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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

१२२ प्रेम-दर्शन तोर्यो धनुष सुयंबर कीनो, रावन अजित जयो। अघ बक बच्छ अरिष्ट केसि मथि दावानल अँचयो ॥ तिय बपु धर्यो असुर सुर मोहे, को जग जो न द्रयो। गुरुसुत मृतक ज्यायबे कारन सागर सोध लयो॥ जानौं नाहिं कहा या रसमें सहजहि होत नयो। 'सूरस्याम' बल तोहि मनावत मोहि सब बिसरि गयो ॥ धन्य तेरा मान! बड़े-बड़े काम किये, कहीं हार नहीं मानी, कहीं थकावट नहीं प्रतीत हुई। आज तुझे मनानेमें मेरा सारा बल बिला गया। यह भक्तोंकी और भगवान्‌की प्रणय- लीला है—इस लीलामें राग, काम, क्रोध, मान सभी हैं; परन्तु सभी दूसरे रूपमें हैं। सभी पवित्र प्रेमके नामान्तरमात्र हैं, यहाँका यह सर्वधर्मत्याग ही परम धर्म है। यहाँकी अविधि ही सर्वोपरि प्रेमकी विधि है। यह तो हुई सिद्ध भक्तोंकी बात। भक्तिके साधनमें भी यदि काम, क्रोध, लोभ कभी सतावें तो उनको भगवान्‌के प्रति ही लगा देना चाहिये। जो बातें हमारे मार्गमें बाधक होती हैं, वे ही भगवान्‌के प्रति प्रयुक्त होनेपर साधक बन जाती हैं। यह निश्चय रखना चाहिये। श्रीमद्भागवतमें परमहंसश्रेष्ठ श्रीशुकदेवजीके वचन हैं— कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च। नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ (१०। २९। १५) 'काम, क्रोध, भय, स्नेह, तादात्म्य एवं मित्रता, सभी कुछ जो श्रीहरिके प्रति ही करते हैं वे अवश्य ही भगवान्‌के साथ तन्मय हो जाते हैं।'

भक्तिके साधन और अन्तराय १२३ तीव्र काम उसी वस्तुके लिये उत्पन्न होता है जो सबसे श्रेष्ठ हो, अखिल ऐश्वर्यमय हो, महान् माधुर्यसे पूर्ण हो, सर्वांगसुन्दर हो, आनन्दमय हो; भगवान्में यह सब कुछ है। यह सोचकर सदा-सर्वदा एकमात्र श्रीकृष्णमिलनकी कामनासे पीड़ित रहे और यह कामवासना उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाय। प्रेमभरा क्रोध इस प्रकार करे कि 'तुम बड़े निठुर हो, इतना पुकारनेपर भी नहीं आते; याद रखो अभी तो मैं पुकारता हूँ—पीछे तुम्हें पीछे-पीछे भटकना पड़ेगा।' आठों पहर चिन्तनमें लगे रहकर प्रेमभरा मान इस प्रकार करे कि 'मेरे पास तो अटूट चिन्तन-धन है, मैं तुम्हारी कोई गरज नहीं रखता; तुम्हें सौ बार गरज हो तो आना।' इत्यादि। भगवान्के प्रति काम, क्रोध और अभिमान कैसे किया जा सकता है, इसका एक और सुन्दर उदाहरण मातृपरायण शिशु है। छोटे बच्चेको आप बहुमूल्य रत्न दीजिये, उसे बढ़िया-बढ़िया चीजें खानेको दीजिये, उसका खूब सम्मान कीजिये, उसका यश गाइये, उसे स्वर्ग-मोक्ष मिलनेकी बात कहिये, वह माता और मातृस्तनोंको छोड़कर और कुछ भी नहीं चाहता। चाहे क्या, वह और किसी वस्तुको जानता ही नहीं, उसके लिये जाननेकी और चाहनेकी एकमात्र वस्तु माँ है। माँके बदलेमें वह किसी वस्तुसे भी सन्तुष्ट नहीं हो सकता। इसी प्रकार भक्तकी कामना केवल भगवान्के लिये ही होनी चाहिये। एकमात्र भगवान् ही उसके काम्य होने चाहिये। बच्चा कुछ बड़ा हुआ; इधर-उधर कुछ चलने लगा, चलते- चलते ठोकर खाकर गिर पड़ा, रोने लगा। बच्चेका रोना सुनकर

१२४ प्रेम-दर्शन माँ दौड़ी आयी। बच्चा खीझ गया; पड़ा स्वयं, परन्तु क्रोध उसका मातापर हुआ। वह अपनी तोतली बोलीमें बार-बार कहता है, तू मुझे अकेला छोड़ क्यों गयी ? फिर अभिमान करके रूठ जाता है। कहता है, 'जा मैं तुझसे नहीं बोलूँगा। तेरी गोदी नहीं आऊँगा।' माँ मनाती है, गोद लेना चाहती है, स्तन पिलाना चाहती है, वह रोता हुआ आगे-आगे भागता है। वह ऐसा क्यों करता है, इसीलिये कि वह स्वाभाविक ही मातापर अपना अधिकार समझता है। माताको ही अपनी सब कुछ समझता है। वह भूखा रहे तो माँका दोष, वह गिर जाय तो माँका अपराध, वह सो न सके तो माताका अपराध और अपराधका दण्ड खीझना और रूठना—क्रोध और अभिमान ! इसी प्रकार निर्भर भक्त भी अपने भगवान्‌के प्रति काम, क्रोध और अभिमानादि कर सकता है। 🔲 🔲

