भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished770 पृष्ठ

६७६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


अधिकारी हो जाता है और श्राद्ध करनेपर वह ब्रह्मलोकका भागी होता है। फल्गुतीर्थमें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य जिस फलको पाता है, उसे जो एक लाख अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करता है, वह भी नहीं पाता। मनुष्यको गयामें जाकर अवश्य पिण्डदान करना चाहिये। वहाँके पिण्ड पितरोंको अत्यन्त प्रिय हैं। इस कार्यमें न तो विलम्ब करना चाहिये और न विघ्न डालना चाहिये।

(श्राद्धकर्ताको गयामें इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—) पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, मातामहके पिता प्रमातामह आदि (अर्थात् वृद्धप्रमातामह, मातामही, प्रमातामही और वृद्धप्रमातामही)—इन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्डदान अक्षय होकर प्राप्त हो। मेरे कुलमें जो मरे हैं, जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। मेरे भाई-बन्धुओंके कुलमें जो लोग मरे हैं और जिनकी उत्तम गति नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो फाँसीपर लटककर मरे हैं, जहर खाने या शस्त्रोंके आघातसे जिनकी मृत्यु हुई है और जो आत्मघाती हैं, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो यमदूतोंके अधीन होकर सब नरकोंमें यातनाएँ भोगते हैं, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्डदान करता हूँ। जो पशुयोनिमें पड़े हैं, पक्षी, कीट एवं सर्पका शरीर धारण कर चुके हैं अथवा जो वृक्षोंकी योनिमें स्थित हैं, उन सबके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। द्युलोक, अन्तरिक्ष और पृथ्वीपर स्थित जो पितर और भाई-बन्धु आदि हैं तथा संस्कारहीन अवस्थामें जिनकी मृत्यु हुई है, उनके लिये मैं पिण्ड देता हूँ। जो मेरे भाई-बन्धु हों अथवा न हों या दूसरे जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षय होकर मिले। जो मेरे पिताके कुलमें मरे हैं, जो माताके कुलमें मरे हैं, जो गुरु, श्वशुर तथा बन्धु-बान्धवोंके कुलमें मरे हैं एवं इनके सिवा जो दूसरे भाई-बन्धु मृत्युको प्राप्त हुए हैं, मेरे कुलमें जिनका पिण्डदान-कर्म नहीं हुआ है, जो स्त्री-पुत्रसे रहित हैं, जिनके श्राद्धकर्मका लोप हो गया है, जो जन्मसे अन्धे और पङ्गु रहे हैं, जो विकृतरूपवाले या कच्चे गर्भकी दशामें मरे हैं, मेरे कुलमें मरे हुए जो लोग मेरे परिचित या अपरिचित हों, उन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिण्ड अक्षयभावसे प्राप्त हो। ब्रह्मा और शिव आदि सब देवता साक्षी रहें। मैंने गयामें आकर पितरोंका उद्धार किया है। देव गदाधर! मैं पितृकार्य (श्राद्ध)-के लिये गयामें आया हूँ। भगवन्! आप ही इस बातके साक्षी हैं। मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया*।


* साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मोशानादयस्तथा। मया गयां समासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता ॥
आगतोऽस्मि गयां देव पितृकार्ये गदाधर। त्वमेव साक्षी भगवन्नृणोऽहमृणत्रयात् ॥
(ना० उत्तर० ४५।५८-५९)

\ उत्तरभाग \ ६७७

* उत्तरभाग * ६७७


दूसरे दिन पवित्र होकर प्रेतपर्वतपर जाय और वहाँ ब्रह्मकुण्डमें स्नान करके विद्वान् पुरुष देवता आदिका तर्पण करे। फिर पवित्र होकर प्रेतपर्वतपर पितरोंका आवाहन करे और पूर्ववत् संकल्प करके पिण्ड दे। परम उत्तम पितृदेवताओंकी उनके नाम-मन्त्रोंद्वारा भलीभाँति पूजा करके उनके लिये पिण्डदान करे। मनुष्य पितृ-कर्ममें जितने तिल ग्रहण करता है, उतने ही असुर भयभीत होकर इस प्रकार भागते हैं, जैसे गरुड़को देखकर सर्प भाग जाते हैं। मोहिनी! उस प्रेतपर्वतपर पूर्ववत् सब कार्य करे। तत्पश्चात् वहाँ तिलमिश्रित सत्तू दे और इस प्रकार प्रार्थना करे—

ये केचित्प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम॥
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु सक्तुभिस्तिलमिश्रितैः।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं यत्किञ्चित् सचराचरम्॥
मया दत्तेन पिण्डेन तृप्तिमायान्तु सर्वशः।
(ना० उत्तर० ४५। ६४—६६)

‘जो कोई मेरे पितर प्रेतरूपमें विद्यमान हैं, वे सब इन तिलमिश्रित सत्तुओंके दानसे तृप्ति-लाभ करें। ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त जो कुछ भी चराचर जगत् है, वह मेरे दिये हुए पिण्डसे पूर्णतः तृप्त हो जाय।’

सबसे पहले पाँच तीर्थोंमें तथा उत्तरमानसमें श्राद्ध करनेकी विधि है। हाथमें कुश लेकर आचमन करके कुशयुक्त जलसे अपना मस्तक सींचे और उत्तरमानसमें जाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्नान करे। उस समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

उत्तरे मानसे स्नानं करोम्यात्मविशुद्धये।
सूर्यलोकादिसम्प्राप्तिसिद्धये पितृमुक्तये॥ ६८॥

‘मैं उत्तरमानसमें आत्मशुद्धि, सूर्यादि लोकोंकी प्राप्ति तथा पितरोंकी मुक्तिके लिये स्नान करता हूँ।’

इस प्रकार स्नान करके विधिपूर्वक देवता आदिका तर्पण करे और अन्तमें इस प्रकार कहे—

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥ ६९-७०॥

‘ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त समस्त जगत्, देवता, ऋषि, दिव्य पितर, मनुष्य, पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह और प्रमातामह आदि सब लोग तृप्त हो जायँ।’

अपनी शाखाके गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार पिण्डदानसहित श्राद्ध करना चाहिये। अष्टकाश्राद्ध, आभ्युदयिकश्राद्ध, गयाश्राद्ध तथा क्षयाह तिथिको किये जानेवाले एकोद्दिष्ट श्राद्धमें माताके लिये पृथक् श्राद्ध करना चाहिये और अन्यत्र पतिके साथ ही संयुक्तरूपसे उसके लिये श्राद्ध करना उचित है। तदनन्तर—

ॐ नमोऽस्तु भानवे भर्त्रे सोमभौमज्ञरूपिणे।
जीवभार्गवशनैश्चरराहुकेतुस्वरूपिणे ॥ ७२ ॥

‘सोम, मङ्गल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु तथा केतु—ये सब जिनके स्वरूप हैं, सबका भरण-पोषण करनेवाले उन भगवान् सूर्यको नमस्कार है।’

—इस मन्त्रसे भगवान् सूर्यको नमस्कार करके उनकी पूजा करे। ऐसा करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको सूर्यलोकमें पहुँचा देता है। मानसरोवर पूर्वोक्त प्रेतपर्वत आदिसे यहाँ उत्तरमें स्थित है, इसलिये इसे उत्तरमानस कहते हैं। उत्तरमानससे मौन होकर दक्षिणमानसकी यात्रा करनी चाहिये। उत्तरमानससे उत्तर दिशामें उदीची नामक तीर्थ है, जो पितरोंको मोक्ष देनेवाला है। उदीची और मुण्डपृष्ठके मध्यभागमें देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंको तृप्त करनेवाला कनखलतीर्थ है, जो पितरोंको उत्तम गति देनेवाला है। वहाँ स्नान करके मनुष्य कुकनककी भाँति प्रकाशित होता है और अत्यन्त पवित्र हो जाता है; इसीलिये वह परम उत्तम तीर्थ लोकमें कनखल नामसे विख्यात है। कनखलसे दक्षिण भागमें दक्षिणमानसतीर्थ

६७८* संक्षिप्त नारदपुराण *

है। दक्षिणमानसमें तीन तीर्थ बताये गये हैं। उन सबमें विधिपूर्वक स्नान करके पृथक्-पृथक् श्राद्ध करना चाहिये। स्नानके समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे— दिवाकर करोमीह स्नानं दक्षिणमानसे। ब्रह्महत्यादिपापौघघातनाय विमुक्तये ॥ ७८-७९ ॥ ‘भगवन् दिवाकर! मैं ब्रह्महत्या आदि पापोंके समुदायका नाश करने और मोक्ष पानेके लिये यहाँ दक्षिणमानसतीर्थमें स्नान करता हूँ।’

यहाँ स्नान-पूजन आदि करके पिण्डसहित श्राद्ध करे और अन्तमें पुनः भगवान् सूर्यको प्रणाम करते हुए निम्नाङ्कित वाक्य कहे— नमामि सूर्यं तृप्त्यर्थं पितॄणां तारणाय च। पुत्रपौत्रधनैश्वर्याद्यायुरारोग्यवृद्धये ॥८०॥ ‘मैं पितरोंकी तृप्ति तथा उद्धारके लिये और पुत्र, पौत्र, धन, ऐश्वर्य आदि आयु तथा आरोग्यकी वृद्धिके लिये भगवान् सूर्यको प्रणाम करता हूँ।’

इस प्रकार मौनभावसे सूर्यका दर्शन और पूजन करके नीचे लिखे मन्त्रका उच्चारण करे— कव्यवाडादयो ये च पितॄणां देवतास्तथा। मदीयैः पितृभिः सार्द्धं तर्पिताः स्थ स्वधाभुजः ॥ ८१-८२ ॥ ‘कव्यवाड्, अनल आदि जो पितरोंके देवता हैं, वे मेरे पितरोंके साथ तृप्त होकर स्वधाका उपभोग करें।’

वहाँसे सब तीर्थोंमें परम उत्तम फल्गुतीर्थको जाय। वहाँ श्राद्ध करनेसे सदा पितरोंकी तथा श्राद्धकर्ताकी भी मुक्ति होती है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे भगवान् विष्णु स्वयं फल्गुरूपसे प्रकट हुए थे। दक्षिणाग्निमें ब्रह्माजीके द्वारा जो होम किया गया, निश्चय ही उसीसे फल्गुतीर्थका प्रादुर्भाव हुआ; जिसमें स्नान आदि करनेसे घरकी लक्ष्मी फलती-फूलती है, गौ कामधेनु होकर मनोवाञ्छित फल देती है तथा वहाँका जल और भूतल भी मनोवाञ्छित फल देता है। सृष्टिके अन्तर्गत फल्गुतीर्थ कभी निष्फल नहीं होता। समस्त लोकोंमें जो सम्पूर्ण तीर्थ हैं, वे सब फल्गुतीर्थमें स्नान करनेके लिये आते हैं। गङ्गाजी भगवान् विष्णुका चरणोदक हैं और फल्गुरूपमें साक्षात् भगवान् आदिगदाधर प्रकट हुए हैं। वे स्वयं ही द्रव (जल)-रूपमें विराजमान हैं, अतः फल्गुतीर्थको गङ्गासे अधिक माना गया है। फल्गुके जलमें स्नान करनेसे सहस्र अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। (उसमें स्नान करते समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—) फल्गुतीर्थे विष्णुजले करोमि स्नानमद्य वै। पितॄणां विष्णुलोकाय भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये ॥८८॥ ‘भगवान् विष्णु ही जिसके जल हैं, उस फल्गुतीर्थमें आज मैं स्नान करता हूँ। इसका उद्देश्य यह है कि पितरोंको विष्णुलोककी और मुझे भोग एवं मोक्षकी प्राप्ति हो।’

