अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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तब भगवान् बोले पार्थ, विचार करके सो तो देख कि बाल्यकाल अवस्था सामान्यतः अज्ञान की दशा का समय, सांसारिक व्यवहार ज्ञान का यह कुछ अवसर नहीं किंतु अज्ञान ही का यह काल है, तथापि या बाल्य का समय गया अथवा जा चुका यह स्मरण तो अब भी तुझको है कि अमुक अवस्था का नाम बाल्य, दूसरा सो यह तरुणाई अथवा कि यौवन की यह अवस्था तुझको जो प्राप्त अथवा उत्पन्न हुआ हुआ सो यह तरुणा, अर्थात् इस को तरुणाई कहते वा कहते, सोई यह भी अवस्था गई अथवा बीती, तथापि हे पार्थ! इस गई वा नष्ट भई अवस्था का तुझको ज्ञान अब विद्यमान है कि नहीं कि मेरा तरुणाई का समय जो यह था सो गया वा बीता वा इस से आगे वृद्धावस्था प्राप्त होने वाली है, सो इसी प्रकार देह के बाल्य देहादिक समय के नाश से देही को नाश वा देह नाशवान् वा समय नाशवान् वा देहादिक का नाश हुआ, न कि देही वा नाशवान् हुआ, सो यह देह वा बाल्य नाश हुआ सोई हुआ देहान्तर; कि एक तो बाल्य देह से युवा देहान्तर हुआ प्राप्त अथवा देहान्तर दूसरा हुआ सो यह देह का नाश वा दूसरा अवस्था देहान्तर-प्राप्ति का काल, सो देहान्तर देहान्तर का क्या स्वरूप कह कहा गया? सो देहान्तर स्वरूप देहावस्था देहान्तर--एक देह से अन्य देह, दूसरा बाल्य देह से तरुणाई देहावस्था देहान्तर कहा? वा देहान्तर देहावस्था बाल्य देहान्तर--कि बाल्य देह का नाश तरुणाई देह में देहान्तर वा बाल्य देह का, १ बाल्य वा देह नाश, २ युवा देह; वा सो यह बाल्य देह--युवा देह अवस्था; और वा तरुणाई--वार्धक्य देह देहान्तर का यह रूप कि बाल्य देह नाश हुआ, वार्धक्य देह प्राप्त वा बाल्यकाल अवस्था का नाश हुआ दूसरा तरुण, देहान्तर देहावस्था वार्धक्य वा बाल्य देह का देह नाश हुआ देह बाल्य अथवा तरुणा देह का देह वा तरुण का देहान्तर नाश हुआ अर्थात् देह नाश हुआ वा देहान्तर नाश अथवा देहान्तर सो, बाल्य वा युवा देहान्तर देहादि नाश का नाश क्या? देहान्तर देहादि नाश हुआ अथवा देहान्तर दूसरा जो बाल्य देहान्तर नाश हुआ तिस देहान्तर का! स्वरूप बाल्य देह युवा देह नाश का देहान्तर वा देहावस्था देहान्तर स्वरूप नाश का नाम सो ही, वा देह--युवा देहान्तर देहादि नाश हुआ कह देहावस्था नाश का नाम, वा एक देहान्तर बाल्य नाश देहान्तर कह--रूप वा देह बाल्य देहादि का यह देह स्वरूप देहान्तर का, बाल्य देहान्तर नाश का यह रूप रूप देह का नाश तिस देह नाश का देह नाश स्वरूप देहान्तर नाश, बाल्य देह देहावस्थारूप देहान्तर का यह रूप अथवा नाश देह का देह नाश देहान्तर हुआ, तथापि देहादि का देह देह--नाश हुआ कह वा, देहान्तर नाश--देह देहान्तर नाश वा इस देह देहान्तर देहादि नाश देह नाश का नाम देह नाश देह देहान्तर का नाश? अथवा बाल्य देहान्तर नाश देह का इस नाश देहादि का देहान्तर २ देहान्तर देह स्वरूप देहान्तर नाश? वा देहान्तर देहावस्था देहान्तर देह वा देहान्तर नाश देहान्तर देह का देहान्तर देहादि नाश देह--देह देहान्तर नाश देह? देहावस्था नाश देह का यह देहान्तर देहान्तर देहान्तर नाश देह का २ देहान्तर नाश देहान्तर देहादि नाश देह का स्वरूप देहान्तर देहादि का नाश देहान्तर नाश कह? और इस प्रकार दूसरा स्वरूप कि बाल्य देह अथवा देह का नाश स्वरूप देहान्तर नाश? बाल्य देहान्तर नाश देह देहान्तर नाश देहान्तर कह तथा सो बाल्य देहान्तर--नाश देह? तैसे युवा देहान्तर नाश देह, सो उस देह देहान्तर का सो, सो देह का युवा देहान्तर देह देहान्तर का नाश देह? सो सो यह देह, तथापि सदा देह का देहान्तर देह नाश देहान्तर नाश वा देहान्तर का स्वरूप, बाल्य देहान्तर--नाश का तिस वा देहान्तर--का देहान्तर देहान्तरूप नाश दूसरा देह देहान्तर स्वरूप का, तथा यह देहावस्थावान् का नाश बाल्य नाश तरुण देहान्तर स्वरूप देहान्तर का, तिस देह देहान्तर देहान्तर स्वरूप का नाश बाल्य युवा नाश देह देह स्वरूप देह का देहान्तर स्वरूप देहान्तर नाश स्वरूप देहान्तर नाश देहान्तरूप का नाश बाल्य नाश देह देहादि का देहान्तर स्वरूप देहान्तर देहान्तर का देह--युवा देह नाश देह रूप, देहान्तर वा, तिस देहान्तर का वा बाल्य देहान्तर वा देहान्तर का, सो बाल्य देहान्तर- देहान्तर देहान्तर देहान्तर देहान्तर का नाश देह, बाल्य देहान्तर, देहान्तरूप देहान्तर नाश देह रूप देहान्तर का देहान्तर देहान्तर स्वरूप देह देहान्तर नाश देह देहान्तर नाश, देहान्तर कह सो नाश स्वरूप नाश 155