प्रेमी भक्तोंकी महिमा त्रिरूपभंगपूर्वकं नित्यदासनित्यकान्ताभजनात्मकं वा प्रेमैव कार्यम्, प्रेमैव कार्यम्॥ ६६॥ ६६-तीन (स्वामी, सेवक और सेवा) रूपोंको भंगकर नित्य दासभक्तिसे या नित्य कान्ताभक्तिसे प्रेम ही करना चाहिये, प्रेम ही करना चाहिये। स्वामी, सेवक और सेवा; अथवा पति, पत्नी और पतिसेवा— इन तीन-तीन रूपोंको मिटाकर नित्य दास्यभक्तिके द्वारा अथवा कान्ताभक्तिके द्वारा भगवान्‌से प्रेम ही करना चाहिये। दास्यभाव और कान्ताभाव इन दोनोंमें ही आगे चलकर भगवान्‌के साथ तन्मयता हो जाती है। निष्कामभावसे शरीर, मन, वाणी, सब कुछ स्वामीके अर्पण कर, एक अपने स्वामीको छोड़कर जगत्‌में दूसरे किसीको भी न जानना—यह दास्यभक्तिका आदर्श है। और पति ही मेरा तन, मन, धन, गति, मति, आश्रय, जीवन, प्राण, धर्म, मोक्ष और भगवान् है; एक पतिके सिवा अन्य कोई पुरुष ही जगत्‌में नहीं है; पतिका धन मेरा धन, पतिका तन मेरा तन, पतिका मन मेरा मन, पतिकी सेवा मेरी सेवा, पतिका ऐश्वर्य मेरा ऐश्वर्य, पतिका मान मेरा मान, पतिका अपमान मेरा अपमान, पतिके प्राण मेरे प्राण—इस प्रकार एकमात्र पतिपरायणा पतिगत-प्राणा होकर निष्काम अनन्यभावसे निरन्तर सेवामें लगे रहना, यह कान्ताभक्तिका आदर्श है। वास्तवमें दोनों एक ही हैं। दोनोंमें ही समता है। दोनोंमें ही अभिन्नता है। दास्यभक्तिमें भी सेवक अपना सब कुछ भुलाकर स्वामीके नाम-गोत्रवाला बन जाता है और कान्ताभक्तिमें तो अपने नाम-गोत्रको पतिके नाम-गोत्रमें मिलानेपर

१२६ प्रेम-दर्शन ही कान्ताभावकी प्राप्ति होती है। दास्यभावके सम्बन्धमें श्रीगोसाईंजी महाराज कहते हैं— मेरे जातिपाँति न चहौं काहूकी जातिपाँति, मेरे कोऊ कामको न हौं काहूके कामको। लोक परलोक रघुनाथहीके हाथ सब, भारी है भरोसो तुलसीके एक नामको॥ अति ही अयाने उपखाने नहीं बूझैं लोग, साहहीको गोत गोत होत है गुलामको। साधु कै असाधु, कै भलो कै पोच, सोच कहा, का काहूके द्वार परौं जो हौं सो हौं रामको॥ स्वामी और सेवकका कुल-गोत्र एक हो गया। इस दास्यभावकी महिमा गाती हुई भगवती श्रीराधिकाजी भक्तवर उद्धवजीसे कहती हैं— कृष्णभक्तिः कृष्णदास्यं वरेषु च वरं वरम्। श्रेष्ठा पंचविधामुक्तेर्हरिभक्तिर्गरीयसी ॥ ब्रह्मत्वादपि देवत्वादिन्द्रत्वादमरादपि। अमृतात् सिद्धिलाभाच्च हरिदास्यं सुदुर्लभम् ॥ (ब्रह्मवैवर्त० कृ० ९७।८-९) 'सब वरोंमें श्रेष्ठतम वर श्रीकृष्णभक्ति या श्रीकृष्णदास्य ही है। पाँच प्रकारकी श्रेष्ठ मुक्तियोंसे हरिभक्ति ही श्रेष्ठ एवं गुरुतर है। ब्रह्मत्व, देवत्व, अमरत्व, अमृतप्राप्ति, सिद्धिलाभ—इन सभीसे श्रीहरिका दासत्व प्राप्त होना सुदुर्लभ है।' कान्ताभक्तिमें तो एकात्मता है ही— प्रीति जो मेरे पीवकी, बैठी पिंजर माहिं। रोम रोम पिउ पिउ करै, 'दादू' दूसर नाहिं॥

