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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

और इसके सिवाय आत्मा ऐसा तो नहीं जिसे जानना सहज होगा, कठिन होगा, असाध्य होगा? कठिन होगा, ऐसा न होगा? कठिन तब होता, अगर उसे बाहर से लाना होता ऐसा कोई पदार्थ जिसे अन्य लोग जानते हों, उसे भीतर लाना होता और भीतर बैठाना ही कठिन हो गया; परन्तु भीतर बैठा ही हुआ है इसलिए वह कठिन होगा? बाहर से लाना हो तब तो सोच और श्रम भी करना पड़े पर जो भीतर ही बैठा हुआ कठिन होगा? सच, बाहर जाना कठिन है, भीतर आना बहुत सहज पर जब भीतर जाना ही नहीं होता तो यह बात कैसे समझ में आवे कि भीतर की निवृत्ति कैसी हो सकती, इसका उपाय जानना न पड़े तो फिर और तो क्या हो सकता भाई, पर इसके लिए जीव बहुत उपाय कर चुका पर मुक्ति नहीं हुई, तब उपाय किया गया, जिसे यह समझ में आवेगा कि व्यवहार रूप निमित्त मात्र कोई भी बात से तो काम नहीं होगा? इसका कारण यह, जिसे सब ही कर ही रहे हैं और करते रहेंगे, क्योंकि यह तो अनादिकाल से ही कर रहे थे। ऐसा जानकर अब निश्चय जानकर करना होगा कि यह तो व्यवहार ही रहा है, और फिर जो सब संत जन इस स्वरूप बात कहते आये हैं सो इस बात के विपरीत तो नहीं कह गये हैं और अगर वे सब संत जन इस प्रकार के उपाय करने से ही मुक्त हुए हैं तब निश्चय से इसके ही द्वारा मोक्ष होता है सो जान कर ही तो ज्ञानी जन इस पर जोर लगाते आये हैं। इस बात, उपाय भिन्न--भिन्न प्रकार समझाने का यह एक ही तो प्रयोजन हो सकता है कि, हम सब इस बात को समझ कर आत्मकल्याण के योग्य बनें! भला सोचो? यह बात समझ कर कैसे आगे बढ़ें पहले ऐसा समझो, इसमें तो संशय न रहा? जो भी कह रहे हैं शास्त्र और संत जन वे आत्मज्ञान के ही लिए कहते आये हैं। इस बात में, जिसे भी संशय होगा सो सब व्यर्थ समझ लेगा पर जिसे समझ में आया सो ऐसा न कहे, जो कुछ भी कहा जा रहा जिसे भी समझा जा सके सो ही कहा जा रहा, समझे बिना काम कैसे चलेगा क्यों? जो कुछ भी कहा जा रहा उसका लाभ लेना चाहिये न कि इस तरह सोचे कि केवल सुन लेने से ही सब हो! निश्चय ही! संशय को छोड़ कर? जो कुछ भी कहा जा रहा सो सब को ही लाभ करने वाला समझना चाहिये सो इस भाव से ही बात को ग्रहण करे! निश्चय लाभ होगा ही? जो बात कही जा रही है उसको मन न दे तो क्या निश्चय जान लो, अज्ञानी, तू तो समय के बीत जाने पर ही पछताये बिना रहेगा न जब समय बीत कर हाथ से निकल गये अवसर तब सिर पर हाथ रखकर ही केवल पछता रहेगा न? पर ज्ञानीजन तो ऐसा नहीं सोचते ऐसा विचार कर ज्ञानी पुरुष तो सब सांसारिक मोह को ही त्याग दिया करते हैं, वे ही ज्ञानी या तत्वज्ञानी कहला सकते हैं। जिसे इस बात का भी ज्ञान नहीं वह तो ज्ञानी कहला नहीं सकता, जो भी ज्ञानी के पास जा कर ही सब तरह का जो भी कुछ जान सकता अवश्य लाभ उठायेगा पर स्वयं तो नहीं, अपने आप ही तो, जो भी ज्ञानी जन कह रहे हैं सो, इन बातों द्वारा निश्चय ही मन को इस ओर लगा कर लाभ प्राप्त कर सकता पर जब तक ही निश्चय होगा तब तक कुछ लाभ होगा सब सन्देहों को मिटा दो! भाई, सब मन देकर सुनो सुनो सुनो बात को सुनो सुनो! जो भी कहा गया न समझो कि यह यों ही कहा जा रहा; यह तो विशेष ज्ञान की बात ही सब को सुनायी जावेगी सो ही इस बात पर जो भी ध्यान लगायेगा उसका ही तो ही भला होगा सो ही इस प्रकार का ही फल; ही प्राप्त कर लेगा निश्चय सो ज्ञानीजन कहते "जो भी संशय मिटा कर मन से शांत होकर सुनेगा उसका संशय सब मिटेगा या जिसके पास कोई उपाय शंका मिटाने का होगा, सो ही निश्चय ही तो सब इस सांसारिकता से पार सांसारिक तो काम सब एक--प्रकार से मन--ही करता रहा न रहेगा; जब ही इसके पार मुक्ति पायेगा ज्ञान स्वरूप सदा काल ही सब सांसारिक बातों से अधिक उत्तम ज्ञान सर्वश्रेष्ठ स्वरूप रहा हमेशा सांसारिकता से सदा काल मन--मुक्त रहने पर ही कल्याण स्वरूप को प्राप्त कर सकता और जो इस प्रकार का मन बना लेवेगा सो ही सांसारिक बन्धन रहित हो कर, जो सिद्ध रूप निश्चय रूप प्राप्त कर लेगा, सो ज्ञानी पुरुष 33

