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नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary

आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय) द्वारा

DevanagariHindipublished220 पृष्ठ

१८८ नीतिवाक्यामृतम् कन्या का पिता यदि अधिक ऐश्वर्यशाली हुआ तो कन्या पति को सदा छोटा समझती है। अल्पस्य कन्यापितुर्दौःस्थ्यं महता कष्टेन विज्ञायते ॥ २२ ॥ यदि कन्या का पिता अल्प विभव वाला और वर विशेष विभव वाला हुआ तो कन्या की मनःस्थिति अथवा मन के दुःखों का ठीक-ठीक अनुभव वर को बड़ी कठिनाई से होता है। अल्पस्य महता सह संव्यवहारे महान् व्ययोऽल्पश्चायः ॥ २३ ॥ छोटे कुल का बड़े कुल के साथ सम्बन्ध होने से व्यय अधिक और आय कम होती है। वरं वेश्यायाः परिग्रहो नाविशुद्धकन्याया परिग्रहः ॥ २४ ॥ वेश्या को अङ्गीकार करना अच्छा है किन्तु वंश अथवा चरित्र से शुद्ध जो न हो ऐसी कन्या का वरण नहीं अच्छा है। वरं जन्मनाशः कन्यायाः नाकुलीनेष्ववक्षेपः ॥ २५ ॥ कन्या का जन्म भले ही नष्ट हो जाय, किन्तु उसे अकुलीन के साथ विवाहित कर देना अच्छा नहीं है। सम्यग् वृत्ता कन्या तावत् सन्देहास्पदं यावन्न पाणिग्रहः ॥ २६ ॥ सदाचार सम्पन्न भी कन्या तब तक सन्देह का स्थान बनी रहती है जब तक कि उसका विवाह नहीं हो जाता। विकृतप्रत्यूढापि पुनर्विवाह मर्हतीति स्मृतिकाराः ॥ २७ ॥ स्मृतिकारों का मत है कि संयोग या भ्रमवश अन्धे, लूले, लंगड़े आदि विकृत अंगवाले पुरुष के साथ विवाहित कन्या पुनर्विवाह के योग्य होती है। आनुलोम्येन चतुस्त्रिद्विवर्णाः कन्याभाजनाः ब्राह्मण-क्षत्रिय- विशः ॥ २८ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये अनुलोम क्रम से अर्थात् ब्राह्मण—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार कन्याओं से क्षत्रिय इसी प्रकार तीन और वैश्य दो कन्याओं से विवाह कर सकता है। देशापेक्षा मातुलसम्बन्धः ॥ २९ ॥ मामा की लड़की के साथ विवाह करना देश की प्रथा के अधीन है। धर्मसन्ततिरनुपहतारतिगृहवार्तासुविहितत्वमाभिजात्याचारविशुद्धि- र्देवद्विजातिथिबान्धवसत्कारानवद्यत्वं च दारकर्मणः फलम् ॥ ३० ॥ धर्मानुसार सन्तानोत्पादन, दोषरहित कायसम्बन्ध, गृह के कार्यों का सुव्यवस्थित रूप से होना, कुलीनता और शुद्ध आचार-व्यवहार का होना,

प्रकीर्णसमुद्देशः १८६ देवता, ब्राह्मण, अतिथि और बन्धु-बान्धवों के सत्कार में त्रुटि न होना ये सब दारसंग्रह अर्थात् विवाह के फल हैं । गृहिणी गृहमुच्यते न पुनः कुड्यकटसंघातः ॥ ३१ ॥ गृहिणी का नाम गृह हैं न कि ईंट-पत्थर और लकड़ी के समूह का । गृहकर्मविनियोगः परिमितार्थत्वम् , अस्वातन्त्र्यं सदा मातृव्यञ्जन- स्त्रीजनावरोध इति कुलवधूनां रक्षणोपायः ॥ ३२ ॥ घर के कामों में लगाये रखना, सीमित रुपया पैसा देना, अधिक स्वच्छ- न्दता का न होने देना और सर्वदा बड़ी बूढ़ी स्त्रियों के बीच रखना ये सब कुलवधुओं की रक्षा के उपाय हैं । रजकशिला, कुर्कुरखर्परसमा हि वेश्याः कस्तास्वभिजातोऽभिर- म्येत ॥ ३३ ॥ वेश्याएं धोबी की शिला एवं कुत्ते के भोजन के लिये रखे गये मिट्टी के खप्पड के समान होती हैं कौन कुलीन उनमें अनुरक्त होना चाहेगा अर्थात् कोई कुलीन जिसे अपने वंश-वैभव का अभिमान होगा वेश्यागामी नहीं होगा । दानैर्दौर्भाग्यं, सत्कृतौ परोपभोग्यत्वम् , आसक्तौ परिभवो मरणं वा महोपकारेऽप्यात्मीयत्वं, बहुकालसम्बन्धेऽपि त्यक्तानां तदैव पुरुषान्तर- गामित्वमिति वेश्यानां कुलागतो धर्मः ॥ ३४ ॥ प्रेमी के दान-मान से कभी सन्तुष्ट न होना सत्कार करते रहने पर भी दूसरों से सम्भोग करना, उन पर अत्यन्त आसक्त होने पर या तो अनादृत होना अथवा मरण को प्राप्त करना, महान् उपकार करने पर भी आत्मीयता का अभाव पाया जाना, बहुत समय का भी सम्बन्ध होने पर परित्यक्त होने पर तत्क्षण ही अन्य पुरुष से सम्बन्ध कर लेना ये सब वेश्याओं के कुल परम्परागत धर्म होते हैं । [ इति विवाहसमुद्देशः ] ३२. प्रकीर्णसमुद्देशः समुद्र इव प्रकीर्णकसूक्तरत्नविन्यासनिबन्धनं प्रकीर्णकम् ॥ १ ॥ समुद्र में जिस प्रकार विशाल रत्नराशि इतस्ततः बिखरी हुई है उसी प्रकार विभिन्न प्रसंगों के उपयुक्त सुभाषित रत्नों का विन्यास जिसमें हो उसे प्रकीर्णक कहते हैं ।

