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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ
५३४* संक्षिप्त नारदपुराण *

वाराहपुराणका लक्षण तथा उसके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य

**श्रीब्रह्माजी कहते हैं—**वत्स! सुनो, अब मैं वाराहपुराणका वर्णन करता हूँ। यह दो भागोंसे युक्त है और सनातन भगवान् विष्णुके माहात्म्यका सूचक है। पूर्वकालमें मेरे द्वारा निर्मित जो मानव-कल्पका प्रसङ्ग है, उसीको विद्वानोंमें श्रेष्ठ साक्षात् नारायणस्वरूप वेदव्यासने भूतलपर इस पुराणमें लिपिबद्ध किया है। वाराहपुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार है। इसमें सबसे पहले पृथ्वी और वाराहभगवान्‌का शुभ संवाद है। तदनन्तर आदि सत्ययुगके वृत्तान्तमें रैभ्यका चरित्र है। फिर दुर्जयके चरित्र और श्राद्धकल्पका वर्णन है। तत्पश्चात् महातपाका आख्यान, गौरीकी उत्पत्ति, विनायक, नागगण, सेनानी (कार्तिकेय), आदित्यगण, देवी, धनद तथा वृषका आख्यान है। उसके बाद सत्यतपाके व्रतकी कथा दी गयी है। तदनन्तर अगस्त्यगीता तथा रुद्रगीता कही गयी है। महिषासुरके विध्वंसमें ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—तीनोंकी शक्तियोंका माहात्म्य प्रकट किया गया है। तत्पश्चात् पर्वाध्याय, श्वेतोपाख्यान, गोप्रदानिक इत्यादि सत्ययुगका वृत्तान्त मैंने प्रथम भागमें दिखाया है। फिर भगवद्धर्ममें व्रत और तीर्थोंकी कथाएँ हैं। बत्तीस अपराधोंका शारीरिक प्रायश्चित्त बताया गया है। प्रायः सभी तीर्थोंके पृथक्-पृथक् माहात्म्यका वर्णन है। मथुराकी महिमा विशेषरूपसे दी गयी है। उसके बाद श्राद्ध आदिकी विधि है। तदनन्तर ऋषिपुत्रके प्रसङ्गसे यमलोकका वर्णन, कर्मविपाक एवं विष्णुव्रतका निरूपण है। गोकर्णके पापनाशक माहात्म्यका भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार वाराहपुराणका यह पूर्वभाग कहा गया है। उत्तर भागमें पुलस्त्य और पुरुराजके संवादमें विस्तारके साथ सब तीर्थोंके माहात्म्यका पृथक्-पृथक् वर्णन है। फिर सम्पूर्ण धर्मोंकी व्याख्या और पुष्कर नामक पुण्य-पर्वका भी वर्णन है। इस प्रकार मैंने तुम्हें पापनाशक वाराहपुराणका परिचय दिया है। यह पढ़ने और सुननेवालोंके मनमें भगवद्भक्ति बढ़ानेवाला है। जो मनुष्य इस पुराणको लिखकर और सोनेकी गरुड़-प्रतिमा बनवाकर तिलधेनुके साथ चैत्रकी पूर्णिमाके दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको दान देता है, वह देवताओं तथा महर्षियोंसे वन्दित होकर भगवान् विष्णुका धाम प्राप्त कर लेता है। जो वाराहपुराणकी इस अनुक्रमणिकाका श्रवण या पाठ करता है, वह भी भगवान् विष्णुके चरणोंमें संसार-बन्धनका नाश करनेवाली भक्ति प्राप्त कर लेता है।


पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५३५

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स्कन्दपुराणकी विषयानुक्रमणिका, इस पुराणके पाठ, श्रवण एवं दानका माहात्म्य

श्रीब्रह्माजी कहते हैं—वत्स ! सुनो, अब मैं स्कन्दपुराणका वर्णन करता हूँ, जिसके पद-पदमें साक्षात् महादेवजी स्थित हैं। मैंने शतकोटि पुराणमें जो शिवकी महिमाका वर्णन किया है, उसके सारभूत अर्थका व्यासजीने स्कन्दपुराणमें वर्णन किया है। उसमें सात खण्ड किये गये हैं। सब पापोंका नाश करनेवाला स्कन्दपुराण इक्यासी हजार श्लोकोंसे युक्त है। जो इसका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह साक्षात् भगवान् शिव ही है। इसमें स्कन्दके द्वारा उन शैव धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, जो तत्पुरुष कल्पमें प्रचलित थे। वे सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं। इसके पहले खण्डका नाम 'माहेश्वरखण्ड' है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। इसमें बारह हजारसे कुछ कम श्लोक हैं। यह परम पवित्र तथा विशाल कथाओंसे परिपूर्ण है। इसमें सैकड़ों उत्तम चरित्र हैं तथा यह खण्ड स्कन्दस्वामीके माहात्म्यका सूचक है। माहेश्वरखण्डके भीतर केदारमाहात्म्यमें पुराणका आरम्भ हुआ है। इसमें पहले दक्षयज्ञकी कथा है। इसके बाद शिवलिङ्ग-पूजनका फल बताया गया है। इसके बाद समुद्र-मन्थनकी कथा और देवराज इन्द्रके चरित्रका वर्णन है। फिर पार्वतीका उपाख्यान और उनके विवाहका प्रसङ्ग है। तत्पश्चात् कुमारस्कन्दकी उत्पत्ति और तारकासुरके साथ उनके युद्धका वर्णन है। फिर पाशुपतका उपाख्यान और चण्डकी कथा है। फिर दूतकी नियुक्तिका कथन और नारदजीके साथ समागमका वृत्तान्त है। उसके बाद कुमार-माहात्म्यके प्रसङ्गमें पञ्चतीर्थकी कथा है। धर्मवर्मा राजाकी कथा तथा नदियों और समुद्रका वर्णन है। तदनन्तर इन्द्रद्युम्न और नाड़ीजङ्घकी कथा है। फिर महीनदीके प्रादुर्भाव और दमनककी कथा है। तत्पश्चात् मही-सागर-संगम और कुमारेशका वृत्तान्त है। इसके बाद नाना प्रकारके उपाख्यानोंसहित तारकयुद्ध और तारकासुरके वधका वर्णन है। फिर पञ्चलिङ्ग-स्थापनकी कथा आयी है। तदनन्तर द्वीपोंका पुण्यमय वर्णन, ऊपरके लोकोंकी स्थिति, ब्रह्माण्डकी स्थिति और उसका मान तथा वर्केरेशकी कथा है। महाकालका प्रादुर्भाव और उसकी परम अद्भुत कथा है। फिर वासुदेवका माहात्म्य और कोटितीर्थका वर्णन है। तदनन्तर गुप्तक्षेत्रमें नाना तीर्थोंका आख्यान कहा गया है। पाण्डवोंकी पुण्यमयी कथा और बर्बरीककी सहायतासे महाविद्याके साधनका प्रसङ्ग है। तत्पश्चात् तीर्थयात्राकी समाप्ति है। तदनन्तर अरुणाचलका माहात्म्य तथा सनक और ब्रह्माजीका संवाद है। गौरीकी तपस्याका वर्णन तथा वहाँके भिन्न-भिन्न तीर्थोंका वर्णन है। महिषासुरकी कथा और उसके वधका परम अद्भुत प्रसङ्ग कहा गया है। द्रोणाचल पर्वतपर भगवान् शिवका नित्य निवास बताया गया है। इस प्रकार स्कन्दपुराणमें यह अद्भुत 'माहेश्वरखण्ड' कहा गया है।

दूसरा 'वैष्णवखण्ड' है। अब उसके आख्यानोंका मुझसे श्रवण करो। पहले भूमि-वराह-संवादका वर्णन है, जिसमें वेङ्कटाचलका पापनाशक माहात्म्य बताया गया है। फिर कमलाकी पवित्र कथा और श्रीनिवासकी स्थितिका वर्णन है। तदनन्तर कुम्हारकी कथा तथा सुवर्णमुखरी नदीके माहात्म्यका वर्णन है। फिर अनेक उपाख्यानोंसे युक्त भरद्वाजकी अद्भुत कथा है। इसके बाद मतङ्ग और अञ्जनके पापनाशक संवादका वर्णन है। फिर उत्कलप्रदेशके पुरुषोत्तमक्षेत्रका माहात्म्य कहा गया है। तत्पश्चात् मार्कण्डेयजीकी कथा, राजा अम्बरीषका वृत्तान्त, इन्द्रद्युम्नका आख्यान और विद्यापतिकी शुभ कथाका उल्लेख है। ब्रह्मन् ! इसके बाद जैमिनि और नारदका आख्यान है,

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कार्तिकमासमें प्रत्येक दिनके कृत्यका वर्णन है। अन्तमें भीष्मपञ्चकव्रतका प्रतिपादन किया गया है, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है।

तत्पश्चात् मार्गशीर्षके माहात्म्यमें स्नानकी विधि बतायी गयी है। फिर पुण्ड्रादि-कीर्तन और माला-धारणका पुण्य कहा गया है। भगवान्‌को पञ्चामृतसे स्नान करानेका तथा घण्टा बजाने आदिका पुण्य फल बताया गया है। नाना प्रकारके फूलोंसे भगवत्पूजनका फल और तुलसीदलका माहात्म्य कहा गया है। भगवान्‌को नैवेद्य लगानेकी महिमा, एकादशीके दिन कीर्तन, अखण्ड एकादशी-व्रत रहनेका पुण्य और एकादशीकी रातमें जागरण करनेका फल बताया गया है। इसके बाद मत्स्योत्सवका विधान और नाममाहात्म्यका कीर्तन है। भगवान्‌के ध्यान आदिका पुण्य तथा मथुराका माहात्म्य बताया गया है। मथुरातीर्थका उत्तम माहात्म्य अलग कहा गया है और वहाँके बारह वनोंकी महिमाका वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् इस पुराणमें श्रीमद्भागवतके उत्तम माहात्म्यका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रसङ्गमें वज्रनाभ और शाण्डिल्यके संवादका उल्लेख किया गया है, जो व्रजकी आन्तरिक लीलाओंका प्रकाशक है। तदनन्तर माघमासमें स्नान, दान और जप करनेका माहात्म्य बताया गया है, जो नाना प्रकारके आख्यानोंसे युक्त है। माघ-माहात्म्यका दस अध्यायोंमें प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् वैशाख-माहात्म्यमें शय्यादान आदिका फल कहा गया है। फिर जलदानकी विधि, कामोपाख्यान, शुकदेवचरित, व्याधकी अद्भुत कथा और अक्षयतृतीया आदिके पुण्यका विशेषरूपसे वर्णन है। इसके बाद अयोध्या-माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमें चक्रतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, ऋणमोचनतीर्थ, पापमोचनतीर्थ, सहस्रधारातीर्थ, स्वर्गद्वारतीर्थ, चन्द्रहरितीर्थ, धर्महरितीर्थ, स्वर्णवृष्टितीर्थकी कथा और तिलोदा-सरयू-संगमका वर्णन है। तदनन्तर सीताकुण्ड, गुप्तहरितीर्थ, सरयू-घाघरा-संगम,

फिर नीलकण्ठ और नृसिंहका वर्णन है। तदनन्तर अश्वमेध यज्ञकी कथा और राजाका ब्रह्मलोकमें गमन कहा गया है। तत्पश्चात् रथयात्रा-विधि और जप तथा स्नानकी विधि कही गयी है। फिर दक्षिणामूर्तिका उपाख्यान और गुण्डिचाकी कथा है। रथ-रक्षाकी विधि और भगवान्‌के शयनोत्सवका वर्णन है। इसके बाद राजा श्वेतका उपाख्यान कहा गया है। फिर पृथु-उत्सवका निरूपण है। भगवान्‌के दोलोत्सव तथा सांवत्सरिक-व्रतका वर्णन है। तदनन्तर उद्दालकके नियोगसे भगवान् विष्णुकी निष्काम पूजाका प्रतिपादन किया गया है। फिर मोक्ष-साधन बताकर नाना प्रकारके योगोंका निरूपण किया गया है। तत्पश्चात् दशावतारकी कथा और स्नान आदिका वर्णन है। इसके बाद बदरिकाश्रम-तीर्थका पापनाशक माहात्म्य बताया गया है। उस प्रसङ्गमें अग्नि आदि तीर्थों और गरुड़-शिलाकी महिमा है। वहाँ भगवान्‌के निवासका कारण बताया गया है। फिर कपालमोचन-तीर्थ, पञ्चधारा-तीर्थ और मेरुसंस्थानकी कथा है। तदनन्तर कार्तिकमासका माहात्म्य प्रारम्भ होता है। उसमें मदनालसके माहात्म्यका वर्णन है। धूम्रकेशका उपाख्यान और

