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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

६५४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


एकादशीका फल प्राप्त करो। जो कोई मनुष्य तुमसे विद्ध एकादशीका व्रत करता है, वह उस व्रतद्वारा तुम्हें लाभ पहुँचानेवाला होगा। यहाँ अरुणोदयका समय दो मुहूर्ततक जानना चाहिये। रात और दिनके पृथक्-पृथक् पंद्रह मुहूर्त माने गये हैं। दिन और रात्रिकी छोटाई-बड़ाईके अनुसार त्रैराशिककी विधिसे रात या दिनके मुहूर्तोंको समझना चाहिये। रात्रिके तेरहवें मुहूर्तके बाद तुम दशमीके अन्त भागमें स्थित होकर उस दिन उपवास करनेवाले लोगोंके पुण्यको प्राप्त कर लोगी। शुचिस्मिते! यह वर पाकर तुम निश्चिन्त हो जाओ। मोहिनी! जो व्रत करनेवाले लोग तुमसे विद्ध हुई एकादशीका व्रत यहाँ प्रयत्नपूर्वक करते हैं, उनके उस व्रतसे जो पुण्य होता है, उसका फल तुम भोगो!

ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा इस प्रकार आदेश प्राप्त होनेपर मोहिनी बहुत प्रसन्न हुई। अपने पाप दूर करनेके लिये तीर्थ-सेवनकी आज्ञा मिल जानेपर उसने जीवनको कृतार्थ माना। राजन्! ऐसा सोचकर हर्षमें भरी हुई मोहिनी देवताओं तथा पुरोहितको प्रणाम करके सूर्योदयसे पूर्ववर्ती दशमीके अन्त भागमें स्थित हो गयी। मोहिनीको अपनी तिथिके अन्तमें स्थित देख सूर्यपुत्र यमका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। वे बोले—'चारुलोचने! तुमने इस लोकमें फिर मेरी अच्छी प्रतिष्ठा कर दी। राजा रुक्माङ्गदके मतवाले हाथीपर रखकर जो नगाड़ा बजाया जाता था, वह तो तुमने बंद करा ही दिया। यह दशमी तिथि यदि सूर्योदयकालका स्पर्श करे तो सदा निन्दित मानी गयी है। यदि दशमीसे उदयकालका स्पर्श न हो तो भी अरुणोदयकालमें रहनेपर वह मनुष्योंको मोहमें डालनेवाली होगी। उस दशमीको त्याग करके व्रत करनेपर मनुष्यको प्रिय वस्तुओंका संयोग एवं भोग प्राप्त होता है।' ऐसा कहकर सूर्यपुत्र यम प्रसन्नतापूर्वक ब्रह्मकुमारी मोहिनीको प्रणाम करके देवताओंके साथ अपने चित्रगुप्तका हाथ पकड़े हुए स्वर्गलोकको चले गये। देवताओंके चले जानेपर मोहिनी ब्रह्माजीसे बोली—'पिताजी! मेरे इन पुरोहितने क्रोधपूर्वक मेरे शरीरको जला दिया है। मैं पुनः उसे प्राप्त कर लूँ—ऐसा प्रयत्न कीजिये।'

मोहिनीका यह वचन सुनकर लोकस्रष्टा ब्रह्माजी पुत्रीके हितके लिये ब्राह्मणदेवताको पुनः शान्त करते हुए बोले—'तात! वसो! मेरी बात सुनो। महाभाग! मैं तुम्हारे, इस मोहिनीके तथा सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये हितकारक वचन कहता हूँ। मानद! तुमने क्रोधवश मोहिनीको भस्मावशेष कर दिया है। अब यह पुनः अपने लिये शरीरकी याचना करती है, अतः आज्ञा दो। तात! मेरी पुत्री और तुम्हारी यजमान होकर यह दुर्गतिमें पड़ी है। तुम्हारा और मेरा कर्तव्य है कि इसका पालन करें। मानद! यदि तुम शुद्ध भावसे मुझे आज्ञा दो तो मैं इसके लिये पुनः नूतन शरीर उत्पन्न कर दूँगा, किंतु यह एकादशीसे वैर रखनेवाली होनेके कारण पापाचारिणी है। विप्रवर! जिस प्रकार यह पापसे शीघ्र शुद्ध हो सके, वही उपाय कीजिये।' ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर राजपुरोहितने अपनी यजमानपत्नीके शरीरकी प्राप्तिके लिये प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा दे दी। ब्राह्मणका अनुमोदक वचन सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने मोहिनीके शरीरकी राखको कमण्डलुके जलसे सींच दिया। लोककर्ता ब्रह्माके सींचते ही मोहिनी पूर्ववत् शरीरसे सम्पन्न हो गयी। उसने अपने पिता ब्रह्माजीको प्रणाम करके विनयसे नतमस्तक हो पुरोहित वसुके दोनों पैर पकड़ लिये। इससे राजपुरोहित वसु प्रसन्न हो गये। उन्होंने पति और पुत्रसे रहित संकटमें पड़ी हुई विधवा यजमानपत्नी मोहिनीसे

मोहिनी-वसु-संवाद—गङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन

* उत्तरभाग *६५५

इस प्रकार कहा। वसु बोले—देवि! मैंने ब्रह्माजीके कहनेसे क्रोध त्याग दिया। अब तीर्थ-स्नानादि पुण्य-कर्मसे तुम्हारी सद्गति कराऊँगा। मोहिनीसे ऐसा कहकर ब्राह्मणने उसके पिता जगत्पति ब्रह्माजीको नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक विदा किया। तब ब्रह्माजी अपने लोकको चले गये, जो परम ज्योतिर्मय है। रुक्माङ्गदके पुरोहित विप्रवर वसु मोहिनीको कृपाके योग्य मानकर मन-ही-मन उसकी सद्गतिका उपाय सोचने लगे। दो घड़ीतक ध्यानमें स्थित होकर उन्होंने उसकी सद्गतिका उपाय जान लिया।


मोहिनी-वसु-संवाद—गङ्गाजीके माहात्म्यका वर्णन

वसिष्ठजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ! सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहनेवाले पुरोहित वसु यजमानपत्नी मोहिनीसे मधुर वाणीमें बोले।

पुरोहित वसुने कहा—मोहिनी! सुनो, मैं तुम्हें तीर्थोंके पृथक्-पृथक् लक्षण बतलाता हूँ। जिसके जान लेनेमात्रसे पापियोंकी उत्तम गति होती है। पृथ्वीपर सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ गङ्गा हैं। गङ्गाके समान पापनाशक तीर्थ दूसरा कोई नहीं है।

अपने पुरोहित वसुका यह वचन सुनकर मोहिनीके मनमें गङ्गा-स्नानके प्रति आदर बढ़ गया। वह पुरोहितजीको प्रणाम करके बोली।

मोहिनीने कहा—भगवन्! सम्पूर्ण पुराणोंकी सम्मतिके अनुसार इस समय गङ्गाजीका उत्तम माहात्म्य बताइये। पहले गङ्गाजीके अनुपम तथा पापनाशक माहात्म्यको सुनकर फिर आपके साथ पापनाशिनी गङ्गाजीमें स्नान करनेके लिये चलूँगी। वसु सब पुराणोंके ज्ञाता थे। उन्होंने मोहिनीका वचन सुनकर गङ्गाजीके पापनाशक माहात्म्यका इस प्रकार वर्णन किया।

पुरोहित वसु बोले—देवि! वे देश, वे जनपद, वे पर्वत और वे आश्रम भी धन्य हैं, जिनके समीप सदा पुण्यसलिला भगवती भागीरथी बहती रहती हैं*। जीव गङ्गाजीका सेवन करके जिस गतिको पाता है, उसे तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्यागके द्वारा भी नहीं पा सकता। जो मनुष्य पहली अवस्थामें पापकर्म करके अन्तिम अवस्थामें गङ्गाजीका सेवन करते हैं, वे भी परम गतिको प्राप्त होते हैं। इस संसारमें दुःखसे व्याकुल जो जीव उत्तम गतिकी खोजमें लगे हैं, उन सबके लिये गङ्गाके समान दूसरी कोई गति नहीं है। गङ्गाजी बड़े-बड़े भयंकर पातकोंके कारण अपवित्र नरकमें गिरनेवाले नराधम पापियोंको जबरन तार देती हैं। गङ्गा देवी अंधों, जड़ों तथा द्रव्यहीनोंको भी पवित्र बनाती हैं। मोहिनी! (विशेषरूपसे) पक्षोंके आदि अर्थात् कृष्णपक्षमें षष्ठीसे लेकर पुण्यमयी अमावास्यातक दस दिन गङ्गाजी इस पृथ्वीपर निवास करती हैं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे लेकर दस दिनतक वे स्वयं ही पातालमें निवास करती हैं। फिर शुक्लपक्षकी एकादशीसे कृष्ण-पक्षकी पञ्चमीतक जो दस दिन होते हैं, उनमें गङ्गाजी सदा स्वर्गमें रहती हैं। [इसलिये इन्हें 'त्रिपथगा' कहते हैं] सत्ययुगमें सब तीर्थ उत्तम


* ते देशास्ते जनपदास्ते शैलास्तेऽपि चाश्रमाः। येषां भागीरथी पुण्या समीपे वर्तते सदा॥
(ना० उत्तर० ३८। ८)

६५६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


हैं। त्रेतामें पुष्कर तीर्थ सर्वोत्तम है, द्वापरमें कुरुक्षेत्रकी विशेष महिमा है और कलियुगमें गङ्गा ही सबसे बढ़कर है। कलियुगमें सब तीर्थ स्वभावतः अपनी-अपनी शक्तिको गङ्गाजीमें छोड़ते हैं, परंतु गङ्गादेवी अपनी शक्तिको कहीं नहीं छोड़तीं। गङ्गाजीके जलकणोंसे परिपुष्ट हुई वायुके स्पर्शसे भी पापाचारी मनुष्य भी परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो सर्वत्र व्यापक हैं, जिनका स्वरूप चिन्मय है, वे जनार्दन भगवान् विष्णु ही द्रवरूपसे गङ्गाजीके जल हैं, इसमें संशय नहीं है। महापातकी भी गङ्गाजीके जलमें स्नान करनेसे पवित्र हो जाते हैं, इस विषयमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। गङ्गाजीका जल अपने क्षेत्रमें हो या निकालकर लाया गया हो, ठंडा हो या गरम हो, वह सेवन करनेपर आमरण किये हुए पापोंको हर लेता है। बासी जल और बासी दल त्याग देने योग्य माना गया है, परंतु गङ्गाजल और तुलसीदल बासी होनेपर भी त्याज्य नहीं है। मेरुके सुवर्णकी, सब प्रकारके रत्नोंकी, वहाँके प्रस्तर और जलके एक-एक कणकी गणना हो सकती है, परंतु गङ्गाजलके गुणोंका परिमाण बतानेकी शक्ति किसीमें भी नहीं है*। जो मनुष्य तीर्थयात्राकी पूरी विधि न कर सके वह भी केवल गङ्गाजलके माहात्म्यसे यहाँ उत्तम फलका भागी होता है। गङ्गाजीके जलसे एक बार भक्तिपूर्वक कुल्ला कर लेनेपर मनुष्य स्वर्गमें जाता और वहाँ कामधेनुके थनोंसे प्रकट हुए दिव्य रसोंका आस्वादन करता है। जो शालग्राम शिलापर गङ्गाजल डालता है, वह पापरूपी तीव्र अन्धकारको मिटाकर उदयकालीन सूर्यकी भाँति पुण्यसे प्रकाशित होता है। जो पुरुष मन, वाणी और शरीरद्वारा किये हुए अनेक प्रकारके पापोंसे ग्रस्त हो, वह भी गङ्गाजीका दर्शन करके पवित्र हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। जो सदा गङ्गाजीके जलसे सींचकर पवित्र की हुई भिक्षा भोजन करता है, वह केंचुलका त्याग करनेवाले सर्पकी भाँति पापसे शून्य हो जाता है। हिमालय और विन्ध्यके समान पापराशियाँ भी गङ्गाजीके जलसे उसी प्रकार नष्ट हो जाती हैं, जिस प्रकार भगवान् विष्णुकी भक्तिसे सब प्रकारकी आपत्तियाँ। गङ्गाजीमें भक्तिपूर्वक स्नानके लिये प्रवेश करनेपर मनुष्योंके ब्रह्महत्या आदि पाप 'हाय-हाय' करके भाग जाते हैं। जो प्रतिदिन गङ्गाजीके तटपर रहता और सदा गङ्गाजीका जल पीता है, वह पुरुष पूर्वसंचित पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो गङ्गाजीका आश्रय लेकर नित्य निर्भय रहता है, वही देवताओं, ऋषियों और मनुष्योंके लिये


