राजकुमारके चंगुलमें पड़ी देख 'त्राहि, त्राहि' कहते हुए उसके पिताकी शरण ली। तब राजकुमारके पिताने कुपित होकर बहुत बड़ी सेनाको आज्ञा दी, 'दुष्ट नाभाग धर्मको कलङ्कित कर रहा है, अतः उसे मार डालो, मार डालो।' राजाकी आज्ञा पाकर सेनाने राजकुमारके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। नाभाग अस्त्रोंका ज्ञाता था, उसने अपने अस्त्र-शस्त्रोंसे अधिकांश सैनिकोंको मार गिराया। राजकुमारके द्वारा सेनाके मारे जानेका समाचार सुनकर राजा अपने सैनिकोंको साथ ले स्वयं ही युद्धके लिये गये। फिर तो उनका अपने पुत्रके साथ संग्राम छिड़ गया। उसमें अस्त्र-शस्त्रोंके प्रयोगमें राजकुमारकी अपेक्षा उसके पिता ही बढ़े-चढ़े सिद्ध हुए। इसी समय सहसा आकाशसे परिव्राट् मुनि उतर पड़े और राजासे बोले—'महाभाग! अपने पुत्रके साथ युद्ध बंद कीजिये, वह अपने धर्मसे भ्रष्ट हो चुका है। पुरुष अपने वर्णकी कन्याके साथ विवाह न करके जिस-जिस हीन जातिकी कन्याका पाणिग्रहण करता है, उसी-उसीके वर्णका वह भी हो जाता है। अतः आपका यह मन्दबुद्धि पुत्र अब वैश्य हो गया है, इसका क्षत्रियके साथ युद्ध करनेका अधिकार नहीं है। इसलिये अब आप युद्धसे निवृत्त हो जाइये।' तब राजा अपने पुत्रके साथ युद्ध करनेसे रुक गये। उसने भी उस वैश्य-कन्याके साथ विवाह कर लिया। वैश्यत्वको प्राप्त होनेपर उसने राजाके पास जाकर पूछा—'भूपाल! अब मेरा जो कर्तव्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजिये।'

राजा ने कहा—बाभ्रव्य आदि तपस्वी धार्मिक न्यायके लिये नियुक्त हैं, वे तुम्हारे लिये जो कर्म धर्मानुकूल बतावें, उसीका अनुष्ठान करो।

तब राजसभामें रहनेवाले बाभ्रव्य आदि मुनियोंने नाभागके लिये पशुपालन, कृषि तथा वाणिज्य—ये ही उत्तम धर्म बतलाये। राजाकी आज्ञाके अनुसार उसने भी वैसा ही किया। नाभागके उस वैश्य-कन्यासे एक पुत्र हुआ, जिसका नाम भान्दन था।

वत्सप्रीके द्वारा कुजृम्भका वध तथा उसका मुदावतीके साथ विवाह २६७

वत्सप्रीके द्वारा कुजृम्भका वध तथा उसका मुदावतीके साथ विवाह

मार्कण्डेयजी कहते हैं— इस पृथ्वीपर विदूरथ नामके एक राजा हो चुके हैं। उनकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई थी। उनके दो पुत्र थे—सुनीति और सुमति। एक दिन राजा विदूरथ शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ उन्हें एक विशाल गड्ढा दिखायी दिया, जो पृथ्वीका मुख-सा प्रतीत होता था। उसे देखकर राजाने सोचा, यह भयंकर गर्त क्या है? मालूम होता है पातालतक जानेवाली गुफा है, पृथ्वीका साधारण गर्त नहीं; देखनेमें भी पुराना नहीं जान पड़ता। उस निर्जन वनमें इस प्रकार सोचते-विचारते हुए राजाने वहाँ सुव्रत नामके तपस्वी ब्राह्मणको आते देखा और निकट आनेपर उनसे पूछा—'यह क्या है? यह गर्त बहुत ही गहरा है, इसमें पृथ्वीका भीतरी भाग दिखायी दे रहा है।'

ऋषिने कहा— राजन्! क्या आप इसे नहीं जानते? इस पृथ्वीपर जो कुछ भी है, वह सब राजाको जानना चाहिये। रसातलमें एक महापराक्रमी भयंकर दानव निवास करता है; वह पृथ्वीको जृम्भित (छिद्रयुक्त) कर देता है, इसलिये उसे कुजृम्भ कहते हैं। नरेश्वर! वह पृथ्वीपर अथवा स्वर्गमें जो कुछ करता है, उसकी जानकारी आप क्यों नहीं रखते। पूर्वकालमें विश्वकर्माने जिसका निर्माण किया था, वह सुनन्द नामका मूसल उस दुष्टात्माने हड़प लिया। उसीसे युद्धमें वह शत्रुओंका संहार करता है। पातालके अंदर रहकर उस मूसलसे ही वह इस पृथ्वीको विदीर्ण कर देता है और इस प्रकार समस्त असुरोंके आने जानेके लिये द्वार बना लेता है। जब आप पातालके भीतर रहनेवाले इस शत्रुक्रा नाश करेंगे, तभी वास्तवमें सम्पूर्ण पृथ्वीके स्वामी हो सकेंगे। राजन्! उस मूसलके बलाबलके विषयमें विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं कि यदि कोई स्त्री वह मूसल छू दे तो वह उस दिन निर्बल हो जाता है; किन्तु दूसरे दिन फिर पूर्ववत् प्रबल हो जाता है। युवतीकी अँगुलियोंके स्पर्शसे उसकी शक्तिके नष्ट हो जानेका जो दोष या प्रभाव है, उसे वह दुराचारी दैत्य भी नहीं जानता। भूपाल! आपके नगरके समीप ही उसने यह पृथ्वीमें छेद किया है, फिर भी आप निश्चिन्त क्यों हैं।