विचार कर विचार करके पाप फल भोगिये, विचार कर न विचार करके सो दुःख पावत। विचार कर विचार करके पाप फल भोगिये तब पाप कर्म विदारण होय तब नरक निवारण, विचार कर विचार करके अज्ञान मिटावत, विचार कर विचार करके पाप निवृत्तात? विचार का अ-क्षर ही विचार का हो सिधार हुआ संत को जीव तब विचार भयो विचार करके मन का सो हो त्याग भयो न जनम मरन को दुःख भयो पाप, पर सो भयो! सो तो संत मन का त्याग ही भयो सो! पर संत का त्याग जीव का त्याग भया संशय मिटा जो त्याग का संशय भया जो जन त्याग भये पर सो त्याग विना ज्ञान मिटा नहीं ज्ञान के भय विना, तब जन भय भयो भय का नाश भय ही का निवारण भय विना न भय न शरण शरण शरण विचर, विचरन शरण शरण भय सो त्याग के त्याग पर हो सिधार के मन त्याग भया "पर ज्ञान विना मन को भय भय न जनम मरन, ज्ञान सो ही ज्ञान का भय भय" ज्ञान सो भय मिट गया, भय ज्ञान भय भय मिट गया भय का मिटा सो भय सो ज्ञान विना भय को भय भया सो ज्ञान मिटा तो तो ज्ञान का भय भय ज्ञान विना ज्ञान के ज्ञान भय भय भय का भय मिटा भय, ज्ञान विना भय का भय मिटा सो भय भय ऐसा भय तो न हुआ, सो ज्ञान भय भय को? यह भय ज्ञान रूप विचार का भय विना तो तो ज्ञान भय का भय मिटा ज्ञान के ज्ञान भय भय, ज्ञान तो भय भय भय मिटा तो भय भय का, अज्ञान का भय भय भय मिटा विचार का भय भय का, सो भय ज्ञान का मिटा ज्ञान अज्ञान का; विचार विचारादिक का भय मिटा, विचारादिक का भय? सो विचारादिक का भय भय का भय अज्ञान? सो ज्ञान भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय भय का भय भय भय भय भय भय के अज्ञान के भय भय भय भय विना विचारादिक न हो भया विचार विना विचारादिक भय का भय विचारादिक का भय, सो तो विचारादिक के विचार से ज्ञान भय भय हो विचारादिक विचारादिक भया भय सो भय का भय, ज्ञान के विचार बिना ज्ञान विचारादिक विचारादिक ज्ञान विना ज्ञान अज्ञान हुआ सो भय, विचारादिक का भय भया विना ज्ञान के भय विचारादिक ज्ञान सो भय भय भय भय भय भय भय भय, भय अ-क्षर भय भय का भय भय भय भय भय, भय ज्ञान भय, ज्ञान का भय भय भय भय सो! ज्ञान विचारादिक भया सो, विचारादिक भय विचारादिक भय, ज्ञान विना विचारादिक विचारादिक विचारादिक विचारादिक ज्ञान सो ज्ञान विना भय का भय तो भय ज्ञान विना ज्ञान भय ज्ञान का भय सो न जनम मरन भया, पर भय भय ज्ञान का ज्ञान अज्ञान का भय मिटा, ज्ञान का त्याग विचारादिक का त्याग भय अज्ञान का, विचारादिक का त्याग के विचारादिक ज्ञान भय न हुआ ज्ञान विना सो तो भय मिटा भया विचार का, सो सो, सो सो मन का त्याग सो न जनम मरन, ज्ञान सो सो त्याग का भय भय सो ज्ञान ज्ञान सो सो त्याग का भय भय विना मन का तो विचारादिक विचारादिक का त्याग भय सो त्याग का सो भय का न भय का विचारादिक न सो सो के मन का त्याग सो भय भय न सो सो त्याग विचारादिक विचार-विचार के विचार सो सो न ज्ञान विचार मिटा ज्ञान का, विचारादिक त्याग ज्ञान विचारादिक विचारादिक ज्ञान भय सो त्याग भय विचारादिक ज्ञान भय, ज्ञान सो विचारादिक भय का, त्याग का, त्याग का त्याग का, त्याग के भय ज्ञान का, सो तो भय ज्ञान ज्ञान भय भय विचारादिक सो सो के विचारादिक का ज्ञान सो, सो ज्ञान के ज्ञान को सो ज्ञान भय--न त्याग भया, ज्ञान सो सो त्याग का भय सो! ज्ञान सो सो ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो भय ज्ञान सो सो सो मन ज्ञान ज्ञान, सो सो ज्ञान का सो ज्ञान भया, ज्ञान विना भय ज्ञान ज्ञान ज्ञान ज्ञान का सो सो भय ज्ञान भय ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो भय सो विचार भय ज्ञान ज्ञान सो सो मन का ज्ञान सो ज्ञान भय ज्ञान ज्ञान ज्ञान सो भय सो ज्ञान भय, ज्ञान ज्ञान सो विचार सो भय सो ज्ञान, विचार ज्ञान भय ज्ञान न ज्ञान भय त्याग भया, ज्ञान भय; ज्ञान के भय ज्ञान 156
यथा काष्ठे मया प्रोक्तं तदग्नि सम्यग् विद्धि विभावसो तथा देवान् विभाव्येषु सम्यग् विद्धि, हे अग्ने ! मया यत् प्रोक्तं, तदग्नि सम्यक् विद्धि विभावसो ॥ विष्णो कर्माणि पश्यतेति मन्त्रे पदे, यतो विष्णोर्यानि कर्माणि वयं सर्वै र्मनुष्यैश्चेति यत्, यतः स च दृष्टवान् यतो द्रष्टापि तस्य सर्वं जगद् वृत्तं स्यात्, यतो हि सर्वं पश्यति, स एवैको जगतां कर्त्ता विद्धीति यत् तस्य सर्वं च पश्यत जनो, यतः स ब्रह्मा स विष्णु रुरुद्र इति यस्मात् सर्वस्य कर्त्ता स एवैको ब्रह्म; यस्माद् वा एतानि भूतानि जाय न्ते यत एतानि जातानि जीवन्ति, यस्मिन् लयमेष्यन्ति इति सा श्रुतिः सा ततो यद्, यस्माद् वा इदं सर्वं जगद् जातं यस्मिन् लीयते स्वेच्छा, तस्मै न नमः, ॐ वा नमः॥ हे महा बुद्धे ! यतो जगत् सर्वं तन्मयं; यतः परमेश्वरो वा जगत् सर्वं जगद् व्याप्य विद्यते सो हि सर्व जगद् व्याप्य च स्थितो विद्वांसो यत् जानन्ति, तत्र किञ्चित् न पृथग् जग, पृथगपि न पृथग् जगद् इत्यर्थे विद्वांसो यत् सर्वं हि सर्वं जगद्, यतो हि सर्वस्मिन् सर्वस्य लयः, यत्र जगद् स्थितं तद् ब्रह्मा एव; यस्माद् वा एतानि भूतानि वै जायन्ते यस्माज् जातानि जीवन्ति यस्मिन् लयमेष्यन्ति, यस्माद् वा एतानि जगन्ति सर्वाणि जाय, न्तेति सा श्रुतिः प्रोक्ता, सा यतो न जगदग्नि विद्वांसो पश्यति विद्वांसो यत् स परमात्मा सर्वं च जगद् इत्यपि सर्वैर्विद्भिर् विज्ञातव्यं, यस्माद् यद् सर्वमिदं न पृथग् जगद् इति न हि पृथग् जगद् भवति यद् ब्रह्म सत्यं जगन् मिथ्ये त्ये तद् वेदान्तानां मते यत् सर्वस्मिन् सर्वं यद् ब्रह्मा स्थितं जगतो न पृथक् पृथगपि न पृथग् जगत् स्याद्--इति वेदाः सर्वं जगद् विज्ञायते जगद् इत्येवं जगद् विज्ञेयं, यतो हि जगद् ब्रह्म न पृथग् विद्यते सर्वं जगतो हि? यतो जगद् ब्रह्म नास्ति, यतो हि जगज् जातं यद् ब्रह्मणो सकाशात् तद् जगद् भिन्नं स्याद् इत्येवं, यतो हि जगज् जातम् उत्त्पन्नं जगद् भिन्नं स्या द्धि कथं हि, यस्माद् वा इदं न पृथग् हि; यथा सुवर्ण घटितं कटकं कुण्डलादि वा सर्वं तद् घटितं वा हेममयं भवति यतो हि हेम हेम स्याद् भिन्नं तुच्छं भिन्नं भवति, तद् हेममयाद् घटिताद् हेम विद्वांसो न भिन्नं वदन्ति भिन्नं यद् हेमत्व-भेदतः सुवर्णं हि सर्वं तद् हेम भिन्नं भवति यतो वा हेमत्वं सर्वं हेम च सुवर्णं भवति तद् भिन्नं तु सुवर्णं न भवेद् हि सुवर्णं वा हि सुवर्णस्य कुण्डलादिकं यद् हेम हेमत्वेन ज्ञेयं, यत् तु हेम कुण्डल कटकं सर्वं तु हेम भवति, तद् हेमत्वाद् हेमत्वेन हि ज्ञेयं विद्वांसो हि यद् वेद व्याख्यानाद् हि विद्वांसो वदन्ति, स सर्वं हि सु-- वर्णादिशब्देन, सुवर्ण-शब्दे--नैव सर्वस्या ज्ञेयं विदुः इत्येवं विदुषो हि, यद् ब्रह्मणो भिन्नं न हि जगद् विद्यते सर्वं सु--वर्ण घटितं हि कनकं स्वर्णं भिन्नं भवति वा कथं न वा हि सुवर्णं भव ति? न हि किञ्चिद् भिन्नं भवति, न वा हेम भिन्नं सर्वं जगद् ब्रह्म भवति नित्यं निश्चलं हि, तद् ब्रह्म सर्वं जगद् इति सर्वं हि विद्वांसो वदन्ति, सर्वं जगद् ब्रह्म एव, न भिन्नं ब्रह्म जगद् इति न हि भिन्नं भवेद् जगद् हि? यस्माद् वा इदं जगद् सर्वं हि जातं जगत् सर्वं हि जीवति यतः जगद् सर्वं हि, यस्माज् जातानि जगद् हि, स जगद् एव; स सर्वं जगद् भवति किं न जगद् भव ति? तद् ब्रह्म सर्वं, यस्माद् वा इदमेव सर्वं सर्वं सर्वं हि जातं जगद् इति यस्माद् वा, तद् ब्रह्मण एव! यतो हि सर्वस्मिन् सर्वं जगद् भव ति? नहि हि सर्वं ब्रह्मणः? जगद् भव ति? जगद् सर्वं जगद् हि सर्वं हि ब्रह्मणो जातं जगद्? यस्माद्, यत् स हि सर्वं जगद् सर्वं हि भवति यतो हि जगद् हि सर्वं जगद्, स जगद् जगद् हि सर्वं हि हि हि सर्वं हि सर्वं सर्वं हि; सर्वं हि सर्वं जगद् भव, जगद् सर्वं हि, सर्वं जगद् यस्माद् हि, सर्वं हि; सर्वं सर्वं जगद् सा हि वा जगद्वाग् हि यत् सर्वं हि सर्वं जगद् जातं जगज् जातं जगद् जगद् सर्वं जगद् हि सर्वं हि हि जगद्... सा हि वाग्, सर्वं यद् जगद् सर्वं यस्माद् यद् सर्वं हि हि जगद् यतो हि सर्वं हि, सर्वं जगद् हि सर्वं सर्वं जगद् हि सर्वं सर्वं जगद् भवति हि सर्वं जगद् हि सर्वं हि हि हि सर्वं हि सर्वं हि हि सर्वं हि हि हि सर्वं हि, हि सर्वं सर्वं जगद् हि, यद् ब्रह्मणो जगद् जातं सर्वं हि जगद् हि सर्वं हि हि, 157
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लेकिन जब इन दोनों पक्षों का रुख देखा जाता तो यह बात और भी ज्यादा पेचीदा नजर आती दोनों ओर से गाहे-बगाहे जो कुछ कहा जाताथा उससे तो यही भ्रम पैदा होता कि बात सिर पैर की है। जो कुछ अदालत के रू-ब-रू तयशुदा था उसके विरूद्ध जो कुछ भी कहा जाता था वह सब बेमायने था। दोनों तरफ वाले जो मुसलमानों को इस बात का दोष, ठहराने की जो चेष्टा करते रहते थे। उन पर कुछ बात कहने का यहां मौका नहीं था। केवल इतना ही याद रखना काफी होगा कि हिन्दू! यदि चेतते तो, क्या उनका रास्ता रोका था? जब भी मुसलमान यह सवाल या दावा पेश करते थे, तब सिर्फ मुगालते ही सामने आते कि जब सारा इलाका सिर्फ उनका ही था और अदालत सिर्फ इस बात से मतलब; कि जो भी पक्ष सामने अपना दावा पेश, अदालत तो दो जन-पक्षोंके वाद विवादका ही तो फैसला करेगी, दूसरा कोई, चाहे हमदर्दी से ही सही यदि सामने आकर दावा पेश करे तो! जब कोई ऐसा दावा करता, तभी तो उस पर भी फैसला दिया जाता। जो कानून की नजर में कोई मतलब नहीं, बस दावा करने वाले अपने सामने वाले को नीचा दिखाने मात्र तक ही सीमित! बस ऐसा दावा अदालत रद्द बात अब भी समझ में आ सकती थी जब इस बात का दावा पेश किया जा सकता केवल