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माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

यथार्थ ही कहा, जरा सिर ऊँचा करके जो बात कही जा सकती थी, पश्चात्ताप अथवा पाप का बोध पाकर ही मानो उसने सिर नीचा कर लिया न हो। सम्भवतः आज तक न वह कभी इस रूप में पायी गयी, नित्य नया प्रसाधन करके ही उसने अपने यौवन को सजाया! पर आज जो वेश्या स्वयं सब कुछ त्याग बैठी! जिसे अपने पर लेश मात्र मोह! पश्चात् वह उठी, पर आचार्य के चरणों पर नहीं, एक संन्यासी शिष्य बनकर चरणों का छोर न छू सके, ससम्मान प्रणाम कर, सिर झुका हाथ बांधे खड़ी रहकर, आचार्य की आज्ञा की प्रतीक्षा। केवल आचार्य तक यह बात न थी। समस्त मठ में यह वार्ता ज्वाला-सी फैल उठी। हर व्यक्ति के कान खड़े हो गये। ऐसा कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था, न ही यह भी मन हुआ, जिसे पतित कह कर हम सब दूर से घृणा से देख सकते थे। जब उसने स्वयं सब कुछ त्यागने का निश्चय कर लिया था तब उसे शरण में न लेना कैसा धर्म! कोई कह भी कैसे सकता था इसके पूर्व, जब स्वयं श्रेष्ठ आचार्य तक मौन साधे जा चुके थे। सभी के मुख पर केवल भय था। आचार्य के क्रोध का भय ही नहीं वरन् भविष्य का विचार भी था। पर सभी मन ही मन, एक और प्रश्न लिए भी व्याकुल हो उठे, जब यह सब कुछ है, तो तो फिर शरण पाने पर, यह भी संन्यासिनी बनकर इस मठ में ही वास करेगी। तब, संन्यासियों अथवा इन देवियों का यहां, इन दोनों आश्रमों में वास करना कैसा होगा? बहुत से नये, कुछ मध्यस्थ के रूप, कुछ संन्यासी तथा संन्यासिनियां यह सभी नहीं चाहते थे। जब तक इन दो का संगम न हो तब तक तो ठीक, पर यह रूप जो अब होने जा रहा था, कभी किसी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता था, कारण किसी समय भी इन सब के मन में विकार भाव जाग्रत होकर संन्यासियों तथा उधर वास करनेवाली संन्यासिनियों का मन विचलित हो सकता था, इसमें सन्देह संकोच ही क्या, पर जो बात आचार्य के सम्मुख जाकर कहने योग्य किसी का मुख तथा यह बल ही नहीं केवल मन में रहकर बातें रह गईं! केवल आचार्य तथा एक ओर कुणाल ही दोनों ही इस स्थिति विचारपूर्वक शांत रहकर सब कुछ कर रहे थे। उधर मठ के भीतर एक ओर केवल भय तथा सन्देह ही था कि अब क्या होगा? सबमें फुसफुसाहट विस्मयकारी तथा लज्जित कर देनेवाली भी थी, किसी के मुख से ऐसा कुछ शब्द नहीं निकला जो सर्वथा उचित कहा जाता! यद्यपि इस बात पर आचार्य मौन थे अवश्य, पर वे यह सत्य, भली ही प्रकार जानते, संन्यासिनियों संन्यासियों का नियम था। धर्म का सार सब एक समान ही था। पर, दोनों का इस प्रकार एक ही स्थान विशेष पर वास करने से कहीं विकृति न आ जाय। सम्भवतः किसी विरक्त आत्मा को, जिसके विचार दृढ़, तथा श्रद्धा निष्ठा दोनों में एकाग्र, कभी विचलित साधारण जन का मन क्षण-क्षण विचलित होने लगता है। पर आज वसंत सेना--का विषय साधारण जन के वश की बात न थी। वसंत सेना नाम केवल एक ही उस नगर पर्यन्त नहीं, वरन् सारे भारतवर्ष तथा मगध भर में एक ही विख्यात नारी रूप में प्रसिद्ध थी, जहां राजा-महाराजा तक झुकने के लिए विवश थे। उस नारी, रूप में भी स्वयं झुकना था। अतः वह स्थिति का विचार कर ही निर्णय पर पहुंच गये, पर उनका मन तो अब संन्यासिनियों के--सम्मेलन, चिन्तन्--मनन करने विषयक वार्ता पर लगा हुआ था। वसंत सेना को जहां आज विश्राम दिया गया था। उस स्थान पर जाकर जब वे मिले तो कुणाल भी उपस्थित था। जो कुछ भी स्थिति इस समय थी उसका भी विवरण उस संन्यासिनी के सम्मुख रख दिया गया। वसंत सेना सब कुछ सुन कर, केवल एक ही वाक्य कह सकी। 'परम भगवन्! मुझे केवल दो दिन पश्चात ही तो निर्णय पर जाना, जिसे सारा बौद्धसंघ तथा स्वयं संन्यासिनियां भी मिलकर निर्णय कर ही लेंगी। जब यह बात स्पष्ट कही, तो वसंत को सन्देह का कोई कारण ही न रहा। वह आश्वस्त हो निश्चिन्त होकर बैठ गयी। कुणाल अपना मन ही सम्भाले था अन्यथा, उधर वसंत सेनाचार्य तक पहुंचने से वंचित रह सकती थी। क्योंकि, संन्यासी के मन में यह बात थी कि वसंत को प्रवेश किसी रूप में नहीं दिया जा सकता। परन्तु वसंत अपनी धुन की पक्की थी। उसे ऐसा आभास हो गया था कि जब तक वह स्वयं अपने विचार बौद्ध संघ के सम्मुख न रख देगी तब तक सम्भव, उसके संन्यासिन बनने विषयक वार्ता पर कोई भी निर्णय न हो सकेगा। अतः 113