प्रेमी भक्तोंकी महिमा १२७ प्रीतमको पतियाँ लिखूँ, जो कहूँ होय बिदेस। तनमें, मनमें, नैनमें, ताको कहा सँदेस॥ कान्ता और कान्त तो घुल-मिलकर एक हो जाते हैं—अतएव वहाँ त्रिरूपका भंग आप ही हो जाता है। सूत्रकार कहते हैं, इस एकात्मताके आदर्शको सामने रखकर, इस भावको मनमें स्थान देकर दास्यभाव या कान्ताभावसे भगवान्‌के प्रति केवल प्रेम ही करो। भक्ता एकान्तिनो मुख्याः ॥ ६७ ॥ ६७-एकान्त ( अनन्य ) भक्त ही श्रेष्ठ हैं। इससे पूर्व सूत्रके अनुसार भक्ति करनेवाला भगवान्‌का अनन्य भक्त ही सबमें श्रेष्ठ है। क्योंकि उसका तन, मन, धन सब कुछ परमात्माका हो जाता है। वह परमात्माका यन्त्रवत् होकर संसारमें रहता है। उसका आत्मा परमात्मासे मिल जाता है, उसका मन परमात्माके मनमें रम जाता है, उसके नेत्र सब जगह सर्वदा परमात्माको ही देखते हैं— प्रीतम छबि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय। भरी सराय 'रहीम' लखि, आप पथिक फिरि जाय ॥ 'कबिरा' काजर-रेखहू, अब तो दई न जाय। नैननि पीतम रमि रहा, दूजा कहाँ समाय ॥ आठ पहर चौंसठ घरी, मेरे और न कोय। नैना माहीं तू बसै, नींदहिं ठौर न होय ॥ कण्ठावरोधरोमांचाश्रुभिः परस्परं लपमानाः पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च ॥ ६८ ॥ ६८-ऐसे अनन्य भक्त कण्ठावरोध, रोमांच और अश्रुयुक्त नेत्रवाले होकर परस्पर सम्भाषण करते हुए अपने कुलोंको और पृथिवीको पवित्र करते हैं।

१२८ प्रेम-दर्शन अनन्य भक्तगण जब इकट्ठे होकर अपने प्राणस्वरूप प्रियतमकी चर्चा करते हैं तो उनका प्रेमसागर उमड़ पड़ता है। तब वे चेष्टा करनेपर भी नहीं बोल सकते; उनके कण्ठ रुक जाते हैं, शरीर पुलकित हो जाता है, रोम-रोमसे प्रेमकी किरणधाराएँ निकलकर उस स्थानमें निर्मल प्रेमज्योति फैला देती हैं। वहाँका वातावरण अत्यन्त विशुद्ध और प्रेममय हो जाता है। उस समय वे भक्तगण प्रेमविह्वल होकर आँखोंसे प्रेमके आँसुओंकी धारा बहाते हुए परमानन्दमें मग्न हो जाते हैं। यह स्थिति बहुत ही दुर्लभ और परम पवित्र होती है, जिन भाग्यवानोंको यह अवस्था प्राप्त हो जाती है, उन सबके कुल तो पवित्र होते ही हैं— सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत। श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत॥ —वरं उनके अस्तित्वसे पृथ्वी भी पवित्र हो जाती है। उस समय उन पवित्र प्रेमस्वरूप भक्तके तनसे स्पर्श की हुई जरा-सी हवा जिसके शरीरको स्पर्श कर लेती है, वह भी पवित्र हो जाता है। शास्त्रमें कहा है— कुलं पवित्रं जननी कृतार्था वसुन्धरा पुण्यवती च तेन। अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिँ- ल्लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेतः॥ ‘जिसका चित्त अपार संवित् एवं सुखके सागर परब्रह्ममें लीन हो गया है, उसके जन्मसे कुल पवित्र, जननी कृतार्थ और पृथ्वी पुण्यवती हो जाती है।’ श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं— वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।

प्रेमी भक्तोंकी महिमा १२९ विलज्ज उद्गायति नृत्यते च मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥ (११।१४।२४) ‘प्रेमके प्रकट हो जानेसे जिसकी वाणी गद्गद और चित्त द्रवीभूत हो जाता है, जो प्रेमावेशमें बार-बार रोता है, कभी हँसता है, कभी लाज छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने और नाचने लगता है। ऐसा मेरा परम भक्त त्रिलोकीको पवित्र कर देता है।’ तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि ॥ ६९ ॥ ६९-ऐसे भक्त तीर्थोंको सुतीर्थ, कर्मोंको सुकर्म और शास्त्रोंको सत्-शास्त्र कर देते हैं। तीर्थ पापी नर-नारियोंको निष्पाप और पवित्र करते हैं, परन्तु पापात्माओंके सतत समागमसे उनमें मलिनता आ जाती है। तीर्थोंकी वह मलिनता भक्तोंके समागमसे नष्ट होती है। दिलीपकुमार महाराज भगीरथके घोर तपसे प्रसन्न होकर वर देनेके लिये आविर्भूत हुई भगवती श्रीगंगाजीने उनसे कहा— ‘भगीरथ! मैं पृथ्वीपर कैसे आऊँ! संसारके सारे पापी तो आ-आकर मुझमें अपने पापोंको धो डालेंगे। परन्तु उन पापियोंके अपार पाप-पंकको मैं कहाँ धोने जाऊँगी, इसपर आपने क्या विचार किया है?’ इसके उत्तरमें भगीरथने कहा— साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः। हरन्त्यघं तेऽङ्गसङ्गात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः॥ (श्रीमद्भागवत ९।९।६) ‘हे माता! समस्त विश्वको पवित्र करनेवाले विषयोंके त्यागी,