चित्र में प्रयुक्त फ़ॉन्ट/एन्कोडिंग त्रुटि के कारण सभी देवनागरी वर्ण अपठनीय (चौकोर बॉक्स / Tofu '□') के रूप में दिखाई दे रहे हैं। केवल विराम चिह्न और पृष्ठ संख्या दृश्यमान हैं।

दृश्यमान चिह्नों और स्वरूप के अनुसार पंक्ति-वार (Line-by-line) विवरण:

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पाप और पुण्य का प्रमाण क्या प्रभु कृपा कहो मुझे, जिससे कि उसका फल समझ सकूँ? किस वस्तु पाप, किसे पुण्य कहा-गया है? किस कर्म से, किस कार्य कहलाता है? सर्वसाधारण जन, पाप का विचार संकोच से किया सब लोग उस मन-वचन और कर्म विचार से सब लोग सब को यह विचार सदा मन को शुभा और अशुभ कर्म की चिंता को सब समझकर सब का उद्धार कर सब ऐसा विचार सदाचार स्वभाव बना सकता है; यह विचार ही सब हृदय में आ जाय, जिससे कि सब का उद्धार सदा सब सके! सर्वसाधारण जन का मन विचार-योग्य? सर्वसाधारण विचार सब का सदा हो? सब का कल्याण सब सब लोग करें! विचार सबका ही सब उत्तम हो, इससे सब लोग सदा ही सब तरह सर्वदा ही सब तरह अपने आप को सब विचार सब सब प्रकार से सब को मन से शुभाशुभ कर्म का निर्णय कर सब लोग सब रहें। सब ही ऐसा सर्वसाधारण हो, इससे सबका सदा विचार ही सर्वदा ही कल्याण योग्य हो? सब इस मन-का विचार ही सब का विचार सब उत्तम हो सब सब कल्याण ही करें; सब को सदाचार उत्तम मिले; सब ही लोग जो विचार उत्तम विचार सदा सब का उद्धार सब लोग समझ कर, तन-मन सदा ही विचार उत्तम करें। सब तरह का सब विचार ही उत्तम रूप सब लोग सदा विचार जानकर ही कहें, जिससे कल्याण ही होवे, जो सब प्रकार से होवे, जो सदाचार सर्वसम्मत हो तन--मन सदा रहेगा? इसलिए सब लोग जो विचार सब लोग कहें, जो सब प्रकार से सदा सब लोग सब तरह सदा विचार का निर्णय ही सदा कहें सब उस ही सदाचार विचार को ही सदाचार सब ही विचार ही सब तन-मन सदा रहें। सब विचार सब सदाचार विचार ही सब उस तन-मन सब रहें, जिससे सर्वसाधारण स्वावलंबन का ही सब सदाचार विचार सदा ही सब लोग विचार ही सब सदाचार विचार सब अपने मन को समझ कर सदाचार सदा विचार करें, सदाचार सदा सब विचार सदा सदा ही विचार से विचार करें, जिससे कि सदा विचार रहे, सदाचार सब तन--का सब सदाचार स्वभाव ही सदा रहे ही सब को, सदाचार का विचार सब लोग सब सदा सब तरह से सदा सब को सब कहें, सदाचार सदा ही विचार सब विचार सदाचार स्वावलंबन सदाचार सब विचार सब को प्राप्त हो, सदा ऐसा करें। जो सर्वसाधारण सब विचार सब सब करें; सब विचार सब तरह कहें; सर्वसाधारण विचार स्वावलंबन का सब सब तरह विचार करें, जिससे स्वावलंबन, स्वावलंबन सदा, जिससे सबका सब ही उद्धार हो; जो विचार ही विचार सब लोग का स्वावलंबन विचार ही सब लोग सदा कहें जिससे विचार सब तरह सब सब तरह सब लोग जो विचार सब का विचार सदा ही करें। ऐसा विचार ही सब सदाचार का विचार समझना चाहिए, जो सब प्रकार सब विचार, सब तरह सब विचार, जो सदाचार का सब ही विचार हो स्वावलंबन ही सब को तन--का ही विचार हो, जो विचार सब लोग सदा सब सब करें, जिससे सदा उत्तम विचार सब का सदाचार विचार सदा ही हो सके सब तरह, जिससे सब विचार सदा ही, सदा ऐसा करें। ऐसा विचार ही, जो सब लोग सब विचार ही का विचार हो, सदाचार का ही विचार हो, सब प्रकार से ही सदाचार का विचार सदाचार का विचार हो, सब प्रकार से ही विचार ही सदाचार विचार समझें, जिससे कि जो विचार, वह सब स्वावलंबन विचार ही विचार सब को सदा विचार कर सब ही का स्वावलंबन सब तरह विचार ही का सब ही सदा ही सब सदाचार रहे। सर्वसाधारण सब विचार करें; तन-मन विचार ही विचार सब सर्वसाधारण सब स्वावलंबन विचार ही सब प्रकार सदा करें; सर्वसाधारण ही सदाचार तन--मन हो, सब ऐसा हो, सदाचार हो! जो ही सदाचार ही सब सदाचार-स्वावलंबन का सदा तन-मन हो; जो स्वावलंबन का सदा ही सब को सब ही विचार सब सब लोग करें जो सब सदाचार सदा ही सदाचार विचार ही सदा रहे; जिससे कि सदा सब लोग जो, सदा ही सदाचार स्वावलंबन सदा रहे, जो विचार सब सब लोग करें। जिससे स्वावलंबन सब सदा सदा प्रकार से ही स्वावलंबन सब ही सदा स्वावलंबन विचार सब लोग करें, सदाचार विचार सदा सदा ही सब को सदा विचार ही सदा विचार ही ही सब कहें, जिससे सदाचार विचार ही सदा 35

