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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

प्रेममें अनन्यता ३१ प्रेमा-भक्तिमें यह कर्मत्याग अपने-आप ही हो जाता है। प्रेममें मतवाला भक्त अपने प्रियतम भगवान्को छोड़कर अन्य किसी बातको जानता नहीं; उसका मन सदा श्रीकृष्णाकार बना रहता है, उसकी आँखोंके सामने सदा सर्वत्र प्रियतम भगवान्की छबि ही रहती है। दूसरी वस्तुमें उसका मन ही नहीं जाता। श्रीगोपियोंने भगवान्से कहा था— चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये। पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३४) ‘हे प्रियतम! हमारा चित्त आनन्दसे घरके कामोंमें आसक्त हो रहा था, उसे तुमने चुरा लिया। हमारे हाथ घरके कामोंमें लगे थे, वे भी चेष्टाहीन हो गये और हमारे पैर भी तुम्हारे पाद- पद्मोंको छोड़कर एक पग भी हटना नहीं चाहते। अब हम घर कैसे जायँ और जाकर करें भी क्या?’ जगत्का चित्र चित्तसे मिट जानेके कारण वह भक्त किसी भी लौकिक (स्मार्त) अथवा वैदिक (श्रौत) कार्यके करने लायक नहीं रह जाता। इससे वे सब स्वयमेव छूट जाते हैं। सुन्दरदासजी ऐसे प्रेमी भक्तकी दशाका वर्णन करते हुए कहते हैं— न लाज तीन लोककी, न वेदको कह्यौ करै। न संक भूत-प्रेतकी, न देव-जच्छते डरै॥ सुनै न कान और की, द्रसै न और इच्छना। कहै न बात और की, सुभक्ति प्रेमलच्छना॥ कबहुँक हँसि उठि नृत्य करै रोवन फिर लागे। कबहुँक गदगद कंठ सबद निकसें नहिं आगे॥

३२ प्रेम-दर्शन कबहुँक हृदै उमंग बहुत ऊँचे सुर गावै। कबहुँक है मुख मौन गगन जैसो रहि जावै॥ चित्त बित्त हरिसों लग्यो सावधान कैसे रहै। यह प्रेमलच्छना भक्ति है, शिष्य सुनो 'सुन्दर' कहै॥ तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषूदासीनता च ॥ ९ ॥ ९-उस प्रियतम भगवान्में अनन्यता और उसके प्रतिकूल विषयमें उदासीनताको भी निरोध कहते हैं। बाहरी ज्ञान बना रहनेकी स्थितिमें भी प्रेमी भक्त अपने प्रियतमके प्रति अनन्य भाव रखता हुआ उसके प्रतिकूल कार्योंसे सर्वथा उदासीन रहता है। इस प्रकार सावधानीसे होनेवाले कर्म भी निरोध कहलाते हैं। प्रेमी भक्तके द्वारा होनेवाली प्रत्येक चेष्टा अपने प्रियतमके अनुकूल होती है और अनन्य भावसे उसीकी सेवाके लिये होती है। प्रतिकूल चेष्टा तो उसके द्वारा वैसे ही नहीं होती जैसे सूर्यके द्वारा कहीं अँधेरा नहीं होता या अमृतके द्वारा मृत्यु नहीं हो सकती। अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता ॥ १० ॥ १०-(अपने प्रियतम भगवान्को छोड़कर) दूसरे आश्रयोंके त्यागका नाम अनन्यता है। प्रेमी भक्तके मनमें अपने प्रियतम भगवान्के सिवा अन्य किसीके होनेकी ही कल्पना नहीं होती, तब वह दूसरेका भजन कैसे करे? वह तो चराचर विश्वको अपने प्रियतमका शरीर जानता है, उसे कहीं दूसरा दीखता ही नहीं— उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥ रहीम कहते हैं कि आँखोंमें प्यारेकी मधुर छबि ऐसी समा रही है कि दूसरी किसी छबिके लिये स्थान ही नहीं रह गया— प्रीतम-छबि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय। भरी सराय 'रहीम' लखि, आप पथिक फिरि जाय॥