फल्गुतीर्थमें स्नान करके मनुष्य अपने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार तर्पण एवं पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करे। तत्पश्चात् शिवलिङ्गरूपमें स्थित ब्रह्माजीको नमस्कार करे— नमः शिवाय देवाय ईशानपुरुषाय च। अघोरवामदेवाय सद्योजाताय शम्भवे ॥ ९० ॥ ‘ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात—इन पाँच नामोंसे प्रसिद्ध कल्याणमय भगवान् शिवको नमस्कार है।’

इस मन्त्रसे पितामहको नमस्कार करके उनकी पूजा करनी चाहिये। फल्गुतीर्थमें स्नान करके यदि मनुष्य भगवान् गदाधरका दर्शन और उनको नमस्कार करे तो वह पितरोंसहित अपने-आपको वैकुण्ठधाममें ले जाता है। (भगवान् गदाधरको नमस्कार करते समय निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़ना चाहिये—) ॐ नमो वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय श्रीधराय च विष्णवे ॥ ९२-९३ ॥ ‘वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध—

उत्तरभाग ६७१

  • उत्तरभाग * ६७१

इन चार व्यूहोंवाले सर्वव्यापी भगवान् श्रीधरको नमस्कार है।'

पाँच तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। जो भगवान् गदाधरको पाँच तीर्थोंके जलसे स्नान कराकर उन्हें पुष्प और वस्त्र आदिसे सुशोभित नहीं करता, उसका किया हुआ श्राद्ध व्यर्थ होता है। नागकूट, गृध्रकूट, भगवान् विष्णु तथा उत्तरमानस—इन चारोंके मध्यका भाग 'गयाशिर' कहलाता है। इसीको फल्गुतीर्थ कहते हैं। मुण्डपृष्ठ पर्वतके नीचे परम उत्तम फल्गुतीर्थ हैं। उसमें श्राद्ध आदि करनेसे सब पितर मोक्षको प्राप्त होते हैं। यदि मनुष्य गयाशिरतीर्थमें शमीपत्रके बराबर भी पिण्डदान करता है तो वह जिसके नामसे पिण्ड देता है, उसे सनातन ब्रह्मपदको पहुँचा देता है। जो भगवान् विष्णु अव्यक्त रूप होते हुए भी मुण्डपृष्ठ पर्वत तथा फल्गु आदि तीर्थोंके रूपमें सबके सामने अभिव्यक्त हैं, उन भगवान् गदाधरको मैं नमस्कार करता हूँ। शिला पर्वत तथा फल्गु आदि रूपमें अव्यक्तभावसे स्थित हुए भगवान् श्रीहरि आदिगदाधररूपसे सबके समक्ष प्रकट हुए हैं।

तदनन्तर धर्मारण्यतीर्थको जाय, जहाँ साक्षात् धर्म विराजमान हैं। वहाँ मतङ्गवापीमें स्नान करके तर्पण और श्राद्ध करे। फिर मतङ्गेश्वरके समीप जाकर उन्हें नमस्कार करते हुए निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—

प्रमाणं देवताः शम्भुर्लोकपालाश्च साक्षिणः।
मयागत्य मतङ्गेऽस्मिन् पितॄणां निष्कृतिः कृता ॥ १०१-१०२ ॥

'सब देवता और भगवान् शङ्कर प्रमाणभूत हैं तथा समस्त लोकपाल भी साक्षी हैं। मैंने इस मतङ्गतीर्थमें आकर पितरोंका उद्धार किया है—उनका ऋण चुकाया है।'

पहले ब्रह्मतीर्थमें, फिर ब्रह्मकूपमें श्राद्ध आदि करे। कूप और यूपके मध्यभागमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष पितरोंका उद्धार कर देता है। धर्मेश्वर धर्मको नमस्कार करके महाबोधि वृक्षको प्रणाम करे। मोहिनी! यह दूसरे दिनका कृत्य मैंने तुम्हें बताया है। स्नान, तर्पण, पिण्डदान, पूजन और नमस्कार आदिके साथ किया हुआ श्राद्धकर्म पितरोंको सुख देनेवाला होता है।


गयामें तीसरे और चौथे दिनका कृत्य, ब्रह्मतीर्थ तथा विष्णुपद आदिकी महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी! अब मैं तुम्हें गयाजीमें तीसरे दिनका कृत्य बतलाता हूँ, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है। उसका श्रवण गया-सेवनका फल देनेवाला है। 'ब्रह्मसर' में स्नान करके पिण्डसहित श्राद्ध करना चाहिये। (स्नानके समय इस प्रकार कहे—)

स्नानं करोमि तीर्थेऽस्मिन्नृणत्रयविमुक्तये ॥
श्राद्धाय पिण्डदानाय तर्पणायार्थसिद्धये।
(ना० उत्तर० ४६ । २-३)

'मैं तीनों ऋणोंसे मुक्ति पाने, श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान करने तथा अभीष्ट मनोरथोंकी सिद्धिके लिये इस तीर्थमें स्नान करता हूँ।'

ब्रह्मकूप और ब्रह्मयूपके मध्यभागमें स्नान, तर्पण एवं श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। स्नान करके 'ब्रह्मयूप' नामसे प्रसिद्ध जो ऊँचा यूप है, वहाँ श्राद्ध करे। ब्रह्मसरमें श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। गोप्रचारतीर्थके समीप ब्रह्माजीके द्वारा उत्पन्न किये हुए आम्रवृक्ष हैं, उनको सींचनेमात्रसे पितृगण मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। [आम्रवृक्षको सींचते समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—]

आम्रं ब्रह्मसरोद्भूतं सर्वदेवमयं विभुम्।
विष्णुरूपं प्रसिञ्चामि पितॄणां चैव मुक्तये ॥ ६॥

'ब्रह्मसरमें प्रकट हुआ आम्रवृक्ष सर्वदेवमय

६८० * संक्षिप्त नारदपुराण *

है, वह सर्वव्यापी भगवान् विष्णुका स्वरूप है। मैं पितरोंकी तृप्तिके लिये उसका अभिषेक करता हूँ।'

एक मुनि हाथमें जलसे भरा हुआ घड़ा और कुशका अग्रभाग लेकर आमकी जड़में पानी दे रहे थे। उन्होंने आमको भी सींचा और पितरोंको भी तृप्त किया। उनकी एक ही क्रिया दो प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाली हुई। ब्रह्मयूपकी परिक्रमा करके मनुष्य वाजपेय-यज्ञका फल पाता है और ब्रह्माजीको नमस्कार करके अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें ले जाता है। (निम्नाङ्कित मन्त्रसे ब्रह्माजीको नमस्कार करना चाहिये—)

ॐ नमो ब्रह्मणेऽजाय जगज्जन्मादिकारिणे।
भक्तानां च पितॄणां च तारकाय नमो नमः॥ ९॥

'जगत्की सृष्टि, पालन आदि करनेवाले सच्चिदानन्द-स्वरूप अजन्मा ब्रह्माजीको नमस्कार है। भक्तों और पितरोंके उद्धारक पितामहको बारम्बार नमस्कार है।'

तत्पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्रसे इन्द्रिय-संयमपूर्वक यमराजके लिये बलि दे—

यमराजधर्मराजौ निश्चलार्था इति स्थितौ।
ताभ्यां बलिं प्रयच्छामि पितॄणां मुक्तिहेतवे॥ १०-११॥

'यमराज और धर्मराज—दोनों सुस्थिर प्रयोजनवाले हैं। मैं पितरोंकी मुक्तिके लिये उन दोनोंको बलि अर्पित करता हूँ।'

मोहिनी! इसके बाद 'द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ'— इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रसे कुत्तोंके लिये बलि देकर नीचे लिखे मन्त्रद्वारा संयमपूर्वक काकबलि समर्पित करे—

ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा।
वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयार्पितम् ॥ १२-१३॥

'पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, वायव्य कोण तथा नैर्ऋत्यकोणके कौए भूमिपर मेरे दिये हुए इस पिण्डको ग्रहण करें।'

तत्पश्चात् हाथमें कुश लेकर ब्रह्मतीर्थमें स्नान करे। इस प्रकार विद्वान् पुरुष तीसरे दिनका नियम समाप्त करके भगवान् गदाधरको नमस्कार करे और ब्रह्मचर्य पालन करता रहे। चौथे दिन फल्गुतीर्थमें स्नान आदि कार्य करे। फिर गयाशिरमें 'पद' पर पिण्डदानसहित श्राद्ध करे। वहाँ फल्गुतीर्थमें साक्षात् 'गयाशिर' का निवास है। क्रौञ्चपादसे लेकर फल्गुतीर्थतक—साक्षात् गयाशिर है। गयाशिरपर वृक्ष, पर्वत आदि भी हैं, किंतु वह साक्षात् रूपसे फल्गुतीर्थस्वरूप है। फल्गुतीर्थ गयासुरका मुख है। अतः वहाँ स्नान करके श्राद्ध करना चाहिये। आदिदेव भगवान् गदाधर व्यक्त और अव्यक्त रूपका आश्रय ले पितरोंकी मुक्तिके लिये विष्णुपद आदिके रूपमें विद्यमान हैं। वहाँ जो दिव्य विष्णुपद है, वह दर्शनमात्रसे पापका नाश करनेवाला है। स्पर्श और पूजन करनेपर वह पितरोंको मोक्ष देनेवाला है। विष्णुपदमें पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य अपनी सहस्र पीढ़ियोंका उद्धार करके उन्हें विष्णुलोक पहुँचा देता है। रुद्रपद अथवा शुभ ब्रह्मपदमें श्राद्ध करके पुरुष अपने ही साथ अपनी सौ पीढ़ियोंको शिवधाममें पहुँचा देता है। दक्षिणाग्निपदमें श्राद्ध करनेवाला वाजपेय-यज्ञका और गार्हपत्यपदमें श्राद्ध करनेवाला राजसूय-यज्ञका फल पाता है। चन्द्रपदमें श्राद्ध करके अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है। सत्यपदमें श्राद्ध करनेसे ज्योतिष्टोम-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। आवसथ्यपदमें श्राद्ध करनेवाला चन्द्रलोकको जाता है और इन्द्रपदमें श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको इन्द्रलोक पहुँचा देता है। दूसरे-दूसरे देवताओंके जो पद हैं, उनमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। सबमें काश्यपपद श्रेष्ठ है। विष्णुपद, रुद्रपद तथा ब्रह्मपदको भी सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। मोहिनी! आरम्भ और समाप्तिके दिनमें इनमेंसे किसी एक पदपर श्राद्ध

  • उत्तरभाग * | ६८१

करना श्राद्धकर्ताके लिये भी श्रेयस्कर होता है।

पूर्वकालमें भीष्मजीने विष्णुपदपर श्राद्ध करते समय अपने पितरोंका आवाहन करके विधिपूर्वक श्राद्ध किया और जब वे पिण्डदानके लिये उद्यत हुए, उस समय गयाशिरमें उनके पिता शन्तनुके दोनों हाथ सामने निकल आये। परंतु भीष्मजीने भूमिपर ही पिण्ड दिया, क्योंकि शास्त्रमें हाथपर पिण्ड देनेका अधिकार नहीं दिया गया है। भीष्मके इस व्यवहारसे सन्तुष्ट होकर शन्तनु बोले—'बेटा! तुम शास्त्रीय सिद्धान्तपर दृढ़तापूर्वक डटे हुए हो, अतः त्रिकालदर्शी होओ और अन्तमें तुम्हें भगवान् विष्णुकी प्राप्ति हो; साथ ही जब तुम्हारी इच्छा हो, तभी मृत्यु तुम्हारा स्पर्श करे।' ऐसा कहकर शन्तनु मुक्त हो गये।