१६० नीतिवाक्यामृतम् वर्णपदवाक्यप्रमाणप्रयोगनिष्णातमतिः सुमुखः सुव्यक्तो मधुरगम्भी- रध्वनिः, प्रगल्भः, प्रतिभावान् सम्यगूहापोहावधारणागमशक्तिसम्पन्नः, संप्रज्ञातसमस्तलिपिभाषावर्णाश्रमसमयस्वपरव्यवहारस्थितिराशुलेखन- वाचनसमर्थश्चेति सान्धिविग्रहिकगुणाः॥ २ ॥ वर्ण-पद वाक्य अर्थात् व्याकरण और प्रमाण अर्थात् तर्कशास्त्र के प्रयोग में कुशल बुद्धि, स्पष्ट अक्षर बोलनेवाला स्पष्ट अर्थवाले वाक्यों को प्रयोग करने वाला, मधुर और गम्भीर ध्वनिवाला, धृष्ट, प्रतिभाशाली, अच्छी तरह तर्क- वितर्क करने में कुशल, और विनयी तथा समस्याओं को निश्चयात्मक रूप में जानकर प्रमाण देने में समर्थ, समस्त लिपि, भाषा, चारों वर्णों के आचार- विचार, समयागम (दर्शन-शास्त्र) और अपने तथा पराये से व्यवहार में कुशल शीघ्र लिखने-पढ़ने में समर्थ व्यक्ति सन्धिविग्रहिक सन्धि और युद्ध के विषय में परामर्श दाता हे अर्थात् महामात्य अथवा राज्यमन्त्री उपर्युक्त गुणों से युक्त होना चाहिए । कथाऽव्यवच्छेदो, व्याकुलत्वं, मुखे वैरस्यम् , अनवेक्षणं, स्थानत्यागः, साध्वाचरितेऽपि दोषोद्भावनं, विज्ञप्ते च मौनम् , अक्षमाकालयापनम् , अदर्शनं, वृथाभ्युपगमश्चेति विरक्तलिङ्गानि ॥ ३ ॥ जो पुरुष अपने प्रति विरक्त हो उसके यह लक्षण होते हैं—कथा भंग करना, अर्थात् चलती हुई बातचीत को बीच से काट देना या न सुनना, व्याकु लता, मुख पर आह्लाद का अभाव, सामने न देखना, स्थान छोड़कर चले जाना, अच्छे कार्यों में भी दोष निकालना, कुछ प्रश्न करने पर मौन हो जाना, उत्तर देने में असमर्थ होकर व्यर्थ समय बिताना, मुंह न दिखाना और बात स्वीकार करके उसे पूरा न करना । दूराद्वेक्षणं, मुखप्रसादः, सम्प्रश्नेष्वादरः, प्रियेषु वस्तुषु स्मरणं, परोक्षे गुणग्रहणं, तत्परिवारस्य सदानुवृत्तिरित्यनुरक्तलिं- ङ्गानि ॥ ४ ॥ अपने प्रति श्रद्धालु और अनुरागी व्यक्ति में—दूर से ही देखने लगना, देखते ही मुख पर आह्लाद का होना, प्रश्न करने पर बड़े आदर के साथ सुनना और उत्तर देना अपने लिये की गई प्रिय बातों का स्मरण करते रहना, पीठ पीछे गुणों का वर्णन आदि करना, और सदा उसके परिवार वालों के अनुकूल व्यवहार करना—ये लक्षण होते हैं । श्रुतिसुखत्वम् , अपूर्वाविरुद्धार्थातिशययुक्तत्वम् , उभयालंकार- सम्पन्नत्वम् , अन्यूनाधिकवचनत्वम् , अतिव्यक्तान्वयत्वम् , इति काव्य- स्य गुणाः ॥ ५ ॥