१३० प्रेम-दर्शन शान्तस्वरूप, ब्रह्मनिष्ठ साधु-महात्मा आकर तुम्हारे प्रवाहमें स्नान करेंगे तब उनके अंगके संगसे तुम्हारे सारे पाप धुल जायँगे; क्योंकि उनके हृदयमें समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीहरि निवास करते हैं।' प्रचेतागण भगवान्‌की स्तुति करते हुए कहते हैं— तेषां विचरतां पद्भ्यां तीर्थानां पावनेच्छया। भीतस्य किं न रोचेत तावकानां समागमः॥ (श्रीमद्भागवत ४।३०।३७) 'आपके जो भक्तगण तीर्थोंको पवित्र करनेके लिये ही भूमिपर विचरण करते हैं, उनका समागम संसारभयसे भीत पुरुषको कैसे प्रिय नहीं होगा।' धर्मराज युधिष्ठिर भक्तराज विदुरजीसे कहते हैं— भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता॥ (श्रीमद्भागवत १।१३।१०) 'हे प्रभो! आप-सरीखे भगवद्भक्त स्वयं तीर्थरूप हैं, (पापियोंद्वारा कलुषित हुए) तीर्थोंको आपलोग अपने हृदयमें विराजित भगवान् श्रीगदाधरके प्रभावसे पुनः तीर्थत्व प्रदान करा देते हैं।' इसी प्रकार जिन शास्त्रोक्त कर्मोंको भक्तगण करने लगते हैं, वे ही सत्कर्म हो जाते हैं और वे जिस शास्त्रको आदर देते हैं, वही सत्-शास्त्र माना जाता है। वरं यह कहना भी अत्युक्ति नहीं कि भक्त जिस जगह रहते हैं, जिस सरोवर या नदीमें स्नान करते हैं, वही तीर्थ बन जाता है; भक्त जो कुछ कर्म करते हैं, वही आदर्श सत्कर्म कहलाता है और

प्रेमी भक्तोंकी महिमा १३१ भक्त जो कुछ उपदेश करते हैं, वही सत्-शास्त्र माना जाता है। उनका निवासस्थान ही तीर्थ, उनके कर्म ही सत्कर्म और उनकी वाणी ही सत्-शास्त्र है। तीर्थ, सत्कर्म और शास्त्रका रहस्य समझनेपर यह बात भलीभाँति समझमें आ जाती है। तन्मयाः ॥ ७० ॥ ७०-( क्योंकि ) वे तन्मय हैं। जैसे नदी समुद्रमें मिलकर समुद्र बन जाती है, इसी प्रकार भक्त भी अपना तन-मन-बुद्धि-अहंकार सब कुछ प्रियतम भगवान्‌के समर्पण कर भगवान्‌के साथ तन्मय हो जाता है। ऐसा भक्त साक्षात् भगवत्स्वरूप ही होता है, वह जहाँ रहता है वहाँका तमाम सूक्ष्म और स्थूल वातावरण शुद्ध हो जाता है। इसीलिये उसके समागममात्रसे तीर्थ, कर्म और शास्त्र पवित्र हो जाते हैं। ऐसे ही भक्तोंके द्वारा भगवान्, भगवन्नाम, भगवद्भक्तिकी महिमा बढ़ती है और इनके समागममें आनेवाले पापी-से-पापी नर-नारी भी घोर संसार-सागरसे अनायास ही तर जाते हैं। मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवताः सनाथा चेयं भूर्भवति ॥ ७१ ॥ ७१-( ऐसे भक्तोंका आविर्भाव देखकर ) पितरगण प्रमुदित होते हैं, देवता नाचने लगते हैं और यह पृथ्वी सनाथा हो जाती है। भक्तोंका आविर्भाव सभीके लिये शुभ होता है, क्योंकि उनके सभी कर्म स्वाभाविक ही लोककल्याणकारी होते हैं। उनके प्रभावसे लोगोंमें धर्मके प्रति श्रद्धा बढ़ती है, पितृकार्य और देवकार्योंमें विश्वास उत्पन्न हो जाता है। इससे धर्मपथसे डिगे हुए लोग पुनः धर्ममार्गपर आरूढ़ होकर यज्ञ, दान,

१३२ प्रेम-दर्शन श्राद्ध, तर्पण आदि कर्म करने लगते हैं, जिससे देवता और पितरोंको बड़ा सुख मिलता है। भक्तिके प्रतापसे भक्तके आगे-पीछेके कई कुल तर जाते हैं, इसलिये अपने कुलमें भक्तको उत्पन्न हुआ देखकर पितरगण अपनी मुक्तिकी दृढ़ आशासे हर्षोत्फुल्ल हो जाते हैं। पद्मपुराणमें कहा है— आस्फोटयन्ति पितरो नृत्यन्ति च पितामहाः। मद्द्वंशे वैष्णवो जातः स नस्त्रा भविष्यति॥ 'पितृ-पितामहगण अपने वंशमें भगवद्भक्तका जन्म हुआ जानकर—यह हमारा उद्धार कर देगा, इस आशासे प्रसन्न होकर नाचने और ताल ठोकने लगते हैं।' मचले हुए दर्शनाकांक्षी भक्त किसी भी बातसे सन्तुष्ट नहीं होते, अतः स्नेहमयी जननीकी भाँति उन्हें अपनी गोदमें खिलाकर सुखी करनेके लिये सच्चिदानन्दघन भगवान् दिव्यरूपमें साक्षात् प्रकट होते हैं। उनके प्रकट होते ही देवताओंका अहित करनेवाले असुरोंका विनाश आरम्भ हो जाता है। इस प्रकार भक्तके आविर्भावको ही भगवान्के प्राकट्यमें कारण समझकर देवतागण भी नाचने लगते हैं। जबतक भगवान् या भगवान्के प्यारे धर्मात्मा भक्तोंका आविर्भाव नहीं होता तबतक पृथ्‍वीदेवी अनाथा रहती हैं। और जब भक्त प्रकट होते हैं तब बछड़ेके पीछे स्नेहवश दौड़नेवाली गौकी तरह भगवान् भी प्रकट हो जाते हैं, अतएव भक्तके आविर्भावसे ही पृथ्‍वी सनाथा हो जाती है। नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः ॥ ७२ ॥ ७२-उनमें (भक्तोंमें) जाति, विद्या, रूप, कुल, धन और क्रियादिका भेद नहीं है। सूत्रकार यहाँ यह समझाते हैं कि भक्तिमें जाति, विद्या,