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गोप्रचारतीर्थ, क्षीरोदकतीर्थ और बृहस्पतिकुण्ड आदि पाँच तीर्थोंकी महिमाका प्रतिपादन किया गया है। तत्पश्चात् घोषार्क आदि तेरह तीर्थोंका वर्णन है। फिर गयाकूपके सर्वपापनाशक माहात्म्यका कथन है। तदनन्तर माण्डव्याश्रम आदि, अजित आदि तथा मानस आदि तीर्थोंका वर्णन किया गया है। इस प्रकार यह दूसरा 'वैष्णवखण्ड' कहा गया है।

मरीचे ! इसके बाद परम पुण्यदायक 'ब्रह्म-खण्ड' का वर्णन सुनो, जिसमें पहले सेतुमाहात्म्य प्रारम्भ करके वहाँके स्नान और दर्शनका फल बताया गया है। फिर गालवकी तपस्या तथा राक्षसकी कथा है। तत्पश्चात् देवीपत्तनमें चक्रतीर्थ आदिकी महिमा, वेतालतीर्थका माहात्म्य और पापनाश आदिका वर्णन है। मङ्गल आदि तीर्थोंका माहात्म्य, ब्रह्मकुण्ड आदिका वर्णन, हनुमत्कुण्डकी महिमा तथा अगस्त्यतीर्थके फलका कथन है। रामतीर्थ आदिका वर्णन, लक्ष्मीतीर्थका निरूपण, शङ्ख आदि तीर्थोंकी महिमा तथा साध्यामृत आदि तीर्थोंके प्रभावका वर्णन है। इसके बाद धनुषकोटि आदिका माहात्म्य, क्षीरकुण्ड आदिकी महिमा तथा गायत्री आदि तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन है। फिर रामेश्वरकी महिमा, तत्त्वज्ञानका उपदेश तथा सेतु-यात्रा-विधिका वर्णन है, जो मनुष्योंको मोक्ष देनेवाला है। तत्पश्चात् धर्मारण्यका उत्तम माहात्म्य बताया गया है, जिसमें भगवान् शिवने स्कन्दको तत्त्वका उपदेश किया है। फिर धर्मारण्यका प्रादुर्भाव, उसके पुण्यका वर्णन, कर्मसिद्धिका उपाख्यान तथा ऋषिवंशका निरूपण है। तदनन्तर वहाँ अप्सरा-सम्बन्धी मुख्य तीर्थोंका माहात्म्य कहा गया है। इसके बाद वर्णाश्रम-धर्मके तत्त्वका निरूपण किया गया है। तदनन्तर देवस्थान-विभाग और बकुलादित्यकी शुभ कथाका वर्णन है। वहाँ छत्रानन्दा, शान्ता, श्रीमाता, मातङ्गिनी और पुण्यदा—ये पाँच देवियाँ सदा स्थित बतायी गयी हैं। इसके बाद वहाँ इन्द्रेश्वर आदिकी महिमा तथा द्वारका आदिका निरूपण है। लोहासुरकी कथा, गङ्गाकूपका वर्णन, श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र तथा सत्यमन्दिरका वर्णन है। फिर जीर्णोद्धारकी महिमाका कथन, आसन-दान, जातिभेद-वर्णन तथा स्मृति-धर्मका निरूपण है। तत्पश्चात् अनेक उपाख्यानोंसे युक्त वैष्णव-धर्मोंका वर्णन है। तदनन्तर पुण्यमय चातुर्मास्यका माहात्म्य प्रारम्भ करके उसमें पालन करने योग्य सब धर्मोंका निरूपण किया गया है। फिर दानकी प्रशंसा, व्रतकी महिमा, तपस्या और पूजाका माहात्म्य तथा सच्छूद्रका कथन है। तदनन्तर प्रकृतियोंके भेदका वर्णन, शालग्रामके तत्त्वका निरूपण, तारकासुरके वधका उपाय, गरुड़-पूजनकी महिमा, विष्णुका शाप, वृक्षभावकी प्राप्ति, पार्वतीका अनुनय, भगवान् शिवका ताण्डवनृत्य, राम-नामकी महिमाका निरूपण, शिव-लिङ्गपतनकी कथा, पैजवन शूद्रकी कथा, पार्वतीजीका जन्म और चरित्र, तारकासुरका अद्भुत वध, प्रणवके ऐश्वर्यका कथन, तारकासुरके चरित्रका पुनर्वर्णन, दक्ष-यज्ञकी समाप्ति, द्वादशाक्षरमन्त्रका निरूपण, ज्ञानयोगका वर्णन, द्वादश सूर्योंकी महिमा तथा चातुर्मास्य-माहात्म्यके श्रवण आदिके पुण्यका वर्णन किया गया है, जो मनुष्योंके लिये कल्याणदायक है। तदनन्तर ब्राह्मोत्तर भागमें भगवान् शिवकी अद्भुत महिमा, पञ्चाक्षर-मन्त्रके माहात्म्य तथा गोकर्णकी महिमाका वर्णन है। तत्पश्चात् शिवरात्रिकी महिमा, प्रदोषव्रतका वर्णन तथा सोमवार-व्रतकी महिमा एवं सीमन्तिनीकी कथा है। फिर भद्रायुकी उत्पत्तिका वर्णन, सदाचार-निरूपण, शिवकवचका उपदेश, भद्रायुके विवाहका वर्णन, भद्रायुकी महिमा, भस्म-माहात्म्य-वर्णन, शबरका उपाख्यान, उमा-महेश्वर-व्रतकी महिमा, रुद्राक्षका माहात्म्य, रुद्राध्यायके पुण्य तथा ब्रह्मखण्डके श्रवण आदिकी पुण्यमयी महिमाका वर्णन है। इस प्रकार यह

'ब्रह्मखण्ड' बताया गया है।

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'ब्रह्मखण्ड' बताया गया है।

इसके बाद चौथा परम उत्तम 'काशीखण्ड' है, जिसमें विन्ध्यपर्वत और नारदजीके संवादका वर्णन है। फिर सत्यलोकका प्रभाव, अगस्त्यके आश्रममें देवताओंका आगमन, पतिव्रताच्ररित्र तथा तीर्थयात्राकी प्रशंसा है। तदनन्तर सप्तपुरीका वर्णन, संयमिनीका निरूपण, शिवशर्माको सूर्य, इन्द्र और अग्निके लोककी प्राप्तिका उल्लेख है। अग्निका प्रादुर्भाव, निर्ऋति तथा वरुणकी उत्पत्ति, गन्धवती, अलकापुरी और ईशानपुरीके उद्भवका वर्णन, चन्द्र, सूर्य, बुध, मङ्गल तथा बृहस्पतिके लोक, ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, ध्रुवलोक और तपोलोकका वर्णन है। तत्पश्चात् ध्रुवलोककी पुण्यमयी कथा, सत्यलोकका निरीक्षण, स्कन्द-अगस्त्य-संवाद, मणिकर्णिकाकी उत्पत्ति, गङ्गाजीका प्राकट्य, गङ्गासहस्रनाम, काशीपुरीकी प्रशंसा, भैरवका आविर्भाव, दण्डपाणि तथा ज्ञानवापीका उद्भव, कलावतीकी कथा, सदाचारनिरूपण, ब्रह्मचारीका आख्यान, स्त्रीके लक्षण, कर्तव्याकर्तव्यका निर्देश, अविमुक्तेश्वरका वर्णन, गृहस्थ योगीके धर्म, कालज्ञान, दिवोदासकी पुण्यमयी कथा, काशीका वर्णन, भूतलपर मायागणपतिका प्रादुर्भाव, विष्णुमायाका प्रपञ्च, दिवोदासका मोक्ष, पञ्चनदतीर्थकी उत्पत्ति, बिन्दुमाधवका प्राकट्य, तदनन्तर काशीका वैष्णवतीर्थ कहलाना; फिर शूलधारी शङ्करका काशीमें आगमन, जैगीषव्यके साथ संवाद, महेश्वरका ज्येष्ठेश्वर नाम होना, क्षेत्राख्यान, कन्दुकेश्वर और व्याघ्रेश्वरका प्रादुर्भाव, शैलेश्वर, रत्नेश्वर तथा कृत्तिवासेश्वरका प्राकट्य, देवताओंका अधिष्ठान, दुर्गासुरका पराक्रम, दुर्गाजीकी विजय, ॐकारेश्वरका वर्णन, पुनः ॐकारका माहात्म्य, त्रिलोचनका प्रादुर्भाव, केदारेश्वरका आख्यान, धर्मेश्वरकी कथा, विष्णुभुजाका प्राकट्य, वीरेश्वरका आख्यान, गङ्गा-माहात्म्यकीर्तन, विश्वकर्मेश्वरकी महिमा, दक्षयज्ञोद्भव, सतीश और अमृतेश आदिका माहात्म्य, पराशरनन्दन व्यासजीकी भुजाओंका स्तम्भन, क्षेत्रके तीर्थोंका समुदाय, मुक्तिमण्डपकी कथा, विश्वनाथजीका वैभव, तदनन्तर काशीकी यात्रा और परिक्रमाका वर्णन—ये 'काशीखण्ड'के विषय हैं।

तदनन्तर पाँचवें 'अवन्तीखण्ड'का वर्णन सुनो। इसमें महाकालवनका आख्यान, ब्रह्माजीके मस्तकका छेदन, प्रायश्चित्तविधि, अग्निकी उत्पत्ति, देवताओंका आगमन, देवदीक्षा, नाना प्रकारके पातकोंका नाश करनेवाला शिवस्तोत्र, कपालमोचनकी कथा, महाकालवनकी स्थिति, कलकलेश्वरका सर्वपापनाशक तीर्थ, अप्सराकुण्ड, पुण्यदायक रुद्रसरोवर, कुटुम्बेश, विद्याधरेश्वर तथा मर्कटेश्वर तीर्थका वर्णन है। तत्पश्चात् स्वर्गद्वार, चतुःसिन्धुतीर्थ, शङ्करवापिका, शङ्करादित्य, पापनाशक गन्धवतीतीर्थ, दशाश्वमेधिकतीर्थ, अनशंतीर्थ, हरिसिद्धिप्रदतीर्थ, पिशाचादियात्रा, हनुमदीश्वर, कवचेश्वर, महाकालेश्वरयात्रा, वल्मीकेश्वरतीर्थ, शुक्रेश्वर और नक्षत्रेश्वरतीर्थका उपाख्यान, कुशस्थलीकी परिक्रमा, अक्रूरतीर्थ, एकपादतीर्थ, चन्द्रार्कवैभवतीर्थ, करभेशतीर्थ, लड्डुकेश आदि तीर्थ, मार्कण्डेश्वरतीर्थ, यज्ञवापीतीर्थ, सोमेश्वरतीर्थ, नरकान्तकतीर्थ, केदारेश्वर, रामेश्वर, सौभाग्येश्वर तथा नरादित्यतीर्थ, केशवादित्य, शक्तिभेदतीर्थ, स्वर्णसारमुखतीर्थ, ॐकारेश्वर आदि तीर्थ, अन्धकासुरके द्वारा स्तुति-कीर्तन, कालवनमें शिवलिङ्गोंकी संख्या तथा स्वर्णशृङ्गेश्वरतीर्थका वर्णन है। फिर कुशस्थली, अवन्ती एवं उज्जयिनीपुरीके पद्मावती, कुमुद्वती, अमरावती, विशाला तथा प्रतिकल्प—इन नामोंका उल्लेख है। इनका उच्चारण ज्वरकी शान्ति करनेवाला है। तत्पश्चात् शिप्रामें स्नान आदिका फल, नागोंद्वारा की हुई भगवान् शिवकी स्तुति, हिरण्याक्षवधकी कथा, सुन्दरकुण्डकतीर्थ, नीलगङ्गा, पुष्करतीर्थ, विन्ध्यवासनतीर्थ, पुरुषोत्तमतीर्थ, अघनाशनतीर्थ, गोमतीतीर्थ, वामनकुण्ड, विष्णुसहस्रनाम, वीरेश्वर सरोवर, कालभैरवतीर्थ, नागपञ्चमीकी महिमा,