प्रकीर्णसमुद्देशः १६१ काव्य के गुण इस प्रकार हैं :—सुनने में सुखद, नवीन, और अविरोधी अर्थ एवं कल्पनाओं से परिपूर्ण, शब्द और अर्थ उभयविध अलंकारों से युक्त न न्यून न अधिक वचनों के प्रयोग से युक्त और अत्यन्त स्फुट पद तथा वाक्य सम्बन्ध का होना । अतिपरुषवचनविन्यासत्वमनन्वितगतार्थत्वं, दुर्बोधानुपपन्नपदोप- न्यासम्, अयथार्थयतिविन्यासत्वम्, अभिधानाभिधेयशून्यत्वम्, इति काव्यस्य दोषाः ॥ ६ ॥ काव्य के दोष निम्नलिखित हैं : अत्यन्त कर्कश वाक्य रचना, असम्बद्ध और उक्त अर्थ की पुनः आवृत्ति करना, कठिनता से समझ में आने योग्य एवं व्याकरण से सिद्ध न होने वाले पदों का प्रयोग करना, अनुचित स्थानों पर यति अर्थात् विराम का प्रयोग करना, कोश आदि में कथित शब्दों के प्रयोग से शून्य होना । वचनकविः, अर्थकविः, उभयकविः, वर्णकविः, चित्रकविः, दुष्कर- कविः, अरोचकी, सम्मुखाभ्यवहारी चेत्यष्टौ कवयः ॥ ७ ॥ वचन कवि अर्थात् कालिदास आदि के समान प्रसाद गुण सम्पन्न कविता करने वाला, अर्थकवि अर्थात् भारवि के समान गूढार्थ कविता करनेवाला, उभयकवि अर्थात् माघ आदि कवि के समान शब्द और अर्थ दोनों के प्रयोग में अत्यन्त कुशल, वर्णकवि, चित्रकवि और क्लिष्ट कविता करनेवाला, अरोचकी अर्थात् अरुचि उत्पन्न करनेवाली कविता करनेवाला, और सम्मुखाभ्यवहारी अर्थात् सामने ही कविता बना देने वाला—आशुकवि ये आठ प्रकार के कवि होते हैं । मनः प्रसादः, कलासु कौशलं, सुखेन चतुर्वर्गविषया व्युत्पत्तिः, आसंसारं च यश इति कविसङ्ग्रहस्य फलम् ॥ ८ ॥ राजा को अपनी सभा में कवियों का संग्रह करने से ये लाभ होते हैं। कवि की कविताएं सुन सुन कर मन प्रसन्न रहता है, विभिन्न प्रकार की कलाओं में निपुणता प्राप्त होती है, धर्म, अर्थ काम और मोक्ष के सम्बन्ध का ज्ञान सुखपूर्वक हो जाता है तथा संसार की सत्ता जब तक है तब तक उस राजा का यश कवि की कविता के माध्यम से बना रहता है । आलप्तिशुद्धिः, माधुर्यातिशयः, प्रयोगसौन्दर्यम्, अतीव मसृणता, स्थान-कम्पित-कुहरित-आदि भावः, रागान्तर संक्रान्तिः, परिगृहीतराग- निर्वाहः, हृदयग्राहिता चेति गीतस्य गुणाः ॥ ९ ॥ आलाप का शुद्ध होना, अत्यधिक माधुर्य, पदरचना का सौष्ठव, अत्यन्त स्निग्धता और कोमलता, ऊंचा स्तर करके गा सकने योग्य, धुन में गा

१६२ नीतिवाक्यामृतम् सकना, ओर ध्वनि संकोच कर सकना, दूसरे राग में सरलता से परिवर्त्तन किया जा सकना ओर स्वीकृत राग का पूर्ण निर्वाह होना एवं हृदय ग्राहिता का होना यह सब गीत के गुण हैं । समत्वं, तालानुयायित्वं, गेयाभिनेयानुगत्वं, श्लक्ष्णत्वं, प्रव्यक्तयात- प्रयोगत्वम् , श्रुतिसुखावहत्वं चेति वाद्यगुणाः ॥ १० ॥ सम पर बजना, ताल के अनुसार रहना, नेत्र ओर अभिनेय अर्थात् गीत ओर नाट्य के अनुरूप होना कोमलता, स्फुटयति का प्रयोग होना, ओर सुनने में प्रिय लगना ये वाद्य के गुण हैं । दृष्टि हस्तपादक्रियासु समसमायोगः, संगीतकानुगतत्वं, सुश्लिष्ट- ललिताभिनयाङ्गहारप्रयोगभावो, रसभाववृत्तिलावण्यभाव इति नृत्य- गुणाः ॥ ११ ॥ दृष्टि, हाथ और पैर का संचालन समान रूप से, ताल और लय के अनु- सार हो, जो संगीत छिड़ा हो उसका अनुसरण होना, बिना विच्छेद के अभि- नयानुकूल अंगों फा इधर-उधर चलाना, शृङ्गारादि रस, आलम्बन उद्दीपन आदि भाव विभाव तथा कौशिकी आदि वृत्तियों के अनुरूप सौन्दर्य का होना यह सब नृत्य के गुण हैं । स खलु महान् यः खल्वात्तॊ न दुर्वचनं ब्रूते ॥ १२ ॥ जो दुःखी होने पर भी दुर्वचनों का प्रयोग नहीं करता वही व्यक्ति महान् है । स किं गृहाश्रमी यत्रागत्यार्थिनो न भवन्ति कृतार्थाः ॥ १२ ॥ जिसके पास आकर याचक गण सफल होकर न लौटें वह गृहस्थ गृहस्थ नहीं है । ऋणग्रहणेन धर्मः सुखं सेवा वणिज्या च तादात्विकानां नायतिहित- वृत्तीनाम् १४ ॥ इस समय अपना काम निकाल लो भविष्य में देखा जायगा—इस तरह के विचार वाले 'तादात्विक' लोग ही ऋण लेकर तीर्थ यात्रा, यज्ञ आदि सांसारिक सुखभोग और किसी बड़े आदमी का स्वागत-सत्कार रूप सेवा कार्य तथा व्यापार करते हैं, किन्तु जो विवेकी हैं और उत्तर काल में अपना कल्याण चाहते हैं वे ऐसा नहीं करते । स्वस्य विद्यमानम् अर्थिभ्यो देयं नाविद्यमानम् ॥ १५ ॥ अपने पास जो वस्तु वर्त्तमान हो उसे ही याचकों फो देना चाहिए न कि जो न हो उसे भी ऋण आदि कर देना ।

