भारतकोश
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संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ
६६२* संक्षिप्त नारदपुराण *

गङ्गामें मिली हैं। उसमें गोता लगानेवाला मनुष्य इन्द्रका प्रिय अतिथि होता है। मोहिनी ! जह्नुकुण्ड नामक महातीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य निश्चय ही अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धारक होता है। शुभगे ! तदनन्तर अदिति-तीर्थ है, जहाँ अदितिने कश्यपसे भगवान् विष्णुको वामनरूपमें प्राप्त किया था। वहाँ किये जानेवाले स्नानका फल महान् अभ्युदय बताया गया है। तत्पश्चात् शिलोच्चय नामक महातीर्थ है, जहाँ तपस्या करके समस्त प्रजा तृण आदिके साथ स्वर्गको चली जाती है; क्योंकि वह स्थान अनेक तीर्थोंका आश्रय है। तदनन्तर इन्द्राणी नामक तीर्थ है, जहाँ | इन्द्राणीने तपस्या करके इन्द्रको पतिरूपमें प्राप्त किया था। यह स्थान प्रयागके तुल्य सेवन करने योग्य है। उसके बाद पुण्यदायक स्नात तीर्थ है, जहाँ क्षत्रिय विश्वामित्रने तपस्या करके तीर्थ-सेवनके प्रभावसे ब्रह्मर्षिपदको प्राप्त किया था। तत्पश्चात् प्रद्युम्न-तीर्थ है, जो तपस्याके लिये प्रसिद्ध है। वहाँ कामदेव तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णके प्रद्युम्न नामक पुत्र हुए। उस तीर्थमें स्नान करनेसे महान् अभ्युदयकी प्राप्ति होती है। तदनन्तर दक्षप्रयाग है, जहाँ गङ्गासे यमुना मिली हैं। वहाँ स्नान करनेसे प्रयागकी ही भाँति अक्षय पुण्य होता है।

गङ्गाजीके तटपर किये जानेवाले स्नान, तर्पण, पूजन तथा विविध प्रकारके दानोंकी महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं— राजपत्नी मोहिनी ! अब गङ्गाजीमें स्नान-तर्पण आदि कर्मोंका फल बतलाया जाता है। देवि ! यदि गङ्गाजीके तटपर संध्योपासना की जाय तो द्विजोंको पवित्र करनेवाली गायत्रीदेवी किसी साधारण स्थानकी अपेक्षा वहाँ लाख गुना पुण्य प्रकट करनेमें समर्थ होती हैं। मोहिनी ! यदि पुत्रगण श्रद्धापूर्वक गङ्गाजीमें पितरोंको जलाञ्जलि दें तो वे उन्हें अक्षय तथा दुर्लभ तृप्ति प्रदान करते हैं। गङ्गाजीमें तर्पण करते समय मनुष्य जितने तिल हाथमें लेता है, उतने सहस्र वर्षोंतक पितृगण स्वर्गवासी होते हैं। सब लोगोंके जो कोई भी पितर पितृलोकमें विद्यमान हैं, वे गङ्गाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं। शुभानने ! जो जन्मकी सफलता अथवा संतति चाहता है, वह गङ्गाजीके समीप जाकर देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे। जो मनुष्य मृत्युको प्राप्त होकर दुर्गतिमें पड़े हैं, वे अपने वंशजोंद्वारा कुश, तिल और गङ्गाजलसे तृप्त किये जानेपर वैकुण्ठधाममें चले जाते हैं। जो | कोई पुण्यात्मा पितर स्वर्गलोकमें निवास करते हैं, उनके लिये यदि गङ्गाजलसे तर्पण किया जाय तो वे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं, ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। जो मनुष्य गङ्गाजीमें स्नान करके प्रतिदिन शिवलिङ्गकी पूजा करता है, वह निश्चय ही एक ही जन्ममें मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अग्निहोत्र, वेद तथा बहुत दक्षिणावाले यज्ञ भी गङ्गाजीपर शिवलिङ्ग-पूजाके करोड़वें अंशके बराबर भी नहीं हैं। जो पितरों अथवा देवताओंके उद्देश्यसे गङ्गाजलद्वारा अभिषेक करता है, उसके नरकनिवासी पितर भी तत्काल तृप्त हो जाते हैं। मिट्टीके घड़ेकी अपेक्षा ताँबेके घड़ेसे किया हुआ स्नान दसगुना उत्तम माना गया है। इसी प्रकार अर्घ्य, नैवेद्य, बलि और पूजा आदिमें भी क्रमशः समझने चाहिये। उत्तरोत्तर पात्रमें विशेषता होनेके कारण फलमें भी विशेषता होती है। जो धन होते हुए भी मोहवश विस्तृत विधिका पालन नहीं करता, वह उस कर्मके फलका भागी नहीं होता।<br><br>देवताओंका दर्शन पुण्यमय होता है। दर्शनसे

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स्पर्श उत्तम है। स्पर्शसे पूजन श्रेष्ठ है और पूजनमें भी घृतके द्वारा कराया हुआ देवताका स्नान परम उत्तम माना गया है। गङ्गाजलसे जो स्नान कराया जाता है, उसे विद्वान् पुरुष घृतस्नानके ही तुल्य कहते हैं। जो ताँबेके पात्रमें मगधदेशीय मापके अनुसार एक प्रस्थ गङ्गाजल रखकर उसमें दूसरे-दूसरे विशेष द्रव्य मिलाकर उस मिश्रित जलके द्वारा अपने पितरोंसहित देवताओंको एक बार भी अर्घ्य देता है, वह पुत्र-पौत्रोंके साथ स्वर्गलोकको जाता है। जल, क्षीर, कुशाग्र, घृत, दधि, मधु, लाल कनेरके फूल तथा लाल चन्दन—इन आठ अङ्गोंसे युक्त अर्घ्य सूर्यके लिये देनेयोग्य कहा गया है। जो श्रेष्ठ मानव गङ्गाजीके तटपर भगवान् विष्णु, शिव, सूर्य, दुर्गा तथा ब्रह्माजीकी स्थापना करता है और अपनी शक्तिके अनुसार उनके लिये मन्दिर बनवाता है, उसे अन्य तीर्थोंमें यह सब करनेकी अपेक्षा गङ्गाजीके तटपर कोटि-कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन गङ्गाजीके तटकी मिट्टीसे यथाशक्ति उत्तम लक्षणयुक्त शिवलिङ्ग बनाकर उनकी प्रतिष्ठा करके मन्त्र तथा पत्र-पुष्प आदिसे यथासाध्य पूजा करता और अन्तमें विसर्जन करके उन्हें गङ्गामें ही डाल देता है, उसे अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। जो नरश्रेष्ठ सर्वानन्ददायिनी गङ्गाजीमें स्नान करके भक्तिपूर्वक ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करता है, मुक्ति उसके हाथमें ही आ जाती है। जो नियमपूर्वक छः मासतक गङ्गाजीमें ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्रका जप करता है, उसके पास सब सिद्धियाँ उपस्थित हो जाती हैं। जो गङ्गाजीके समीप प्रणवसहित ‘नमः शिवाय’ मन्त्रका विधिपूर्वक चौबीस लाख जप करता है, वह साक्षात् शङ्कर (-के समान) है। ‘नमः शिवाय’—यह पञ्चाक्षरी मन्त्र सिद्ध-विद्या है। उसको जपनेवाला साक्षात् शिव (-के समान) ही है, इसमें संशय नहीं है। ‘अपवित्रः पवित्रो वा*’—इस मन्त्रका जप करनेवाला पुरुष पातकरहित हो जाता है। गङ्गाजीके पूजित होनेपर सब देवताओंकी पूजा हो जाती है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके देवनदी गङ्गाकी पूजा करनी चाहिये। गङ्गाजीके चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं। वे सम्पूर्ण अङ्गोंसे सुशोभित होती हैं। उनके एक हाथमें रत्नमय कलश, दूसरेमें श्वेत कमल, तीसरेमें वर और चौथेमें अभय है। वे शुभ-स्वरूपा हैं।

उनके श्रीअङ्गोंपर श्वेत वस्त्र सुशोभित होता है। मोती और मणियोंके हार उनके आभूषण हैं। उनका मुख परम सुन्दर है। वे सदा प्रसन्न रहती हैं। उनका हृदय-कमल करुणारससे सदा आर्द्र बना रहता है। उन्होंने वसुधापर सुधाधारा बहा रखी है। तीनों लोक सदा उनके चरणोंमें नमस्कार करते हैं। इस प्रकार जलमयी गङ्गाका ध्यान


* अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥

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करके उनकी पूजा करनेवाला पुरुष पुण्यका भागी होता है। जो इस प्रकार पंद्रह दिन भी निरन्तर पूजा करता है, वही देवताओंके समान हो जाता है और दीर्घकालतक पूजा करनेसे फलमें भी अधिकता होती है। पूर्वकालमें राजा जह्नुने वैशाख शुक्ला सप्तमीको क्रोधपूर्वक गङ्गाजीको पी लिया था और फिर अपने कानके दाहिने छिद्रसे उन्हें निकाल दिया। शुभानने ! उस स्थानपर आकाशकी मेखलारूप गङ्गाजीका पूजन करना चाहिये। वैशाख मासकी अक्षय-तृतीयाको तथा कार्तिकमें भी रातको जागरण करते हुए जौ और तिलसे भक्तिभावपूर्वक विष्णु, गङ्गा और शिवकी पूजा करनी चाहिये। उक्त सामग्रियोंके सिवा उत्तम गन्ध, पुष्प, कुंकुम, अगरु, चन्दन, तुलसीदल, बिल्वपत्र, बिजौरा नींबू आदि, धूप, दीप और नैवेद्यसे वैभव-विस्तारके अनुसार पूजा करनी उचित है। गङ्गाजीके तटपर किया हुआ यज्ञ, दान, तप, जप, श्राद्ध और देवपूजा आदि सब कर्म कोटि-कोटिगुना फल देनेवाला होता है। जो अक्षय-तृतीयाको गङ्गाजीके तटपर विधिपूर्वक घृतमयी धेनुका दान करता है, वह पुरुष सहस्रों सूर्योंके समान तेजस्वी और सम्पूर्ण भोगोंसे सम्पन्न हो हंसभूषित सुवर्ण-रत्नमय विचित्र विमानपर बैठकर अपने पितरोंके साथ कोटिसहस्र एवं कोटिशत कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इसी प्रकार जो (कभी) गङ्गातटपर शास्त्रीय विधिसे गोदान करता है, वह उस गायके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। यदि गङ्गातटपर वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक कपिला गौका दान दिया जाय तो वह गौ नरकमें पड़े हुए सम्पूर्ण पितरोंको तत्काल स्वर्ग पहुँचा देती है। जो गङ्गातटपर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यभगवान्‌की प्रीतिके लिये ब्राह्मणोंको ग्रामदान करता है, उसे सम्पूर्ण दानोंका जो पुण्य है, समस्त यज्ञोंका जो फल है तथा सब प्रकारके तप, व्रत और पुण्यकर्मोंका जो फल बताया गया है, वह सहस्रगुना होकर मिलता है। उस दानके प्रभावसे दाता पुरुष करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी विमानपर बैठकर अपनी रुचिके अनुसार श्रीविष्णुधाममें अथवा श्रीशिवधाममें प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा-विहार करता है। देवता उसकी स्तुति करते रहते हैं। देवि ! जो अक्षयतृतीयाके दिन गङ्गातटपर श्रेष्ठ ब्राह्मणको सोलह माशा सुवर्ण दान करता है, वह भी दिव्यलोकोंमें पूजित होता है। अन्नदान करनेसे विष्णुलोककी और तिलदानसे शिवलोककी प्राप्ति होती है। रत्नदानसे ब्रह्मलोक, गोदान और सुवर्णदानसे इन्द्रलोक तथा सुवर्णसहित वस्त्रदानसे गन्धर्वलोककी प्राप्ति होती है। विद्यादानसे मुक्तिदायक ज्ञान पाकर मनुष्य निरञ्जन ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।