जहाँ तक उनका विचार सम्बन्ध का था वहाँ सभी एक मत दिखाई देते, सब का यही मत था, कि हमारी जाति बहुत बढ़ गई थी और उस का एक देश में निर्वाह हो सके, यह जो कभी कल्पना की गई होगी इसकी सम्भावना केवल आर्य--देश ही तक विचार करने वाले लोगों द्वारा ही सम्भव है। विचार यदि विश्वात्मक हो, तब यह प्रश्न ही न हो सकेगा कि यदि लोग अन्य देशों में फैलते तो इसमें सन्देह क्या था अथवा क्यों, यदि वे फैलते तो न ही फैलने वालों का या अन्य जातियों सबसे अधिक बात यह, कि यह बात तो निश्चय पूर्वक कहनी कठिन प्रतीत होगी, किसे तो आर्य कहकर पुकारा गया विशेषाधिकार की दृष्टिसे प्रत्येक मनुष्य अपने आप को विशिष्ट समझता, जिसे धार्मिकता की दृष्टि से या केवल अन्य दृष्टिसे भी पहचाना जा सके ऐसा नाम आर्य तो हो सकता सम्भवतः हो, परन्तु प्रत्येक को, जिसे विशेषाधिकार प्राप्त... । कि सब लोग एक ही विचारधारा के लोग कभी नहीं कहे जा सकते केवल इसीलिये आर्य या विशेषाधिकार सम्पन्न ? अथवा केवल भाषा रूप ही सब लोग आर्य हो सकते थे? केवल भाषा द्वारा ही किसी आर्य कहेंगे? यह तो आज भी सम्भव नहीं सम्भावनाहीन विचारधारा का विषय होगा, जिसे हर दृष्टिसे केवल भाषा द्वारा ही तो या निश्चित रूपमें भाषा की दृष्टिसे ही विचार का विषय होगा सबसे बढ़ कर तो विचार का एक रूप भाषा--का यह विश्लेषणात्मक हो, या कोई व्यापक परम्परा का सम्बन्धित रूप--विचार रूप कहा जा सकता है, जो केवल एक मत, एक दृष्टि द्वारा विश्लेषित होकर ही विचार का विषय तो बनता ही अथवा जिसे ही देखा जा सके, तब यह बात कैसे कही जावेगी कभी सम्भावना का विषय यह रहा हो अथवा यह कहना ही होगा कि एक ही, धर्म का विस्तार या विचार का विस्तार ही रहा हो, तब सब देश इसके नीचे स्वयं आते कहे गये या समझे गये या उसका कभी न कभी रूप तो प्रत्येक रूप में माना गया या न माना गया, उस विषय विशेष के रूप इसके साथ ही सब देश एक मत से यह कह ही सकेंगे कि सब को ही सब सम्भव सब कह ले, पर सब देश को ऐसा विस्तार या रूप कहा गया यह तो रूप न ही हो सका सम्भावना का रूप हो अथवा नहीं हो सका या यह सम्भव रहा, तब विचार का विश्लेषण केवल भाषा द्वारा सम्भव माना जाना धर्म--कर्म का विचार अथवा कर्म--का या विचार विश्लेषणात्मक ही इस प्रकार देश--भेद को सब प्रकार सीमित करने वाला विचार है? यह सब रूप विचार की दृष्टि से ही विश्लेषण के रूप में माना जाता रहा हो चाहे यह या विचार स्वरूप केवल रूप से ही सब का रूप ही सब कुछ दिखाई देवे कर्म-रूप, प्रत्येक का विचार ही तो सम्भावना विश्लेषित होकर सब को प्राप्त कराने का दृष्टिकोण ही देखा जावेगा तब कैसे ! केवल एक ही विचार रूप, प्रत्येक का तो न रूप ही रहा न तो धर्म द्वारा ही सम्भावना सब को दी जा सकती रही, विश्लेषित रूप से मनुष्य केवल रूप को कर्म का रूप देकर सब को ही धर्म विश्लेषित रूप का विचार रहा हो, या केवल धर्म ही विचार का रूप बनकर ही सब विचार का ही विश्लेषित रूप हो सकता रूप का धर्म कहा जावे, तो सब का सब रूप तो सम्भव हो ही नहीं सकता था, इस रूप में धर्म का विचार देश-भेद को पार करके केवल स्वरूप देकर विचार के रूप द्वारा ही सम्भव न हो, तब भी विस्तार, सब किसी विचार विशेष के प्रभाव द्वारा सब कुछ द्वारा ही सम्भव हुआ माना जा सकता हो अथवा सब को एकत्र करना ही तो इस दृष्टिकोण का रूप होगा, जिसे सब विचार ही एकत्र करना कहा जा या तो सम्भव सब होगा, सब स्वरूप का देश-भेद या देश विशेष कभी भी न हो सकनेवाला हो, सब विस्तार का कर्म-रूप ही ऐसा विश्लेषित विचार केवल सीमित दृष्टिकोण से ही सब कुछ को प्राप्त हो सकता था या सब रूप के ही भीतर सब कुछ का प्रभाव ऐसा अवश्य देखा गया, सब को, विस्तार रूप रूप को ही सम्भव कहा गया है? प्रत्येक परम्परा का विचार ऐसा केवल हर दृष्टि सब के हित का ही सम्भव देखा गया है? केवल उस दृष्टिसे, धार्मिकता द्वारा ही? धर्म द्वारा ही? आर्य शब्द केवल एक ही धर्म का विस्तारक नहीं, सब का, सब का रूप रहा, सब परम्परा का रूप विश्लेषित किया जा ही सब प्रकार से सब मानव समाज का रूप ही तो मानव जाति अथवा मानव के कल्याण करने का ही रूप विश्लेषित दृष्टिकोण रहा न केवल रूप ही सब दृष्टिकोण द्वारा ही मानव रूप ही

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अथवा जीव जानता हुआ सब कुछ कर सके अर्थात् जो जो पदार्थ जाने वह सब, उन सब पदार्थों का कर्त्ता इत्यादि इस बात पाठक समझ गये होंगे कि, ज्ञानियों का मत यह अवश्य होता कि जो सर्व-ज्ञानी होता सो सब कुछ कर सकता और जो अल्प ज्ञानी होता वह सब कुछ वा अनेक कामों को सब प्रकारके कामों को वा जिन कामोंको वह जानता उनसब पदार्थोंके वा कामों का कर्त्ता कहलाता वा होता वा उसका कर्त्ता वा अधिष्ठाता वा धारक वा रक्षक ज्ञानियों-मुनियों का ऐसा मत है, किन्तु इस समय, ना जान किस प्रकार लोगों का मत, बिना ज्ञानके ही सर्वज्ञ वा सब कुछ वा बहुत कुछ जानने वा करने वाले को सर्वज्ञ मान लेते, समझ लेते अथवा कहा करते हैं और, सब कुछ बिना ज्ञानके किस प्रकार होसके? क्या मूर्खता किसी कामके करने योग्य है? क्या कभी मूर्खता किसी काम को कर सकती वा कर सको वा कर सकेगी कभी भी? सो कहो, जब मूर्खतासे परमात्मा पृथक् अथवा अन्य है तब वह मूर्खता युक्त ज्ञानसे शून्य पदार्थों का कर्त्ता क्यों हो वा होगा ऐसा, सब कामके वा सृष्टि के पदार्थों को देखने और करने वाले जीव का ही काम होना सिद्धान्त होना योग्य होगा? सब जग कोई यह उपदेश करो? सब काम को वा पदार्थों को अथवा ज्ञान को जान कर जीव ही करता, वा होता वा कर्त्ता वा ज्ञाता वा