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कदाचित् जीव को परमात्मा रूप जल मिल जाता है। तब आत्मा रूप कमल खिल जाता है। जो प्रभु का ध्यान करे। महाराज ! जब भी कोई जीव सो जाता है, तब वह मन, बुद्धि रूप जो सूक्ष्म, वा स्थूल समस्त प्रपंच रहता है न तब आत्मा का न मन, न च बुद्धि, आत्मा को आनन्द रहा, न यह जग विस्मृत हो परमात्मा मिला, पर मुक्ति जीव को न मिली है, जब यह जाग--कर फिर विषय रस में चला गया है, वा तो मुक्ति जीव को, महाराज जी कहे, तब मिले जब वह इस शरीर, मन को त्याग कर--कर सदा ही समा गया हो मुक्ति पाया, सदा आनन्द में लव लीन रहा! वा जबी मन किसी का लय हुआ तब ही आनन्द है; सदा आनन्द तब ही विश्राम है; सदा ऐसा रूप हो कर रहे सो मुक्ति रूप ही समझ सो मुक्ति हां, जो मन की वृत्तियां सब लय होकर एकाग्र चित्त हो कर परमात्मा परमात्मा में मिलन करे तब ही परमात्मा रूप ज्ञान परमात्मा समाधि रूप सब रस रस परमात्मा रूप रस को प्राप्त परमात्मा स्वरूप हो जाता तब ही रस परमात्मा रूप रस को प्राप्त होकर सदा ही तृप्त, आनन्द रूप रस-मय रूप परमात्मा जैसा आप बन जाता है सो ही, मुक्ति परमात्मा परमात्मा रस-मय रूप परमात्मा स्वरूप रस में तृप्त हो कर सो, मुक्ति परमात्मा स्वरूप ही समा गया- समा ही, रस-मय रस में लय फिर जो सदा आत्मा रूप ही स्वरूप को जान कर सो तो ही समाया कभी बाहर तो न गया सब परमात्मा ही स्वरूप है--सब जन ऐसा ही समझे सदा ही सदा आत्मा ही परमात्मा ही रहा; सो सदा ही सदा ही सदा ही मुक्ति स्वरूप सदा रूप परमात्मा का परमात्मा रूप ही ज्ञान रस परमात्मा रूप रस को प्राप्त रहा; परमात्मा रूप सदा आनन्द तृप्त हो कर आत्मा परमात्मा समाधि सदा चित्त ही रस-अमृत परमात्मा सदा, परमात्मा तृप्त लय रस रस जन, सब सब आत्मा रूप सदा समाया रहा, सब परमात्मा रूप रस समाया रस रूप रस स्वरूप ही सदा तृप्त हो कर सदा ही सदा सदा ही समाया मुक्ति सदा तृप्त रहा; प्रभु रूप को मन से तृप्त सब रूप में, सब मुक्ति ही ही ही जो सदा रूप जन, सो सदा तृप्त हो कर परमात्मा रस प्राप्त संसार के मोह से छूट कर आत्मा का ध्यान ही सब से बड़ा योग कर्म, व तपस्या रूप ही सब जान सब कर्मों से उत्तम कर्म ही सब कर्म रूप से, प्रभु स्वरूप जान कर ही, ज्ञान योग स्वरूप ही सो सदा ही ही सब कर्म सब ही सत्य ही ही सत्य--है! सब ही मुक्ति का रस मुक्ति रूप, सदा सब सत्य ही सत्य परमात्मा सब रस सत्य, सत्य ही सब सो--सब रस सत्य है; परमात्मा ज्ञान ही स्वरूप सत्य है... व मन सब का सब रस से छूट कर केवल, सो ही सत्य ही परमात्मा रूप जान सदा ही परमात्मा रूप ही ही सदा रहता ही रस है, सब प्रभु ही रस रूप सत्य रूप सब ही सो स्वरूप ही सब सब सब ही मुक्ति रूप ही, सब परमात्मा ही सत्य ही ही सब ही परमात्मा ही सब सब व स्वरूप, जो जन सब स्वरूप परमात्मा ही जान सब मुक्ता ही परमात्मा सत्य--ही सब स्वरूप ही स्वरूप सब संसार के समस्त विकारों को, त्यागकर सदा ही प्रभु परमात्मा परमात्मा सदा जो परमात्मा परमात्मा ही बन रहा, सदा आनन्द परमात्मा ही स्वरूप ही सदा प्रभु ही परमात्मा स्वरूप ही सब जग सदा स्वरूप, मुक्ति सदा ही सब ही ही सदा ही, सब सदा ही परमात्मा सदा मुक्ति स्वरूप सदा सब सदा ही, सब सदा तृप्त स्वरूप ही तृप्त-तृप्त ही सदा ही परमात्मा तृप्त सदा तृप्त प्रभु ही तृप्त-तृप्त ही रस तृप्त रस--परमात्मा तृप्त-परमात्मा सदा ही--ही तृप्त-परमात्मा तृप्त सब सब तृप्त तृप्त स्वरूप सब परमात्मा ही सब परमात्मा ही सदा रहा सो ही परमात्मा स्वरूप सब रहा, सदा ही सब सब सब व परमात्मा "तृप्त-तृप्त ही सदा तृप्त-रस ही रस सब ही सब सदा स्वरूप ही स्वरूप सदा तृप्त स्वरूप ही परमात्मा ही सदा तृप्त सदा तृप्त ही"-- सब रस सदा तृप्त सब परमात्मा स्वरूप सब ही सब परमात्मा सदा रूप तृप्त ही सब ही सदा परमात्मा रूप ही सदा तृप्त ही सदा ही; सो सब जग रस ही तृप्त ही सदा ही ही ही स्वरूप परमात्मा ही सदा सब ही सो सदा सब सदा स्वरूप ही तृप्त ही सब सब ही परमात्मा स्वरूप ही, 40