एक वर्षतक गङ्गार्चन-व्रतका विधान और माहात्म्य, गङ्गातटपर नक्तव्रत करके भगवान् शिवका पूजन, प्रत्येक मासकी पूर्णिमा और अमावास्याको शिवाराधन तथा गङ्गा-दशहराके पुण्य-कृत्य एवं उनका माहात्म्य

**पुरोहित वसु बोले—**मोहिनि ! एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये। दिव्यस्वरूपा गङ्गादेवीका ध्यान करके एक सेर अगहनीके चावलको दो सेर दूधमें पकाकर खीर तैयार करावे, उसमें मधु और घी मिला दे, वे दोनों पृथक्-पृथक् एक-एक तोला होने चाहिये। तदनन्तर भक्तिभावसे परिपूर्ण हो खीर, पूआ, लड्डू, मण्डल, आधा गुंजा सुवर्ण, कुछ चाँदी, चन्दन, अगरु, कर्पूर, कुंकुम, गुग्गुल, बिल्वपत्र, दूर्वा, रोचना, श्वेत चन्दन, नील कमल तथा

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अन्यान्य सुगन्धित पुष्प यथाशक्ति गङ्गाजीमें छोड़े और अत्यन्त भक्तिभावसे निम्नाङ्कित पौराणिक मन्त्रोंका उच्चारण करता रहे—'ॐ गङ्गायै नमः, ॐ नारायण्यै नमः, ॐ शिवायै नमः।' मोहिनी! प्रत्येक मासकी पूर्णिमा और अमावास्याको प्रातः-काल एकाग्रचित्त हो इसी विधिसे गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य एक वर्षतक हविष्यभोजी, मिताहारी तथा ब्रह्मचारी रहकर दिनमें अथवा रात्रिके समय नियमपूर्वक भक्ति और प्रसन्नताके साथ यथाशक्ति गङ्गाजीकी पूजा करता है, उसे वर्षके अन्तमें ये गङ्गादेवी दिव्य शरीर धारण करके दिव्य माला, दिव्य वस्त्र तथा दिव्य रत्नोंसे विभूषित हो प्रत्यक्ष दर्शन देती हैं और वर देनेके लिये उसके सामने खड़ी हो जाती हैं। शुभे! इस प्रकार दिव्य देहधारिणी प्रत्यक्षरूपा गङ्गाजीका अपने नेत्रोंसे दर्शन करके मनुष्य कृतकृत्य होता है। वह मानव जिन-जिन भोगोंकी कामना करता है, उन सबको प्राप्त कर लेता है और जो ब्राह्मण निष्कामभावसे गङ्गाकी आराधना करता है, वह उसी जन्ममें मोक्ष पा जाता है। गङ्गाजीके पूजनका यह सांवत्सरव्रत भगवान् लक्ष्मीपतिको संतुष्ट करनेवाला एवं मोक्ष देनेवाला है।

**वसिष्ठजी कहते हैं—**राजेन्द्र! वसुका यह गङ्गामाहात्म्यसूचक वचन सुनकर मोहिनीने पुनः अपने पुरोहित विप्रवर वसुसे पूछा।

**मोहिनी बोली—**ब्रह्मन्! गङ्गाजीके तटपर गङ्गा आदिके स्थापन और पूजनका क्या फल है? मुझ अबलाको गङ्गाजीके माहात्म्यसे युक्त देवाराधनकी विधि बताइये, जिसे सुनकर पापसे छुटकारा मिल जाता है।

**पुरोहित वसु बोले—**देवि! तुमने सब लोकोंके हितकी कामनासे बहुत उत्तम बात पूछी है। गङ्गाजीका सम्पूर्ण माहात्म्य बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें वृषभध्वज भगवान् शिवने कृपापूर्वक इसका वर्णन किया था। देवी पार्वतीने प्रेमपूर्वक उनसे प्रश्न किया था और उन्होंने गङ्गाजीके तटपर बैठकर गङ्गाजीका माहात्म्य उन्हें सुनाया था। देवताओंने पूर्वाह्नकालमें, ऋषियोंने मध्याह्नकालमें, पितरोंने अपराह्नकालमें तथा गुह्यक आदिने रात्रिके प्रथम भागमें भोजन किया है। इन सब वेलाओंका उल्लंघन करके रातमें भोजन करना उत्तम है। अतः नक्तव्रतका आचरण करना चाहिये। रातको भोजन करनेवाले नक्त-व्रतीको ये छः कर्म अवश्य करने चाहिये—स्नान, हविष्य-भोजन, सत्यभाषण, स्वल्पाहार, अग्निहोत्र तथा भूमिशयन। जो कोई भी साधक हो, वह माघ मासमें गङ्गातटपर शिव-मन्दिरके समीप रातमें घी मिलायी हुई खिचड़ी भोजन करे। भोजन आरम्भ करनेसे पहले भगवान् शिवको खिचड़ीका ही नैवेद्य लगावे। काष्ठ-मौन होकर भोजन करे और जिह्वाकी लोलुपता त्याग दे। भगवान् शिवको स्मरण करके जितेन्द्रियभावसे पलाशके पत्तेमें नियमपूर्वक भोजन करे। धर्मराज तथा देवीके लिये पृथक्-पृथक् पिण्ड दे। दोनों पक्षोंकी चतुर्दशीको उपवास करे। पूर्णिमाके दिन गन्ध और गङ्गाजलसे तथा दूध, दही, घी, शहद (और शर्करा)-से भगवान् शिवको नहलाकर शिवलिङ्गके मस्तकपर धतूरका फूल चढ़ावे। तत्पश्चात् यथाशक्ति घीका पकाया हुआ पूआ निवेदन करे। फिर एक आढक तिल लेकर शिवलिङ्गके ऊपर चढ़ावे। नील तथा लाल कमलके फूलोंसे सर्वेश्वर शिवका पूजन करे। कमलका फूल न मिले तो सुवर्णमय कमलसे महादेवजीकी पूजा करे। मधुयुक्त खीरका भोग लगावे। घृतमिश्रित गुग्गुलका धूप दे। घीका दीपक जलावे। चन्दन आदिसे अनुलेपन करे। भक्तिपूर्वक महेश्वरको बिल्वपत्र और फल चढ़ावे। उनकी प्रसन्नताके लिये काले रंगकी गौ और काले रंगका बैल दान करे। उन गाय-बैलोंकी शक्ल-सूरत

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एक-सी होनी चाहिये। माघ मास व्यतीत होनेपर आठ ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा दे। ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक रहे। इस प्रकार यम-नियम, श्रद्धा और भक्तिसे युक्त होकर जो एक बार भी शास्त्रीय विधिसे इस व्रतका पालन करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोगोंको भोगता है और मृत्युके पश्चात् परम उत्तम गतिका भागी होता है।

वैशाख शुक्ला चतुर्दशीको एकाग्रचित्त होकर अगहनीके चावलका भात और दूध रातमें भोजन करे। पुष्प आदिसे भगवान् शिवकी पूजा करे। उन्हें भोज्य पदार्थ निवेदन करके काष्ठ-मौन होकर भोजन करे। उस दिन पवित्र हो मौन-भावसे बरगदकी लकड़ीद्वारा दन्तधावन करे। रातमें गङ्गातटपर शिवलिङ्गके समीप सोये। प्रातःकाल पूर्णिमाको विधिपूर्वक गङ्गामें स्नान करके उपवास-व्रतका संकल्प लेकर रातमें जागरण करे। शिवलिङ्गको घीसे नहलाकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिके द्वारा उनका पूजन करके एक सुन्दर वृषभको श्वेत पुष्प, वस्त्र, हल्दी और चन्दनसे अलंकृत करके विधिपूर्वक भगवान् शिवके लिये निवेदन करे। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति खीर भोजन करावे। इस प्रकार जो श्रद्धा और भक्तिके साथ एक बार भी उक्त नियमका पालन करता है, वह अन्तमें मुक्त हो जाता है।

ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें दशमी तिथिको हस्त नक्षत्रका योग होनेपर स्त्री हो या पुरुष, भक्तिभावसे गङ्गाजीके तटपर जाकर रात्रिमें जागरण करना चाहिये और दस प्रकारके फूलोंसे, दस प्रकारकी गन्धसे, दस तरहके नैवेद्योंसे तथा दस-दस ताम्बूल एवं दीप आदिसे श्रद्धापूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके पहले भक्तिपूर्वक शास्त्रोक्त विधिके अनुसार गङ्गाजीमें दस बार स्नान करके जलमें दस पसर काले तिल और घी छोड़ना चाहिये। इसी प्रकार सत्तू तथा गुड़के दस-दस पिण्ड भी गङ्गाजीके जलमें डालने चाहिये। तदनन्तर गङ्गाके रमणीय तटपर अपनी शक्तिके अनुसार सोने या चाँदीसे गङ्गाजीकी प्रतिमा निर्माण कराकर उसकी स्थापना करे। पहले भूमिपर कमल या स्वस्तिकका चिह्न बनाकर उसके ऊपर कलश स्थापित करे। कलशपर भी पद्म एवं स्वस्तिकका चिह्न होना चाहिये। उसके कण्ठमें वस्त्र और पुष्पहार लपेट देना चाहिये। कलशको गङ्गाजलसे भरकर उसमें अन्य आवश्यक पदार्थ छोड़े। उसके ऊपर पूर्णपात्र रखकर उसमें गङ्गाजीकी पूर्वोक्त प्रतिमा स्थापित करनी चाहिये। सुवर्ण आदिकी प्रतिमा न मिले तो मिट्टी आदिकी बनवानी चाहिये। इसकी भी शक्ति न हो तो आटासे पृथ्वीपर ही गङ्गाजीका स्वरूप अङ्कित करना चाहिये। उनका स्वरूप इस प्रकार है—गङ्गादेवीके चार भुजाएँ और सुन्दर नेत्र हैं। उनके श्रीअङ्गोंसे दस हजार चन्द्रमाओंके समान उज्ज्वल चाँदनी-सी छिटकती रहती है। दासियाँ उन्हें चवँर डुलाती हैं। मस्तकपर तना हुआ श्वेत छत्र उनकी शोभा बढ़ाता है। वे अत्यन्त प्रसन्न और वरदायिनी हैं। करुणासे उनका अन्तःकरण सदा द्रवीभूत रहता है। वे वसुधातपर सुधाधारा बहाती हैं। देवता आदि सदा उनकी स्तुति करते रहते हैं। वे दिव्य रत्नोंके आभूषण, दिव्य हार और दिव्य अनुलेपनसे विभूषित हैं। जलमें उनके उपर्युक्त स्वरूपका ध्यान करके प्रतिमामें उनकी विशेषरूपसे पूजा करनी चाहिये। प्रतिमाको पञ्चामृतसे स्नान कराना उत्तम है। प्रतिमाके आगे एक वेदी बनाकर उसको गोबरसे लीपे। उसपर भगवान् नारायण, शिव, ब्रह्मा, सूर्य, राजा भगीरथ तथा गिरिराज हिमालयकी स्थापना करके गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंसे यथाशक्ति उनकी पूजा करे; फिर दस ब्राह्मणोंको दस सेर तिल दे। इसी प्रकार दस सेर जौ दे और उनके साथ अलग-अलग दस पात्रोंमें

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गव्य (दही-घी आदि) भी दे। तत्पश्चात् पहलेसे तैयार करायी हुई मछली, कछुआ, मेढ़क, मगर आदि जलचर जीवोंकी यथाशक्ति सुवर्णमयी अथवा रजतमयी प्रतिमा स्थापित करके उनकी पूजा करे, वैसी प्रतिमा न मिलनेपर आटेकी प्रतिमा बनावे और मन्त्रज्ञ पुरुष पुष्प आदिसे पूर्वनिर्दिष्ट मन्त्रद्वारा ही उनकी पूजा करके उन्हें गङ्गाजीमें छोड़ दे। यदि अपने पास वैभव हो तो उस दिन गङ्गाजीकी रथयात्रा भी करावे। रथपर गङ्गाजीकी प्रतिमा या चित्र हो, उसका मुख उत्तर दिशाकी ओर रहे। रथपर भ्रमण करती हुई गङ्गाजीका दर्शन इस लोकमें पापी मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। इस प्रकार विधिपूर्वक रथयात्रा सम्पन्न करके मनुष्य आगे बताये जानेवाले दस प्रकारके पापोंसे तत्काल ही मुक्त हो जाता है। बिना दिये हुए किसीकी वस्तु ले लेना, हिंसा करना और परायी स्त्रीके साथ सम्बन्ध रखना—ये तीन प्रकारके शारीरिक पाप माने गये हैं। कठोरतापूर्ण वचन, असत्य, चुगली तथा अनाप-शनाप बातें बकना—ये चार प्रकारके वाचिक पाप कहे गये हैं। दूसरेका धन हड़पनेकी बात सोचना, मनसे किसीका अनिष्ट-चिन्तन करना और झूठा अभिनिवेश (मरण-भय)—ये तीन प्रकारके मानसिक पाप हैं। ये दस प्रकारके पाप करोड़ों जन्मोंद्वारा संचित हो तो भी पूर्वोक्त विधिसे रथयात्रा करनेवाला पुरुष उनसे मुक्त हो जाता है।

पूजाका मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ नमो दशहरायै नारायण्यै गङ्गायै नमः।' जो मनुष्य उस दिन रातमें और दिनमें भी उक्त मन्त्रका पाँच-पाँच हजार जप करता है, वह मनुके बताये हुए दस धर्मों* का फल प्राप्त करता है। आगे बताये जानेवाले स्तोत्रको विधिपूर्वक ग्रहण करके उस दिन गङ्गाजीके आगे उसका पाठ करे। फिर भगवान् विष्णुकी पूजा करे। वह स्तोत्र इस प्रकार है—

ॐ शिवस्वरूपा गङ्गाको नमस्कार है। कल्याण प्रदान करनेवाली गङ्गाको नमस्कार है। विष्णुरूपिणी देवीको नमस्कार है। आप भगवती गङ्गाको बारंबार नमस्कार है। सम्पूर्ण देवता आपके स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आपका स्वरूपभूत जल उत्तम औषध है, आपको नमस्कार है। आप समस्त जीवोंके सम्पूर्ण रोगोंका निवारण करनेके लिये श्रेष्ठ वैद्यके समान हैं, आपको नमस्कार है। आप स्थावर और जङ्गम जीवोंसे उत्पन्न होनेवाले विषका नाश करनेवाली हैं, आपको नमस्कार है। संसाररूपी विषका नाश करनेवाली जीवनदायिनी गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। आप आध्यात्मिक आदि तीनों तापोंका निवारण करनेवाली एवं सबके प्राणोंकी अधीश्वरी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप शान्तिस्वरूपा तथा सबका संताप दूर करनेवाली हैं, सब कुछ आपका ही स्वरूप है, आपको नमस्कार है। सबको पूर्णतः शुद्ध करनेवाली और सब पापोंसे छुटकारा दिलानेवाली आपको नमस्कार है। आप भोग और मोक्ष देनेवाली भोगवती (नामक पातालगङ्गा) हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप ही मन्दाकिनी नामसे प्रसिद्ध आकाशगङ्गा हैं, आपको नमस्कार है। आप स्वर्ग देनेवाली हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। तीनों लोकोंमें मूर्तरूपसे प्रकट होनेवाली आप गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। शुक्लरूपसे स्थित होनेवाली आपको नमस्कार है। सबका क्षेम चाहनेवाली क्षेमवतीको


* श्रीमनुके बतलाये हुए दस धर्म ये हैं—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ (६। ९२)

'धैर्य, क्षमा, मनका निग्रह, चोरी न करना, बाहर-भीतरकी पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, सात्त्विक बुद्धि, अध्यात्मविद्या, सत्य और अक्रोध—ये दस धर्मके लक्षण हैं।'

६६८ * संक्षिप्त नारदपुराण *


नमस्कार है, नमस्कार है। देवताओंके सिंहासनपर विराजमान होनेवाली तेजोमयी आप गङ्गादेवीको नमस्कार है। आप मन्द गति धारण करके 'मन्दा' और शिवलिङ्गका आधार होनेसे 'लिङ्गधारिणी' कहलाती हैं। भगवान् नारायणके चरणारविन्दोंसे प्रकट होनेके कारण आप 'नारायणी' कहलाती हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सम्पूर्ण जगत्‌को मित्र माननेवाली आप विश्वमित्राको नमस्कार है। रेवती नामसे प्रसिद्ध गङ्गाको नमस्कार है, नमस्कार है। आप बृहतीदेवीको नित्य नमस्कार है। लोकधात्रीको बारंबार नमस्कार है। विश्वमें प्रधान होनेसे आपका नाम विश्वमुख्या है, आपको नमस्कार है। जगत्‌को आनन्दित करनेके कारण नन्दिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। पृथ्वी¹, शिवामृता² और विरजा³ नामवाली गङ्गादेवीको बारंबार नमस्कार है। परावरगता⁴, आद्या⁵ एवं तारा⁶ नामवाली आपको नमस्कार है, नमस्कार है। स्वर्गमें विराजमान गङ्गादेवी ! आपको नमस्कार है। आप सबसे अभिन्न हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप शान्त-स्वरूपा, प्रतिष्ठा (आधारस्वरूपा) तथा वरदायिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप उग्रा⁷, मुखजल्पा⁸ और संजीवनी⁹ हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आपकी ब्रह्मलोकतक पहुँच है। आप ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाली तथा पापनाशिनी हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। प्रणतजनोंकी पीड़ाका नाश करनेवाली जगन्माता गङ्गाको नमस्कार है, नमस्कार है। देवि ! आप जल-बिन्दुओंकी राशि हैं, दुर्गम संकटका नाश करनेवाली तथा जगत्‌के उद्धारमें दक्ष हैं, आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विपत्तियोंका विरोध करनेवाली मङ्गलमयी गङ्गादेवीको नमस्कार है, नमस्कार है। पर और अपर सब आपके ही स्वरूप हैं, आप ही पराशक्ति हैं, मोक्षदायिनी देवि ! आपको सदा नमस्कार है। गङ्गा मेरे आगे रहें, गङ्गा मेरे दोनों पार्श्वमें रहें, गङ्गा मेरे चारों ओर रहें और हे गङ्गे ! आपमें ही मेरी स्थिति हो। पृथ्वीपर प्राप्त हुई शिवस्वरूपा देवि ! आदि, मध्य और अन्तमें आप ही हैं। आप सर्वस्वरूपा हैं। आप ही मूल प्रकृति हैं। आप ही सर्वसमर्थ नर-नारायण हैं। गङ्गे ! आप ही परमात्मा और आप ही शिव हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है¹⁰।


१. पृथ्वीपर स्थित होने अथवा पृथुल जलराशि धारण करनेके कारण गङ्गाजीका नाम 'पृथ्वी' है। भगवदीय शक्ति होनेसे गङ्गा और पृथ्वीमें अभेद भी है।
२. शिव (कल्याणमय) हैं अमृत (जल) जिनका, वे गङ्गाजी 'शिवामृता' हैं, शिवस्वरूपा और अमृतस्वरूपा होनेके कारण उनका यह नाम सार्थक है।
३. रजोगुणरहित, निर्मलस्वरूप होनेके कारण गङ्गाजीको 'विरजा' कहते हैं। गोलोकस्थित विरजासे अभिन्न होनेके कारण भी इनका नाम 'विरजा' है।
४. पर (ऊपर स्वर्गलोक) और अवर (नीचे पाताललोक)-में स्थित।
५. आदिशक्तिस्वरूपा।
६. सबको संसार-सागरसे तारनेवाली अथवा 'तारा' नामक शक्तिसे अभिन्न।
७. पाप-समुदायके लिये भयंकर।
८. अपने स्रोतरूप मुखसे निरन्तर कलकल शब्द करनेवाली।
९. सेवकोंको जन्म-मृत्युसे छुड़ाकर नूतन अमृतमय जीवन प्रदान करनेवाली।
१०. ॐ नमः शिवायै गङ्गायै शिवदायै नमोऽस्तु ते। नमोऽस्तु विष्णुरूपिण्यै गङ्गायै ते नमो नमः॥
सर्वदेवस्वरूपिण्यै नमो भेषजमूर्तये। सर्वस्य सर्वव्याधीनां भिषक्श्रेष्ठे नमोऽस्तु ते॥
स्थाणुजङ्गमसम्भूतविषहन्त्रि नमोऽस्तु ते। संसारविषनाशिन्यै जीवनायै नमो नमः॥

उत्तरभाग ६६१

  • उत्तरभाग * ६६१
जो प्रतिदिन भक्तिभावसे इस स्तोत्रका पाठ करता है अथवा जो श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, वह मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले पूर्वोक्त दस पापों तथा सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त हो जाता है। रोगी रोगसे और विपत्तिका मारा पुरुष विपत्तिसे छुटकारा पा जाता है। शत्रुओंसे, बन्धनसे तथा सब प्रकारके भयसे भी वह मुक्त हो जाता है। इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता है और मृत्युके पश्चात् परब्रह्म परमात्मामें लीन हो जाता है। जिसके घरमें इस स्तोत्रको लिखकर इसकी पूजा की जाती है, वहाँ आग और चोरका भय नहीं है। वहाँ पापसे भी भय नहीं होता। ज्येष्ठ शुक्ला दशमीको गङ्गाजीके जलमें खड़ा होकर जो इस स्तोत्रका दस बार जप या पाठ करता है, वह दरिद्र अथवा असमर्थ होनेपर भी वही फल पाता है, जो पूर्वोक्त विधिसे भक्तिपूर्वक गङ्गाजीकी पूजा करनेसे प्राप्त होने योग्य बताया गया है। जैसी गौरी देवीकी महिमा है, वैसी ही गङ्गा देवीकी भी है, अतः गौरीके पूजनमें जो विधिकही गयी है, वही गङ्गाजीके पूजनके लिये भी उत्तम विधि है। जैसे भगवान् शिव हैं, वैसे ही भगवान् विष्णु हैं, जैसे भगवान् विष्णु हैं, वैसी ही भगवती उमा हैं और जैसी भगवती उमा हैं, वैसी ही गङ्गाजी हैं—इनमें कोई भेद नहीं है। जो भगवान् विष्णु और शिवमें, गङ्गा और गौरीमें तथा लक्ष्मी और पार्वतीमें भेद मानता है, वह मूढ़बुद्धि है। उत्तरायणमें किसी उत्तम मासका शुक्लपक्ष हो, दिनका समय हो और गङ्गाजीके तटकी भूमि हो, साथ ही हृदयमें भगवान् जनार्दनका चिन्तन हो रहा हो—ऐसी अवस्थामें जो शरीरका त्याग करते हैं, वे धन्य हैं*। विघ्ननन्दिनी! जो मनुष्य गङ्गामें प्राणत्याग करते हैं, वे देवताओंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए विष्णुलोकको जाते हैं। जो मनुष्य गङ्गाके तटपर आमरण उपवासका व्रत लेकर मर जाता है, वह निश्चय ही अपने पितरोंके साथ परमधामको प्राप्त होता है। गङ्गाजीमें मृत्युके लिये दो योजन दूरकी भूमि और समीपका स्थान दोनों समान हैं। जो मनुष्य गङ्गामें मर जाता है,