भगवान् श्रीराम रमणीय रुद्रपदमें आकर जब पिण्डदान करनेको उद्यत हुए, उस समय पिता दशरथ स्वर्गसे हाथ फैलाये हुए वहाँ आये। किंतु श्रीरामने उनके हाथमें पिण्ड नहीं दिया। शास्त्रकी आज्ञाका उल्लङ्घन न हो जाय, इसलिये उन्होंने रुद्रपदपर ही उस पिण्डको रखा। तब दशरथने श्रीरामसे कहा—'पुत्र! तुमने मुझे तार दिया। रुद्रपदपर पिण्ड देनेसे मुझे रुद्रलोककी प्राप्ति हुई है। तुम चिरकालतक राज्यका शासन, अपनी प्रजाका पालन तथा दक्षिणासहित यज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने विष्णुलोकको जाओगे। तुम्हारे साथ अयोध्याके सब लोग, कीड़े-मकोड़ेतक वैकुण्ठधाममें जायँगे।' श्रीरामसे ऐसा कहकर राजा दशरथ परम उत्तम रुद्रलोकको चले गये।

कनकेश, केदार, नारसिंह और वामन—इनकी रथमार्गमें पूजा करके मनुष्य अपने समस्त पितरोंका उद्धार कर देता है। जो गयाशिरमें जिनके नामसे पिण्ड देते हैं, उनके वे पितर यदि नरकमें हों तो स्वर्गमें जाते हैं और स्वर्गमें हों तो मोक्षलाभ करते हैं। जो गयाशिरमें कन्द, मूल, फल आदिके द्वारा शमीपत्रके बराबर भी पिण्ड देता है, वह अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। जहाँ विष्णु आदिके पद दिखायी देते हैं, वहाँ उनके आगे जिनके पदपर श्राद्ध किया जाता है, उन्हींके लोकोंमें मनुष्य अपने पितरोंको भेजता है। इन पदोंके द्वारा सर्वत्र मुण्डपृष्ठ पर्वत ही लक्षित होता है। वहाँ पूजित होनेवाले पितर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं। एक मुनि मुण्डपृष्ठमें कौञ्चरूपसे तपस्या करते थे। उनके चरणोंका चिह्न जहाँ लक्षित होता है, वह क्रौञ्चपद माना गया है। भगवान् विष्णु आदिके पद यहाँ लिङ्गरूपमें स्थित हैं। देवता आदिका तर्पण करके रुद्रपदसे प्रारम्भ करके श्राद्ध करना चाहिये। मोहिनी! यह चौथे दिनका कृत्य बताया गया है। इसे करके मनुष्य पवित्र एवं श्राद्धकर्मका अधिकारी होता है और श्राद्ध करनेपर वह ब्रह्मलोकका भागी होता है। शिलापर स्थित तीर्थोंमें स्नान और तर्पण करके जिनके लिये पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध किया जाता है, वे ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं और वहाँ कल्पपर्यन्त सानन्द निवास करते हैं।


६८२* संक्षिप्त नारदपुराण *

गयामें पाँचवें दिनका कृत्य, गयाके विभिन्न तीर्थोंकी पृथक्-पृथक् महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी! पाँचवें दिन मनुष्य गदालोल-तीर्थमें पूर्ववत् स्नान आदि करके अक्षयवटके समीप पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करे। वहाँ श्राद्ध आदि करके वह अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उनकी पूजा करे। अक्षयवटके निकट श्राद्ध करके एकाग्रचित्त हो वटेश्वरका दर्शन, नमस्कार तथा पूजन करे। ऐसा करनेसे श्राद्धकर्ता पुरुष अपने पितरोंको अक्षय तथा सनातन ब्रह्मलोकमें भेज देता है। (गदालोल-तीर्थमें स्नान करते समय इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—)
गदालोले महातीर्थे गदाप्रक्षालने वरे॥
स्नानं करोमि शुद्ध्यर्थमक्ष्याय स्वराप्तये।
एकान्तरे वटस्याग्रे यः शेते योगनिद्रया॥
बालरूपधरस्तस्मै नमस्ते योगशायिने।
संसारवृक्षशस्त्रायाशेषपापक्षयाय च॥
अक्षय्यब्रह्मदात्रे च नमोऽक्षय्यवटाय वै।
(ना० उत्तर० ४७। ४–७)

'जहाँ भगवान्‌की गदा धोयी गयी है, उस गदालोल नामक श्रेष्ठ महातीर्थमें मैं आत्मशुद्धि तथा अक्षय स्वर्गकी प्राप्तिके लिये स्नान करता हूँ। जो बालरूप धारण करके वटकी शाखाके अग्रभागपर एकान्त स्थलमें योगनिद्राके द्वारा शयन करते हैं, उन योगशायी श्रीहरिको नमस्कार है। जो संसाररूपी वृक्षका उच्छेद करनेके लिये शस्त्ररूप हैं, जो समस्त पापोंका नाश तथा अक्षय ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले हैं, उन अक्षयवटस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है।'

(इसके बाद लिङ्गस्वरूप प्रपितामहको नमस्कार करे—)
कलौ माहेश्वरा लोका येन तस्माद् गदाधरः।
लिङ्गरूपोऽभवत् तं वन्दे त्वां प्रपितामहम्॥७-८॥

'कलियुगमें लोग प्रायः शिवभक्त होते हैं, इसलिये भगवान् गदाधर वहाँ शिवलिङ्गरूपमें प्रकट हुए हैं। प्रभो! आप पितामह ब्रह्माके भी पिता होनेसे प्रपितामहरूप हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।'

इस मन्त्रसे उन प्रपितामहदेवको नमस्कार करके मनुष्य अपने पितरोंको रुद्रलोकमें पहुँचा देता है। हेति नामसे प्रसिद्ध एक असुर था; भगवान्‌ने अपनी गदासे उस असुरके मस्तकके दो टुकड़े कर दिये। तत्पश्चात् जहाँ वह गदा धोयी गयी, वह गदालोल नामसे विख्यात श्रेष्ठ तीर्थ हो गया। हेति राक्षस ब्रह्माजीका पुत्र था। उसने बड़ी अद्भुत तपस्या की। तपस्यासे वरदायक ब्रह्मा आदि देवताओंको सन्तुष्ट करके यह वर माँगा—'मैं दैत्य आदिसे, शस्त्र आदिसे, नाना प्रकारके मनुष्योंसे तथा विष्णु और शिव आदिके चक्र एवं त्रिशूल आदि आयुधोंद्वारा अवध्य और महान् बलवान् होऊँ।' 'तथास्तु' कहकर देवता अन्तर्धान हो गये। तब हेतिने देवताओंको जीत लिया और स्वयं इन्द्रपदका उपभोग करने लगा। तब ब्रह्मा और शिव आदि देवता भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और बोले—'भगवन्! हेतिका वध कीजिये।'

भगवान्‌ने कहा—'देवताओ! हेति तो समस्त सुर और असुरोंके लिये अवध्य है। तुम लोग मुझे कोई ब्रह्माजीका अस्त्र दो, जिससे मैं हेतिको मारूँ।'

उनके ऐसा कहनेपर ब्रह्मादि देवताओंने भगवान् विष्णुको वह गदा दे दी और कहा—'उपेन्द्र! आप हेतिको मार डालिये।' देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ने वह गदा धारण की। फिर युद्धमें गदाधरने गदासे हेतिको मारकर देवताओंको स्वर्गलोक लौटा दिया।

तदनन्तर महानदीमें स्थित गायत्री-तीर्थमें उपवासपूर्वक स्नान करके गायत्रीदेवीके समक्ष

उत्तरभाग

  • उत्तरभाग * ६८३

सन्ध्योपासना करे। वहाँ पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य अपने कुलको ब्राह्मणत्वकी ओर ले जाता है। समुद्घात-तीर्थमें स्नान करके सावित्री-देवीके समक्ष मध्याह्नकालकी सन्ध्योपासना करके द्विज अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचा देता है। तत्पश्चात् प्राची सरस्वतीमें स्नान करके सरस्वती-देवीके समक्ष सायंकालीन सन्ध्योपासना करके मनुष्य अपने कुलको सर्वज्ञताकी प्राप्ति कराता है। वह अनेक जन्मोंतक किये हुए सन्ध्यालोपजनित पापसे सर्वथा शुद्ध हो जाता है। विशालामें लेलिहान-तीर्थमें, भरताश्रममें पदाङ्कित-तीर्थमें, मुण्डपृष्ठमें गदाधरके समीप, आकाशगङ्गातीर्थमें तथा गिरिकर्ण आदिमें श्राद्ध एवं पिण्डदान करनेवाला, गोदा वैतरणीमें स्नान करनेवाला एवं देवनदीमें, गोप्रचारमें, मानसतीर्थमें, पदस्वरूप-तीर्थोंमें, पुष्करिणीमें, गदालोल-तीर्थमें, अमरतीर्थमें, कोटीतीर्थमें तथा रुक्मकुण्डमें पिण्ड देनेवाला पुरुष अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। सुलोचने! मार्कण्डेयेश्वर तथा कोटीश्वरको नमस्कार करके मनुष्य अपने पितरोंको तार देता है तथा पुण्यदायिनी पाण्डुशिलाका दर्शनमात्र करनेसे मानव अपने नरकनिवासी पितरोंको भी पवित्र करके उन्हें स्वर्गलोकमें पहुँचाता है। पाण्डुशिलाके विषयमें यह उद्गार प्रकट करके राजा पाण्डु अविनाशी शाश्वत पदको प्राप्त हुए थे। घृतकुल्या, मधुकुल्या, देविका और महानदी—ये शिलामें संगत होकर मधुस्रवा कही गयी हैं। वहाँ स्नान करनेसे मानव दस हजार अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाता है।

दशाश्वमेधतीर्थ और हंसतीर्थमें श्राद्ध करनेसे श्राद्धकर्ता स्वर्गलोकमें जाता है। मतङ्गपदमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष ब्रह्मलोकका निवासी होता है। ब्रह्माजीने विष्णु आदिके साथ शमीगर्भमें अग्निका मन्थन करके एक नूतन तीर्थको उत्पन्न किया, जो मन्थोकुण्डके नामसे विख्यात है। वह पितरोंको मुक्ति देनेवाला तीर्थ है। वहाँ स्नान करके तर्पण और पिण्डदान करनेसे मनुष्य मोक्षका भागी होता है। रामेश्वर और करकेश्वरको नमस्कार करके मानव अपने पितरोंको स्वर्गमें भेज देता है। गयाकूपमें पिण्डदान करनेसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। भस्मकूटमें भस्मस्नान करनेसे मनुष्य अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। निःक्षीरा-संगममें स्नान करनेवाले मनुष्यके सारे पाप धुल जाते हैं। रामपुष्करिणीमें श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। वशिष्ठतीर्थमें वशिष्ठेश्वरको प्रणाम करके मनुष्य अश्वमेध-यज्ञके पुण्यका भागी होता है। धुनेकारण्यमें कामधेनु-पदोंपर स्नान करके पिण्ड देनेवाला पुरुष वहाँके देवताको नमस्कार करके पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। कर्दमालतीर्थमें, गयानाभिमें और मुण्डपृष्ठके समीप स्नान करके श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है। चण्डीदेवीको नमस्कार तथा फल्गुचण्डीश नामक संगमेश्वरका पूजन करनेसे भी पूर्वोक्त फलकी ही प्राप्ति होती है। गयागज, गयादित्य, गायत्री, गदाधर, गया और गयाशिर—ये छः प्रकारकी गया मुक्ति देनेवाली है। श्राद्धकर्ता जिस-जिस तीर्थमें जाय, वहीं जितेन्द्रियभावसे आदिगदाधरका ध्यान करते हुए ब्राह्मणके कथनानुसार श्राद्ध एवं पिण्डदान करे। तदनन्तर भगवान् जनार्दनका विधिपूर्वक पूजन करके दही और भातका उत्तम नैवेद्य अर्पण करे— तत्पश्चात् पिण्डदान करके भगवत्प्रसादसे ही जीवननिर्वाह करे। दैत्यके मुण्डपृष्ठपर वह शिला स्थित है, इसलिये मुण्डपृष्ठ नामक पर्वत पितरोंको ब्रह्मलोक देनेवाला है। श्रीरामचन्द्रजीके वनमें जानेके बाद उनके भाई भरत उस पर्वतपर आये थे। उन्होंने पिताको पिण्ड आदि देकर वहाँ रामेश्वरकी स्थापना की थी। जो एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान करके