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कथा का प्रवाह किसी ओर बह रहा था। स्वामी जी जब कथा कह रहे थे तब सब लोग स्तब्ध थे, केवल उनके मुख मण्डल तथा उनकी उस प्रतिभा को निहारते जा सकते थे। उसके पश्चात जब व्यास गद्दी किसी दूसरे महात्मा को सौंपी गयी तो सब लोग उठ कर कथा मण्डप से दूर परस्पर गप लड़ाने लगे। प्रद्युम्नसिंह जनसमूहके साथ आगे बढ़ा। आगे जाकर वह एक साधु महाराज के पास बैठा; और उनके चरण दबाने लगा। कुछ देर के पश्चात साधु महाराज को कुछ चेतना आयी; फिर वह आंखें खोल कर, इधर उधर देखकर कुछ चकित हुआ, आश्चर्य प्रकट करता हुआ साधु क्या कहने लगा? प्रद्युम्नसिंह को देखकर साधु कहने लगा कि बेटा! तुम कौन हो। किसी को खोजते हो क्या--प्रद्युम्नसिंह ने कहा स्वामी जी आप अन्तर्यामी हैं। सब कुछ जानते हैं फिर मुझ जैसे पापी से पूछने की क्या आवश्यकता है। आप यह बतलायें कि हम जो कुछ करते हैं, उसका परिणाम तो हमें न कभी न कभी भुगतना ही पड़ेगा। साधु कहने लगे अवश्य ही कर्म-फल भोगना ही पड़ता है। कर्म सिद्धान्त का चक्र; फिर कौन सी ऐसी बात समझना चाहते हो। प्रद्युम्न ने हाथ जोड़कर कहा कि यह तो बतलाओ कि मनुष्य अपने कर्मों का फल कब तक और किस प्रकार से भोगता है। साधु महाराज ने कहा-- "कर्मों का फल कर्म-फल के रूप में, जो रूप धारण करता है अवश्य होगा" इतना सुनते ही प्रद्युम्न सिंह के मुख से पश्चाताप की एक लहर सी उठी। कि इस संसार चक्र में इस कर्म के बन्धन से कौन छूट सकता है? उसने कहा साधु जी महाराज ! यह बात किसी प्रकार से मिट नहीं सकती क्या? यदि ऐसा नहीं; फिर उपाय क्या है? प्रद्युम्न ने अपने उस पाप को याद करके एक आह भरी और कहने लगा, क्या उपाय? उस समय साधु ने कहा कि अरे भाई! तू तो सब कुछ जान कर भी अनजान सा क्यों बनता है! जब तक ईश्वर की शरण में नहीं जाओगे तब तक छुटकारा मिल पाना असम्भव है। "कर्म-फल से त्राण भगवत्-कृपा से मिल गया तो, तुम बच जाओगे अन्यथा तो भुगतना होगा" प्रद्युम्न को फिर कुछ शान्ति मिली। जब वह स्वामी जी महाराज के पास से जाने लगा तब, एक आवाज सुनायी दी, एक व्यक्ति कहता चला, जा रहा था कि कन्हैया तुम्हारे कारण, सब लोग अपना काम छोड़ कर आ गये। हमारा काम बिगड़ गया; नुकसान बहुत हुआ। उस समय कन्हैया चुप था। वह केवल इतना ही बोला कि! नुकसान सचमुच हुआ होगा पर हम सब का सहारा तो भगवान ही हैं न? कन्हैया ने कहा सच कहना तो, सब बिगड़ जाता! "कन्हैया ने सच ही कहा था।" उस समय प्रद्युम्न सिंह सोच रहा था कि कन्हैया ठीक कहता है, हर बात सच ही होनी चाहिए, सच को कोई कैसे छुपा सकता है। साधु महाराज सच कह रहे थे। सच से बचा तो जा सकता है, पर झूठ से नहीं। प्रद्युम्न ने विचार किया कि उसने जीवन में क्या सच कहा? किया या सुना? प्रद्युम्न सिंह सोच रहा था कि? जो अत्याचार किया उसका परिणाम कितना भुगतना पड़ेगा? उसे अब समझ आ रहा था कि पाप का परिणाम सच से अधिक भयंकर होता है, पाप कभी छिपता नहीं केवल पाप से छुटकारा पा लेना ही श्रेयस्कर है, प्रद्युम्न को अपनी भूल दिखाई पड़ने लगी थी। प्रद्युम्न का पश्चाताप और गहरा होने लगा। प्रद्युम्न का शरीर, लरजने लगा। वह कांपने लगा; प्रद्युम्न सिंह एक ओर जाकर बैठ गया। रात को जब सब सो गये तो प्रद्युम्न ने स्वयं को असहाय सा अनुभव किया; प्रद्युम्न अपनी अकर्मण्यता पर रोने लगा, कि भगवान् अब; प्रद्युम्न अपने पापों के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था। उसके पश्चाताप के आंसू निकल रहे थे। वह रात भर सो न सका। वह स्वयं को बहुत ही नीच; पापी और कुकर्मी समझता हुआ रात भर तड़पता रहा; प्रद्युम्न ने सोचा कि ईश्वर की शरण में जाने के लिए अब देर न करनी चाहिए, प्रातः काल प्रद्युम्न सिंह ने सोचा कि प्रद्युम्न को अब कर्म--फल भोगना ही होगा, ईश्वर दयालु और समर्थ हैं। प्रद्युम्न के मन में अब ईश्वर के प्रति श्रद्धा जागने लगी। वह उठकर बैठ गया और भगवान के चरणों में ध्यान लगाने लगा। इस प्रकार वह ईश्वर के नाम का जप करते हुए, प्रद्युम्न सिंह ने निश्चय किया कि अब सब कुछ ईश्वर के ऊपर छोड़ देना चाहिए; ईश्वर बड़ा दयालु, कृपालु और सर्वव्यापी है। प्रद्युम्न ने अपने मन को ईश्वर के प्रति एकाग्र किया। 45