प्रकीर्णसमुद्देशः १६३ ऋणदातुरासन्नं फलं परोपास्तिः कलहः परिभवः प्रस्तावेऽर्था- लाभश्च ॥ १६ ॥ ऋणदाता को तत्काल यही फल मिलता है कि उसे दूसरे की उपासना करनी पड़ती है अर्थात् जिसे ऋण दिया है उसके यहां जाकर मांगना पड़ता है, कलह होता है, ऋण लेने वाले के द्वारा तिरस्कार होता है और अपने काम के समय उसे अपना धन नहीं मिलता । अदातुस्तावत् स्नेहः सौजन्यं प्रियभाषणं वा साधुता च यावन्ना- र्थावाप्तिः ॥ १७ ॥ कर्ज लेकर फिर उसे न देने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति कर्ज लेनेवाले से तभी तक स्नेह, सजनता और प्रियभाषण तथा साधुता-पूर्ण व्यवहार रखता है जब तक कि उसे अर्थ अर्थात् कर्ज नहीं मिल जाता । तदसत्यमपि नासत्यं यत्र न सम्भाव्यार्थहानिः ॥ १८ ॥ झूठ बोलकर भविष्य की किसी विशेष अर्थहानि को बचाया जा सके अथवा महान् कार्य सिद्ध हो सके तो वह झूठ-मूठ नहीं है । प्राणवधे नास्ति कश्चिदसत्यवादः ॥ १९ ॥ झूठ बोलकर किसी निरपराध के प्राण बचाए जा सकें तो वह झूठ- मूठ नहीं है । अर्थाय मातरमपि लोको हिनस्ति किं पुनरसत्यं न भाषते ॥ २० ॥ धन के लिये लोग माता को भी मार डालते हैं तो क्या झूठ न बोलेंगे । अतः धन के सम्बन्ध में विश्वास नहीं करना चाहिए चाहे कितनी ही शपथ कोई क्यों न ले । सत्कला-सत्योपासनं हि विवाहकर्म, दैवायत्तस्तु वधूवरयो- र्निर्वाहः ॥ २१ ॥ सत् कलाओं की प्राप्ति, सत्य भाषण में स्वाभाविक रुचि ये विवाह के कर्त्तव्य-कर्म हैं और वधू तथा वर का निर्वाह पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति तो भाग्याधीन ही होती है । रतिकाले तन्नास्ति कामात्तों यन्न ब्रूते पुमान् , न चैतत्प्रमा- णम् ॥ २२ ॥ काम-बाधा से पीड़ित मनुष्य रति के समय अपनी प्रिया के विश्वास और प्रसन्नता के लिये ऐसी कौन सी बात है जो नहीं कहता किन्तु वह सब प्रामाणिक नहीं होतीं । तावत् स्त्री-पुरुषयोः परस्परं प्रीतिर्यावन्न प्रातिलोम्यं कलहो रतिः र्त्तवं च ॥ २३ ॥ १३ नी०