६८४

  • संक्षिप्त नारदपुराण *

रामेश्वरको तथा राम और सीताको नमस्कार करता और श्राद्ध एवं पिण्डदान देता है, वह धर्मात्मा अपने पितरोंके साथ भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। शिलाके दक्षिण हाथमें स्थापित मुण्डपृष्ठतीर्थके समीप श्राद्ध आदि करनेसे मनुष्य अपने समस्त पितरोंको ब्रह्मलोक पहुँचा देता है। कुण्डने सीतागिरिके दक्षिण पर्वतपर बड़ी भारी तपस्या की थी, अतः उनके नामपर कुण्डपृष्ठतीर्थ विख्यात हुआ।

पुण्यमय मातङ्गपदमें पिण्ड देनेवाला पुरुष अपने पितरोंको स्वर्गमें पहुँचा देता है। शिलाके बायें हाथमें उद्यन्तक गिरिकी स्थापना हुई। यहाँ महात्मा अगस्त्यजीने उदयाचलको ले आकर स्थापित किया था। वहाँ पिण्ड देनेवाला पुरुष अपने पितरोंको ब्रह्मलोक भेज देता है। अगस्त्यजीने अपनी तपस्याके लिये वहाँ उद्यन्तक नामक कुण्डका निर्माण किया था। वहाँ ब्रह्माजी अपनी देवी सावित्री और सनकादि कुमारोंके साथ विराजमान हैं। हाहा, हूहू आदि गन्धर्वोंने वहाँ सङ्गीत और वाद्यका आयोजन किया था। अगस्त्यतीर्थमें स्नान करके मध्याह्नकालमें सावित्रीकी उपासना करनेपर पुरुष कोटि जन्मोंतक धनाढ्य तथा वेदवेत्ता ब्राह्मण होता है। अगस्त्यपदमें स्नान करके पिण्ड देनेवाला पुरुष पितरोंको स्वर्गकी प्राप्ति कराता है। जो मनुष्य ब्रह्मयोनिमें प्रवेश करके निकलता है, वह योनिसंकटसे मुक्त हो परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होता है । गयाकुमारको प्रणाम करके मनुष्य ब्राह्मणत्व पाता है। सोमकुण्डमें स्नान आदि करनेसे वह पितरोंको चन्द्रलोककी प्राप्ति कराता है। काकशिलामें कौओंके लिये दी हुई बलि क्षणभरमें मोक्ष देनेवाली है। स्वर्गद्वारेश्वरको नमस्कार करके मनुष्य अपने पितरोंको स्वर्गसे ब्रह्मलोकको भेज देता है। आकाश-गङ्गामें पिण्ड देनेवाला पुरुष स्वयं निर्मल होकर पितरोंको स्वर्गलोकमें भेज देता है। शिलाके दाहिने हाथमें धर्मराजने भस्मकूट धारण किया था। अतः वहाँ महादेवजीने अपना वही नाम रखा है। मोहिनी ! जहाँ भस्मकूट पर्वत है, वहीं भस्म नामधारी भगवान् शिव हैं। जहाँ वट है वहाँ वटेश्वर ब्रह्माजी स्थित हैं। उनके सामने रुक्मिणी-कुण्ड है और पश्चिममें कपिला नदी है। नदीके तटपर कपिलेश्वर महादेव हैं, वहीं उमा और सोमकी भेंट हुई थी। मनुष्य कपिलामें स्नान करके कपिलेश्वरको प्रणाम एवं उनका पूजन करे। वहाँ श्राद्धका दान करनेवाला पुरुष स्वर्गलोकका भागी होता है। महिषीकुण्डपर मङ्गलागौरीका निवास है, जो पूजित होनेपर पूर्ण सौभाग्यको देनेवाली है। भस्मकूटमें भगवान् जनार्दन हैं। उनके हाथमें अपने या दूसरेके लिये बिना तिलके और सव्यभावसे भी पिण्ड देनेवाला पुरुष जिनके लिये दधिमिश्रित पिण्ड देता है, वे सब विष्णुलोकगामी होते हैं। (वहाँ पिण्ड देकर भगवान्‌से इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—)

एष पिण्डो मया दत्तस्तव हस्ते जनार्दन।
गयाश्राद्धे त्वया देयो मह्यं पिण्डो मृते मयि॥
तुभ्यं पिण्डो मया दत्तो यमुद्दिश्य जनार्दन।
देहि देव गयाशीर्षे तस्मै तस्मै मृते ततः॥
जनार्दन नमस्तुभ्यं नमस्ते पितृरूपिणे।
पितृपात्र नमस्तुभ्यं नमस्ते मुक्तिहेतवे॥
गयायां पितृरूपेण स्वयमेव जनार्दनः।
तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं मुच्यते च ऋणत्रयात्॥
नमस्ते पुण्डरीकाक्ष ऋणत्रयविमोचन।
लक्ष्मीकान्त नमस्तेऽस्तु नमस्ते पितृमोक्षद॥
(ना० उत्तर० ४७। ६३-६७)

'जनार्दन ! मैंने आपके हाथमें यह पिण्ड दिया है। मेरे मरनेपर आप गयाश्राद्धमें मुझे पिण्ड दीजियेगा। जनार्दन ! जिसके उद्देश्यसे मैंने आपको पिण्ड दिया है, देव! उसके मरनेपर आप गयाशीर्षमें उसके लिये अवश्य पिण्ड दें। जनार्दन !

उत्तरभाग ६८५

  • उत्तरभाग * ६८५

आप पितृस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है, बारम्बार नमस्कार है। पितरोंके पात्ररूप नारायण! आपको नमस्कार है। आप सबकी मुक्तिके हेतुभूत हैं, आपको नमस्कार है। गयामें साक्षात् जनार्दन ही पितृरूपसे विद्यमान हैं। उन कमलनेत्र श्रीहरिका दर्शन करके मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। तीनों ऋणोंसे मुक्त करनेवाले लक्ष्मीकान्त! आपको नमस्कार है। पितरोंको मोक्ष देनेवाले प्रभो! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार कमलनयन भगवान् जनार्दनका पूजन करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। पृथ्वीपर बायाँ घुटना गिराकर भगवान् जनार्दनको नमस्कार करे। तत्पश्चात् पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध करनेवाला पुरुष भाइयोंसहित विष्णुलोकमें जाता है। शिलाके वाम भागमें प्रेतकूटगिरि स्थित है। प्रेतकूटगिरिको धर्मराजने धारण किया है। वहाँ प्रेतकुण्ड है, जहाँ पदोंके साथ देवता विद्यमान हैं। उसमें स्नान करके श्राद्ध-तर्पण आदि करनेवाला पुरुष पितरोंको प्रेतभावसे मुक्त कर देता है। कीकट प्रदेशमें गया, राजगृह वन, महर्षि च्यवनका आश्रम, पुनपुना नदी, वैकुण्ठ, लोहदण्ड तथा शौणग गिरिकूट—ये सब पवित्र हैं। उनमें श्राद्ध-पिण्डदान आदि करनेवाला पुरुष पितरोंको ब्रह्मधाममें पहुँचा देता है। शिलाके दक्षिण पादमें गृध्रकूटगिरि रखा गया है। धर्मराजने शिलाको स्थिर रखनेके लिये वहाँ उस पर्वतको स्थापित किया है। वह शीघ्र पवित्र करनेवाला है। वहाँ 'गृध्रेश्वर' नामक भगवान् शिव विराजमान हैं। गृध्रेश्वरका दर्शन और उनके समीप स्नान करके मनुष्य शिवधाममें जाता है। ऋणमोक्ष एवं पापमोक्ष नामवाले शिवजीका दर्शन करके मनुष्य शिवलोकमें जाता है। वहाँ विघ्नोंका नाश करनेवाले विघ्नेश्वर गणेशजी गजरूपसे निवास करते हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य विघ्नोंसे मुक्त होता है और पितरोंको भगवान् शिवके लोकमें पहुँचा देता है। स्नान करके गायत्री और गयादित्यका दर्शन करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है। प्रथम पादमें विराजमान ब्रह्माजीका दर्शन करके पुरुष अपने पितरोंका उद्धार कर देता है। जो नाभिमें पिण्ड देता है, वह पितरोंको ब्रह्मलोकमें पहुँचाता है। मुण्डपृष्ठकी शोभाके लिये श्रेष्ठ कमल उत्पन्न हुआ है। मुण्डपृष्ठ और अरविन्द दोनोंका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

जो हाथियों अथवा सर्पोंका अपराध करके मारा गया है; जो परायी स्त्रियोंसे रमण करते समय उनके पतियोंद्वारा मारे गये हैं; जो गौओंको आगमें जलाने या विष देनेवाले हैं, पाखण्डी तथा क्रूर बुद्धिवाले हैं; जो नराधम क्रोधमें आकर प्रायः विष खा लेते, आगमें जल मरते, अपने ऊपर हथियार चला लेते, फाँसी लगाकर मर जाते, पानीमें डूब मरते तथा वृक्ष एवं पर्वतसे नीचे कूदकर प्राण दे देते हैं; जो पाँच प्रकारकी हत्याके अधिकारी हैं तथा जो महापातकी हैं; वे सब-के-सब पतित कहे गये हैं। वे गयाकूपके स्नानसे तथा वहाँकी भस्म रमानेसे अवश्य शुद्ध हो जाते हैं। देवि! इस प्रकार गयातीर्थका उत्तम माहात्म्य सब पापोंको शान्त करनेवाला तथा पितरोंको मुक्ति देनेवाला है। जो मनुष्य इसे प्रतिदिन अथवा श्राद्ध एवं पर्वके दिन भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह भी ब्रह्मलोकका भागी होता है। वह कल्याणका आश्रय, पवित्र, धन्य तथा मानवोंको स्वर्गीय गति प्रदान करनेवाला है। यह माहात्म्य यश, आयु तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि करनेवाला है।

६८६* संक्षिप्त नारदपुराण *

अविमुक्त क्षेत्र—काशीपुरीकी महिमा

मान्धाता बोले— भगवन्! मोहिनीने पितरोंका उत्तम गति देनेवाले गया-माहात्म्यको सुनकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर वसुसे पुनः क्या पूछा?