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५३९ ---|--- नृसिंहजयन्ती, कुटुम्बेश्वरयात्रा, देवसाधककीर्तन, कर्कराज नामक तीर्थ, विघ्नेशादितीर्थ और सुरोहनतीर्थका वर्णन किया गया है। रुद्रकुण्ड आदिमें अनेक तीर्थोंका निरूपण किया गया है। तदनन्तर आठ तीर्थोंकी पुण्यमयी यात्राका वर्णन है। इसके बाद नर्मदानदीका माहात्म्य बतलाया गया है, जिसमें धर्मपुत्र युधिष्ठिरके वैराग्य तथा मार्कण्डेयजीके साथ उनके समागमका वर्णन है।<br><br>तदनन्तर पहलेके प्रलयकालीन अनुभवका वर्णन, अमृत-कीर्तन, कल्प-कल्पमें नर्मदाके पृथक्-पृथक् नामोंका वर्णन, नर्मदाजीका आर्षस्तोत्र, कालरात्रिकी कथा, महादेवजीकी स्तुति, पृथक् कल्पकी अद्भुत कथा, विशल्याकी कथा, जालेश्वरकी कथा, गौरीव्रतका वर्णन, त्रिपुरदाहकी कथा, देहपातविधि, कावेरीसङ्गम, दारुतीर्थ, ब्रह्मावर्त, ईश्वरकथा, अग्नितीर्थ, सूर्यतीर्थ, मेघनादादितीर्थ, दारुकतीर्थ, देवतीर्थ, नर्मदेशतीर्थ, कपिलातीर्थ, करञ्जकतीर्थ, कुण्डलेशतीर्थ, पिप्पलादतीर्थ, विमलेश्वरतीर्थ, शूलभेदनतीर्थ, शचीहरणकी कथा, अभ्रकका वध, शूलभेदोद्भवतीर्थ, पृथक्-पृथक् दानधर्म, दीर्घतपाकी कथा, ऋष्यशृङ्गका उपाख्यान, चित्रसेनकी पुण्यमयी कथा, काशिराजका मोक्ष, देवशिलाकी कथा, शबरीतीर्थ, पवित्र व्याधोपाख्यान, पुष्करिणीतीर्थ, अर्कतीर्थ, आदित्येश्वरतीर्थ, शक्रतीर्थ, करोटिकतीर्थ, कुमारेश्वरतीर्थ, अगस्त्येश्वरतीर्थ, आनन्देश्वरतीर्थ, मातृतीर्थ, लोकेश्वर, धनेश्वर, मङ्गलेश्वर तथा कामजतीर्थ, नागेश्वरतीर्थ, गोपारीतीर्थ, गौतमतीर्थ, शङ्खचूडतीर्थ, नारदेश्वरतीर्थ, नन्दिकेश्वरतीर्थ, वरणेश्वरतीर्थ, दधिस्कन्दादितीर्थ, हनुमदीश्वरतीर्थ, रामेश्वर आदि तीर्थ, सोमेश्वर, पिङ्गलेश्वर, ऋणमोक्षेश्वर, कपिलेश्वर, पूतिकेश्वर, जलेशय, चण्डार्क, यमतीर्थ, काल्होडीश्वर, नन्दिकेश्वर, नारायणेश्वर, कोटीश्वर, व्यासतीर्थ, प्रभासतीर्थ, नागेश्वरतीर्थ, संकर्षणतीर्थ, प्रश्रयेश्वरतीर्थ, पुण्यमय एरण्डी-सङ्गमतीर्थ, सुवर्णशिलतीर्थ, करञ्जतीर्थ, | कामरतीर्थ, भाण्डीरतीर्थ, रोहिणीभवतीर्थ, चक्रतीर्थ, धौतपापतीर्थ, आङ्गिरसतीर्थ, कोटितीर्थ, अन्योन्यतीर्थ, अङ्गारतीर्थ, त्रिलोचनतीर्थ, इन्द्रेशतीर्थ, कम्बुकेशतीर्थ, सोमेशतीर्थ, कोहलेशतीर्थ, नर्मदातीर्थ, अर्कतीर्थ, आग्नेयतीर्थ, उत्तम भार्गवेश्वरतीर्थ, ब्राह्मतीर्थ, दैवतीर्थ, मार्गेशतीर्थ, आदिवाहेश्वर, रामेश्वरतीर्थ, सिद्धेश्वरतीर्थ, अहल्यातीर्थ, कंकटेश्वरतीर्थ, शक्रतीर्थ, सोमतीर्थ, नादेशतीर्थ, कोयेशतीर्थ, रुक्मिणीसम्भवतीर्थ, योजनेशतीर्थ, वराहेशतीर्थ, द्वादशीतीर्थ, शिवतीर्थ, सिद्धेश्वरतीर्थ, मङ्गलेश्वरतीर्थ, लिङ्गवाराहतीर्थ, कुण्डेशतीर्थ, श्वेतवाराहतीर्थ, भार्गवेशतीर्थ, रवीश्वरतीर्थ, शुक्ल आदि तीर्थ, हुङ्कारस्वामितीर्थ, सङ्गमेश्वरतीर्थ, नहुषेश्वरतीर्थ, मोक्षणतीर्थ, पञ्चगोपदतीर्थ, नागशावकतीर्थ, सिद्धेशतीर्थ, मार्कण्डेयतीर्थ, अक्रूरतीर्थ, कामोदतीर्थ, शूलारोपतीर्थ, माण्डव्यतीर्थ, गोपकेश्वरतीर्थ, कपिलेश्वरतीर्थ, पिङ्गलेश्वरतीर्थ, भूतेश्वरतीर्थ, गङ्गातीर्थ, गौतमतीर्थ, अश्वमेधतीर्थ, भृगुकच्छतीर्थ, पापनाशक केदारेशतीर्थ, कलकलेश (या कनखलेश) तीर्थ, जालेशतीर्थ, शालग्रामतीर्थ, वराहतीर्थ, चन्द्रप्रभाततीर्थ, आदित्यतीर्थ, श्रीपदतीर्थ, हंसतीर्थ, मूलस्थानतीर्थ, शूलेश्वरतीर्थ, उग्रतीर्थ, चित्रदैवकतीर्थ, शिखीश्वरतीर्थ, कोटितीर्थ, दशकन्यतीर्थ, सुवर्णतीर्थ, ऋणमोचनतीर्थ, भारभूतितीर्थ, पुङ्खमुण्डित तीर्थ, आमलेशतीर्थ, कपालेशतीर्थ, शृङ्गेरण्डीतीर्थ, कोटितीर्थ और लोटलेशतीर्थ आदिका वर्णन है। इसके बाद फलस्तुति कही गयी है। तदनन्तर कृमिजङ्गलमाहात्म्यके प्रसङ्गमें रोहिताश्वकी कथा, धुन्धुमारका उपाख्यान, उसके वधका उपाय, धुन्धु-वध, चित्रवहका उद्भव, उसकी महिमा, चण्डीशका प्रभाव, रतीश्वर, केदारेश्वर, लक्षतीर्थ, विष्णुपदी तीर्थ, मुखारतीर्थ, च्यवनान्त्यतीर्थ, ब्रह्मसरोवर, चक्रतीर्थ, ललितोपाख्यान, बहुगोमुखतीर्थ, रुद्रावर्ततीर्थ, मार्कण्डेयतीर्थ, पापनाशकर्तीर्थ, श्रवणेशतीर्थ, शुद्धपटतीर्थ, देवान्धुप्रेततीर्थ,

५४० * संक्षिप्त नारदपुराण *

जिह्वोदतीर्थका प्राकट्य, शिवोद्भेदतीर्थ और फल-श्रुति—इन विषयोंका वर्णन है। यह सब 'अवन्ती-खण्ड'का वर्णन किया गया है, जो श्रोताओंके पापका नाश करनेवाला है।

इसके अनन्तर 'नागरखण्ड'का परिचय दिया जाता है। इसमें लिङ्गोत्पत्तिका वर्णन, हरिश्चन्द्रकी शुभ कथा, विश्वामित्रका माहात्म्य, त्रिशंकुका स्वर्गलोकमें गमन, हाटकेश्वर-माहात्म्यके प्रसङ्गमें वृत्रासुरका वध, नागबिल, शङ्खतीर्थ, अचलेश्वरका वर्णन, चमत्कारपुरकी चमत्कारपूर्ण कथा, गयशीर्षतीर्थ, बालशतीर्थ, बालमण्डतीर्थ, मृगतीर्थ, विष्णुपद, गोकर्ण, युगरूप, समाश्रय तथा सिद्धेश्वरतीर्थ, नागसरोवर, सप्तर्षितीर्थ, अगस्त्यतीर्थ, भ्रूणगर्त, नलेश्वतीर्थ, भीष्मतीर्थ, वैडूरमरकततीर्थ, शर्मिष्ठातीर्थ, सोमनाथतीर्थ, दुर्गातीर्थ, आनर्तकेश्वरतीर्थ, जमदग्निवधकी कथा, परशुरामद्वारा क्षत्रियोंके संहारका कथानक, रामह्रद, नागपुरतीर्थ, षड्लिङ्कतीर्थ, यज्ञभूतीर्थ, मुण्डीरादित्यतीर्थ, त्रिकार्कतीर्थ, सतीपरिणयतीर्थ, रुद्रशीर्षतीर्थ, योगेशतीर्थ, बालखिल्यतीर्थ, गरुड़तीर्थ, लक्ष्मीजीका शाप, सप्तविंशतीर्थ, सोमप्रासादतीर्थ, अम्बावृद्धतीर्थ, अग्नितीर्थ, ब्रह्मकुण्ड, गोमुखतीर्थ, लोहयष्टितीर्थ, अजापालेश्वरीदेवी, शनैश्चरतीर्थ, राजवापी, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, कुशेश्वर, लवेश्वरलिङ्ग, सर्वोत्तमत्तम अड़सठ तीर्थोंके नाम, दमयन्तीपुत्र त्रिजातकी कथा, रेवती अम्बाकी स्थापना, भक्तिकातीर्थका आविर्भाव, क्षेमङ्करीदेवी, केदारक्षेत्रका प्रादुर्भाव, शुक्लतीर्थ, मुखारकतीर्थ, सत्यसन्ध्येश्वरका आख्यान, कर्णोत्पलाकी कथा, अटेश्वरतीर्थ, याज्ञवल्क्यतीर्थ, गौरीगणेशतीर्थ, वास्तुपदतीर्थका आख्यान, अजागृहादेवीकी कथा, सौभाग्यनन्दतीर्थ, शूलेश्वरलिङ्ग, धर्मराजकी कथा, मिष्टान्न देवेश्वरका आख्यान, तीन गणपतिका आविर्भाव, जावालचरित, मकरेशकी कथा, कालेश्वरी और अन्धकका आख्यान, अप्सरसकुण्ड, पुष्यादित्यतीर्थ, रोहिताश्वतीर्थ, नागर ब्राह्मणोंकी उत्पत्तिका कथन, भार्गवचरित, विश्वामित्रचरित, सारस्वततीर्थ, पिप्पलादतीर्थ, कंसारीश्वरतीर्थ, पिण्डकतीर्थ, ब्रह्माका यज्ञानुष्ठान, सावित्रीकी कथा, रैवतका आख्यान, भर्तृयज्ञका वृत्तान्त, मुख्य तीर्थोंका निरीक्षण, कुरुक्षेत्र, हाटकेश्वरक्षेत्र और प्रभासक्षेत्र—इन तीनों क्षेत्रोंका वर्णन, पुष्करारण्य, नैमिषारण्य तथा धर्मारण्य—इन तीन अरण्योंका वर्णन, वाराणसी, द्वारका तथा अवन्ती—इन तीन पुरियोंका वर्णन, वृन्दावन, खाण्डववन और अद्वैतवन—इन तीन वनोंका उल्लेख, कल्पग्राम, शालग्राम तथा नन्दिग्राम—इन तीन उत्तम ग्रामोंका प्रतिपादन, असीतीर्थ, शुक्लतीर्थ और पितृतीर्थ—इन तीन तीर्थोंका निरूपण, श्रीशैल, अर्बुदगिरि तथा रैवतगिरि—इन तीन पर्वतोंका वर्णन, गङ्गा, नर्मदा और सरस्वती—इन तीन नदियोंका नाम-उच्चारण, इनमेंसे एक-एकका कीर्तन साढ़े तीन करोड़ तीर्थोंका फल देनेवाला है—इत्यादि विषयोंका प्रतिपादन किया गया है। कूपिकातीर्थ, शङ्खतीर्थ, चामरतीर्थ और बालमण्डनतीर्थ—इन चारोंका उच्चारण, हाटकेश्वरक्षेत्रका फल देनेवाला है। इन सब तीर्थोंके वर्णनके पश्चात् साम्बादित्यकी महिमा, श्राद्धकल्पका निरूपण, युधिष्ठिर-भीष्म-संवाद, अन्धक (अन्धकारपूर्ण नरक), जलशायीका माहात्म्य, चातुर्मास्य-व्रत, अशून्यशयनव्रत, मङ्कणेशकी महिमा, शिवरात्रिका माहात्म्य, तुलापुरुषदान, पृथ्वीदान, बालकेश्वर, कपालमोचनेश्वर, पापपिण्ड, सासलिङ्ग, युगमान आदिका वर्णन, निम्बेश्वर और शाकम्भरीकी कथा, ग्यारह रुद्रोंके प्राकट्यका वर्णन, दानमाहात्म्य तथा द्वादशादित्यका कीर्तन—इन सब विषयोंका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार यह 'नागर-खण्ड' कहा गया ।

