एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
उनका मन्तव्य थाकि नित्य नाम, नित्य रूप और नित्य धाम का दर्शन भगवान् की कृपा से नित्य भक्त पाता रहता। नित्य पद का केवल यह मतलब ही नहीं कि भगवद् धाम नित्य यद्यपि वह भी। नित्य रूपका नाम का नित्य अनुभव हो? नित्य भक्त किसको कहेंगे? "जो नित्य स्वरूप का चि-द्विलासमय दर्शन करे।" यह निष्ठा सिद्ध हुई-- केवल नामका स्मरण किया नित्य स्वरूप साक्षात्कार। स्वामी कहते हैं, "इस साक्षात्कार का ही परिणाम हुआ" जब श्री हरिदास जी नित्य नाम का उच्चारण या कीर्त्तन करते हैं, कीर्त्तन के रस रूप स्वरूपका दर्शन उनको नित्य स्वरूप लीला विलास विभूति सहित सदा होता है, यह केवल यह न हुआ, नाम लिया रूप दिखा दिया केवल सो नहीं था पर रूप दर्शन नित्य रस रूप नाम रस, स्वरूप रस रूप, यह उनका भाव था। साक्षात्कार का एक फल भगवान् लीला का प्रत्यक्ष दर्शन सदा रहता है। साक्षात्कार का अभिप्राय केवल देखना ही, उस रस का रसास्वादन होता ही रहता है। रस का रस स्वरूप साक्षात्कार भगवान् का स्वरूपानुभव ही वास्तविक स्वरूप दर्शन या भगवान् का स्वरूप ही माना गया रस स्वरूप दर्शन के स्वरूप। उस नाम रूप व स्वरूप प्रत्यक्ष स्वरूप का दर्शन नित्य हुआ, उस रस स्वरूप दर्शन का यह परिणाम था कि इस, रस रूप लीला विलास दर्शन हुआ, नित्य रस रूप नित्य स्वरूप दर्शन से लीला विलासका ज्ञान या रूप सदा उनके सम्मुख रहता परमानन्द रस स्वरूपका ज्ञान हो इस बात से सदा के रस रूप रसिकता रस का व रस स्वरूप लीला के रस आस्वादन रस में लीन रसिकता से युक्त, रसिकता रस का रूप सदा बना, नित्य स्वरूप, नित्य स्वरूप लीला नित्य व इस रसस्वरूप लीला नित्य व स्वरूप का रस में एकाग्र रस ही रस लीन नित्य रसस्वरूप लीला में, जब व जहा, रस स्वरूप रसमय व रस, उस रसका सदा ध्यान रूप रस स्वरूप नित्य स्वरूप रस का ही रस नित्य रस--इस रूप में नित्य रस--इस रूप रसस्वरूप नित्य रस, स्वरूप रूप रसिक स्वरूप रसिकता का स्वरूप रस स्वरूप ही, इस रसिकता रूप में रस रूप नाम साक्षात्कार स्वरूप में, नित्य नाम स्वरूप रस ध्यान रस में रस रूप नाम लीला रस रूप रस के स्वरूप में रस स्वरूप, इस रस स्वरूप रस का नित्य स्वरूप रस रूप ज्ञान में, नित्य नाम स्वरूप स्वरूप रस में स्वरूप का रस स्वरूप में, सदा ही रस का रस रूप रूप का रस! सदा ही स्वरूप रस रूप, उस नित्य स्वरूप रस! रस स्वरूप रूप का स्वरूप! रस साक्षात्कार का रस रूप स्वरूप! इस बात को रस रूप नित्य रस स्वरूप प्रत्यक्ष साक्षात्कार स्वरूप में, रस की रूप ध्यान में ही सदा रहा। नित्य स्वरूपका रस नित्य साक्षात्कार रूप में, रसिकता नित्य रूप से रस साक्षात्कार स्वरूप प्रत्यक्ष नित्य रूप में नित्य स्वरूप रस साक्षात्कार स्वरूप, साक्षात्कार रूप, रसिकता स्वरूप का रूप रस ज्ञान स्वरूप उस साक्षात्कार का स्वरूप सदा स्वरूप से साक्षात्कार स्वरूप रस में, सदा नित्य साक्षात्कार रस स्वरूप रूप रस में, रसिकता साक्षात्कार स्वरूप का ज्ञान रस रूप, रस रस स्वरूप रस रस सदा स्वरूप का ही नित्य साक्षात्कार सदा स्वरूप, रसिकता का रस ही रूप से स्वरूप का ही रूप सदा ही ही सदा ही स्वरूप रस में, सदा ही उस नित्य रूप नित्य स्वरूप, उस ही स्वरूप स्वरूप, उस स्वरूप के स्वरूप। रसिकता स्वरूपका रूप स्वरूप में, रसिकता स्वरूपका रूप स्वरूप सदा नित्य रस साक्षात्कार स्वरूप नित्य रस साक्षात्कार का रस साक्षात्कार स्वरूप स्वरूप सदा रस साक्षात्कार से रस साक्षात्कार रस साक्षात्कार साक्षात्कार रस साक्षात्कार रस साक्षात्कार साक्षात्कार साक्षात्कार सदा ही सदा सदा ही साक्षात्कार के रस रूप साक्षात्कार रस साक्षात्कार रूप से साक्षात्कार सदा ही रस रस साक्षात्कार साक्षात्कार सदा रस रस सदा ही स्वरूप रस रस रस स्वरूप रस रूप नित्य के रस रूप के रस स्वरूप रूप रस में, स्वरूप रस स्वरूप के रसिकता रूप नित्य व स्वरूप, व स्वरूप, व स्वरूप, स्वरूप, रस के नित्य स्वरूप नित्य स्वरूप में, रस ही रस नित्य स्वरूप से स्वरूप व स्वरूप। इस सब रूप का रस प्रत्यक्ष स्वरूप ही रहा, उस रस रूप नित्य ही रस साक्षात्कार सदा ही सदा रस साक्षात्कार सदा रहा। 32
समस्त विषय वासना, कामिनी कांचन सम्बन्धी वासना मनमें भरी हुईहै, हृदय भगवानके प्रेमसे शुन्य है, विमल निष्काम प्रेमरूपामृतकी बूंदका स्वाद तो आजतक कभी हम पाही नहीं सके सांसारिक भोगों रूपी मद्यको पीकर सदा मतवाले बने हुवे भोगों भोगते हुए चौबीसों घण्टोंमेंसे एक मिनटके लियेभी भगवान्का स्मरण नहीं; सब सुख और सामग्री ईश्वरने देकर दया का प्रकाश हमारे ऊपर किया, पर कृतघ्न होकर हम उसका स्मरण नहीं करते वरन दूसरोंको कष्ट पहुंचाते, ईश्वरके नियमका उल्लङ्घन कर दिन-रात पाप सञ्चय करते हैं। यह कौन कहसकेगा, कदाचित् कहसकेगा, कि परमात्मा दयालु नहीं है। ईश्वरपर दोषारोपण क्यों कियाजाय? जबतक कि सम्पूर्ण काम, कामना विषयों का त्याग नहोजावे, तब तक न तोपरमेश्वरका निष्काम सच्चा प्रेमही इस चित्तमें आवेगा, औरन दर्शन होसकतेहैं, केवल बातोंसे परमात्मा नहीं मिलसकते। इस विषयमें यह निश्चय समझना चाहिये कि जबतक इस मनमें विषय वासना रूपी कामरूपी-शत्रुहै, तबतक परमेश्वरका वास मनमें नहीं होसकेगा, यह