इतना कहकर ब्रह्मर्षि सुव्रत चले गये। राजाने भी अपने नगरमें जाकर मन्त्रवेत्ता मन्त्रियोंसे परामर्श किया और कुजृम्भके विषयमें जो कुछ सुना था, वह सब कह सुनाया। उन्होंने मूसलका वह प्रभाव भी, कि स्त्रीके स्पर्शसे उसकी शक्तिका ह्रास हो जाता था, मन्त्रियोंको बताया। जिस समय राजा मन्त्रियोंके साथ परामर्श कर रहे थे, उस समय उनकी कन्या मुदावती भी पास ही बैठी सब कुछ सुन रही थी। तदनन्तर कुछ

२६८ * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

दिनोंके बाद कुजृम्भने सखियोंसे घिरी हुई उस राजकन्याको उपवनसे हर लिया। यह बात सुनकर राजाके नेत्र क्रोधसे चञ्चल हो उठे और उन्होंने अपने दोनों पुत्रोंसे, जो वनके मार्ग भलीभाँति जानते थे, कहा—'तुमलोग शीघ्र जाओ। उस दानवने निर्विन्ध्याके तटपर गढ़ा बना रखा है, उसीके मार्गसे रसातलमें जाकर मुदावतीका अपहरण करनेवाले उस दुष्टको मार डालो।'

तब अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए दोनों राजकुमार उस गर्तके मार्गसे सेनासहित रसातलमें जा पहुँचे और कुजृम्भसे युद्ध करने लगे। उनमें परिघ, खड्ग, शक्ति, शूल, फरसे तथा बाणोंकी मारसे निरन्तर अत्यन्त भयानक संग्राम होता रहा। फिर मायाके बली दैत्यने युद्धमें उन दोनों राजकुमारोंको बाँध लिया और उनके समस्त सैनिकोंका संहार कर डाला। यह समाचार पाकर राजाको बहुत दुःख हुआ। उन्होंने अपने सभी योद्धाओंसे कहा—'जो इस दैत्यका वध करके मेरे दोनों पुत्रोंको छुड़ा लायेगा, उसको मैं अपनी कन्या ब्याह दूँगा।' भानन्दनके पुत्र वत्सप्रीने भी यह घोषणा सुनी। वह बलवान्, अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञाता तथा शूरवीर था। उसने अपने पिताके प्रिय मित्र राजा विदूरथके पास आकर उन्हें प्रणाम किया और विनीत भावसे कहा—'महाराज! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपके ही तेजसे उस दैत्यको मारकर आपके दोनों पुत्रों तथा कन्याको छुड़ा लाऊँगा।' यह सुनकर राजाने अपने प्यारे मित्रके उस पुत्रको प्रसन्नतापूर्वक छातीसे लगा लिया और कहा—'वत्स! जाओ, तुम्हें अपने कार्यमें सफलता प्राप्त हो।'

तदनन्तर वीर वत्सप्री खड्ग और धनुष ले, अँगुलीयोंमें गोधाके चर्मसे बने हुए दस्ताने पहनकर पूर्वोक्त गढ़ेके मार्गसे तुरंत पातालमें गया। वहाँ उसने अपने धनुषकी भयंकर टङ्कार सुनायी, जिससे सारा पाताल गूँज उठा। वह टङ्कार सुनकर दानवराज कुजृम्भ अपनी सेना साथ ले बड़े क्रोधके साथ वहाँ आया और राजकुमारके साथ युद्ध करने लगा। दोनोंके पास अपनी-अपनी सेनाएँ थीं, एक बलवान्‌का दूसरे बलवान् वीरके साथ युद्ध हो रहा था। लगातार तीन दिनोंतक घमासान युद्ध होता रहा, तब वह दानव अत्यन्त क्रोधमें भरकर मूसल लानेके लिये दौड़ा। प्रजापति विश्वकर्माका बनाया हुआ वह मूसल सदा अन्तः-पुरमें रहता था और गन्ध, माला तथा धूप आदिसे प्रतिदिन उसकी पूजा होती थी। राजकुमारी मुदावती उस मूसलके प्रभावको जानती थी। अतः उसने अत्यन्त नम्रतासे मस्तक झुकाकर उस श्रेष्ठ मूसलका स्पर्श किया। वह महान् दैत्य जबतक उस मूसलको हाथमें ले, तबतक ही उसने नमस्कारके बहाने अनेक बार उसका स्पर्श कर लिया; फिर उस दैत्यराजने युद्धभूमिमें जाकर

  • वत्सप्रीके द्वारा कुजृम्भका वध तथा उसका मुदावतीके साथ विवाह * २६९

मूसलसे युद्ध आरम्भ किया; किन्तु उसके शत्रुओंपर मूसलके प्रहार व्यर्थ सिद्ध होने लगे। उस दिव्य अस्त्रके निर्बल पड़ जानेपर दैत्यने दूसरे अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा शत्रु‌का सामना किया। राजकुमारने उसे रथहीन कर दिया। तब वह ढाल-तलवार लेकर उसकी ओर दौड़ा। उसे क्रोधमें भरकर वेगसे आते देख राजकुमारने कालाग्निके समान प्रज्वलित