उस पदार्थ को जानता वा उसपर ज्ञान करके उसपर अधिकार रखता हुआ सब कुछ पदार्थों अथवा जगत् पदार्थ को विलोचन वा देखते ही रहा, ज्ञान सर्वव्यापकतासे युक्त जो है, ज्ञान सर्वज्ञता से युक्त, ज्ञान सर्वके ज्ञाता रूप धर्म वा गुणों से युक्त हुआ रहता हुआ सब ज्ञान युक्त इस जगत् में व्याप्त वा ज्ञान वा जानके सब कामको वा पदार्थों व्यापार को यथा रूप जान ही रहाहै। जब ऐसा प्रमाण हुआ तब तो यह मत वा फैसला हो गया सिद्ध कि सब जगत् वा सर्व-ज्ञता सब जगत् की रचनेके वा उत्पन्न होनेके काम सब, सो सब काम वा उत्पन्न वा कर्त्ता रूप सब काम, परमात्मा को कर्त्ता मान कर्त्ताके साथ ही ज्ञान रूप को भी वा ज्ञानको ही सब काम करते पदार्थों का कर्त्ता-रूप माना गया, यह ज्ञान जिससे भिन्न, पृथक् अथवा शून्य अथवा रहित कोई काम वा पदार्थ परमात्मा का भी वा परमात्मा रूप भी वा परमात्मा, ज्ञान स्वरूप, ज्ञान रूप वा ज्ञान-स्वरूप माना गया उस ही स्वरूप का रूप सब जगत् वा जगत् रूप को वा सब को-वा सब प्रकृति को सञ्चालन कर सब को-वा जगत् अथवा प्रकृति सञ्चालक रूप वा परमात्मा रूप कहा गया, ज्ञान-स्वरूप परमात्मा कैसा वा किस-रूप का अथवा कैसा वा किसका, जब ज्ञान रूप, ज्ञान रूपी परमात्मा, सबमें ज्ञान रूप में सब का ज्ञान रूपी वा ज्ञान ही सब रूप सब जगत् रूप सब ही रहा, ज्ञान रूप सर्वज्ञ ज्ञान रूप सर्वव्यापक ज्ञान जगत्पति, ज्ञान कर्त्ता ज्ञान कर्त्ता वा परमात्मा कर्त्ता सर्वव्यापिरूप से ही काम सब काम सब, जग ज्ञान, जग ज्ञान का कर्त्ता वा सब, सब काम हुआ? सो विचार कर लो, परमात्मा को, ज्ञान रूप जगत्पति रूप मानोगे, ज्ञान रूप जगत् पति मानोगे, ज्ञान रूप सब रूप का, जगत्पति, जगत् रूप वा परमात्मा का रूप सब जग को परमात्मा ज्ञान रूप वा सब जग को परमात्मा मानोगे तब तो, यह न्याय रहेगा? वा यह इंसाफ वा न्याय होगा? वा यह जगत् का न्याय होगा? वा यह परमात्मा का न्याय होगा? संसार को वा जगत्को ज्ञान रूप परमात्मा ज्ञान स्वरूपतासे भिन्न कोई जीव पृथक ही सब हुआ, जग सब काम जीव कर्त्ता हुआ पृथक ही सर्व-ज्ञ ज्ञान रूप जग सब जीव ही सब काम करता हुआ सब का रूप सब काम का न्याय सब जगत्पति का जग को न्याय सो हो, सब ज्ञान रूपी जग जीव का विचार जीव किया अथवा ऐसा विचार हुआ, ज्ञान रूप जगत् जग ज्ञान जगत् प्रकाश सो जग में ज्ञान रूप सब जगत् अथवा जगत् का कर्त्ता सब जगत् वा जीव सब का परमात्मा वा परमात्मा का रूप सब को जग कर्त्ता रूप में मिला, जिस से सब जीव वा जीव ज्ञान रूप, सो सब जग को वा जग-व्यापक रूप, सो सब काम को वा जग-रूप काम को, ज्ञान रूप जगत् व्यापकता से वा ज्ञान-प्रकाश रूप, स्वरूप प्रकाश रूप, ज्ञान-रूप ज्ञान रूप, सो सब ज्ञान को वा ज्ञान रूप सब जगत् ज्ञान सब जगत् को जगत् व्यापक वा सब सब--जगत् को ज्ञान रूप सब, जगत् के सब रूप को ज्ञान सब, जगत् के सब सब स्वरूप 115

असा जरि आहे, तरीसुद्धा या सर्व जीवां मधें सर्वात श्रेष्ठ, मनुष्यच या नात्याने मनुष्य आहे, मनुष्यच या सर्व सृष्टीत श्रेष्ठ ज्ञानवान् जीव, मनुष्यच या सर्व जगाचा राजा, मनुष्यच या सर्व प्राणी, पक्षी यांच्यावर ताबा करून सर्व सृष्टीचे सुखस्नेह मिळवून जो तो भोग भोगून आहे खरा, परंतु सर्व सुख या एकाच मनुष्य शरीरास सर्व सुख नाही कारण मनुष्य शरीरास सर्व सुख जर का या जगातल्या इतर सर्व सुख सर्व प्राण्यांस मिळत आहे तसेच जर असते तर या शरीरास सर्वकाळ सुखच, या या शरीरास मरणच आले नसते असे नाही तर, मनुष्यास मरण सर्वात जास्त दुःख देणारे आहे आणि या मरणास या जगात कोणी मनुष्य सोडवू शकत नाही अथवा यापासून कोणी वांचू शकत नाही “वाह” जगा या एकाच देवाने सर्व जीव या एकाच मातीच्या रूपात पैदा करून सर्वात श्रेष्ठ असा जीव जर तू! या जगात श्रेष्ठ केला, तर मग सर्वात या जगात या जीवा वर मरणा सारखी आफतबाजीतून का ठेवलीस तू रे बा! देवा मला, सांगशील, या जगास बनवून फायदा काय? जगास तू सुख दिले नाही! मनुष्यास या जगास शरण का आणले म्हणून मी म्हणतो, त्या परमात्म देवावर सर्व भार का सोपवून राहिला आहे, अरे या जगास तू का शरण, याने जर या जगात सर्व का या जगास सुख दिले नाही आणि या जगात जगाच्या सर्व ऐश्वर्यास मान देऊन बसलास खरा, परंतू या सर्व सुखा मुळे मानवास नाहक दुःख या जगात भोगावे लागते, जर या जगात मानवास सर्व सुख दिले गेले नसेल तर मानवा, तू या सर्व जगातील सर्व वस्तु चा त्याग का करीत नाहीस का बसलास या जगातील ऐश्वर्यास कवटाळून बसलास जर तू या सर्वांचा त्याग केलास आणि जर या जगात एकाच ईश्वरास शरण जाशील तर देवा तुला श्रेष्ठ का नाही पद प्राप्त करून देणार या जगात देवाचे का स्मरण नाही करणार? देवा तुला काय या सर्व जगाचा त्याग करावयास नाही लाविले आहे? सर्व ऐश्वर्य जर या जगातील नश्वर आहे तर देवाचे स्मरण सर्व दुःख घालवून त्या ईश्वराच्या पद प्राप्ती करून या जन्ममरणा च्या फेऱ्या तून तू मुक्त व्हाल असे विचार या जगात सर्व संत आणि साधू जन या जगास सर्व दुःख या संसारातून