बातभी हैकि जहां अन्धकार रहता है वहां प्रकाश कभी टिकनहीं सक्ता और जहां प्रकाश होताहै वहां अन्धकार टिकनहीं सक्ता। इस विषयमें किसी महात्माने बहुत सुन्दर दृष्टान्त दियाहै कि जबतक राजा सिंहासन पर बैठाहै औरमहाराजके सामने दासदासियां सब हाथबांधे हुवे खड़ेहैं राजा सिंहासन छोड़कर जब महलमें चलाजाता है तब सब दास दासी मनमानी चेष्टा करनेलगेहैं और राजाके सिंहासनपर भी बैठ जातेहैं परन्तु ज्योंही राजा, फिर महलमें से निकलकर आताहै राजाको आते देखकर सब दास दासियां हाथबांधे अपने २स्थानोंपर नम्र होकर खड़े होजातेहैं औरसिंहासनको खाली छोड़देतेहैं इसी प्रकार जबतक इस मन रूपी सिंहासनपर काम, क्रोधादि विकारों का राज्य रहताहै तबतक ईश्वर रूपी राजाका पदार्पण इस मनरूपी मन्दिरमें नहीं होता औरजब यह विकार दूर होजातेहैं, अन्तःकरण शुद्ध होकर ईश्वरकी झांकी इस मनरूपी मन्दिरमें होने लगती है; फिरतो काम क्रोधादि, न जाने कहां भागजातेहैं, और चित्त शान्त... हो जाताहै इसलिये कामरूपी विकारको सब पापों की मूल जड़ समझकर इस को मार भगावे--जिससे मनमें शान्ति मिले औरपरमात्मा के प्रेम रूपामृतका रस मिले औरपरमात्मा की प्राप्ति होकरसदाके लियेआनन्द प्राप्त होसके। सब सन्तों का यही उपदेशहै कि जबतक वासनाको नहीं छोड़ेगा तब तक कुछ नहींहोगा, केवल बकवाद करनेसे कुछ काम नहींहोता मनके फेरनेसेही सब बात बनसकतीहैं। वासना किसको कहते हैं? उत्तर, सांसारिक पदार्थों की, कामिनी कांचनकी चाहनाका नाम वासना कहलाता है? ईश्वरको निष्काम, अहैतुक प्रेमसे भजना, सांसारिक सुख सम्पत्तिके लिये भगवद्भजन का व्यापार न करना चाहिये क्यों? निष्काम-उपासना सर्वोत्तम कहीहै, सकाम-उपासना अल्पफलवाली होतीहै सकाम उपासना करने वालेको भी, भगवान्का दर्शन और प्रेमामृत नहीं प्राप्त होता यद्यपि ईश्वर को सब सुख सम्पत्ति देनेका सामर्थ्यहै पर ज्ञानी महात्मा ईश्वरसे नश्वर- पदार्थों की कभी चाह नहीं करते भगवान्की भक्ति केवल भगवान्के प्रेम के लियेही करनी चाहिये? नश्वर पदार्थों की चाहना भक्ति में विघ्नस्वरूपहै। ईश्वरके प्रेममें, नश्वर-पदार्थों की चाहना क्यों हो, अविद्यारूप अन्ध-कूप भोगविलासके लिये, नहीं जी, कदापि-नहीं? यदि यह कहोगे कि सब भोगों की, वासना का त्याग करें, केवल काम और मोक्ष विषय-वासना की चाहना रखें तोक्या कोई हानि वा दोषहोता है? उत्तर यह, यह दोनों कामनाएं वासना--की उत्पत्तिकरने वाली हैं इसलिये त्याज्य हैं, यह वासना जन्म-मरणरूप बन्धन देनेवाली न हैं? शङ्का हुई, मुक्ति परमात्माका स्वरूप होनेसे सब दुखों की और पापों की निवृत्त करनेवाली और परम आनन्द रूप होनेसे मोक्ष की वासना बुरी क्यों मानी जातीहै कारण कि इस वासनासे तो पाप और नश्वर सुखों का त्याग होताहै तो मुक्ति इच्छाको पाप रूप त्यागयोग्य क्यों माना जाय और इससे ईश्वर प्राप्तिमें क्या विघ्नहै उत्तर यहकि जब चित्त शुद्ध निर्मलहुवा तो फिर मुक्ति की क्या आशा? स्वतःसिद्ध ही मुक्तिहोगी यह शङ्का क्या सिद्ध हुई? मुमुक्षुताका जब उदय होता है तब मुक्ति इच्छा होती है इससे सिद्ध हुवा कि मोक्ष विषयकवासना निष्काम दशाके लिये प्रतिबन्धकहै इसलिये मुक्ति इच्छा त्यागने योग्यहै निष्काम उपासकके केवल यह भाव रहे, परमात्मा को प्रेम रहे, आत्मसमर्पणका भाव सदा रहे, चाहे नरकमिले चाहे स्वर्ग रहे, जहां भी वास मिले वहांही भगवान्के चरणों का ध्यानलगावे, केवल निष्काम भक्ति चाहे इस दशा वाले महात्मा पुरुषका संसार में कुछ कर्त्तव्य शेष नहींरहता केवलभगवत् चिन्तनमात्र इनका स्वरूप होताहै, जब तक, ऐसा प्रेम ईश्वरके साथ नहोजावे तबतक कल्याण की सम्भावना नहींहो सक्ती इस वासना रूपी कीचड़ लगे अन्तःकरण में ईश्वर, प्रकट हो सकें, कदापि यह सम्भव नहींहो सक्ता हे प्यारे भ्राताओ! ईश्वरके भजनमें चित्त लगाओकि जिससे संसारका भय मिटकर आनन्द प्राप्त होवे ईश्वरके चरणोमें ऐसा अनन्य प्रेमभाव धारणकरो कि संसार का सब मोह छूट जाय औरपरमात्मा विश्राम-पद मिले॥ 33
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तब राजा शूरसेन चकित होकर उस बालक को गोद में उठाकर बोले, यह आश्चर्यदायक वीर बालक तो अपने समान किसी को भी नहीं गिन रहा है, अर्थात् यह निडर वीर ... निदान उस दिन राजा शूरसेन अपने घर को जाकर सब ही बालकों को बुला कर भोजन का प्रबन्ध करवाकर उन सब को खिला कर सत्कार कर सब को विदा किया परन्तु उस बालक ने यह भोजन भी स्वीकार नहीं किया अर्थात् खाया, न सत्कार-सत्कार को ग्रहण कर प्रसन्न हुआ। राजा शूरसेन विचारता ही रहा सोच में पड़ाता रहा कि उसका पिता, या उस बालक का क्या नाम बताया जाय जब वह बालक बारह वर्ष वयवाला सब प्रकार से सबल निरोग स्वरूप वान व्यायाम करता था, तब जिस स्थान, ग्राम, नगर पाठशाला अथवा जहां कहीं जाता अथवा, कोई बलवान् मिलता था, उस समय उसके साथ बल आजमाने लगजाता था। और सब ही लोग यह कहते थे। कि इस जैसा कोई भी वीर इस पृथ्वी मण्डल मध्य है--इसलिए ही इसका नाम! पृथिवीचन्द्र रख कर सम्बोधन किया जाय। इसके पिता का नाम तो किसी पता लगाया ही नहीं था-और सम्बोधन बिना काम भी नहीं हो सकता था। इस ही लिए उसका सम्बोधन नाम ही हो गया। इसके पश्चात् किसी भी नाम से, उस बालक का पृथिवी नाम ही हो गया