१६४ नीतिवाक्यामृतम्

स्त्री और पुरुष में परस्पर प्रेम तभी तक बना रहता है जब तक कि उनमें किसी बात से परस्पर प्रतिकूलता न हो, कलह न हो और रति-संबंधी कोई छल-कपट न पैदा हो। तादात्विकबलस्य कुतो रणे जयः, प्राणार्थः स्त्रीषु कल्याणं वा ॥ २४ ॥ अस्थायी सेना से संग्राम में विजय नहीं मिलती तथा प्राण-रक्षा की दृष्टि से स्त्रियों के प्रति किये गये कल्याणकारी कार्यों से प्राण-रक्षा नहीं होती। अर्थात् तत्काल के लिये इकट्ठा की गई सेना से संग्राम नहीं जीता जा सकता और भविष्य में यह हमारी रक्षा करेगी इस दृष्टि से स्त्रियों के संग की गई भलाई भी काम नहीं देती। तावत् सर्वः सर्वस्यानुनयवृत्तिपरो यावन्न भवति कृतार्थः ॥ २५ ॥ तब तक सभी सब की सेवा में विनम्र भाव से लगे रहते हैं जब तक कि उनका काम नहीं निकल जाता। काम निकल जाने पर कोई किसी को नहीं पूछता। अशुभस्य कालहरणमेव प्रतीकारः ॥ २६ ॥ अशुभ बातों को दूर रखने के लिये समय का बिता देना ही एक मात्र उपाय है। पक्वान्नादिव स्त्रीजनाद्दोषशान्तिरेव प्रयोजनं किं तत्र रागविरा- गाभ्याम् ॥ २७ ॥ पका हुआ अन्न खाने से जैसे भूख मिट जाती है उसी प्रकार स्त्रियों से कामशान्ति मात्र करना प्रयोजन रखना चाहिए उनमें आसक्ति और विरक्ति नहीं। तृणेनापि प्रयोजनमस्ति किं पुनर्न पाणिपादवता मनुष्येण ॥ २८ ॥ समय पर घास तिनके से भी मनुष्य को प्रयोजन होता है तो हस्त- पाद आदि से संयुक्त मनुष्य से क्यों न होगा ? अतः सब से मैत्री भाव रखना चाहिए। न कस्यापि लेखमवमन्येत, लेखप्रधाना हि राजानस्तन्मूलत्वात् सन्धिविग्रहयोः सकलस्य जगद्व्यापारस्य च ॥ २६ ॥ किसी सामान्य राजा के भी लेख का अनादर नहीं करना चाहिए। राजाओं के यहाँ लेख ही मुख्य होता है। उसी के आधार पर उनके यहाँ सन्धि और विग्रह का काम चलता है और समस्त संसार के काम भी लेख के ही अधीन होते हैं। पुष्पयुद्धमपि नीतिवेदिनो नेच्छन्ति किं पुनः शस्त्रयुद्धम् ॥ ३० ॥

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CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri १६५ प्रकीर्णसमुद्देशः जब कि नीतिज्ञ पुरुष फूल के द्वारा भी युद्ध नहीं करना चाहते तब शस्त्र के द्वारा युद्ध की तो चर्चा ही क्या है ! स प्रभुर्यो बहून् बिभर्त्ति किमर्जुनतरोः 'फलसम्पदा या न भवति परेषामुपभोग्या ॥ ३१ ॥ प्रभु वही है जो बहुतों का भरण-पोषण करे । अर्जुन वृक्ष के प्रचुर फल से क्या लाभ जो कि किसी के काम आने लायक ही नहीं होता । मार्गपादप इव स त्यागी यः सहते सर्वेषां संबाधाम् ॥ ३२ ॥ जो पुरुष सब के द्वारा दिये गये क्लेशों को सह लेता है वह मार्ग में लगे पेड़ के समान त्यागी है । मार्ग में लगे पेड़ से सभी मनुष्य दातून, लकड़ी, पत्ती आदि लेते रहते हैं और वह फिर भी हरा भरा खड़ा रहता है इसी प्रकार वास्तविक त्याग उसी का है जो कोई कुछ भी क्यों न करे पर वह शान्त ही रहे । पर्वता इव राजानो दूरतः सुन्दरालोकाः ॥ ३३ ॥ पर्वत की शोभा जिस प्रकार दूर से ही अच्छी लगती है उसीप्रकार राज- पद का सौन्दर्य भी दूर से ही शोभा देता है उसके निकट सम्पर्क में आने से अनेक कष्ट भी सहने पड़ते हैं । वार्तारमणीयः सर्वोऽपि देशः ॥ ३४ ॥ बात-चीत में सभी अन्य देश अच्छे लगते हैं हैं वस्तुतः परदेश में क्लेश होता ही है अतः अपना देश छोड़कर अन्यत्र न जाना चाहिए । अधनस्याबान्धवस्य च जनस्य मनुष्यवत्यपि भूमिर्भवति महा- टवी ॥ ३५ ॥ निर्धन और बन्धुहीन व्यक्ति के लिये मनुष्यों से भरी हुई भी यह पृथ्वी महान् अरण्य के समान लगती है । श्रीमतो ह्यरण्यान्यपि राजधानी ॥ ३६ ॥ श्रीमानों के लिये जंगल भी राजधानी के समान ही सुखद बन जाता है । सर्वस्याप्यासन्नविनाशस्य भवति प्रायेण मतिविपर्यस्ता ॥ ३७ ॥ जिसका विनाश निकट होता है उसकी बुद्धि विपरीत हो जाती है । पुण्यवतः पुरुषस्य न क्वचिदप्यस्ति दौःस्थ्यम् ॥ ३८ ॥ पुण्यात्मा पुरुष की कहीं भी दुर्गति नहीं होती । दैवानुकूलः कां सम्पदं न करोति विघटयति वा विपदम् ॥ ३६ ॥ जब दैव अपने अनुकूल होता है तब कौन सी सम्पत्ति नहीं सुलभ हो जाती और कौन विपत्ति दूर नहीं हो जाती ।