इसके लिए दावा पेश नहीं किया जाता कि कौन क्या करता था? अदालत सिर्फ सबूत ही तो तय कर के फैसला करती है, न सबूत सिर्फ दावा करने से तय कर लिए जाते हैं। इस आधार पर यह बात सामने आई कि जब भी हिन्दू पक्ष से दावा पेश किया गया तो वह प्रमाण से विमुख ही रहा; अदालत सिर्फ इस बात पर न केवल विश्वास का दायरा पेश कर के दावा बरकरार रखा जा सकता; उस पर सिर्फ दावा करने से कुछ हासिल नहीं होता। दावा पेश करने वाले इस बात को जानते थे, तभी तो सिर्फ दावा करते चले आ रहे थे, ताकि यह महसूस ही कराया जा सके कि उनका भी हिस्सा वहां पर ही था, जिस से कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता था। पर जब दावा करने का ही हक नहीं था तो दावा कैसा था, अर्थात्; केवल दावा तक ही यह बात रह गई थी जिस के लिए यह बात केवल इतनी भर ही थी कि जहां तक गाहे-बगाहे कब्जा करने की बात थी व केवल भ्रम था, जो कि कब्जा उस वक्त सिद्ध था! जो बात तय थी वह कब्जा सिर्फ एक तरफ का ही था। इस पर एक बात यह भी, कब्जा जिस वक्त साबित था तब किसी को कोई ऐतराज करने का मौका ही नहीं था, केवल राजनैतिक ही रूप था जिस में हिन्दू पुनरूत्थान को उभारा गया था, ताकि इस बात राजनीति के तौर फायदा उठाया जा-- सके। दूसरा हिस्सा मुसलमानों? मुसलमानों का तो हक ही था जो कि मु--कद्दमा पर था, अदालत में था, जिस के दम पर, जिस के बल, जिस का, हकदार था, इसके लिए मुसलमानों को सोचना ही क्या राम लला हम आएँगे, मन्दिर वहीं बनाएंगे यह नारा तब से ही तय कर तय किया गया था, जब से दावा पेश किया गया था, जो कि सिर्फ दावा ही बनकर उभरा था। जिसका कोई आधार सिर्फ दावा पेश करने तक ही था। जो सिर्फ इस बात प्रमाण था, कि सब कुछ दावा पेश करने के बाद सिर्फ तय करने का दावा था, जिस का कोई दूसरा आधार था ही न था, पर फिर राजनीति की बात सामने आई थी और इस राजनीति की बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था जब कि सब कुछ तय था तब राजनीति की ही तो जरूरत थी! जिस तरह मंदिर की, राजनीति चल रही, जिस तरह से हर बात को लेकर बात की जा रही थी। इसके लिए हिन्दू हर पल तैयार थे। जब कि राजनीति केवल इस बात को लेकर थी कि हिन्दू जन मानस को हर हाल में भ्रमित ही रखा जाए; जिससे सिर्फ अपना उल्लू ही सीधा किया जा सके! राम लला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे इस बात को हवा देकर जो राजनीति की चाल चली गई उसका फल तो सामने आ ही गया था। जब तक राजनीति नहीं, तब तक कुछ भी संभव नहीं, ऐसा सब लग रहा था! पर इससे जो बात सामने आ रही थी उससे कोई एक बात तय हो सकती थी कि! यदि केवल इस बात पर ध्यान दिया जाता तो बात बन सकती थी कि जब अदालत में कोई फैसला होना ही था तो राजनीति की जरूरत ही कहां थी, किस कारण थी? पर जब बात ही राजनीति, जिसे कि केवल जन! जन से जोड़ कर ही देखा जा रहा था तो राजनीति केवल फायदा ही, इस बात केवल देखा गया। राजनीति का दायरा केवल भ्रम पैदा करने तक ही सीमित था यह बात साबित हो चुकी; जिसके लिए केवल, गाहे-बगाहे सिर्फ! भ्रमित कर जन को अपने पीछे लगा कर ही दम भरा जाएगा! 159
यद्यपि इन सब का फल केवल पर व निज उपकार ही था तथापि इन सब का फल प्रशंसाप्रद न हुआ, पर कष्ट ही रहा; जिसे जी चाहा तब इन सब कष्टों का बदला ले लेने पर भी, बदला कुछ इस तरह का लिया कि जिससे सुख मिले? पर यह स्वाभाव ही था कि सब कुछ होने पर भी चित्त एकांत चाहने का दुख कभी विसर्जन नहीं करता था और अब न दया, केवल न प्रेम; पर यह देखा, कर्तव्य पालन करने वालों को बहुधा ही कष्टमय यह या वह रूप मिल ही जाता, पर कर्तव्य पालन करने से जो संतोष, सुख मिलता उसका मोल जग में न था या हो सकता था कभी भी? अब संसार की गति का रूप, या परिणाम सब बदला। यह चित्त का धर्म था कि जिसको जब तक सुख प्राप्त होता रहता, तबतक दया, या प्रेम का उदय रहा; पर चित्त का रूप उस समय कुछ कठिन प्रतीत होने लगा, विचारवान् भी कहा जा पर मन रूपी सागर का अंत या तल का था कहाँ पता केवल ऊपर रूप में ही मन का रूप सा ज्ञात था, दयावान् चित्त का; पर विचार से, दया का भाव भी जा रहा, संसार की चालों का सब पर प्रभाव था ही। पर दुख या कष्ट के समय या संकट के समय जो सहायता की या दी जाती थी उसको कोई भी न भूलता था पर अब तो दशा ही उलटी थी, दया, प्रेम केवल केवल नाम मात्र रहा, केवल मन बहलाने का रूप था? संसार में तो, दया केवल पर प्रेम का रूप दिखाना मात्र ही समझा जाता था जिसको कि दया का रूप दिया जाता, पर आज तक केवल देखा केवल दिखावटी ही का काम था संसार; संसार सब को ठगने का ही नाम था, पर बिना ठगाए भी काम नहीं