आग्नेय-अस्त्रसे उसपर प्रहार किया। उससे दैत्यकी छातीमें गहरी चोट पहुँची और उसके प्राणपखेरू उड़ गये। उसके मारे जानेपर रसातलनिवासी बड़े-बड़े नागोंने महान् उत्सव मनाया। राजकुमारपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। गन्धर्वराज गाने लगे और देवताओंके बाजे बज उठे। राजकुमार वत्सप्रीने उस दैत्यको मारकर राजा विदूरथके दोनों पुत्रों तथा कृशाङ्गी कन्या मुदावतीको भी बन्धनसे मुक्त किया। कुजृम्भके मारे जानेपर नागोंके अधिपति शेषसंज्ञक भगवान् अनन्तने उस मूसलको ले लिया। मुदावतीने सुनन्द नामक मूसलके गुणको

जानकर उसका बारंवार स्पर्श किया था, इसलिये नागराज अनन्तने उसका नाम सुनन्दा रख दिया। तत्पश्चात् राजकुमारने भाइयोंसहित उस कन्याको शीघ्र ही पिताके पास पहुँचाया और प्रणाम करके कहा—'तात! आपकी आज्ञाके अनुसार मैं आपके दोनों पुत्रों और इस मुदावतीको भी छुड़ा लाया। अब मुझसे और भी जो कार्य लेना हो, उसके लिये आज्ञा कीजिये।'

इसपर महाराज विदूरथके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उच्चस्वरसे बोले—'बेटा! बेटा!! तूने बहुत अच्छा किया, बहुत अच्छा किया। आज देवताओंने तीन कारणोंसे मेरा सम्मान बढ़ाया है—एक तो तुम जामाताके रूपमें मुझे प्राप्त हुए,

दूसरे मेरा शत्रु मारा गया तथा तीसरे मेरी सन्तानें कुशलपूर्वक लौट आयीं; अतः आज शुभ मुहूर्तमें तुम मेरी इस कन्याका पाणिग्रहण करो।' यों कहकर राजाने उन दोनोंका विधिपूर्वक विवाह कर दिया। नवयुवक वत्सप्री मुदावतीके साथ

२७० * संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *


रमणीय प्रदेशों तथा महलोंमें विहार करने लगा। कुछ कालके बाद उसके वृद्ध पिता भनन्दन वनमें चले गये और वत्सप्री राजा हुआ। उसने सदा ही प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए अनेक यज्ञ किये। वह प्रजाको पुत्रकी भाँति मानकर उसकी रक्षा करता था। उसके राज्यमें वर्णसङ्कर सन्तानकी उत्पत्ति नहीं हुई। कभी किसीको लुटेरों, सर्पों तथा दुष्टोंका भय नहीं हुआ। इसके शासनकालमें किसी प्रकारके उत्पातका भी भय नहीं था।


राजा खनित्रकी कथा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—सुनन्दाके गर्भसे वत्सप्रीके बारह पुत्र हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं—प्रांशु, प्रवीर, शूर, सुनक्र, विक्रम, क्रम, बली, बलाक, चण्ड, प्रचण्ड, सुविक्रम और स्वरूप। ये सभी महाभाग संग्रामविजयी थे। इनमें महापराक्रमी प्रांशु ज्येष्ठ थे, अतः वे ही राजा हुए। शेष भाई सेवककी भाँति उनकी आज्ञाके अधीन रहते थे। उनके यज्ञमें इतना धन दान दिया गया कि ब्राह्मणों तथा विप्रवर्गके लोगोंने भी राशि-राशि द्रव्य छोड़ दिया। [अधिक होनेके कारण साथ न ले जा सके।] वह सभी द्रव्य पृथ्वीपर पड़ा रह गया, जिससे इस पृथ्वीका 'वसुंधरा' (धन धारण करनेवाली) नाम सार्थक हुआ। वे प्रजाका और पुत्रोंकी भाँति पालन करते थे। उनके खजानेमें जो धन एकत्रित होता था, उसके द्वारा उन्होंने जो लाखों यज्ञ सम्पन्न किये, उनकी कोई संख्या नहीं है। प्रांशुके पुत्र प्रजाति थे। प्रजातिके खनित्र आदि पाँच पुत्र हुए। उनमें सबसे बड़े खनित्र राजा हुए। वे अपने पराक्रमके लिये विख्यात थे। खनित्र बड़े ही शान्त, सत्यवादी, शूरवीर, समस्त प्राणियोंके हितमें लगे रहनेवाले, स्वधर्मपरायण, वृद्ध पुरुषोंके सेवक, अनेक शास्त्रोंके विद्वान्, वक्ता, विनयशील, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता, डींग न हाँकनेवाले और सब लोगोंके प्रिय थे। वे दिन-रात यही कामना किया करते थे—'समस्त प्राणी प्रसन्न रहें। दूसरोंपर भी स्नेह रखें। सब जीवोंका कल्याण हो। सभी निर्भय हों। किसी भी प्राणीको कोई व्याधि एवं मानसिक व्यथा न हो। समस्त प्राणी सबके प्रति मित्रभावके पोषक हों। ब्राह्मणोंका कल्याण हो। सबमें परस्पर प्रेम रहे। सब वर्णोंकी उन्नति हो। समस्त कर्मोंमें सिद्धि प्राप्त हो। लोगो! सब भूतोंके प्रति तुम्हारी बुद्धि कल्याणमयी हो। तुमलोग जिस प्रकार अपना तथा अपने पुत्रोंका सर्वदा हित चाहते हो, उसी प्रकार सब प्राणियोंके प्रति हित-बुद्धि रखते हुए बर्ताव करो। यह तुम्हारे लिये अत्यन्त हितकी बात है। कौन किसका अपराध करता है। यदि कोई मूढ़ किसीका थोड़ा भी अहित करता है तो वह निश्चय ही उसका फल भोगता है; क्योंकि फल सदा कर्ताको ही मिलता है। लोगो! यह विचारकर सबके प्रति पवित्र भाव रखो। इससे इस लोकमें पाप नहीं बनेगा और तुम्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होगी। बुद्धिमानो! मैं तो यह चाहता हूँ कि आज जो मुझसे स्नेह रखता है, उसका इस पृथ्वीपर सदा ही कल्याण हो तथा जो इस लोकमें मेरे साथ द्वेष रखता है, वह भी कल्याणका ही भागी बने।*'