अब 'प्रभासखण्ड'का वर्णन किया जाता है, जिसमें सोमनाथ, विश्वनाथ, महान् पुण्यप्रद अर्कस्थल तथा सिद्धेश्वर आदिका आख्यान पृथक्-पृथक् कहा गया है। तत्पश्चात् अग्नितीर्थ, कपर्दीश्वर,

* पूर्वभाग- चतुर्थ पाद *५४१

उत्तम गतिदायक केदारेश्वर, भीमेश्वर, भैरवेश्वर, चण्डीश्वर, भास्करेश्वर, चन्द्रेश्वर, मङ्गलेश्वर, बुधेश्वर, बृहस्पतीश्वर, शुक्रेश्वर, शनैश्चरेश्वर, राहीश्वर, केत्वीश्वर आदि शिवविग्रहोंका वर्णन है। तत्पश्चात् सिद्धेश्वर आदि अन्य पाँच रुद्रोंकी स्थितिका वर्णन किया गया है। वरारोहा, अजापाला, मङ्गला, ललितेश्वरी, लक्ष्मीश्वर, बाडवेश्वर, उर्वीश्वर, कामेश्वर, गौरीश्वर, वरुणेश्वर, दुर्वासेश्वर, गणेश्वर, कुमारेश्वर, चण्डकल्प, शकुलीश्वर, कोटीश्वर तथा बालरूपधारी ब्रह्मा आदिकी उत्तम कथा है। तत्पश्चात् नरकेश्वर, संवर्तेश्वर, निधीश्वर, बलभद्रेश्वर, गङ्गा, गणपति, जाम्बवती नदी, पाण्डुकूप, शतमेध, लक्षमेध और कोटिमेधकी श्रेष्ठ कथा है। दुर्वासादित्य, घटस्थान, हिरण्यासङ्गम, नागरादित्य, श्रीकृष्ण, संकर्षण, समुद्र, कुमारी, क्षेत्रपाल, ब्रह्मेश्वर, पिङ्गलासङ्गेश्वर, शङ्करादित्य, घटेश्वर, ऋषितीर्थ, नन्दादित्य, त्रितकूप, सोमपान, पर्णादित्य और न्युङ्कुमतीकी भी अद्भुत कथाका उल्लेख है। तदनन्तर बाराहस्वामीका वृत्तान्त, छायालिङ्ग, गुल्फ, कनकनन्दा, कुन्ती और गङ्गेेशकी कथा है। फिर चमसोद्भेदेश्वर, विदुरेश्वर, त्रिलोकेश्वर, मङ्कणेश्वर, त्रैपुरेश्वर तथा षण्डतीर्थकी कथा है। फिर सूर्यप्राची, त्रीक्षण और उमानाथकी कथा है। पृथिव्युद्धार, शूलस्थल, च्यवनादित्य और च्यवनेश्वरका वृत्तान्त है। उसके बाद अजापालेश्वर, बालादित्य, कुबेरस्थल तथा ऋषितोयाकी पुण्यमयी कथा एवं शृगालेश्वरका माहात्म्यकीर्तन है। फिर नारदादित्यकी कथा, नारायणके स्वरूपका निरूपण, तप्तकुण्डकी महिमा तथा मूलचण्डीश्वरका वर्णन है। चतुर्मुख गणेश और कलम्बेश्वरकी कथा, गोपालस्वामी, बकुलस्वामी और मरुद्रणकी भी कथा है। तत्पश्चात् क्षेमादित्य, उन्नतविघ्नेश, तलस्वामी, कालमेध, रुक्मिणी, दुर्वासेश्वर, भद्रेश्वर, शङ्खावर्त, मोक्षतीर्थ, गोष्पदतीर्थ, अच्युतगृह, जालेश्वर, ॐकारेश्वर, चण्डीश्वर, आशापुरनिवासी विघ्नेश और कलाकुण्डकी अद्भुत कथा है। कपिलेश्वर और जरद्गव शिवकी भी विचित्र कथाका उल्लेख है। नलेश्वर, कर्कोटकेश्वर, हाटकेश्वर, नारदेश्वर, यन्त्रभूषा, दुर्गकूट और गणेशकी कथाका भी उल्लेख है। सुपर्णभैरवी और एलाभैरवी तथा भल्लतीर्थकी भी महिमा है। तत्पश्चात् कर्दमालतार्थ और गुप्त सोमनाथका वर्णन है। इसके बाद बहुस्वर्णेश्वर, भृङ्गेश्वर, कोटीश्वर, मार्कण्डेश्वर, कोटीश तथा दामोदरगृहकी माहात्म्य-कथा है। तदनन्तर स्वर्णरेखा, ब्रह्मकुण्ड, कुन्तीश्वर, भीमेश्वर, मृगीकुण्ड तथा सर्वस्व—ये वस्त्रापथक्षेत्रमें कहे गये हैं। तत्पश्चात् दुर्गाभल्लेश, गङ्गेश, रैवतेश, अर्बुदेश्वर, अचलेश्वर, नागतीर्थ, वसिष्ठाश्रम, भद्रकर्ण, त्रिनेत्र, केदार, तीर्थगमन, कोटीश्वर, रूपतीर्थ और हृषीकेश—ये अद्भुत माहात्म्यकथाएँ हैं। इसके बाद सिद्धेश्वर, शुक्रेश्वर, मणिकर्णीश्वर, पङ्कतीर्थ, यमतीर्थ और वाराहीतीर्थ आदिके माहात्म्यका वर्णन है। फिर चन्द्रप्रभास, पिण्डोदक, श्रीमाता, शुक्लतीर्थ, कात्यायनीदेवी, पिण्डारकतीर्थ, कनकखलतीर्थ, चक्रतीर्थ, मानुषतीर्थ, कपिलाग्रीतीर्थ तथा रक्तानुबन्ध आदि माहात्म्यकथाका उल्लेख है। तदनन्तर गणेशतीर्थ, पार्थेश्वरतीर्थ और उज्ज्वलतीर्थकी यात्रामें चण्डीस्थान, नागोद्भव, शिवकुण्ड, महेशतीर्थ तथा कामेश्वरका माहात्म्यवर्णन और मार्कण्डेयजीकी उत्पत्तिकथा है। फिर उद्दालकेश और सिद्धेशके समीपवर्ती तीर्थोंकी पृथक्-पृथक् कथाएँ हैं। इसके बाद श्रीदेवमाताकी उत्पत्ति, व्यास और गौतमतीर्थकी कथा, कुलसन्तार्तीर्थका माहात्म्य तथा रामतीर्थ एवं कोटितीर्थकी महिमा है। चन्द्रोद्भेदतीर्थ, ईशानतीर्थ और ब्रह्मस्थानकी उत्पत्तिका अद्भुत माहात्म्य तथा त्रिपुष्कर, रुद्रह्रद और गुहेश्वरकी शुभ कथा है। तत्पश्चात् अविमुक्तकी महिमा, उमामहेश्वरका माहात्म्य, महौजका प्रभाव और जम्बूतीर्थका महत्त्व कहा गया है। गङ्गाधर और मिश्रककी कथा एवं फलस्तुतिका भी वर्णन है। तदनन्तर द्वारकामाहात्म्यके प्रसङ्गमें चन्द्रशर्माकी

वामनपुराणकी विषय-सूची और उस पुराणके श्रवण, पठन एवं दानका माहात्म्य

५४२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


कथा है। जागरण और पूजन आदिका आख्यान, एकादशीव्रतकी महिमा, महाद्वादशीका आख्यान, प्रह्लाद और ऋषियोंका समागम, दुर्वासाका उपाख्यान, यात्राकी प्रारम्भिक विधि, गोमतीकी उत्पत्तिकथा, उसमें स्नान आदिका फल, चक्रतीर्थका माहात्म्य, गोमतीसागर-सङ्गम, सनकादि कुण्डका आख्यान, नृगतीर्थकी कथा, गोप्रचारकी पुण्यमयी कथा, गोपियोंका द्वारकामें आगमन, गोपीसरोवरका आख्यान, ब्रह्मतीर्थ आदिका कीर्तन, पाँच नदियोंके आगमनकी कथा, अनेक प्रकारके उपाख्यान, शिवलिङ्ग, गदातीर्थ और श्रीकृष्णपूजन आदिका वर्णन है। त्रिविध-मूर्तिका वर्णन, दुर्वासा और श्रीकृष्ण-संवाद, कुश दैत्यके वधकी कथा, विशेष, पूजनका फल, गोमती और द्वारकामें तीर्थोंके आगमनका वर्णन, श्रीकृष्णमन्दिरका दर्शन, द्वारवतीमें अभिषेक, वहाँ तीर्थोंके निवासकी कथा और द्वारकाके पुण्यका वर्णन है। ब्राह्मणो ! इस प्रकार सर्वोत्तम कथाओंसे युक्त शिवमाहात्म्य-प्रतिपादक स्कन्दपुराणमें यह सातवाँ प्रभासखण्ड बताया गया है। जो इसे लिखकर सुवर्णमय त्रिशूलके साथ माघकी पूर्णिमाके दिन सत्कारपूर्वक ब्राह्मणको दान देता है, वह सदा भगवान् शिवके लोकमें आनन्दका भागी होता है।

वामनपुराणकी विषय-सूची और उस पुराणके श्रवण, पठन एवं दानका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— वत्स! सुनो, अब मैं त्रिविक्रमचरित्रसे युक्त वामनपुराणका वर्णन करता हूँ। इसकी श्लोक-संख्या दस हजार है। इसमें कूर्म कल्पके वृत्तान्तका वर्णन है और त्रिवर्णकी कथा है। यह पुराण दो भागोंसे युक्त है और वक्ता-श्रोता दोनोंके लिये शुभकारक है। इसमें पहले पुराणके विषयमें प्रश्न है। फिर ब्रह्माजीके शिरश्छेदकी कथा, कपालमोचनका आख्यान और दक्ष-यज्ञ-विध्वंसका वर्णन है। तत्पश्चात् भगवान् हरकी कालरूप संज्ञा, मदनदहन, प्रह्लादनारायणयुद्ध, देवासुर-संग्राम, सुकेशी और सूर्यकी कथा, काम्यव्रतका वर्णन, श्रीदुर्गाचरित्र, तपतीचरित्र, कुरुक्षेत्रवर्णन, अनुपम सत्या-माहात्म्य, पार्वती-जन्मकी कथा, तपतीका विवाह, गौरी-उपाख्यान, कौशिकी-उपाख्यान, कुमारचरित, अन्धकवधकी कथा, साध्योपाख्यान, जाबालिचरित, अरजाकी अद्भुत कथा, अन्धकासुर और भगवान् शङ्करका युद्ध, अन्धकको गणत्वकी प्राप्ति, मरुद्गणोंके जन्मकी कथा, राजा बलिका चरित्र, लक्ष्मी-चरित्र, त्रिविक्रम-चरित्र, प्रह्लादकी तीर्थयात्रा और उसमें अनेक मङ्गलमयी कथाएँ, धुन्धु-चरित, प्रेतोपाख्यान, नक्षत्र पुरुषकी कथा, श्रीदामाका चरित्र, त्रिविक्रमचरित्रके अन्तमें ब्रह्माजीके द्वारा कहा हुआ उत्तम स्तोत्र तथा प्रह्लाद और बलिके संवादमें सुतललोकमें श्रीहरिकी प्रशंसाका उल्लेख है। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें इस पुराणका पूर्वभाग बताया है। अब इस वामनपुराणके उत्तरभागका श्रवण करो। उत्तरभागमें चार संहिताएँ हैं। वे पृथक्-पृथक् एक-एक

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५४३

सहस्र श्लोकोंसे युक्त हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—माहेश्वरी, भागवती, सौरी और गाणेश्वरी। माहेश्वरी संहितामें श्रीकृष्ण तथा उनके भक्तोंका वर्णन है। भागवती संहितामें जगदम्बाके अवतारकी अद्भुत कथा दी गयी है। 'सौरीसंहिता'में भगवान् सूर्यकी पाप-नाशक महिमाका वर्णन है। 'गाणेश्वरीसंहिता'में भगवान् शिव तथा गणेशजीके चरित्रका वर्णन किया गया है। यह वामन नामका अत्यन्त विचित्र पुराण महर्षि पुलस्त्यने महात्मा नारदजीसे कहा है। फिर नारदजीसे महात्मा व्यासको प्राप्त हुआ है और व्यासजीसे उनके शिष्य रोमहर्षणको मिला है। रोमहर्षणजी नैमिषारण्यनिवासी शौनकादि ब्रह्मर्षियोंसे यह पुराण कहेंगे। इस प्रकार यह मङ्गलमय वामनपुराण परम्परासे प्राप्त हुआ है। जो इसका पाठ और श्रवण करते हैं, वे भी परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो इस पुराणको लिखकर शरत्कालके विषुव योगमें वेदवेत्ता ब्राह्मणको घृतधेनुके साथ इसका दान करता है, वह अपने पितरोंको नरकसे निकालकर स्वर्गमें पहुँचा देता है और स्वयं भी अनेक प्रकारके भोगोंका उपभोग करके देह-त्यागके पश्चात् वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है।