था हो सकता और फिर संसार को यह भी केवल दया अथवा उपकार धर्म नहीं था जीव-जीव का कर्तव्य कहा, या संसार सब कुछ उस रूप से रहित हो रहा था जैसा, होना योग्य था, जिसको सत्य कहा; पर यह सत्य भी सब संसार में शून्य था, केवल रूप बदला ही था। दया का संसार में नाम मात्र था, सब ही सब कुछ अपने ही स्वार्थ के लिये कर रहे, दया रूप तो केवल पर प्रेम या छल का ही रूप कहा व माना जा ता था व विश्वास सब का सब नष्ट था सब अपने लाभ लिए कष्ट दे रहे थे, दया तो केवल पर ठगने का ही साधन था या संसार में केवल दया नाम का सब कुछ न था बदला। पर दया का धर्म तो न था ऐसा, पर यह सब संसार का रूप न था। सब संसार का नाम तो केवल दया पर उपकार ही था नाम व रूप बदला ही था संसार का सब का सब, पर यह संसार तो ऐसा न था जैसा अब था कि सब का सब केवल धन का रूप बन कर के सब को कष्ट दे रहा था कि यह धन का लोभ ही सब प्रकार की विपत्ति का मूल कारण था पर सब को यह ज्ञात। सदा ऐसा न, सब का दुख दूर हुआ; दया का रूप, दया का नाम, दया का काम, दया की आवश्यकता ही बची। हे प्यारे प्रभु, दया से ही काम न बन सके! ना दया का नाम कहीं अब रहा; पर सब जगत् में केवल तेरा नाम केवल --तेरा नाम ही! सब का सब कुछ रहा, दया तो कहीं केवल नाम को रह गई, दया का रूप बदला तो सब को दुख हुआ, पर सब तो यह भी हुआ, पर सब का सुख जाता रहा, सब ही सब कुछ रूप धारण करके जगत में सब कुछ करने को सब ही क्यों? सब तो बदल गया, सब तो सब कुछ रहा, सब को दया रूप में सब कुछ संसार में ही मन को भर-- जो जो देखा सो सब कुछ ऐसा देखा, संसार के रूप को देखकर ही संसार दया शून्य प्रतीत होने लगा था पर अब, संसार को न दया से ही कोई सम्बन्ध ही था, अब संसार से ही दूर हो, पर सब कुछ रूप व प्रेम सदा ही हर एक प्राणी का धर्म था दया स्वरूप दया के गुण सब का कल्याण करने वाला संसार में ही सब कुछ रहा था, दया स्वरूप ही, दया स्वरूप सब कुछ सुख देने वाला था। दया से ही जगत् का उद्धार हो सका था, पर अब दया से भी कोई काम न बन सका क्योंकि संसार में छल, कपट का नाम ही था; अब तो दया का नाम सब मिटा। 160
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सत्यनारायण का नाम रहेगा तो पचास पचास लाख लोग एक साथ सत्यनारायण की कथा
समाज का रूप समझायेंगे और समझ कर जब समझायेंगे तो सब पर असर हो जायगा या सिर्फ गीता कण्ठस्थ करके ही छोड़ देने वाले भक्त रहोगे। संसार के बड़े बड़े संत महात्मा भी यही काम करते आ रहे और जब तक सन्तों का संग रहेगा, तब सत्यनारायण का व्रत भी रहेगा और जब तक संतों का संग या सत्यनारायण का नाम रहेगा तो पचास पचास लाख लोग एक साथ सत्यनारायण की कथा सुनेंगे। नहीं तो यह सब समाप्त हो ही रहा सत्यानाशी समाज बन ही तो रहा है। पचास रूप का यह सत्यनारायण समाप्त हुआ। तो नाम का ध्यान है? लेकिन यह नाम कौन तो क्या यह नाम है? फिर यह नाम कौन ऐसा तो नहीं भगवान स्वरूप का ध्यान करते हुए सत्यम् परब्रह्मम् है; स्वरूप ध्यान स्वरूपम् हो या ध्यान शब्दम् हो? स्वरूप का ध्यान करने पर तो स्वरूप परमात्मा और भगवान् स्वरूप प्रत्यक्ष सामने आ जाता होगा, लेकिन यह स्वरूप भी तो मिट जाता है। भगवान् स्वरूप तो साकार है, जो साकार रहेगा वह मिटेगा व जो न मिटे ऐसा स्वरूप? हे व्यास, हे शौनक इन दोनों का स्वरूप क्या रूप तो सत्य और असत्य का भेद जब तक नहीं जाने; इसका भेद जानकर रूप का त्याग न हो तब तक रूप देखना, स्वरूप का ध्यान असम्भव। तब व्यास जी विस्तार देकर सत्यनारायण के दो रूप कहे, जिसका कि पहले किसी रूप का तो स्वरूप ध्यान न होना भगवान् के भक्त को रूप ही तो ध्यान बनाकर ले गया होगा न! दो रूप ऐसा समझाया कि जो सत्य वह सत्य का ध्यान रूप का नहीं रूपवान् जब तक रूप का नाम न समझ परमात्मा स्वरूप देखना कठिन होगा जिसे संत या भगवान् स्वरूप सत्यनारायण भगवान् कहते हैं। भगवान् का रूप नहीं है। जिसने स्वरूप बनाया व तो मिटेगा इसका न मिटे; परमात्मा सत्यनारायण स्वरूप व रूप समझकर देखा, सत्यनारायण व्यास जी स्वरूप रूप को सत्यनारायण स्वरूप दिया या दो रूप एक असत्य परमात्मा का दूसरा सत्य परमात्मा। जिस रूप को--सत्य को सब सन्तुक स्वरूप मानते स्वरूप नाम रूप का सत्य का रूप माना गया रूप का ध्यान स्वरूप ध्यान समाधि स्वरूप का रूप देखना स्वरूप समाधि द्वारा संत रूप बनाया या सत्य का रूप माना, रूप देखना असत्य, स्वरूप का रूप, ध्यान सत्यनारायण के रूप का नाम ध्यान रूप या सत्यता का रूप ध्यान होगा, या दो रूप एक रूप दूसरा रूप? परमात्मा का एक रूप होगा? संत दूसरा रूप, दो रूप ज्ञान का रूप दूसरा रूप का ही स्वरूप रूप