* नन्दन्तु सर्वभूतानि स्निह्यन्तु विजनेष्वपि। स्वस्त्यस्तु सर्वभूतेषु निरातङ्कानि सन्तु च॥
मा व्याधिरस्तु भूतानामाधयो न भवन्तु च। मैत्रोमशेषभूतानि पुष्णन्तु सकले जने॥

  • राजा खनित्रकी कथा * २७१

राजा प्रजातिके पुत्र ऐसे थे। वे समस्त गुणोंसे सम्पन्न और सुन्दर थे। उनके नेत्र पद्मपत्रके समान सुशोभित थे। उन्होंने अपने भाइयोंको प्रेमपूर्वक पृथक्-पृथक् राज्योंमें अभिषिक्त कर दिया और स्वयं समुद्रवसना पृथ्वीका उपभोग करने लगे। उन्होंने पूर्व दिशामें अपने भाई शौरिको, दक्षिण दिशामें उदावसुको, पश्चिममें सुनयको और उत्तरमें महारथको अभिषिक्त किया। उन चारों भाइयोंके तथा स्वयं राजा खनित्रके भिन्न-भिन्न गोत्रवाले मुनि पुरोहित हुए और वे ही वंशपरम्पराके क्रमसे मन्त्री भी होते आये। उक्त चारों राजा अपने-अपने राज्यका उपभोग करने लगे। खनित्र उन सबके सम्राट् थे। वे सारी पृथ्वीके स्वामी थे। महाराज खनित्र उन चारों भाइयों तथा समस्त प्रजापर सदा पुत्रोंकी भाँति स्नेह रखते थे। एक दिन राजा शौरिसे उनके मन्त्री विश्ववेदीने एकान्तमें कहा—'राजन्! मुझे आपसे कुछ कहना है। जिसके अधिकारमें यह सारी पृथ्वी रहती है, उसीके वशमें अन्य सब राजा भी रहते हैं। वह तो राजा होता ही है, उसके पुत्र-पौत्र तथा वंशके लोग भी क्रमशः राजा होते हैं। इसलिये आप हमलोगोंको साधन बनाकर अपने बाप-दादोंके राज्यपर अधिकार कर लीजिये। हम इस लोकमें ही आपको लाभ पहुँचा सकते हैं, परलोकमें नहीं।'

राजा ने कहा—'हमारे ज्येष्ठ भाई राजा हैं और हमलोगोंको पुत्रकी भाँति प्रेमसे अपनाये रखते हैं; फिर हम उनके राज्यपर किस प्रकार अधिकार जमावें।

विश्ववेदी बोले—राजन्! आप राज्यपर अधिकार कर लेनेके बाद राजाचित धन-सम्पत्तिके द्वारा अपने बड़े भाईकी पूजा करते रहियेगा। भला, राज्य-प्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले मनुष्योंमें यह छोटे-बड़ेका भेद कैसा।

विश्ववेदीके इस प्रकार समझानेपर शौरिने उनकी इच्छाके अनुसार काम करनेकी प्रतिज्ञा की। तब मन्त्रीने उनके अन्य भाइयोंको भी वशमें किया। फिर साम-दान आदिके द्वारा उन सबके पुरोहितोंको भी फोड़ लिया। फिर वे चारों पुरोहित महाराज खनित्रके विरुद्ध भयङ्कर पुरश्चरण करने लगे। उनके आभिचारिक कर्मसे चार कृत्याएँ


शिवमस्तु द्विजातीनां प्रीतिरस्तु परस्परम्। समृद्धिः सर्ववर्णानां सिद्धिरस्तु च कर्मणाम्॥
हे लोकाः सर्वभूतेषु शिवा वोऽस्तु सदा मतिः। यथाऽऽत्मनि यथा पुत्रे हितमिच्छथ सर्वदा॥
तथा समस्तभूतेषु वर्तध्वं हितबुद्धयः। एवंहि हितमन्त्यन्तं को वा कस्मापराध्यते॥
यत् करोत्यहितं किञ्चित् कस्यचित्क्षुद्रमानसः। तं संनयति तद्धर्मं कांगानि फलं यतः॥
इति मत्वा मनस्तेषु भो लोकाः कृतबुद्धयः। सन्तु मा लौकिके पापे लोकान् प्राप्स्यथ वै मृधाः।
यो मेऽद्य सिद्ध्यते तस्य शिवमस्तु सदा भुवि। यश्च मांद्वैष्टि लोकेऽस्मिन् सोऽपि भद्राणि पश्यतु।
\hfill [११७। २२। १९]

२७२ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

उत्पन्न हुईं। वे सभी विकराल, बड़े-बड़े मुखवाली तथा देखनेमें अत्यन्त भयङ्कर थीं। उनके हाथोंमें भयानक एवं विशाल त्रिशूल था। वे सभी राजा खनित्रके पास आयीं। राजा साधु पुरुष थे, अतः उनके पुण्य-समूहसे वे परास्त हो गयीं और लौटकर उन दुष्टात्मा पुरोहितोंपर ही टूट पड़ीं। कृत्याओंने उन चारों पुरोहितों तथा शौरिके दुष्ट मन्त्री विश्ववेदीको भी जलाकर भस्म कर डाला।