तापत्रितयहन्त्र्यै च प्राणेश्र्वर्यै नमो नमः। शान्त्यै संतापहारिण्यै नमस्ते सर्वमूर्तये॥
सर्वसंशुद्धिकारिण्यै नमः पापविमुक्तये। भुक्तिमुक्तिप्रदायिन्यै भोगवत्यै नमो नमः॥
मन्दाकिन्यै नमस्तेऽस्तु स्वर्गदायै नमो नमः। नमस्त्रैलोक्यमूर्तायै त्रिदशायै नमो नमः॥
नमस्ते शुक्लसंस्थायै क्षेमवत्यै नमो नमः। त्रिदशासनसंस्थायै तेजोवत्यै नमोऽस्तु ते॥
मन्दायै लिङ्गधारिण्यै नारायण्यै नमो नमः। नमस्ते विश्वमित्रायै रेवत्यै ते नमो नमः॥
बृहत्यै ते नमो नित्यं लोकधात्र्यै नमो नमः। नमस्ते विश्वमुख्यायै नन्दिन्यै ते नमो नमः॥
पृथ्व्यै शिवामृतायै च विरजायै नमो नमः। परावरगताद्यायै तारायै ते नमो नमः॥
नमस्ते स्वर्गसंस्थायै अभिन्नायै नमो नमः। शान्तायै ते प्रतिष्ठायै वरदायै नमो नमः॥
उग्रायै मुखजल्पायै संजीवन्यै नमो नमः। ब्रह्मगायै ब्रह्मदायै दुरितघ्न्यै नमो नमः॥
प्रणतार्तिप्रभञ्जिन्यै जगन्मात्रे नमो नमः। विप्लुषायै दुर्गहन्त्र्यै दक्षायै ते नमो नमः॥
सर्वापत्प्रतिपक्षायै मङ्गलायै नमो नमः।
परापरे परे तुभ्यं नमो मोक्षप्रदे सदा। गङ्गा ममाग्रतो भूयाद् गङ्गा मे पार्श्वयोस्तथा॥
गङ्गा मे सर्वतो भूयात्त्वयि गङ्गेऽस्तु मे स्थितिः। आदौ त्वमन्ते मध्ये च सर्वा त्वं गाङ्गते शिवे॥
त्वमेव मूलप्रकृतिस्त्वं हि नारायणः प्रभुः। गङ्गे त्वं परमात्मा च शिवस्तुभ्यं नमो नमः॥
(ना० उत्तर० ४३।६९-८४)

* शुक्लपक्षे दिवा भूमौ गङ्गायामुत्तरायणे। धन्या देहं विमुञ्चन्ति हृदयस्थे जनार्दने॥
(ना० उत्तर० ४३। ९४)

६७० * संक्षिप्त नारदपुराण *


वह स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त होता है। जो मानव प्राण-त्यागके समय गङ्गाका स्मरण अथवा गङ्गाजलका स्पर्श करता है, वह पापी होनेपर भी परमगतिको प्राप्त होता है। जिन धीर पुरुषोंने गङ्गाजीके समीप जाकर अपने शरीरका त्याग किया है, वे देवताओंके समान हो गये। इसलिये मुक्ति देनेवाले दूसरे सब साधनोंको छोड़कर देहपातपर्यन्त गङ्गाजीका ही सेवन करे। जो महान् पापी होकर भी गङ्गाके समीपवर्ती आकाशमें, गङ्गातटकी भूमिपर अथवा गङ्गाजीके जलमें मरा है, वह ब्रह्मा, विष्णु और शिवके द्वारा पूजनीय अक्षयपदको प्राप्त कर लेता है। जो धर्मात्मा, पवित्र एवं साधुसम्मत प्राणधारी मनुष्य मन-ही-मन गङ्गाजीका चिन्तन करता है, वह परम गतिको प्राप्त कर लेता है। कोई कहीं भी मर रहा हो, परंतु मृत्युकाल उपस्थित होनेपर यदि वह गङ्गाजीका स्मरण करता है, तो वह शिवलोक अथवा विष्णुधामको जाता है। भगवान् शङ्करके अत्यन्त कर्कश जटाकलापसे निकलकर पापी सगर-पुत्रोंके शरीरकी राखको बहाकर गङ्गाजीने उन्हें स्वर्गलोक पहुँचाया था। पुरुषके शरीरकी जितनी हड्डियाँ गङ्गाजीमें मौजूद रहती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। मनुष्यकी हड्डी जब गङ्गाजीके जलमें ले जाकर छोड़ी जाती है, उसी समयसे प्रारम्भ करके उसकी स्वर्गलोकमें स्थित होती है। जिस पुण्यकर्मा पुरुषकी हड्डी गङ्गाजीके जलमें पहुँचायी जाती है, उसकी ब्रह्मलोकसे किसी प्रकार पुनरावृत्ति नहीं होती। जिस मृतक पुरुषकी हड्डी दशाहाके भीतर गङ्गाजीके जलमें पड़ जाती है, उसे गङ्गामें मरनेका जैसा फल बताया गया है, उसी फलकी प्राप्ति होती है। अतः स्नान करके पञ्चगव्य छिड़ककर सुवर्ण, मधु, घी और तिलके साथ उस अस्थि-पिण्डको दोनेमें रख ले और प्रेतगणोंसे युक्त दक्षिण दिशाकी ओर देखते हुए 'नमोऽस्तु धर्माय' (धर्मराजको नमस्कार है) ऐसा कहकर जलमें प्रवेश करे और 'धर्मराज मुझपर प्रसन्न हों' ऐसा कहकर उस हड्डीको जलमें फेंक दे। तदनन्तर स्नान करके तीर्थवासी अक्षयवटका दर्शन करे और ब्राह्मणको दक्षिणा दे। ऐसा करनेपर यमलोकमें स्थित हुए पुरुषका स्वर्गलोकमें गमन होता है और वहाँ उसे देवराज इन्द्रके समान प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। गङ्गाजीकी बहती हुई मुख्य धारासे लेकर चार हाथतकका जो भाग है, उसके स्वामी भगवान् नारायण हैं। प्राण कण्ठतक आ जायँ तो भी उसमें प्रतिग्रह स्वीकार न करे। भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशीको गङ्गाजीका जल जहाँतक बढ़ जाता है, वहाँतककी भूमिको उनका गर्भ जानना चाहिये। उससे दूरका स्थान 'तीर' कहलाता है। साधारण स्थितिमें जहाँतक जल रहता है, उससे डेढ़ सौ हाथ दूरतक गर्भकी सीमा है। उससे परेका भू-भाग तट है। देवि! किन्हीं विद्वानोंका ऐसा ही मत है तथा यह श्रुतियों और स्मृतियोंको भी अभिमत है। तीरसे दो-दो कोस दोनों ओरका स्थान 'क्षेत्र' कहलाता

उत्तरभाग ६७१

  • उत्तरभाग * ६७१

है। तीरको छोड़कर क्षेत्रमें वास करना चाहिये; क्योंकि तीरपर निवास अभीष्ट नहीं है। दोनों तटोंसे एक योजन विस्तृत भू-भाग क्षेत्रकी सीमा माना गया है। जितने पाप हैं, वे सब-के-सब गङ्गाजीकी सीमा नहीं लाँघते। वे गङ्गाको देखकर उसी प्रकार दूर भागते हैं, जैसे सिंहको देखकर वनमें रहनेवाले दूसरे जीव। महाभागे! जहाँ गङ्गा हैं, जहाँ श्रीराम और श्रीशिवका तपोवन है, उसके चारों ओर तीन योजनतक सिद्धक्षेत्र जानना चाहिये। तीर्थमें कभी दान न ले। पवित्र देव-मन्दिरोंमें भी प्रतिग्रह न ले तथा ग्रहण आदि सभी निमित्तोंमें मनुष्य प्रतिग्रहसे अलग रहे। जो तीर्थमें दान लेता है तथा पुण्यमय देवमन्दिरोंमें भी प्रतिग्रह स्वीकार करता है, उसके पास जबतक प्रतिग्रहका धन है, तबतक उसका तीर्थ-व्रत निष्फल कहा जाता है। देवि! गङ्गाजीमें दान लेना मानो गङ्गाको बेचना है। गङ्गाके विक्रयसे भगवान् विष्णुका विक्रय हो जाता है और भगवान् विष्णुका विक्रय होनेपर तीनों लोकोंका विक्रय हो जाता है। जो गङ्गाजीके तीरकी मिट्टी लेकर अपने मस्तकपर धारण करता है, वह केवल तम (अन्धकार, अज्ञान एवं तमोगुण)-का नाश करनेके लिये मानो सूर्यका स्वरूप धारण करता है। जो मनुष्य गङ्गाजीके तटकी धूलि फैलाकर उसके ऊपर पितरोंके लिये पिण्ड देता है, वह अपने पितरोंको तृप्त करके स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। भद्रे! इस प्रकार मैंने तुम्हें गङ्गाका उत्तम माहात्म्य बताया है। जो मनुष्य इसको पढ़ता अथवा सुनता है, वह भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है। विधिनन्दिनि! जो भगवान् विष्णु अथवा शिवका लोक प्राप्त करना चाहते हों, उन्हें प्रतिदिन पवित्रचित्त हो श्रद्धा और भक्तिके साथ इस गङ्गा-माहात्म्यका पाठ करना चाहिये।


गयातीर्थकी महिमा

वसिष्ठजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर पापनाशिनी गङ्गाका यह उत्तम माहात्म्य सुनकर मोहिनीने पुनः अपने पुरोहितसे पूछा।

मोहिनी बोली— भगवन्! आपने मुझे गङ्गाका पुण्यमय आख्यान (माहात्म्य) सुनाया है। अब मैं यह सुनना चाहती हूँ कि संसारमें गयातीर्थ कैसे विख्यात हुआ?