वसिष्ठजी बोले— राजन्! सुनो, मोहिनीने पुनः जो प्रश्न किया, वह बतलाता हूँ।

मोहिनीने कहा— लोकोद्धारपरायण द्विजश्रेष्ठ! आपको बारम्बार साधुवाद है, आप बड़े दयालु हैं। ब्रह्मन्! मैंने गयाजीका परम उत्तम पवित्र माहात्म्य सुना, जो परम गोपनीय और पितरोंको सद्गति देनेवाला है। विप्रेन्द्र! अब काशीका उत्तम माहात्म्य बताइये।

वसिष्ठजी कहते हैं— मोहिनीका यह कथन सुनकर उसके पुरोहित वसु बोले—सुनो।

पुरोहित वसुने कहा— कल्याणमयी काशीपुरी धन्य है। भगवान् महेश्वर भी धन्य हैं, जो मुक्तिदायिनी वैष्णवपुरी काशीको श्रीहरिसे माँगकर निरन्तर उसका सेवन करते हैं। सनातनदेव भगवान् शङ्कर श्रीहरिके क्षेत्रमें ही विद्यमान हैं। वे भगवान् हृषीकेशकी पूजा करते हुए स्वयं भी देवता आदिसे पूजित होते हैं। काशीपुरी तीनों लोकोंका सार है। उस रमणीय नगरीका यदि सेवन किया जाय तो वह मनुष्योंको उत्तम गति देनेवाली है। नाना प्रकारके पापकर्म करनेवाले मनुष्य भी यहाँ आकर अपने पापोंका नाश करके रजोगुणरहित तथा शुद्ध अन्तःकरणके प्रकाशसे युक्त हो जाते हैं। इसे ‘वैष्णवक्षेत्र’ तथा ‘शैवक्षेत्र’ भी कहते हैं। यह सब प्राणियोंको मोक्ष देनेवाला है। महापातकी मनुष्य भी जब भगवान् शिवकी नगरी काशीपुरीमें आता है, तब उसका शरीर संसारके सुदृढ़ बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। जो पुण्यात्मा मनुष्य भगवान् विष्णु या भगवान् शिवके भक्त होकर सबको प्रतिदिन आदरबुद्धिसे देखते हुए इस क्षेत्रमें निवास करते हैं, वे शुद्ध संत पुरुष भगवान् शङ्करके समान हैं। वे भय, दुःख और पापसे रहित हो जाते हैं। उनके कर्मकलाप पूर्णतः शुद्ध होते हैं और वे जन्म-मृत्युके गहन जालका भेदन करके परम मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। काशीका विस्तार पूर्वसे पश्चिमकी ओर ढाई योजनतक है और दक्षिणसे उत्तरकी ओर असीसे वरणातक आधे योजनका विस्तार है। शुभे! असी शुष्क नदी है। भगवान् शिवने इस क्षेत्रका यही विस्तार बताया है। काशीमें जो तिमिचण्डेश्वर नामक शिवलिङ्ग है, उससे उत्तरायण जानना चाहिये और शंकुकर्णको दक्षिणायन। वह ॐकारमें स्थित है। तदनन्तर पिङ्गला नामक तीर्थ आग्नेय कोणमें स्थित बताया गया है। सूखी हुई नदी जो असी नामसे प्रसिद्ध है, उसीको पिङ्गला नाड़ी समझना चाहिये। उसीके आस-पास लोलार्कतीर्थ विद्यमान है। इडा नामकी नाड़ी सौम्या कही गयी है। उसीको वरणाके नामसे जानना चाहिये, जहाँ भगवान् केशवका स्थान है। इन दोनोंके बीचमें सुषुम्णा नाड़ीकी स्थिति कही गयी है। मत्स्योदरीको ही सुषुम्णा जानना चाहिये। इस महाक्षेत्रको भगवान् शिव और भगवान् विष्णुने कभी विमुक्त (परित्यक्त) नहीं किया है और न भविष्यमें भी करेंगे। इसीलिये इसका नाम ‘अविमुक्त’ है। शुभे! प्रयाग आदि दुस्तर (दुर्लभ) तीर्थसे भी काशीका माहात्म्य अधिक है, क्योंकि वहाँ सबको अनायास ही मोक्षकी प्राप्ति होती है।

निषिद्ध कर्म करनेवाले जो नाना वर्णके लोग हैं तथा महान् पातकों और पापोंसे परिपूर्ण शरीरवाले जो घृणित चाण्डाल आदि हैं, उन सबके लिये विद्वानोंने अविमुक्तक्षेत्रको उत्तम औषध माना है। वहाँ दुष्ट, अन्धे, दीन, कृपण, पापी और दुराचारी सबको भगवान् शिव अपनी कृपाशक्तिके द्वारा

उत्तरभाग ६८७

  • उत्तरभाग * ६८७

शीघ्र ही परम गतिकी प्राप्ति करा देते हैं। उत्तरवाहिनी गङ्गा और पूर्ववाहिनी सरस्वती अत्यन्त पवित्र मानी गयी हैं। वहीं कपालमोचन है। उस तीर्थमें जाकर जो श्राद्धमें पिण्डदानके द्वारा पितरोंको तृप्त करेंगे, उन्हें परम प्रकाशमान लोकोंकी प्राप्ति होती है। जो ब्रह्महत्यारा है, वह भी यदि कभी अविमुक्तक्षेत्र काशीकी यात्रा करे तो उस क्षेत्रके माहात्म्यसे उसकी ब्रह्महत्या निवृत्त हो जाती है। जो परम पुण्यात्मा मानव काशीपुरीमें गये हैं, वे अक्षय, अजर एवं शरीररहित परमात्मस्वरूप हो जाते हैं। कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और पुष्करमें भी वह सद्गति सुलभ नहीं है, जो काशीवासी मनुष्योंको प्राप्त होती है। वहाँ रहनेवाले प्राणियोंको सब प्रकारसे तप और सत्यका फल मिलता है, इसमें संशय नहीं है। काशीपुरीमें रहनेवाले दुष्कर्मी जीव वायुद्वारा उड़ायी हुई वहाँकी धूलिका स्पर्श पाकर परम गतिको प्राप्त कर लेते हैं। जो एक मासतक वहाँ जितेन्द्रियभावसे नियमित भोजन करते हुए निवास करता है, उसके द्वारा भलीभाँति महापाशुपत-व्रतका अनुष्ठान सम्पन्न हो जाता है। वह जन्म और मृत्युके भयको जीतकर परम गतिको प्राप्त होता है। वह पुण्यमयी निःश्रेयसगति तथा योगगतिको पा लेता है। सैकड़ों जन्मोंमें भी योगगति नहीं प्राप्त की जा सकती; परंतु काशीक्षेत्रके माहात्म्य तथा भगवान् शङ्करके प्रभावसे उसकी प्राप्ति हो जाती है। शुभानने! जो प्रतिदिन एक समय भोजन करके एक मासतक काशीमें निवास करता है, वह जीवनभरके पापको एक ही महीनेमें नष्ट कर देता है। जो मानव मृत्युपर्यन्त अविमुक्तक्षेत्रको नहीं छोड़ता और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक वहाँ निवास करता है, वह साक्षात् शङ्कर होता है। जो विघ्नोंसे आहत होकर भी काशी नहीं छोड़ता, वह जरा-मृत्यु तथा इस नश्वर जन्मसे छूट जाता है। जो इस देहका अन्त होनेतक निरन्तर काशीपुरीका सेवन करते हैं, वे मृत्युके पश्चात् हंसयुक्त विमानसे दिव्यलोकोंमें जाते हैं। जिसका चित्त विषयोंमें आसक्त है, जिसने भक्ति और सद्बुद्धि त्याग दी है, ऐसा मनुष्य भी इस काशीक्षेत्रमें मरकर फिर संसारबन्धनमें नहीं पड़ता। पृथ्वीपर यह काशी नामक श्रेष्ठ तीर्थ स्वर्ग तथा मोक्षका हेतु है। जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है, उसकी मुक्तिमें कोई संशय नहीं है। सहस्रों जन्मोंतक योगसाधन करके योगी जिस पदको पाता है, वही परम मोक्षरूप पद काशीमें मृत्यु होनेमात्रसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, म्लेच्छ, कीट-पतंग आदि पाप-योनिके जीव, कीड़े, चींटियाँ तथा दूसरे-दूसरे मृग और पक्षी आदि जीव काशीमें समयानुसार (अपने-आप) मृत्यु होनेपर देवेश्वर शिवरूप माने गये हैं। शुभे ! जो जीव वास्तवमें वहाँ प्राण-त्याग करते हैं, वे रुद्र-शरीर पाकर भगवान् शिवके समीप आनन्द भोगते हैं। मनुष्य

६८८* संक्षिप्त नारदपुराण *

सकाम हो या निष्काम अथवा वह पशु-पक्षीकी योनिमें क्यों न पड़ा हो, अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-में प्राण-त्याग करनेपर वह अवश्य ही मोक्षका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। जो मानव सदा भगवान् शिवकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले और उनके अनन्य भक्त हैं, उन्हींके चिन्तनमें जिनका चित्त आसक्त है और भगवान् शिवमें ही जिनके प्राण बसते हैं, वे निःसंदेह जीवन्मुक्त हैं। अविमुक्तक्षेत्रमें मृत्युके समय साक्षात् भगवान् भूतनाथ कर्मप्रेरित जीवोंके कानमें मन्त्रोपदेश देते हैं। स्वयं भगवान् श्रीरामने अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो अविमुक्तनिवासी कल्याणकारी शिवसे यह कहा है कि 'शिव ! तुम जिस-किसी भी मुमूर्षु जीवके दाहिने कानमें मेरे मन्त्रका उपदेश करोगे, वह मुक्त हो जायगा।' अतः भगवान् शिवकी कृपाशक्तिसे अनुगृहीत हो सभी जीव वहाँ परम गतिको प्राप्त होते हैं। मोहिनी ! यह मैंने अविमुक्तक्षेत्रके संक्षेपमें बहुत थोड़े गुण बताये हैं। समुद्रके रत्नोंकी भाँति अविमुक्तक्षेत्रके गुणोंका विस्तार अनन्त है। जो ज्ञान-विज्ञानमें निष्ठा रखनेवाले तथा परमानन्दकी प्राप्तिके इच्छुक हैं, उनके लिये जो गति बतायी गयी है, निश्चय ही काशीमें मरे हुएको वही गति प्राप्त होती है।

काशीका योगपीठ है श्मशानतीर्थ, जिसे मणिकर्णिका कहते हैं। अपने कर्मसे भ्रष्ट हुए मनुष्योंको भी काशीके श्मशानादि तीर्थोंमें मोक्षकी प्राप्ति बतायी गयी है। काशीमें भी अन्य सब तीर्थोंकी अपेक्षा मणिकर्णिका उत्तम मानी गयी है। वहाँ नित्य भगवान् शिवका निवास माना गया है। वरानने ! दस अश्वमेध-यज्ञोंका जो फल बताया गया है, उसे धर्मात्मा पुरुष मणिकर्णिकामें स्नान करके प्राप्त कर लेता है। जो यहाँ वेदवेत्ता ब्राह्मणको अपना धन दान करता है, वह शुभगतिको पाता और अग्निकी भाँति तेजसे उद्दीप्त होता है। जो मनुष्य वहाँ उपवास करके ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, वह निश्चय ही सौत्रामणी यज्ञका फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य वहाँ चार वत्सतरीसे युक्त सौम्य स्वभावके तरुण वृषभको छत्र आदिसे चिह्नित करके छोड़ता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। इसमें संदेह नहीं कि वह पितरोंके साथ मोक्षको प्राप्त होता है। इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ, भगवान् शिवकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे वहाँ जो कुछ भी धर्म आदि किया जाता है, उसका फल अनन्त है। जो अविमुक्तक्षेत्रमें महादेवजीकी पूजा और स्तुति करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त एवं अजर-अमर होकर स्वर्गमें निवास करते हैं। जो मुक्तात्मा पुरुष एकाग्रचित्त हो इन्द्रिय-समुदायको संयममें रखकर ध्यान लगाये हुए शतरुद्रीका जप करते हैं और अविमुक्तक्षेत्रमें सदा निवास करते हैं, वे उत्तम द्विज कृतार्थ हो जाते हैं। यशस्विनी ! जो काशीमें एक दिन उपवास करेगा, उसे सौ वर्षोंतक उपवास करनेका फल प्राप्त होगा।