प्रेमी भक्तोंकी महिमा १३३ रूप, कुल, धन और क्रियादिकी प्रधानता नहीं है। ब्राह्मण हो या शूद्र, पढ़ा-लिखा हो या बेपढ़ा-लिखा, सुन्दर हो या कुरूप, ऊँचे कुलका हो या नीच कुलका, धनवान् हो या दरिद्र और बहुत क्रियाशील हो या अक्रिय। जो अपना सर्वस्व प्रभुपर न्योछावर कर सतत उनका प्रेमपूर्वक स्मरण करनेमें अपने चित्तको तल्लीन कर देता है, उसीको भक्तिरूपी परम दुर्लभ धन मिल जाता है। निषादका जन्म नीच जातिमें हुआ था, सदन कसाई थे, शबरी गँवार स्त्री थी, ध्रुव अपढ़ बालक थे, विभीषण और हनुमानादि कुरूप और अकुलीन राक्षस तथा वानर थे, विदुर और सुदामा निर्धन थे, गोपीजन क्रियाहीन थीं, परन्तु इन सबने भक्ति और प्रपत्ति के प्रतापसे भगवान्‌का प्रेम प्राप्त किया और भगवान्‌के परमप्रिय हो गये। सर्व सत्कर्मोंकी फलरूपा भक्ति जिसके हृदयमें है, वही भक्त है, वही सर्वगुणसम्पन्न है, फिर चाहे वह कोई हो, यही बात श्रीरामचरितमानसमें कही गयी है— सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता । सोइ महि मंडित पंडित दाता ॥ धर्म परायन सोइ कुल त्राता । राम चरन जा कर मन राता ॥ नीति निपुन सोइ परम सयाना । श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना ॥ सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा । जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा ॥ कह रघुपति सुनु भामिनि बाता । मानउँ एक भगति कर नाता ॥ जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई ॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥ इसका यह तात्पर्य नहीं कि भक्त अपनेको सबसे ऊँचा और सर्वगुणसम्पन्न समझकर सबसे अपनी पूजा कराता है या समाज, जाति, वर्ण और आश्रममें बड़ोंके साथ खान-पान, विवाह, व्यवहार, रहन-सहन, आचार-विचार और कुलपरम्परा

१३४ प्रेम-दर्शन आदिमें अपने लिये समान अधिकारका दावा करता है। भक्त तो अभिमानका सर्वथा त्यागी है, फिर वह नया झूठा अभिमान लादकर ऐसा क्यों करने लगा ? जो ऐसा करते हैं वे भक्त नहीं हैं। वर्णाश्रम तथा भक्तिमें भेद है। जो भक्तिके नामपर वर्णाश्रमकी मर्यादा नाश करना चाहते हैं, वे तो भक्तिपर लांछन लगाते हैं। अतएव भक्तिमार्गपर चलनेवाले साधकोंको शास्त्र- त्यागकी कभी भावना ही नहीं करनी चाहिये। यह सत्य है कि प्रारब्धमें न होनेसे विद्या और धन नहीं मिल सकता और न इस जन्ममें रूप, जाति तथा कुल ही बदल सकते हैं। परन्तु इन सब वस्तुओंके होने-न-होनेसे अथवा कम-ज्यादा होनेसे भक्तमें ऊँचा-नीचा भाव नहीं करना चाहिये—भक्तिके नाते जातिभेद आदिके कारण भक्तको नीचा कदापि नहीं समझना चाहिये। वैष्णवशास्त्रोंमें इसीलिये भक्तोंमें जातिभेदबुद्धिको एक अपराध बतलाया है।*

  • वैष्णवग्रन्थोंमें निम्नलिखित ६४ अपराध बतलाये गये हैं। इनपर ध्यान रखकर चलनेसे बहुत लाभ हो सकता है। १-श्रीभगवान्‌को कोई देवता या तत्त्वविशेष मानना, २-वेदोंमें ग्रन्थ या पौरुषेयबुद्धि, ३-भक्तोंमें जातिभेदबुद्धि, ४-गुरुको साधारण मनुष्य समझना, ५-भगवान्‌की प्रतिमाको काठ, पत्थर, धातु, कागज या मिट्टी समझना, ६-भगवान्‌के प्रसादको साधारण खानेकी चीज समझना, ७-भगवान्‌के चरणोदकको साधारण जल समझना, ८-तुलसीको साधारण वृक्ष समझना, ९-गौको साधारण पशु समझना, १०-भागवत और गीताको साधारण पुस्तक समझना, ११-भगवान्‌की लीलाओंको मनुष्यकी की हुई मानना, १२-सांसारिक प्रेम या स्त्रीसुखके साथ भगवान्‌की लीलाकी तुलना करना, १३-गोपियोंको (भगवान्‌के लिये) परनारी समझना, १४-रासलीलाको कामचेष्टा समझना, १५-भगवान्‌के महोत्सवके समय स्पर्शास्पर्शबुद्धि रखना, १६-ईश्वर और शास्त्रोंको न मानकर नास्तिक हो जाना, १७-सन्देहपूर्वक धर्मका आचरण करना, १८-धर्मके पालनमें आलस्य करना, १९-भक्तोंको बाहरी बातोंपर कसना, २०-साधु-महात्माओंके गुण-दोषोंकी आलोचना करना, २१-अपनेको उत्तम समझना, २२-किसी भी देवता या किसी भी शास्त्रकी निन्दा करना, २३-भगवान्‌की मूर्तिके सामने