प्रेममें अनन्यता ३३ गोपियोंकी सर्वत्र श्याममयी चित्तवृत्तिका वर्णन करते हुए श्रीदेवकविने कहा है— औचक अगाध सिंधु स्याहीकौ उमड़ि आयो, तामें तीनों लोक बूडि गए एक संगमें। कारे-कारे आखर लिखे जु कारे कागद सु न्यारे करि बाँचै कौन जाँचै चितभंगमें॥ आँखिनमें तिमिर अमावसकी रैन जिमि, जंबूनद-बुंद जमुना-जल-तरंगमें। यों ही मन मेरो मेरे कामकौ न रह्यो माई, स्याम रंग ह्वै करि समानो स्याम रंगमें॥ यदि कोई उससे दूसरेकी बात कहता है तो वह उसे सुनना ही नहीं चाहता या उसे सुनायी ही नहीं पड़ती। यदि कहीं जबरदस्ती सुननी पड़ती भी है तो उसका मन उधर आकर्षित होता ही नहीं। शिवजीकी अनन्योपासिका पार्वतीजीको सप्तर्षियोंने महादेवजीके अनेक दोष बतलाकर उनसे मन हटाने और सर्वसद्गुणसम्पन्न भगवान् विष्णुमें मन लगानेको कहा, तब शिवप्रेमकी मूर्ति भगवतीने उत्तर दिया— जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥ महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ इसी तरह गोपियोंने भी उद्धवजीसे कहा था— ऊधौ! मन मानेकी बात। दाख छोहारा छोड़ि अमृतफल बिषकीरा बिष खात॥ जो चकोरको दै कपूर कोउ तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरे काठमें बँधत कमलके पात॥ ज्यों पतंग हित जानि आपनो, दीपकसों लपटात। 'सूरदास' जाको मन जासों, ताको सोइ सुहात॥

३४ प्रेम-दर्शन इस प्रकार प्रेमी भक्त एकमात्र अपने प्रियतम भगवान्‌को ही जानकर, उसीको सर्वस्व मानकर, जैसे मछलीको केवल जलका आश्रय होता है, वैसे ही केवल भगवान्‌का ही आश्रय लेकर सारी चेष्टाएँ उसीके लिये करता है। एक भरोसो एक बल, एक आस बिस्वास। एक राम घनस्याम हित चातक 'तुलसीदास'॥ वह चातककी टेककी भाँति केवल भगवान्‌में ही चित्त लगाये, सम्पूर्णरूपसे उसीपर निर्भर करता हुआ, उसीके लिये शरीर धारण करता है। उसका खाना-पीना, सोना-बैठना, चलना-फिरना, देना- लेना, दान-पुण्य करना, सब कुछ उसीके लिये होता है। अतएव उसके समस्त कर्म भगवान्‌के प्रति अनन्य प्रेमभावसे सम्पन्न होनेके कारण स्वाभाविक ही कल्याणमय होते हैं। लोके वेदेषु तदनुकूलाचरणं तद्विरोधिषूदासीनता ॥ ११ ॥ ११-लौकिक और वैदिक कर्मोंमें भगवान्‌के अनुकूल कर्म करना ही उसके प्रतिकूल विषयमें उदासीनता है। अनन्य भावसे भगवदर्थ कर्म करनेवालेके लिये भगवान्‌के प्रतिकूल कर्मोंका अपने-आप ही त्याग हो जाता है। वैदिक या लौकिक (श्रौत या स्मार्त), कोई भी ऐसा कर्म वह नहीं कर सकता जो भगवान्‌के अनुकूल न हो, यानी जिससे प्रेमाभक्तिकी वृद्धिमें सहायता न पहुँचती हो। पुत्रके लिये माता-पिताकी, स्त्रीके लिये स्वामीकी और शिष्यके लिये गुरुकी आज्ञा मानना वेद और लोक-धर्मके अनुसार सर्वथा कर्तव्य है; परन्तु उनकी आज्ञा भी यदि भगवत्-प्रेमसे विरुद्ध है तो प्रेमी भक्त कष्ट सहकर भी उसका त्याग कर देता है, क्योंकि उसके द्वारा अपने प्यारेके प्रतिकूल आचरण होना असम्भव है। गोस्वामीजी महाराजने उदाहरण देते हुए कहा है—

प्रेममें अनन्यता ३५ जाके प्रिय न राम-बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥ तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥ प्रह्लादने भगवान्‌के प्रतिकूल पिताकी आज्ञा नहीं मानी, विभीषणने भाईका साथ छोड़ दिया, भरतजी माताकी आज्ञाको टाल गये, राजा बलिने गुरु शुक्राचार्यकी बात नहीं सुनी और ब्रजवनिताओेने पतियोंकी आज्ञापर ध्यान नहीं दिया और ये सभी जगत्‌के लिये कल्याणकारी हुए। कर्म चार प्रकारके होते हैं—नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध। इनमें मद्य-मांस-सेवन, चोरी, व्यभिचार आदि निषिद्ध कर्म तो सभीके लिये त्याज्य हैं। शास्त्रीय काम्य (सकाम) कर्म बन्धनकारक तथा जन्म-मृत्युके चक्रमें डालनेवाले होनेके कारण ‘काम्यानां कर्मणां न्यासम्’ इस भगवत्-वचनानुसार त्याज्य हैं। रहे नित्य और नैमित्तिक कर्म, इनको लौकिक और वैदिक विधिके अनुसार फलासक्ति छोड़कर केवल भगवान्‌के आज्ञानुसार भगवत्-प्रीत्यर्थ करना चाहिये। भगवत्-प्रीत्यर्थ वही कर्म होते हैं जो भगवान्‌के प्रति प्रेम बढ़ानेवाले हों। गीताके अनुसार आसक्ति और फलाशा छोड़कर मन, वाणी और शरीरसे भगवान्‌के अनुकूल कर्म करना और प्रतिकूल कर्मोंका त्याग करना ही विरोधी कर्मोंमें उदासीनता है। प्रेमाभक्तिकी उन्मादमयी स्थिति प्राप्त न होनेतक ऐसे भगवदनुकूल कर्म प्रेमी भक्तके द्वारा स्वाभाविक हुआ ही करते हैं। भवतु निश्चयदाढ्‌र्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्॥ १२॥ १२- (विधिनिषेधसे अतीत अलौकिक प्रेमप्राप्ति करनेका मनमें) दृढ़ निश्चय हो जानेके बाद भी शास्त्रकी रक्षा करनी चाहिये। अर्थात् भगवदनुकूल शास्त्रोक्त कर्म करने चाहिये।