* कृते तु सर्वतीर्थानि त्रेतायां पुष्करं परम्। द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गा विशिष्यते॥
कलौ तु सर्वतीर्थानि स्वं स्वं वीर्यं स्वभावतः। गङ्गायां प्रतिमुञ्चन्ति सा तु देवी न कुत्रचित्॥
गङ्गाम्भःकणदिग्धस्य वायोः संस्पर्शनादपि। पापशीला अपि नराः परां गतिमवाप्नुयुः॥
योऽसौ सर्वगतो विष्णुश्चित्स्वरूपी जनार्दनः। स एव द्रवरूपेण गङ्गाम्भो नात्र संशयः॥
ब्रह्महा गुरुहा गोघ्नः स्तेयी च गुरुतल्पगः। गङ्गाम्भसा च पूयन्ते नात्र कार्या विचारणा॥
क्षेत्रस्थमुद्धतं वापि शीतमुष्णमथापि वा। गाङ्गेयं तु हरेत्तोयं पापमामरणान्तिकम्॥
वर्ज्यं पर्युषितं तोयं वर्ज्यं पर्युषितं दलम्। न वर्ज्यं जाह्नवीतोयं न वर्ज्यं तुलसीदलम्॥
मेरोः सुवर्णस्य च सर्वरत्नैः संख्योपलानामुदकस्य वापि।
गङ्गाजलानां न तु शक्तिरस्ति वक्तुं गुणाख्यापरिमाणमत्र॥
(ना० उत्तर० ३८। २०-२७)

उत्तरभाग ६५७

  • उत्तरभाग * ६५७

पूजनीय हैं। प्रभासतीर्थमें सूर्यग्रहणके समय सहस्र गोदान करनेसे मनुष्य जो फल पाता है, वह गङ्गाजीके तटपर एक दिन रहनेसे ही मिल जाता है। जो अन्य सारे उपायोंको छोड़कर मोक्षकी कामना लिये दृढ़निश्चयके साथ गङ्गाजीके तटपर सुखपूर्वक रहता है, वह अवश्य ही मोक्षका भागी होता है, विशेषतः काशीपुरीमें गङ्गाजी तत्काल मोक्ष देनेवाली हैं। यदि जीवनभर प्रतिमासकी चतुर्दशी और अष्टमी तिथिको सदा गङ्गाजीके तटपर निवास किया जाय तो वह उत्तम सिद्धि देनेवाला है। मनुष्य सदा कृच्छ्र और चान्द्रायण करके सुखपूर्वक जिस फलका अनुभव करता है, वही उसे गङ्गाजीके तटपर निवास करनेमात्रसे मिल जाता है। ब्रह्मपुत्री! इस लोकमें गङ्गाजीकी सेवामें तत्पर रहनेवाले मनुष्यको आधे दिनके सेवनसे जो फल प्राप्त होता है, वह सैकड़ों यज्ञोंद्वारा भी नहीं मिल सकता। सम्पूर्ण यज्ञ, तप, दान, योग तथा स्वाध्याय-कर्मसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही भक्तिभावसे गङ्गाजीके तटपर निवास करनेमात्रसे मिल जाता है। सत्य-भाषण, नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन तथा अग्निहोत्रके सेवनसे मनुष्योंको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह गङ्गातटपर निवास करनेसे ही मिल जाता है। गङ्गाजीके भक्तको संतोष, उत्तम ऐश्वर्य, तत्त्वज्ञान, सुखस्वरूपता तथा विनय एवं सदाचार-सम्पत्ति प्राप्त होती है। मनुष्य केवल गङ्गाजीको ही पाकर कृतकृत्य हो जाता है^२। जो भक्तिभावसे गङ्गाजीके जलका स्पर्श करता और गङ्गाजल पीता है, वह मनुष्य अनायास ही मोक्षका उपाय प्राप्त कर लेता है^३। जिनके सम्पूर्ण कृत्य सदा गङ्गाजलसे ही सम्पन्न होते हैं, वे मनुष्य शरीर त्यागकर भगवान् शिवके समीप आनन्दका अनुभव करते हैं^४। जैसे इन्द्र आदि देवता अपने मुखसे चन्द्रमाकी किरणोंमें स्थित अमृतका पान करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य गङ्गाजीका जल पीते हैं। विधिपूर्वक कन्यादान और भक्तिपूर्वक भूमिदान, अन्नदान, गोदान, स्वर्णदान, रथदान, अश्वदान और गजदान आदि करनेसे जो पुण्य बताया गया है, उससे सौ गुना अधिक पुण्य चुल्लूभर गङ्गाजल पीनेसे होता है। सहस्रों चान्द्रायणव्रतका जो फल कहा गया है, उससे अधिक फल गङ्गाजल पीनेसे


१. मनोवाक्कायजैर्ग्रस्तः पापैर्बहुविधैरपि। वीक्ष्य गङ्गां भवेत् पूतः पुरुषो नात्र संशयः॥
गङ्गातोयाभिषिक्तां तु भिक्षामश्नाति यः सदा। सर्पवत्कञ्चुकं मुक्त्वा पापहीनो भवेत् स वै॥
हिमवद्विन्ध्यसदृशा राशयः पापकर्मणाम्। गङ्गाम्भसा विनश्यन्ति विष्णुभक्त्या यथापदः॥
प्रवेशमात्रे गङ्गायां स्नानार्थं भक्तितो नृणाम्। ब्रह्महत्यादिपापानि हाहेत्युक्त्वा प्रयान्त्यलम्॥
गङ्गातीरे वसेन्नित्यं गङ्गातोयं पिबेत् सदा। यः पुमान् स विमुच्येत पातकैः पूर्वसंचितैः॥
यो वै गङ्गां समाश्रित्य नित्यं तिष्ठति निर्भयः। स एव देवैर्मर्त्यैश्च पूजनीयो महर्षिभिः॥
(ना० उत्तर० ३८। ३२-३७)
२. संतोषः परमैश्वर्यं तत्त्वज्ञानं सुखात्मता॥ विनयाचारसम्पत्तिर्गङ्गाभक्तस्य जायते।
(ना० उत्तर० ३८। ४९-५०)
३. भक्त्या तज्जलसंस्पर्शी तज्जलं पिबते च यः॥ अनायासेन हि नरो मोक्षोपायं स विन्दति।
(ना० उत्तर० ३८। ५१-५२)
४. सर्वाणि येषां गङ्गायास्तोयैः कृत्यानि सर्वदा। देहं त्यक्त्वा नरास्ते तु मोदन्ते शिवसंनिधौ॥
(ना० उत्तर० ३८। ५३)

६५८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


मिलता है। चुल्लूभर गङ्गाजल पीनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो इच्छानुसार गङ्गाजीका पानी पीता है, उसकी मुक्ति हाथमें ही है। सरस्वती नदीका जल तीन महीनेमें, यमुनाजीका जल सात महीनेमें, नर्मदाजीका जल दस महीनेमें तथा गङ्गाजीका जल एक वर्षमें पचता है। अर्थात् शरीरमें उसका प्रभाव विद्यमान रहता है। जो देहधारी मनुष्य कहीं अज्ञात स्थानमें मर गये और उनके लिये शास्त्रीय विधिसे तर्पण नहीं किया गया, ऐसे लोगोंको गङ्गाजीके जलसे उनकी हड्डियोंका संयोग होनेपर परलोकमें उत्तम फलकी प्राप्ति होती है¹। जो शरीरकी शुद्धि करनेवाले चान्द्रायणव्रतका एक सहस्त्र बार अनुष्ठान कर चुका है और जो केवल इच्छानुसार गङ्गा-जल पीता है, वही पहलेवालेसे बढ़कर है। जो गङ्गाजीका दर्शन और स्तुति करता है, जो भक्तिपूर्वक गङ्गामें नहाता और गङ्गाका ही जल पीता है, वह स्वर्ग, निर्मल ज्ञान, योग तथा मोक्ष सब कुछ पा लेता है²।


गङ्गाजीके दर्शन, स्मरण तथा उनके जलमें स्नान करनेका महत्त्व

पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी ! सुनो, अब मैं गङ्गाजीके दर्शनका फल बतलाता हूँ, जिसका वर्णन तत्त्वदर्शी मुनियोंने पुराणोंमें किया है। ज्ञान, अनुपम ऐश्वर्य, प्रतिष्ठा, आयु, यश तथा शुभ आश्रमोंकी प्राप्ति गङ्गाजीके दर्शनका फल है। गङ्गाजीके दर्शनमात्रसे सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी चञ्चलता, दुर्व्यसन, पातक तथा निर्दयता आदि दोष नष्ट हो जाते हैं। दूसरोंकी हिंसा, कुटिलता, परदोष आदिका दर्शन तथा मनुष्योंके दम्भ आदि दोष गङ्गाजीके दर्शनमात्रसे दूर हो जाते हैं। मनुष्य यदि अविनाशी


१. कन्यादानैश्च विधिवद्भूमिदानैश्च भक्तितः। अन्नदानैश्च गोदानैः स्वर्णदानादिभिस्तथा ॥
रथाश्वगजदानैश्च यत्पुण्यं परिकीर्तितम्। ततः शतगुणः पुण्यं गङ्गाम्भश्शुलुकाशनात् ॥
चान्द्रायणसहस्त्राणां यत्फलं परिकीर्तितम्। ततोऽधिकफलं गङ्गातोयपानादवाप्यते ॥
गण्डूषमात्रपाने तु अश्वमेधफलं लभेत। स्वच्छन्दं यः पिबेदम्भस्तस्य मुक्तिः करे स्थिता ॥
त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्तभिस्त्वथ यामुनम् । नार्मदं दशभिर्मासैर्गाङ्गं वर्षेण जीर्यति ॥
शास्त्रेणाकृततोयानां मृतानां चापि देहिनाम् । तदुत्तरफलावाप्तिर्गङ्गायामस्थियोगतः ॥
(ना० उत्तर० ३८। ५५—६०)

२. गङ्गां पश्यति यः स्तौति स्नाति भक्त्या पिबेज्जलम्। स स्वर्गं ज्ञानममलं योगं मोक्षं च विन्दति ॥
(ना० उत्तर० ३८। ६१)

उत्तरभाग

  • उत्तरभाग * ६५९

सनातन पदकी प्राप्ति करना चाहता है तो वह भक्तिपूर्वक बार-बार गङ्गाजीकी ओर देखे और बार-बार उनके जलका स्पर्श करे। अन्यत्र बावड़ी, कुआँ और तालाब आदि बनवाने, पौंसले चलाने तथा अन्नसत्र आदिकी व्यवस्था करनेसे जो पुण्य होता है, वह गङ्गाजीके दर्शनमात्रसे मिल जाता है। परमात्माके दर्शनसे मानवोंको जो फल प्राप्त होता है, वह भक्तिभावसे गङ्गाजीका दर्शनमात्र करनेसे सुलभ हो जाता है। नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, नर्मदा तथा पुष्करतीर्थमें स्नान, स्पर्श और सेवन करके मनुष्य जिस फलको पाता है, वह कलियुगमें गङ्गाजीके दर्शनमात्रसे प्राप्त हो जाता है—ऐसा महर्षियोंका कथन है।