इस घटनासे सब लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ; क्योंकि भिन्न-भिन्न नगरोंमें निवास करनेवाले वे सभी पुरोहित और मन्त्री एक ही समय नष्ट हुए। महाराज खनित्रने भी जब सुना कि भाइयोंके पुरोहित मर गये और मन्त्री विश्ववेदी भी जलकर भस्म हो गये, तब उन्हें बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने सोचा यह क्या बात हो गयी। महाराजको इसका कुछ भी कारण नहीं मालूम हुआ। तब उन्होंने अपने घरपर पधारे हुए महर्षि वसिष्ठसे पूछा—'ब्रह्मन्! भाइयोंके पुरोहित और मन्त्री जो नष्ट हो गये, इसका क्या कारण है?' राजाके इस प्रकार पूछनेपर महामुनि वसिष्ठने सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया। शौरिके मन्त्रीने जो भाइयोंमें भेद डालनेवाली बात कही थी और शौरिने जो उत्तर दिया था, पुरोहितोंने जो अभिचार-कर्म किया तथा जिस कारण उनकी मृत्यु हुई, वे सब बातें महर्षिने निवेदन कीं। यह सब समाचार सुनकर महाराज खनित्रने कहा—'मुझ पापी, भाग्यहीन तथा दुष्टको धिक्कार है, जिनके कारण चार ब्राह्मणोंकी हत्या हुई। मेरे राज्यको धिक्कार है तथा महान् राजाओंके कुलमें लिये हुए जन्मको भी धिक्कार है, क्योंकि मैं ब्राह्मणोंके विनाशका कारण बन गया। वे पुरोहित तो अपने स्वामी, मेरे भाइयोंका कार्य कर रहे थे, उस दशामें उनकी मृत्यु हुई है। अतः दुष्ट वे नहीं हैं, मैं ही दुष्ट हूँ; क्योंकि मैं ही उनके नाशका कारण बना हूँ।' ऐसा विचार करके महाराज खनित्र अपने क्षुप नामक पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके तीनों पत्नियोंके साथ तपस्याके लिये वनमें चले गये। वे वानप्रस्थके नियमोंके ज्ञाता थे, अतः वनमें जाकर उन्होंने साढ़े तीन सौ वर्षोंतक घोर तपस्या की। तपस्यासे शरीरको दुर्बल करके समस्त इन्द्रियोंको रोककर वनवासी नरेशने अपने प्राण त्याग दिये। इससे वे सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अक्षय पुण्यलोकोंमें गये। उनकी तीनों पत्नियाँ भी उन्हींके साथ प्राण त्यागकर उन्हीं लोकोंमें गयीं। राजा खनित्रका यह चरित्र सुनने और पढ़नेपर मनुष्योंका पाप नष्ट करनेवाला है। अब क्षुपका वृत्तान्त सुनो।

• क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २७३


क्षुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवीक्षित तथा मरुत्तके चरित्र

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजा खनित्रके पुत्र क्षुपने भी राज्य पानेके बाद पिताकी ही भाँति धर्मपूर्वक प्रजाजनोंका पालन किया। वे दानशील तथा अनेक यज्ञोंके अनुष्ठान करनेवाले थे। उन्होंने व्यवहार आदिके मार्गमें शत्रु और मित्र दोनोंके प्रति समान भाव रखा। एक दिन महाराज क्षुप अपने राज्य-सिंहासनपर बैठे थे। उस समय सूतों एवं वन्दीजनोंने कहा—'महाराज! पूर्वकालमें जैसे क्षुप नामके राजा हुए थे, वैसे ही आप भी हैं। प्राचीन राजा क्षुप ब्रह्माजीके पुत्र थे। उनका चरित्र जैसा था, वैसा ही वर्तमान महाराजका भी है। पहलेके महाराज क्षुप गौ और ब्राह्मणोंसे कर नहीं लेते थे तथा उन महात्माने प्रजासे प्राप्त हुए छठे भागके द्वारा इस पृथ्वीपर अनेक यज्ञ किये थे।'

राजा बोले—'मेरे-जैसा कौन मनुष्य उन महात्मा राजाओंका पूर्णरूपसे अनुसरण कर सकेगा, तथापि उत्तम आचरणवाले पुरुषोंके समान कार्य करनेके लिये उद्योग अवश्य करना चाहिये। अतः इस समय मैं जो प्रतिज्ञा करता हूँ, उसे सुनो—मैं महाराज क्षुपके चरित्रका अनुसरण करूँगा तथा खेतीका अभाव होने या उसका अभाव दूर होनेपर तीन-तीन यज्ञोंका अनुष्ठान करूँगा। मेरी यह प्रतिज्ञा सम्पूर्ण भूमण्डलके लिये है। आजके पहले गौ और ब्राह्मणोंने जो राजकर दिया है, वह सब उन्हींकी सेवामें लौटा दूँगा।