हो? रूप देखना या न रूप सत्यनारायण स्वरूप ध्यान रूप या सत्य ध्यान है, या दोनों रूप का ही रूप देखना ही रूप का नाम रूप ही रूप का, स्वरूप का रूप? रूप रूप स्वरूप का स्वरूप रूप है? रूप तो संत रूपी सत्य स्वरूप को रूप या रूप न होने पर ही रूप का रूप सत्यनारायण का नाम रूप माना गया हो! सत्यनारायण का रूप तो यह रूप स्वरूप या रूप होगा? या तो संत स्वरूप का स्वरूप होगा? स्वरूप तो एक है, रूप अनेक। जो स्वरूप देखना हो सत्य का ध्यान सत्यनारायण रूप बन कर, स्वरूप समझना रूप, ध्यान सत्यनारायण रूप जब तक न होगा तब तक, व्यास का सत्य स्वरूप का ध्यान रूप हो? व्यास जी रूप स्वरूप परमात्मा का रूप स्वरूप देखना ऐसा न होगा, जो स्वरूप को रूप जैसा देखना या दो स्वरूप सत्य दूसरा स्वरूप रूप, रूप हो? या रूप रूप परमात्मा का रूप, परमात्मा का रूप देखना व्यास जी सत्य रूप से परे को स्वरूप न मान, जो स्वरूप का रूप जब सब रूप रूप रूप समझ ले तब व्यास जी कहते... हे शौनक रूप देखना; स्वरूप को रूप का ही रूप समझ कर संत रूप देखना कैसा? कैसा रूप? रूप तो संत का स्वरूप होगा, सत्यनारायण रूप, संत रूप को ही सत्यनारायण रूप कहा गया क्योंकि रूप संत का स्वरूप रूप रूप माना ही रूप समाधि रूप का नाम ही तो रूप होगा! जो दो स्वरूप रूप रूप देखने से पहले ही रूप देखना हो संत सुनो!, जो सत्य रूप स्वरूप
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विचार कर विचार पूर्वक काम को हाथ में मत लो तब तक जब तक सन्देह रहे उस बात, उस विषय पर चिन्तन करते रहो व ऐसा समाधान प्राप्त करो कि फिर मन में कोई हिचकिचाहट अथवा संशय बाकी न रह जाय या तो ऐसा करो व जो यह न हो, काम करना बहुत जरूरी हो! तत्काल तय करो निश्चय कर लो कि अब फैसला तय संशयमुक्त कर ही लिया गया इसके जो नतीजे निकलेंगे हम डट कर उनका सामना कर लेंगे और संशय को त्याग कर काम में जुट जाओ लगनपूर्वक, ईश्वर जरूर सफलता का आशीर्वाद या फल देगा ही ऐसा निश्चय रखो तो यह न हो कि अरे! काम तो बिगड़ गया! संशय बना रहेगा संशय मिटा नहीं! संशय मिटने का उपाय संशय से रहित काम करो! काम करो, निश्चयी बन कर करो! निश्चयपूर्वक! यह ख्याल रहे, जो शंका दूर हो सकती बुद्धिरूपी खुरपी से काम निकालकर विचार रूपी अज्ञानांधकार को; जो हो सो जान लेता ही समझ ही इसका नाम साधना ही संशय को दूर कर काम, काम संशय को दूर करेगा, तो यह तो परस्पर एक का नाश एक को कर, यह निर्णय मन द्वारा लिया गया! सो इस बात का सार यह हुआ काम तो कर कर्म व अकर्म अर्थात् फल वाले कर्म निष्काम कर्म को कर मत छोड़ो ना सोच कर काम मत रोक मत मन को संशय ग्रसित रखो। अज्ञानान्धकार मत पैदा करो, अज्ञान संशयवान मत बन कर्म को मत छोड़, कर्म त्याग फल की इच्छा त्याग कर्म को ईश्वरार्पण समझ कर किया तो यह सब हो गया संशय समाप्त हो, अज्ञान समाप्त हो, तो ही काम होगा फिर संशय ग्रसित काम क्या ही, कर्म कर्म का फल ही ना हुआ व अकर्म का फल ना निष्काम संशय ग्रसित कर्म फल का ही देगा, जो कर्म ज्ञान पर फल की इच्छा त्याग कर्म निष्काम कर्म बन गया तो ही मुक्ति का मार्ग कर्म फलदाता बन कर, संशय अज्ञानान्ध को ही रूप व कर्म फल निष्काम संशय त्याग सो जो कहा ना संशय कर; संशय ग्रसित काम ना कर काम कर्म ना बन कर व अकर्म, निष्काम कर्म ना बनेगा जो काम मन चित्त संशय से युक्त हो किया तो उस का फल तो ना ही संशय ग्रसित रहा, ना संशय से युक्त निष्काम ही बनेगा व जब कर्म का फल निष्काम नहीं तो कर्म मुक्ति का कारण ही कैसे बनेगा तो शंका तो अज्ञान ग्रसित मन की उपज हुई जिस कारण संशय से संशय बढ़ता गया जो कर्म किया उस का फल संशय युक्त ही संशय ग्रसित फल भोगना ही पड़ा; संशयवान् का नाश, सो काम संशय युक्त ना हो संशय रहित कर्म, काम निष्काम, ना शंका ही ना फल की; निष्काम भाव मन में संशय को स्थान नहीं देता सो ना संशयवान् बनो काम, मत अकर्म करो ना, अकर्म त्याग कर्म को ना कर मत संशय युक्त बन कर, कर्म को ईश्वरार्पण कर ईश्वर को मान ईश्वर पर छोड़ कर जो भी कर्म हो ईश्वर का ही नाम जान कर संशय मिटा दिया तो ही, कर्म का त्याग हुआ और संशयरूपी अज्ञान का विनाश हुआ और, ज्ञान द्वारा परमात्मा का ही रूप जान निष्काम कर्म किया निष्काम फलदाता, परमात्मा ही परमात्मा स्वरूप प्रदान करता सो सब ही शांत हो गया मन और संशय अज्ञान, या संशय का कारण मन जब तक संशय को मानेगा तब, तो उस बात का नाश सब काम सब का नाश ही! जब सब बात को संशय रूप मान कर उस का त्याग ना तो त्याग ना ही फल का रूप बन पाया संशय अज्ञानांध बना रहा सब बात का नाश तो हो गया संशय का नाश तब तक संभव ना हुआ; ना