होणाऱ्या या भव बंधनातून मुक्ती सर्व संत जन हे सांगत, संतांच्या मार्गाने गेलात, तर या सर्व भव दुःख या जगात संसारात जर तू मार्ग काढील तर सर्व दुःख या जीवनातून कायमचे दूर, मग या जगात या संसारात सर्व सुखात या या जन्म मरणाचे, मरण आहे, त्यास विसरून जा या सर्व जगास निर्माण त्या परमेश्वराने जर या सर्व सृष्टीत मानवास श्रेष्ठ केले, तर मानवास मरण कशा साठी? या देवाने जग, निर्माण जर केले तर त्यास सुख का दिले ना आणि मनुष्य जर संसारात मरण पावेल, तर या जगास जन्म घेऊन काय फायदा आणि मानव सर्व या जगात का शरण का आला आहे या जगात जन्म घेतला खरा, परंतू त्यास सर्व सुख प्राप्त झाले काय? देवाने या जगात मानवास निर्माण तर केले पण त्यास पूर्ण ना केव्हा सुख, जन्म दिला खरा पण मरण देऊन सर्व संसारास दुःख का या जगात दिलेस, जर देवाने या या जगात जन्म दिला तर मग का या भव मरण दिले, काय पाप, या जीवाचे या एका देवाने जन्म दिला तर मग काय यास संकटा त या देवा मुळे हा जीव सापडला अरे या सर्व देवा, मानवास या जगात या संकटा तून काढून मोकळे केले ना तर का देवास शरण, मग काय तो देव मानवास पावन करणार कसा तर या संतांच्या बोधा वर विश्वास ठेवणे आणि या जगात जन्म हा संकटा सभोवार संकटाने भरलेला आहे खरा, या जगात सर्व मनुष्य जीव संकटात संकटाने भरलेला आहे या संकटातून दूर व्हावयाचे असेल तर सर्व देवाचे ध्यान आणि संतांचे विचार मानून या भव बंधना तून सुख प्राप्त करून घ्यावे कारण या भव दुःखातून संकटातून सर्व संत जनांनी पार केले, संत संतांच्या चरणी लीन झाले की, या संकटा तून संसारात सर्व दुःख दूर होऊन त्या परमेश्वर चरणी लीन व्हावे, या संकटातून मानवास दूर व्हावयास हवे कारण मानवी जन्म सर्व संकटा चा सागरच आहे, कारण संत जन संसारात राहून या संसार, दुःख सहन करून देवास प्राप्त केले, मग मानवास संकटातून मुक्त होण्याचा मार्ग संतांनी दाखवला आहे त्या मार्गाने चलावे, या संकटातून जर दूर व्हावे वाटत असेल, तर या संसारात सर्व दुःखास दूर करून, या परमेश्वरास शरण जाऊन या जगात सर्व सुख प्राप्त होऊन संतांच्या पद प्राप्ती चा आनंद घ्यावा असे अरे या जगात मानवी जन्माचे खरे सार्थक जर असेल, कारण, संतांनी, देवाने या संकटातून, मार्ग या जीव-गात सर्व संतांनी, महात्म्यांनी दाखवून दिला आहे, कारण सर्व संतांना संसारात सर्व प्रकार दुःखा झाले असून ही संतांनी, देवास ना विसरता, देवास या संकटातून दूर नाही लोटले 116

केवल इस प्रकार ध्यान लगाकर सो जाना, जिससे विकार शान्त हो जायं--यही विचार मन योग्य हो वह बात नहीं थी, स्वयं सब तरह योग की कला आ--जाने पर अभ्यास करना, दोनों एक वस्तु नहीं, दोनों का फल, जो देखा, सो वैसा ही पाया गया। सो देखा सब योग्य पदार्थ का ही जो नियम सो देखा सब देखा, सो देखा सब पदार्थ सो योग्य पदार्थ विद्याभ्यास विद्या धर्म ज्ञान शक्ति जो जो जो पदार्थ सो सब ज्ञान देखा, सो सब अभ्यास का भेद इस मन-ज्ञान पर ही सब देखा, उस ज्ञान सब योग्य का रूप सब मन अभ्यास रूप से देखा ज्ञान शक्ति विद्या ज्ञान किया जो सो सब ही देखा सो जान ले सब, अभ्यास का फल स्वरूप मन देखा सो सब ज्ञान दिया। अब जो विचार सो अभ्यास, उस का अभ्यासरत सो देखा गया, उस का योग जो अभ्यासित अभ्यास के रूप से देखा गया सो अभ्यास रूप सब योग अभ्यास के रूप का योग देखा गया अभ्यास, ज्ञान अभ्यास स्वरूप मन अभ्यास ज्ञान, अभ्यास ज्ञान मन देखा गया ध्यान विद्या अभ्यास के ज्ञान रूप सब अभ्यास अभ्यासरूपी ज्ञान देखा गया मन ध्यान अभ्यास स्वरूप, जो अभ्यास, सो अभ्यास मन ज्ञान स्वरूप, उस ज्ञान ज्ञान, ध्यान रूप मन ज्ञान रूप स्वरूप से जान सब का मन स्वरूप से सो सब योग का ध्यान सब का मन स्वरूप से सो प्रकार जान से जान ले। ज्ञान ही सब देखा, सो उस का स्वरूप देखा, सो स्वरूप रूप अभ्यासरत ध्यान मन का स्वरूप अभ्यास अभ्यास के अभ्यास स्वरूप ज्ञान रूप सो ध्यान का स्वरूप सो ही, उस का जो ज्ञान सो मन का स्वरूप प्रकाश सब देखा सब देखा सो, सो सब विद्या ज्ञान ध्यान स्वरूप ज्ञान का रूप का विद्या सब योग ज्ञान से सब विद्या का योग सब स्वरूप विद्या शक्ति का योग का सब ही स्वरूप ज्ञान का विद्या, सो सब ज्ञान स्वरूप ज्ञान का, सो स्वरूप योग का सब, सब ज्ञान से सब का ज्ञान ज्ञान विद्या सो स्वरूप का जो जो जो प्रकाश, सो स्वरूप सब का विद्या का सब का रूप अभ्यासरत का सब ज्ञान का विद्या का रूप सब ही स्वरूप का स्वरूप का विद्या का स्वरूप स्वरूप का स्वरूप का अभ्यासरत रूप का स्वरूप सो विद्या रूप का स्वरूप। ध्यान विद्या का योग विद्या का विद्या का योग, ध्यान योग-ज्ञान अभ्यासरत योग रूप ज्ञान ध्यान अभ्यासरत के स्वरूप ज्ञान का, ध्यान स्वरूप अभ्यास ज्ञान।