३६ प्रेम-दर्शन प्रेमकी बाह्यज्ञानशून्य, विधि-निषेधसे अतीत सिद्धावस्थामें लौकिक और वैदिक कर्मोंका त्याग अपने-आप ही हो जाता है, जान-बूझकर किया नहीं जाता। इसलिये जबतक प्रेमकी वैसी, सब कुछ भुला देनेवाली स्थिति प्राप्त न हो जाय तबतक प्रेमके नामपर शास्त्रविहित कर्मोंका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। शास्त्रके अनुसार भगवान्‌के अर्पणबुद्धिसे भगवदनुकूल नित्य-नैमित्तिक कर्म और श्रवण-कीर्तनादिरूप भजन करते-करते ही भगवान्‌का वह परमोच्च प्रेम प्राप्त होता है। भगवान् स्वयं आज्ञा करते हैं— तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ (गीता १६। २४) अतः तुम्हारे लिये क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये—इसकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है, यह जानकर तुम्हें शास्त्रविधिके अनुसार ही कर्म करना चाहिये। अन्यथा पातित्याशंकया ॥ १३ ॥ १३-नहीं तो गिर जानेकी सम्भावना है। जो मनुष्य जान-बूझकर शास्त्रोंकी आज्ञाका पालन न करके शास्त्रके प्रतिकूल, अमर्यादित कार्य करता है और उसे प्रेमका नाम देकर दोषमुक्त होना चाहता है, वह अवश्य ही गिर जाता है। भगवान्‌ने स्वयं कहा है— यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ (गीता १६। २३) 'जो मनुष्य शास्त्रकी विधिको छोड़कर मनमाना स्वेच्छाचार करता है वह न सिद्धि पाता है, न परम गति पाता है और न उसे सुखकी ही प्राप्ति होती है।' जान-बूझकर शास्त्रविहित कर्मोंका

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त्याग करना प्रेमका आदर्श नहीं है, मोह है, उच्छृंखलता और स्वेच्छाचार है। ऐसा करनेवाला परिणाममें आसुरी योनि, नरक और दुःखोंको ही प्राप्त होता है। लोकोऽपि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीर- धारणावधि ॥ १४॥ १४-लौकिक कर्मोंको भी तबतक (बाह्यज्ञान रहनेतक विधिपूर्वक करना चाहिये।) पर भोजनादि कार्य जबतक शरीर रहेगा तबतक होते रहेंगे। वैदिक कर्मके साथ ही लौकिक जीविका, गृहस्थ-पालन आदिके कार्य भी सावधानीके साथ भगवदनुकूल विधिके अनुसार करने चाहिये। अवश्य ही एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें वैदिक, लौकिक कार्य अनायास ही छूट जाते हैं; परंतु उस स्थितिके प्राप्त होनेतक दोनों प्रकारके कर्म विधिवत् अवश्य करने चाहिये। फिर तो आप ही छूट जायँगे। परन्तु आहारादि कर्म उस अवस्थामें भी रहेंगे। कारण, वे शरीरके लिये आवश्यक हैं। यद्यपि प्रेमके नशेमें चूर भक्त आहारादिके लिये न तो कोई इच्छा करता है और न चेष्टा ही करता है, परन्तु आहारादि प्राप्त होनेपर अभ्यासवश अनायास ही उसके द्वारा आहार कर लिया जाता है। अवश्य ही वह भी भगवत्प्रसाद ही होता है। 🔲 🔲