राजपत्नी! जो अशुभ कर्मोंसे युक्त हो संसारसमुद्रमें डूब रहे हों और नरकमें गिरनेवाले हों, उनके द्वारा यदि गङ्गाजीका स्मरण कर लिया जाय तो वह दूरसे ही उनका उद्धार कर देती है। चलते, खड़े होते, सोते, ध्यान करते, जागते, खाते और हँसते-रोते समय जो निरन्तर गङ्गाजीका स्मरण करता है, वह बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो सहस्रों योजन दूरसे भी भक्तिपूर्वक गङ्गाका स्मरण करते हैं तथा 'गङ्गा-गङ्गा' की रट लगाते हैं, वे भी पातकसे मुक्त हो जाते हैं। विचित्र भवन, विचित्र आभूषणोंसे विभूषित स्त्रियाँ, आरोग्य और धन-सम्पत्ति—ये गङ्गाजीके स्मरणजनित पुण्यके फल हैं। मनुष्य गङ्गाजीके नामकीर्तनसे पापमुक्त होता है और दर्शनसे कल्याणका भागी होता है। गङ्गामें स्नान और जलपान करके वह अपनी सात पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है। जो अश्रद्धासे भी पुण्यवाहिनी गङ्गाका नामकीर्तन करता है, वह भी स्वर्गलोकका भागी होता है।

देवि! अब मैं गङ्गाजीके जलमें स्नानका फल बतलाता हूँ। जो गङ्गाजीके जलमें स्नान करता है, उसका सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है और मोहिनी! उसे उसी क्षण अपूर्व पुण्यकी प्राप्ति होती है। गङ्गाजीके पवित्र जलसे स्नान करके शुद्धचित्त हुए पुरुषोंको जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह सैकड़ों यज्ञोंके अनुष्ठानसे भी सुलभ नहीं है। जैसे सूर्य उदयकालमें घने अन्धकारका नाश करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार गङ्गाजलसे अभिषिक्त हुआ पुरुष पापराशिका नाश करके प्रकाशमान होता है। गङ्गामें स्नान करनेमात्रसे मनुष्यके अनेक जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है और वह तत्काल पुण्यका भागी होता है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेसे और समस्त इष्टदेव-मन्दिरोंमें पूजा करनेसे जो पुण्य होता है, वही केवल गङ्गास्नानसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। कोई महापातकोंसे युक्त हो या सम्पूर्ण पातकोंसे, विधिपूर्वक गङ्गास्नान करनेसे वह सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। गङ्गास्नानसे बढ़कर दूसरा कोई स्नान न हुआ है, न होगा। विशेषतः कलियुगमें गङ्गादेवी सब पाप हर लेती हैं। जो मानव नित्य-निरन्तर गङ्गामें स्नान करता है, वह यहीं जीवन्मुक्त हो जाता है और मरनेपर भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। गङ्गामें मध्याह्नकालमें स्नान करनेसे प्रातःकालकी अपेक्षा दस गुना पुण्य होता है, सायंकालमें सौ गुना तथा भगवान् शिवके समीप अनन्तगुना पुण्य होता है। करोड़ों कपिला गौओंका दान करनेसे भी गङ्गास्नान बढ़कर है। गङ्गामें जहाँ कहीं भी स्नान किया जाय, वह कुरुक्षेत्रके समान पुण्य देनेवाली है; किंतु हरिद्वार, प्रयाग तथा गङ्गासागर-संगममें अधिक फल देनेवाली होती है। भगवान् सूर्य गङ्गाजीसे कहते हैं कि 'हे जाह्नवि ! जो लोग मेरी किरणोंसे तपे हुए तुम्हारे जलमें स्नान करते हैं, वे मेरा मण्डल भेदकर मोक्षको प्राप्त होते हैं।' वरुणने भी गङ्गासे कहा है कि 'जो मनुष्य अपने घरमें रहकर भी स्नानकालमें तुम्हारे नामका कीर्तन करेगा, वह भी वैकुण्ठलोकमें चला जायगा।'

६६० * संक्षिप्त नारदपुराण *

कालविशेष और स्थलविशेषमें गङ्गा-स्नानकी महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं—वामोरु! अब मैं कालविशेषमें किये जानेवाले गङ्गा-स्नानका फल बतलाऊँगा। जो मनुष्य माघ मासमें निरन्तर गङ्गा-स्नान करता है, वह दीर्घकालतक अपने समस्त कुलके साथ इन्द्रलोकमें निवास करता है। तदनन्तर दस लाख करोड़ कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें जाकर रहता है। सम्पूर्ण संक्रान्तियोंमें जो मनुष्य गङ्गाजीके जलमें स्नान करता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठधामको जाता है। विषुव योगमें उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ होनेके दिन तथा संक्रान्तिके समय विशेषरूपसे उसका फल बताया गया है। माघके ही समान कार्तिकमें भी गङ्गा-स्नानका महान् फल माना गया है। मोहिनी! जब सूर्य मेष राशिमें प्रवेश करते हैं, उस समय तथा कार्तिक-पूर्णिमाको गङ्गा-स्नान करनेसे ब्रह्मा आदि देवताओंने माघस्नानकी अपेक्षा अधिक पुण्य बताया है। कार्तिक अथवा वैशाखमें अक्षयतृतीया तिथिको गङ्गा-स्नान करनेसे एक वर्षतक स्नान करनेका पुण्यफल प्राप्त होता है। मन्वादि और युगादि तिथियोंमें गङ्गा-स्नानका जो फल बताया गया है, तीन मासके निरन्तर स्नानसे भी वही फल प्राप्त होता है। द्वादशीको श्रवण, अष्टमीको पुष्य और चतुर्दशीको आर्द्रा नक्षत्रका योग होनेपर गङ्गा-स्नान अत्यन्त दुर्लभ है। वैशाख, कार्तिक और माघकी पूर्णिमा और अमावास्या बड़ी पवित्र मानी गयी हैं। इनमें गङ्गा-स्नानका सुयोग अत्यन्त दुर्लभ है। कृष्णाष्टमी (भाद्रपद कृष्णा अष्टमी)-को गङ्गा-स्नान करनेसे (साधारण तिथिके स्नानकी अपेक्षा) सहस्रगुना फल होता है। सभी पर्वोंमें सौगुना पुण्य प्राप्त होता है। माघ कृष्णा अष्टमी तथा अमावास्याको भी गङ्गा-स्नानसे सौगुना पुण्य होता है। उक्त दोनों तिथियोंको सूर्यके आधा उदय होनेपर 'अर्धोदय' योग होता है और आधासे कुछ कम उदय होनेपर 'महोदय' कहा गया है। महोदयमें गङ्गा-स्नान करनेसे सौगुना और अर्धोदयमें लाखगुना पुण्य बताया गया है। देवि! फाल्गुन और आषाढ़ मासमें तथा सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणके समय किया हुआ गङ्गा-स्नान तीन मासके स्नानका फल देनेवाला है। अपने जन्मके नक्षत्रमें भक्तिभावसे गङ्गा-स्नान करनेपर आजन्म संचित पापोंका नाश हो जाता है। माघ कृष्णा चतुर्दशीको व्यतीपातयोग तथा कृष्णाष्टमी (भाद्रपद कृष्णा अष्टमी)-को विशेषतः वैधृतियोग गङ्गा-स्नानके लिये दुर्लभ है। जो मनुष्य पूरे माघभर विधिपूर्वक अरुणोदयकालमें गङ्गा-स्नान करता है, वह जातिस्मर (पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला) होता है। इतना ही नहीं, वह सम्पूर्ण शास्त्रोंका अर्थवेत्ता, ज्ञानी तथा नीरोग भी अवश्य होता है। संक्रान्तिमें, दोनों पक्षोंकी अन्तिम तिथिको तथा चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणमें इच्छानुसार गङ्गा-स्नान करनेवाला मानव ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। चन्द्रग्रहणका स्नान लाखगुना बताया गया है और सूर्यग्रहणका स्नान उससे भी दस गुना अधिक माना गया है। वारुण-नक्षत्र (शतभिषा)-से युक्त चैत्र कृष्णा त्रयोदशी यदि गङ्गा-तटपर सुलभ हो जाय तो वह सौ सूर्यग्रहणके समान पुण्य देनेवाली है। ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें दशमी तिथिको मङ्गलवार तथा हस्त नक्षत्रके योगमें भगवती भागीरथी हिमालयसे इस मर्त्यलोकमें उतरी थीं। इस तिथिको वह आद्यगङ्गा-स्नान करनेपर दसगुने पाप हर लेती हैं और अश्वमेधयज्ञका सौगुना पुण्य प्रदान करती हैं। 'हे जाह्नवी! मेरे जो महापातक-समुदायरूप पाप हैं, उन सबको तुम

उत्तरभाग ६६१

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गोविन्द-द्वादशीके दिन स्नान करनेसे नष्ट कर दो।' यदि माघकी पूर्णिमाको मघा नक्षत्र या बृहस्पतिका योग हो तो उक्त तिथिका महत्त्व बहुत बढ़ जाता है। यदि यह योग गङ्गाजीमें सुलभ हो तब तो सौ सूर्यग्रहणके समान पुण्य होता है।