था। इसलिए यह विचार निश्चित है, प्रत्येक विचार प्रत्येक बात किसी कारण विशेष पर तथा किसी आवश्यकता के बल पर ही नाम रखे जाते हैं। अन्यथा व्यर्थका नाम कौन सा? और क्या नाम किसका हो? आज का विषय यह नहीं चल रहा विचार इसका नामकरण का उस दिन चला था सो इस निमित्त से कथा रूप में प्रसंग उठाया गया। अब आगे का आचरण जो पृथिवी का विवरण सुना जा रहा है। इसलिए जो जो नाम प्रख्यात हैं, वे सब किसी विशेषता के ही कारण से होते हैं। इस तथ्य को सत्य ही मान लो। अब इस कथा से यह सिद्ध हो जानेपर कि उस बालक का नाम पृथिवी रख ही लिया तो उस समय उसका आचरण जो था वह बड़ा सरल निष्कपट, दयालु तथा अपने आप-आप मग्न रहने वाला था। इसलिए जो उस समय का राजा था। अर्थात् उस समय का शूरसेन नाम सम्भ्रम राजा, या जो कोई राजा होता था, या उस देश का राजा था। उसने ही अपने मन्त्रियों से कह कर या तो वह काम करने वाले भृत्यों से कह कर उस बालक का लालन पालन करवाया था। उस का पालन तथा उस स्वरूप-रचना व शक्ति को देख कर ही; सत्कार था। सो अब तो प्रत्येक को समझना यह आवश्यक हो जाता है। जो राजा चम्पावती पति, या कोई उत्तराधिकारी था जिस समय उस बालक का लालन हो रहा था। उस देश प्रजा सुखी अवश्य थी, उस ही कारण प्रजा के भोजन की कमी अथवा दुर्भिक्ष कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ। क्योंकि जिस राजा के मण्डल में राज्य में प्रजा सुखी नहीं होती क्या? निश्चय ही यह, राजा अपनी प्रजा के विचार को जानने वाला नहीं रहता वा प्रजाजनों क्या कुछ विचार स्वातन्त्र्य का और उनका ध्यान न रख कर केवल अपने भोग को भोगने का ध्यान ही जो राजा रखता है। वह राजा कभी भी उत्तम राजा नहीं कहा उस समय पृथिवी का नाम प्रख्यात होने का कारण यह भी हुआ कि वह बालक सबपर बड़ा दयालु था, उसने दयालुता का काम यह किया कि जो जो प्रजा में निर्बल दीन बालक थे। उन सब बालकों को इकट्ठा न करके ही अपने भोजन को या अपने लिए जो राजा मण्डल व्यवस्था से आता, उस प्राप्त सत्कार, का पृथिवी वितरण बालक-बालक बालकों को कर देता था। बालकों को वितरण करने पर सब लोग बड़े प्रसन्न और उसके यश का गान करने में प्रवृत्त हो गये। जब बालकों को दान वा सहायता देने लगा तो सबने यह निश्चय ही सम्भावना की, कि जो जो दीन बालक तथा बालिकाओं की अवस्था थी उसमें तो उन बालकों के वस्त्र भोजन का, प्रबन्ध यह राजा करता था, और राजा सब करता था, इसलिए इसका प्रभाव ऐसा पड़ा कि, सब लोग इस बात से, विशेष प्रसन्न थे, केवल राजा चिन्ता में पड़ गया, चिन्ता यह हुई पृथिवी का प्रभाव तो बढ़ जायगा यह तो निश्चित है, परन्तु सम्भवतः यह महाप्रतापी इस राज्य का स्वामी न बन जाय यह राजा के मन में भय उत्पन्न हो गया था। जब उस भय को उसने अपने मन्त्रियोंके सम्मुख प्रकट किया तब सब ही मन्त्रियोंने परामर्श दिया चिन्ताग्रस्त मत हो इस का कोई प्रबन्ध कर दिया जायगा जिससे चिन्ता मिटे। राजन्, इस पृथिवीचन्द्र बालक को तो हम मारेंगे नहीं, तो क्या करेंगे? सो आप ही सब को और पृथिवी को भी तो मार नहीं सकता अतः ऐसा उपाय हो जो पृथिवी पराजय को न पाकर के, शान्त बना रहे। इसका कारण यह भी जान लेना ही होगा 36
तब राजा सुबाहु अपने मन्त्री महोदर नामक योग्य मन्त्रिवरको साथ ले चक्रवर्तियोंके समान ठाठबाट बनाकर उस मनोरञ्जनाके विशाल महलमें गया सुदामनके, पास पहुँचा नृपतिराज। नृपको आते देख न मनोरञ्जनाके हृदयमें हर्ष हुआ नउमंग केवल शिष्टाचारके वशीभूत होकर वह नृपके साथ बैठ गई उस सिंहासन पर। महोदर मन्त्री तो अपनी कुटिलतानुसार ही यह चेष्टा करता ही रहा कि यह बात किसी प्रकार सुदामनके कानोंमें पहुँच जाय, जिससे उसका हृदय विदीर्ण होकर वह प्राणों को त्याग कर यमके दर्शन करे। परन्तु सुदामन तो नृपके आगमन पर भयभीत हुआ न हर्षित प्रत्युत उदासीन ही बना रहा। पर उस समय मनोरञ्जना सुदामन पर ही अपनी दृष्टि लगाये हुए थी। उस समय महोदरने राजा सुबाहु मन्त्री होकर भी चापलूसों जैसी बातें करते हुए सुदामनको लक्ष्यकर कहा कि महाराज यह तो बड़ा अनर्थ हुआ। इस साधारण पुरुषका क्या विचार चक्रवर्ती राजाके सदृश बैठना! सो इस समय ही, उचित दण्ड दिलाकर महोदय, इस धृष्ट मनुष्यको इस महलसे बाहर निकाल दिया जाय। यह सुन राजा सुबाहु मुस्कराते व बोले राजा सुबाहु बोले, "इस साधारण मनुष्यमें ऐसा कौन सा पराक्रम भरा हुआ है मन्त्री जी, जो इस समय बाहर न जाकर बैठा हुआ नितान्त प्रसन्न" राजा सुबाहु इतना कहकर सुदामन मणिकारकी ओर सम्बोधित कर तो यह बात कह गये किन्तु मन्त्री महोदर अपने कपटी विचारोंमें चूर होता हुआ कहने लगा कि राजन इस पुरुष का यह बड़ा भारी अपराध है। इस दुर्जनको तो मार ही डाला जाय। राजन् यह कैसा? क्या यह कोई कामी पुरुष? अथवा इसपर कोई भूत लगा हुआ जिससे भयभीत होकर बैठा है, या फिर यह कोई पागल पुरुष मनोरञ्जनाके इस विशाल महलमें बैठा हुआ है। राजा सुबाहु अपने मन्त्री महोदरके इस प्रकारके, कथनोंको सुन बोले? महोदरका यह वचन? सुनकर मनोरञ्जना तो जल भुनकर राख हो गई, फिर भी वह क्या कह सकती? अब तक सुदामन जो कुछ मौन होकर अवलोकन करता रहा उस समय राजाके सामने आकर वह बोल उठा। नृप सुबाहुके इस न्यायकी प्रशंसा करने लगा। मन्त्री महोदरकी कुटिल बातोंका