पुरोहित वसुने कहा— गया पितृतीर्थ है। उसे सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ माना गया है, जहाँ देवदेवेश्वर पितामह ब्रह्माजी स्वयं निवास करते हैं। जहाँ याग (श्राद्ध)-की अभिलाषा रखनेवाले पितरोंने यह गाथा गायी है—'बहुत-से पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे एक भी तो गया जायगा अथवा अश्वमेध-यज्ञ करेगा या नीलवृषभका उत्सर्ग करेगा।' देवि! गयाका उत्तम माहात्म्य सारसे भी सारतर वस्तु है। मैं उसका संक्षेपसे वर्णन करूँगा। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। सुनो, पूर्वकालकी बात है। गयासुर नामसे प्रसिद्ध एक असुर हुआ था, जो बड़ा पराक्रमी था। उसने बड़ा भयंकर तप किया, जो सम्पूर्ण भूतोंको पीड़ित करनेवाला था। उसकी तपस्यासे संतप्त हुए देवता लोग उसके वधके लिये भगवान् विष्णुकी शरणमें गये। तब भगवान्ने उसको गदासे मार दिया। अतः गदाधर भगवान् विष्णु ही गयातीर्थमें मुक्तिदाता माने गये हैं। भगवान् विष्णुने इस तीर्थकी मर्यादा स्थापित की। जो मनुष्य यहाँ यज्ञ, श्राद्ध, पिण्डदान एवं स्नानादि कर्म करता है, वह स्वर्ग अथवा ब्रह्मलोकमें जाता है। गयातीर्थको उत्तम जानकर ब्रह्माजीने वहाँ यज्ञ किया तथा उन्होंने वहाँ सरस्वती नदीकी भी सृष्टि की और समस्त दिशाओंमें व्याप्त होकर उस तीर्थमें निवास

६७२ * संक्षिप्त नारदपुराण *

किया। तदनन्तर ब्राह्मणोंके प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजीने वहाँ अनेक तीर्थ निर्माण किये और कहा—ब्राह्मणो! गयामें श्राद्ध करनेसे पवित्र हुए लोग ब्रह्मलोकगामी होंगे और जो लोग तुम्हारा पूजन और सत्कार करेंगे, उनके द्वारा सदा मैं पूजित होऊँगा। ब्रह्मज्ञान, गयाश्राद्ध, गोशालामें प्राप्त होनेवाली मृत्यु तथा कुरुक्षेत्रमें निवास—यह मनुष्योंके लिये चार प्रकारकी मुक्ति (-के साधन) हैं। ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी और गुरुपत्नीगमन तथा इन सबके संसर्गसे होनेवाला पाप—ये सब-के-सब गयाश्राद्धसे नष्ट हो जाते हैं। मरनेपर जिनका दाह-संस्कार नहीं हुआ है, जो पशुओंद्वारा मारे गये हैं अथवा जिन्हें सर्पने डँस लिया है, वे सब लोग गयाश्राद्धसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं।

देवि! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास सुना जाता है। त्रेतायुगमें विशाल नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो विशालापुरीमें रहते थे। वे अपने सद्गुणोंके कारण धन्य समझे जाते थे। उनमें धैर्यका विलक्षण गुण था। उन्होंने श्रेष्ठ तीर्थ गयाशिरमें आकर पितृयाग प्रारम्भ किया। उन्होंने विधिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान दिया। इतनेमें ही उन्होंने आकाशमें उत्तम आकृतिसे युक्त तीन पुरुषोंको देखा, जो क्रमशः श्वेत, लाल और काले रंगके थे। उन्हें देखकर राजाने पूछा—'आपलोग कौन हैं?'

सित (श्वेत)-ने कहा—राजन्! मैं तुम्हारा पिता सित हूँ। मेरा नाम तो सित है ही, मेरे शरीरका वर्ण भी सित (श्वेत) है । साथ ही मेरे कर्म भी सित (उज्ज्वल) हैं और ये जो लाल रंगके पुरुष दिखायी देते हैं, ये मेरे पिता हैं। इन्होंने बड़े निष्ठुर कर्म किये हैं। वे ब्रह्महत्यारे और पापाचारी रहे हैं और इनके बाद ये जो तीसरे सज्जन हैं, ये तुम्हारे प्रपितामह हैं। ये नामसे तो कृष्ण हैं ही, कर्म और वर्णसे भी कृष्ण हैं। इन्होंने पूर्वजन्ममें अनेक प्राचीन ऋषियोंका वध किया है। ये दोनों पिता और पुत्र अवीचि नामक नरकमें पड़े हुए हैं, अतः ये मेरे पिता और ये दूसरे इनके पिता, जो दीर्घकालतक काले मुखसे युक्त हो नरकमें रहे हैं और मैं, जिसने अपने शुद्ध कर्मके प्रभावसे इन्द्रका परम दुर्लभ सिंहासन प्राप्त किया था, तुझ मन्त्रज्ञ पुत्रके द्वारा गयामें पिण्डदान करनेसे हम तीनों ही बलात् मुक्त हो गये।

एक बार गया जाना और एक बार वहाँ पितरोंको पिण्ड देना भी दुर्लभ है; फिर नित्य वहीं रहनेका अवसर मिले, इसके लिये तो कहना ही क्या है! देश-कालके प्रमाणानुसार कहीं-कहीं मृत्युकालसे एक वर्ष बीतनेके बाद अपने भाई-बन्धु पतित पुरुषोंके लिये गयाकूपमें पिण्डदान करते हैं। एक समय किसी प्रेतराजने एक वैश्यसे अपनी मुक्तिके लिये अनुरोध करते हुए कहा—तुम गयातीर्थका दर्शन करके स्नान कर लेना और पवित्र होकर मेरा नाम ले मेरे लिये पिण्डदान करना। वहाँ पिण्ड देनेसे मैं अनायास ही प्रेतभावसे मुक्त हो सम्पूर्ण दाताओंको प्राप्त होनेवाले शुभ लोकोंमें चला जाऊँगा। वैश्यसे ऐसा कहकर अनुयायियोंसहित प्रेतराजने एकान्तमें विधिपूर्वक अपने नाम आदि अच्छी तरह बताये। वैश्य धनोपार्जन करके परम उत्तम गयातीर्थ नामक तीर्थमें गया। उस महाबुद्धि वैश्यने वहाँ पहले अपने पितरोंको पिण्ड आदि देकर फिर सब प्रेतोंके लिये क्रमशः पिण्डदान और धनदान किया। उसने अपने पितरों तथा अन्य कुटुम्बीजनोंके लिये भी पिण्डदान किया था। वैश्यद्वारा इस प्रकार पिण्ड दिये जानेपर वे सभी प्रेत प्रेतभावसे छूटकर द्विजत्वको प्राप्त हो ब्रह्मलोकमें चले गये। गयामें किये हुए श्राद्ध, जप, होम और तप अक्षय होते हैं। यदि पिताकी क्षयाह-तिथिको पुत्रोंद्वारा ये कर्म किये जायँ तो वे मोक्षकी प्राप्ति करानेवाले

  • उत्तरभाग * | ६७३ ---|---

होते हैं। पितृगण नरकके भयसे पीड़ित हो पुत्रकी अभिलाषा करते हैं और सोचते हैं—जो कोई पुत्र गया जायगा, वह हमें तार देगा।

गयामें धर्मपृष्ठ, ब्रह्मसभा, गयाशीर्ष तथा अक्षयवटके समीप पितरोंके लिये जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय होता है। ब्रह्मारण्य, धर्मपृष्ठ और धेनुकारण्य—इनका दर्शन करके वहाँ पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपनी बीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। महान् कल्पपर्यन्त किया हुआ पाप गयामें पहुँचनेपर नष्ट हो जाता है। गोतीर्थ और गृध्रवटतीर्थमें किया हुआ श्राद्धदान महान् फल देनेवाला होता है। वहाँ सब मनुष्य मतङ्गके आश्रमका दर्शन करते हैं और सब लोकोंके समक्ष ‘धर्मसर्वस्व’ की घोषणा करते हैं*। वहाँ पवित्र पङ्कजवन नामक तीर्थ है, जो पुण्यात्मा पुरुषोंसे सेवित है, जिसमें पिण्डदान दिया जाता है। वह सबके लिये दर्शनीय तीर्थ है। तृतीयातीर्थ, पादतीर्थ, निःक्षीरामण्डलतीर्थ, महाह्रद तथा कौशिकीतीर्थ—इन सबमें किया हुआ श्राद्ध महान् फल देनेवाला होता है। मुण्डपृष्ठमें परम बुद्धिमान् महादेवजीने अपना पैर दे रखा है। अन्य तीर्थोंमें अनेक सौ वर्षोंतक जो दुष्कर तपस्या की जाती है, उसके समान फल यहाँ थोड़े ही समयके तीर्थसेवनसे प्राप्त हो जाता है। धर्मपरायण मनुष्य इस तीर्थमें आकर अपनी समस्त पापराशिको तत्काल दूर कर देता है, ठीक उसी तरह जैसे साँप पुरानी केंचुलको त्याग देता है। वहीं मुण्डपृष्ठतीर्थके उत्तर भागमें कनकनन्दा नामसे विख्यात तीर्थ है, जहाँ ब्रह्मर्षिगण निवास करते हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य अपने शरीरके साथ स्वर्गलोकको जाते हैं। वहाँ किया हुआ श्राद्ध, दान सदा अक्षय कहा गया है। सुलोचने! वहाँ निःक्षीरामें तीन दिनतक स्नान करके मानसरोवरमें नहाकर श्राद्ध करे। उत्तरमानसमें जाकर मनुष्य परम उत्तम सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो अपनी शक्ति और बलके अनुसार वहाँ श्राद्ध करता है, वह दिव्य भोगों और मोक्षके सम्पूर्ण उपायोंको प्राप्त कर लेता है। तदनन्तर ब्रह्मसरोवरतीर्थमें जाय, जो ब्रह्मयूपसे सुशोभित है। वहाँ श्राद्ध करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। सुभगे! तदनन्तर लोकविख्यात धेनुकतीर्थमें जाय। वहाँ एक रात रहकर तिलमयी धेनुका दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो निश्चय ही चन्द्रलोकमें जाता है। तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् महादेवजीके गृध्रवट नामक स्थानको जाय। वहाँ भगवान् शङ्करके समीप जाकर अपने अङ्गोंमें भस्म लगावे। देवि! ऐसा करनेसे ब्राह्मणोंको तो बारह वर्षोंतक किये जानेवाले व्रतका पुण्य प्राप्त होता है और अन्य वर्णके लोगोंका सारा पाप नष्ट हो जाता है।

तत्पश्चात् उदयगिरि पर्वतपर जाय; जहाँ दिव्य संगीतकी ध्वनि गूँजती रहती है। वहाँ सावित्रीदेवीका परम पुण्यदायक पदचिह्न दृष्टिगोचर होता है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण वहाँ संध्योपासना करे। इससे बारह वर्षोंतक संध्योपासना करनेका फल प्राप्त होता है। विधिनन्दिनि! वहीं योनिद्वार है। वहाँ जानेसे मनुष्य योनि-संकटसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें गयातीर्थमें निवास करता है, वह अपने कुलकी सात पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है। सुभगे! तदनन्तर महान् फलदायक धर्मपृष्ठ


* अग्निपुराणमें ‘धर्मसर्वस्व’ की घोषणाका स्वरूप इस प्रकार स्पष्ट किया गया है। मतङ्गवापीमें स्नान करके श्राद्धकर्ता पुरुष वहाँ पिण्डदान करे और मतङ्गेश्वरको, जो सुसिद्धोंके अधीश्वर हैं, नमस्कार करके इस प्रकार कहे—'सब देवता प्रमाण देनेवाले और समस्त लोकपाल भी साक्षी रहें, मैंने इस मतङ्गतीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार किया है' (देखिये अग्निपुराण अध्याय ११५ श्लोक ३४-३५)।