अब देशविशेषके योगसे गङ्गा-स्नानका फल बतलाया जाता है। गङ्गाजीमें जहाँ-कहीं भी स्नान किया जाय, वह कुरुक्षेत्रसे दसगुना पुण्य देनेवाली है; किंतु जहाँ वे विन्ध्याचल पर्वतसे संयुक्त होती हैं, वहाँ कुरुक्षेत्रकी अपेक्षा सौगुना पुण्य होता है। काशीपुरीमें गङ्गाजीका माहात्म्य विन्ध्याचलकी अपेक्षा सौगुना बताया गया है। यों तो गङ्गाजी सर्वत्र ही दुर्लभ हैं, किंतु गङ्गाद्वार, प्रयाग और गङ्गासागर-संगम—इन तीन स्थानोंमें उनका माहात्म्य बहुत अधिक है। गङ्गाद्वारमें कुशावर्ततीर्थके भीतर स्नान करनेसे सात राजसूय और दो अश्वमेध-यज्ञोंका फल मिलता है। उस तीर्थमें पंद्रह दिन निवास करनेसे छः विश्वजित् यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। साथ ही विद्वानोंने वहाँ रहनेसे एक लाख गोदानका पुण्य बताया है। कुशावर्तमें भगवान् गोविन्दका और कनखलमें भगवान् रुद्रका दर्शन-पूजन करनेसे अथवा इन स्थानोंमें गङ्गा-स्नान करनेसे अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होती है। जहाँ पूर्वकालमें वाराहरूपधारी भगवान् विष्णु प्रकट हुए थे, वहाँ स्नान करके मनुष्य सौ अग्निहोत्रका, दो ज्योतिष्टोम यज्ञका और एक हजार अग्निष्टोम यज्ञोंका पुण्य-फल पाता है। वहीं ब्रह्मतीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष दस हजार ज्योतिष्टोम यज्ञोंका और तीन अश्वमेध-यज्ञोंका पुण्य प्राप्त करता है। मोहिनी! कुब्ज नामसे प्रसिद्ध जो पापनाशक तीर्थ है, वहाँ स्नान करनेसे सम्पूर्ण रोग और सब जन्मोंके पातक नष्ट हो जाते हैं। हरिद्वारक्षेत्रमें ही एक दूसरा तीर्थ है, जो कपिलतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। शुभे! उसमें स्नान करनेवाला मानव अस्सी हजार कपिला गौओंके दानके समान पुण्य-फल पाता है। गङ्गाद्वार, कुशावर्त, बिल्वक, नीलपर्वत तथा कनखल-तीर्थमें स्नान करके मनुष्य पापरहित हो स्वर्गलोकमें जाता है। तदनन्तर पवित्र नामक तीर्थ है, जो सब तीर्थोंमें परम उत्तम है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य दो विश्वजित् यज्ञोंका पुण्य पाता है। तदनन्तर वेणीराज्य नामक तीर्थ है, जहाँ महापुण्यमयी सरयू उत्तम पुण्यस्वरूपा गङ्गासे इस प्रकार मिली हैं, जैसे एक बहिन अपनी दूसरी बहिनसे मिलती है। भगवान् विष्णुके दाहिने चरणारविन्दके पखारनेसे देवनदी गङ्गा प्रकट हुई हैं और बायें चरणसे मानस-नन्दिनी सरयूका प्रादुर्भाव हुआ है। उस तीर्थमें भगवान् शिव और विष्णुकी पूजा करनेवाला पुरुष विष्णुस्वरूप हो जाता है। वहाँका स्नान पाँच अश्वमेध-यज्ञोंका फल देनेवाला बताया गया है। तत्पश्चात् गाण्डवतीर्थ है, जहाँ गङ्गासे गण्डकी नदी मिली है। वहाँका स्नान और एक हजार गौओंका दान दोनों बराबर हैं। तदनन्तर रामतीर्थ है, जिसके समीप पुण्यमय वैकुण्ठ है। तत्पश्चात् परम पवित्र सोमतीर्थ है, जहाँ नकुल मुनि भगवान् शिवकी पूजा करके उनका ध्यान करते हुए गणस्वरूप हो गये। उसके बाद चम्पक नामक पुण्य तीर्थ है, जहाँ गङ्गाकी धारा उत्तर दिशाकी ओर बहती है। उसे मणिकर्णिकाके समान महापातकोंका नाश करनेवाला बताया गया है। तदनन्तर कलश-तीर्थ है, जहाँ कलशसे मुनिवर अगस्त्य प्रकट हुए थे। वहीं भगवान् रुद्रकी आराधना करके वे श्रेष्ठ मुनीश्वर हो गये। इसके बाद परम पुण्यमय सोमद्वीप-तीर्थ है, जिसका महत्त्व काशीपुरीके समान है। वहाँ भगवान् शङ्करकी आराधना करनेवाले चन्द्रमाको भगवान् रुद्रने सिरपर धारण किया था। वहीं विश्वामित्रकी भगिनी

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गङ्गामें मिली हैं। उसमें गोता लगानेवाला मनुष्य इन्द्रका प्रिय अतिथि होता है। मोहिनी ! जह्नुकुण्ड नामक महातीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य निश्चय ही अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धारक होता है। शुभगे ! तदनन्तर अदिति-तीर्थ है, जहाँ अदितिने कश्यपसे भगवान् विष्णुको वामनरूपमें प्राप्त किया था। वहाँ किये जानेवाले स्नानका फल महान् अभ्युदय बताया गया है। तत्पश्चात् शिलोच्चय नामक महातीर्थ है, जहाँ तपस्या करके समस्त प्रजा तृण आदिके साथ स्वर्गको चली जाती है; क्योंकि वह स्थान अनेक तीर्थोंका आश्रय है। तदनन्तर इन्द्राणी नामक तीर्थ है, जहाँ | इन्द्राणीने तपस्या करके इन्द्रको पतिरूपमें प्राप्त किया था। यह स्थान प्रयागके तुल्य सेवन करने योग्य है। उसके बाद पुण्यदायक स्नात तीर्थ है, जहाँ क्षत्रिय विश्वामित्रने तपस्या करके तीर्थ-सेवनके प्रभावसे ब्रह्मर्षिपदको प्राप्त किया था। तत्पश्चात् प्रद्युम्न-तीर्थ है, जो तपस्याके लिये प्रसिद्ध है। वहाँ कामदेव तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णके प्रद्युम्न नामक पुत्र हुए। उस तीर्थमें स्नान करनेसे महान् अभ्युदयकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर दक्षप्रयाग है, जहाँ गङ्गासे यमुना मिली हैं। वहाँ स्नान करनेसे प्रयागकी ही भाँति अक्षय पुण्य होता है।

गङ्गाजीके तटपर किये जानेवाले स्नान, तर्पण, पूजन तथा विविध प्रकारके दानोंकी महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं— राजपत्नी मोहिनी ! अब गङ्गाजीमें स्नान-तर्पण आदि कर्मोंका फल बतलाया जाता है। देवि ! यदि गङ्गाजीके तटपर संध्योपासना की जाय तो द्विजोंको पवित्र करनेवाली गायत्रीदेवी किसी साधारण स्थानकी अपेक्षा वहाँ लाख गुना पुण्य प्रकट करनेमें समर्थ होती हैं। मोहिनी ! यदि पुत्रगण श्रद्धापूर्वक गङ्गाजीमें पितरोंको जलाञ्जलि दें तो वे उन्हें अक्षय तथा दुर्लभ तृप्ति प्रदान करते हैं। गङ्गाजीमें तर्पण करते समय मनुष्य जितने तिल हाथमें लेता है, उतने सहस्र वर्षोंतक पितृगण स्वर्गवासी होते हैं। सब लोगोंके जो कोई भी पितर पितृलोकमें विद्यमान हैं, वे गङ्गाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं। शुभानने ! जो जन्मकी सफलता अथवा संतति चाहता है, वह गङ्गाजीके समीप जाकर देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे। जो मनुष्य मृत्युको प्राप्त होकर दुर्गतिमें पड़े हैं, वे अपने वंशजोंद्वारा कुश, तिल और गङ्गाजलसे तृप्त किये जानेपर वैकुण्ठधाममें चले जाते हैं। जो | कोई पुण्यात्मा पितर स्वर्गलोकमें निवास करते हैं, उनके लिये यदि गङ्गाजलसे तर्पण किया जाय तो वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। जो मनुष्य गङ्गाजीमें स्नान करके प्रतिदिन शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह निश्चय ही एक ही जन्ममें मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अग्निहोत्र, वेद तथा बहुत दक्षिणावाले यज्ञ भी गङ्गाजीपर शिवलिङ्ग-पूजाके करोड़वें अंशके बराबर भी नहीं हैं। जो पितरों अथवा देवताओंके उद्देश्यसे गङ्गाजलद्वारा अभिषेक करता है, उसके नरकनिवासी पितर भी तत्काल तृप्त हो जाते हैं। मिट्टीके घड़ेकी अपेक्षा ताँबेके घड़ेसे किया हुआ स्नान दसगुना उत्तम माना गया है। इसी प्रकार अर्घ्य, नैवेद्य, बलि और पूजा आदिमें भी क्रमशः समझने चाहिये। उत्तरोत्तर पात्रमें विशेषता होनेके कारण फलमें भी विशेषता होती है। जो धन होते हुए भी मोहवश विस्तृत विधिका पालन नहीं करता, वह उस कर्मके फलका भागी नहीं होता।<br><br>देवताओंका दर्शन पुण्यमय होता है। दर्शनसे

\ उत्तरभाग \

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स्पर्श उत्तम है। स्पर्शसे पूजन श्रेष्ठ है और पूजनमें भी घृतके द्वारा कराया हुआ देवताका स्नान परम उत्तम माना गया है। गङ्गाजलसे जो स्नान कराया जाता है, उसे विद्वान् पुरुष घृतस्नानके ही तुल्य कहते हैं। जो ताँबेके पात्रमें मगधदेशीय मापके अनुसार एक प्रस्थ गङ्गाजल रखकर उसमें दूसरे-दूसरे विशेष द्रव्य मिलाकर उस मिश्रित जलके द्वारा अपने पितरोंसहित देवताओंको एक बार भी अर्घ्य देता है, वह पुत्र-पौत्रोंके साथ स्वर्गलोकको जाता है। जल, क्षीर, कुशाग्र, घृत, दधि, मधु, लाल कनेरके फूल तथा लाल चन्दन—इन आठ अङ्गोंसे युक्त अर्घ्य सूर्यके लिये देनेयोग्य कहा गया है। जो श्रेष्ठ मानव गङ्गाजीके तटपर भगवान् विष्णु, शिव, सूर्य, दुर्गा तथा ब्रह्माजीकी स्थापना करता है और अपनी शक्तिके अनुसार उनके लिये मन्दिर बनवाता है, उसे अन्य तीर्थोंमें यह सब करनेकी अपेक्षा गङ्गाजीके तटपर कोटि-कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन गङ्गाजीके तटकी मिट्टीसे यथाशक्ति उत्तम लक्षणयुक्त शिवलिङ्ग बनाकर उनकी प्रतिष्ठा करके मन्त्र तथा पत्र-पुष्प आदिसे यथासाध्य पूजा करता और अन्तमें विसर्जन करके उन्हें गङ्गामें ही डाल देता है, उसे अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। जो नरश्रेष्ठ सर्वानन्ददायिनी गङ्गाजीमें स्नान करके भक्तिपूर्वक ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करता है, मुक्ति उसके हाथमें ही आ जाती है। जो नियमपूर्वक छः मासतक गङ्गाजीमें ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्रका जप करता है, उसके पास सब सिद्धियाँ उपस्थित हो जाती हैं। जो गङ्गाजीके समीप प्रणवसहित ‘नमः शिवाय’ मन्त्रका विधिपूर्वक चौबीस लाख जप करता है, वह साक्षात् शङ्कर (-के समान) है। ‘नमः शिवाय’—यह पञ्चाक्षरी मन्त्र सिद्ध-विद्या है। उसको जपनेवाला साक्षात् शिव (-के समान) ही है, इसमें संशय नहीं है। ‘अपवित्रः पवित्रो वा*’—इस मन्त्रका जप करनेवाला पुरुष पातकरहित हो जाता है। गङ्गाजीके पूजित होनेपर सब देवताओंकी पूजा हो जाती है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके देवनदी गङ्गाकी पूजा करनी चाहिये। गङ्गाजीके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं। वे सम्पूर्ण अङ्गोंसे सुशोभित होती हैं। उनके एक हाथमें रत्नमय कलश, दूसरेमें श्वेत कमल, तीसरेमें वर और चौथेमें अभय है। वे शुभ-स्वरूपा हैं।

उनके श्रीअङ्गोंपर श्वेत वस्त्र सुशोभित होता है। मोती और मणियोंके हार उनके आभूषण हैं। उनका मुख परम सुन्दर है। वे सदा प्रसन्न रहती हैं। उनका हृदय-कमल करुणारससे सदा आर्द्र बना रहता है। उन्होंने वसुधापर सुधाधारा बहा रखी है। तीनों लोक सदा उनके चरणोंमें नमस्कार करते हैं। इस प्रकार जलमयी गङ्गाका ध्यान


* अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥

६६४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


करके उनकी पूजा करनेवाला पुरुष पुण्यका भागी होता है। जो इस प्रकार पंद्रह दिन भी निरन्तर पूजा करता है, वही देवताओंके समान हो जाता है और दीर्घकालतक पूजा करनेसे फलमें भी अधिकता होती है। पूर्वकालमें राजा जह्नुने वैशाख शुक्ला सप्तमीको क्रोधपूर्वक गङ्गाजीको पी लिया था और फिर अपने कानके दाहिने छिद्रसे उन्हें निकाल दिया। शुभानने ! उस स्थानपर आकाशकी मेखलारूप गङ्गाजीका पूजन करना चाहिये। वैशाख मासकी अक्षय-तृतीयाको तथा कार्तिकमें भी रातको जागरण करते हुए जौ और तिलसे भक्तिभावपूर्वक विष्णु, गङ्गा और शिवकी पूजा करनी चाहिये। उक्त सामग्रियोंके सिवा उत्तम गन्ध, पुष्प, कुंकुम, अगरु, चन्दन, तुलसीदल, बिल्वपत्र, बिजौरा नींबू आदि, धूप, दीप और नैवेद्यसे वैभव-विस्तारके अनुसार पूजा करनी उचित है। गङ्गाजीके तटपर किया हुआ यज्ञ, दान, तप, जप, श्राद्ध और देवपूजा आदि सब कर्म कोटि-कोटिगुना फल देनेवाला होता है। जो अक्षय-तृतीयाको गङ्गाजीके तटपर विधिपूर्वक घृतमयी धेनुका दान करता है, वह पुरुष सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न हो हंसभूषित सुवर्ण-रत्नमय विचित्र विमानपर बैठकर अपने पितरोंके साथ कोटिसहस्र एवं कोटिशत कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इसी प्रकार जो (कभी) गङ्गातटपर शास्त्रीय विधिसे गोदान करता है, वह उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। यदि गङ्गातटपर वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक कपिला गौका दान दिया जाय तो वह गौ नरकमें पड़े हुए सम्पूर्ण पितरोंको तत्काल स्वर्ग पहुँचा देती है। जो गङ्गातटपर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यभगवान्‌की प्रीतिके लिये ब्राह्मणोंको ग्रामदान करता है, उसे सम्पूर्ण दानोंका जो पुण्य है, समस्त यज्ञोंका जो फल है तथा सब प्रकारके तप, व्रत और पुण्यकर्मोंका जो फल बताया गया है, वह सहस्रगुना होकर मिलता है। उस दानके प्रभावसे दाता पुरुष करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी विमानपर बैठकर अपनी रुचिके अनुसार श्रीविष्णुधाममें अथवा श्रीशिवधाममें प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा-विहार करता है। देवता उसकी स्तुति करते रहते हैं। देवि ! जो अक्षयतृतीयाके दिन गङ्गातटपर श्रेष्ठ ब्राह्मणको सोलह माशा सुवर्ण दान करता है, वह भी दिव्यलोकोंमें पूजित होता है। अन्नदान करनेसे विष्णुलोककी और तिलदानसे शिवलोककी प्राप्ति होती है। रत्नदानसे ब्रह्मलोक, गोदान और सुवर्णदानसे इन्द्रलोक तथा सुवर्णसहित वस्त्रदानसे गन्धर्वलोककी प्राप्ति होती है। विद्यादानसे मुक्तिदायक ज्ञान पाकर मनुष्य निरञ्जन ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।


एक वर्षतक गङ्गार्चन-व्रतका विधान और माहात्म्य, गङ्गातटपर नक्तव्रत करके भगवान् शिवका पूजन, प्रत्येक मासकी पूर्णिमा और अमावास्याको शिवाराधन तथा गङ्गा-दशहराके पुण्य-कृत्य एवं उनका माहात्म्य

**पुरोहित वसु बोले—**मोहिनि ! एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये। दिव्यस्वरूपा गङ्गादेवीका ध्यान करके एक सेर अगहनीके चावलको दो सेर दूधमें पकाकर खीर तैयार करावे, उसमें मधु और घी मिला दे, वे दोनों पृथक्-पृथक् एक-एक तोला होने चाहिये। तदनन्तर भक्तिभावसे परिपूर्ण हो खीर, पूआ, लड्डू, मण्डल, आधा गुंजा सुवर्ण, कुछ चाँदी, चन्दन, अगरु, कर्पूर, कुंकुम, गुग्गुल, बिल्वपत्र, दूर्वा, रोचना, श्वेत चन्दन, नील कमल तथा

उत्तरभाग ६६५

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अन्यान्य सुगन्धित पुष्प यथाशक्ति गङ्गाजीमें छोड़े और अत्यन्त भक्तिभावसे निम्नाङ्कित पौराणिक मन्त्रोंका उच्चारण करता रहे—'ॐ गङ्गायै नमः, ॐ नारायण्यै नमः, ॐ शिवायै नमः।' मोहिनी! प्रत्येक मासकी पूर्णिमा और अमावास्याको प्रातः-काल एकाग्रचित्त हो इसी विधिसे गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य एक वर्षतक हविष्यभोजी, मिताहारी तथा ब्रह्मचारी रहकर दिनमें अथवा रात्रिके समय नियमपूर्वक भक्ति और प्रसन्नताके साथ यथाशक्ति गङ्गाजीकी पूजा करता है, उसे वर्षके अन्तमें ये गङ्गादेवी दिव्य शरीर धारण करके दिव्य माला, दिव्य वस्त्र तथा दिव्य रत्नोंसे विभूषित हो प्रत्यक्ष दर्शन देती हैं और वर देनेके लिये उसके सामने खड़ी हो जाती हैं। शुभे! इस प्रकार दिव्य देहधारिणी प्रत्यक्षरूपा गङ्गाजीका अपने नेत्रोंसे दर्शन करके मनुष्य कृतकृत्य होता है। वह मानव जिन-जिन भोगोंकी कामना करता है, उन सबको प्राप्त कर लेता है और जो ब्राह्मण निष्कामभावसे गङ्गाकी आराधना करता है, वह उसी जन्ममें मोक्ष पा जाता है। गङ्गाजीके पूजनका यह सांवत्सरव्रत भगवान् लक्ष्मीपतिको संतुष्ट करनेवाला एवं मोक्ष देनेवाला है।

**वसिष्ठजी कहते हैं—**राजेन्द्र! वसुका यह गङ्गामाहात्म्यसूचक वचन सुनकर मोहिनीने पुनः अपने पुरोहित विप्रवर वसुसे पूछा।

**मोहिनी बोली—**ब्रह्मन्! गङ्गाजीके तटपर गङ्गा आदिके स्थापन और पूजनका क्या फल है? मुझ अबलाको गङ्गाजीके माहात्म्यसे युक्त देवाराधनकी विधि बताइये, जिसे सुनकर पापसे छुटकारा मिल जाता है।

**पुरोहित वसु बोले—**देवि! तुमने सब लोकोंके हितकी कामनासे बहुत उत्तम बात पूछी है। गङ्गाजीका सम्पूर्ण माहात्म्य बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें वृषभध्वज भगवान् शिवने कृपापूर्वक इसका वर्णन किया था। देवी पार्वतीने प्रेमपूर्वक उनसे प्रश्न किया था और उन्होंने गङ्गाजीके तटपर बैठकर गङ्गाजीका माहात्म्य उन्हें सुनाया था। देवताओंने पूर्वाह्नकालमें, ऋषियोंने मध्याह्नकालमें, पितरोंने अपराह्नकालमें तथा गुह्यक आदिने रात्रिके प्रथम भागमें भोजन किया है। इन सब वेलाओंका उल्लंघन करके रातमें भोजन करना उत्तम है। अतः नक्तव्रतका आचरण करना चाहिये। रातको भोजन करनेवाले नक्त-व्रतीको ये छः कर्म अवश्य करने चाहिये—स्नान, हविष्य-भोजन, सत्यभाषण, स्वल्पाहार, अग्निहोत्र तथा भूमिशयन। जो कोई भी साधक हो, वह माघ मासमें गङ्गातटपर शिव-मन्दिरके समीप रातमें घी मिलायी हुई खिचड़ी भोजन करे। भोजन आरम्भ करनेसे पहले भगवान् शिवको खिचड़ीका ही नैवेद्य लगावे। काष्ठ-मौन होकर भोजन करे और जिह्वाकी लोलुपता त्याग दे। भगवान् शिवको स्मरण करके जितेन्द्रियभावसे पलाशके पत्तेमें नियमपूर्वक भोजन करे। धर्मराज तथा देवीके लिये पृथक्-पृथक् पिण्ड दे। दोनों पक्षोंकी चतुर्दशीको उपवास करे। पूर्णिमाके दिन गन्ध और गङ्गाजलसे तथा दूध, दही, घी, शहद (और शर्करा)-से भगवान् शिवको नहलाकर शिवलिङ्गके मस्तकपर धतूरका फूल चढ़ावे। तत्पश्चात् यथाशक्ति घीका पकाया हुआ पूआ निवेदन करे। फिर एक आढक तिल लेकर शिवलिङ्गके ऊपर चढ़ावे। नील तथा लाल कमलके फूलोंसे सर्वेश्वर शिवका पूजन करे। कमलका फूल न मिले तो सुवर्णमय कमलसे महादेवजीकी पूजा करे। मधुयुक्त खीरका भोग लगावे। घृतमिश्रित गुग्गुलका धूप दे। घीका दीपक जलावे। चन्दन आदिसे अनुलेपन करे। भक्तिपूर्वक महेश्वरको बिल्वपत्र और फल चढ़ावे। उनकी प्रसन्नताके लिये काले रंगकी गौ और काले रंगका बैल दान करे। उन गाय-बैलोंकी शक्ल-सूरत

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एक-सी होनी चाहिये। माघ मास व्यतीत होनेपर आठ ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे। ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक रहे। इस प्रकार यम-नियम, श्रद्धा और भक्तिसे युक्त होकर जो एक बार भी शास्त्रीय विधिसे इस व्रतका पालन करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोगोंको भोगता है और मृत्युके पश्चात् परम उत्तम गतिका भागी होता है।

वैशाख शुक्ला चतुर्दशीको एकाग्रचित्त होकर अगहनीके चावलका भात और दूध रातमें भोजन करे। पुष्प आदिसे भगवान् शिवकी पूजा करे। उन्हें भोज्य पदार्थ निवेदन करके काष्ठ-मौन होकर भोजन करे। उस दिन पवित्र हो मौन-भावसे बरगदकी लकड़ीद्वारा दन्तधावन करे। रातमें गङ्गातटपर शिवलिङ्गके समीप सोये। प्रातःकाल पूर्णिमाको विधिपूर्वक गङ्गामें स्नान करके उपवास-व्रतका संकल्प लेकर रातमें जागरण करे। शिवलिङ्गको घीसे नहलाकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिके द्वारा उनका पूजन करके एक सुन्दर वृषभको श्वेत पुष्प, वस्त्र, हल्दी और चन्दनसे अलंकृत करके विधिपूर्वक भगवान् शिवके लिये निवेदन करे। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति खीर भोजन करावे। इस प्रकार जो श्रद्धा और भक्तिके साथ एक बार भी उक्त नियमका पालन करता है, वह अन्तमें मुक्त हो जाता है।

ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें दशमी तिथिको हस्त नक्षत्रका योग होनेपर स्त्री हो या पुरुष, भक्तिभावसे गङ्गाजीके तटपर जाकर रात्रिमें जागरण करना चाहिये और दस प्रकारके फूलोंसे, दस प्रकारकी गन्धसे, दस तरहके नैवेद्योंसे तथा दस-दस ताम्बूल एवं दीप आदिसे श्रद्धापूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके पहले भक्तिपूर्वक शास्त्रोक्त विधिके अनुसार गङ्गाजीमें दस बार स्नान करके जलमें दस पसर काले तिल और घी छोड़ना चाहिये। इसी प्रकार सत्तू तथा गुड़के दस-दस पिण्ड भी गङ्गाजीके जलमें डालने चाहिये। तदनन्तर गङ्गाके रमणीय तटपर अपनी शक्तिके अनुसार सोने या चाँदीसे गङ्गाजीकी प्रतिमा निर्माण कराकर उसकी स्थापना करे। पहले भूमिपर कमल या स्वस्तिकका चिह्न बनाकर उसके ऊपर कलश स्थापित करे। कलशपर भी पद्म एवं स्वस्तिकका चिह्न होना चाहिये। उसके कण्ठमें वस्त्र और पुष्पहार लपेट देना चाहिये। कलशको गङ्गाजलसे भरकर उसमें अन्य आवश्यक पदार्थ छोड़े। उसके ऊपर पूर्णपात्र रखकर उसमें गङ्गाजीकी पूर्वोक्त प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। सुवर्ण आदिकी प्रतिमा न मिले तो मिट्टी आदिकी बनवानी चाहिये। इसकी भी शक्ति न हो तो आटासे पृथ्वीपर ही गङ्गाजीका स्वरूप अङ्कित करना चाहिये। उनका स्वरूप इस प्रकार है—गङ्गादेवीके चार भुजाएँ और सुन्दर नेत्र हैं। उनके श्रीअङ्गोंसे दस हजार चन्द्रमाओंके समान उज्ज्वल चाँदनी-सी छिटकती रहती है। दासियाँ उन्हें चवँर डुलाती हैं। मस्तकपर तना हुआ श्वेत छत्र उनकी शोभा बढ़ाता है। वे अत्यन्त प्रसन्न और वरदायिनी हैं। करुणासे उनका अन्तःकरण सदा द्रवीभूत रहता है। वे वसुधातपर सुधाधारा बहाती हैं। देवता आदि सदा उनकी स्तुति करते रहते हैं। वे दिव्य रत्नोंके आभूषण, दिव्य हार और दिव्य अनुलेपनसे विभूषित हैं। जलमें उनके उपर्युक्त स्वरूपका ध्यान करके प्रतिमामें उनकी विशेषरूपसे पूजा करनी चाहिये। प्रतिमाको पञ्चामृतसे स्नान कराना उत्तम है। प्रतिमाके आगे एक वेदी बनाकर उसको गोबरसे लीपे। उसपर भगवान् नारायण, शिव, ब्रह्मा, सूर्य, राजा भगीरथ तथा गिरिराज हिमालयकी स्थापना करके गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंसे यथाशक्ति उनकी पूजा करे; फिर दस ब्राह्मणोंको दस सेर तिल दे। इसी प्रकार दस सेर जौ दे और उनके साथ अलग-अलग दस पात्रोंमें

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गव्य (दही-घी आदि) भी दे। तत्पश्चात् पहलेसे तैयार करायी हुई मछली, कछुआ, मेढ़क, मगर आदि जलचर जीवोंकी यथाशक्ति सुवर्णमयी अथवा रजतमयी प्रतिमा स्थापित करके उनकी पूजा करे, वैसी प्रतिमा न मिलनेपर आटेकी प्रतिमा बनावे और मन्त्रज्ञ पुरुष पुष्प आदिसे पूर्वनिर्दिष्ट मन्त्रद्वारा ही उनकी पूजा करके उन्हें गङ्गाजीमें छोड़ दे। यदि अपने पास वैभव हो तो उस दिन गङ्गाजीकी रथयात्रा भी करावे। रथपर गङ्गाजीकी प्रतिमा या चित्र हो, उसका मुख उत्तर दिशाकी ओर रहे। रथपर भ्रमण करती हुई गङ्गाजीका दर्शन इस लोकमें पापी मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। इस प्रकार विधिपूर्वक रथयात्रा सम्पन्न करके मनुष्य आगे बताये जानेवाले दस प्रकारके पापोंसे तत्काल ही मुक्त हो जाता है। बिना दिये हुए किसीकी वस्तु ले लेना, हिंसा करना और परायी स्त्रीके साथ सम्बन्ध रखना—ये तीन प्रकारके शारीरिक पाप माने गये हैं। कठोरतापूर्ण वचन, असत्य, चुगली तथा अनाप-शनाप बातें बकना—ये चार प्रकारके वाचिक पाप कहे गये हैं। दूसरेका धन हड़पनेकी बात सोचना, मनसे किसीका अनिष्ट-चिन्तन करना और झूठा अभिनिवेश (मरण-भय)—ये तीन प्रकारके मानसिक पाप हैं। ये दस प्रकारके पाप करोड़ों जन्मोंद्वारा संचित हो तो भी पूर्वोक्त विधिसे रथयात्रा करनेवाला पुरुष उनसे मुक्त हो जाता है।

पूजाका मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ नमो दशहरायै नारायण्यै गङ्गायै नमः।' जो मनुष्य उस दिन रातमें और दिनमें भी उक्त मन्त्रका पाँच-पाँच हजार जप करता है, वह मनुके बताये हुए दस धर्मों* का फल प्राप्त करता है। आगे बताये जानेवाले स्तोत्रको विधिपूर्वक ग्रहण करके उस दिन गङ्गाजीके आगे उसका पाठ करे। फिर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। वह स्तोत्र इस प्रकार है—

ॐ शिवस्वरूपा गङ्गाको नमस्कार है। कल्याण प्रदान करनेवाली गङ्गाको नमस्कार है। विष्णुरूपिणी देवीको नमस्कार है। आप भगवती गङ्गाको बारंबार नमस्कार है। सम्पूर्ण देवता आपके स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूपभूत जल उत्तम औषध है, आपको नमस्कार है। आप समस्त जीवोंके सम्पूर्ण रोगोंका निवारण करनेके लिये श्रेष्ठ वैद्यके समान हैं, आपको नमस्कार है। आप स्थावर और जङ्गम जीवोंसे उत्पन्न होनेवाले विषका नाश करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। संसाररूपी विषका नाश करनेवाली जीवनदायिनी गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। आप आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंका निवारण करनेवाली एवं सबके प्राणोंकी अधीश्वरी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप शान्तिस्वरूपा तथा सबका संताप दूर करनेवाली हैं, सब कुछ आपका ही स्वरूप है, आपको नमस्कार है। सबको पूर्णतः शुद्ध करनेवाली और सब पापोंसे छुटकारा दिलानेवाली आपको नमस्कार है। आप भोग और मोक्ष देनेवाली भोगवती (नामक पातालगङ्गा) हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप ही मन्दाकिनी नामसे प्रसिद्ध आकाशगङ्गा हैं, आपको नमस्कार है। आप स्वर्ग देनेवाली हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। तीनों लोकोंमें मूर्तरूपसे प्रकट होनेवाली आप गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। शुक्लरूपसे स्थित होनेवाली आपको नमस्कार है। सबका क्षेम चाहनेवाली क्षेमवतीको


* श्रीमनुके बतलाये हुए दस धर्म ये हैं—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ (६। ९२)

'धैर्य, क्षमा, मनका निग्रह, चोरी न करना, बाहर-भीतरकी पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, सात्त्विक बुद्धि, अध्यात्मविद्या, सत्य और अक्रोध—ये दस धर्मके लक्षण हैं।'

६६८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


नमस्कार है, नमस्कार है। देवताओंके सिंहासनपर विराजमान होनेवाली तेजोमयी आप गङ्गादेवीको नमस्कार है। आप मन्द गति धारण करके 'मन्दा' और शिवलिङ्गका आधार होनेसे 'लिङ्गधारिणी' कहलाती हैं। भगवान् नारायणके चरणारविन्दोंसे प्रकट होनेके कारण आप 'नारायणी' कहलाती हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌को मित्र माननेवाली आप विश्वमित्राको नमस्कार है। रेवती नामसे प्रसिद्ध गङ्गाको नमस्कार है, नमस्कार है। आप बृहतीदेवीको नित्य नमस्कार है। लोकधात्रीको बारंबार नमस्कार है। विश्वमें प्रधान होनेसे आपका नाम विश्वमुख्या है, आपको नमस्कार है। जगत्‌को आनन्दित करनेके कारण नन्दिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। पृथ्वी¹, शिवामृता² और विरजा³ नामवाली गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। परावरगता⁴, आद्या⁵ एवं तारा⁶ नामवाली आपको नमस्कार है, नमस्कार है। स्वर्गमें विराजमान गङ्गादेवी ! आपको नमस्कार है। आप सबसे अभिन्न हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप शान्त-स्वरूपा, प्रतिष्ठा (आधारस्वरूपा) तथा वरदायिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप उग्रा⁷, मुखजल्पा⁸ और संजीवनी⁹ हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आपकी ब्रह्मलोकतक पहुँच है। आप ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाली तथा पापनाशिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश करनेवाली जगन्माता गङ्गाको नमस्कार है, नमस्कार है। देवि ! आप जल-बिन्दुओंकी राशि हैं, दुर्गम संकटका नाश करनेवाली तथा जगत्‌के उद्धारमें दक्ष हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विपत्तियोंका विरोध करनेवाली मङ्गलमयी गङ्गादेवीको नमस्कार है, नमस्कार है। पर और अपर सब आपके ही स्वरूप हैं, आप ही पराशक्ति हैं, मोक्षदायिनी देवि ! आपको सदा नमस्कार है। गङ्गा मेरे आगे रहें, गङ्गा मेरे दोनों पार्श्वमें रहें, गङ्गा मेरे चारों ओर रहें और हे गङ्गे ! आपमें ही मेरी स्थिति हो। पृथ्वीपर प्राप्त हुई शिवस्वरूपा देवि ! आदि, मध्य और अन्तमें आप ही हैं। आप सर्वस्वरूपा हैं। आप ही मूल प्रकृति हैं। आप ही सर्वसमर्थ नर-नारायण हैं। गङ्गे ! आप ही परमात्मा और आप ही शिव हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है¹⁰।


१. पृथ्वीपर स्थित होने अथवा पृथुल जलराशि धारण करनेके कारण गङ्गाजीका नाम 'पृथ्वी' है। भगवदीय शक्ति होनेसे गङ्गा और पृथ्वीमें अभेद भी है।
२. शिव (कल्याणमय) हैं अमृत (जल) जिनका, वे गङ्गाजी 'शिवामृता' हैं, शिवस्वरूपा और अमृतस्वरूपा होनेके कारण उनका यह नाम सार्थक है।
३. रजोगुणरहित, निर्मलस्वरूप होनेके कारण गङ्गाजीको 'विरजा' कहते हैं। गोलोकस्थित विरजासे अभिन्न होनेके कारण भी इनका नाम 'विरजा' है।
४. पर (ऊपर स्वर्गलोक) और अवर (नीचे पाताललोक)-में स्थित।
५. आदिशक्तिस्वरूपा।
६. सबको संसार-सागरसे तारनेवाली अथवा 'तारा' नामक शक्तिसे अभिन्न।
७. पाप-समुदायके लिये भयंकर।
८. अपने स्रोतरूप मुखसे निरन्तर कलकल शब्द करनेवाली।
९. सेवकोंको जन्म-मृत्युसे छुड़ाकर नूतन अमृतमय जीवन प्रदान करनेवाली।
१०. ॐ नमः शिवायै गङ्गायै शिवदायै नमोऽस्तु ते। नमोऽस्तु विष्णुरूपिण्यै गङ्गायै ते नमो नमः॥
सर्वदेवस्वरूपिण्यै नमो भेषजमूर्तये। सर्वस्य सर्वव्याधीनां भिषक्श्रेष्ठे नमोऽस्तु ते॥
स्थाणुजङ्गमसम्भूतविषहन्त्रि नमोऽस्तु ते। संसारविषनाशिन्यै जीवनायै नमो नमः॥