प्रेमी भक्तोंकी महिमा १३५ यतस्तदीयाः ॥ ७३ ॥ ७३-क्योंकि (भक्त सब ) उनके ( भगवान्‌के ) ही हैं। भक्त अपनी भक्तिके प्रभावसे भगवद्रूप ही हो जाते हैं, इसीलिये उनमें परस्पर भेदबुद्धि नहीं होती और उनमें कोई अपनेको किसी भी हेतुसे ऊँचा नहीं समझता। □ □ पीठ देकर बैठना, २४-भगवान्‌की मूर्तिके सामने जूते पहनकर जाना, २५-भगवान्‌की मूर्तिके सामने माला धारण करना, २६-भगवान्‌की मूर्तिके सामने छड़ी लेकर जाना, २७-भगवान्‌की मूर्तिके सामने नीले कपड़े पहनकर जाना, २८-दाँतुन-कुल्ला किये बिना जाना, २९-मलत्याग या मैथुनादिके बाद कपड़े बदले बिना मन्दिरमें प्रवेश करना, ३०-भगवान्‌की मूर्तिके सामने हाथ-पैर फैलाना, ३१-भगवान्‌की मूर्तिके सामने पान खाना, ३२-भगवान्‌की मूर्तिके सामने जोरसे हँसना, ३३-कुचेष्टा करना, ३४-स्त्रियोंके चारों ओर घूमना, ३५-क्रोध करना, ३६-भगवान्‌की मूर्तिके सामने किसी दूसरेका अभिवादन करना, ३७-दुर्गन्धवाली कोई चीज खाकर दुर्गन्ध दूर हुए पहले मन्दिरमें जाना, ३८-मादक द्रव्य सेवन करना, ३९-किसीको अपमानित करना या मारना, ४०-काम- क्रोधादिकी चेष्टा करना, ४१-अतिथि या साधुकी आवभगत न करना, ४२-अपनेको भक्त, धर्मात्मा, पण्डित या पुण्यवान् समझना, ४३-नास्तिक, व्यभिचारी, हिंसक, लोभी और झूठ बोलनेवाले मनुष्योंका संग करना, ४४-विपत्तिमें ईश्वरपर दोष लगाना, ४५- पापके लिये धर्म करना, ४६-किसीको किंचित् भी कष्ट देकर अपनेको धार्मिक समझना, ४७-स्त्री, पुत्र, परिवार, आश्रित, दीन और साधुका पालन-पोषण न करना, ४८-किसी वस्तुको अपनी भोग्य समझकर भगवान्‌के निवेदन करना या बिना निवेदन किये भोगना, ४९-अपने इष्टदेवके नामकी शपथ करना, ५०-धर्म और भगवान्‌के नामको बेचकर धन कमाना, ५१-अपने इष्टदेवको छोड़कर दूसरेसे आशा करना, ५२-शास्त्रोंकी मर्यादाको तोड़ना, ५३-ब्रह्मज्ञान न होनेपर भी ब्रह्मज्ञानीके समान आचरण करना, ५४-सम्प्रदायभेदसे वैष्णवोंमें किसीको ऊँचा-नीचा समझना, ५५-देवताके समान आचरण करना, ५६-अवतारोंकी लीलाओंमें तारतम्य देकर उनकी निन्दा करना, ५७-दिल्लगीमें भी किसीको 'आप ही भगवान् हैं' ऐसा कहना, ५८-भगवान् किसीके मुखापेक्षी हैं, भूलकर भी ऐसा समझना, ५९-लोभवश किसीको भगवत्प्रसाद या चरणोदक देना, ६०-भगवान्‌के चित्र, प्रतिमा या नामका अपमान करना, ६१- किसी भी जीवको किसी प्रकारसे कष्ट पहुँचाना, भय दिखलाना या किसीका अहित करना, ६२-तर्क-वितर्कमें हार जाने या सिद्धान्त स्थापित न कर सकनेपर आस्तिकताको त्याग देना, ६३-भगवान्‌के अवतारोंके जन्म-कर्मोंको साधारण समझना, ६४- भगवान्‌के युगलरूपमें द्वैतबुद्धि करना।