इससे आगे गङ्गा और वरणाका संगमरूप उत्तम तीर्थ है, जो सायुज्य मुक्ति देनेवाला है। जब बुधवारको श्रवण और द्वादशीका योग हो, उस समय उसमें स्नान करके मनुष्य मोक्षरूप फल पाता है। शुभानने ! जो वहाँ उस समय श्राद्ध करता है, वह अपने समस्त पितरोंका उद्धार करके विष्णुलोकमें जाता है। गङ्गाके साथ वरणा और असीका जो संगम है, वह समस्त लोकोंमें विख्यात है; वहाँ विधिपूर्वक अश्वदान करके मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जो मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक संगमेश्वरका पूजन करता है, वह निग्रह और अनुग्रहमें समर्थ साक्षात् देवदेवेश्वर शिव (-तुल्य) है। देवेश्वरसे पूर्वमें भगवान् केशव विद्यमान हैं और केशवके पूर्वमें जगद्विख्यात संगमेश्वर विद्यमान हैं।

  • उत्तरभाग * ६८९

काशीके तीर्थ एवं शिवलिङ्गोंके दर्शन-पूजन आदिकी महिमा

पुरोहित वसु कहते हैं—सुन्दरि! संगमेश्वर पीठके वायव्य भागमें राजा सगरके द्वारा स्थापित किया हुआ चतुर्मुख शिवलिङ्ग है। उससे वायव्य कोणमें भद्रदेह नामक तालाब है, जो गौओंके दूधसे भरा गया है। वह सम्पूर्ण पातकोंका नाश करनेवाला है। मोहिनी! सहस्रों कपिला गौओंके विधिपूर्वक दान करनेका जो फल है, उसे मनुष्य वहाँ स्नान करनेमात्रसे पा लेता है। जब पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा हो, उस समय वहाँके लिये अतिशय पुण्यकाल माना गया है, जो अश्वमेध-यज्ञका फल देनेवाला है। वहीं श्मशानभूमिमें विख्यात देवी भीष्मचण्डिकाका दर्शन होता है। उनकी पूजा करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। अन्तकेश्वरसे पूर्व, सर्वेश्वरके दक्षिणभागमें और मातलीश्वरसे उत्तर दिशामें कृत्तिवासेश्वर नामक शिवलिङ्ग है। देवि! कृत्तिवासेश्वरका दर्शन और पूजन करके मनुष्य एक ही जन्ममें शिवके समीप परम गति प्राप्त कर लेता है। सत्ययुगमें पहले उसका नाम 'त्र्यम्बकेश्वर' था, त्रेतामें वही 'कृत्तिवासेश्वर' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। द्वापरमें उन्हीं भगवान् शिवका नाम 'महेश्वर' कहा जाता है तथा कलियुगमें सिद्ध पुरुष उन्हें 'हस्तिपालेश्वर' कहते हैं। यदि सनातन मोक्षप्रद तारकज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो बारंबार भगवान् कृत्तिवासेश्वरका दर्शन करना चाहिये। उन देवाधिदेवका दर्शन करनेसे ब्रह्महत्यारा भी पापमुक्त हो जाता है। उनका स्पर्श और पूजन करनेपर सम्पूर्ण यज्ञोंका फल मिलता है। जो उन सनातन महादेवजीका बड़ी श्रद्धासे पूजन करते हैं और फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशीको एकाग्रचित्त हो फूल, फल, बिल्वपत्र, उत्तम और साधारण भक्ष्यपदार्थ दूध, दही, घी, मधु और जलसे उस उत्तम शिवलिङ्गका अर्चन तथा डमरूके डिंडिम घोष, नमस्कार, नृत्य, गीत, अनेक प्रकारके मुखवाद्य, स्तोत्र एवं मन्त्रोंद्वारा शुभस्वरूप भगवान् शिवको तृप्त करते हैं और मोहिनी! एक रात उपवास करके परम भक्तिभावसे पूजन करके श्रीमहादेवजीको संतुष्ट करते हैं, वे परम पदको प्राप्त कर लेते हैं।

जो चैत्र मासकी चतुर्दशीको परमेश्वर शिवकी पूजा करता है, वह धनके स्वामी कुबेरके समीप जाकर उन्हींकी भाँति क्रीड़ा करता है। जो वैशाखकी चतुर्दशीको पवित्रचित्तसे भगवान् शिवकी अर्चना करता है, वह स्वामिकार्तिकेयके लोकमें जाकर उन्हींका अनुचर होता है। जो ज्येष्ठ मासकी चतुर्दशीको श्रद्धापूर्वक भगवान् शङ्करकी पूजा करता है, वह स्वर्गलोकमें जाता है और प्रलयकाल आनेतक वहाँ निवास करता है। भद्रे! जो आषाढ़ मासकी चतुर्दशीको पवित्रभावसे कृत्तिवासेश्वर शिवकी पूजा करता है, वह सूर्यलोकमें जाकर इच्छानुसार क्रीड़ा करता है। जो श्रावणकी चतुर्दशीको वहाँ प्रकट हुए कामेश्वर शिवकी पूजा करता है, उसे भगवान् शिव वरुणलोक देते हैं। जो भाद्रपद मासकी चतुर्दशीको भाँति-भाँतिके पुष्पों और फलोंद्वारा भगवान् शङ्करकी पूजा करता है, उसे इन्द्रका सालोक्य प्राप्त होता है। जो आश्विन कृष्णा चतुर्दशीको भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह पितरोंके लोकमें जाता है। जो कार्तिक मासकी चतुर्दशीको देवेश्वर महादेवजीकी पूजा करता है, वह चन्द्रलोकमें जाकर जबतक इच्छा हो, तबतक वहाँ क्रीड़ा करता है। जो मार्गशीर्ष कृष्णा चतुर्दशीको पिनाकधारी भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है और वहाँ अनन्त कालतक क्रीड़ा-सुखमें निमग्न रहता है। जो पौष मासमें प्रसन्नचित्त होकर भगवान् शिवकी अर्चना करता है, वह नैर्ऋत्यलोकमें जाता है और निर्ऋतिके

६९० * संक्षिप्त नारदपुराण *


साथ ही आनन्दका अनुभव करता है। जो माघ मासमें सुन्दर पुष्प एवं मूल-फल आदिके द्वारा भगवान् शङ्करकी आराधना करता है, वह संसार-सागरका त्याग करके भगवान् शिवके लोकमें जाता है। अतः यदि शिवधाममें जानेकी इच्छा हो तो यत्नपूर्वक कृत्तिवासेश्वरका पूजन तथा अविमुक्त-क्षेत्रमें निवास करना चाहिये। काशीमें व्यासेश्वरके पश्चिम घण्टाकर्ण (या कर्णघण्टा) नामक सरोवर है। देवि! उस सरोवरमें स्नान करके व्यासेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्यकी जहाँ-कहीं भी मृत्यु हो, उसे काशीमें मरनेका ही फल प्राप्त होता है। मोहिनी! यदि मनुष्य दण्डघात-तीर्थमें स्नान करके अपने पितरोंका तर्पण करे तो उसके नरक-निवासी पितर वहाँसे निकलकर पितृलोकमें चले जाते हैं। देवि! जो पापकर्मों मनुष्य पिशाचयोनिको प्राप्त हो गये हैं, उनके लिये यदि वहाँ पिण्डदान किया जाय तो उनका उस पिशाच-शरीरसे उद्धार हो जाता है। उस घातके दर्शनसे मानव कृतकृत्य हो जाता है। वहीं लोकको कल्याण प्रदान करनेवाली ललितादेवी विद्यमान हैं। यह मनुष्य-जन्म दुर्लभ है। विद्युतपातके समान चञ्चल है, उसे पाकर जिसने ललितादेवीका दर्शन कर लिया, उसे जन्मका भय कहाँसे हो सकता है? पृथ्वीकी परिक्रमा करके मनुष्य जिस फलको पाता है, वही फल उसे काशीमें ललितादेवीके दर्शनसे मिल जाता है। प्रत्येक मासकी चतुर्थीको उपवास करके ललितादेवीकी पूजा और उनके समीप रातमें जागरण करे। देवि! ऐसा करनेसे उसे सम्पूर्ण समृद्धियाँ प्राप्त होती हैं। मोहिनी! तीनों लोकोंद्वारा पूजित नलकूबरकेश्वर सब सिद्धियोंके दाता हैं। उनकी पूजा करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। देवि! उनके दक्षिणभागमें मणिकर्णी नामसे प्रसिद्ध शिवलिङ्ग है। उसके आगे एक महान् तीर्थ (जलाशय) है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। भगवान् मणिकर्णीश्वर कुण्डमें विराजमान हैं। उनका दर्शन, नमस्कार और पूजन करनेसे फिर गर्भमें निवास नहीं करना पड़ता। मणिकर्णीश्वरके दक्षिण पार्श्वमें गङ्गाजीके जलमें स्थापित परम उत्तम गङ्गेश्वरलिङ्ग है। उसकी पूजा करनेसे देवलोककी प्राप्ति होती है।

मोहिनी! अब मैं काशीके दूसरे मन्दिरका वर्णन करता हूँ, जहाँ देवाधिदेव महादेवजीका रुचिर एवं अभीष्ट स्थान है। सुभगे! पूर्वकालमें कुछ राक्षस भगवान् चन्द्रमौलिका शुभ लिङ्ग साथ ले अन्तरिक्ष-मार्गसे बड़ी उतावलीके साथ जा रहे थे। जिस समय वह शिवलिङ्ग इस काशी-क्षेत्रमें पहुँचा, उस समय महादेवजीने सोचा—'क्या उपाय किया जाय, जिससे मेरा अविमुक्तक्षेत्रसे वियोग न हो।' शुभे! देवेश्वर भगवान् शिव इस बातका विचार कर ही रहे थे कि उस स्थानपर मुर्गेका शब्द सुनायी दिया। देवि! उस शब्दको सुनकर राक्षसोंके मनमें भय समा गया और वे प्रातःकाल उस शिवलिङ्गको वहीं छोड़कर वहाँसे भाग गये। राक्षसोंके चले जानेपर वहीं अत्यन्त रुचिर एवं सुन्दर स्थानमें वह लिङ्ग स्थित हुआ। साक्षात् देवदेव भगवान् शिव उस अविमुक्तक्षेत्रमें उस शिवलिङ्गके रूपमें विराजमान हुए। इसीलिये उसे 'अविमुक्त' कहते हैं। उस समय देवताओंने महादेवजीका नाम 'अविमुक्त' रख दिया, जो परम पवित्र अक्षरोंसे युक्त है। जो प्राणी वहाँ मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे स्थावर हों या जङ्गम, उन सबको वह शिवलिङ्ग मोक्ष देनेवाला है। भगवान् अविमुक्तके दक्षिण भागमें एक सुन्दर बावड़ी है, उसका जल पीनेसे इस लोकमें पुनरावृत्ति नहीं होती। जिन मनुष्योंने उक्त बावड़ीका जल पीया है, वे कृतार्थ हैं। उन्हें निश्चय ही तारक-ज्ञान प्राप्त होता है। मनुष्य बावड़ीके जलमें स्नान करके यदि दण्डकेश्वर एवं अविमुक्तेश्वरका दर्शन

  • उत्तरभाग * ६९१

करे तो वह क्षणमात्रमें कैवल्य-मोक्षका भागी होता है। काशीपुरी, श्मशानघाट, अविमुक्तस्थान और अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन करके मनुष्य शिवगणोंका अधिपति होता है। अविमुक्तेश्वर लिङ्गका दर्शन करनेसे मानव सम्पूर्ण पापों, रोगों तथा पशुपाश (जीवके अज्ञानमय बन्धन)-से मुक्त हो जाता है।