उत्तरभाग ६६१

  • उत्तरभाग * ६६१
जो प्रतिदिन भक्तिभावसे इस स्तोत्रका पाठ करता है अथवा जो श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, वह मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले पूर्वोक्त दस पापों तथा सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त हो जाता है। रोगी रोगसे और विपत्तिका मारा पुरुष विपत्तिसे छुटकारा पा जाता है। शत्रुओंसे, बन्धनसे तथा सब प्रकारके भयसे भी वह मुक्त हो जाता है। इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता है और मृत्युके पश्चात् परब्रह्म परमात्मामें लीन हो जाता है। जिसके घरमें इस स्तोत्रको लिखकर इसकी पूजा की जाती है, वहाँ आग और चोरका भय नहीं है। वहाँ पापसे भी भय नहीं होता। ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको गङ्गाजीके जलमें खड़ा होकर जो इस स्तोत्रका दस बार जप या पाठ करता है, वह दरिद्र अथवा असमर्थ होनेपर भी वही फल पाता है, जो पूर्वोक्त विधिसे भक्तिपूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनेसे प्राप्त होने योग्य बताया गया है। जैसी गौरी देवीकी महिमा है, वैसी ही गङ्गा देवीकी भी है, अतः गौरीके पूजनमें जो विधिकही गयी है, वही गङ्गाजीके पूजनके लिये भी उत्तम विधि है। जैसे भगवान् शिव हैं, वैसे ही भगवान् विष्णु हैं, जैसे भगवान् विष्णु हैं, वैसी ही भगवती उमा हैं और जैसी भगवती उमा हैं, वैसी ही गङ्गाजी हैं—इनमें कोई भेद नहीं है। जो भगवान् विष्णु और शिवमें, गङ्गा और गौरीमें तथा लक्ष्मी और पार्वतीमें भेद मानता है, वह मूढ़बुद्धि है। उत्तरायणमें किसी उत्तम मासका शुक्लपक्ष हो, दिनका समय हो और गङ्गाजीके तटकी भूमि हो, साथ ही हृदयमें भगवान् जनार्दनका चिन्तन हो रहा हो—ऐसी अवस्थामें जो शरीरका त्याग करते हैं, वे धन्य हैं*। विघ्ननन्दिनी! जो मनुष्य गङ्गामें प्राणत्याग करते हैं, वे देवताओंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए विष्णुलोकको जाते हैं। जो मनुष्य गङ्गाके तटपर आमरण उपवासका व्रत लेकर मर जाता है, वह निश्चय ही अपने पितरोंके साथ परमधामको प्राप्त होता है। गङ्गाजीमें मृत्युके लिये दो योजन दूरकी भूमि और समीपका स्थान दोनों समान हैं। जो मनुष्य गङ्गामें मर जाता है,

तापत्रितयहन्त्र्यै च प्राणेश्र्वर्यै नमो नमः। शान्त्यै संतापहारिण्यै नमस्ते सर्वमूर्तये॥
सर्वसंशुद्धिकारिण्यै नमः पापविमुक्तये। भुक्तिमुक्तिप्रदायिन्यै भोगवत्यै नमो नमः॥
मन्दाकिन्यै नमस्तेऽस्तु स्वर्गदायै नमो नमः। नमस्त्रैलोक्यमूर्तायै त्रिदशायै नमो नमः॥
नमस्ते शुक्लसंस्थायै क्षेमवत्यै नमो नमः। त्रिदशासनसंस्थायै तेजोवत्यै नमोऽस्तु ते॥
मन्दायै लिङ्गधारिण्यै नारायण्यै नमो नमः। नमस्ते विश्वमित्रायै रेवत्यै ते नमो नमः॥
बृहत्यै ते नमो नित्यं लोकधात्र्यै नमो नमः। नमस्ते विश्वमुख्यायै नन्दिन्यै ते नमो नमः॥
पृथ्व्यै शिवामृतायै च विरजायै नमो नमः। परावरगताद्यायै तारायै ते नमो नमः॥
नमस्ते स्वर्गसंस्थायै अभिन्नायै नमो नमः। शान्तायै ते प्रतिष्ठायै वरदायै नमो नमः॥
उग्रायै मुखजल्पायै संजीवन्यै नमो नमः। ब्रह्मगायै ब्रह्मदायै दुरितघ्न्यै नमो नमः॥
प्रणतार्तिप्रभञ्जिन्यै जगन्मात्रे नमो नमः। विप्लुषायै दुर्गहन्त्र्यै दक्षायै ते नमो नमः॥
सर्वापत्प्रतिपक्षायै मङ्गलायै नमो नमः।
परापरे परे तुभ्यं नमो मोक्षप्रदे सदा। गङ्गा ममाग्रतो भूयाद् गङ्गा मे पार्श्वयोस्तथा॥
गङ्गा मे सर्वतो भूयात्त्वयि गङ्गेऽस्तु मे स्थितिः। आदौ त्वमन्ते मध्ये च सर्वा त्वं गाङ्गते शिवे॥
त्वमेव मूलप्रकृतिस्त्वं हि नारायणः प्रभुः। गङ्गे त्वं परमात्मा च शिवस्तुभ्यं नमो नमः॥
(ना० उत्तर० ४३।६९-८४)

* शुक्लपक्षे दिवा भूमौ गङ्गायामुत्तरायणे। धन्या देहं विमुञ्चन्ति हृदयस्थे जनार्दने॥
(ना० उत्तर० ४३। ९४)

६७० * संक्षिप्त नारदपुराण *


वह स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त होता है। जो मानव प्राण-त्यागके समय गङ्गाका स्मरण अथवा गङ्गाजलका स्पर्श करता है, वह पापी होनेपर भी परमगतिको प्राप्त होता है। जिन धीर पुरुषोंने गङ्गाजीके समीप जाकर अपने शरीरका त्याग किया है, वे देवताओंके समान हो गये। इसलिये मुक्ति देनेवाले दूसरे सब साधनोंको छोड़कर देहपातपर्यन्त गङ्गाजीका ही सेवन करे। जो महान् पापी होकर भी गङ्गाके समीपवर्ती आकाशमें, गङ्गातटकी भूमिपर अथवा गङ्गाजीके जलमें मरा है, वह ब्रह्मा, विष्णु और शिवके द्वारा पूजनीय अक्षयपदको प्राप्त कर लेता है। जो धर्मात्मा, पवित्र एवं साधुसम्मत प्राणधारी मनुष्य मन-ही-मन गङ्गाजीका चिन्तन करता है, वह परम गतिको प्राप्त कर लेता है। कोई कहीं भी मर रहा हो, परंतु मृत्युकाल उपस्थित होनेपर यदि वह गङ्गाजीका स्मरण करता है, तो वह शिवलोक अथवा विष्णुधामको जाता है। भगवान् शङ्करके अत्यन्त कर्कश जटाकलापसे निकलकर पापी सगर-पुत्रोंके शरीरकी राखको बहाकर गङ्गाजीने उन्हें स्वर्गलोक पहुँचाया था। पुरुषके शरीरकी जितनी हड्डियाँ गङ्गाजीमें मौजूद रहती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। मनुष्यकी हड्डी जब गङ्गाजीके जलमें ले जाकर छोड़ी जाती है, उसी समयसे प्रारम्भ करके उसकी स्वर्गलोकमें स्थित होती है। जिस पुण्यकर्मा पुरुषकी हड्डी गङ्गाजीके जलमें पहुँचायी जाती है, उसकी ब्रह्मलोकसे किसी प्रकार पुनरावृत्ति नहीं होती। जिस मृतक पुरुषकी हड्डी दशाहाके भीतर गङ्गाजीके जलमें पड़ जाती है, उसे गङ्गामें मरनेका जैसा फल बताया गया है, उसी फलकी प्राप्ति होती है। अतः स्नान करके पञ्चगव्य छिड़ककर सुवर्ण, मधु, घी और तिलके साथ उस अस्थि-पिण्डको दोनेमें रख ले और प्रेतगणोंसे युक्त दक्षिण दिशाकी ओर देखते हुए 'नमोऽस्तु धर्माय' (धर्मराजको नमस्कार है) ऐसा कहकर जलमें प्रवेश करे और 'धर्मराज मुझपर प्रसन्न हों' ऐसा कहकर उस हड्डीको जलमें फेंक दे। तदनन्तर स्नान करके तीर्थवासी अक्षयवटका दर्शन करे और ब्राह्मणको दक्षिणा दे। ऐसा करनेपर यमलोकमें स्थित हुए पुरुषका स्वर्गलोकमें गमन होता है और वहाँ उसे देवराज इन्द्रके समान प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। गङ्गाजीकी बहती हुई मुख्य धारासे लेकर चार हाथतकका जो भाग है, उसके स्वामी भगवान् नारायण हैं। प्राण कण्ठतक आ जायँ तो भी उसमें प्रतिग्रह स्वीकार न करे। भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशीको गङ्गाजीका जल जहाँतक बढ़ जाता है, वहाँतककी भूमिको उनका गर्भ जानना चाहिये। उससे दूरका स्थान 'तीर' कहलाता है। साधारण स्थितिमें जहाँतक जल रहता है, उससे डेढ़ सौ हाथ दूरतक गर्भकी सीमा है। उससे परेका भू-भाग तट है। देवि! किन्हीं विद्वानोंका ऐसा ही मत है तथा यह श्रुतियों और स्मृतियोंको भी अभिमत है। तीरसे दो-दो कोस दोनों ओरका स्थान 'क्षेत्र' कहलाता

उत्तरभाग ६७१

  • उत्तरभाग * ६७१

है। तीरको छोड़कर क्षेत्रमें वास करना चाहिये; क्योंकि तीरपर निवास अभीष्ट नहीं है। दोनों तटोंसे एक योजन विस्तृत भू-भाग क्षेत्रकी सीमा माना गया है। जितने पाप हैं, वे सब-के-सब गङ्गाजीकी सीमा नहीं लाँघते। वे गङ्गाको देखकर उसी प्रकार दूर भागते हैं, जैसे सिंहको देखकर वनमें रहनेवाले दूसरे जीव। महाभागे! जहाँ गङ्गा हैं, जहाँ श्रीराम और श्रीशिवका तपोवन है, उसके चारों ओर तीन योजनतक सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये। तीर्थमें कभी दान न ले। पवित्र देव-मन्दिरोंमें भी प्रतिग्रह न ले तथा ग्रहण आदि सभी निमित्तोंमें मनुष्य प्रतिग्रहसे अलग रहे। जो तीर्थमें दान लेता है तथा पुण्यमय देवमन्दिरोंमें भी प्रतिग्रह स्वीकार करता है, उसके पास जबतक प्रतिग्रहका धन है, तबतक उसका तीर्थ-व्रत निष्फल कहा जाता है। देवि! गङ्गाजीमें दान लेना मानो गङ्गाको बेचना है। गङ्गाके विक्रयसे भगवान् विष्णुका विक्रय हो जाता है और भगवान् विष्णुका विक्रय होनेपर तीनों लोकोंका विक्रय हो जाता है। जो गङ्गाजीके तीरकी मिट्टी लेकर अपने मस्तकपर धारण करता है, वह केवल तम (अन्धकार, अज्ञान एवं तमोगुण)-का नाश करनेके लिये मानो सूर्यका स्वरूप धारण करता है। जो मनुष्य गङ्गाजीके तटकी धूलि फैलाकर उसके ऊपर पितरोंके लिये पिण्ड देता है, वह अपने पितरोंको तृप्त करके स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। भद्रे! इस प्रकार मैंने तुम्हें गङ्गाका उत्तम माहात्म्य बताया है। जो मनुष्य इसको पढ़ता अथवा सुनता है, वह भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। विधिनन्दिनि! जो भगवान् विष्णु अथवा शिवका लोक प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन पवित्रचित्त हो श्रद्धा और भक्तिके साथ इस गङ्गा-माहात्म्यका पाठ करना चाहिये।


गयातीर्थकी महिमा

वसिष्ठजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर पापनाशिनी गङ्गाका यह उत्तम माहात्म्य सुनकर मोहिनीने पुनः अपने पुरोहितसे पूछा।

मोहिनी बोली— भगवन्! आपने मुझे गङ्गाका पुण्यमय आख्यान (माहात्म्य) सुनाया है। अब मैं यह सुनना चाहती हूँ कि संसारमें गयातीर्थ कैसे विख्यात हुआ?