६७४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


नामक तीर्थमें जाय, जहाँ पितृलोकका पालन करनेवाले साक्षात् धर्मराज विराजमान हैं। वहाँ जानेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। तदनन्तर मनुष्य परम उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाय, वहाँ ब्रह्माजीके समीप जानेसे राजसूय-यज्ञका फल मिलता है। तदनन्तर फल्गुतीर्थमें जाय। वह प्रचुर फल-मूलसे सम्पन्न और विख्यात है। वहीं कौशिकी नदी है, जहाँ किया हुआ श्राद्ध अक्षय माना गया है। वहाँसे उस पर्वतपर जाय, जो परम पुण्यात्मा, धर्मज्ञ राजर्षि गयके द्वारा सुरक्षित रहा है। वहीं गयशिर नामका सरोवर है, जहाँ पुण्यसलिला महानदी विद्यमान हैं। ऋषियोंसे सेवित परम पुण्यमय ब्रह्मसरोवर नामक तीर्थ भी वहीं है, जहाँ भगवान् अगस्त्य वैवस्वत यमसे मिले थे और जहाँ सनातन धर्मराज निरन्तर निवास करते हैं। वहाँ सब सरिताओंका उद्गम दिखायी देता है और पिनाकपाणि महादेव वहाँ नित्य निवास करते हैं। लोकविख्यात अक्षयवट भी वहीं है। पूर्वकालमें यजमान राजा गयने वहाँ यज्ञ किया था। वहाँ प्रकट हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गा गयके यज्ञोंमें सुरक्षित थीं। मुण्डपृष्ठ, गया, रैवत, देवगिरि, तृतीय, क्रौञ्चपाद—इन सबका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। शिवनदीमें शिवकरका, गयामें गदाधरका और सर्वत्र परमात्माका दर्शन करके मनुष्य पापराशिसे मुक्त हो जाता है। काशीमें विशालाक्षी, प्रयागमें ललितादेवी, गयामें मङ्गलादेवी तथा कृतशौचतीर्थमें सैंहिकादेवीका दर्शन करनेसे भी उक्त फलकी प्राप्ति होती है। गयामें रहकर मनुष्य जो कुछ दान करता है, वह सब अक्षय होता है। उसके उत्तम कर्मसे पितर प्रसन्न होते हैं। पुत्र गयामें स्थित होकर जो अन्नदान करता है, उसीसे पितर अपनेको पुत्रवान् मानते हैं।


गयामें प्रथम और द्वितीय दिनके कृत्यका वर्णन, प्रेतशिला आदि तीर्थोंमें पिण्डदान आदिकी विधि और उन तीर्थोंकी महिमा

**पुरोहित वसु कहते हैं—**मोहिनी! सुनो, अब मैं प्रेतशिलाका पवित्र माहात्म्य बतलाता हूँ, जहाँ पिण्डदान करके मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार करता है। प्रभासात्रिने शिलाके चरणप्रान्तको आच्छादित कर रखा है। मुनियोंसे संतुष्ट हुए प्रभास शिलाके अङ्गुष्ठभागसे प्रकट हुए। अङ्गुष्ठभागमें ही भगवान् शङ्कर स्थित हैं। इसलिये वे प्रभासेश कहे गये हैं। शिलाके अङ्गुष्ठका जो एक देश है, उसीमें प्रभासेशकी स्थिति है और वहीं प्रेतशिलाकी स्थिति है। वहाँ पिण्डदान करनेसे मनुष्य प्रेतयोनिसे मुक्त हो जाता है, इसीलिये उसका नाम 'प्रेतशिला' है। महानदी तथा प्रभासात्रिके सङ्गममें स्नान करनेवाला पुरुष साक्षात् वामदेव (शिव)-स्वरूप हो जाता है। इसीलिये उक्त सङ्गमको 'वामतीर्थ' कहा गया है। देवताओंके प्रार्थना करनेपर भगवान् श्रीरामने जब महानदीमें स्नान किया, तभीसे वहाँ सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाला 'रामतीर्थ' प्रकट हुआ। मनुष्य अपने सहस्रों जन्मोंमें जो पापराशि संग्रह करते हैं, वह सब रामतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाती है। जो मनुष्य—

राम राम महाबाहो देवानांमभयंकर॥
त्वां नमस्ये तु देवेश मम नश्यतु पातकम्।
(ना० उत्तर० ४५। ८-९)

'महाबाहु राम! देवताओंको अभय देनेवाले श्रीराम! आपको नमस्कार करता हूँ। देवेश! मेरा पातक नष्ट हो जाय।'

—इस मन्त्रद्वारा रामतीर्थमें स्नान करके श्राद्ध एवं पिण्डदान करता है, वह विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। प्रभासेश्वरको नमस्कार करके भासमान शिवके समीप जाना चाहिये और उन भगवान्

  • उत्तरभाग * | ६७५ ---|---

शिवको नमस्कार करके यमराजको बलि दे और इस प्रकार कहे—'देवेश ! आप ही जल हैं तथा आप ही ज्योतियोंके अधिपति हैं। आप मेरे मन, वचन, शरीर और क्रियाद्वारा उत्पन्न हुए समस्त पापोंका शीघ्र नाश कीजिये।' शिलाके जघन प्रदेशको यमराजने दबा रखा है। धर्मराजने पर्वतसे कहा—'न गच्छ' (गमन न करो—हिलो-डुलो मत), इसलिये पर्वतको 'नग' कहते हैं। यमराजको बलि देनेके पश्चात् उनके दो कुत्तोंको भी अन्नकी बलि या पिण्ड देना चाहिये। उस समय इस प्रकार कहे—'वैवस्वतकुलमें उत्पन्न जो दो श्याम और सबल नामवाले कुत्ते हैं, उनके लिये मैं पिण्ड दूँगा। ये दोनों हिंसा न करें।' तत्पश्चात् प्रेतशिला आदि तीर्थमें घृतयुक्त चरुके द्वारा पिण्ड बनावे और पितरोंका आवाहन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उनके लिये पिण्ड दे। प्रेतशिलापर पवित्रचित्त हो जनेऊको अपसव्य करके दक्षिण दिशाकी ओर मुँह किये हुए पितरोंका ध्यान एवं स्मरण करे—'कव्यवाहक, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् और सोमपा—ये सब पितृ-देवता हैं। हे महाभाग पितृदेवताओ! आप यहाँ पधारें और आपके द्वारा सुरक्षित मेरे पितर एवं मेरे कुलमें उत्पन्न हुए जो भाई-बन्धु हों, वे भी यहाँ आवें। मैं उन सबको पिण्ड देनेके लिये इस गयातीर्थमें आया हूँ। वे सब-के-सब इस श्राद्ध-दानसे अक्षय तृप्तिलाभ करें।'

तत्पश्चात् आचमन करके पञ्चाङ्ग-न्यासपूर्वक यत्नतः प्राणायाम करे; फिर देश-काल आदिका उच्चारण करके 'अस्मत् पितॄणां पुनरावृत्तिरहित-ब्रह्मलोकाप्तिहेतवे गयाश्राद्धमहं करिष्ये' (अपने पितरोंको पुनरावृत्तिरहित ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेके लिये मैं गयाश्राद्ध करूँगा) ऐसा संकल्प करके शास्त्रोक्त क्रमसे विधिपूर्वक श्राद्ध करे। पहले श्राद्धके स्थानको पृथक्-पृथक् पञ्चगव्यसे सींचकर पितरोंका आवाहन-पूजन करे। तत्पश्चात् मन्त्रोंद्वारा पिण्डदान करे। पहले सपिण्ड पितरोंको श्राद्धका पिण्ड देकर उनके दक्षिण भागमें कुश बिछाकर उनके लिये एक बार तिल और जलकी अञ्जलि दे। अञ्जलिमें तिल और जल लेकर यत्नपूर्वक पितृतीर्थसे उनके लिये अञ्जलि देनी चाहिये; फिर एक मुट्ठी सत्तूसे अक्षय्य पिण्ड दे। पिण्डद्रव्योंमें तिल, घी, दही और मधु आदि मिलाना चाहिये। सम्बन्धियोंका तिल आदिके द्वारा कुशोंपर आवाहन करना चाहिये। श्राद्धमें माता, पितामही और प्रपितामहीके लिये जो तीन मन्त्र-वाक्य बोले जाते हैं, उनमें यथास्थान स्त्रीलिङ्गका उच्चारण करना चाहिये। सम्बन्धियोंके लिये भी पूर्ववत् पितरोंका आवाहन करते हुए पहलेकी ही भाँति पिण्ड दे। अपने गोत्रमें या पराये गोत्रमें पति-पत्नीके लिये पिण्ड देते समय यदि पृथक्-पृथक् श्राद्ध, पिण्डदान और तर्पण नहीं किया गया तो वह व्यर्थ है। पिण्डपात्रमें तिल देकर उसे शुभ जलसे भर दे और मन्त्रपाठपूर्वक उस जलसे प्रदक्षिणक्रमसे उन सब पिण्डोंको तीन बार सींचे। तत्पश्चात् प्रणाम करके क्षमा-प्रार्थना करे। तदनन्तर पितरोंका विसर्जन करके आचमन करनेके पश्चात् साक्षी देवताओंको सुना दे। मोहिनी! सब स्थानोंमें इसी प्रकार पिण्डदान करना चाहिये।

गयामें पिण्डदानके लिये समय एवं मुहूर्त्तका विचार नहीं करना चाहिये। मलमास हो, जन्मदिन हो, गुरु और शुक्र अस्त हों, अथवा बृहस्पति सिंहराशिपर स्थित हों तो भी गयाश्राद्ध नहीं छोड़ना चाहिये। संन्यासी गयामें जाकर दण्ड दिखावे, पिण्डदान न करे। वह विष्णुपदमें दण्ड रखकर पितरोंसहित मुक्त हो जाता है। गयामें खीर, सत्तू, आटा, चरु अथवा चावल आदिसे भी पिण्डदान किया जाता है। शुभगे! गयाजीका दर्शन करके महापापी और पातकी भी पवित्र एवं श्राद्ध-कर्मका

६७६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


अधिकारी हो जाता है और श्राद्ध करनेपर वह ब्रह्मलोकका भागी होता है। फल्गुतीर्थमें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य जिस फलको पाता है, उसे जो एक लाख अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करता है, वह भी नहीं पाता। मनुष्यको गयामें जाकर अवश्य पिण्डदान करना चाहिये। वहाँके पिण्ड पितरोंको अत्यन्त प्रिय हैं। इस कार्यमें न तो विलम्ब करना चाहिये और न विघ्न डालना चाहिये।

(श्राद्धकर्ताको गयामें इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—) पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, मातामहके पिता प्रमातामह आदि (अर्थात् वृद्धप्रमातामह, मातामही, प्रमातामही और वृद्धप्रमातामही)—इन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्डदान अक्षय होकर प्राप्त हो। मेरे कुलमें जो मरे हैं, जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। मेरे भाई-बन्धुओंके कुलमें जो लोग मरे हैं और जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो फाँसीपर लटककर मरे हैं, जहर खाने या शस्त्रोंके आघातसे जिनकी मृत्यु हुई है और जो आत्मघाती हैं, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो यमदूतोंके अधीन होकर सब नरकोंमें यातनाएँ भोगते हैं, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्डदान करता हूँ। जो पशुयोनिमें पड़े हैं, पक्षी, कीट एवं सर्पका शरीर धारण कर चुके हैं अथवा जो वृक्षोंकी योनिमें स्थित हैं, उन सबके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। द्युलोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वीपर स्थित जो पितर और भाई-बन्धु आदि हैं तथा संस्कारहीन अवस्थामें जिनकी मृत्यु हुई है, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो मेरे भाई-बन्धु हों अथवा न हों या दूसरे जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षय होकर मिले। जो मेरे पिताके कुलमें मरे हैं, जो माताके कुलमें मरे हैं, जो गुरु, श्वशुर तथा बन्धु-बान्धवोंके कुलमें मरे हैं एवं इनके सिवा जो दूसरे भाई-बन्धु मृत्युको प्राप्त हुए हैं, मेरे कुलमें जिनका पिण्डदान-कर्म नहीं हुआ है, जो स्त्री-पुत्रसे रहित हैं, जिनके श्राद्धकर्मका लोप हो गया है, जो जन्मसे अन्धे और पङ्गु रहे हैं, जो विकृतरूपवाले या कच्चे गर्भकी दशामें मरे हैं, मेरे कुलमें मरे हुए जो लोग मेरे परिचित या अपरिचित हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षयभावसे प्राप्त हो। ब्रह्मा और शिव आदि सब देवता साक्षी रहें। मैंने गयामें आकर पितरोंका उद्धार किया है। देव गदाधर! मैं पितृकार्य (श्राद्ध)-के लिये गयामें आया हूँ। भगवन्! आप ही इस बातके साक्षी हैं। मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया*।


* साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मोशानादयस्तथा। मया गयां समासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता ॥
आगतोऽस्मि गयां देव पितृकार्ये गदाधर। त्वमेव साक्षी भगवन्नृणोऽहमृणत्रयात् ॥
(ना० उत्तर० ४५।५८-५९)

\ उत्तरभाग \ ६७७

* उत्तरभाग * ६७७


दूसरे दिन पवित्र होकर प्रेतपर्वतपर जाय और वहाँ ब्रह्मकुण्डमें स्नान करके विद्वान् पुरुष देवता आदिका तर्पण करे। फिर पवित्र होकर प्रेतपर्वतपर पितरोंका आवाहन करे और पूर्ववत् संकल्प करके पिण्ड दे। परम उत्तम पितृदेवताओंकी उनके नाम-मन्त्रोंद्वारा भलीभाँति पूजा करके उनके लिये पिण्डदान करे। मनुष्य पितृ-कर्ममें जितने तिल ग्रहण करता है, उतने ही असुर भयभीत होकर इस प्रकार भागते हैं, जैसे गरुड़को देखकर सर्प भाग जाते हैं। मोहिनी! उस प्रेतपर्वतपर पूर्ववत् सब कार्य करे। तत्पश्चात् वहाँ तिलमिश्रित सत्तू दे और इस प्रकार प्रार्थना करे—

ये केचित्प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम॥
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु सक्तुभिस्तिलमिश्रितैः।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं यत्किञ्चित् सचराचरम्॥
मया दत्तेन पिण्डेन तृप्तिमायान्तु सर्वशः।
(ना० उत्तर० ४५। ६४—६६)

‘जो कोई मेरे पितर प्रेतरूपमें विद्यमान हैं, वे सब इन तिलमिश्रित सत्तुओंके दानसे तृप्ति-लाभ करें। ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त जो कुछ भी चराचर जगत् है, वह मेरे दिये हुए पिण्डसे पूर्णतः तृप्त हो जाय।’

सबसे पहले पाँच तीर्थोंमें तथा उत्तरमानसमें श्राद्ध करनेकी विधि है। हाथमें कुश लेकर आचमन करके कुशयुक्त जलसे अपना मस्तक सींचे और उत्तरमानसमें जाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

उत्तरे मानसे स्नानं करोम्यात्मविशुद्धये।
सूर्यलोकादिसम्प्राप्तिसिद्धये पितृमुक्तये॥ ६८॥

‘मैं उत्तरमानसमें आत्मशुद्धि, सूर्यादि लोकोंकी प्राप्ति तथा पितरोंकी मुक्तिके लिये स्नान करता हूँ।’

इस प्रकार स्नान करके विधिपूर्वक देवता आदिका तर्पण करे और अन्तमें इस प्रकार कहे—

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥ ६९-७०॥

‘ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त समस्त जगत्, देवता, ऋषि, दिव्य पितर, मनुष्य, पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह और प्रमातामह आदि सब लोग तृप्त हो जायँ।’

अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार पिण्डदानसहित श्राद्ध करना चाहिये। अष्टकाश्राद्ध, आभ्युदयिकश्राद्ध, गयाश्राद्ध तथा क्षयाह तिथिको किये जानेवाले एकोद्दिष्ट श्राद्धमें माताके लिये पृथक् श्राद्ध करना चाहिये और अन्यत्र पतिके साथ ही संयुक्तरूपसे उसके लिये श्राद्ध करना उचित है। तदनन्तर—

ॐ नमोऽस्तु भानवे भर्त्रे सोमभौमज्ञरूपिणे।
जीवभार्गवशनैश्चरराहुकेतुस्वरूपिणे ॥ ७२ ॥

‘सोम, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु तथा केतु—ये सब जिनके स्वरूप हैं, सबका भरण-पोषण करनेवाले उन भगवान् सूर्यको नमस्कार है।’

—इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यको नमस्कार करके उनकी पूजा करे। ऐसा करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको सूर्यलोकमें पहुँचा देता है। मानसरोवर पूर्वोक्त प्रेतपर्वत आदिसे यहाँ उत्तरमें स्थित है, इसलिये इसे उत्तरमानस कहते हैं। उत्तरमानससे मौन होकर दक्षिणमानसकी यात्रा करनी चाहिये। उत्तरमानससे उत्तर दिशामें उदीची नामक तीर्थ है, जो पितरोंको मोक्ष देनेवाला है। उदीची और मुण्डपृष्ठके मध्यभागमें देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंको तृप्त करनेवाला कनखलतीर्थ है, जो पितरोंको उत्तम गति देनेवाला है। वहाँ स्नान करके मनुष्य कुकनककी भाँति प्रकाशित होता है और अत्यन्त पवित्र हो जाता है; इसीलिये वह परम उत्तम तीर्थ लोकमें कनखल नामसे विख्यात है। कनखलसे दक्षिण भागमें दक्षिणमानसतीर्थ

६७८* संक्षिप्त नारदपुराण *

है। दक्षिणमानसमें तीन तीर्थ बताये गये हैं। उन सबमें विधिपूर्वक स्नान करके पृथक्-पृथक् श्राद्ध करना चाहिये। स्नानके समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे— दिवाकर करोमीह स्नानं दक्षिणमानसे। ब्रह्महत्यादिपापौघघातनाय विमुक्तये ॥ ७८-७९ ॥ ‘भगवन् दिवाकर! मैं ब्रह्महत्या आदि पापोंके समुदायका नाश करने और मोक्ष पानेके लिये यहाँ दक्षिणमानसतीर्थमें स्नान करता हूँ।’

यहाँ स्नान-पूजन आदि करके पिण्डसहित श्राद्ध करे और अन्तमें पुनः भगवान् सूर्यको प्रणाम करते हुए निम्नाङ्कित वाक्य कहे— नमामि सूर्यं तृप्त्यर्थं पितॄणां तारणाय च। पुत्रपौत्रधनैश्वर्याद्यायुरारोग्यवृद्धये ॥८०॥ ‘मैं पितरोंकी तृप्ति तथा उद्धारके लिये और पुत्र, पौत्र, धन, ऐश्वर्य आदि आयु तथा आरोग्यकी वृद्धिके लिये भगवान् सूर्यको प्रणाम करता हूँ।’

इस प्रकार मौनभावसे सूर्यका दर्शन और पूजन करके नीचे लिखे मन्त्रका उच्चारण करे— कव्यवाडादयो ये च पितॄणां देवतास्तथा। मदीयैः पितृभिः सार्द्धं तर्पिताः स्थ स्वधाभुजः ॥ ८१-८२ ॥ ‘कव्यवाड्, अनल आदि जो पितरोंके देवता हैं, वे मेरे पितरोंके साथ तृप्त होकर स्वधाका उपभोग करें।’

वहाँसे सब तीर्थोंमें परम उत्तम फल्गुतीर्थको जाय। वहाँ श्राद्ध करनेसे सदा पितरोंकी तथा श्राद्धकर्ताकी भी मुक्ति होती है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे भगवान् विष्णु स्वयं फल्गुरूपसे प्रकट हुए थे। दक्षिणाग्निमें ब्रह्माजीके द्वारा जो होम किया गया, निश्चय ही उसीसे फल्गुतीर्थका प्रादुर्भाव हुआ; जिसमें स्नान आदि करनेसे घरकी लक्ष्मी फलती-फूलती है, गौ कामधेनु होकर मनोवाञ्छित फल देती है तथा वहाँका जल और भूतल भी मनोवाञ्छित फल देता है। सृष्टिके अन्तर्गत फल्गुतीर्थ कभी निष्फल नहीं होता। समस्त लोकोंमें जो सम्पूर्ण तीर्थ हैं, वे सब फल्गुतीर्थमें स्नान करनेके लिये आते हैं। गङ्गाजी भगवान् विष्णुका चरणोदक हैं और फल्गुरूपमें साक्षात् भगवान् आदिगदाधर प्रकट हुए हैं। वे स्वयं ही द्रव (जल)-रूपमें विराजमान हैं, अतः फल्गुतीर्थको गङ्गासे अधिक माना गया है। फल्गुके जलमें स्नान करनेसे सहस्र अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। (उसमें स्नान करते समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—) फल्गुतीर्थे विष्णुजले करोमि स्नानमद्य वै। पितॄणां विष्णुलोकाय भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये ॥८८॥ ‘भगवान् विष्णु ही जिसके जल हैं, उस फल्गुतीर्थमें आज मैं स्नान करता हूँ। इसका उद्देश्य यह है कि पितरोंको विष्णुलोककी और मुझे भोग एवं मोक्षकी प्राप्ति हो।’

फल्गुतीर्थमें स्नान करके मनुष्य अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार तर्पण एवं पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करे। तत्पश्चात् शिवलिङ्गरूपमें स्थित ब्रह्माजीको नमस्कार करे— नमः शिवाय देवाय ईशानपुरुषाय च। अघोरवामदेवाय सद्योजाताय शम्भवे ॥ ९० ॥ ‘ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात—इन पाँच नामोंसे प्रसिद्ध कल्याणमय भगवान् शिवको नमस्कार है।’

इस मन्त्रसे पितामहको नमस्कार करके उनकी पूजा करनी चाहिये। फल्गुतीर्थमें स्नान करके यदि मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन और उनको नमस्कार करे तो वह पितरोंसहित अपने-आपको वैकुण्ठधाममें ले जाता है। (भगवान् गदाधरको नमस्कार करते समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़ना चाहिये—) ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय श्रीधराय च विष्णवे ॥ ९२-९३ ॥ ‘वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध—

उत्तरभाग ६७१

  • उत्तरभाग * ६७१

इन चार व्यूहोंवाले सर्वव्यापी भगवान् श्रीधरको नमस्कार है।'

पाँच तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। जो भगवान् गदाधरको पाँच तीर्थोंके जलसे स्नान कराकर उन्हें पुष्प और वस्त्र आदिसे सुशोभित नहीं करता, उसका किया हुआ श्राद्ध व्यर्थ होता है। नागकूट, गृध्रकूट, भगवान् विष्णु तथा उत्तरमानस—इन चारोंके मध्यका भाग 'गयाशिर' कहलाता है। इसीको फल्गुतीर्थ कहते हैं। मुण्डपृष्ठ पर्वतके नीचे परम उत्तम फल्गुतीर्थ हैं। उसमें श्राद्ध आदि करनेसे सब पितर मोक्षको प्राप्त होते हैं। यदि मनुष्य गयाशिरतीर्थमें शमीपत्रके बराबर भी पिण्डदान करता है तो वह जिसके नामसे पिण्ड देता है, उसे सनातन ब्रह्मपदको पहुँचा देता है। जो भगवान् विष्णु अव्यक्त रूप होते हुए भी मुण्डपृष्ठ पर्वत तथा फल्गु आदि तीर्थोंके रूपमें सबके सामने अभिव्यक्त हैं, उन भगवान् गदाधरको मैं नमस्कार करता हूँ। शिला पर्वत तथा फल्गु आदि रूपमें अव्यक्तभावसे स्थित हुए भगवान् श्रीहरि आदिगदाधररूपसे सबके समक्ष प्रकट हुए हैं।

तदनन्तर धर्मारण्यतीर्थको जाय, जहाँ साक्षात् धर्म विराजमान हैं। वहाँ मतङ्गवापीमें स्नान करके तर्पण और श्राद्ध करे। फिर मतङ्गेश्वरके समीप जाकर उन्हें नमस्कार करते हुए निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—