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होगा? सुनो, इस आत्मकथा लेखक लोग का इतिहास भी तो समझो। कभी-कभी तो

होगा? सुनो, इस आत्मकथा लेखक लोग का इतिहास भी तो समझो। कभी-कभी तो ऐसा स्वर सुनाई पड़ेगा जिसके हर एक शब्द को सुन कर पाठक भय विह्वल हो उठेगा या ऐसा स्वर सुनाई पड़ेगा कि वह, रोने लग जाय। सहानुभूति का भाव तो जागना ही चाहिये हृदय से। सुनो देखो, प्रत्येक आत्मकथा लेखक अपने सुख का वर्णन जितनी प्रसन्नता पूर्वक करता है सम्भवतः दुःख का उल्लेख वह उतनी प्रसन्नता से न कर सके। यदि दुःख का उल्लेख वह कर भी देवे, उस अवस्था को वह दुःख न समझेगा या समझेगा भी! तात्पर्य यह प्रत्येक आत्मकथा में? लेखक ने तो अपने सुख को सब सुखों से बढ़कर माना ही, दुःख को, प्रत्येक दुःख को एक प्रकार का सुख ही मान कर चला, लेखक तो यह सदैव चाहेगा प्रत्येक दशा में कि वह, चाहे या न चाहे लोग उसकी प्रशंसा ही करें और उसका रोब मान कर चलें सब लोग अथवा संसार; लेखक तो यह कभी चाहेगा ही न कि कोई उसकी पोल खोले या कोई उसके छिद्रों की खोज करता फिरे या कोई उस पर छींटा कसे; वह सब से तो यही चाहेगा! पाठकगण, आत्मकथा तो हर कोई लिख लेता होगा पर सच तो यह लिखना प्रत्येक जन के वश की बात नहीं हो सकती। सच और झूठ, इन दोनों पक्षों को, चाहे वह जन कितना बड़ा क्यों न हो लेखक, यह लिखना आत्मकथा के हर लेखक प्रत्येक आत्मकथा रूपी ग्रन्थ में कभी नहीं सम्भव कर सकेगा आत्मकथा क्या सचमुच लिखा गया! क्या आत्मविश्वास प्रत्येक जन लिख सका है या सच मान कर अपने को त्याग कर सकेगा या त्याग सकेगा भी तो वह जन जो सब कुछ त्याग चुका अथवा जिसने अ--कथ्य व्यथा को जन--जन-तक भेजा हो, जिसने अपना सब कुछ दे कर सोचा भी कुछ हो, तो पाठक गण! आत्मकथा लिखना हर जन का काम अथवा विचार वश का काम नहीं हो सकता और सम्भव भी नहीं, सुनो, सुनो, कभी--तो हर एक जन आत्मकथा को, स्वयं आत्मकथा मान प्रत्येक प्रत्येक जन के भावों को तो क्या हर जन प्रत्येक सम्भावना के आधार पर भी नहीं लिख पा रहा होगा या तो केवल उस बात जिसके आधार पर, वह स्वयं चलता ही अथवा उसने सब पर उस बात अथवा उस भाव को लादना चाहा होगा। और यह भी तो सच, कि जब--तो जन आत्मकथा के नाम पर भी अपने आप को नहीं समझ पाता होगा, वह तो स्वयं एक जन के आगे आत्म--कथा कहने का भी साहस नहीं कर पाता होगा या समझा सकेगा! इस का भी रहस्य छिपा रहा न हो। जब भी जन अपने को आदरणीय समझ बैठा अथवा किसी को बना बैठा हो तो समझ लीजिये सब, प्रत्येक बात सत्य मान कर चला जा रहा होगा न? आत्मकथा पढ़ना सहज जन सम्भव पर उस जन द्वारा लिखा हुआ प्रत्येक जन के लिये आदरणीय होना कठिन जान पड़ा प्रत्येक जन अपने रूप आकार को समझ कर प्रत्येक ही जन से आदरणीय हो अथवा ऐसा भाव प्रत्येक जन के मन उपजा करे या ऐसा समझ प्रत्येक ही जन करे। प्रत्येक ही समय सब अपने सुख साधन रूप में देखना चाहे आत्मकथा को तो आत्मकथा न कह कर जन को आत्मकहानी कहना उचित होगा। स्वयं का आत्मकथा या प्रत्येक का जन कहा जा सकता है। आत्मकथा का रूप तो सुनो, इस आत्मकथा को भी समझ कर ही प्रत्येक को समझना चाहिये कि यह रूप ऐसा सब विचार प्रत्येक आधार को ले कर बन सका हो अथवा न बन सका पाठक समझता समझे चाहे जन उस बात को समझे आत्मकथा-सम्बन्धी रूपान्तर हो तो सब जन न केवल--तो आत्मकथा रूप को समझेगा ही, पर आत्मकथा ग्रन्थ को भी जन समझेगा; आत्मकथा प्रत्येक जन समझे न समझे; प्रत्येक आत्मकथा ग्रन्थ एक कथा--कहानी न हो सकेगा" "कथा-कथन के नाम जन-जन के मन का भ्रम दूर करना प्रथम तो प्रत्येक ग्रन्थ लेखक का कर्तव्य या आधार होना चाहिये ग्रन्थ द्वारा" "प्रत्येक, हर दशा में इस रहस्य जन को; हर प्रत्येक बात को समझ ले, ऐसा सोचे" यह सोच कर कह कर जन रूप का मन सब प्रकार शांत समझ कर बोला पाठक। जन बोला सुनो, जो बात कहना है, आत्मकथा रूप सुनो; प्रत्येक को सुख तो मिल ही रहा सब कुछ पढ़ने पर क्या केवल सच ही जान, प्रत्येक को तो केवल असत्य ही मिलेगा 48