पुरोहित वसुने कहा— गया पितृतीर्थ है। उसे सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ माना गया है, जहाँ देवदेवेश्वर पितामह ब्रह्माजी स्वयं निवास करते हैं। जहाँ याग (श्राद्ध)-की अभिलाषा रखनेवाले पितरोंने यह गाथा गायी है—'बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे एक भी तो गया जायगा अथवा अश्वमेध-यज्ञ करेगा या नीलवृषभका उत्सर्ग करेगा।' देवि! गयाका उत्तम माहात्म्य सारसे भी सारतर वस्तु है। मैं उसका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। सुनो, पूर्वकालकी बात है। गयासुर नामसे प्रसिद्ध एक असुर हुआ था, जो बड़ा पराक्रमी था। उसने बड़ा भयंकर तप किया, जो सम्पूर्ण भूतोंको पीड़ित करनेवाला था। उसकी तपस्यासे संतप्त हुए देवता लोग उसके वधके लिये भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। तब भगवान्ने उसको गदासे मार दिया। अतः गदाधर भगवान् विष्णु ही गयातीर्थमें मुक्तिदाता माने गये हैं। भगवान् विष्णुने इस तीर्थकी मर्यादा स्थापित की। जो मनुष्य यहाँ यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान एवं स्नानादि कर्म करता है, वह स्वर्ग अथवा ब्रह्मलोकमें जाता है। गयातीर्थको उत्तम जानकर ब्रह्माजीने वहाँ यज्ञ किया तथा उन्होंने वहाँ सरस्वती नदीकी भी सृष्टि की और समस्त दिशाओंमें व्याप्त होकर उस तीर्थमें निवास

६७२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

किया। तदनन्तर ब्राह्मणोंके प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजीने वहाँ अनेक तीर्थ निर्माण किये और कहा—ब्राह्मणो! गयामें श्राद्ध करनेसे पवित्र हुए लोग ब्रह्मलोकगामी होंगे और जो लोग तुम्हारा पूजन और सत्कार करेंगे, उनके द्वारा सदा मैं पूजित होऊँगा। ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशालामें प्राप्त होनेवाली मृत्यु तथा कुरुक्षेत्रमें निवास—यह मनुष्योंके लिये चार प्रकारकी मुक्ति (-के साधन) हैं। ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन तथा इन सबके संसर्गसे होनेवाला पाप—ये सब-के-सब गयाश्राद्धसे नष्ट हो जाते हैं। मरनेपर जिनका दाह-संस्कार नहीं हुआ है, जो पशुओंद्वारा मारे गये हैं अथवा जिन्हें सर्पने डँस लिया है, वे सब लोग गयाश्राद्धसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं।

देवि! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास सुना जाता है। त्रेतायुगमें विशाल नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो विशालापुरीमें रहते थे। वे अपने सद्गुणोंके कारण धन्य समझे जाते थे। उनमें धैर्यका विलक्षण गुण था। उन्होंने श्रेष्ठ तीर्थ गयाशिरमें आकर पितृयाग प्रारम्भ किया। उन्होंने विधिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान दिया। इतनेमें ही उन्होंने आकाशमें उत्तम आकृतिसे युक्त तीन पुरुषोंको देखा, जो क्रमशः श्वेत, लाल और काले रंगके थे। उन्हें देखकर राजाने पूछा—'आपलोग कौन हैं?'

सित (श्वेत)-ने कहा—राजन्! मैं तुम्हारा पिता सित हूँ। मेरा नाम तो सित है ही, मेरे शरीरका वर्ण भी सित (श्वेत) है । साथ ही मेरे कर्म भी सित (उज्ज्वल) हैं और ये जो लाल रंगके पुरुष दिखायी देते हैं, ये मेरे पिता हैं। इन्होंने बड़े निष्ठुर कर्म किये हैं। वे ब्रह्महत्यारे और पापाचारी रहे हैं और इनके बाद ये जो तीसरे सज्जन हैं, ये तुम्हारे प्रपितामह हैं। ये नामसे तो कृष्ण हैं ही, कर्म और वर्णसे भी कृष्ण हैं। इन्होंने पूर्वजन्ममें अनेक प्राचीन ऋषियोंका वध किया है। ये दोनों पिता और पुत्र अवीचि नामक नरकमें पड़े हुए हैं, अतः ये मेरे पिता और ये दूसरे इनके पिता, जो दीर्घकालतक काले मुखसे युक्त हो नरकमें रहे हैं और मैं, जिसने अपने शुद्ध कर्मके प्रभावसे इन्द्रका परम दुर्लभ सिंहासन प्राप्त किया था, तुझ मन्त्रज्ञ पुत्रके द्वारा गयामें पिण्डदान करनेसे हम तीनों ही बलात् मुक्त हो गये।

एक बार गया जाना और एक बार वहाँ पितरोंको पिण्ड देना भी दुर्लभ है; फिर नित्य वहीं रहनेका अवसर मिले, इसके लिये तो कहना ही क्या है! देश-कालके प्रमाणानुसार कहीं-कहीं मृत्युकालसे एक वर्ष बीतनेके बाद अपने भाई-बन्धु पतित पुरुषोंके लिये गयाकूपमें पिण्डदान करते हैं। एक समय किसी प्रेतराजने एक वैश्यसे अपनी मुक्तिके लिये अनुरोध करते हुए कहा—तुम गयातीर्थका दर्शन करके स्नान कर लेना और पवित्र होकर मेरा नाम ले मेरे लिये पिण्डदान करना। वहाँ पिण्ड देनेसे मैं अनायास ही प्रेतभावसे मुक्त हो सम्पूर्ण दाताओंको प्राप्त होनेवाले शुभ लोकोंमें चला जाऊँगा। वैश्यसे ऐसा कहकर अनुयायियोंसहित प्रेतराजने एकान्तमें विधिपूर्वक अपने नाम आदि अच्छी तरह बताये। वैश्य धनोपार्जन करके परम उत्तम गयातीर्थ नामक तीर्थमें गया। उस महाबुद्धि वैश्यने वहाँ पहले अपने पितरोंको पिण्ड आदि देकर फिर सब प्रेतोंके लिये क्रमशः पिण्डदान और धनदान किया। उसने अपने पितरों तथा अन्य कुटुम्बीजनोंके लिये भी पिण्डदान किया था। वैश्यद्वारा इस प्रकार पिण्ड दिये जानेपर वे सभी प्रेत प्रेतभावसे छूटकर द्विजत्वको प्राप्त हो ब्रह्मलोकमें चले गये। गयामें किये हुए श्राद्ध, जप, होम और तप अक्षय होते हैं। यदि पिताकी क्षयाह-तिथिको पुत्रोंद्वारा ये कर्म किये जायँ तो वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले

  • उत्तरभाग * | ६७३ ---|---

होते हैं। पितृगण नरकके भयसे पीड़ित हो पुत्रकी अभिलाषा करते हैं और सोचते हैं—जो कोई पुत्र गया जायगा, वह हमें तार देगा।

गयामें धर्मपृष्ठ, ब्रह्मसभा, गयाशीर्ष तथा अक्षयवटके समीप पितरोंके लिये जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय होता है। ब्रह्मारण्य, धर्मपृष्ठ और धेनुकारण्य—इनका दर्शन करके वहाँ पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपनी बीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। महान् कल्पपर्यन्त किया हुआ पाप गयामें पहुँचनेपर नष्ट हो जाता है। गोतीर्थ और गृध्रवटतीर्थमें किया हुआ श्राद्धदान महान् फल देनेवाला होता है। वहाँ सब मनुष्य मतङ्गके आश्रमका दर्शन करते हैं और सब लोकोंके समक्ष ‘धर्मसर्वस्व’ की घोषणा करते हैं*। वहाँ पवित्र पङ्कजवन नामक तीर्थ है, जो पुण्यात्मा पुरुषोंसे सेवित है, जिसमें पिण्डदान दिया जाता है। वह सबके लिये दर्शनीय तीर्थ है। तृतीयातीर्थ, पादतीर्थ, निःक्षीरामण्डलतीर्थ, महाह्रद तथा कौशिकीतीर्थ—इन सबमें किया हुआ श्राद्ध महान् फल देनेवाला होता है। मुण्डपृष्ठमें परम बुद्धिमान् महादेवजीने अपना पैर दे रखा है। अन्य तीर्थोंमें अनेक सौ वर्षोंतक जो दुष्कर तपस्या की जाती है, उसके समान फल यहाँ थोड़े ही समयके तीर्थसेवनसे प्राप्त हो जाता है। धर्मपरायण मनुष्य इस तीर्थमें आकर अपनी समस्त पापराशिको तत्काल दूर कर देता है, ठीक उसी तरह जैसे साँप पुरानी केंचुलको त्याग देता है। वहीं मुण्डपृष्ठतीर्थके उत्तर भागमें कनकनन्दा नामसे विख्यात तीर्थ है, जहाँ ब्रह्मर्षिगण निवास करते हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य अपने शरीरके साथ स्वर्गलोकको जाते हैं। वहाँ किया हुआ श्राद्ध, दान सदा अक्षय कहा गया है। सुलोचने! वहाँ निःक्षीरामें तीन दिनतक स्नान करके मानसरोवरमें नहाकर श्राद्ध करे। उत्तरमानसमें जाकर मनुष्य परम उत्तम सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो अपनी शक्ति और बलके अनुसार वहाँ श्राद्ध करता है, वह दिव्य भोगों और मोक्षके सम्पूर्ण उपायोंको प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर ब्रह्मसरोवरतीर्थमें जाय, जो ब्रह्मयूपसे सुशोभित है। वहाँ श्राद्ध करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। सुभगे! तदनन्तर लोकविख्यात धेनुकतीर्थमें जाय। वहाँ एक रात रहकर तिलमयी धेनुका दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो निश्चय ही चन्द्रलोकमें जाता है। तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् महादेवजीके गृध्रवट नामक स्थानको जाय। वहाँ भगवान् शङ्करके समीप जाकर अपने अङ्गोंमें भस्म लगावे। देवि! ऐसा करनेसे ब्राह्मणोंको तो बारह वर्षोंतक किये जानेवाले व्रतका पुण्य प्राप्त होता है और अन्य वर्णके लोगोंका सारा पाप नष्ट हो जाता है।

तत्पश्चात् उदयगिरि पर्वतपर जाय; जहाँ दिव्य संगीतकी ध्वनि गूँजती रहती है। वहाँ सावित्रीदेवीका परम पुण्यदायक पदचिह्न दृष्टिगोचर होता है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण वहाँ संध्योपासना करे। इससे बारह वर्षोंतक संध्योपासना करनेका फल प्राप्त होता है। विधिनन्दिनि! वहीं योनिद्वार है। वहाँ जानेसे मनुष्य योनि-संकटसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें गयातीर्थमें निवास करता है, वह अपने कुलकी सात पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है। सुभगे! तदनन्तर महान् फलदायक धर्मपृष्ठ


* अग्निपुराणमें ‘धर्मसर्वस्व’ की घोषणाका स्वरूप इस प्रकार स्पष्ट किया गया है। मतङ्गवापीमें स्नान करके श्राद्धकर्ता पुरुष वहाँ पिण्डदान करे और मतङ्गेश्वरको, जो सुसिद्धोंके अधीश्वर हैं, नमस्कार करके इस प्रकार कहे—'सब देवता प्रमाण देनेवाले और समस्त लोकपाल भी साक्षी रहें, मैंने इस मतङ्गतीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार किया है' (देखिये अग्निपुराण अध्याय ११५ श्लोक ३४-३५)।