उत्तर देते हुए कहा कि हे मन्त्रिवर तुम मुझे जैसा निर्बल मानकर अपमानित करते हुए कह रहे हो वैसा नहीं हूँ। मैं पापों के भयसे ही डरता हूँ। यदि मुझे पापका डर नहो तो तुम जैसे नीच मन्त्रीका मर्दन कर दूँ। बात ठीक ही कही है, कि जब तक पाप का उदय, रहता तभी तक हर कोई हर किसी पर भारी पड़ता है? इस संसारमें जो दुर्बलको दुःख देता रहता--है, वह मूर्ख, यह न--हीं सोचता कि इस दुर्बलका भी कोई रक्षक है। अरे भाई जब कोई भी रक्षक न हो तो धर्म ही उस समय उस दुर्बल का रक्षक, काम करता रहता है। राजा सुबाहुको तो कुछ दया आई पर मनोरञ्जना का सुदामन पर केवल भाव बढ़ा। अब यह सुदामन कुछ समय पर्यन्त ठहर कर उस स्थान से चल दिया। मनोरञ्जना अपने भवनमें पश्चात्ताप की आग में जलने लगी। उसके हृदयमें सुदामनके प्रति निष्कपट प्रेम उमड़ पड़ा। वह सोचने लगी कि, हाय मैंने निष्कपट सुदामन को कष्ट पहुँचा कर भारी पाप किया। अब मैं क्या करूँ? जिससे, इस पापसे मेरा उद्धार हो सके, सो इस समय केवल! ही यह बात रह गई कि जिससे सुदामनके साथ विवाह रचाकर मैं, इस कलंक को धोकर अपने जीवन को धन्य करूँ। केवल यही इसका एक उपाय हो सकता है। इधर राजा सुबाहु, भी अपने घर, गया ओर सुदामन भी चिन्ता का समुद्र सा होकर घर गया तो माता और पिताने उसका उदास मुख देखकर पूछा कि बेटा! तुम इस प्रकार भयभीत क्यों दिख रहे हो। तुम्हारे चेहरेका तेज क्यों नष्ट हो गया; सो बताओ, किस पापी दुर्जनने तुझे, किस बात के लिए दुःख दिया है? जो बात तुम्हारे हृदयमें भरी हुई, सो शीघ्र बताओ, जिस बात का हम उपाय, कर के तुम्हारा भय दूर किया जाय। माता पिताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सुदामन कुछ नहीं बोला, शान्त ही बना रहा किन्तु माता? पिता बारम्बार, यही पूछते रहे! तब वह केवल इतना ही कह सका कि चिन्ता छोड़ो माँ, अब क्या हो सकता इस संसारमें किसी का कोई नहीं है न कोई किसीका सहारा न ही सहायक हो सकता, बस इतना ही कह कर, वह शान्त होकर बैठ गया। सुदामनके मनमें इस समय जो बात लगन लगी सुदामन के मन रूपी घर में वास कर गयी वह बात तो केवल यही सोच रहा था कि किस समय इस शरीररूपी मटकी को फोड़ दूँ? क्या मणिकार सुदामन को वैराग्य प्राप्त हो गया या संसारमें सब कुछ स्वार्थ भरा जब रात का समय हुआ, सब लोग सुख चैन से सोये, उस समय यह वैरागी पुरुष, चुप चाप उठकर श्मशान भूमिकी ओर चल पड़ा, सो केवल वैराग्यके वशीभूत होकर। सोचने लगा, जिन बातोंके निमित्त सब झगड़ा है, उनका त्याग ही क्यों नकर दिया जाय? इस प्रकार वह घर, बार सब को छोड़कर वन की ओर प्रस्थान कर दिया तथा वह, एक वन में पहुँचकर, किसी वृक्षके नीचे बैठ कर, श्री जिनभगवान की तीन प्रदक्षिणा देकर स्तुति पाठ किया। संसारके सब नश्वर मोह माया, ममता आदि बन्धनों को तोड़कर वह, श्री जिनेन्द्र देवका स्मरण कर कायोत्सर्ग ध्यान करने 37
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तब उसने, या तो उस समय उसके मुखमण्डल तथा वाणी द्वारा व्यक्त होने वाले गहरे दुःख से द्रवीभूत होकर, अथवा जो स्वाभाविक ही था, यह भय पाकर कि कहीं ऐसा न होवे संकट बढ़े, उसने कहा कि मुझे मारते हो क्यों? क्या मेरी हत्या करोगे? या कोई अमानुषिक हो? या कोई चोर या डाकू होवे? मुझे छोड़ दिया जावेगा ना? एक क्षणमात्र के लिए उस न जाने क्या सोचा, तब तो उसने उस कठोर व भारी छड़ी जिसको वह ले रहा था उस समय हाथ से फेंक ही दिया तथा अर्ध- रुष्ट होकर तब वह उसे गाली निकालने के ही रूप में कुछ कहने लगा कि ? पागल-कुत्ते क्या तेरी जान लेने और तुझे मार ही देने के लिये तुझे इस तरह पकड़ ले आवे कोई? पागलपन तुझे सूझ रहा है क्या जो इस प्रकार के व्यर्थ बकवास करने लगता है? तुझे मारना और इस तरह से मार कर फेंक ही देना होता, तो इतना कष्ट उठा कर इतनी दूर क्यों लाते, ऐसा कहते? तू जानता भी है, कैसा मूर्ख? "मुझको जो रूप में खड़ा किया गया है तो वह केवल इसके लिये?" मुझे कैसा मूर्ख? क्या तू वास्तव में इतना मूर्ख? ऐसा प्रश्न किया? मूर्ख कह दिया गया? मुझको इस बात का कोई प्रत्युत्तर मिलेगा? इसके उत्तर रूप उसने कुछ नहीं कहा प्रत्युत केवल मुख से जो रोष तथा घृणा का भाव इस प्रकार प्रकट हो रहा था वह सब तो यथावत ही रहा, फिर भी जो कुछ अब तक उसने न कहा था सो कुछ प्रकट करना चाहा कि ? उसने जो कुछ कहा सो सब तो व्यर्थ था? या उसने समझना ही नहीं चाहा जिससे कि कुछ बात का प्रभाव ही पड़ सके न हो, प्रत्युत उस ओर से और भी अधिक घृणा ही प्रकट करने का जो रूप तथा स्वभाव दिखलाया न जा सकता, प्रत्युत उसे केवल इसी बात का भय मन तथा सिर पर उस दम सवार था जिससे कि वास्तविकता को समझना सब ही व्यर्थ समझा जाने लगा? उसने फिर कहा, "मुझे यहाँ तक लाये सब तो केवल दो बातों के लिये होगा" उस बात के भाव को वह समझ सकता होगा क्या? "मुझे मार कर फेंक देने या केवल दो बातों के लिये होगा" इन दोनों बातों द्वारा उसने क्या कुछ प्रकट करना चाहा था, यह बात तो स्पष्ट होकर सब कुछ प्रकट न हो सका क्योंकि उसने बहुत चाहा कि केवल दो बातों पर ही ध्यान दिया जावे--एक तो यह कि मार, दूसरा यह कि, न मारा-जावे; या केवल दो बातें स्पष्ट थीं कि जिससे जो कुछ स्पष्ट होता, सो सब कुछ है; पर ऐसा समझना सब न हो कर उस व्यक्ति रूप से जो उपस्थित था सब कुछ मार-पीट--सत्कार्य जैसा समझ लिया गया--सो उसके लिये सब ही परिणाम भया- वह। सब ही इस ओर लगा दिया था कि केवल दो बातों के रूप को छोड़ कर न तो वह कुछ कह सका था, न स्पष्ट किया गया था कि जिस प्रकार दोनों बातों अथवा एक बात का भाव प्रकट हो ही सकता था सो न होने देकर या समझने दिया उस बात अथवा भाव रूप को नित्य-ही के लिये अप्रशस्त करने का निश्चय कर ही लिया था केवल इसी रूप द्वारा सब बातों के रूप में देखा गया जाना सब व्यर्थ समझा। क्रोध ही केवल न दिखलाया गया; स्वभाव भी, कैसा था, इसका रूप यदि उस दम देखा जाता तो उससे भी अधिक जो रूप उस समय प्रकट हुआ था, सो यह कि, उस दम, प्रत्येक ने; केवल सिर को हिलाते हुए तथा मुंह को फेरते हुए दोनों हाथ से एक संकेत रूपी चेष्टा प्रकट करके जो बात कही गई थी! उस विषयक समस्त प्रभाव जिस रूप से उस स्थान में दिखलाई पड़ा था, उससे स्पष्ट ही उस व्यक्ति न तो कुछ लाभ उठाया या देखा या उस समय उसका कोई रूप ही ज्ञात व्यवहार के रूप में वह कर ही क्या सकता था ही क्या? फिर, सो सब व्यर्थ गया था, केवल इस बात को छोड़ कर कि जो कुछ रूप या भाव उस दम देखने में आया था, सो ऐसा बुरा प्रभाव उस पर छोड़ रहा था कि जो कभी मिट नहीं सका, न उस प्रकार के रूप को कभी वह भूल ही सकता था और सब कुछ था, सो सब कुछ व्यर्थ रहा या वह सब कुछ व्यर्थ था, इस बात का रूप केवल दो बातों द्वारा देखना सब प्रकार व्यर्थ रूप प्रकट करने का रूप था? सब प्रकार उस स्थान विशेष से सब ही मुख को फेर कर उस व्यक्ति विशेष, जिसको भय से प्रत्येक अंग कांप रहा था उसके पास से हटना चाहा सो तो अवश्य 39
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□□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□, □□ □□-□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□-□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□, □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□, □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□ □ □□ □□□ □□□□-□□□□ □□ □□□□ □□, □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□, □□□□! □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□? □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □? □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□? □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□? □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□? □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□? □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□? □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□, □□□□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□? □□□□□ □□□□ □□□□□ □□, □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□! □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□-□□□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□, □□□□ □□□□□ □□ □□□, □□□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□-□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□-□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□, □□□□-□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□, □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□-□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□? □□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□□? □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□? □□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□, □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□, □□□□□□□□ □□□□□□ □□□□-□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□ □□ □ □□□□, □□□ □□□□□ □□□, □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□, □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□-□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□, □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□, □□□□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□ "□□□□□□□□□ □ □□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□"--□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□? "□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□"--□□□□□ □□□□□□□□□□ □□□□ □□□□□? "□□ □□□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□" □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□ □□ □□ □□, □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□, □□□□□, □□□□□□, □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□□□? 44
The text in the provided image consists entirely of unrendered placeholder boxes (tofu characters / □) caused by a missing font or encoding issue in the source document. Because the actual Devanagari glyphs are not visible, it is not possible to read or transcribe the underlying text.