कूर्मपुराणकी संक्षिप्त विषय-सूची और उसके पाठ, श्रवण तथा दानका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं—वत्स मरीचे! अब तुम कूर्मपुराणका परिचय सुनो। इसमें लक्ष्मी-कल्पका वृत्तान्त है। इस पुराणमें कूर्मरूपधारी दयामय श्रीहरिने इन्द्रद्युम्नके प्रसङ्गसे महर्षियोंको धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका पृथक्-पृथक् माहात्म्य सुनाया है। यह शुभ पुराण चार संहिताओंमें विभक्त है। इसकी श्लोक-संख्या सत्रह हजार है। मुने! इसमें अनेक प्रकारकी कथाओंके प्रसङ्गसे मनुष्योंको सद्गति प्रदान करनेवाले नाना प्रकारके ब्राह्मणधर्म बताये गये हैं। इसके पूर्वभागमें पहले पुराणका उपक्रम है। तत्पश्चात् लक्ष्मी और इन्द्रद्युम्नका संवाद, कूर्म और महर्षियोंकी वार्ता, वर्णाश्रमसम्बन्धी आचारका कथन, जगत्की उत्पत्तिका वर्णन, संक्षेपसे काल-संख्याका निरूपण, प्रलयके अन्तमें भगवान्का स्तवन, संक्षेपसे सृष्टिका वर्णन, शङ्करजीका चरित्र, पार्वतीसहस्रनाम, योगनिरूपण, भृगुवंशवर्णन, स्वायम्भुव मनु तथा देवता आदिकी उत्पत्ति, दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षसृष्टि-कथन, कश्यपके वंशका वर्णन, अत्रिवंशका परिचय, श्रीकृष्णका शुभ चरित्र, मार्कण्डेय-श्रीकृष्ण-संवाद, व्यास-पाण्डव-संवाद, युगधर्मका वर्णन, व्यास-जैमिनिकी कथा, काशी एवं प्रयागका माहात्म्य, तीनों लोकोंका वर्णन और वैदिक शाखाका निरूपण है। इस पुराणके उत्तरभागमें पहले ईश्वरीय-गीता फिर व्यास-गीता है, जो नाना प्रकारके धर्मोंका उपदेश देनेवाली है। इसके सिवा नाना प्रकारके तीर्थोंका पृथक्-पृथक् माहात्म्य बताया गया है। तदनन्तर प्रतिसर्गका वर्णन है। यह 'ब्राह्मीसंहिता' कही गयी है। इसके बाद 'भागवतीसंहिता' के विषयोंका निरूपण है, जिसमें वर्णोंकी पृथक्-पृथक् वृत्ति बतायी गयी है। इसके प्रथम पादमें ब्राह्मणोंकी सदाचाररूप स्थिति बतायी गयी है, जो भोग और सुख बढ़ानेवाली है। द्वितीय पादमें क्षत्रियोंकी वृत्तिका भलीभाँति निरूपण किया गया है, जिसका आश्रय लेकर मनुष्य अपने पापोंका यहीं नाश करके स्वर्गलोकमें चला जाता है। तृतीय पादमें वैश्योंकी चार प्रकारकी वृत्ति कही गयी है, जिसके सम्यक् आचरणसे उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है। उसी प्रकार इसके चतुर्थ पादमें शूद्रोंकी वृत्ति कही गयी है, जिससे मनुष्योंके कल्याणकी वृद्धि करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपति संतुष्ट होते हैं। तदनन्तर भागवतीसंहिताके पाँचवें पादमें संकरजातियोंकी वृत्ति कही गयी है,

मत्स्यपुराणकी विषय-सूची तथा इस पुराणके पाठ, श्रवण और दानका माहात्म्य

५४४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


जिसके आचरणसे वह भविष्यमें उत्तम गतिको पा लेता है। मुने! इस प्रकार द्वितीय संहिता पाँच पादोंसे युक्त कही गयी है। इस उत्तरभागमें तीसरी संहिता 'सौरसंहिता' कहलाती है, जो मनुष्योंका कार्य सिद्ध करनेवाली है। वह सकामभाववाले मनुष्योंको छः प्रकारसे षट्कर्मसिद्धिका बोध कराती है। चौथी 'वैष्णवीसंहिता' है, जो मोक्ष देनेवाली कही गयी है। यह चार पदोंवाली संहिता द्विजातियोंके लिये ब्रह्मस्वरूप है। वे क्रमशः छः, चार, दो और पाँच हजार श्लोकोंकी बतायी गयी हैं। यह कूर्मपुराण धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप फल देनेवाला है, जो पढ़ने और सुननेवाले मनुष्योंको सर्वोत्तम गति प्रदान करता है। जो मनुष्य इस पुराणको लिखकर अयनारम्भके दिन सोनेकी कच्छपमूर्तिके साथ ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक इसका दान करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है।


मत्स्यपुराणकी विषय-सूची तथा इस पुराणके पाठ, श्रवण और दानका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— द्विजश्रेष्ठ! अब मैं तुम्हें मत्स्यपुराणका परिचय देता हूँ, जिसमें वेदवेत्ता व्यासजीने इस भूतलपर सात कल्पोंके वृत्तान्तको संक्षिप्त करके कहा है। नृसिंहवर्णन आरम्भ करके चौदह हजार श्लोकोंका मत्स्यपुराण कहा गया है। मनु और मत्स्यका संवाद, ब्रह्माण्डका वर्णन, ब्रह्मा, देवता और असुरोंकी उत्पत्ति, मरुद्गणका प्रादुर्भाव, मदनद्वादशी, लोकपालपूजा, मन्वन्तर-वर्णन, राजा पृथुके राज्यका वर्णन, सूर्य और वैवस्वत मनुकी उत्पत्ति, बुध-संगमन, पितृवंशका वर्णन, श्राद्धकाल, पितृतीर्थ-प्रचार, सोमकी उत्पत्ति, सोमवंशका कथन, राजा ययातिका चरित्र, कार्तवीर्य अर्जुनका चरित्र, सृष्टिवंश-वर्णन, भृगुशाप, भगवान् विष्णुका पृथ्वीपर दस बार जन्म (अवतार), पुरुवंशका कीर्तन, हुताशनवंशका वर्णन, पहले क्रियायोग, फिर पुराणकीर्तन, नक्षत्रव्रत, पुरुषव्रत, मार्तण्डशयनव्रत, श्रीकृष्णष्टमीव्रत, रोहिणीचन्द्र नामक व्रत, तड़ागविधिकी महिमा, वृक्षोत्सर्ग, सौभाग्यशयनव्रत, अगस्त्यव्रत, अनन्ततृतीयाव्रत, रसकल्याणिनीव्रत, आनन्दकरीव्रत, सारस्वतव्रत, उपरागाभिषेक (ग्रहणस्नान) विधि, सप्तमीशयनव्रत, भीमद्वादशी, अनङ्गशयनव्रत, अशून्यशयनव्रत, अङ्गारकव्रत, सप्तमीसप्तकव्रत, विशोकद्वादशीव्रत, दस प्रकारका मेरुप्रदान, ग्रहशान्ति, ग्रहस्वरूपकथा, शिवचतुर्दशी, सर्वफलत्याग, रविवारव्रत, संक्रान्तिस्नान, विभूतिद्वादशीव्रत, षष्ठीव्रत-माहात्म्य, स्नानविधिका वर्णन, प्रयागका माहात्म्य, द्वीप और लोकोंका वर्णन, अन्तरिक्षमें गमन, ध्रुवकी महिमा, देवेश्वरोंके भवन, त्रिपुरका प्रकाशन, श्रेष्ठ पितरोंकी महिमा, मन्वन्तर-निर्णय, चारों युगोंकी उत्पत्ति, युगधर्म-निरूपण, वज्राङ्गकी उत्पत्ति, तारकासुरकी उत्पत्ति, तारकासुरका माहात्म्य, ब्रह्मदेवानुकीर्तन, पार्वतीका प्राकट्य, शिवतपोवन, मदनदेहदाह, रतिशोक, गौरी-तपोवन, शिवका गौरीको प्रसन्न करना,

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५४५

पार्वती तथा ऋषियोंका संवाद, पार्वतीविवाह-मङ्गल, कुमार कार्तिकेयका जन्म, कुमारकी विजय, तारकासुरका भयंकर वध, नृसिंहभगवान्‌की कथा, ब्रह्माजीकी सृष्टि, अन्धकासुरका वध, वाराणसी-माहात्म्य, नर्मदा-माहात्म्य, प्रवर-गणना, पितृगाथाका कीर्तन, उभयमुखी गौका दान, काले मृगचर्मका दान, सावित्रीकी कथा, राजधर्मका वर्णन, नाना प्रकारके उत्पातोंका कथन, ग्रहशान्त, यात्रानिमित्तक वर्णन, स्वप्नमङ्गलकीर्तन, ब्राह्मण और वराहका माहात्म्य, समुद्र-मन्थन, कालकूटकी शान्ति, देवासुर-संग्राम, वास्तुविद्या, प्रतिमालक्षण, देवमन्दिर-निर्माण, प्रासादलक्षण, मण्डपलक्षण, भविष्य राजाओंका वर्णन, महादानवर्णन तथा कल्पकीर्तन—इन सब विषयोंका इस पुराणमें वर्णन किया गया है। जो पवित्र, कल्याणकारी तथा आयु और कीर्ति बढ़ानेवाले इस पुराणका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। जो इस पुराणको लिखकर सुवर्णमय मत्स्य और गौके साथ विषुव योगमें ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक दान देता है, वह परम पदको प्राप्त होता है।

गरुडपुराणकी विषय-सूची और पुराणके पाठ, श्रवण और दानकी महिमा

ब्रह्माजी कहते हैं—मरीचे! सुनो, अब मैं मङ्गलमय गरुडपुराणका वर्णन करता हूँ। गरुडके पूछनेपर गरुडासन भगवान् विष्णुने उन्हें तार्क्ष्य-कल्पकी कथासे युक्त उन्नीस हजार श्लोकोंका गरुडपुराण सुनाया था। इसमें पहले पुराणको आरम्भ करनेके लिये प्रश्न किया गया है। फिर संक्षेपसे सृष्टिका वर्णन है। तत्पश्चात् सूर्य आदिके पूजनकी विधि, दीक्षाविधि, श्राद्ध-पूजा, नवव्यूहपूजाकी विधि, वैष्णव-पञ्जर, योगाध्याय, विष्णुसहस्रनामकीर्तन, विष्णुध्यान, सूर्यपूजा, मृत्युञ्जय-पूजा, मालामन्त्र, शिवार्चा, गोपालपूजा, त्रैलोक्यमोहन श्रीधरपूजा, विष्णु-अर्चा, पञ्चतत्त्वार्चा, चक्रार्चा, देवपूजा, न्यास आदि, संध्योपासन, दुर्गार्चन, सुरार्चन, महेश्वर-पूजा, पवित्रारोपण-पूजन, मूर्तिध्यान, वास्तुमान, प्रासादलक्षण, सर्वदेवप्रतिष्ठा, पृथक् पूजाविधि, अष्टाङ्गयोग, दानधर्म, प्रायश्चित्तविधि, द्वीपेश्वरों और नरकोंका वर्णन, सूर्यव्यूह, ज्योतिष, सामुद्रिकशास्त्र, स्वरज्ञान, नूतनरत्नपरीक्षा, तीर्थ-माहात्म्य, गयाका उत्तम माहात्म्य, पृथक्-पृथक् विभागपूर्वक मन्वन्तर-वर्णन, पितरोंका उपाख्यान, वर्णधर्म, द्रव्यशुद्धि, समर्पण, श्राद्धकर्म, विनायकपूजा, ग्रहयज्ञ, आश्रम, जननाशौच, प्रेतशुद्धि, नीति-शास्त्र, व्रत-कथा, सूर्यवंश, सोमवंश, श्रीहरिकी अवतारकथा, रामायण, हरिवंश, भारताख्यान, आयुर्वेदनिदान, चिकित्सा, द्रव्यगुणनिरूपण, रोगनाशक विष्णुकवच, गरुडकवच, त्रैपुर मन्त्र, प्रश्नचूडामणि, अश्वायुर्वेदकीर्तन, ओषधियोंके नामका कीर्तन, व्याकरणका ऊहापोह, छन्दःशास्त्र, सदाचार, स्नानविधि, तर्पण, बलिवैश्वदेव, संध्या, पार्वणकर्म, नित्यश्राद्ध, सपिण्डन, धर्मसार, पापोंका प्रायश्चित्त, प्रतिसंक्रम, युगधर्म, कर्मफल, योगशास्त्र, विष्णुभक्ति, श्रीहरिको नमस्कार करनेका