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१६६ नीतिवाक्यामृतम् असूयकः पिशुनः, कृतघ्नो दीर्घरोष इति कर्मचाण्डालाः ॥ ४० ॥ सदा दूसरों के गुणों में दोष निकालने वाला निन्दक पुरुष, चुगलखोर, कृतघ्न और अपने मन में किसी के प्रति बहुत दिनों तक क्रोध को बनाए रखने वाला ये चार अपने कर्मों से चाण्डाल हैं और पांचवां तो जाति से होता है । औरसः, क्षेत्रजः, दत्तः, कृत्रिमो, गूढोत्पन्नोऽपविद्ध एते षट् पुत्रा दायादाः पिण्डदाश्च ॥ ४१ ॥ अपनी विवाहिता पत्नी से उत्पन्न औरस पुत्र, पराई स्त्री से उत्पन्न क्षेत्रज, बन्धु-बान्धवों से दिया गया दत्तक पुत्र, युद्ध आदि के द्वारा जीता गया अथवा किसी संकट से मुक्त कर पाला-पोसा गया कृत्रिम पुत्र, चोरी से पैदा किया गया गूढोत्पन्न पुत्र और पति के परदेश चले जाने या मर जाने के बाद उत्पन्न अपविद्ध ये छह प्रकार के पुत्र अपने दायाद और पिण्डदाता होते हैं । देशकालकुलापत्यस्त्रीसमापेक्षो दायादविभागोऽन्यत्र यतिराजकुला- भ्याम् ॥ ४२ ॥ सन्यासियों और राज-परिवार को छोड़कर दायाद का निर्णय देश, समय वंश, सन्तान और स्त्री की दृष्टि से किया जाता है । अर्थात् सम्पत्ति के बंटवारे के विषय में विभिन्न देशों में विभिन्न नियम और मत प्रचलित हैं । अतिपरिचयः कस्यावज्ञां न जनयति ॥ ४३ ॥ अत्यधिक परिचय से किसका अनादर नहीं होता । भृत्यापराधे स्वामिनो दण्डो यदि भृत्यं न मुञ्चति ॥ ४४ ॥ भृत्य को यदि स्वामी छोड़ नहीं देता तो भृत्य के अपराध से स्वामी को दण्ड मिलता है । अलं महत्तया समुद्रस्य यः लघुं शिरसा वहत्यधस्ताच्च नयति गुरून् ॥ ४५ ॥ समुद्र की महत्ता व्यर्थ हैं जो कि हलकी सारहीन वस्तु को ऊपर तैरने देता है और गुरु अर्थात् सारयुक्त ठोस चीज को डुबा देता है । रतिमन्त्राहारकालेषु न कमप्युपसेवेत ॥ ४६ ॥ मैथुन कर्म, मन्त्रणा, और भोजन के समय किसी को समीप न रहने दे । सुष्ठु परिचितेष्वपि तिर्यक्षु विश्वासं न गच्छेत् ॥ ४७ ॥ बहुत हिल-मिल गये हों तब भी तिर्यग् योनि के पशु-पक्षी आदि पर विश्वास नहीं करना चाहिए । मत्तवारणारोहिणो जीवितव्ये सन्देहो निश्चितश्चापायः ॥ ४८ ॥