अविमुक्तके आगे एक शिवलिङ्ग स्थित है, जिसका मुख पश्चिमकी ओर है। भद्रे! वह 'लक्षणेश्वर' नामसे विख्यात है। उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य ज्ञानी हो जाता है। देवि! उसके उत्तरमें चतुर्मुख लिङ्ग है, जो चतुर्थेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है। वह श्रेष्ठ शिवलिङ्ग पाप-भयका निवारण करनेवाला है। वाराणसी नामक क्षेत्र पृथ्वीपर प्राणियोंके लिये मुक्तिदायक है। उसमें भी अविमुक्तेश्वर तो जीवन्मुक्त कहा गया है (वह जीवन्मुक्ति देनेवाला है)। काशीमें जहाँ-कहीं भी जो रह चुका है, उसके लिये गणपति-पदकी प्राप्ति बतायी गयी है और जो वहाँ प्राण-त्याग करता है, वह आत्यन्तिक मोक्षको प्राप्त करता है। उपर्युक्त सीमाके भीतरी क्षेत्रमें प्रथम आवरण बताया गया है। द्वितीय आवरणमें पूर्व दिशामें मणिकर्णिका है। उस स्थानमें सात करोड़ शिवलिङ्ग विद्यमान हैं। उनके दर्शनमात्रसे यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। ये सब सिद्ध लिङ्ग हैं। काशीमें जो पवित्र कूप, सरोवर, बावड़ी, नदी और कुण्ड कहे गये हैं, वे ही सिद्धपीठ हैं। जो एकाग्रचित्त हो इन सबमें स्नान करेगा और वहाँके शिवलिङ्गोंका दर्शन करेगा, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं ले सकता। पृथ्वीपर और अन्तरिक्षमें जो-जो तीर्थ हैं, उनमें मुख्य तीर्थोंका मैंने तुमसे वर्णन किया है। वरारोहे! तीर्थयात्राको सब पापोंका नाश करनेवाली कहा गया है।

काशी-यात्राका काल, यात्राकालमें यात्रियोंके लिये आवश्यक कृत्य, अवान्तर तीर्थ और शिवलिङ्गोंका वर्णन

पुरोहित वसु कहते हैं—मोहिनी! अब मैं यात्राकालका वर्णन करता हूँ, जिसे देवता आदिने नियत किया है। वह यात्रा यथायोग्य फलकी प्राप्ति करानेवाली है। पूर्वकालमें देवताओंने काशीमें रहकर चैत्र मासमें यह तीर्थयात्रा की थी। वे कामकुण्डपर स्थित होकर स्नान एवं पूजनमें तत्पर रहते थे। शुभानने! ज्येष्ठ मासमें रुद्रावास कुण्डपर स्नान-पूजामें तत्पर रहनेवाले सिद्धोंने वहाँकी शुभ यात्रा की है। गन्धर्वोंने आषाढ़ मासमें यहाँकी यात्रा की थी। वे प्रियादेवी-कुण्डपर रहकर स्नान-पूजन किया करते थे। मोहिनी! विद्याधरोंने श्रावण मासमें यह यात्रा की थी। वे लक्ष्मीकुण्डपर रहकर स्नान-पूजन करते थे। वरानने! यक्षोंने आश्विन मासमें यह यात्रा सम्पन्न की है। वे मार्कण्डेय-कुण्डपर रहकर स्नान-पूजनमें संलग्न थे। मोहिनी! नागोंने मार्गशीर्ष मासमें यह यात्रा की है। वे कोटितीर्थमें रहकर स्नान-पूजन आदि करते थे। शुभलोचने! गुह्यकोंने कपालमोचनतीर्थमें रहकर स्नान-ध्यान एवं पूजन आदि करते हुए पौष मासमें यहाँकी यात्रा सम्पन्न की है। शोभने! पिशाचोंने फाल्गुन मासमें काशीकी यात्रा की थी। वे कालेश्वर-कुण्डपर रहकर स्नान-पूजन आदिमें तत्पर रहते थे। देवि! शुभ फाल्गुन मासमें शुक्ल पक्षकी जो चतुर्दशी है, उसीमें पिशाचोंने यात्रा की थी। इसीलिये उसे 'पिशाच-चतुर्दशी' कहते हैं।

शुभानने! अब मैं यात्राका आवश्यक कृत्य बतलाऊँगा, जिसके करनेसे मनुष्य यात्राका फल पाता है। यात्राके समय जलसे भरे हुए सुन्दर घड़ोंको वस्त्रसे ढककर फल, फूल और

६९२ * संक्षिप्त नारदपुराण *


मिष्टान्नके साथ उनका दान करना चाहिये। चैत्रके शुक्लपक्षमें महान् फल देनेवाली जो तृतीया है, उसमें मनुष्योंको भक्तिभावसे गौरी-देवीका दर्शन करना चाहिये। वरानने! स्नान करके गोप्रेक्षतीर्थमें जाना चाहिये और स्वर्गद्वारमें जो कालिका देवी हैं, उनकी यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये। उनके सिवा संवर्ता और ललिता भी श्रेष्ठ एवं कल्याणमयी देवी कही गयी हैं, उनका भी भक्तिभावसे दर्शन करना चाहिये। वे सम्पूर्ण कामनाओंका फल देनेवाली हैं। तदनन्तर पवित्र व्रतका पालन करनेवाले शिवभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना और वस्त्र तथा भरपूर दक्षिणाद्वारा उनका यथायोग्य सत्कार करना चाहिये।

अब मैं उन विनायकोंका परिचय देता हूँ, जो काशीक्षेत्रके निवासमें विघ्न डालनेवाले हैं। देवि! उनका पूजन करके मनुष्य काशीवासका निर्विघ्न फल प्राप्त करता है। पहले ढुंढिविनायक, फिर किलविनायक, देवीविनायक, गोप्रेक्षविनायक, हस्तिहस्तीविनायक तथा सिन्दूर्यविनायकका दर्शन करना चाहिये। देवि! चतुर्थीको इन सभी विनायकोंका दर्शन करे और इनकी प्रसन्नताके लिये ब्राह्मणको मिठाई खिलावे। इस कार्यसे मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है।

अब मैं काशीक्षेत्रकी रक्षा करनेवाली चण्डिकाओंका वर्णन करता हूँ। दक्षिण दिशामें दुर्गा रक्षा करती हैं। नैर्ऋत्य कोणमें अन्तरेश्वरी, पश्चिममें अङ्गारेश्वरी, वायव्य कोणमें भद्रकाली, उत्तर दिशामें भीमचण्डा, ईशानकोणमें महामत्ता, पूर्व दिशामें ऊर्ध्वकेशीसहित शङ्खुरीदेवी, अग्निकोणमें अधःकेशी तथा मध्यभागमें चित्रघण्टादेवी रक्षा करती हैं। जो मानव इन चण्डिका देवियोंका दर्शन करता है, उसपर प्रसन्न होकर वे सब-की-सब तत्परतापूर्वक उसके लिये क्षेत्रकी रक्षा करती हैं। देवि! ये पापियोंके लिये सदा विघ्न उपस्थित करती हैं, अतः रक्षाके लिये विनायकोंसहित उक्त देवियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये।

भीष्मजी काशीपुरीमें आकर उत्तम पञ्चायतनरूपसे देवेश्वर शिवकी आराधना करते हुए कुछ कालतक यहाँ रहे। सुभगे! उस स्थानपर भगवान् शिव स्वयं प्रकट हुए थे, जो 'गोप्रेक्षक' के नामसे विख्यात हुए। सम्पूर्ण देवता उनकी स्तुति करते हैं। गोप्रेक्षेश्वरके पास आकर उनका दर्शन और पूजन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। एक समय वनकी गौएँ दावानलसे दग्ध हो इधर-उधर भटकती हुई इस कुण्डके समीप आयीं और यहाँका जल पीकर शान्त हुईं। तबसे यह 'कपिलाह्रद' कहलाता है। यहाँ प्रकट होकर साक्षात् भगवान् शिव 'वृषध्वज' नामसे विख्यात हुए। भगवान् शिवने न केवल वहाँ निवास किया, वे वहाँ सबको प्रत्यक्ष दर्शन देते हुए शिवलिङ्गरूपमें विराजमान हैं। जो एकाग्रचित्त हो इस कपिलाह्रद-तीर्थमें स्नान करके वृषध्वज

  • उत्तरभाग * | ६९३ ---|---

शिवका दर्शन करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता है। वह स्वर्गलोकमें जाता है। भगवान् वृषध्वजकी पूजा करके वहाँ मरा हुआ पुरुष शिवरूप हो जाता है। अथवा शरीर-भेदसे अत्यन्त दुर्लभ शिवगणका स्वरूप धारण करता है। इसी प्रदेशमें गौओंने स्वयं ब्रह्माजीके अनुरोधसे सम्पूर्ण लोकोंकी शान्तिके लिये तथा सबको पवित्र करनेके उद्देश्यसे अपना दुग्ध दान किया था; जिससे 'भद्रदोह' नामक सरोवर प्रकट हुआ, जो पवित्र, पापहारी एवं शुभ है। उस स्थानमें स्नान करनेवाला मनुष्य साक्षात् वागीश्वर होता है। वहाँ परमेष्ठी ब्रह्माजीने स्वयं ले आकर एक शिवलिङ्ग स्थापित किया है। फिर ब्रह्माजीसे लेकर भगवान् विष्णुने दूसरा शिवलिङ्ग स्थापित किया, जो 'हिरण्यगर्भ' के नामसे वहाँ विद्यमान है। तदनन्तर ब्रह्माजीने पुनः इसी कारणसे 'स्वर्लोकेश्वर' नाम शिवलिङ्ग स्थापित किया; जो स्वर्गीय लीलाका दर्शन करानेवाला है। देवताओंके स्वामी उन स्वर्लोकेश्वरका दर्शन करके मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यहाँ प्राणत्याग करनेसे फिर कभी वह संसारमें जन्म नहीं लेता। उसकी वह अक्षयगति होती है, जो केवल योगियोंके लिये सुलभ बतायी गयी है।