५४६ * संक्षिप्त नारदपुराण *

फल, विष्णुमहिमा, नृसिंहस्तोत्र, ज्ञानामृत, गुहाष्टकस्तोत्र, विष्ण्वर्चनस्तोत्र, वेदान्त और सांख्यका सिद्धान्त, ब्रह्मज्ञान, आत्मानन्द, गीतासार तथा फलवर्णन—ये विषय कहे गये हैं। यह गरुडपुराणका पूर्वखण्ड बताया गया है।

इसीके उत्तरखण्डमें सबसे पहले प्रेतकल्पका वर्णन है। मरीचे! उसमें गरुडके पूछनेपर भगवान् विष्णुने पहले धर्मके महत्त्वको प्रकट किया है, जो योगियोंकी उत्तम गतिका कारण है। फिर दान आदिका फल तथा और्ध्वदेहिक कर्म बताया गया है। तत्पश्चात् यमलोकके मार्गका वर्णन किया गया है। इसी प्रसंगमें षोडश श्राद्धके फलको सूचित करनेवाले वृत्तान्तका वर्णन है। यमलोकके मार्गसे छूटनेका उपाय और धर्मराजके वैभवका कथन है। इसके बाद प्रेतकी पीड़ाओंका वर्णन, प्रेतचिह्न-निरूपण, प्रेतचरितवर्णन तथा प्रेतत्वप्राप्तिके कारणका उल्लेख किया गया है। तदनन्तर प्रेतकृत्यका विचार, सपिण्डीकरणका कथन, प्रेतत्वसे मुक्त होनेका कथन, मोक्षसाधक दान, आवश्यक एवं उत्तम दान, प्रेतको सुख देनेवाले कार्योंका ऊहापोह, शारीरक निर्देश, यमलोक-वर्णन, प्रेतत्वसे उद्धारका कथन, कर्म करनेके अधिकारीका निर्णय, मृत्युसे पहलेके कर्तव्यका वर्णन, मृत्युसे पीछेके कर्मका निरूपण, मध्यषोडश श्राद्ध, स्वर्गप्राप्ति करानेवाले कर्तव्यका ऊहापोह, सूतककी दिन-संख्या, नारायणबलि कर्म, वृषोत्सर्गका माहात्म्य, निषिद्ध कर्मका त्याग, दुर्मृत्युके अवसरपर किये जानेवाले कर्मका वर्णन, मनुष्योंके कर्मका फल, विष्णुध्यान और मोक्षके लिये कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार, स्वर्गकी प्राप्तिके लिये विहित कर्मका वर्णन, स्वर्गीय सुखका निरूपण, भूलोकवर्णन, नीचेके सात लोकोंका वर्णन, ऊपरके पाँच लोकोंका वर्णन, ब्रह्माण्डकी स्थितिका निरूपण, ब्रह्माण्डके अनेक चरित्र, ब्रह्म और जीवका निरूपण, आत्यन्तिक प्रलयका वर्णन तथा फलस्तुतिका निरूपण है। यही गरुड नामक पुराण है, जो कीर्तन और श्रवण करनेपर वक्ता और श्रोता मनुष्योंके पापका शमन करके उन्हें भोग और मोक्ष देनेवाला है। जो इस पुराणको लिखकर दो सुवर्णमयी हंसप्रतिमाके साथ विषुव योगमें ब्राह्मणको दान देता है, वह स्वर्गलोकमें जाता है।

ब्रह्माण्डपुराणका परिचय, संक्षिप्त विषय-सूची, पुराण-परम्परा, उसके पाठ, श्रवण एवं दानका फल

**ब्रह्माजी कहते हैं—**वत्स! सुनो, अब मैं ब्रह्माण्डपुराणका वर्णन करता हूँ, जो भविष्यकल्पोंकी कथासे युक्त और बारह हजार श्लोकोंसे परिपूर्ण है। इसके चार पाद हैं। पहला 'प्रक्रियापाद' दूसरा 'अनुषङ्गपाद', तीसरा 'उपोद्घातपाद' और चौथा 'उपसंहारपाद' है। पहलेके दो पादोंको पूर्वभाग कहा गया है। तृतीय पाद ही मध्यम भाग है और चतुर्थ पाद उत्तरभाग माना गया है।

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५४७ ---|---

पूर्वभागके प्रक्रियापादमें पहले कर्तव्यका उपदेश, नैमिषका आख्यान, हिरण्यगर्भकी उत्पत्ति और लोकरचना इत्यादि विषय वर्णित हैं। मानद ! यह पूर्वभागका प्रथम पाद (प्रक्रियापाद) है।

अब द्वितीय (अनुषङ्ग) पादका वर्णन सुनो, इसमें कल्प तथा मन्वन्तरका वर्णन है। तत्पश्चात् लोकज्ञान, मानुषी-सृष्टिकथन, रुद्रसृष्टिवर्णन, महादेवविभूति, ऋषिसर्ग, अग्निविजय, कालसद्भाव-वर्णन, प्रियव्रत-वंशका परिचय, पृथ्वीका दैर्घ्य और विस्तार, भारतवर्षका वर्णन, फिर अन्य वर्षोंका वर्णन, जम्बू आदि सात द्वीपोंका परिचय, नीचेके लोकों-पातालोंका वर्णन, भूर्भुवः आदि ऊपरके लोकोंका वर्णन, ग्रहोंकी गतिका विश्लेषण, आदित्यव्यूहका कथन, देवग्रहानुकीर्तन, भगवान् शिवके नीलकण्ठ नाम पड़नेका कथन, महादेवजीका वैभव, अमावास्याका वर्णन, युगतत्त्वनिरूपण, यज्ञप्रवर्तन, अन्तिम दो युगोंका कार्य, युगके अनुसार प्रजाका लक्षण, ऋषिप्रवर-वर्णन, वेदव्यास-वर्णन, स्वायम्भुव मन्वन्तरका निरूपण, शेषमन्वन्तरका कथन, पृथ्वीदोहन, चाक्षुष और वर्तमान मन्वन्तरके सर्गका वर्णन है। इस प्रकार यह पूर्वभागका द्वितीय पाद कहा गया।

अब मध्यभागके उपोद्घातपादमें वर्णित विषय कहे जाते हैं। उसमें पहले सप्तर्षियोंका वर्णन, प्रजापतिवंशका निरूपण, उससे देवता आदिकी उत्पत्ति, तदनन्तर विजयकी अभिलाषा और मरुद्गणोंकी उत्पत्तिका कथन है। कश्यपकी संतानोंका वर्णन, ऋषिवंशनिरूपण, पितृकल्पका कथन, श्राद्धकल्पका वर्णन, वैवस्वतमनुकी उत्पत्ति, उनकी सृष्टि, मनुपुत्रोंका वंश, गान्धर्वनिरूपण, इक्ष्वाकुवंश-वर्णन, महात्मा अत्रिके वंशका कथन, अमावसुके वंशका वर्णन, रजिका अद्भुत चरित्र, ययातिचरित, यदुवंशनिरूपण, कार्तवीर्यचरित, परशुरामचरित, वृष्णिवंशका वर्णन, सगरकी उत्पत्ति, भार्गवका चरित्र, कार्तवीर्यवधसम्बन्धी कथा, सगरका चरित्र, भार्गव (और्व)-की कथा, देवासुर-संग्रामकी कथा, कृष्णावतारवर्णन, शुक्राचार्यकृत इन्द्रका पवित्र-स्तोत्र, विष्णुमाहात्म्यकथन, बलिवंश-निरूपण तथा कलियुगमें होनेवाले राजाओंका चरित्र—यह मध्यमभागका तीसरा उपोद्घातपाद है।

अब उत्तरभागके चौथे उपसंहारपादका वर्णन करता हूँ। इसमें वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा विस्तारके साथ ज्यों-की-त्यों दी गयी है। जो कथा पहले ही कह दी गयी है, वह यहाँ संक्षेपसे बतायी जाती है। भविष्यमें होनेवाले मनुओंका चरित्र भी कहा गया है। तदनन्तर कल्पके प्रलयका निर्देश किया गया है। कालमान बताया गया है। तत्पश्चात् प्राप्त लक्षणोंके अनुसार चौदह भुवनोंका वर्णन किया गया है। फिर विपरीत कर्मोंके आचरणसे नरकोंकी प्राप्तिका कथन है। मनोमयपुरका आख्यान और प्राकृत प्रलयका प्रतिपादन किया गया है। तदनन्तर शिवधामका वर्णन है और सत्त्व आदि गुणोंके सम्बन्धसे जीवोंकी त्रिविध गतिका निरूपण किया गया है। इसके बाद अन्वय तथा व्यतिरेकदृष्टिसे अनिर्देश्य एवं अतर्क्य परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार यह उत्तर-भागसहित उपसंहारपादका वर्णन किया गया है। मरीचे ! मैंने तुम्हें चार पादवाले ब्रह्माण्डपुराणका परिचय दिया। यह अठारहवाँ पुराण सारसे भी सारतर वस्तु है। इसकी कहीं भी उपमा नहीं है। मानद ! ब्रह्माण्डपुराण जो चार लाख श्लोकमें कहा गया है, वास्तवमें उसीको भावितात्मा मुनियोंके उपदेशक पाराशरनन्दन व्यासमुनिने अठारह भागोंमें विभक्त करके पृथक्-पृथक् कहा है। दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले धर्मशील मुनियोंने मुझसे सभी पुराण सुनकर उनका सम्पूर्ण लोकोंके लिये प्रकाशन किया है। पूर्वकालमें मैंने वसिष्ठको इस पुराणका उपदेश दिया था। वसिष्ठने शक्तिनन्दन पराशरको और पराशरने जातूकर्ण्यको यह पुराण सुनाया।

५४८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

फिर जातूकर्ण्यसे वायुदेवके मुखसे प्रकट हुए इस उत्तम पुराणको पाकर व्यासदेवने इसे प्रमाणभूत माना और इस लोकमें इसका प्रचार किया। वत्स! जो एकाग्रचित्त हो इस पुराणका पाठ एवं श्रवण करता है, वह इस लोकमें सारे पापोंका नाश करके अनामय लोक (रोग-शोकसे रहित परम धाम)-में जाता है। जो इस पुराणको लिखकर सोनेके सिंहासनपर रखता और वस्त्रसे आच्छादित करके ब्राह्मणको दान कर देता है, वह ब्रह्माजीके लोकमें जाता है। इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मरीचे! मैंने तुमसे जो ये अठारह पुराण संक्षेपसे कहे हैं, उन सबको विस्तारसे सुनना चाहिये। जो श्रेष्ठ मानव इन अठारह पुराणोंको विधिपूर्वक सुनता अथवा कहता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। मैंने इस समय जो कुछ कहा है, यह पुराणोंका सूत्ररूप है। पुराणका फल चाहनेवाले पुरुषको इसका नित्य अनुशीलन करना चाहिये। जो दाम्भिक, पापाचारी, देवता और गुरुकी निन्दा करनेवाला, साधुमहात्माओंसे द्वेष रखनेवाला और शठ है, उसे इस पुराणका उपदेश कदापि नहीं देना चाहिये। जो शान्त, मनोनिग्रहसे युक्त, सेवापरायण, द्वेषरहित तथा पवित्र हो, उस श्रेष्ठ वैष्णव पुरुषको ही इसका उपदेश देना चाहिये।

बारह मासोंकी प्रतिपदाके व्रत एवं आवश्यक कृत्योंका वर्णन

श्रीनारदजी बोले— प्रभो! मैंने आपके मुखसे समस्त पुराणोंका सूत्र, जैसा कि परमेष्ठी ब्रह्माजीने महर्षि मरीचिसे कहा था, सुन लिया। महाभाग! अब मुझसे क्रमशः तिथियोंके विषयमें निरूपण कीजिये, जिससे व्रतका ठीक-ठीक निश्चय हो जाय। जिस मासमें, जिस पुण्य तिथिको जिसने उपासना की है और उसकी पूजा आदिका जो विधान है, वह सब इस समय बताइये।