प्रकीर्णसमुद्देशः १६७ मतवाले हाथी पर चढ़ने वाले का जीवन संशय में पड़ जाता है और नाश निश्चित रहता है । अत्यर्थं ह्यश्वविनोदोऽङ्गभङ्गमनापाद्य न तिष्ठति ॥ ४९ ॥ घोड़े के संग बहुत खिलवाड़ करने से कोई न कोई अङ्ग-भङ्ग हुए बिना नहीं रहता । ऋणमददानो दासकर्मणा निर्हरेत् ॥ ५० ॥ ऋण न दे सकने पर दास कर्म द्वारा ऋण दूर करना चाहिए । अन्यत्र यतिब्राह्मणक्षत्रियेभ्यः ॥ ५१ ॥ यति, ब्राह्मण और क्षत्रियों को छोड़कर अर्थात् संन्यासीब्राह्मण और क्षत्रिय पर यदि ऋण हो और वह न दे सकें तो उनसे नोकरी लेकर ऋण नहीं पूरा करना चाहिए । तस्यात्मदेह एव वैरी यस्य यथालाभमशनं शयनं च न सहते ॥५२॥ जो यथालाभ भोजन न कर सकें और सो न सकें उनके लिये अपना शरीर ही शत्रु के तुल्य होता है । तस्य किमसाध्यं नाम यो महामुनिरिव सर्वान्नीनः सर्वक्लेशसहः सर्वत्र सुखशायी च ॥ ५३ ॥ जो महामुनि के समान सब प्रकार का और सब का अन्न ग्रहण कर ले, सब प्रकार का क्लेश सह ले और सर्वत्र सुखपूर्वक सो सके उसके लिए कोई भी काम असाध्य नहीं है । स्त्रीप्रीतिरिव कस्य नामेयं स्थिरा लक्ष्मीः ॥ ५४ ॥ स्त्री की प्रीति के समान यह लक्ष्मी भी किसके पास स्थिर रह सकी है ? परपैशुन्योपायेन राज्ञां वल्लभो लोकः ॥ ५५ ॥ लोग दूसरों की चुगली और निन्दारूप उपाय से राजा के प्रियपात्र बनते हैं । नीचो महत्त्वमात्मनि मन्यते परस्य कृतेनापवादेन ॥ ५६ ॥ नीच पुरुष दूसरे की निन्दा करके अपना महत्त्व मानता है । न खलु परमाणोरल्पत्वेन महान् मेरुः किन्तु स्वगुणेन ॥ ५७ ॥ परमाणु सबसे छोटा पदार्थ है इस दृष्टि से महान् मेरु पर्वत की प्रशंसा नहीं की जाती, किन्तु उसके गुणों के कारण । न खलु निर्निमित्तं महान्तो भवन्ति कलुषितमनीषाः ॥ ५८ ॥ महान् व्यक्ति बिना किसी कारण के ही किसी के प्रति कलुषित भावना वाले नहीं होते ।

१६८ नीतिवाक्यामृतम् स वह्नेः प्रभावो यत्प्रकृत्या शीतलमपि जलं भवत्युष्णम् ॥ ५६ ॥ यह अग्नि का प्रभाव है कि स्वभावतः शीतल भी जल उष्ण हो- जाता है । सुचिरस्थायिनं कार्यार्थी साधूपचरेत् ॥ ६० ॥ किसी कार्य को सिद्ध करने के लिये किसी स्थायी प्रामाणिक अथवा स्थिर बुद्धिवाले की सम्यक् सेवा करनी चाहिए । स्थितैः सहार्थोपचारेण व्यवहारं न कुर्यात् ॥ ६१ ॥ किसी स्थित अर्थात् धन-धान्य की प्रचुरता के कारण स्थायी अर्थात् धनी व्यक्ति के साथ छोटे आदमी को अर्थ-व्यवहार अर्थात् रुपये पैसे के लेन देन का सम्बन्ध नहीं करना चाहिए । सत्पुरुषपुरश्चरितया शुभमशुभं वा कुर्वतो नास्त्यपवादः प्राण- व्यापादो वा ॥ ६२ ॥ सत्पुरुषों की सेवा में लगे रहने पर भला-बुरा कुछ भी करे उससे उसकी निन्दा अथवा प्राण सङ्कट नहीं होता । सम्पत् सम्पदमनुबध्नाति विपच्च विपदम् ॥ ६३ ॥ सम्पत्ति से सम्पत्ति बढ़ती है और विपत्ति से विपत्ति । गोरिव दुग्धार्थी को नाम कार्यार्थी परस्य सञ्चारं विचारयति ॥६४॥ जिस प्रकार दूध चाहने वाला 'यह कब सोचता है कि गो क्या भक्ष्य- अभक्ष्य खाती है इसी प्रकार अपना प्रयोजन सिद्ध करने वाला व्यक्ति भी उस व्यक्ति के कार्य-अकार्य पर विचार नहीं करता । शास्त्रविदः स्त्रियश्चानुभूतगुणाः परम् आत्मानं रंजयन्ति ॥ ६५ ॥ शास्त्र-ज्ञानी और स्त्रियां गुणों के अनुभव को प्राप्त कर केवल अपने को सुखी बनाती हैं। अर्थात् शास्त्रज्ञ पुरुष विद्या के गुण से आत्मानन्द में मग्न रहता है और स्त्रियां अपने गुणों के कारण दूसरों की प्रिय बनकर अपने को सुखी करती हैं । चित्रगतमपि राजानं नावमन्येत, क्षात्रं हि तेजो महती पुरुष- देवता ॥ ६६ ॥ चित्र में भी बने हुए राजा का अपमान नहीं करना चाहिए । क्षत्रियत्व का तेज महान् देवता रूप में वर्त्तमान होता है । कार्यमारभ्य पर्यालोचः शिरो मुण्डयित्वा नक्षत्रप्रश्न इव ॥ ६७ ॥ काम प्रारम्भ करने के अनन्तर उसके शुभाशुभ पर विचार करना वैसा ही व्यर्थ है जैसे शिर का मुण्डन करा लेने के अनन्तर शुभ नक्षत्र पूछना ।