ऐसी प्रतिज्ञा करके राजा क्षुपने सब कुछ वैसा ही किया। वे खेती मारी जानेपर तीन-तीन यज्ञोंका अनुष्ठान करते थे। पहले गौ-ब्राह्मणोंने पूर्वके राजाओंको जितना कर दिया था, उतना धन उन्होंने उन्हें लौटा दिया। उनकी पत्नी प्रमथाके गर्भसे वीर नामक उत्तम पुत्र हुआ। उसने अपने प्रताप और पराक्रमसे पृथ्वीके समस्त राजाओंको अपने वशमें कर लिया था। विदर्भराजकुमारी नन्दिनी उसकी प्रियतमा पत्नी थी, जिसके गर्भसे उसने विविंश नामक पुत्रको जन्म दिया। विविंश भी महाबलवान् राजा हुआ। उसके शासनकालमें आबादी अधिक हो जानेसे समूची पृथ्वी मनुष्योंसे भर गयी थी। समयपर वर्षा होती, पृथ्वीपर खेती लहराया करती, खेतीमें अच्छे दाने लगते और दानोंमें पूर्ण रस भरे रहते थे। वे रस मनुष्योंके लिये पुष्टिकारक होते; किन्तु वह पुष्टि उन्माद पैदा करनेवाली नहीं होती थी। लोगोंके पास जो धनका संग्रह होता, वह उनके मदका कारण नहीं बनता था। विविंशके प्रतापसे शत्रु सदा भयभीत रहते थे। प्रजा स्वस्थ थी और सुहृद्वर्ग भलीभाँति पूजित हो प्रसन्नता प्राप्त करता था। राजा विविंश बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान तथा पृथ्वीका भलीभाँति पालन करके संग्राममें मृत्यु पाकर यहाँसे इन्द्रलोकमें चला गया।

विविंशका पुत्र खनीनेत्र हुआ, जो महाबलवान् और पराक्रमी था। उसके यज्ञोंमें गन्धर्वगण विस्मित हो यह गाथा गाया करते थे—'खनीनेत्रके समान दूसरा राजा इस पृथ्वीपर नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने दस हजार यज्ञ पूर्ण करके समुद्रसहित यह सारी पृथ्वी दान कर दी थी।' महात्मा ब्राह्मणोंको समूची पृथ्वीका दान दे उन्होंने तपस्यासे द्रव्य संग्रह किया और उसके द्वारा पृथ्वीको छुड़ाया। राजा खनीनेत्रने सरसठ हजार सरसठ सौ सरसठ यज्ञ किये थे और सबमें प्रचुर दक्षिणा दी थी। राजाको कोई पुत्र नहीं था; इसलिये वे पापनाशिनी गोमतीके तटपर गये और वहाँ मन, वाणी एवं शरीरको संयममें रखकर घोर तपस्या

२७४* संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण *

करने लगे। सन्तानके लिये उन्होंने इन्द्रका स्तवन किया। उनके स्तोत्र, तपस्या और भक्तिसे सन्तुष्ट होकर इन्द्रने कहा—'राजन्! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, कोई वर माँगो।'

राजा बोले—देवेश्वर! मुझे कोई पुत्र नहीं है, अतः आपकी कृपासे मुझे पुत्र प्राप्त हो। वह पुत्र समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, अक्षय ऐश्वर्यसे युक्त, धर्मपालक तथा धर्मज्ञ हो।

इन्द्रने 'एवमस्तु' कहकर आशीर्वाद दिया। राजाका मनोरथ पूर्ण हो गया, अब वे प्रजाका पालन करनेके लिये अपने नगरमें आये। वहाँ वे विधिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान तथा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करने लगे। उस समय इन्द्रकी कृपासे उन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम उसके पिताने बलाश्र्व रखा। फिर राजाने पुत्रको सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा दी। पिताके मरनेके बाद जब बलाश्र्व राज्यसिंहासनपर आसीन हुए, तब उन्होंने पृथ्वीके सम्पूर्ण राजाओंको अपने वशमें कर लिया। परन्तु बहुत-से महापराक्रमी राजा, जो सब प्रकारके साधन और धनसे सम्पन्न थे, एक साथ मिल गये और उन्होंने राजा बलाश्र्वको उनकी राजधानीमें ही घेर लिया। नगरपर घेरा पड़ जानेसे राजा बलाश्र्वको बड़ा क्रोध हुआ, परन्तु उनका खजाना बहुत थोड़ा रह गया था; इसलिये सैनिक बलकी कमी हो जानेसे वे अत्यन्त विकल हो गये। जब उन्हें और कोई शरण नहीं दिखायी दी, तब वे आर्त हो दोनों हाथ मुँहके आगे करके जोर-जोरसे साँस लेने लगे; फिर तो उनके हाथकी अँगलियोंके छिद्रसे, मुखकी वायुसे प्रेरित हो सैकड़ों योद्धा, रथ, हाथी और घोड़े निकलने लगे। क्षणभरमें राजाका सारा नगर बहुत बड़ी सेनासे भर गया। तब उस विशाल सेनाके साथ नगरसे बाहर निकलकर उन्होंने उन शत्रु राजाओंको परास्त किया और सबको अपने अधीन करके उनपर कर लगा दिया। करका धमन करने (हाथोंको फूँकने)-से उन्होंने शत्रुओंका दाह करनेवाली सेना उत्पन्न की थी, इसलिये वे राजा बलाश्र्व करन्धम कहलाने लगे। करन्धम धर्मात्मा, सब प्राणियोंके मित्र तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे। जब राजा सङ्कटमें पड़े थे, तब साक्षात् उनके धर्मने उनके पास पहुँचकर शत्रुनाशक सेना प्रदान की थी और फिर स्वयं ही उसे अदृश्य कर दिया।