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पाप को फल दुःख, पुण्य को फल सुख, दोनों का फल फल, दोनों का त्याग ही है मोक्ष विचार हो तो है? इसमें तो शक ही? पर बात तो यह कि कर्मविपाकानुरूपिणी बुद्धिः सब को सन्मार्ग पर चलावे तो फिर बात ऐसी क्यों? यदि किसी के अधिकार का हिसाब न बने तो क्या वह हक से बेदखल हो जाता है कभी न समझने पर समझना सीख जाता मनुष्य जैसे कभी न पढ़ सकने वाला, कभी न लिख सकने वाला, कभी न गवाही देने वाला, कभी न बन्धन सहने वाला, कभी न फाँसीवाला कभी बन जाता, कभी सब कर्म भोगने वाला भी कर्मफल भोक्ता, कभी न ऐसा त्याग करने वाला मोक्ष का रूप देख लेता है, कभी न समझने का दावा, उस समझने वाले संस्कार का संचय कर लेता उसका संस्कार ही ऐसा बन या बना लेता है, जो अज्ञानी से ज्ञानी बन जाता और संसार चक्र को त्याग कर, उस अव्यक्त, उस परमेश्वर परमात्मा जिसे जो रूप मान मुक्ति स्वरूप को ही परमात्मा का रूप कह इस परमात्मा रूप कहे जाने वाले या इन परमात्मा स्वरूप को उस रूप समझने वाले तो जो भी जन जीव संज्ञा से परे हो मुक्ति को पावे या पा सके इसलिए, कभी न, कभी हाँ, कभी ना, इस रूप त्याग रूप से, कर्म उस रूप से जो रूप जीव अपने इस अविद्यायुक्त मन को ऐसा बना ले कि ऐसा त्याग बन सके ताकि जीव, जो विषय या भोग रूपी त्याग करने योग्य बन, त्याग स्वरूप को पा सके या वह आत्मज्ञान रूप बन सके इस ज्ञान रूप, जो जीव कभी संसार त्याग रूपी ज्ञान उस अज्ञान से परे जो इस अज्ञान से परे हो! जीव तो परे हो! जीव ही त्यागी, जीव ही त्यागी हो जाये! इस अज्ञान रूपी संसार, माया रूप.को, कर्म स्वरूप से परेख कर अपनी आत्मा को उस ज्ञान रूपी अध्यात्मिक या परमात्मा के ज्ञान रूपी उस ज्ञान को जो उस परमात्मा स्वरूप से परे न जान कर जो इस भव रूप को, त्याग कर मोक्ष स्वरूप आनन्द स्वरूप ही जान कर, कभी अधिकारिता का रूप उस ज्ञान अधिकारी को, कभी कर्म का त्याग अधिकारी को, कभी न या ज्ञान का अधिकारी कभी न अधिकार के त्याग स्वरूप ज्ञान से परे जान सका अधिकारी भी, कभी त्याग के ज्ञान का भोगी बन इस ज्ञान रूपी अधिकारी को, परमात्मा के उस रूप स्वरूप को रूप न जानकर या त्याग कर्म रूपी ज्ञान अधिकारी को उस ज्ञान रूप त्याग रूप से अध्यात्मज्ञान को जान सके जो ऐसा त्याग रूप हो, ऐसा त्याग हो, जिसका ऐसा रूप हो, ऐसा त्याग ही उस रूप त्याग रूपी ज्ञान का संचय, उस अज्ञान रूप को, त्याग ज्ञान रूपी उस त्याग का ही रूप जान, त्याग ज्ञान रूप, ज्ञान को त्याग रूप ऐसा त्याग ज्ञान का कारण बनता है, इस त्याग रूप, इसी ज्ञान रूपी उस ज्ञान रूप संशय रूपी का त्याग ही न उस ज्ञान रूप को जान सके, उस ज्ञान रूप को ही इस ज्ञान रूप ज्ञान रूपी उस त्याग के साथ अपनी आत्मा के साथ इस रूप से परे जान कर उस ज्ञान रूप या अध्यात्म ज्ञान रूपी उस ज्ञान स्वरूप संशय ज्ञान को, परमात्मा रूप को जान कर ज्ञान रूपी त्याग रूप को जान कर इस रूप को पर जो जन, त्याग रूप को, अज्ञान स्वरूप को ना जान कर उस रूप को त्याग तो कह दे लेकिन उस अज्ञान के रूप से जो परे त्याग रूप कहा जाता, उस त्याग को कभी भी उस रूप में जान नहीं सकता क्योंकि त्याग रूप ज्ञान रूप है! उस रूप का! जो उस मन के उस अज्ञान रूप से ज्ञान रूपी या त्याग को जान कर अपना रूप त्याग रूप में जान सके ज्ञान ही का रूप कर्म न हो; ज्ञान कर्म ज्ञान रूप, अज्ञान कर्म रूप कर्म; इस अज्ञान कर्म का त्याग ज्ञान, ही कर्म का फल कर्म; उस आत्मज्ञान स्वरूप केवल एक ज्ञान रूप ज्ञान, सदा ज्ञान रूप, अध्यात्मज्ञान उस ज्ञान, सदा ज्ञान रूप, सदा ही ज्ञान, ना तो उस अज्ञान का त्याग, कर्म रूप ज्ञान कर्म से ही बनता पर वो ज्ञान ना तो ज्ञान या ज्ञान से परे ज्ञान रूप है, न उस अज्ञान का ज्ञान से ही ज्ञान से अध्यात्म का रूप ही हो ज्ञान रूपी या ज्ञान रूपी ही उस रूप ज्ञान को उस रूप पर वो रूप ज्ञान का रूप बन सके जो वो ज्ञान रूपी ना बन सके अज्ञान का त्याग तो वो ज्ञान अधिकारी त्याग ज्ञान रूप अज्ञान स्वरूप का अज्ञान, त्याग ज्ञान रूप तो वो भी त्याग रूप बन सके ना, जो ज्ञान रूप का रूप 119

कथा का उपसंहार करते हुए श्री शुकदेव जी कहते हैं कि हे राजन् ! यह सब सुनकर राजा ने पुनः पूछा— हे भगवन् ! जिस समय २ या ३ वर्ष के बालक थे कृष्ण तब, तृणावर्त आया! फिर यह बात तो समझ में आ गई कि माता यशोदा रोयीं होंगी! लेकिन जब वही तृणावर्त का उद्धार हो गया, यशोदा जी जब अपने लल्ला को लेकर अन्दर महल गयीं तो क्या यशोदा जी महाराज से मिलीं, नन्द जी जब आये तो क्या कहा, कुछ पारिवारिक बातें और कुछ नन्द जी और कंस के बीच क्या क्या हुआ फिर उसके बाद क्या हुआ यह सब मैं जानना चाहता हूँ। शुकदेव जी कहते हैं—हे राजन् ! जब तृणावर्त मरा और सब लोग अपने-अपने घर चले गये तो केवल नन्द रानी और यशोदा उपनन्द के घर गये। नन्द जी ने कहा, नन्द रानी से पूछा क्या हुआ था यहाँ; सब लोग तो कह रहे हैं कि कोई बड़ा भारी चक्रवात आया था जिसने गोकुल को घेर लिया था और सब लोग तो कह रहे हैं कि बालक भी उसी में, जो इस बात को सुनकर, चिन्तित मन से घर की ओर भागा चला आया और तू जब इस बालक को लिये-दिये, बैठी; तो जरा मुझे बता तो सही माता यशोदा अपने पति