प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण तल्लक्षणानि वाच्यन्ते नानामतभेदात् ॥ १५ ॥ १५-अब नाना मतोंके अनुसार उस भक्तिके लक्षण कहते हैं। विभिन्न आचार्योंने भक्तिका स्वरूप भिन्न-भिन्न रूपसे बतलाया है, पहले उनका वर्णन करके फिर देवर्षि नारदजी अपना मत दिखलाना चाहते हैं। पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्यः ॥ १६ ॥ १६-पाराशरनन्दन श्रीव्यासजीके मतानुसार भगवान्‌की पूजा आदिमें अनुराग होना भक्ति है। अपने तन, मन, धनको भगवान्‌की पूजन-सामग्री समझना और परम श्रद्धापूर्वक यथाविधि तीनोंके द्वारा भगवान्‌की प्रतिमाकी अथवा विश्वरूप भगवान्‌की पूजा करनी चाहिये। भगवत्-पूजामें मन लगनेसे संसारके बन्धनकारक विषयोंसे मन अपने-आप ही हट जाता है। बाह्य और मानस दोनों ही प्रकारसे भगवान्‌की पूजा होनी चाहिये। भगवत्की पूजासे भगवान्‌का परमपद प्राप्त होता है— श्रीविष्णोरर्चनं ये तु प्रकुर्वन्ति नरा भुवि। ते यान्ति शाश्वतं विष्णोरानन्दं परमं पदम्॥ (विष्णुरहस्य) 'इस धरातलमें जो लोग भगवान्‌की पूजा करते हैं वे सनातन आनन्दमय परमपदको प्राप्त होते हैं।' कथादिष्विति गर्गः ॥ १७ ॥ १७-श्रीगर्गाचार्यके मतसे भगवान्‌की कथा आदिमें अनुराग होना ही भक्ति है।

प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ३९ श्रीभगवान्‌की दिव्य लीला, महिमा, उनके गुण और नामोंके कीर्तन तथा श्रवणमें मन लगाना निस्सन्देह भक्तिका प्रधान लक्षण है। संसारमें अधिकांश मनुष्य तो ऐसे हैं जिन्हें भगवान् और भगवान्‌की कथासे कोई मतलब ही नहीं है। दिन-रात विषय-चर्चामें ही उनका जीवन बीतता है। न तो वे कभी भगवान्‌का गुणगान करते हैं और न उन्हें भगवच्चर्चा सुहाती है। ‘श्रवण न रामकथा अनुरागी।’ इस अवस्थामें जिन मनुष्योंका मन भगवान्‌के गुणानुवाद सुनने और कहनेमें लगा रहता है वे अवश्य ही भक्त हैं। सूत्रकार आचार्य श्रीनारदजीने स्वयं महर्षि वेदव्याससे कहा है— इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य वा स्विष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदत्तयोः। अविच्युतोऽर्थः कविभिर्निरूपितो यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम् ॥ (श्रीमद्भा० १।५।२२) ‘विद्वानोंने यही निरूपित किया है कि भगवान्‌का गुणानुवाद- कीर्तन ही तप, वेदाध्ययन, भलीभाँति किये हुए यज्ञ, मन्त्र, ज्ञान और दान आदि सबका अविनाशी फल है।’ श्रीरामचरितमानसमें कहा है— रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥ भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥ अतएव श्रीहरिकथामें यथार्थ अनुराग होना भक्ति है और इस भक्तिसे भगवान्‌की प्राप्ति निश्चय ही हो जाती है। आत्मरत्यविरोधेनेति शाण्डिल्यः ॥ १८ ॥ १८-शाण्डिल्य ऋषिके मतमें आत्मरतिके अविरोधी विषयमें अनुराग होना ही भक्ति है। अविच्छिन्नरूपसे शुद्ध आत्मस्वरूपमें रत रहना ही आत्मरति

४० प्रेम-दर्शन है; इस आत्मरतिमें नित्य स्थित रहनेको ही अव्यक्तोपासक महानुभाव भक्ति कहते हैं। श्रीशंकराचार्यजीने कहा है— मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी। स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते॥ आत्मरूपसे प्रत्येक प्राणीमें श्रीभगवान् ही विराजमान हैं, अतः उन सर्वात्मामें रति होना वस्तुतः भगवान्‌की भक्ति ही है और ऐसी भक्ति करनेवालेको मुक्ति प्राप्त होनेमें कोई सन्देह नहीं। नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति ॥ १९ ॥ १९-परन्तु देवर्षि नारदके मतसे अपने सब कर्मोंको भगवान्‌के अर्पण करना और भगवान्‌का थोड़ा-सा भी विस्मरण होनेमें परम व्याकुल होना ही भक्ति है। नारदजीको महर्षि व्यास, गर्ग और शाण्डिल्य-कथित भक्तिके लक्षणोंसे कोई विरोध नहीं है। भगवान्‌की पूजा करना, भगवान्‌के गुणगान करना और सर्वात्मरूप भगवान्‌में प्रेम करना उचित और आवश्यक है। व्यासजीको तो भगवद्गुणगानमें श्रीनारदने ही लगाया था। अतः इन लक्षणोंका खण्डन करने या इन्हें तुच्छ बतलानेके लिये नहीं, परन्तु इन्हींको और भी पुष्ट करनेके लिये नारदजी इन सभी लक्षणोंसे युक्त एक सर्वांगपूर्ण भक्तिका लक्षण निर्देश करते हुए कहते हैं कि अपने समस्त कर्म, (वैदिक और लौकिक) भगवान्‌में अर्पण करके प्रियतम भगवान्‌का अखण्ड स्मरण करना और पलभरके लिये भी उनका यदि विस्मरण हो जाय (प्रियतमको भूल जाय) तो परम व्याकुल हो जाना, यही सर्वलक्षणसम्पन्न भक्ति है। इसमें पूजा- कथामें अनुराग और विश्वात्मा भगवान्‌में रति तो रहती ही है। भगवान्‌ने श्रीमद्भगवद्गीतामें सब प्रकारके योगियोंमें इन्हीं लक्षणोंसे युक्त भक्ति-योगीको सर्वोत्तम बतलाया है—