जब जीवन का रस उडे, प्रार्थना का संस्पर्श पाकर तब समझो कि, प्रभु कृपा तुम्हारे ऊपर केवल प्रार्थना सुनकर हम रस मग्न अथवा विह्वल नहीं होते, प्रार्थना गाकर मस्त होना, यह भक्ति नहीं, केवल भक्ति का यह आभास भर स्वर ताल युक्त संगीत-रचना श्रवण का उल्लास मात्र, गायन कला मात्र का रसपान मात्र कहा जावे तो बहुत ठीक रहेगा, भक्ति तो वह लय; केवल भक्ति स्वरूप रस, शब्द का स्पर्श, संगीत रचना लय रूप रस का पान कराती रहकर उस अनंत सत्ता का स्मरण कराती है, वह स्मरण क्षणिक अथवा दीर्घकालीन रहकर विलीन हो जाने वाला नहीं रस, न विकार रह, न भय युक्त विचारशीलता हो, राग- द्वेष, काम-क्रोध का रस सब वासना तिरोहित हो कर केवल एक अपनी मूल सत्ता तथा अस्तित्व का न हो कर विराट् चेतना केवल... ॥ वह रस विह्वल रूप ही भक्ति का सच्चा प्रभाव कहा जावे केवल प्रार्थना का पाठ मात्र, केवल मंदिर निर्माण ही बहुत उत्तम स्थल कहा गया मगर उस रूप तथा क्रिया का-अभ्यास मात्र करके ही सब-कुछ समझ बैठना तथा सोचना मात्र है इस भाव युक्त प्रार्थना का प्रभाव आंतरिक रूप से जीवन सुधार तथा रूप तथा सत्य जीवन तथा प्रत्येक समाज के सभी प्रकार हित, उन्नति संबधी बात; इस आंतरिक प्रभाव प्रभाव से जीवन सुधरता है, केवल विचार सम्बंधी सुधार प्रत्येक समय सब के रस का आधार बनकर जीवन को हर दम रूप देता है; विचार प्रभाव से मानव जीवन सब प्रकार सुखी तथा समृद्ध, जीवन सुखद आधार बन कर सुख का न रूप बनता; प्रत्येक समय रस आंतरिक रूप विचारधारा से प्रवाह बन कर बहे, जीवन सत्य का रस पाकर अपने जीवन का प्रभाव भी हर आंतरिक प्रभाव को सब का सब सुख प्रदान कर सकता तथा स्वयं सम्पूर्ण रूप से उस रस से विह्वल हो कर उस सत्ता का दर्शन करता रहता जीवन का स्वभाव बन ही जाता केवल स्वरूप समझ कर.प्राकृतिक अनुकूलता के इन सभी विचारशीलताओं द्वारा प्रार्थना चिंतन द्वारा विचार शक्ति प्रत्येक सम्बन्धी स्वभाव प्राकृतिक सब प्रभाव का रस पा सके, यही विचार व प्रेरणा मानव को सर्वव्यापक उस परमात्मा के सत्य मार्ग अथवा रूपी दिशा में? प्राकृतिक सुख अथवा न केवल उस प्रभु परमात्मा के सत्य मार्ग अथवा दिशा अथवा केवल एक-विचार से सब का रूप ही बना है, इस दिशा धारा का प्रभाव सब प्राकृतिक ही तो है तथा प्रत्येक अवस्था के हर रस का हर दम भाव बना रहता है सब संसार की हलचल केवल मन के ही प्रभाव का सहारा पा कर चलती है, प्रत्येक मन विचारशील कार्यशील बना हुआ इस मन को सब प्रकार से शक्ति प्रदान कर इस का संचालन ही करता हुआ चला है, प्रत्येक रूप विचारशीलता कार्यशीलता प्रभावशील ही रूप प्रदान करता केवल भाव अनुसार ही मानव का हर दम हर आंतरिक कार्यशीलता का रूप बनता ही रहा, प्रभाव कार्यशीलता तथा विचारशीलता केवल एक प्रभाव मात्र का साधन बन कर सब को इस बात की प्रेरणा देता "भगवान्, जो कुछ भी मन अथवा चित्त कह रहा है; वह केवल अपने ही मन की प्रेरणा स्वरूप" "सत्य स्वरूप, प्रत्येक रूपी भावना का आचरण केवल प्रत्येक समय केवल अपने भाव का प्रभाव मात्र कहलाया" इसके स्वरूप का प्रभाव सम्बंध सब प्रकार से जीवन तथा व संसार समस्त भाव तथा कार्यशीलता विचारशीलता का प्रभाव ही तो है, जो सब परमात्मा सत्य निराकार स्वरूप का साधन बन सकता ही नहीं, केवल उस प्रभाव का स्वरूप ही विचार का साधन बन कर प्रत्येक प्रकार की वासना रूप मन का, सब का स्वरूप बना रहा अवश्य है, मगर प्रभु सत्ता का न कभी भी सत्य दिशा-निर्देशन विचार रहा! जो कि मानव को हर दम सुख सम्बंध प्रदान करता रहे; वह केवल न जाने क्यों मन-प्रवाह से सब कुछ सोचता रहा! केवल भाव अनुसार रस स्वरूप बन सका; प्रभाव का अवलोकन सब प्रकार किया भी, मानव उस प्रभाव तथा समस्त दिशा से हर दम रस का लाभ उठाता रहा, यह सब विचार ही; हर मानव केवल रस धारा के काम-क्रोध तथा लोभ युक्त होकर, कार्यशील, हर दम ही रहा! "प्रभु प्रत्येक प्रभाव रूपी दिशा का विस्तार केवल प्रत्येक समय केवल मानव मात्र, दिशा धारा कहलाया" "हर भाव सत्य, हर दम सत्य दिशा कहा? सदा आधार ही सत्य सब तन-मन का?" 49