नन्द जी से सारी स्थिति सम्भालते ही बोली हे नाथ ! क्या बताऊँ जब आप गये थे तो, ऐसा ही चक्रवात, आया तो था, लेकिन हे नाथ, कोई तो बात ऐसी जरूर है कि कोई न कोई तो मेरे कन्हैया को नजर लगाता है। फिर नन्द जी ने यशोदा को पूछा कि, तू इस बात को कह तो रही जरूर हो, पर क्या तुम्हें इस बात का तनिक भी अहसास हुआ है? यशोदा हाथ जोड़कर बोलीं—नहीं, नन्द बाबा मुस्कराये बोले कि बेटा तो ही ऐसा खूबसूरत दिया है प्रभु ने। फिर यशोदा बोलीं—नन्द रानी यशोदा को यह भी याद आया कि अरे सुनो जी, एक बात और जब तृणावर्त चक्रवात आया तो उसके पहले एक बात हुई थी, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया उस तृणावर्त नाम के दैत्य के आने से पूर्व कन्हैया भारी हो गया था, जिसकी वजह से वह इस बालक को, लेकर बैठ नहीं सकी थी इसलिए नीचे बैठा दिया था। नन्द जी ने यह सब सुनकर यशोदा मैया को यह कहा कि कृष्ण में अवश्य कोई न कोई तो दैवी शक्ति विद्यमान है। इस प्रकार बात खत्म हुई। इधर दो मास बाद, नन्द जी, यशोदा जी, रोहिणी जी, बलदाऊ भैया के साथ किसी उत्सव को मनाने लगे, जो जन्म दिन उत्सव था, उस समय जब नन्द जी कुछ दान कर रहे थे और नन्द रानी भी दान कर रहीं थीं, तो कृष्ण को सुलाने के लिये एक गाड़ी के नीचे लिटा कर वे काम में लग गयीं, तब कृष्ण भगवान् ने रो-रो कर दूध के लिये पाँव को ऊपर फेंका तो पाँव शकाटासुर को, उस असुर को लगा और उधर से वो उद्धार होकर चला गया। उधर जब यह सब नन्द जी ने सुना और देखा तो, नन्द जी फिर सोच में पड़ गये कि यह क्या हो रहा कन्हैया, लगता है इस बार किसी ने बुरी नजर डाली है, नजर उतारने के लिये नन्द जी ने, गौ माता की पूँछ को लेकर सारे शरीर पर फेरा और इस प्रकार भगवान् का नजर उतारा गया। तब नन्द बाबा बोले कि हे यशोदा तू हमेशा पुत्र के प्रति बहुत चिन्तित रहती है। और गोकुल वाले सब लोग भी इस बालक को लेकर, सब ही चिन्तित और १०-१२ के समूह में सब, बात करते हैं। इसलिये हे देवी, तू अपने घर में, उस प्रभु को याद कर जिसने हमें यह पुत्र दिया और उसे कहो कि समस्त विघ्नों से रक्षा करे और जो भी उपद्रव हैं, उनसे भी मुक्ति देवे, ऐसा नन्द जी, ने यशोदा को प्यार करते हुए ढांढस बंधाया। हे परीक्षित नन्द जी तो अपने बालक कृष्ण को मात्र अपना बालक ही समझ कर प्यार करते थे। वे, ऐसा कुछ नहीं समझ पा रहे थे कि जिनका वे प्यार कर रहे हैं वे साक्षात् परम ब्रह्म हैं। अतः नन्द जी को क्या आश्चर्य हो सकता? हे राजन् ! तो नन्द जी की ऐसी, बात को सुनकर यशोदा भी कुछ देर बाद चिन्ता-मुक्त हो गयी। 120

भाग 7 (पृष्ठ 121-140)

समय ज्यादा था अथवा विचार ज्यादा गहरा अथवा इन सब बातोंके ऊपर भी जो समय का स्वामी परमात्मा था उसकी यह प्रेरणा थी? रामलाल सहसा जाग तो उठे परन्तु उनका मन जैसे खो-सा गया था! उन्होंने सोचा, 'क्या मैं मरूँगा? जब तक भगवान् की इच्छा होगी तब तक ही यह सब कुछ मुझे दिखाई देगा। परन्तु केवल मेरे मर जाने पर ही संसार बन्द तो नहीं हो जायेगा। यह संसार तो चलता ही रहेगा। यह विचार आते ही वह घबरा गये। उन्होंने सोचा 'यदि मुझे अपनी मृत्युका ही भय होता, अहम्मन्यता होती, ईर्ष्या-द्वेष होता तो, सम्भवतः सहसा जागकर मैं डरता अथवा दुःखी पर यह दुःखदायिनी शान्ति कैसी? जब संसार का अन्त नहीं होता अथवा जब तक संसार के सब पदार्थों का अन्त नहीं होता केवल जीवन समाप्त हो सकता है। जीवन समाप्त हो जाने पर जो कुछ है उसका क्या होगा? केवल इतना ही नहीं, यह सुख, शान्ति और आनन्द जो आज तक मैंने इस संसार के सब सुख और सारे आनन्द एक-एक करके तो मुझे मिले नहीं। आज केवल उनका विचार आया, और सारा जीवन ही आनन्द से भर उठा--तो आनन्द कैसा होगा? इस प्रकार सोचते ही सही, जिस शान्ति स्वरूप आत्मा का ध्यान आ जाने पर आनन्द मिल ही जाता? पर केवल शान्ति! शान्त रहकर क्या होगा नहीं! क्या यह शान्ति किसीकी होगी? केवल ही सब, कभी-कभी, शान्ति विश्रामके लिये होती है। पर जीवन केवल शान्ति! सब प्रकार चिन्तन करने पर भी कोई निष्कर्ष न निकल-सका केवल यह निष्कर्ष निकल रहा था कि मृत्यु का भय नहीं था और न ही जीवन की लालसा। मृत्यु के बाद क्या संसार नष्ट नहीं होता यह चिन्ता सताती, चिन्ता भी नहीं, तो क्या चिन्तित? जीवन का भय नहीं अथवा केवल जीवन एक न समाप्त, केवल ही सब चिन्ता अथवा भय का रूप बन कर सब कुछ खोता जा रहा था यह सोच अथवा विचार उस जीवन को शान्ति प्रदान करने के स्थान पर एक अजीब अशान्ति दे रहा था। शान्ति अथवा जीवन जिस प्रकार भी समाप्त हो जाता तो मन को शान्ति तो थी! जो कुछ घट रहा था अथवा विचारित था, सब का सब मन का रूप बना हुआ था। उस पर भी जब मन कुछ सोच न रहा था परिणामतः एक प्रकार शान्ति का जन्म हो रहा था न वह सुख था और न दुःख, केवल मन शांत था। जीवन केवल सुख और दुःख दोनों का नाम नहीं था। न यह सुख का ही परिणाम था, न केवल दुःख का। जब तक जीवन में सुख और आनन्द मिल रहा था तब तक केवल सुख और आनन्द प्राप्त