प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ४१ तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥ योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥ (६।४६-४७) 'तपस्वियोंसे, शास्त्र-ज्ञानियोंसे और सकाम कर्मियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है; अतएव हे अर्जुन ! तू योगी बन। परन्तु सम्पूर्ण योगियोंमें भी वह भक्ति-योगी मेरे मतमें परम श्रेष्ठ है जो मुझमें श्रद्धावान् है और अन्तरात्माको मुझमें लगाकर निरन्तर मुझे भजता है।' भगवान्ने फिर आज्ञा की है— तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ (गीता ८।७) 'इसलिये हे अर्जुन ! तू सब समय (बिना विराम) मेरा स्मरण कर और (स्मरण करता हुआ ही मेरे लिये ही) युद्ध कर। इस प्रकार मुझमें ही मन-बुद्धि अर्पण करके तू निस्सन्देह मुझको ही प्राप्त होगा।' मानापमान, लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःख आदिकी परवा न करके, आसक्ति और फलकी इच्छा छोड़कर, शरीर और संसारमें अपने लिये अहंता-ममतासे रहित होकर, एकमात्र परम प्रियतम श्रीभगवान्को ही परम आश्रय, परम गति, परम सुहृद् समझकर, अनन्यभावसे, अत्यन्त श्रद्धाके साथ, प्रेमपूर्वक निरन्तर तैलधारावत् उनके नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूपका चिन्तन करते हुए परमानन्दमें मग्न रहना और इस प्रकार चिन्तनपरायण रहते हुए ही केवल उन परम प्रियतम भगवान्के लिये, उनकी रुचि तथा इच्छाके अनुसार, उन्हींके प्रीत्यर्थ, उन्हींको सुख पहुँचानेके दृढ़ और परम स्वार्थसे

४२ प्रेम-दर्शन प्रेरित होकर, सर्वथा निःस्वार्थभावसे समस्त दैहिक, वाचिक और मानसिक कर्मोंका आचरण करना। यदि किसी कारणवश क्षणभरके लिये भी उनका चिन्तन-स्मरण छूट जाय तो जलसे निकाली हुई मछलीसे भी अनन्तगुणा अधिक व्याकुलताका अनुभव करना, यही सर्वोच्च भक्ति है। ऐसा पूर्ण समर्पणकारी प्रेमी भक्त त्रैलोक्यके राज्यसुखकी तो बात ही क्या है, अपुनरावर्त्ती मोक्षके लिये भी, किसी भी हालतमें अपने प्रियतम भगवान्‌का स्मरण छोड़ना नहीं चाहता। भगवान् ऐसे भक्तकी प्रशंसा करते हुए भक्त उद्धवसे कहते हैं— न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः। न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥ निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्। अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः॥ निष्किंचना मय्यनुरक्तचेतसः शान्ता महान्तोऽखिलजीववत्सलाः। कामैरनालब्धधियो जुषन्ति यत् तन्निरपेक्ष्यं न विदुः सुखं मम॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१५–१७) 'हे उद्धव ! इस प्रकारके तुम भक्त मुझको जैसे प्रिय हो, वैसे प्रिय ब्रह्मा, शंकर, बलराम, लक्ष्मी और अपनी आत्मा भी नहीं है। ऐसे किसी वस्तुकी इच्छा न रखनेवाले, शान्तचित्त, निर्वैर, सर्वत्र समभावसे मुझको देखनेवाले और निरन्तर मेरा मनन करनेवाले प्रेमी भक्तोंकी चरणरजसे अपनेको पवित्र करनेके लिये मैं सदा-सर्वदा उनके पीछे-पीछे घूमा करता हूँ। मुझमें चित्तको अनुरक्त कर रखनेवाले, सर्वस्व मुझको अर्पण करके अकिंचन बने हुए ऐसे शान्त और मेरे नाते सब जीवोंके प्रति स्नेह करनेवाले तथा सब प्रकारकी कामनाओंसे