प्रमाणं देवताः शम्भुर्लोकपालाश्च साक्षिणः।
मयागत्य मतङ्गेऽस्मिन् पितॄणां निष्कृतिः कृता ॥ १०१-१०२ ॥

'सब देवता और भगवान् शङ्कर प्रमाणभूत हैं तथा समस्त लोकपाल भी साक्षी हैं। मैंने इस मतङ्गतीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार किया है—उनका ऋण चुकाया है।'

पहले ब्रह्मतीर्थमें, फिर ब्रह्मकूपमें श्राद्ध आदि करे। कूप और यूपके मध्यभागमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष पितरोंका उद्धार कर देता है। धर्मेश्वर धर्मको नमस्कार करके महाबोधि वृक्षको प्रणाम करे। मोहिनी! यह दूसरे दिनका कृत्य मैंने तुम्हें बताया है। स्नान, तर्पण, पिण्डदान, पूजन और नमस्कार आदिके साथ किया हुआ श्राद्धकर्म पितरोंको सुख देनेवाला होता है।


गयामें तीसरे और चौथे दिनका कृत्य, ब्रह्मतीर्थ तथा विष्णुपद आदिकी महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी! अब मैं तुम्हें गयाजीमें तीसरे दिनका कृत्य बतलाता हूँ, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है। उसका श्रवण गया-सेवनका फल देनेवाला है। 'ब्रह्मसर' में स्नान करके पिण्डसहित श्राद्ध करना चाहिये। (स्नानके समय इस प्रकार कहे—)

स्नानं करोमि तीर्थेऽस्मिन्नृणत्रयविमुक्तये ॥
श्राद्धाय पिण्डदानाय तर्पणायार्थसिद्धये।
(ना० उत्तर० ४६ । २-३)

'मैं तीनों ऋणोंसे मुक्ति पाने, श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान करने तथा अभीष्ट मनोरथोंकी सिद्धिके लिये इस तीर्थमें स्नान करता हूँ।'

ब्रह्मकूप और ब्रह्मयूपके मध्यभागमें स्नान, तर्पण एवं श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। स्नान करके 'ब्रह्मयूप' नामसे प्रसिद्ध जो ऊँचा यूप है, वहाँ श्राद्ध करे। ब्रह्मसरमें श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। गोप्रचारतीर्थके समीप ब्रह्माजीके द्वारा उत्पन्न किये हुए आम्रवृक्ष हैं, उनको सींचनेमात्रसे पितृगण मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। [आम्रवृक्षको सींचते समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—]

आम्रं ब्रह्मसरोद्भूतं सर्वदेवमयं विभुम्।
विष्णुरूपं प्रसिञ्चामि पितॄणां चैव मुक्तये ॥ ६॥

'ब्रह्मसरमें प्रकट हुआ आम्रवृक्ष सर्वदेवमय

६८० * संक्षिप्त नारदपुराण *

है, वह सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका स्वरूप है। मैं पितरोंकी तृप्तिके लिये उसका अभिषेक करता हूँ।'

एक मुनि हाथमें जलसे भरा हुआ घड़ा और कुशका अग्रभाग लेकर आमकी जड़में पानी दे रहे थे। उन्होंने आमको भी सींचा और पितरोंको भी तृप्त किया। उनकी एक ही क्रिया दो प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली हुई। ब्रह्मयूपकी परिक्रमा करके मनुष्य वाजपेय-यज्ञका फल पाता है और ब्रह्माजीको नमस्कार करके अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें ले जाता है। (निम्नाङ्कित मन्त्रसे ब्रह्माजीको नमस्कार करना चाहिये—)

ॐ नमो ब्रह्मणेऽजाय जगज्जन्मादिकारिणे।
भक्तानां च पितॄणां च तारकाय नमो नमः॥ ९॥

'जगत्की सृष्टि, पालन आदि करनेवाले सच्चिदानन्द-स्वरूप अजन्मा ब्रह्माजीको नमस्कार है। भक्तों और पितरोंके उद्धारक पितामहको बारम्बार नमस्कार है।'

तत्पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्रसे इन्द्रिय-संयमपूर्वक यमराजके लिये बलि दे—

यमराजधर्मराजौ निश्चलार्था इति स्थितौ।
ताभ्यां बलिं प्रयच्छामि पितॄणां मुक्तिहेतवे॥ १०-११॥

'यमराज और धर्मराज—दोनों सुस्थिर प्रयोजनवाले हैं। मैं पितरोंकी मुक्तिके लिये उन दोनोंको बलि अर्पित करता हूँ।'

मोहिनी! इसके बाद 'द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ'— इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रसे कुत्तोंके लिये बलि देकर नीचे लिखे मन्त्रद्वारा संयमपूर्वक काकबलि समर्पित करे—

ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा।
वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयार्पितम् ॥ १२-१३॥

'पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, वायव्य कोण तथा नैर्ऋत्यकोणके कौए भूमिपर मेरे दिये हुए इस पिण्डको ग्रहण करें।'

तत्पश्चात् हाथमें कुश लेकर ब्रह्मतीर्थमें स्नान करे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष तीसरे दिनका नियम समाप्त करके भगवान् गदाधरको नमस्कार करे और ब्रह्मचर्य पालन करता रहे। चौथे दिन फल्गुतीर्थमें स्नान आदि कार्य करे। फिर गयाशिरमें 'पद' पर पिण्डदानसहित श्राद्ध करे। वहाँ फल्गुतीर्थमें साक्षात् 'गयाशिर' का निवास है। क्रौञ्चपादसे लेकर फल्गुतीर्थतक—साक्षात् गयाशिर है। गयाशिरपर वृक्ष, पर्वत आदि भी हैं, किंतु वह साक्षात् रूपसे फल्गुतीर्थस्वरूप है। फल्गुतीर्थ गयासुरका मुख है। अतः वहाँ स्नान करके श्राद्ध करना चाहिये। आदिदेव भगवान् गदाधर व्यक्त और अव्यक्त रूपका आश्रय ले पितरोंकी मुक्तिके लिये विष्णुपद आदिके रूपमें विद्यमान हैं। वहाँ जो दिव्य विष्णुपद है, वह दर्शनमात्रसे पापका नाश करनेवाला है। स्पर्श और पूजन करनेपर वह पितरोंको मोक्ष देनेवाला है। विष्णुपदमें पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य अपनी सहस्र पीढ़ियोंका उद्धार करके उन्हें विष्णुलोक पहुँचा देता है। रुद्रपद अथवा शुभ ब्रह्मपदमें श्राद्ध करके पुरुष अपने ही साथ अपनी सौ पीढ़ियोंको शिवधाममें पहुँचा देता है। दक्षिणाग्निपदमें श्राद्ध करनेवाला वाजपेय-यज्ञका और गार्हपत्यपदमें श्राद्ध करनेवाला राजसूय-यज्ञका फल पाता है। चन्द्रपदमें श्राद्ध करके अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। सत्यपदमें श्राद्ध करनेसे ज्योतिष्टोम-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। आवसथ्यपदमें श्राद्ध करनेवाला चन्द्रलोकको जाता है और इन्द्रपदमें श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको इन्द्रलोक पहुँचा देता है। दूसरे-दूसरे देवताओंके जो पद हैं, उनमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। सबमें काश्यपपद श्रेष्ठ है। विष्णुपद, रुद्रपद तथा ब्रह्मपदको भी सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। मोहिनी! आरम्भ और समाप्तिके दिनमें इनमेंसे किसी एक पदपर श्राद्ध

  • उत्तरभाग * | ६८१

करना श्राद्धकर्ताके लिये भी श्रेयस्कर होता है।

पूर्वकालमें भीष्मजीने विष्णुपदपर श्राद्ध करते समय अपने पितरोंका आवाहन करके विधिपूर्वक श्राद्ध किया और जब वे पिण्डदानके लिये उद्यत हुए, उस समय गयाशिरमें उनके पिता शन्तनुके दोनों हाथ सामने निकल आये। परंतु भीष्मजीने भूमिपर ही पिण्ड दिया, क्योंकि शास्त्रमें हाथपर पिण्ड देनेका अधिकार नहीं दिया गया है। भीष्मके इस व्यवहारसे सन्तुष्ट होकर शन्तनु बोले—'बेटा! तुम शास्त्रीय सिद्धान्तपर दृढ़तापूर्वक डटे हुए हो, अतः त्रिकालदर्शी होओ और अन्तमें तुम्हें भगवान् विष्णुकी प्राप्ति हो; साथ ही जब तुम्हारी इच्छा हो, तभी मृत्यु तुम्हारा स्पर्श करे।' ऐसा कहकर शन्तनु मुक्त हो गये।

भगवान् श्रीराम रमणीय रुद्रपदमें आकर जब पिण्डदान करनेको उद्यत हुए, उस समय पिता दशरथ स्वर्गसे हाथ फैलाये हुए वहाँ आये। किंतु श्रीरामने उनके हाथमें पिण्ड नहीं दिया। शास्त्रकी आज्ञाका उल्लङ्घन न हो जाय, इसलिये उन्होंने रुद्रपदपर ही उस पिण्डको रखा। तब दशरथने श्रीरामसे कहा—'पुत्र! तुमने मुझे तार दिया। रुद्रपदपर पिण्ड देनेसे मुझे रुद्रलोककी प्राप्ति हुई है। तुम चिरकालतक राज्यका शासन, अपनी प्रजाका पालन तथा दक्षिणासहित यज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने विष्णुलोकको जाओगे। तुम्हारे साथ अयोध्याके सब लोग, कीड़े-मकोड़ेतक वैकुण्ठधाममें जायँगे।' श्रीरामसे ऐसा कहकर राजा दशरथ परम उत्तम रुद्रलोकको चले गये।

कनकेश, केदार, नारसिंह और वामन—इनकी रथमार्गमें पूजा करके मनुष्य अपने समस्त पितरोंका उद्धार कर देता है। जो गयाशिरमें जिनके नामसे पिण्ड देते हैं, उनके वे पितर यदि नरकमें हों तो स्वर्गमें जाते हैं और स्वर्गमें हों तो मोक्षलाभ करते हैं। जो गयाशिरमें कन्द, मूल, फल आदिके द्वारा शमीपत्रके बराबर भी पिण्ड देता है, वह अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। जहाँ विष्णु आदिके पद दिखायी देते हैं, वहाँ उनके आगे जिनके पदपर श्राद्ध किया जाता है, उन्हींके लोकोंमें मनुष्य अपने पितरोंको भेजता है। इन पदोंके द्वारा सर्वत्र मुण्डपृष्ठ पर्वत ही लक्षित होता है। वहाँ पूजित होनेवाले पितर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं। एक मुनि मुण्डपृष्ठमें कौञ्चरूपसे तपस्या करते थे। उनके चरणोंका चिह्न जहाँ लक्षित होता है, वह क्रौञ्चपद माना गया है। भगवान् विष्णु आदिके पद यहाँ लिङ्गरूपमें स्थित हैं। देवता आदिका तर्पण करके रुद्रपदसे प्रारम्भ करके श्राद्ध करना चाहिये। मोहिनी! यह चौथे दिनका कृत्य बताया गया है। इसे करके मनुष्य पवित्र एवं श्राद्धकर्मका अधिकारी होता है और श्राद्ध करनेपर वह ब्रह्मलोकका भागी होता है। शिलापर स्थित तीर्थोंमें स्नान और तर्पण करके जिनके लिये पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध किया जाता है, वे ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ कल्पपर्यन्त सानन्द निवास करते हैं।