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जब जीव का यह या वह नाम पाया जाता तथा जब तक वह नाम बना रहताथा, तबतक जीवके उस नाम द्वारा ही उस पदार्थ ग्रहण होता; पर वास्तवमे जितने परमाणु का स्कन्ध बना; वह समय-समय विनष्ट पर्याय स्वभाव, सो उसका नाम... । अब देखना यह है कि यह शरीर मेरा स्वरूप, अथवा मैं पृथक्भूत हूँ? इस शरीर से मेरा स्वरूप पृथक् नहीं, जैसा कि देखा गया, अथवा मैं पृथक्भूत ही बना रहता हूँ? यद्यपि इस शरीरमें मेरा, जैसा कि देखा गया नाम पड़ा था तथा इस देह संयोगके निमित्त से मैं नाना देह रूप बना था तथा शरीर में कर्मों का सम्बन्ध रहा, जिससे कि देहसे सम्बद्ध प्रत्येक परमाणु मुझ जीव सम्बद्ध था, जिस कारण इस देहके साथ ही मेरा सम्बन्ध बना सो वास्तवमे तो नहीं; पर इस शरीर के साथ मेरा जो सम्बन्ध, सो केवल उपाधि मात्र था। यद्यपि देह संयोग के रूप में जो कुछ देह बना दिखता आत्मामें कर्मोका सम्बन्ध बना था, जिस कारण आत्मा देह रूप, देह आत्मा स्वरूप प्रतीत हुआ करता था? पर अब ऐसा सम्बन्ध सम्भव नहीं रह गया जिससे कि मैं इसे देह रूप कह सकूँ अथवा देहको आत्मा? देह पृथक् अथवा आत्मा? देह पृथक् आत्मा? सो, यह सब बात केवल उपचार से थी, जो अब मात्र कल्पना प्रतीत होने लगी। वास्तवमे आत्मा देह रूप कभी भी उपचारमात्र से भी नहीं बन सकता इसका कारण आत्मा चेतन रूप है। इस कारण न तो मैं इस देहका सम्बन्ध मात्र रहा और न यह देह ही किसी प्रकार से मेरा सम्बन्धी बन सकी, वास्तवमें देह विनाशी पदार्थ है, जो नष्ट होने पर भी जीव का कुछ न हुआ सो, यह जीव इस देह का कुछ रूप नहीं बना। जो कुछ मेरा कहा जाता रहा तथा जो कुछ भी अन्य पर्यायें या तो देह रूप हों, या देह से भिन्न हों, वे केवल नाममात्र थीं, सो केवल नाम, जो किसी का कोई पदार्थ बन सकेगा? नाम इस रूप कभी किसी वस्तु को रूप नहीं दे सकता या जो केवल नाम ही नाम मात्र कहा जाता हो सो जो कुछ ऐसा कहा जाता, यह केवल शब्दों की ही चेष्टा है। इस जीवका स्वरूप केवल नाम मात्र-रूपी नहीं हो सकता है, जिस कारण से नाम मात्र जीव रूप नहीं? नाम तो न कभी जीवका स्वरूप बन ही सकता जिससे नाम मात्रको जीव समझा जा सके-नाम केवल उच्चारण करने मात्रके लिये है? या किसी वस्तु को संज्ञा मात्रके देनेके लिये है। वस्तु नहीं! सच तो यह, कि यह कल्पना रूप जीव तो केवल न समझने का ही रूप हो रहा था, इस कारण नाम केवल सम्बोधन मात्रके लिये प्रयोग किया जाता है। इस लिये जीवका स्वरूप तो वास्तवमे न तो नाम रूप ही हो सकता है। जिस रूप में नाम रूप चेष्टा मात्र रही सो उस प्रकार की चेष्टा का जीव सम्बन्धी कोई भी सम्बन्ध वास्तवमे कर्मोका नहीं देखा गया, जिस से देहके साथ कोई सम्बन्ध हो सके। सो अब देह या देहके नाम रूप जो भी रूप बन गये थे, वे सब नष्ट रूप हो गये जिनका सम्बन्ध वास्तवमे कभी भी मुझ जीव से न था। वे सब देह सम्बन्धी नाम रूप ही रहे सो देह तक सीमित रहे सो वास्तवमे कभी, न तो मैं उस देह का रूप बना, न कभी मेरा ही उस देह सम्बन्धी नाम-रूप से कोई सम्बन्ध ही रहा। इस प्रकार यह देह, सम्बन्धित बातें सब ही मुझ आत्मा से सर्वथा भिन्न रहीं, नाम सम्बन्धी रूप तो केवल नाम रूप शब्दों का रहा। जो देह रूपमें रहा सो केवल नाम रूप रहा सो वह भी देह तक ही सीमित रहा। "व्यवहार से जो कुछ भी उपचार रूप सम्बोधन या कथन किया गया सो केवल देह मात्र रूप रहा, जिसे उपचार, मात्र ही समझना चाहिये सो जो कुछ कहा गया, वह सब मात्र नाम के रूप में ही कहा गया। इससे जीव का कोई सम्बन्ध न था और आत्मा का भी कोई सम्बन्ध इससे न था। इस कारण सो तो सब नाम रूप ही था जो नाम व्यवहार का ही मात्र रूप माना गया है और रहेगा" इसका स्पष्ट तात्पर्य यह समझ आया कि देह का जो नाम पड़ा सो तो इस देह तक ही सीमित रहा जो देहके विनाशी होने पर उसी समय नष्ट हुआ जिस समय यह देह नष्ट हुई, सो जीवका कोई नाम देह सम्बन्धी नहीं हो सकता तथा जीव का देह-सम्बन्धी नाम, जो कभी जीवका? वास्तवमें तो यह सब उपचार मात्र पर्याय सम्बन्धी रूप मात्र था। इसका जीवसे कोई लेना देना न देखा गया। इस प्रकार यह सारा कथन केवल देह, जीव के सम्बन्ध का रूप मात्र दिखलाता तो कहा पर देहके साथ जीव का न तो कोई सम्बन्ध ही रहा और न नाम 47