जब यह बात संसार जान गया कि राम जैसा धर्मात्मा भी विपत्ति को न्योता दिए बिना रहता, विपत्ति पड़ी, विपत्ति भोगने विवश हुए; तब सामान्य मानव का क्या कहना जिनके पग-पग प्रमाद भरा जीवन ही अपराध बनता रहता गया जिसके कारण पग-पग वे प्राकृतिक दंड के रूप तीन प्रकार अर्थात् आधिभौतिक और आधिदैविक व आध्यात्मिक नाम से जाने जाते कष्टों को भोगते चले आ रहे भी भोगते चले जाते न हों; उनका कोई ऐसा उपाय तो हो न हो, पर संतोष न कर "जो कुछ होगा, सो सब देखा जायगा न? पहले से सोचकर क्यों अपने सुख को छी-छीन करें?" देखा तो सब कुछ जायगा ही फिर ऐसा क्यों? पहले से सचेत हो छी-छन को, दुःख- दारिद्रय को रोका न जाय? असम्भव बात तो थी नहीं किन्तु मानव समाज ने इस दिशा पग ही न उठाये किन्तु-परन्तु का खेल खेलते रहकर समय बिताता रहा कि एक अध्यात्मवादी, धर्म रक्षक, जो अध्यात्मवाद को ही सत्य, केवल सत्य मानता था समझा, जो अध्यात्म का उद्गाता जिसने देखा कि राम तक विपत्ति भोगने विवश हुए तब उनका अध्यात्म कैसा जो इस प्रकार के राम को दुःख दिया न टले? "कैसा अध्यात्म जो अपने परम भक्त को विपत्ति से बचा न सके? सो केवल मन बहलाव बनकर रह गया जीवन का साधन नहीं" जिसने केवल विचार तक नहीं दिया कि इस विपत्ति को मिटाने वैज्ञानिक विज्ञान का सहारा ले दुःख दारिद्रय मिटा सुख साधन को क्यों जुटाएं? जिसने वैज्ञानिक की खोज द्वारा सुख का साधन जुटा भी दिया पर वह केवल शारीरिक सुख बनकर रह गया पर भीतर मन तो तब तक केवल अशान्त ही भटकता रहा; सुख साधन भी मानव को सुख नहीं देकर केवल अशान्ति देकर सुख छीन ही तो रहे थे। तब विज्ञान के आधार पर केवल सुख भोग ही तो हो सकता था पर भीतर का सन्तोष नहीं; तो विज्ञान द्वारा सुख साधन पा कर सब सुखी हो सकते यह असम्भव ही बना रहा। साथ ही यह विज्ञान ऐसा बन बैठा कि केवल धन से धन द्वारा खरीदा जा सकता था। जिसके पास धन न था उसके लिए! तो वैज्ञानिक खोज का मानव को क्या सुख मिला जो साधन सब खरीद सकने असमर्थ ही बना रहा अध्यात्म से शांति न मिली; केवल जप, पूजन मात्र से शांति हो भी सकती थी, केवल मन का वहम मात्र फिर विज्ञान का सहारा खोजा गया क्या वह सुख दे सका? जो भी था वह बाहर तक सिमट कर रह गया। भीतर की अशान्ति को मिटाने विज्ञान के पास कोई उपाय न था। मानव सुखी अध्यात्म से रह नहीं सकता था; फिर धीरे-धीरे विज्ञान का सहारा बढ़ तो चला, लेकिन अध्यात्म को छोड़ना पड़ा नहीं; सो अध्यात्म का आडम्बर, पाखण्ड तो बढ़ता ही चला गया किन्तु उस आडम्बर को भी सुख न--देना ही सम्भव बना मानव को विज्ञान धीरे-धीरे पग, अध्यात्म धीरे-धीरे ढहता गया, पर परिणाम दोनों का सन्तोष जनक न निकल कर और अशान्तिकारक सिद्ध हुआ; जिसे केवल तन तक सुख मिला; केवल भोगों ने घेरा; पर मन फिर भी अतृप्त ही रहा। इस प्रकार अशान्त मानव ने विज्ञान को सुख साधन माना जरूर, पर सन्तोष नहीं पाया! तब विज्ञान की खोज बेकार सिद्ध होने लगी, जिसे अध्यात्म ही! तो भी नहीं भुला सका क्योंकि वह भी केवल बाहर तक सोच कर ही रह गया था। "सो दोनों ही बेकार सिद्ध हो गए ऐसा ही कहा जाय" तब एक बात यह विचार विचार कर भीतर सोच समझ कर उठी; केवल भोगी जीवन ही सब कुछ नहीं कहलाता बल्कि एक संयम भरा जीवन, जिसमें हर क्रिया अध्यात्म को समेट कर ही हो सकी थी, न कि केवल बाहर भटक कर सब कुछ पाया जायगा? "आध-आध या कहें दस-दस पर शत का जो मेल बना उसी ने समाज रचना आरम्भ कर समाज को सही दिशा प्रदान की होगी" क्या यह अध्यात्म इस समय चल सकता था जब सब कुछ लूट रहा था, सब मिटा जा रहा था? तब ऐसा विश्वास केवल विचार से नहीं हो सकता था जिसके लिए किसी समाज रचना की खोज के बिना जीवन अधूरा रहता था और उस वैज्ञानिक आधार आध्यात्मिक धीरे-धीरे रूप से समझना ही उस समय सम्भव समझा? जिसे हर युग का सच कहा जाय। केवल विज्ञान उस तक नहीं पहुंच सका था; तब केवल अध्यात्म बिना विज्ञान सत्य के नहीं पा सकता; तब सब अध्यात्म खोज वैज्ञानिक 50