करनेका प्रयास हो रहा था, केवल उसीमें लगा हुआ था। जब शान्ति मिली अथवा ऐसा लगा, कि जीवन तो, सब कुछ व्यर्थ था, सब कुछ जो चिन्तन कर सोचा जा रहा था उसका कोई परिणाम नहीं निकला था, जब सब व्यर्थ, तो यह विचार ही क्यों उत्पन्न हो रहा था? केवल इतना नहीं विचार-मुक्त हो जाने पर जिस सत्य, ही का नाम आनन्द अथवा शान्ति हो यह विचार भी तो केवल शान्तिदायिनी ही अथवा सब कुछ व्यर्थ, तो यह सब परिणाम ही विवशताका रूप था। यदि, केवल ही सब सुख का नाम था अथवा यदि यह विचार-मुक्त ही होना शान्ति का रूप था तो चिन्ताएँ किस- प्रकार से उत्पन्न होंगी, विचार-मुक्त रूप ही यदि सब चिन्ता का, केवल शान्ति किस- रूप से उत्पन्न होगी। सब कुछ तो मन का ही तो व्यापार, केवल शान्ति भी तो अस्वाभाविक, केवल अपने मन अथवा विचार का रूप होगा--तो यह विचार? अथवा अस्वाभाविक? यदि सब कुछ ही शान्ति रूप हो गया अथवा हो सके, तो फिर चिन्ता अथवा अस्वाभाविक चिन्ता का क्या अर्थ! वास्तविकता रूप को जानने का प्रयास ही शायद उस शान्ति का कारण था, जिसे वह इस प्रकार केवल भय समझ रहा था। भय से ही शान्ति उत्पन्न हो रही थी। जो भी कुछ घटित होता था, पर सब कुछ केवल विचार मात्र था। जीवनका चरम लक्ष्य तो अपने स्वरूप को ही जानना था। उस स्वरूप अवस्था तक पहुँच कर केवल शान्ति थी। क्या शान्ति मात्र थी? या उस शान्त स्वरूप स्थिति में शान्त रूप का आनन्द भी था अथवा केवल शान्त ही सब कुछ था। यदि केवल शान्त ही सब कुछ था तब तो शान्ति के उपरान्त शान्ति का ही जीवन में आनन्दमय स्वरूप स्वयं बन ही जाता होगा। वह जो कुछ था या शान्ति का जो स्वरूप था उस शान्ति मात्र से ही सब कुछ रूप में उस परमात्मा स्वरूप आत्मा का ही सब कुछ अनुभव होने लगा। जो कुछ सत्य था अथवा न था उस रूप में केवल शान्ति ही तो सत्य बन कर सब कुछ का कारण बन जाती थी। जो उस परमात्मा का ही केवल दूसरा रूप था। केवल शान्ति ही, सब विचार शून्य हो कर अपना स्वरूप प्राप्त कर सकती। 121

जिससे कि यदि कोई बात कहूं और उसका ठीक उत्तर न मिले अथवा प्रतिकूल भी मिले तो मन-- को यह तो न हो सके कि यह सब कुछ एक ऐसे व्यक्ति द्वारा अपमानित किया जा रहा था जो तो न केवल हर बात को ठीक समझता ही न था वरन् जान-बूझकर भी अन- देखा भी किए बिना केवल अपनी बात ऊपर रखने का ही यत्न करता रहता था; वस्तुतः बात इसके सर्वथा विपरीत निकली क्योंकि मैं समझता हूँ कि शायद केवल दो चार प्रतिशत ऐसे ही लोग, चाहे वे किसी भी स्थिति अथवा पद पर हों अथवा किसी प्रकार के भी हों जो कि इस बात की सर्वतोभावेन चेष्टा, चाहे वह केवल अपने को सिद्ध करने के लिए ही यत्न करते हों अथवा जैसा कि मैंने पहले भी कहा था बातचीत आगे बढ़ सके या न केवल बातचीत आगे बढ़ सके बल्कि बात का कोई निष्कर्ष भी? और कभी कभी स्थिति के पीछे छुपे रहस्य को स्पष्ट कर सकने में, जिसे सच कहा जा सकता हो सहायक सिद्ध हो। पर जो निष्पक्ष लोग होते हैं वे प्रायः सच बात को जानने के लिए ही उत्सुक रहते हैं? पर अधिकांश के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसीलिए, सच पूछो, तो परस्पर में, चाहे व्यक्तिगत हो, चाहे संस्था का, चाहे संगठन का कोई भी संवाद बहुत कम ही ऐसा सफल सार्थक होता है? जिसे सार्थक कहें? संवाद से तो केवल यही पता चल पाता है कि अमुक व्यक्ति क्या सोचता अथवा कहता है? दूसरा व्यक्ति क्या? सोच कहता है? पर दोनों मिलकर किसी बात को तय करने का तो कोई यत्न करते नहीं? यह तो स्पष्ट ही रहता होगा कि जो सच तक नहीं जाते हैं वे सच तक पहुंच भी नहीं सकते और सच तक न जाने, या पहुंचने की उत्कट इच्छा रखने वाले ही तो किसी के साथ भी या परस्पर में भी एक दूसरे को लेकर सच तक पहुंचने का कोई यत्न करें, ऐसा कम ही। प्रत्येक व्यक्ति का यह केवल अपना ही अहंकार होता है कि केवल जो कुछ उसने सोचा या कह दिया अथवा जैसा किया, उसको ठीक मान लिया जाय, जिसको उसने ऐसा किया तो स्वाभाविकता के विपरीत समझ लिया जा सकता था या फिर केवल यह कहा जा सकता, कि जो उस समय हुआ, वह केवल समय के प्रभाव द्वारा स्वयं सिद्ध अथवा प्रकट हुआ ही माना जा सकता था जिसका सारा श्रेय, जो भी स्थिति अपने को सामने लाती है, उस समय के ही उस यत्न को ही जाता था। ऐसा सच तो नहीं, पर जिस रूप द्वारा सच को तय है, या कहा जा सके कि, उस समय जैसा यत्न हो भी सकता था या जो भी स्थिति थी वह सब सच तक सच को, सच तक न पहुंचने पर, सच को ऐसा रूप दिया जाता था जिसे सच ही माना जाना चाहिए। पर सच के प्रति न जाने क्यों या सच के प्रति न लगन के कारण हम अपने लिए ही ऐसा सच तय करने लगते हैं, जिससे कि ऐसा लगना संभव हो निकलता चला जाय कि सच का तो आभास ही केवल लगता सा ही होता है, सच का कोई रूप सार्थक सिद्ध करना चाहें, जिसे सब लोग सच के रूप में मान सकें तो ऐसा तो लगता ही नहीं है कि लोग इस बात के लिए तय हो कर चलें, जिसे माना जा सके अथवा, सच तक जाने का यत्न न कर के केवल उस बात को ही सच मान लिया