प्रकीर्णसमुद्देशः १६६ ऋणशेषाद् रिपुशेषादिवावश्यं भवति, आयत्यां भयम् ॥ ६८ ॥ ऋण के शेष रहने देने से शत्रु के शेष के समान ही भविष्य में अवश्य संकट आता है । नवसेवकः को नाम न भवति विनीतः ॥ ६६ ॥ कौन नया सेवक विनीत नहीं होता, प्रारम्भ में तो सभी नौकर-चाकर बड़ी नम्रता प्रदर्शित करते हैं पर जो आगे चलकर पुराना होनेपर भी नम्र बना रहे वही उत्तम सेवक है । यथाप्रतिज्ञं को नामात्र निर्वाहः ॥ ७० ॥ इस जगत् में अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार कौन अपना जीवन-निर्वाह कर पाता है अर्थात् संसार में अनेक अप्रत्याशित घटनाएं और कठिनाइयां उप- स्थित होती हैं जिनसे मनुष्य जैसा चाहता है वैसा जीवन निर्वाह नहीं कर पाता । अप्राप्तेऽर्थे भवति सर्वोऽपि त्यागी ॥ ७१ ॥ धन न मिलने पर सभी त्यागी बन सकते हैं । अर्थात् जब तक मनुष्य के पास पैसा नहीं आता तभी तक वह तरह-तरह के दान-यज्ञ आदि के मनोरथ करता है बाद में पैसा आ जाने पर वह दान आदि शुभ कर्मों से मुख मोड़ लेता है । अर्थार्थी नीचैराचरणान्नोद्विजेत् , किन्नाधो व्रजति कूपे जलार्थी ॥ ७२ ॥ धनाभिलाषी अथवा,प्रयोजनार्थी को किसी प्रकार का क्षुद्र कार्य करने में संकोच नहीं करना चाहिए,क्या जलाभिलाषी पुरुष कुआं खोदते समय नीचे नहीं जाता । स्वामिनोपहतस्य तदाराधनमेव निर्वृतिहेतुः, जनन्या कृतविप्रियस्य हि बालस्य जनन्येव भवति जीवितव्यकारणम् ॥ ७३ ॥ स्वामी के द्वारा दण्डित या ताड़ित होने पर उसी की आराधना करने से ही सुख मिलता है, कुपित माता जब बालक को मारती है तब अन्त में वही माता ही उसके जीवन का कारण होती है । अतः मालिक द्वारा निकाले गये नौकर को पुनः उसी की सेवा से प्रसन्न कर अपनी नौकरी आदि प्राप्त करनी चाहिए । [ इति प्रकीर्णसमुद्देशः ] इति सकलतार्किकचक्रचूडामणिचुम्बितचरणस्य रमणीयपञ्चपञ्चा- शनमहावादिविज्योपार्जितकीर्त्तिमन्दाकिनीपवित्रितत्रिभुवनस्य परतपञ्च- रणरत्नोदन्वतः श्रीनेमिदेवभगवतः प्रियशिष्येण वादीन्द्रकालानल-

२०० नीतिवाक्यामृतम् श्रीमन्महेन्द्रदेवभट्टारकानुजेन स्याद्वादाचलसिंह, तार्किकचक्रवादीभ- पञ्चानन, वाक्कल्लोलपयोनिधि, केकिकुलराजकुञ्जरप्रभृतिप्रशस्ति-प्रस्तावा- लङ्कारेण षण्णवतिप्रकरण-युक्तिचिन्तामणि (त्रिवर्गे) महेन्द्रमातलि- संजल्प-यशोधरमहाराजचरित-महाशास्त्र-वेधसा श्रीमत्सोमदेवसूरिणा विरचितं नीतिवाक्यामृतं नाम राजनीतिशास्त्रं समाप्तम्। श्रीः शुभं भूयात्। नीतिवाक्यामृतं सम्पूर्णम्। समस्त तार्किकचक्रचूडामणियों से वन्दनीय, पचपन महान् वादियों के विजयी, उत्कृष्टतपश्चर्या के सागर भगवान् नेमिदेव के प्रियशिष्य, वादीन्द्र- कालानल-श्रीमन् भट्टारक महेन्द्रदेव के छोटे भाई-स्याद्वाद-अचलसिंह, तार्किकचक्रवादीभपञ्चानन, वाक्कल्लोलपयोनिधि-केकिकुलराजकुञ्जर इत्यादि प्रशस्तियों से अलङ्कृत षण्णवतिप्रकरण, युक्ति-चिन्तामणि, त्रिवर्ग-महेन्द्र- मातलिसंजल्प, यशोधरमहाराजचरित के रचयिता महाशास्त्रों के विधाता श्रीमान् सोमदेवसूरि द्वारा विरचित नीतिवाक्यामृत नाम का राजनीतिशास्त्र समाप्त हुआ। भगवती श्री कल्याणकारिणी हो। नीतिवाक्यामृत समाप्त।

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दर्तानं. २७६१

०५१)५१९०

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