राजा वीर्यचन्द्रकी सुन्दरी कन्या वीराने, जो उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाली थी, स्वयंवरमें महाराज करन्धमका वरण किया था। उसके गर्भसे महाराजने अबीक्षित् नामक पुत्र उत्पन्न किया। उसके इस नामका प्रसङ्ग सुनो। पुत्र उत्पन्न होनेपर राजा करन्धमने उसके ग्रह आदिके विषयमें ज्योतिषियोंसे पूछा। तब ज्योतिषियोंने कहा—'महाराज! आपका पुत्र उत्तम मुहूर्त, श्रेष्ठ नक्षत्र और शुभ लग्नमें उत्पन्न हुआ है; अतः यह महान् पराक्रमी, परम सौभाग्यवान् तथा अधिक बलशाली होगा। बृहस्पति और शुक्र सातवें स्थानमें तथा चन्द्रमा चौथे स्थानमें रहकर इस बालकको देखते हैं। ग्यारहवें स्थानमें स्थित बुध भी इसको देखते हैं। सूर्य, मङ्गल और शनैश्चरकी इसपर दृष्टि नहीं है; अतः यह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंसे युक्त होगा।' ज्योतिषियोंकी बात सुनकर राजा करन्धमके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बोले—''इसे बृहस्पति और बुध देखते हैं और सूर्य, शनैश्वर एवं मङ्गलसे यह अबीक्षित (अदृष्ट) है; इसलिये इसका नाम 'अवीक्षित' होगा।''

करन्धमके पुत्र अवीक्षित वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् हुए। उन्होंने मुनिवर कण्वके पुत्रसे सम्पूर्ण अस्त्रविद्याकी शिक्षा ग्रहण की। वे रूपमें अश्विनीकुमार, बुद्धिमें बृहस्पति, कान्तिमें चन्द्रमा,

• ध्रुप, विविंश, खनीनेत्र, करन्धम, अवेक्षित तथा मरुत्तके चरित्र • २७९


तेजमें सूर्य, धैर्यमें समुद्र और क्षमामें पृथ्वीके समान थे। वीरतामें तो उनकी समानता करनेवाला कोई था ही नहीं। एक समयकी बात है, वे वैदिशके राजा विशालकी कन्या वैशालिनीको प्राप्त करनेके लिये उसके स्वयंवरमें गये। वह सुन्दर दाँतोंवाली सुन्दरी समस्त राजाओंकी उपेक्षा करके चली जा रही थी, इतनेमें ही अवेक्षितने उसे बलपूर्वक पकड़ लिया। उन्हें अपने बलका बहुत अभिमान था। उनके इस कार्यसे अन्य समस्त राजाओंका, जो बहुत बड़ी संख्यामें एकत्रित थे, अपमान हुआ; अतः वे खिन्न होकर एक-दूसरेसे कहने लगे—'अनेक बलशाली राजाओंके होते हुए किसी एकके द्वारा नारीका अपहरण हो और आपलोग उसे क्षमा कर दें, तो यह धिक्कार देनेयोग्य बात है। क्षत्रिय वह है, जो दुष्ट पुरुषोंसे सताये जानेवालेकी रक्षा करे, उसकी क्षति न होने दे। जो ऐसा नहीं करते, वे लोग इस नामको व्यर्थ ही धारण करते हैं। संसारमें कौन मनुष्य मृत्युसे नहीं डरता, किन्तु युद्ध न करके भी कौन अमर रह गया है। यह विचारकर शस्त्रधारी क्षत्रियोंको पुरुषार्थका त्याग नहीं करना चाहिये।'

यह सुनकर सब राजा अमर्षमें भर गये और परस्पर सलाह करके सभी हथियार ले उठ खड़े हुए। कुछ रथोंपर जा बैठे। कुछ हाथियों और घोड़ोंपर सवार हुए तथा दूसरे कितने ही राजा कुपित हो पैदल ही अवेक्षितसे लोहा लेनेको जा पहुँचे। अवेक्षित अकेले थे। उनके विरोधमें बहुत-से राजा और राजकुमार थे। उनमें बड़ा भयङ्कर संग्राम हुआ। तलवार, शक्ति, गदा और धनुष-बाण लिये हुए समस्त राजा अवेक्षितपर प्रहार करने लगे तथा राजकुमार अवेक्षित भी अकेले ही उन सारे राजाओंसे भिड़ गये और सैकड़ों बाणोंसे मारकर उन्हें घायल करने लगे। अवेक्षितने किसीकी बाँह काट डाली, किसीकी गर्दन उड़ा दी, किसीकी छाती छेद डाली और किसीके वक्षमें प्रहार किया। शत्रुओंके आते हुए बाणोंको वे बाण मारकर दो टुकड़े कर देते थे। किसीकी तलवार काट देते और किसीका धनुष खण्डित कर देते थे। कोई राजकुमार अपना कवच कट जानेके कारण पलायन कर गया। दूसरा अवेक्षितके बाणोंसे घायल होकर पैदल ही रणभूमिसे भाग गया। इस प्रकार जब राजाओंकी सारी मण्डली व्याकुल हो गयी, तब सात सौ वीर मरनेका निश्चय करके युद्धके लिये डट गये। उन सबको अपने उत्तम कुल, युवावस्था तथा शौर्यकी लाज रखनी थी। जब सारी सेना परास्त होकर भागने लगी तब ये ही सात सौ राजा एक साथ मिलकर अवेक्षितसे युद्ध करने लगे। अवेक्षित अत्यन्त क्रोधमें भरकर धर्मयुद्धके नियमसे लड़ने लगे। उन्होंने उन सबके हथियारों और कवचोंको काट गिराया। तब उन राजाओंने धर्मसे विमुख हो चारों ओरसे अवेक्षितको घेर लिया और सब ओरसे उन्हें हजारों बाणोंसे बाँधने लगे। बहुतोंके प्रहारसे पीड़ित हो वे अत्यन्त व्याकुल हो उठे और अत्यन्त विह्वल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इस अवस्थामें उन सबने मिलकर धर्मपूर्वक उन्हें बाँध लिया और राजा विशालके साथ वैदिश नगरमें प्रवेश किया।