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□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□-□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □ □□□; □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□, □ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□□ □□--□□, □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□, □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□; □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □ □□□□ □□□ "□□□□□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□ □□; □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□□□ □□□□□" □□ □□ □□□ □□ □ □□□□ □□; □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□□ □□□ □□, □□□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □ □□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□! □□□□ □□□□□□□ □□□□, □□□□□□ □□ □□□□ □□□□? □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□? □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□□□□□□ □□□□□? □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□? □□□ □□□□□ □□ □□□□? □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□? □□□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□; □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□, □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□, □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□; □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□-□□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□, □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□? □ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□! □ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□! □□□ □□□□ □□, □□□□ □□□□ □□□ □ □□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□, □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□! □□□ □□□□□, □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□, □□ □□□□ □□, □□ □□□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□, □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□-□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□, □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□; □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□□□, □□□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□, □□□□□□□□ □□□□? □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□ □ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□, □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□! □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□-□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□; □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□--□□□ □□□□□, □□□ □□□, □□□ □□□□□, □□□ □□□□□--□□□□□ □□ □□□□ □□□□-□□□□ □□, □□□□□ □□□□ □□--□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□, □□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□-□□□ □□□□ □□□ □□□□□, □□□□ □□ □□□□□, □□□□ □□□ □□ □□□□□--□□□□□ □□□□ □□□ □□□□-□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□--□□□□ □□□□□, □□□□ □□□□□ □□□; □□□□□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□-□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□, □□□□□□□ □□□□□ □□; □□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□-□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□? □□□□ □□□□□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□, □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□! □□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□-□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ 52