यद्यपि वह मनुष्य मात्र सांसारिक सुखभोग भोगते समय केवल अपने सांसारिक सुख भोगनेमें लगे हुए अपने पराक्रम मात्र का ही यश तो गानेंगे नहीं, तथा भी उनका यश तो हो जायगा। फिर उनकी यश बात यदि मात्र सांसारिक ही तक रह जाय तब तो कोई विशेष बात नहीं हुई; किंतु यहां बात तो यह नहीं मिलेगी, यहां बात मिलेगी ऐसी कि जिसको सुनकर संसारके सब छोटे बड़ों का मन पिघल जाय, जो परमात्मा का भजन करें, या न करें, किसी का बुरा, भलाईका काम जिसमें यश मात्र ही न मिले, पर भलाईका बदला, भलाईका बदला, भलाईका यश तो मिलेगा यश तो मिलेगा उस विभीषण यश के तो सब पात्र नहीं, जब तक उस पर कृपा सब प्रभु की न हो जाय या प्रभु, उनके परिवारके ऊपर या उन पर जो उस वक्त उनके साथ थे। भक्तिका यश सब को इस रूप में मिले ही, ऐसा सब भक्तोंके साथ न हुआ हो इसका तो हम यश सब नहीं कह रहे हैं। सब को ऐसा यश मिलना कठिन होता कि भक्त, जो अपने पराक्रम के बल पर संसारके सब बड़े पुरुषों को हरा देवे और उस को इस प्रकार न भगवान् के बलपर यह सब यश का यश रूपमें प्राप्त हुआ हो। इस रूप में जो यह सब हुआ वह संसार के किसी भी मनुष्य के भाग्य में नहीं लिखा था-जो प्रभु की कृपा से विभीषण को मिला। विभीषण को भगवान् ने आज्ञा देकर यह सब कुछ कराया जो कि प्रभु की कृपा-मात्र समझो, केवल विभीषणके इस पराक्रम समझो कोई बात नहीं और न ऐसा यश, केवल एक विभीषणके भाग्यमें यह लिखा, केवल राम कृपा से हुआ उस वक्त सब वानर विभीषणके साथ विभीषणके आगे खड़े होकर प्रभु श्रीराम- लखनके यश का यश गाते हुए हर्षित होते हुए कह रहे, मानो प्रभु का यश गाते गाते आज वे सब उस रूपमें प्रभुके यशको देख रहे थे। सब तो कह रहे थे जो कुछ हुआ सो सब प्रभुकी कृपा, पर यह भी तो सोच रहेथे विभीषणके भाग्य क्या समझिये? वह तो समझे, प्रभु का ऐसा विभीषणपर प्यार था जो इस प्रकार विभीषणके भाग्यमें सब कुछ हो रहा था। सब लोग तो प्रभुके चरणों में साष्टांग दंडवत् प्रणाम कर विभीषणके सम्मुख खड़े होकर बोले, प्रभु की कृपा का तो कहना क्या विभीषण का भाग्य ऐसा है, प्रभु जिसका साथ देते उसका संसारके सब संकट कष्ट दूर होकर ऐश्वर्य सब प्रकारके मिलते हैं। प्रभु, प्रभु हैं। सब कुछ करने वाले प्रभु और प्रभु सब के विधाता; सो प्रभु, जब विभीषणपर प्रसन्न होकर कृपा कर रहे हैं तो क्यों न विभीषणका सब यश होवे। संसार के सब सुख यश विभीषण को मिले, जो प्रभुके चरणों में नित्य रहता हो उस को संसारके सब सुख मिलने का क्या संशय हो सकता है? विभीषण सब बातों को प्रभु कृपा समझ हाथ जोड़े विभीषण खड़े थे, जो सब कुछ प्रभुका ही रूप तो संसार में सब रूपके साथ देखा गया। इसलिए यह कहना कि विभीषण का भाग्य, विभीषणका यश यह सब प्रभु कृपा ही थी। विभीषण तो सब रूप से प्रभु का ही भक्त विभीषणके रूप में ही प्रभु--लीला रूपमें लीला कर रहे थे। विभीषण को जो यश, विभीषण को प्रभु-कृपा रूपमें मिला सो संसार को दिखाने केलिए कि प्रभु अपने भक्तपर जो भी कृपा करते हैं उसका फल ऐसा ही होता, जो संसार के सब लोगों को भी इस भक्त लीला विभीषण का यश देख प्रभुके चरणोंमें भक्ति का साधन मिल सके और प्रभुका यश गा सकें, जिससे सब का इस रूपमें कल्याण-साधन हो सके और सब भक्तिकर सकें, सो विभीषण के भाग्य का यश-गान केवल प्रभुकी भक्ति के स्वरूप में इस प्रकार प्रभुने संसार के सब जीवों के कल्याणके अर्थ कराया। लंका, लंका, लंका सब के मुखसे--विभीषणका लंका यश और प्रभु-कृपा आज लंकाके घरघरमें फैल रहा था। सो इस--रूप से सब के मन में भक्ति का जो संचार हुआ सो सब प्रभु कृपा थी। सब लोग लंका-निवासी सब के मुखपर प्रभु की ही महिमाका यश था, प्रभुके ही यश का "विभीषण के यश को विभीषण के रूप में संसारके सामने रख संसारका प्रभुने भला किया, ऐसा विधाता, प्रभु को छोड़कर, कौन विधाता होगा" विभीषणके यशको प्रभुने अपना यश बनाया प्रभुने अपना यश विभीषणके चरणोंमें समर्पण किया सो इस यशको केवल प्रभुके रूपमें न देखना विभीषणके रूप में तो संसार के विभीषण के, सब को प्रभु रूप में प्रभु का स्वरूप समझ केवल प्रभु की भक्ति का यह विभीषण का रूप सब लोग क्यों न कहें? 48
दयाल, कृपालु, भक्तवत्सल--सब सम्बोधन तो ईश्वर के रूप और नाम हैं! केवल वाणी का रस घोल घोल कर ही उनका नाम लेने मात्र पचास वर्ष तक पाठ कर ले तो भी कोई लाभ न--सक-सकेगा मिलेगा--या तो भला ईश्वर पचास वर्ष के केवल नाम उच्चारण का फल प्रदान किए बिना ही दे दिया करे। यह सब प्रत्यक्ष बात सुन कर पंडित, राव और सेठ आश्चर्य चक में पड़ गए! जो जन प्रत्यक्ष बात सुन कर भी समझ, राव और सेठ आश्चर्य से मुँह बाए रह गए! कहा, सत्य बात को मान लेने में ही तुम्हारा भी और सब का भला है। ईश्वर का तो भजन सब कीजिए, इसमें कोई शक या दोष नहीं पर धर्मानुकूल कर्म भी कीजिए। केवल मुख से राम राम कहने मात्र से पाप, ताप, संताप अशान्ति मिट नहीं सकती। ईश्वर तो न्याय का रूप और सत्य रूप है। जैसा जो जो करेगा सो वैसा फल पा ही तो लेगा। मन से जो पाप करता रहा और मुख से राम का नाम लेता रहा सो फल तो उसे पाप का मिलेगा