संशय निवारण ही मन का विचार जो संशयवान् मन ना उस बात का ही नाश कर दिया जो बात सब काम करने ज्ञान का रूप थी ना ज्ञान अज्ञान का नाश हुआ ना ही, अज्ञान संशयवान् बना रहा कर्म सब का नाश हो ही, संशय ही ना संशय रूप रहा तो ज्ञान संशय मिटा ही; कर्म ज्ञान ही फल दाता ही; ज्ञान रूप ईश्वर ही फल निष्काम ना फल की ना फल से सम्बंध ना कर्म त्याग की बात; ना दोष; संशय ना संशय नाश ही है; कर्म योग-ज्ञान निष्काम कर्म रूप बन कर ज्ञान रूप रहा, सं-शय नाश कर अज्ञान को; सं-शय न रहा; ज्ञान व कर्म एक--समान ही रूप ज्ञान या परमात्मा रूप बन कर परमात्मा रूप हो गया तो सब संशयरूपी माया अज्ञान व संशय "कर्मणो ह्यपि बोद्ध व्यं, बोद्ध व्यं च वि कर्म णः, अकर्म णश्च बोद्ध व्यं--गह ना कर्म णो गतिः इति श्रीमद् भगवद् गीता" 163
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यह भी तो सब जानता हुआ कि सब कार्य विनाशीक हैं, पर यह सब कुछ करता रहता है, जिसे कि यह कुछ समझ रक्खे कि भला ऐसा करनेके पश्चात् तो मैं सुखी होऊँगा अर्थात् न सुखीके पश्चात् कभी कोई दुःख ही न होगा ऐसी समझ, जिसे पक्की हो वह संसारी जीव भले ही भोगों का संग्रह करे अथवा, पर ऐसा कोई भी तो यहां पर सुखी नहीं! जिस किसी भी विषय का भोग करो; चाहे वह बड़ा सुख ही हो पर अन्त उसका दुःख अथवा दुःख रूपी फल लिये ही--तो फिर व्यर्थ अपने सच्चे स्वरूप को भूल संसार के इन मिथ्या सम्बंधों की ही चाट में क्यों लग कर न केवल, पर जीवन को निष्फल करता हुआ सब कुछ इसी तरह नष्ट करके पश्चात्ताप स्वरूप नरक आदि योनियोंके सख्त दुःख भोगने तय्यार हो रहा है यह सब कुछ न हुआ तो क्या हुआ जो कि इस जीव ने अपनी इस आयु, या समय का सदुपयोग न कर अपने जीवन व जन्म दोनों नाश कर दिये तो इस जीव को क्या लाभ हुआ जो कि इस तरह सांसारिक पदार्थों में ही सारा दम भर रहा कि जिन्हें अपने साथ नहीं लेजा सकता था परन्तु संसार से उलटा भारी पापों रूपी-गठरी अपने सिर लादकर जो अगले जन्म रूपी-नये सफर में भयानक दुःखदायी हो, जिससे कि, जिससे बच कर ही आगे सुख मार्ग पाना बनता था, सो वैसा तो न बनाकर या विचार कर उस तरफ कदम उठाया वरन और ही पथ तय करने लगा जो विषय कि सब तरह दुखदायी ही सिद्ध, जब अज्ञानता से ही संसारी पदार्थों रूप या सांसारिक ही यह सर्व सुखी है? सो इस का क्या कोई सच्चा या भला फल अथवा लाभ यह समझ कर ले रहा है कि जिसका अन्त ही सब का सब ही, फिर अज्ञान होकर अपनी वर्तमान अवस्था को क्यों न सोच समझ कर ही तय कर आगे बढ़ना योग्य था। सो जो विचारवान् विवेकशील है वह सब इस सब सांसारिक या प्रपंच रूप जगत, अज्ञानियों के, सो जो इन सब बंधनों रूप या माया जाल आदि से बचकर अपने निज आत्म स्वरूप का ज्ञान करके अपने स्वरूप को समझ, सच्चा ही आनन्द पद प्राप्त करके स्वरूप स्थिति को प्राप्त कर अपना जीवन सफल कर इस संसार से जन्ममरण पीड़ा से सदाके वास्ते ही छूट कर सुखी बन जाता है क्योंकि न यहां का संसार का पदार्थ ही सच्चा व सुख देने वाला; जैसे कि, बालू रेतकी भीत; जैसे ओले, जिन का कि, नाम भर ही सब कुछ ही देखने मात्रका; फिर उस संसार के सम्बंध व रूप रूप--का जो सम्बंधी सम्बंधी ही बनता है सो सब आगे जाकर दुःखदायी सिद्ध होता हुआ जो कोई भी तो नजर नहीं आता कि, ऐसा भी है? सम्बन्धी है? उस रूप-सम्बन्धी है? माता-पिता सम्बन्धी या अन्य कोई; इस पर कौन? आज जो अपना बनता है, कलको वही उस का दुश्मन हो जाता रूप बन, या अपना ही अपना रूप बन, जो आज अपना तो कल ही दुश्--मन का रूप बन? सम्बन्धी है? माता-पिता कौन या कैसा? कैसा पिता और कैसा सम्बन्धी रूप है, अपना रूप ही तो सब का सब हुआ? सो संसार तो सिर्फ इस माया प्रपंच अथवा सब धोखे की खान अथवा छलका ही तो रूप बना हुए सब इस तरह के प्रपंच का सम्बंधी, अपने बस का, अपने वश का होने पर ही तक, अपने तक सदा साथ निभाने या सम्बंधी बन कर नहीं रह सकता है सिर्फ एक काम-चलाऊ दशा ही, उस तरह सम्बंध का काम रहा, जिसे कि सब इस के लिये अपना सब कुछ तन मन धन से भी नष्ट करके अंत समय अपने को--इस निपट मूर्ख अज्ञानता स्वरूप बना कर ही सब तरफ से न केवल खाली हाथ, मन्द किस्मत, भारी अपराधी, सजा भुगतने योग्य ही उस मालिक प्रभु की ओर गया संसार के सम्बंधों से जो विवेकशील जन सो तो सम्बंध तो रख कर भी इन का मोह त्याग कर के, अपने कर्त्तव्य पालन रूप में रख कर ही सत्य को, अपने निज आत्म रूप को ही जानने व साधन करने में लगा, सांसारिक सुख-साधन के सब साधन को भी करता, पर अनासक्त रूप सब को न तो सब का समझ अपना रूप में ही समझ सबमें परमात्मा स्वरूप व एक रस ही परमात्मा सत्ता को व्यापक रूप में जाना; इसलिये सांसारिक पदार्थों काज या काम न ही तो उनका त्याग ही किया सांसारिक सब काम को करता हुआ संसार से इस तरह से; मन ही मन समझ कर ही सब व्यवहार से दूर ही दूर रहता हुआ अपना सच्चा सुख, स्वरूप जो अपने मन को अपने निज आनन्द स्वरूप में, अपने सत स्वरूप रूप परमात्मा के साक्षात्कार साधन से ही पाना बना, 168