तदनन्तर राजा करन्धम, उनकी पत्नी वीरा तथा अन्य राजाओंने अवेक्षितके बाँधे जानेका समाचार सुना। कुछ लोगोंने करन्धमसे कहा—'महाराज! ये सभी राजा वध करनेके योग्य हैं, जिन्होंने अधिक संख्यामें सम्मिलित होकर अकेले राजकुमारको अधर्मपूर्वक बाँधा है।' दूसरे बोले—'आप चुपचाप बैठे क्यों हैं, शीघ्र ही सेना तैयार कीजिये। दुष्ट विशालको तथा वहाँ आये हुए

२७६ • संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण •

अन्य समस्त राजाओंको भी बाँध लीजिये।' उन सबकी यह बात सुनकर वीरपुत्रा वीराने, जो वीरवंशमें उत्पन्न एवं वीर पतिकी पत्नी थी, हर्षमें भरकर कहा—'राजाओ ! मेरे पुत्रने समस्त राजाओंको जीतकर जो बलपूर्वक कन्याको अपने अधिकारमें कर लिया है, यह ठीक ही किया है। इसके लिये मनमें चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है। उसका युद्धमें बन्दी होना प्रशंसाकी ही बात है। अब तुमलोगोंके मस्तकपर भी अस्त्र-शस्त्रोंके गिरनेका समय आ पहुँचा है। युद्धके लिये शीघ्रता करो। अपने-अपने रथोंपर सवार हो जाओ। हाथी, घोड़े और सारथियोंको भी जल्दी तैयार करो। विलम्ब नहीं होना चाहिये। जो सबको परास्त करके शोभा पाता है, वही शूर है। जैसे सूर्य अन्धकारको दूर करके प्रकाशित होता है, उसी प्रकार शूरवीर शत्रुओंको हराकर यशस्वी होता है।'

इस प्रकार पत्नीके उत्साहित करनेपर राजा करन्धमने पुत्रके शत्रुओंका वध करनेके लिये सेनाको तैयार होनेकी आज्ञा दी। तदनन्तर उनका विशाल और उनके साथियोंके साथ घोर युद्ध हुआ। तीन दिनतक युद्ध होनेके पश्चात् विशाल और उनके सहायक राजाओंका मण्डल जब प्रायः पराजित हो गये, तब राजा विशाल हाथमें अर्घ्य लेकर महाराज करन्धमके पास आये। उन्होंने बड़े प्रेमसे करन्धमका पूजन किया। उनका पुत्र अवीक्षित बन्धनसे मुक्त कर दिया गया। राजाने एक रात वहाँ बड़े सुखसे व्यतीत की। दूसरे दिन राजा विशाल अपनी कन्याको साथ लेकर महाराज करन्धमके पास उपस्थित हुए। उस समय अवीक्षितने अपने पिताके सामने ही कहा—'मैं इसको तथा दूसरी किसी युवतीको भी अब नहीं ग्रहण करूँगा, क्योंकि इसके देखते-देखते शत्रुओंद्वारा युद्धमें परास्त हो गया। अब आप किसी औरके साथ इसका विवाह कर दें अथवा यह उस पुरुषका वरण करे, जिसका यश और पराक्रम अखण्डित हो तथा जिसे शत्रुओंके हाथसे अपमानित न होना पड़ा हो। पुरुष सबल होनेके कारण स्वतन्त्र होता है और स्त्रियाँ अबला होनेके कारण सदा परतन्त्र रहती हैं। परन्तु जहाँ पुरुष भी दूसरेके परतन्त्र हो गया, वहाँ उसमें मनुष्यता ही क्या रह गयी। जब इसके सामने ही राजाओंने मुझे पृथ्वीपर गिरा दिया, तब अब मैं इसे अपना मुँह कैसे दिखाऊँगा?' अवीक्षितके ऐसा कहनेपर राजा विशालने अपनी पुत्रीसे कहा—'बेटी! इन महात्माकी बात तुमने सुनी है न? शुभे! जिसमें तुम्हारी रुचि हो, ऐसे किसी दूसरे पुरुषको पतिरूपमें वरण करो अथवा हम जिसे तुम्हें दे दें, उसीका तुम आदर करो।'

कन्या बोली—पिताजी! यद्यपि संग्राममें इनके यश और पराक्रमकी हानि हुई है, तथापि ये उसमें धर्मानुकूल बर्ताव करते रहे हैं। वे अकेले थे तो भी बहुतोंने मिलकर इन्हें परास्त किया है; अतः वास्तवमें इनकी पराजय हुई, यह कहना ठीक नहीं है। युद्धके लिये जब बहुत-से राजा आये, तब ये उनमें सिंहकी भाँति अकेले घुस गये और निरन्तर डटकर सामना करते रहे। इससे इनका महान् शौर्य प्रकट हुआ है। ये वीरता और पराक्रमसे युक्त होकर धर्मयुद्धमें संलग्न थे। ऐसे समयमें समस्त राजाओंने मिलकर इनपर अधर्मपूर्वक विजय पायी है। अतः इसमें इनके लिये लज्जाकी कौन-सी बात है। तात! मैं इनके रूप मात्रपर लुभा गयी हूँ, ऐसी बात नहीं है, इनकी वीरता, पराक्रम और धीरता आदि सद्गुण मेरे चित्तको चुराये लेते हैं। अतः अब अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता है। आप मेरे लिये महाराजसे इन्हीं