श्रीसनातनजीने कहा— नारद! सुनो, अब मैं तुमसे तिथियोंके पृथक्-पृथक् व्रतका वर्णन करता हूँ। तिथियोंके जो स्वामी हैं, उन्हींके क्रमसे पृथक्-पृथक् व्रत बताया जाता है, जो सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला है। चैत्रमासके शुक्ल पक्षमें प्रथम दिन सूर्योदयकालमें ब्रह्माजीने सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि की थी, इसलिये वर्ष और वसन्त-ऋतुके आदिमें बलिराज्य-सम्बन्धी तिथि-अमावास्याको जो प्रतिपदा तिथि प्राप्त होती है, उसीमें सदा विद्वानोंको व्रत करना चाहिये। प्रतिपदा तिथि पूर्वविद्धा होनेपर ही व्रत आदिमें ग्रहण करने योग्य है। उस दिन महाशान्ति करनी चाहिये। वह समस्त पापोंका नाश, सब प्रकारके उत्पातोंकी शान्ति तथा कलियुगके दुष्कर्मोंका निवारण करनेवाली होती है। साथ ही वह आयु देनेवाली, पुष्टिकारक तथा धन और सौभाग्यको बढ़ानेवाली है। वह परम मङ्गलमयी, शान्ति, पवित्र होनेके साथ ही इहलोक और परलोकमें भी सुख देनेवाली है। उस तिथिको पहले अग्निरूपधारी भगवान् ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये, फिर क्रमशः सब देवताओंकी पृथक्-पृथक् पूजा करे। इस तरह पूजा और ॐकारपूर्वक नमस्कार^१ करके कुश, जल, तिल और अक्षतके साथ सुवर्ण और वस्त्रसहित दक्षिणा लेकर वेदवेत्ता ब्राह्मणको व्रतकी पूर्तिके लिये दान करना चाहिये। इस प्रकार पूजा-विशेषसे 'शौरि' नामक व्रत सम्पन्न होता है। ब्रह्मन्! यह मनुष्योंको आरोग्य^२ प्रदान करनेवाला है। मुने! उसी दिन


१. नामके आदिमें 'ॐ' और अन्तमें 'नमः' जोड़कर बोलना ही ॐकारपूर्वक नमस्कार है; यथा— 'ॐ ब्रह्मणे नमः' इत्यादि। अथवा 'ॐ नमः' को एक साथ भी बोल सकते हैं; यथा— 'ॐ नमो ब्रह्मणे' इत्यादि।
२. इसी तिथिको विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें 'आरोग्यव्रत' का विधान किया गया है और ब्रह्मपुराणमें 'संवत्सरारम्भ-

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५४९ ---|---

'विद्याव्रत'¹ भी बताया गया है तथा इसी तिथिको श्रीकृष्णने अजातशत्रु युधिष्ठिरको 'तिलकव्रत'² करनेका उपदेश दिया है।

तदनन्तर ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाको सूर्योदयकालमें देवमन्दिरसम्बन्धी वाटिकामें उगे हुए मनोहर कनेरवृक्षका पूजन करे। कनेरके वृक्षमें लाल डोरा लपेटकर उसपर गन्ध, चन्दन, धूप आदि चढ़ावे, उगे हुए सप्तधान्यके अङ्कुर, नारंगी और बिजौरा नीबू आदिसे उसकी पूजा करे। फिर अक्षत और जलसे उस वृक्षको सींचकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे क्षमा-प्रार्थना करे—

करवीरवृक्षावास नमस्ते भानुवल्लभ।
मौलिमण्डन दुर्गादिदेवानां सततं प्रिय॥
(ना० पूर्व० ११०। १०७)

'करवीर! आप धर्मके निवास-स्थान और भगवान् सूर्यके पुत्र हैं। दुर्गादि देवताओंके मस्तकको विभूषित करनेवाले तथा उनके सदैव प्रिय हैं। आपको नमस्कार है।'

तत्पश्चात् 'आ कृष्णेन०'³ इत्यादि वेदोक्त मन्त्रका उच्चारण करके इसी प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक पूजन करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे और वृक्षकी परिक्रमा करके अपने घर जाय⁴। श्रावण शुक्ला प्रतिपदाको परम उत्तम 'रोटकव्रत'⁵ होता है, जो लक्ष्मी और बुद्धिको देनेवाला है तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षका कारण है। ब्रह्मन्! सोमवारयुक्त श्रावण शुक्ल प्रतिपदा या श्रावणके प्रथम सोमवारसे लेकर साढ़े तीन मासतक यह व्रत किया जाता है। इसमें प्रतिदिन सोमेश्वर भगवान् शिवकी बिल्वपत्रसे पूजा की जाती है। कार्तिक शुक्ला चतुर्दशीतक इस नियमसे पूजा करके उस दिन उपवासपूर्वक रहे और व्रतपरायण पुरुष पूर्णिमाके दिन पुनः भगवान् शङ्करकी पूजा करे। फिर बाँसके पात्रमें सुवर्णसहित पवित्र एवं अधिक वायन, जो देवताकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला हो, लेकर संकल्पपूर्वक ब्राह्मणको दान करे। मुनीश्वर! यह दान धनकी वृद्धि करनेवाला है। भाद्रपदके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदाको कोई 'महत्तमव्रत'⁶ एवं कोई 'मौनव्रत'⁷ बतलाते हैं। इसमें भगवान् शिवकी पूजा की जाती है। उस दिन मौन रहकर नैवेद्य तैयार करे। अड़तालीस फल और पूए एकत्र करके उनमेंसे सोलह तो ब्राह्मणको दे और सोलह देवताको भोग लगावे एवं शेष सोलह अपने उपयोगमें लावे। सुवर्णमयी शिवकी प्रतिमाको विधानवेत्ता पुरुष कलशके ऊपर स्थापित करके उसकी पूजा करे। फिर वह सब कुछ एक धेनुके सहित आचार्यको दान कर दे। ब्रह्मन्! देवदेव महादेवके इस व्रतका चौदह वर्षोंतक पालन करके नाना प्रकारके भोग भोगनेके पश्चात् देहावसान होनेपर शिवलोकमें जाता है।

ब्रह्मन्! आश्विन शुक्ला प्रतिपदाको 'अशोक-व्रत'का पालन करके मनुष्य शोकरहित तथा धन-धान्यसे सम्पन्न हो जाता है। उसमें नियमपूर्वक रहकर अशोक वृक्षकी पूजा करनी चाहिये।


विधि' दी गयी है।
१. 'विद्याव्रत'की विधि विष्णुधर्मोत्तरमें तथा गरुडपुराणमें भी उपलब्ध होती है।
२. 'तिलकव्रत' के विषयमें विशेष जानकारी भविष्योत्तरपुराणसे हो सकती है।
३. आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥
४. निर्णयग्रन्थोंके अनुसार भविष्योत्तरपुराणमें इसकी विशेष विधि दी गयी है। वहाँ 'करवीरव्रत' के नामसे इसका उल्लेख किया गया है।
५. व्रतराजमें इस व्रतका विस्तारपूर्वक वर्णन है।
६-७. महत्तम और मौन—इन दोनों व्रतोंका विशेष विधान स्कन्दपुराणमें उपलब्ध होता है।

५५० * संक्षिप्त नारदपुराण *


बारहवें वर्ष व्रतके अन्तमें अशोक वृक्षकी सुवर्णमयी मूर्ति बनाकर उसे भक्तिपूर्वक गुरुको समर्पित करनेपर मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसी प्रतिपदाको 'नवरात्रव्रत' आरम्भ करे। पूर्वाह्नकालमें कलशस्थापनपूर्वक देवीकी पूजा करे। गेहूँ और जौके बीजसे अंकुर आरोपण करके प्रतिदिन अपनी शक्तिके अनुसार उपवास, अयाचित अथवा एकभुक्त करके रहे और पूजा, पाठ, जप आदि करता रहे। ब्रह्मन्! मार्कण्डेयपुराणमें देवीके जो तीन चरित्र कहे गये हैं, उनका भोग और मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाला पुरुष नौ

दिनोंतक पाठ करे। नवरात्रमें भोजन, वस्त्र आदिके द्वारा कुमारीपूजन उत्तम माना गया है। ब्रह्मन्! इस प्रकार व्रतका आचरण करके मनुष्य इस पृथ्वीपर दुर्गाजीकी कृपासे सम्पूर्ण सिद्धियोंका आश्रय हो जाता है।

कार्तिक शुक्ला प्रतिपदाको नवरात्रमें बताये अनुसार नियमोंका पालन करे। विशेषतः अन्नकूट नामक कर्म भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है। उस दिन गोवर्धनपूजनके लिये सब तरहके पाक और सब गोरसोंका संग्रह करके सबको अन्नकूट करना चाहिये। इससे सब मनोरथोंकी सिद्धि होती है। सायंकालमें गौओंसहित श्रीगोवर्धन पर्वतका पूजन करके जो उसकी प्रदक्षिणा करता है, वह भोग और मोक्ष पाता है।

मार्गशीर्ष शुक्ला प्रतिपदाको परम उत्तम 'धनव्रत'का पालन करना चाहिये। रातमें भगवान् विष्णुका पूजन और होम करके अग्निदेवकी सुवर्णमयी प्रतिमाको दो लाल वस्त्रोंसे आच्छादित करके ब्राह्मणको दान दे। ऐसा करके मनुष्य इस पृथ्वीपर धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। अग्निदेवके द्वारा उसके समस्त पाप दग्ध हो जाते हैं और वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

पौष शुक्ला प्रतिपदाको भक्तिपूर्वक सूर्यदेवकी पूजा करके एकभुक्तव्रत करनेवाला मनुष्य सूर्यलोकमें जाता है। माघ शुक्ला प्रतिपदाके दिन अग्निस্বরূপ साक्षात् महेश्वरकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य इस पृथ्वीपर समृद्धिशाली होता है। फाल्गुन शुक्ला प्रतिपदाको धूलिधूसरित अङ्गोंवाले देवदेव दिगम्बर शिवको सब ओरसे जलद्वारा स्नान करावे। भगवान् महेश्वर इस लौकिक कर्मसे भी संतुष्ट होकर अपना सायुज्य प्रदान करते हैं। फिर भक्तिपूर्वक भलीभाँति पूजित होनेपर वे क्या नहीं दे सकते! वैशाख शुक्ला प्रतिपदाको विश्वव्यापक भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक पूजा करके व्रती पुरुष ब्राह्मणोंको भोजन करावे। इसी प्रकार आषाढ़ शुक्ला प्रतिपदाको जगद्गुरु ब्रह्मा एवं विष्णुका पूजन करके ब्राह्मण-भोजन करावे। ऐसा करनेसे विष्णुसहित सर्वलोकेश्वरेश्वर ब्रह्माजी अपना सायुज्य प्रदान करते हैं और वह सम्पूर्ण सिद्धियोंको प्राप्त कर लेता है। द्विजश्रेष्ठ! बारह महीनोंकी प्रतिपदा तिथियोंमें होनेवाले जो व्रत तुम्हें बताये गये हैं, वे भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। इन सब व्रतोंमें ब्रह्मचर्य-पालनका विधान है। भोजनके लिये सामान्यतः हविष्यान्न बताया गया है।

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * | ५५१ ---|---

बारह मासोंके द्वितीया-सम्बन्धी व्रतों और आवश्यक कृत्योंका निरूपण

सनातनजी कहते हैं—ब्रह्मन्! सुनो, अब मैं तुम्हें द्वितीयाके व्रत बतलाता हूँ, जिनका भक्ति-पूर्वक पालन करके मनुष्य ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। चैत्र शुक्ला द्वितीयाको ब्राह्मी शक्तिके साथ ब्रह्माजीका हविष्यान्न तथा गन्ध आदिसे पूजन करके व्रती पुरुष सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता है और समस्त मनोवाञ्छित कामनाओंको पाकर अन्तमें ब्रह्मपद प्राप्त करता है। विप्रवर! इसी दिन सायंकाल उगे हुए बालचन्द्रमाका¹ पूजन करनेसे भोग और मोक्षरूप फलकी प्राप्ति होती है। अथवा उस दिन भक्तिपूर्वक अश्विनीकुमारोंकी यत्नपूर्वक पूजा करके ब्राह्मणको सोने और चाँदीके नेत्रोंका दान करे²। इस व्रतमें दही अथवा घीसे प्राणयात्राका निर्वाह किया जाता है। द्विजेन्द्र! बारह वर्षोंतक 'नेत्रव्रत'का अनुष्ठान करके मनुष्य पृथ्वीका अधिपति होता है। वैशाख शुक्ला द्वितीयाको सप्तधान्ययुक्त कलशके ऊपर विष्णुरूपी ब्रह्माका विधिपूर्वक पूजन करके मनुष्य मनोवाञ्छित भोग भोगनेके पश्चात् विष्णुलोक प्राप्त कर लेता है। ज्येष्ठ शुक्ला द्वितीयाको सम्पूर्ण भुवनोंके अधिपति ब्रह्मस्वरूप भगवान् भास्करका विधिपूर्वक पूजन करके जो भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह सूर्यलोकमें जाता है। आषाढ़मासके शुक्ल पक्षमें जो पुष्यनक्षत्रसे युक्त द्वितीया तिथि आती है, उसमें सुभद्रादेवीके साथ श्रीबलराम और श्रीकृष्णको रथपर बिठाकर व्रती पुरुष ब्राह्मण आदिके साथ नगर आदिमें भ्रमण करावे और किसी जलाशयके निकट जाकर बड़ा भारी उत्सव मनावे। तदनन्तर देवविग्रहोंको विधिपूर्वक पुनः मन्दिरमें विराजमान करके उक्त व्रतकी पूर्तिके लिये ब्राह्मणोंको भोजन करावे। श्रावण कृष्णा द्वितीयाको प्रजापति विश्वकर्मा शयन करते हैं। अतः वह पुण्यमयी तिथि 'अशून्यशयन' नामसे प्रसिद्ध है। उस दिन अपनी शक्तिके साथ शय्यापर शयन किये हुए नारायणस्वरूप चतुर्मुख ब्रह्माजीकी पूजा करके उन जगदीश्वरको प्रणाम करे।