वाद-विवादरूपी विघ्न

वादो नावलम्ब्यः ॥ ७४ ॥ ७४-( भक्तको ) वाद-विवाद नहीं करना चाहिये। भक्तिके साधकोंके लिये यह सूत्र बड़े ही महत्त्वका है। भक्तको तर्क-वितर्कमें पड़नेकी कोई भी आवश्यकता नहीं। यह समझना चाहिये कि मेरा तो हरेक क्षण अपने प्रियतम भगवान्‌के भजनके लिये समर्पण हो चुका, उसे दूसरे काममें लगानेका अधिकार ही नहीं है। फिर वह तर्क-वितर्क करे भी किस बातकी। सृष्टि कब हुई, कैसे हुई, क्यों हुई, इसका मूल तत्त्व क्या है, इन सब बातोंको जाननेकी उसे जरूरत नहीं। उसने तो श्रीभगवान्‌को ही सब कुछ मान-जानकर अपना एकमात्र लक्ष्य बना लिया है। भगवान् अपना तत्त्व जब चाहेंगे, आप ही समझा देंगे। कब समझावेंगे, समझावेंगे या नहीं समझावेंगे, इस बातकी भी उसे कोई चिन्ता नहीं होनी चाहिये। अपने प्रियतम भगवान्‌के चिन्तनको छोड़कर दूसरी किसी वस्तुके चिन्तनकी उसके मनमें गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिये। और यह भी निश्चित है कि तर्कसे तत्त्वकी उपलब्धि भी नहीं होती। इसीलिये ब्रह्मसूत्रमें कहा है—‘तर्काप्रतिष्ठानात्’ (२।१।११)—‘तर्ककी प्रतिष्ठा नहीं है।’ कठोपनिषद्‌में कहा गया है— ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’ (१।२।९)—‘बुद्धिके तर्कसे उस तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होती।’ वह सत्य तत्त्व तो शुद्धचित्त सात्त्विक पुरुषके सामने स्वयमेव आविर्भूत होता है। किसी अंशमें यह भी सत्य है कि ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’, परन्तु वह वाद दूसरा होता है। श्रद्धालु शिष्य जिज्ञासाभावसे गुरुके सामने तर्क उपस्थित करता है और

वाद-विवादरूपी विघ्न १३७ गुरु उसकी शंका निवारण कर और भी प्रबल तर्कसे उसे सिद्धान्त समझाते हैं। ऐसा वाद दूषित नहीं है। परन्तु जो वाद आग्रहपूर्वक होता है वह तो बुरा ही फल उत्पन्न करता है और वादमें अपने मतका आग्रह हो ही जाता है। फिर सिद्धान्तका लक्ष्य छूट जाता है और व्यक्तिगत दोषनिरीक्षण, दोषारोपण और परस्पर गालीगलौज होने लगता है। विवेक नष्ट हो जाता है, क्रोध छा जाता है, वाणी बेकाबू हो जाती है और सदाके लिये वैर बँध जाता है। इसीलिये ‘वादे वादे वर्द्धते वैरवह्निः’— ‘वाद-विवादसे वैरकी आग भड़क उठती है’, कहा जाता है। भक्तिके पथिकको तो इतनी फुरसत ही नहीं मिलनी चाहिये जिसमें वह वाद-विवाद कर सके। जहाँतक हो सके उसे तर्कके स्थानसे अलग ही रहना चाहिये। यदि प्रारब्धवश कभी तर्कवादियोंसे समागम हो जाय तो उसे विनीतभाव धारणकर उनकी बात सुन लेनी चाहिये और बदलेमें कोई उत्तर देकर बात बढ़ानी नहीं चाहिये। ‘अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति’—‘जब आगमें ईंधन नहीं पड़ेगा तो वह आप ही बुझ जायगी’— कहनेवाले स्वयं ही थक जायँगे। अतएव भक्तके लिये सबसे भली चुप है। ‘मौनं सर्वार्थसाधनम्’—यह वाक्य याद रखना चाहिये। दूसरेकी ऐसी बात सुने ही नहीं जिससे अपने इष्टमें, पथमें, विश्वासमें और साधनमें संशय हो जाय; और स्वयं किसीका जी दुःखे, ऐसी कोई बात किसीसे कहे नहीं। दूसरेकी बात मौके-बेमौके सुननी पड़े तो उसे सुन ले; परन्तु स्वयं तो तर्ककी इच्छासे, दूसरेको दबानेके लिये, अपना मत स्थापन करनेके लिये विवादमें उतरे ही नहीं। इसका यह तात्पर्य नहीं कि श्रद्धाके साथ पूछनेवालेको कुछ न कहे या मौका पड़नेपर बिना

१३८ प्रेम-दर्शन पूछे भी हितकी बात न कहे। मतलब तो यह है कि विवादमें न उतरे। अनावश्यक बोले ही नहीं, जब बिना बोले काम न चले तब आवश्यक समझकर इतना ही बोले जितनेसे काम चल जाय। बात बढ़ाकर न कहे, विवादके भावसे न कहे, किसीका विरोध न करे, किसीकी दिल्लगी न करे, किसीका दोष न बतावे, किसीके हृदयपर चोट न करे, अपनी या अपने मतकी बड़ाई न करे, किसीकी निन्दा न करे, कड़ुआ न बोले, बोलनेमें आशा या कामनाका भाव न रखे, जबानसे किसीको धोखा न दे, किसीके विश्वासमें शंका न पैदा करे। जो कुछ बोले सत्य, मधुर, प्रिय, अनुद्वेगकर और हितकर शब्द ही बोले; शेष समय भगवन्नाम-स्मरणमें लगा रहे। अनावश्यक एक शब्द बोलनेमें भी बड़ी हानि समझे, क्योंकि उतना समय व्यर्थ गया। उतने समयके लिये जीभसे नामजप छूट गया और अनावश्यक शब्दका वातावरणमें जो असर हुआ, वह अलग। यह निश्चय रखे कि तर्क और वाद-विवादसे कभी भगवत्प्रेम, ज्ञान या भगवान्‌की प्राप्ति नहीं होती। तर्कसे तो अहंकार, द्वेष, क्रोध, हिंसा और वैरकी ही जमात इकट्ठी होती है। अतएव वाद-विवादसे सदा अलग रहे। अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तरक सब त्यागी ॥ अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल। भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥ बाहुल्यावकाशादनियतत्वाच्च ॥ ७५ ॥ ७५-क्योंकि (वाद-विवादमें) बाहुल्यका अवकाश है और वह अनियत है। सूत्रकार कारण दिखाते हुए कहते हैं कि वाद-विवादमें