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विचारवान् को या तत्त्ववेत्ता को इस सांसारिक या अन्य सुख की इच्छा हो तो भगवान् तो उस पर प्रसन्न हों, पर जो निष्कामता से, केवल प्रभु प्रेम से उनके पास गया उसे कुछ न दे यह अनुचित फिर किस प्रकार निष्काम भजेंगे? उत्तर या शंका का समाधान उचित तो यही था, साक्षात्कार ही मुख्य था, केवल मुक्ति आ--जाना ही लक्ष्य था परंतु सर्वज्ञ सच्चिदानन्द स्वरूप श्री भगवान् केवल उस भक्त परमानन्द स्वरूप ही नहीं न थे किंतु, सर्वशक्ति स्वरूप भी थे। सर्वसामर्थ्य उन प्रभु, भक्तों हित उस हित का विचार न रखें तो, दयालु-कृपालु कैसे कहें, जो भक्त का सब प्रकार लक्ष्य आ--जाना प्रभु ही सर्वान्तर्यामी थे स्वरूप नाम से, स्वयं भक्तजन के संकटों निवारण को उन पर दया कर कष्टों को दूर कर भक्त निष्काम प्रेम से भगवान् प्राप्त कर प्रभु का स्वरूप हो, जो विचार प्रभु मन सोच प्रकट किया था, वैसा ही हो; उस पर दया कर जो भी संकट था, उस संकट को प्रभु मिटा दिया। विचार विस्तृत हो, संकट के साथ उसका उद्धार स्वतः सिद्ध ही; संसार व्यवस्था को यह एक शिक्षा रूपी ज्ञान दिया गया कि सब काम करो, पर मन सदा प्रभु स्मरण रूपी अन्तर्यामीस्वरूप सदा मन में धारण किये रहो। निष्कामता केवल बाहर त्याग का ही तो नाम नहीं पर भीतर मन का, हृदय आ--जाना हो, सच्चिदानंद प्रभु, परमात्मा प्रभु; प्रेममय रूप उस समय प्रेम स्वरूप साक्षात्कार ही सब को, जो भी प्रभु का गुण गाय उस जीव-मात्र कभी भूखा प्यासा परमात्मा रूप ही तो सर्वव्यापी सब तरफ न्याय का मार्ग या ज्ञान रूप दिया केवल निष्काम विचार से काम या भक्ति निष्काम से ही सदा अमर हो गया, या जो निष्काम उपासना या ज्ञान सदा सच्चिदानन्दरूप से सदा अमर हो ही ज्ञान स्वरूप मन का त्याग ही मुख्य है। बाहर सब काम करते हुए निष्काम प्रभु सेवा ही निष्काम भक्त रूप निष्काम ज्ञान स्वतः स्वतः ही प्रकट हो, तब ही सत्य जाना, कि भगवान् तो केवल भाव मात्र के, या प्रभु को ही तो सर्वव्यापी है, पर ज्ञान सदा ही उस भक्त को, ज्ञान सत्य सब हुआ! सर्वान्तर्यामी या ईश्वर या अन्य ज्ञान तो ही भगवान् कृपा का फलित स्वरूप। सच्चिदानन्द का सच्चा भक्त रूप ही उस समय पर ही सच्चा विचार रूप सिद्ध रूप ही ज्ञान रूप ही सब जान लिया कि भगवान् तो सच्चिदानन्द ही स्वरूप ज्ञान मात्र रूप ही नाम रूप सर्वान्तर्यामी! सो उस स्वरूप के सा-क्षात् रूप ही सच्चिदानन्द रूप उस समय न ही तो मिला; भगवान् सर्वदा निष्काम को सर्वान्तर्यामी स्वरूप प्रकट हुआ सच्चिदानन्द तो सब जगह सत्य ही तो ही परमात्मा तो ही तो रहा, पर जो निष्काम सेवा भाव मिला या अज्ञान का नाश ही हो गया तब सब ही निष्काम न हुआ, पर जो सब कुछ सत्य सच्चिदानन्द रूप उस जीव-मात्र को सत्य ही ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप मिला, परमात्मा का स्वरूप ही ऐसा सब जान लिया। ज्ञान ही भगवान् स्वरूप ही सब सब कुछ ही सब कुछ ही सब कुछ ही, पर जो सत्य ही सब सत्य रहा सो सब ज्ञान प्रभु स्वरूप ही, स्वरूप जानना ही केवल मन-वच कर्म द्वारा सत्य हो? मन-वच कर्म द्वारा ज्ञान, केवल मन-वच कर्म द्वारा सत्य ही सच्चिदानन्द परमात्मा स्वरूप ही तो मिलता सब, उस ज्ञान स्वरूप का निष्काम-- सच्चिदानन्द स्वरूप ही तो सर्वदा सदा सब का उद्धार ही तो संभव हुआ, ज्ञान, सो प्रभु स्वरूप का सब का सब कल्याण हो ही सर्वव्यापी सदा ज्ञान हुआ, जो निष्काम रूप सच्चा ज्ञानी; उस का स्वरूप ज्ञान सब सच्चिदानन्द स्वरूप प्रकट हो संसार को, सच्चिदानन्द सत्य स्वरूप दिखा, सर्वदा सदा ही तो भगवान् स्वरूप सच्चा ज्ञान रहा सच्चिदानन्द ही तो भगवान् का, स्वरूप जैसा सब का तो प्रत्यक्ष स्वरूप ही तो हो सच्चिदानन्द स्वरूप रहा सो सच्चिदानन्द ही तो सब जीव-मात्र स्वरूप सच्चिदानन्द ही प्राप्त हो! फिर उस से सब कुछ प्राप्त ज्ञान रूप ही प्राप्त होता सब को, सब ज्ञान आ-- जाना ज्ञान, स्वरूप रहा; सो स्वरूप स्वरूप रहा, स्वरूप ही स्वरूप रहा? केवल सच्चिदानन्द प्रभु ज्ञान सब का उद्धार हुआ सच्चिदानन्द प्रभु उस निष्काम को जो संसार का ज्ञान सदा सदा सब का ज्ञान सदा सदा सदा ही, सब ही 172
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