तदनन्तर सायंकालमें चन्द्रमाके लिये अर्घ्यदान भी आवश्यक बताया गया है, जो सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला है। भाद्रपद शुक्ला द्वितीयाको इन्द्ररूपधारी जगद्विधाता ब्रह्माकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता है। आश्विन मासके शुक्लपक्षमें जो पुण्यमयी द्वितीया तिथि आती है, उसमें दिया हुआ दान अनन्त फल देनेवाला कहा जाता है। कार्तिक शुक्ला द्वितीयाको पूर्वकालमें यमुनाजीने यमराजको अपने घर भोजन कराया था, इसलिये यह 'यमद्वितीया' कहलाती है। इसमें बहिनके घर भोजन करना पुष्टिवर्धक बताया गया है। अतः बहिनको उस दिन वस्त्र और आभूषण देने चाहिये। उस तिथिको जो बहिनके हाथसे इस लोकमें भोजन करता है, वह सर्वोत्तम रत्न, धन और धान्य पाता है। मार्गशीर्ष शुक्ला द्वितीयाको श्राद्धके द्वारा पितरोंका पूजन करनेवाला पुरुष पुत्र-पौत्रोंसहित आरोग्य लाभ करता है। पौष शुक्ला द्वितीयाको गायके सींगमें लिये हुए जलके द्वारा मार्जन करना और संध्याकालमें बालचन्द्रमाका दर्शन करना मनुष्योंके लिये सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। जो हविष्यान्न भोजन करके इन्द्रियसंयमपूर्वक रहकर अर्घ्यदानसे तथा घृतसहित पुष्प आदिसे बालचन्द्रमाका पूजन करता है, वह धर्म, काम और अर्थकी सिद्धि लाभ करता है। माघशुक्ला द्वितीयाको भानुरूपी प्रजापतिकी विधिपूर्वक अर्चना करके लाल फूल और लाल चन्दन आदिसे उनकी पूजा करनी चाहिये। अपनी शक्तिके


१. विष्णुधर्मोत्तरपुराणके अनुसार यह 'बालेन्दुव्रत' कहा गया है।
२. विष्णुधर्ममें भी इस 'नेत्रव्रत' का वर्णन किया गया है।

५५२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


अनुसार सोनेकी सूर्यमूर्तिका निर्माण कराकर ताँबेके पात्रको गेहूँ या चावलसे भर दे और वह पात्र भक्तिपूर्वक देवताको समर्पित करके मूर्तिसहित उसे ब्राह्मणको दान कर दे। ब्रह्मन्! इस प्रकार व्रतका पालन करनेपर वह मनुष्य उदित हुए साक्षात् सूर्यके समान इस पृथ्वीपर दुर्जय एवं दुर्धर्ष हो जाता है। इस लोकमें श्रेष्ठ कामनाओंका उपभोग करके अन्तमें वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है। फाल्गुन शुक्ला द्वितीयाको श्रेष्ठ द्विज श्वेत एवं सुगन्धित पुष्पोंसे भगवान् शिवकी पूजा करे। फूलोंसे चँदोवा बनाकर सुन्दर पुष्पमय आभूषणोंसे उनका श्रृङ्गार करे। फिर धूप, दीप, नाना प्रकारके नैवेद्य और आरती आदिके द्वारा भगवान्‌को प्रसन्न करके पृथ्वीपर पड़कर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम करे। इस प्रकार देवेश्वर शिवकी आराधना करके मनुष्य रोगसे रहित तथा धन-धान्यसे सम्पन्न हो निश्चय ही सौ वर्षोंतक जीवित रहता है। शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथियोंमें जो विधान बताया गया है, वही विधिज्ञ पुरुषोंको कृष्णपक्षकी द्वितीयामें भी करना चाहिये। पृथक्-पृथक् महीनोंमें नाना रूप धारण करनेवाले अग्निदेव ही द्वितीया तिथियोंमें पूजित होते हैं। इसमें भी पूर्ववत् ब्रह्मचर्य आदिका पालन आवश्यक है।

बारह महीनोंके तृतीया-सम्बन्धी व्रतोंका परिचय

सनातनजी कहते हैं— नारद! सुनो, अब मैं तुम्हें तृतीयाके व्रत बतलाता हूँ, जिनका विधिपूर्वक पालन करके नारी शीघ्र सौभाग्य लाभ करती है। ब्रह्मन्! वर-प्राप्तिकी इच्छा रखनेवाली कन्या तथा सौभाग्य, पुत्र एवं पतिकी मङ्गलकामना करनेवाली विवाहिता नारी चैत्र शुक्ला तृतीयाको उपवास करके गौरीदेवी तथा भगवान् शङ्करकी सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टीकी प्रतिमा बनावे और उसे गन्ध-पुष्प, दूर्वाकाण्ड आदि आचारों तथा सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विधिपूर्वक पूजित करके सधवा ब्राह्मण-पत्नियों अथवा सुलक्षणा ब्राह्मण-कन्याओंको सिन्दूर, काजल और वस्त्राभूषणों आदिसे संतुष्ट करे। तदनन्तर उस प्रतिमाको जलाशयमें विसर्जन कर दे। स्त्रियोंको सौभाग्य देनेवाली जैसी गौरीदेवी हैं, वैसी तीनों लोकोंमें दूसरी कोई शक्ति नहीं है। वैशाख शुक्ल पक्षकी जो तृतीया है, उसे 'अक्षयतृतीया' कहते हैं। वह त्रेतायुगकी आदि तिथि है। उस दिन जो सत्कर्म किया जाता है, उसे वह अक्षय बना देती है। वैशाख शुक्ला तृतीयाको लक्ष्मीसहित जगद्गुरु भगवान् नारायणका पुष्प,धूप और चन्दन आदिसे पूजन करना चाहिये अथवा गङ्गाजीके जलमें स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेवाला मनुष्य समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।

ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी जो तृतीया है, वह 'रम्भा-तृतीया' के नामसे प्रसिद्ध है। उस दिन सपत्नीक श्रेष्ठ ब्राह्मणकी गन्ध, पुष्प और वस्त्र

पूर्वभाग- चतुर्थ पाद ५५३

  • पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५५३
आदिसे विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। यह व्रत धन, पुत्र और धर्मविषयक शुभकारक बुद्धि प्रदान करता है। आषाढ़ शुक्ला तृतीयाको सपत्नीक ब्राह्मणमें लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुकी भावना करके वस्त्र, आभूषण, भोजन और धेनुदानके द्वारा उनकी पूजा करे; फिर प्रिय वचनोंसे उन्हें अधिक संतुष्ट करे। इस प्रकार सौभाग्यकी इच्छासे प्रेमपूर्वक इस व्रतका पालन करके नारी धन-धान्यसे सम्पन्न हो देवदेव श्रीहरिके प्रसादसे विष्णुलोक प्राप्त कर लेती है। श्रावण शुक्ला तृतीयाको 'स्वर्णगौरीव्रत' का आचरण करना चाहिये। उस दिन स्त्रीको चाहिये कि वह षोडश उपचारोंसे भवानीकी पूजा करे।<br><br>भाद्रपद शुक्ला तृतीयाको सौभाग्यवती स्त्री विधिपूर्वक पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा भक्ति-भावसे पूजा करती हुई 'हरितालिकाव्रत'का पालन करे। सोने, चाँदी, ताँबे, बाँस अथवा मिट्टीके पात्रमें दक्षिणासहित पकवान रखकर फल और वस्त्रके साथ ब्राह्मणको दान करे। इस प्रकार व्रतका पालन करनेवाली नारी मनोरम भोगोंका उपभोग करके इस व्रतके प्रभावसे गौरीदेवीकी सहचरी होती है। आश्विन शुक्ला तृतीयाको 'बृहद् गौरीव्रत'-का आचरण करे। नारद! इससे सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि होती है।<br><br>कार्तिक शुक्ला तृतीयाको 'विष्णु-गौरीव्रत'काआचरण करे। उसमें भाँति-भाँतिके उपचारोंसे जगद्वन्द्या लक्ष्मीकी पूजा करके सुवासिनी स्त्रीका मङ्गल-द्रव्योंसे पूजन करनेके पश्चात् उसे भोजन करावे और प्रणाम करके विदा करे। मार्गशीर्ष शुक्ला तृतीयाको मङ्गलमय 'हरगौरीव्रत' करके पूर्वोक्तविधिसे जगदम्बाका पूजन करे। इस व्रतके प्रभावसे स्त्री मनोरम भोगोंका उपभोग करके देवीलोकमें जाती और गौरीके साथ आनन्दका अनुभव करती है। पौष शुक्ला तृतीयाको 'ब्रह्मगौरीव्रत'का आचरण करे। द्विजश्रेष्ठ! इसमें भी पूर्वोक्त विधिसे पूजन करके नारी ब्रह्मगौरीके प्रसादसे उनके लोकमें जाकर आनन्द भोगती है। माघ शुक्ला तृतीयाको व्रत रखकर पूर्वोक्त विधिसे सौभाग्यसुन्दरीकी पूजा करनी चाहिये और उनके लिये नारियलके साथ अर्घ्य देना चाहिये। इससे प्रसन्न होकर व्रतसे संतुष्ट हुई देवी अपना लोक प्रदान करती है। फाल्गुनके शुक्ल पक्षमें कुलसौख्यदा-तृतीयाका व्रत होता है, उसमें गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा पूजित होनेपर देवी सबके लिये मङ्गलदायिनी होती हैं। मुने! सम्पूर्ण तृतीयाव्रतोंमें देवीपूजा, ब्राह्मणपूजा, दान, होम और विसर्जन-यह साधारण विधि है। इस प्रकार तुम्हें तृतीयाके व्रत बताये गये हैं, जो भक्तिपूर्वक पालित होनेपर मनकी अभीष्ट वस्तुएँ देते हैं।

बारह महीनोंके चतुर्थी-व्रतोंकी विधि और उनका माहात्म्य

सनातनजी कहते हैं— ब्रह्मन्! सुनो, अब मैं तुम्हें चतुर्थीके व्रत बतलाता हूँ, जिनका पालन करके स्त्री और पुरुष मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं। चैत्रमासकी चतुर्थीको वासुदेवस्वरूप गणेशजीकी भलीभाँति पूजा करके ब्राह्मणको सुवर्ण दक्षिणा देनेसे मनुष्य सम्पूर्ण देवताओंका वन्दनीय हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। वैशाखकी चतुर्थीको संकर्षण गणेशकी पूजा करके विधिज्ञ पुरुष गृहस्थ ब्राह्मणोंको शङ्ख दान करे तो वहसंकर्षणलोकमें जाकर अनेक कल्पोंतक आनन्दका अनुभव करता है। ज्येष्ठ मासकी चतुर्थीको प्रद्युम्नरूपी गणेशका पूजन करके ब्राह्मणसमूहको फल-मूलका दान करनेसे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है। आषाढ़की चतुर्थीको अनिरुद्धस्वरूप गणेशकी पूजा करके संन्यासियोंको तूँबीका पात्र दान करनेसे मनुष्य मनोवाञ्छित फल पाता है। ज्येष्ठकी चतुर्थीको एक दूसरा परम उत्तम व्रत होता है, जिसे 'सतीव्रत' कहते हैं। इस व्रतका पालन करके स्त्री गणेशमाता