वाद-विवादरूपी विघ्न १३१ उत्तर-प्रत्युत्तर होता है और वह बढ़ता ही जाता है। दोनों ओरसे अपने-अपने मतका समर्थन करनेमें शब्दोंकी झड़ी लग जाती है। जो बात भगवत्कृपासे ही जानी जा सकती है, वह तर्कसे मिल तो सकती ही नहीं। अतएव तर्क-वितर्कका कोई सुफल भी नहीं होता। यदि विवादमें बोलते-बोलते थक जाने या समयपर तर्क याद न आनेसे किसी पक्षकी जीत हो जाती है तो वह भी सिद्धान्त नहीं माना जाता; क्योंकि वह सिद्धान्त है ही नहीं। अतएव विवादमें समय नष्ट न कर भक्तको सर्व प्रकारसे अपने भगवान्पर निर्भर रहते हुए निरन्तर निष्कपट और निष्काम भावसे परम श्रद्धापूर्वक भगवान्का भजन करना चाहिये। भगवत्प्रेमकी प्राप्ति तर्कसे नहीं होती, भक्तिसे ही होती है। ☐ ☐

भक्तिके प्रधान सहायक भक्तिशास्त्राणि मननीयानि तदुद्बोधककर्माण्यपि करणीयानि ॥ ७६ ॥ ७६-( उस प्रेमाभक्तिकी प्राप्तिके लिये ) भक्तिशास्त्रका मनन करते रहना चाहिये और ऐसे कर्म भी करने चाहिये जिनसे भक्तिकी वृद्धि हो। भक्ति चाहनेवालोंको न कोई ग्रन्थ देखना चाहिये और न कोई कर्म करना चाहिये ऐसी बात नहीं है। उनको तर्क- वितर्कका त्याग करके बार-बार ऐसे ग्रन्थोंको अवश्य देखना चाहिये जिनमें भगवान्‌की भक्तिका निरूपण हो, भक्तिका माहात्म्य हो, भक्तिके साधन बतलाये गये हों, भगवान्‌के प्यारे भक्तोंके पुण्यचरित्रोंकी कथाएँ हों और भक्तिके वशमें होकर रहनेवाले भगवान्‌के प्रभाव, रहस्य और गुणोंका वर्णन हो। ऐसे भक्तिशास्त्रोंके अध्ययनसे, महात्मा भक्त सन्तोंकी वाणियोंके श्रवण और पठनसे भगवान्‌के प्रति प्रेमाभक्तिका उदय होता है। हाँ, भक्ति चाहनेवाले पुरुषोंको ऐसी पुस्तकें कभी नहीं पढ़नी- सुननी चाहिये जिनमें श्रीभगवान्‌का और भक्तिका खण्डन हो, उनका महत्त्व कम बतलाया गया हो और भक्तोंकी निन्दा हो, अथवा जिनमें लौकिक विषयोंकी महत्ताका ही वर्णन हो। ऐसी पुस्तकें भी उन्हें लाभदायक नहीं होतीं जिनमें भगवान्, भक्ति और भक्तोंका महत्त्व न हो। इसके सिवा राग-द्वेष, काम-क्रोध और वैर-विरोध उत्पन्न करनेवाला साहित्य तो छूना भी नहीं चाहिये। इसीलिये ऐसा कहा गया है कि —

भक्तिके प्रधान सहायक १४१ यस्मिन् शास्त्रे पुराणे वा हरिभक्तिर्न दृश्यते। श्रोतव्यं नैव तच्छास्त्रं यदि ब्रह्मा स्वयं वदेत्॥ ‘जिस शास्त्र या पुराणमें भगवान्‌की भक्ति न दिखलायी दे, ब्रह्माके द्वारा कहा हुआ होनेपर भी उसको नहीं सुनना चाहिये।’ साथ ही कर्म भी ऐसे करने चाहिये, जिनसे भक्तिकी जागृति और वृद्धि हो। भक्तिकामी पुरुषको निषिद्ध (पाप) कर्मोंका तो बिलकुल ही त्याग कर देना चाहिये। जो विषयोंकी आसक्तिवश पापकर्मोंको नहीं छोड़ना चाहता और भक्त भी कहलाना चाहता है वह या तो स्वयं भ्रममें है या जान-बूझकर भ्रम फैलाना चाहता है। भक्तिकी प्राप्तिमें सहायक कर्मोंमें प्रधान निम्नलिखित हैं— १—अपने वर्ण और आश्रमके धर्मोंका यथासम्भव पूरा पालन। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासीके लिये त्यागपूर्ण आचरण और गृहस्थके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ माता-पिता, स्त्री- पुत्र-परिवार आदि आश्रित जनोंका प्रेम और सत्कारपूर्वक पालन, न्याय और सत्यपूर्वक जीविकानिर्वाह एवं शास्त्रोक्त यज्ञ, दान, तप आदि। २—सदाचारका पालन। ३—सत्संग और भगवद्गुणानुवादका श्रवण, चिन्तन और कीर्तन। ४—भगवन्नामका जप, स्मरण और कीर्तन। ५—भगवत्-पूजन, स्तुति-प्रार्थना और नमस्कार। ६—सन्त-भक्तोंकी सेवा और श्रद्धापूर्वक उनकी आज्ञाका पालन। ७—तीर्थसेवन।