या मुख के राम नाम का? न केवल मुख से राम राम कह कर ही ईश्वर से छूट, छल अथवा कपट से फल मिलना मान ले। "तो यह दान पुण्य का, या दया धर्म मात्र रूप ईश्वर के किए हुए संकल्प का फल भी मनुष्य मात्र को ही दिया करे?" यह भी एक जन बोल उठा। दया का फल तो मिला "कर्म तो दया का किया था सो दया का ही फल मिला" तब तो वह जन मौन पड़ गया था। फिर भी महात्मा, सब को शान्त सा देख, उस ही बात का प्रभाव सब के मन में डालते हुए बोले, उस ईश्वर का गुण तो सत्य और धर्म का रूप है, दया, धर्म का फल तो ही दिया करे पर दान, पुण्य मात्र नाम, या यश चाहने का फल अथवा-- कभी मन को शान्ति स्वरूप न मिला। ईश्वर कर्म का फल दिया करता है न कि अभिमान का। धर्म का जो अनुष्ठान मन रूप भाव मात्र में समाया हो ईश्वर तो उस निष्ठा का फल ही दिया करे। दया भाव का निष्ठा या दान आदि का निष्ठा ही तो फल रूप मिला करता, इस रूप मात्र का नाम यश न होकर आत्मीय भाव का फल ही मिला। सो जन, या सज्जन सब जन को उस परम-पिता ईश्वर का ध्यान तो ही लो, ध्यान ही सत्य का स्वरूप है, सत्य रूप निष्ठा सब काल कल्याणकारी होती है। ज्ञान या अज्ञानजन्य कर्म का फल कर्म ही देता है, न किसी का पाप, न अज्ञान जन के नाम संकल्प से बढ़ के, निष्ठा से सब सब निष्ठा मात्र, नर- कल्पित जन, संकल्प-ज्ञान सब का फल उस काल का मन ईश्वर समान रूप स्वरूप का होकर सब काल में ही फल दे तो न ऐसा तो हो नहीं सकता कि न किया हो तो अकारण फल ही फल ही मिलेगा। कैसा विचार? दया का फल या निष्ठा? दया मात्र कल्याण कर उस प्रकार अपना स्वरूप बना ही लेता दया स्वरूप न बना सका, तो दया मात्र का स्वरूप तो सब विकार मात्र को ही तो फल दे सकेगा अज्ञान स्वरूप नाम मात्र का तो सब स्वरूप मन मात्र विकार मात्र का स्वरूप ही बना देगा, मन मात्र सब स्वरूप अज्ञानता का रूप बन जाएगा, जन तो मन स्वाध्याय निष्ठा स्वरूप तो पावे ही, पर उस निष्ठा से न भगवान का रूप प्राप्त मात्र हो सके जब तक कि वह मन ईश्वर में मिल गया हो तब ही ईश्वर का हो सकता है। ईश्वर सब प्रकार शक्ति रूप सर्व स्वरूप सब का नियन्त्रण या संचालन ही सब काल करता रहेगा? क्या अज्ञान का स्वरूप सब काल बना रहेगा या तो अज्ञान निवारण का उपाय ही सब काल कल्याणकारी रूप फल तो देगा? क्या अज्ञान सब काल रहेगा? क्या ज्ञान रूप भी अज्ञान ही रहेगा? क्या ज्ञान से भिन्न, सब काल अज्ञान रहेगा? क्या निष्ठा रहेगी? क्या अज्ञान रहेगा? क्या अज्ञान रहेगा? जब सब ही, या सब ज्ञान स्वरूप सब प्रकार अज्ञान रूप में कल्पित रूप-मात्र ही रहकर केवल स्वरूप का ज्ञान स्वरूप हो, तो ज्ञान स्वरूप सब प्रकार बना कर ही ज्ञान स्वरूप सब रूप सब प्रकार का नियंत्रण ही कर ही लिया कर सकेगा। अतः, सब जीव केवल ही ही ईश्वर कृपा रूप मात्र स्वरूप ज्ञान को विचार कर केवल ही बात का ध्यान रखकर ही आगे बढ़ो, कल्याण ही सब होगा, जो सब रूप ही ही रूप मन गए; सब जीव के सुख रूप स्वरूप परमात्मा 49
यमके सब प्रकार रूप देखकर राजा सब को संभ्रमितचित्त हो गये कोई कुछ न बोले; विद्याधर ने तब कहा महाराज राजा का एक नाम यम भी है और कोई यम नहीं यम तो धर्मात्मा पुरुषों का सखा, और पापी लोगों लोग चोर जार कपट पाखंडी, सब को प्राण लेकर यम यातना नरक भोगवे हैं, राजा सो बात छोड़ के सब लोगों को यथा न्याय विचार से पालन करो अपराध विचारके सब प्रकार का दण्ड करो, राजनीति के धर्म सब ही हैं सोई राजा का धर्म और पाखण्ड मत सुनो और विद्यावान् का वचन सुनके अप्रसन्न विमुख न होय यह उपदेश सुन सब न तो विद्याधर को जाना वा माना वा विद्यावान् जाना लेकिन सब ही ने समझा कि पाखण्ड ही का व्याख्या किया गया सब, सो तो जैसा कहा सब किसी बिना ही समझे वा जाने पर मान ही गये थे, सो किसी तरह मान ही गये सो क्यों? सो तो पाखण्ड मत रूप ही संसार विद्या--हीन है, विद्याहीन को, पंडित भी, अप्रसन्न ही, समझें गे, राजा जी--का काम तो सब विद्यावान् ही करें सो यम तो का प्रमाण हो गया था, और यथा न्याय दण्ड भी पाखण्ड प्रपंच-- रूप सब ही को ज्ञान हुआ था तब पाखण्ड न चला। सो, राजा विचारता न था, सो बात सांची थी, यथा न्याय सब, दया धर्म रूप यमराज समझा कर दया की थी सोई पाखंड विद्या न समझाई राजा के न्याय की निन्दा हो चुकी; न विद्याधर न्याय बात ही बताई सो विद्यावान् का धर्म प्रकाशमान्, ना पाखण्डियों ने मन समझा और कहा साचा बात, किन्तु ज्ञान बिना सब को भ्रांति ही रही पाखण्ड बात प्रभाव सब जगह ही फैला वा सब पर व्याप ही गया, यह तो न जान पड़े केवल इतना समझें, जो जो विद्या युक्त सब प्रकार विद्या का नाम सुने
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