प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ४३ शून्य हृदयवाले महात्मा जिस परमसुखका अनुभव करते हैं, उस निरपेक्ष परमानन्दको दूसरे लोग नहीं जानते।' बस, श्रीनारदजीके मतसे यही भक्ति है। ऐसा भक्त समस्त आचरण श्रीभगवान्‌के अर्पण करके अनवच्छिन्नरूपसे भगवत्स्मरण करता रहता है और कहीं तनिक भी भूल जानेपर परम व्याकुल हो जाता है। अस्त्येवमेवम् ॥ २० ॥ २०-ठीक ऐसा ही है। देवर्षि नारद पिछले सूत्रमें बतलाये हुए सिद्धान्तकी दृढ़ताके लिये कहते हैं कि वस्तुतः भक्तिका यही स्वरूप है। यथा व्रजगोपिकानाम् ॥ २१ ॥ २१-जैसे व्रजगोपियोंकी ( भक्ति ) । भक्तिका लक्षण बतलाकर अब देवर्षि उदाहरणमें प्रेमिका- शिरोमणि प्रातःस्मरणीया श्रीगोपिकाओंका नाम लेते हैं। वस्तुतः गोपियोंकी ऐसी ही महिमा है। जगत्में ऐसा कौन है जो गोपियोंके प्रेमके तत्त्वका बखान कर सके? उनका तन, मन, धन, लोक, परलोक सब श्रीकृष्णके अर्पित था। वे दिन-रात श्रीकृष्णका ही चिन्तन करतीं, गद्गद वाणीसे निरन्तर श्रीकृष्णका ही गुणगान करतीं और सर्वत्र सर्वदा श्रीकृष्णको ही देखा करती थीं। स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने उनसे कहा है— न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥ ( श्रीमद्भा० १०।३२।२२) 'हे गोपिकाओ! तुमने मेरे लिये गृहस्थकी कठिन बेड़ियोंको तोड़कर मेरा भजन किया है। तुम्हारा यह कार्य सर्वथा निर्दोष है। मैं

४४ प्रेम-दर्शन देवताओंकी आयुपर्यन्त भी तुम्हारे इस उपकारका बदला नहीं चुका सकता। तुम अपनी उदारतासे ही मुझे ऋणमुक्त करना।' उद्धवको सँदेसा देकर भेजते समय भगवान् श्रीकृष्णने प्रेमाश्रु बहाते हुए गद्गद वाणीसे कहा था— ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिकाः। मामेव दयितं प्रेष्ठमात्मानं मनसा गताः। ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थे तान् बिभर्म्यहम्॥ मयि ताः प्रेयसां प्रेष्ठे दूरस्थे गोकुलस्त्रियः। स्मरन्त्योऽङ्ग विमुह्यन्ति विरहौत्कण्ठ्यविह्वलाः॥ धारयन्त्यतिकृच्छ्रेण प्रायः प्राणान् कथञ्चन। प्रत्यागमनसन्देशैर्बल्लव्यो मे मदात्मिकाः॥ (श्रीमद्भा० १०।४६।४—६) 'हे उद्धव! गोपियोंने अपना मन मुझको समर्पण कर दिया है, मैं ही उनके प्राण हूँ, मेरे लिये उन्होंने अपने देहके सारे व्यवहार छोड़ दिये हैं। जो लोग मेरे लिये समस्त लौकिक धर्मोंको छोड़ देते हैं, उनको मैं सुख पहुँचाता हूँ। वे गोपियाँ मुझको प्रियसे भी अति प्रिय समझती हैं, मेरे दूर रहनेपर मुझे स्मरण करके वे दारुण विरहवेदनासे व्याकुल होकर अपने देहकी सुधि भूल जाती हैं। मेरे बिना वे बड़ी ही कठिनतासे किसी प्रकार प्राण धारण कर रही हैं, मेरे पुनः ब्रज जानेके सन्देशके आधारपर ही वे जी रही हैं। मैं उन गोपियोंकी आत्मा हूँ और वे मेरी हैं।' उद्धवने ब्रजमें आकर जब प्रेममयी गोपियोंकी दशा देखी, उन्हें सब ओर, बाहर-भीतर श्रीकृष्णके दर्शन करते पाया और जब उनके मुखसे सुना— [१] नाहिन रह्यो हियमहँ ठौर। नंदनंदन अछत कैसे आनिये उर और॥

चलत चितवत दिवस जागत, सुपन सोवत रात। हृदयते वह स्याम मूरति छिन न इत उत जात॥ कहत कथा अनेक ऊधौ! लोक-लाज दिखात। कहा करौं तन प्रेमपूरन, घट न सिंधु समात॥ स्याम गात सरोज आनन, ललित गति मृदु हास। 'सूर' ऐसे रूप कारन मरत लोचन प्यास॥ [२] ऊधौ! जोग जोग हम नाहीं। अबला ग्यान सार कहा जानें, कैसे ध्यान धराहीं॥ ते ये मूँदन नैन कहत हौ, हरि मूरति जिन माहीं। ऐसी कथा कपटकी मधुकर हमते सुनी न जाहीं॥ स्त्रवन चीर अरु जटा बँधावहु, ये दुख कौन समाहीं। चंदन तजि अँग भसम बतावत, बिरह अनल अति दाहीं॥ जोगी भरमत जेहि लगि भूले, सो तो है हम पाहीं। 'सूरदास' सो न्यारो न पल छिन, ज्यों घटते परिछाहीं॥ गोपियोंने कहा—'उद्धवजी! योग उन्हें जाकर सिखाओ, जहाँ श्यामसुन्दरका वियोग हो। यहाँ तो देखो, सदा ही संयोग है; हमारा प्यारा श्याम सदा-सर्वदा हमारे साथ ही रहता है।' तब उद्धवकी आँखें खुलीं, वे गोपियोंके शुद्ध प्रेमके प्रबल प्रवाहमें बह गये— सुनि गोपीके बैन, नेम ऊधौके भूले। गावत गुन गोपाल फिरत कुंजनमें फूले॥ खिन गोपिनके पग परै, धन्य सोइ है नेम। धाइ धाइ द्रुम भेंटही, ऊधौ छाके प्रेम॥ उन्होंने भक्तिप्रणत चित्तसे कहा—