भूमण्डलके उसी प्रदेशमें देवताओंके लिये कण्टकरूप दैत्य व्याघ्रका रूप धारण करके रहता था। वह बड़ा बलवान् और अभिमानी था। भगवान् शङ्करने उसे मारा और उस स्थानपर व्याघ्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध होकर नित्य निवास किया। उन देवेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। हिमवान्‌के द्वारा स्थापित एक शिवलिङ्ग है, जो 'शैलेश्वर'के नामसे विख्यात है। भद्रे! शैलेश्वरका दर्शन करके मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। उत्पल और विदल नामके जो दो दैत्य ब्रह्माजीके वरदानसे बलोन्मत्त हो रहे थे, वे दोनों स्त्री-विषयक लोलुपताके कारण पार्वतीजीके हाथसे मारे गये। एक शार्ङ्गधनुषसे मारा गया और दूसरा कुन्तक अर्थात् भालेसे। इन दोनों शस्त्रोंके नामपर दो शिवलिङ्ग स्थापित किये गये हैं। भद्रे! जो मनुष्य श्रेष्ठ स्थानमें विद्यमान उक्त दोनों लिङ्गोंका दर्शन करता है, वह जन्म-जन्ममें सिद्ध होकर कभी शोक नहीं करता। देवताओंने उनके सब ओर बहुत-से शिवलिङ्ग स्थापित किये हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य देहत्यागके पश्चात् भगवान् शिवका गण होता है। वाराणसी नदी परम पवित्र और सब पापोंका नाश करनेवाली है। यह इस पवित्र क्षेत्रको सुशोभित करके गङ्गामें मिली है। उसके सङ्गमपर ब्रह्माजीने उत्तम शिवलिङ्गकी स्थापना की है, जो 'सङ्ग Alfonso -> 'सङ्गमेश्वर'के नामसे संसारमें विख्यात है, उसका दर्शन करना चाहिये। शुभे! जो मानव इन देवनदियोंके सङ्गममें स्नान करके सङ्गमेश्वरका पूजन करता है, उसे जन्म लेनेका भय कैसे हो सकता है? भद्रे! भृगुपुत्र शुक्राचार्यने यहाँ एक शिवलिङ्ग स्थापित किया है, जो 'शुक्रेश्वर'के नामसे विख्यात है। सम्पूर्ण सिद्ध और देवता भी उसकी पूजा करते हैं। इसका दर्शन करके मनुष्य तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और मरनेपर फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। मोहिनी! महादेवजीने यहाँ जम्बुक नामक दैत्यका वध किया था। तत्सम्बन्धी शिवलिङ्गका दर्शन करके मानव सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा स्थापित किये हुए इन शिवलिङ्गोंको तुम पुण्यलिङ्ग समझो। ये समस्त कामनाओंको देनेवाले हैं। मोहिनी! इस प्रकार इस अविमुक्तक्षेत्रमें मैंने तुम्हें ये सब शिवलिङ्ग बताये हैं।

काशीकी गङ्गाके वरणा-संगम, असी-संगम तथा पञ्चगङ्गा आदि तीर्थोंका माहात्म्य

६९४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


काशीकी गङ्गाके वरणा-संगम, असी-संगम तथा पञ्चगङ्गा आदि तीर्थोंका माहात्म्य

पुरोहित वसु कहते हैं— भद्रे! अब मैं तुम्हें काशीकी गङ्गाका उत्तम माहात्म्य बताता हूँ, जो भोग और मोक्षरूप फल देनेवाला है। अविमुक्त-क्षेत्रमें जो भी कर्म किया जाता है, वह अक्षय हो जाता है। कोई भी पापी अविमुक्तक्षेत्र (काशी)-में जाकर पापरहित हो जानेके कारण कभी नरकमें नहीं पड़ता। शुभे! अविमुक्तक्षेत्रमें किया हुआ पाप वज्रतुल्य हो जाता है। तीनों लोकोंमें जो मोक्षदायक तीर्थ हैं, वे सम्पूर्ण सदा काशीकी उत्तरवाहिनी गङ्गाका सेवन करते हैं। जो दशाश्वमेधघाटमें स्नान करके विश्वनाथजीका दर्शन करता है, वह शीघ्र ही पापमुक्त होकर संसारबन्धनसे छूट जाता है। यों तो पुण्यसलिला गङ्गा सर्वत्र ही ब्रह्महत्या-जैसे पापोंका निवारण करनेवाली हैं, तथापि काशीमें जहाँ उनकी धारा उत्तरकी ओर बहती है, वहाँ उनकी विशेष महिमा प्रकट होती है। वरणा और गङ्गाके तथा असी और गङ्गाके सङ्गममें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य सम्पूर्ण पातकोंसे मुक्त हो जाता है। काशीकी उत्तरवाहिनी गङ्गामें कार्तिक और माघ मासमें स्नान करके मनुष्य महापाप आदि पातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। सुन्दरी! वहाँ धर्मनद नामसे विख्यात एक कुण्ड है। उसमें धर्म स्वरूपतः प्रकट होकर बड़े-बड़े पातकोंका नाश करता है। वहीं धूली एवं धूतपापा भी है, जो सर्वतीर्थमयी एवं शुभकारक है। जैसे नदीका वेग तटवर्ती वृक्षोंको गिरा देता है, उसी प्रकार वह धूतपापा समस्त पापराशिको हर लेती है।

काशीमें किरणा, धूतपापा, पुण्य-सलिला सरस्वती, गङ्गा और यमुना—ये पाँच नदियाँ एकत्र बतायी गयी हैं। इनसे त्रिभुवनविख्यात पञ्चनद (पञ्चगङ्गा) तीर्थ प्रकट हुआ है। उसमें डुबकी लगानेवाला मानव फिर पाञ्चभौतिक शरीर नहीं धारण करता। यह पाँच नदियोंका सङ्गम समस्त पापराशियोंका नाश करनेवाला है। उसमें स्नान करनेमात्रसे मनुष्य ब्रह्माण्डमण्डपका भेदन करके परम पदको प्राप्त होता है। प्रयागमें माघ मासमें विधिपूर्वक स्नान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह काशीके पञ्चगङ्गातीर्थमें एक ही दिनके स्नानसे मिल जाता है। पञ्चगङ्गामें स्नान और पितरोंका तर्पण करके 'माधव' नामसे प्रसिद्ध भगवान् विष्णुकी पूजा करनेवाला पुरुष फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जिन्होंने पञ्चगङ्गामें श्रद्धापूर्वक श्राद्ध किया है, उनके पितर अनेक योनियोंमें पड़े होनेपर भी मुक्त हो जाते हैं। पञ्चनदतीर्थमें श्राद्धकर्मकी महिमाका प्रत्यक्ष दर्शन करके यमलोकमें पितरलोग यह गाथा गाया करते हैं कि 'क्या हमारे वंशमें भी कोई ऐसा होगा, जो काशीके पञ्चनदतीर्थमें आकर श्राद्ध करेगा? जिससे हम लोग मुक्त हो जायेंगे।' पञ्चनदतीर्थमें जो कुछ धन दान किया जाता है, कल्पके अन्ततक उसके पुण्यका क्षय नहीं होता। वन्ध्या स्त्री भी एक वर्षतक पञ्चगङ्गातीर्थमें स्नान करके यदि मङ्गलागौरीका पूजन करे तो वह अवश्य ही पुत्रको जन्म देती है। वस्त्रसे छाने हुए पञ्चगङ्गाके पवित्र जलसे यहाँ दिक्श्रुतादेवीको स्नान कराकर मनुष्य महान् फलका भागी होता है। पञ्चामृतके एक सौ आठ कलशोंके साथ तुलना करनेपर पञ्चगङ्गाका एक बूँद जल भी उनसे श्रेष्ठ सिद्ध होता है। इस लोकमें पञ्चकूर्च (पञ्चगव्य) पीनेसे जो शुद्धि कही गयी है, वही शुद्धि श्रद्धापूर्वक पञ्चगङ्गाके जलकी एक बूँद पीनेसे प्राप्त होती है और उसके कुण्डमें स्नान करनेसे राजसूय तथा अश्वमेधयज्ञका जो फल कहा गया है, उससे सौगुना उत्तम फल उपलब्ध

  • उत्तरभाग * ६९५

होता है। राजसूय और अश्वमेध-यज्ञ केवल स्वर्गके साधक हैं, किंतु पञ्चगङ्गाके जलसे ब्रह्मलोकतकके सम्पूर्ण द्वन्द्वोंसे मुक्ति मिल जाती है। सत्ययुगमें वह ‘धर्मनद’ के नामसे प्रसिद्ध हुआ, त्रेतामें उसीका नाम ‘धूतपापा’ हुआ। द्वापरमें उसे ‘विन्दुतीर्थ’ कहा जाने लगा और कलियुगमें ‘पञ्चनद’ के नामसे उसकी ख्याति होती है। पञ्चनदतीर्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंका शुभ आश्रय है, उसकी अत्यन्त महिमाका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। भद्रे! इस प्रकार मैंने तुम्हें काशीका उत्तम माहात्म्य बताया है। वह मनुष्योंके लिये सुखद, मोक्षप्रद तथा बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है। महापातकी एवं उपपातकी मानव भी अविमुक्तक्षेत्रके इस माहात्म्यको सुनकर शुद्ध हो जाता है। ब्राह्मण इसको सुनने और पढ़नेसे वेदोंका विद्वान् होता है। क्षत्रिय युद्धमें विजय पाता है, वैश्य धन-सम्पत्तिसे भरपूर होता है और शूद्रको वैष्णव भक्तोंका सङ्ग प्राप्त होता है। सम्पूर्ण यज्ञोंमें जो फल मिलता है, समस्त तीर्थोंमें जो फल प्राप्त होता है, वह सब इसके पाठसे और श्रवणसे भी मनुष्य प्राप्त कर लेता है। विद्यार्थी इससे विद्या पाता है, धनार्थी धन पाता है, पत्नी चाहनेवाला पत्नी और पुत्रकी इच्छावाला पुरुष पुत्र पाता है।


उत्कलदेशके पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी महिमा, राजा इन्द्रद्युम्नका वहाँ जाकर मोक्ष प्राप्त करना

मोहिनी बोली— विप्रवर! मैंने आपके मुखारविन्दसे काशीका उत्तम माहात्म्य सुना। पुराणोंमें मुनियों और ब्राह्मणोंका यह वर्णन सुना जाता है कि पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुका क्षेत्र मोक्ष देनेवाला है। महाभाग ! अब उस पुरुषोत्तम-क्षेत्रका माहात्म्य कहिये।

पुरोहित वसुने कहा— देवि! सुनो, मैं तुम्हें ब्रह्माजीके द्वारा कहा हुआ पुरुषोत्तम-क्षेत्रका उत्तम माहात्म्य बतलाता हूँ। भारतवर्षमें दक्षिण समुद्रके तटतक फैला हुआ एक उत्कल नामका प्रदेश है, जो स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला है। समुद्रसे उत्तर विरज-मण्डलतकका जो प्रदेश है, वह पुण्यात्माओंका देश है। वह भू-भाग सम्पूर्ण गुणोंसे अलंकृत है। विशालाक्षि! समुद्रके उत्तर तटवर्ती उस सर्वोत्तम उत्कल प्रदेशमें सभी पुण्य तीर्थ और पवित्र मन्दिर आदि हैं, जिनका परिचय जानने योग्य है। मुक्ति देनेवाला परम उत्तम एवं पापनाशक पुरुषोत्तम-क्षेत्र परम गोपनीय है। सर्वत्र बालुका-आच्छादित भू-भागमें वह पवित्र एवं धर्म और कामकी पूर्ति करनेवाला परम दुर्लभ क्षेत्र दस योजनतक फैला हुआ है। जैसे नक्षत्रोंमें चन्द्रमा और सरोवरोंमें सागर श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त तीर्थोंमें पुरुषोत्तम-क्षेत्र सबसे श्रेष्ठ है। भगवान् पुरुषोत्तमका एक बार दर्शन करके, सागरके भीतर एक बार स्नान करनेसे तथा ब्रह्मविद्याको एक बार जान लेनेसे मनुष्यको गर्भमें नहीं आना पड़ता। देवेश्वर पुरुषोत्तम समस्त जगत्में व्यापक और सम्पूर्ण विश्वके आत्मा हैं। वे जगत्‌की उत्पत्तिके कारण तथा जगदीश्वर हैं। सब कुछ उन्हींमें प्रतिष्ठित है। जो देवताओं, ऋषियों और पितरोंद्वारा सेवित तथा सर्वभोगसम्पन्न है, ऐसे पुण्यात्मा प्रदेशमें निवास करना किसको नहीं अच्छा लगेगा। इससे बढ़कर इस देशकी श्रेष्ठताके विषयमें और क्या कहा जा सकता है? जहाँ सबको मुक्ति देनेवाले जगदीश्वर भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं, उस उत्कल-देशमें जो मनुष्य निवास करते हैं, वे देवताओंके समान तथा धन्य हैं। जो तीर्थराज समुद्रके जलमें