४६ प्रेम-दर्शन एताः परं तनुभृतो भुवि गोपवध्वो गोविन्द एव निखिलात्मनि रूढभावाः। वाञ्छन्ति यद् भवभियो मुनयो वयं च किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकथारसस्य॥ नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः। रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ- लब्धाशिषां य उदगाद् व्रजवल्लवीनाम्॥ आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।५८, ६०-६१) 'जगत्में इन गोपललनाओंका ही देह धारण करना सफल है, क्योंकि इनका चित्त विश्वात्मा भगवान् श्रीगोविन्दमें लगा हुआ है, जिनकी भवभयसे भीत हुए मुनिगण तथा हमलोग सभी इच्छा करते हैं। सत्य है, जो श्रीअनन्तकी लीला-कथाओंके रसिक हैं, उन्हें ब्राह्मणोंके तीनों जन्मों (जन्म, यज्ञोपवीत और यज्ञदीक्षा)- की क्या आवश्यकता है? रासलीलाके समय भगवान् श्रीहरिके भुजदण्डको कण्ठहार बनाकर पूर्णकाम हुई इन व्रजबालाओंको श्रीहरिका जो प्रसाद प्राप्त हुआ है, वैसा निरन्तर हृदयमें रहनेवाली श्रीलक्ष्मीजी और कमलकी-सी कान्ति और सुगन्धिसे युक्त सुरसुन्दरियोंको भी नहीं मिला; फिर औरोंकी तो बात ही क्या है? इन महाभागा गोपियोंने कठिनतासे छोड़े जा सकनेवाले बन्धुओंको और आर्यधर्मको त्यागकर श्रुति जिसकी खोज करती है, उस मुकुन्दपदवीका अनुसरण किया है। अहो! क्या ही उत्तम

हो, यदि मैं आगामी जन्ममें इस वृन्दावनकी लता, ओषधि या झाड़ियोंमेंसे कोई होऊँ, जिनपर इन गोपियोंकी चरणधूलि पड़ती है।' मथुराकी कुलांगनाओंने गोपियोंकी दशाका वर्णन करके उनके जीवनको धन्य बताते हुए कहा है— या दोहनेऽवहने मथनोपलेप- प्रेङ्खेङ्खनार्भयरुदितोक्षणमार्जनादौ । गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयानाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।४४।१५) 'जो गोपियाँ गायोंका दूध दुहते समय, धान आदि कूटते समय, दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको झुलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, घरोंमें छिड़काव करते तथा झाडू देते समय प्रेमपूर्ण चित्तसे, आँखोंमें आँसू भरे, गद्गद वाणीसे श्रीकृष्णके गुणगान किया करती हैं, उन श्रीकृष्णमें चित्त निवेशित करनेवाली गोपरमणियोंको धन्य है!' इन गोपियोंकी जितनी महिमा गायी जाय, उतनी ही थोड़ी है। सर्वत्यागी व्रजवासी भक्तोंने तो गोपीपद-पंकजपराग ही बनना चाहा है। सत्य ही कहा है— गोपी प्रेमकी धुजा। जिन घनस्याम किये बस अपने उर धरि स्यामभुजा॥ महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव-सदृश महान् त्यागी महापुरुषोंने तो गोपियोंको प्रेममार्गका गुरु माना है। महान् भक्त श्रीनागरीदासजी कहते हैं— जयति ललितादि देवीय व्रज श्रुतिरिचा, कृष्ण प्रिय केलि आधीर अंगी। जुगल-रस-मत्त आनंदमय रूपनिधि, सकल सुख समयकी छाँह संगी॥

४८ प्रेम-दर्शन गौरमुख हिमकरनकी जु किरनावली, स्रवत मधु गान हिय पिय तरंगी। 'नागरी' सकल संकेत आकारिनी, गनत गुनगननि मति होति पंगी॥ एक व्रजभक्तने कहा है— ये हरिरस ओपी गोपी सब तियतें न्यारी। कमलनयन गोविंदचंदकी प्रानपियारी॥ निरमत्सर जे संत तिनहिं चूड़ामनि गोपी। निरमल प्रेम प्रबाह सकल मरजादा लोपी॥ जे ऐसे मरजाद मेटि मोहन गुन गावैं। क्यों नहिं परमानंद प्रेमभगती सुख पावैं॥ गोपियोंकी महिमा तभी कुछ समझमें आ सकती है, जब साधक विषयोंसे परम वैराग्य धारणकर प्रेमपथपर कुछ अग्रसर होता है। तत्रापि न माहात्म्यज्ञानविस्मृत्यपवादः ॥ २२॥ २२-इस अवस्थामें भी (गोपियोंमें) माहात्म्यज्ञानकी विस्मृतिका अपवाद नहीं। अर्थात् गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्णके प्रभाव, रहस्य और गुणोंको जानती थीं। कुछ लोगोंका कहना है कि प्रेममें माहात्म्यज्ञान नहीं रहता। माहात्म्यज्ञान होगा तो प्रेम नहीं रहेगा, परन्तु गोपियोंमें ऐसी बात नहीं थी। गोपियाँ श्रीकृष्णको साक्षात् पुरुषोत्तमभगवान् जानती हुई ही अपना प्रियतम समझती थीं। लौकिक प्रेम और भगवत्प्रेममें यही खास भेद है। भगवत्प्रेममें वस्तुतः ऐसा ही होता है। जो लोग कहते हैं कि गोपियाँ श्रीकृष्णको भगवान् नहीं जानती थीं, वे श्रीमद्भागवतके नीचे लिखे श्लोकोंका मनन करें— मैवं विभोऽर्हति भवान् गदितुं नृशंसं संत्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम्।

प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ४९ भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान् देवो यथाऽऽदिपुरुषो भजते मुमुक्षून्॥ यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरंग स्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम्। अस्त्वेवमेतदुपदेशपदे त्वयीशे प्रेष्ठो भवांस्तनुभृतां किल बन्धुरात्मा॥ यर्ह्यम्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य। अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमंग स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः॥ श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास- स्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः॥ (१०।२९।३१-३२, ३६-३७) व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता। (१०।२९।४१) न खलु गोपिकानन्दनो भवा- नखिलदेहिनामन्तरात्मदृक् । विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले॥ (१०।३१।४) 'हे विभो! आप ऐसे कठोर शब्द (वापस जानेकी बात) न कहिये। हमने अन्य सम्पूर्ण विषयोंको छोड़कर एकमात्र आपके ही चरणकमलोंका आश्रय लिया है। हे स्वच्छन्द! जिस प्रकार

५० प्रेम-दर्शन आदिपुरुष श्रीनारायण मुमुक्षुओंको भजते हैं, (उनके इच्छानुसार उन्हें स्वीकार करते हैं) उसी प्रकार आप हमें अंगीकार कीजिये, त्यागिये नहीं। हे हरि! आप धर्मको जाननेवाले हैं (फिर आप कैसे कहते हैं कि तुमलोग लौट जाओ, आपकी शरण आनेपर भी क्या कोई कभी वापस लौटता है)। आपने जो कहा कि पति, पुत्र और बन्धु-बान्धवोंकी सेवा करना ही स्त्रियोंका परम धर्म है, सो यह उपदेश उपदेशके स्थान आप ईश्वरके विषयमें ही रहे; क्योंकि समस्त देहधारियोंके प्रियतम बन्धु और आत्मा तो आप ही हैं। हे कमललोचन! जिस समय श्रीलक्ष्मीजीको (श्रीविष्णुरूपमें) कभी-कभी आनन्दित करनेवाले आपके चरण- कमलोंको हमने स्पर्श किया था और वनवासी तपस्वियोंके प्रिय आपने हमें आनन्दित किया था, तभीसे हमारे लिये अन्यत्र कहीं ठहरना असम्भव हो गया है। जिनकी कृपादृष्टि पानेके लिये देवगण अत्यन्त प्रयास करते हैं, वे लक्ष्मीजी बिना किसी प्रतिद्वन्द्वीके आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी तुलसीजीके सहित अन्य भक्तोंसे सेवित आपकी चरणरजकी इच्छा करती हैं, हम भी निस्सन्देह आपकी उसी चरणरजकी ही शरणमें आयी हैं। क्योंकि देवताओंकी रक्षा करनेवाले आप आदिपुरुष परमात्मा ही व्रजमण्डलका भय और दुःख दूर करनेके लिये प्रकट होकर अवतीर्ण हुए हैं। यह निश्चय है कि आप केवल यशोदाके ही पुत्र नहीं हैं, वरं समस्त देहधारियोंके अन्तरात्माके साक्षी हैं। हे सखे! ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे ही आपने सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करनेके लिये यदुकुलमें अवतार लिया है।' ऐसे अनेकों प्रमाणोंसे तथा युक्तियोंसे यह सर्वथा सिद्ध है कि गोपियोंने श्रीकृष्णको साक्षात् सच्चिदानन्दघन भगवान् समझकर ही उन्हें आत्मसमर्पण किया था।