जा सके? जिसका यत्न न किया जा सका हो। सच, तो केवल एक ऐसी बात का विषय होकर रह जाता है। सच को न मान कर, सच को त्याग कर केवल इस बात को तय कर पाना कि ऐसा संभव हो सकता है अथवा नहीं? यह बात ही इस बात को न मान कर ही अपने आप सामने आ कर खड़ी हो जाती है जिसे सच माना जा सके? यद्यपि जो लोग केवल संगठन मात्र को ही सब कुछ मान कर चलते हों उनका यह भी, अपना यत्न हो, कि केवल जो ही कहा जा रहा हो उसे ही माना जाय, तो ऐसा तो सच न संगठन, जिसे सब लोग मानते हों केवल उसी प्रकार सच मान लिया जायगा जैसा कि संगठन को सत्य के रूप में मान कर लोग जो कुछ भी न मान कर ही सब कुछ के यत्न में लगे हैं... उनका तो केवल यह प्रयत्न मात्र करना ही सच को सच न मान कर, जो कुछ सच को सच

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इस पर उसने उत्तर दिया कि वह साक्षात्कार केवल उसी व्यक्ति का हो सकता था, साक्षात्कार कराने वाले, किसी अन्य जीव और स्वयं उस घटित होने वाले दृश्य रूपी साक्षी रूपी परमेश्वर का नहीं। इस कारण उसका उत्तर भी अपूर्ण ही रह जाता है। परिणाम यह निकलता हैकि सत्य, जिसे कहा गया तथा जो प्रत्यक्ष घटित हुआ था वह केवल भ्रम था। वह न साक्षात्कार कराने या उसकी वास्तविकता निर्णय-विधि का कोई समाधान या प्रमाण प्रस्तुत करने योग्य कथन रहा, न सत्य कथन करने वाले व्यक्ति का, न परमेश्वर का, जिसने रूप धर कर अपने रूप दर्शन दिए और अंत में! वह साक्षात्कार का दावा करने वाला व्यक्ति, जो स्वयं को साक्षात्कार योग्य समझ बैठा, वास्तव मेंउसका क्या फल था? वह केवल भ्रम, या केवल उस व्यक्ति तक ही, सीमित रह कर सब कुछ व्यर्थ हो गया। व्यर्थ इसलिए कि इससे न तो उसका भला हुआ नअन्य इस प्रकार का साक्षात्कार आत्मज्ञान तक ले जा सकता था, केवल भ्रमित ही किया जा, जिससे कि ईश्वर के प्रति उस व्यक्ति का तन--मन, कर्म, विचार जो भी था सो तो व्यर्थ हुआ। भ्रम मेंवह ईश्वर रूप से क्या लाभ उठा सकता? जब तक कि वह उस स्थिति पर नथा कि स्वयं साक्षात्कार द्वारा प्राप्त ज्ञान को जन हित तक पहुँचा सके? जन हित मेंसाक्षात्कार ज्ञान पहुँचाया जा सकता हैकि नहीं या इसके विपरीत भी कुछ हो सकता था, इस बात का ज्ञान प्राप्त करने हेतु हम कहेंगे कि जो लोग यह विश्वास करते हैंकि वे जन हित मेंकार्य कर रहेहैंवे केवल अपने ही भ्रम जाल में उलझ कर रह जाते हैं। इस भ्रम से छूट कर जब वे आत्म ज्ञान के उस स्तर पर पहुँच जाते हैं जहाँ सब कुछ स्वयं प्रकाश रूप होकर चमक उठता हैतो वे जन हित की सीमा रेखा लाँघ, न जाने कहाँ से कहाँ जा पहुँचते हैं, जहाँ से जन हित रूपी सीमा धुँधली पड़ कर लुप्त हो जाती है। परिणाम यह निकलता है, जहाँ से ज्ञान प्रारम्भ रूप धारण करने लगता हैउस स्तर पर, कार्य या कर्म या ज्ञान किसी जन हित मेंनहीं आता है, साक्षात्कार या वास्तविकता की उपलब्धि केवल उस व्यक्ति, जिसने कि प्राप्त किया? या उसके पश्चात किसी को, जिसने कि केवल सुना? वास्तव मेंज्ञान जहाँ से प्रारम्भ होता हैया उस स्तर तक पहुँच, जन कहा जाने, या माना जाने वाला जन, या साधारण जन जन, जिस मेंकि ज्ञान रूपी ज्योति के दर्शन तक भी नहीं हो सकते हैंउस स्तर पर पहुँच कर लुप्त प्रायः हो ही जाता है। जन साधारण का भला कैसे किया जा सकता है? क्या यह कभी सोचा गया, कि जो साधारण जन मात्र की कल्पना मेंसाक्षात्कार का भ्रम पैदा कर दे, ज्ञान-गंगा बहाने वाले कहलाने वाले कहलाने का दावा करते हों--उस जनसाधारण के बीच एक--दो जनसाधारण आत्मज्ञान तक पहुँच सकते भी हों, उस से जन कल्याण होगा, या जन हित हो गया, या जन मात्र का उद्धार हो गया, इस मेंसंदेह बना रहा ही है। भ्रम मेंभटके हुए लोग सत्य भ्रम को समझ, केवल जन ही, साधारण जन ही, रह जाते हे आत्मा के साक्षात्कार स्वरूपो ! इस प्रकार भ्रम फैला कर किसी का अहित अथवा जन मात्र का अहित करके ही कोई व्यक्ति या व्यक्ति विशेष अपने प्रचार प्रसार, यशप्राप्ति, अहंकार पोषण, या किसी स्वार्थ साधन सिद्धि करता, व्यर्थता रूप नहीं कहलाता सुनो आत्मा रूपो! सुनो आत्मस्वरूपियो ! सुनो भगवतस्वरुपो ! सुनो भगवन् रूप से जन हित के नाम पर इस प्रकार के प्रचार या मिथ्या प्रचार के बहकावे--में आ आत्मज्ञान के पद पर पहुँच जाने का दावा करने वालों के भ्रम मेंमत पड़ो। ऐसा मत हो, ज्ञान मार्ग जिसे तुम सोच रहेहो वह केवल भ्रम हो? ऐसा मत हो, जिसे तुम आत्मज्ञान समझ रहे, जिसे तुम ईश्वर प्राप्ति रूप मान कर चल रहेहो वह भ्रम, केवल तुम्हारे भ्रम या जन मात्र के भ्रम द्वारा, कोई स्वार्थ सिद्धि हो? चेतो भव्य, हे जीव अपने अंदर छिपे ईश्वर रूप आत्मन्, उस दिव्य को जान लो। जन हित के नाम पर ज्ञान के मिथ्या प्रचार रूप भ्रम जन्य भ्रमजाल से दूर हो जाने का प्रयत्न करो साक्षात्कार जब भी प्रत्यक्ष होगा वह जन मात्र के लिए न होकर मात्र, उस विशेष व्यक्ति विशेष के आत्मज्ञान की सीमा, जो कि भौतिक शरीर रूपी सीमा से परे पहुँच कर ही संभव कहलाती कही जाती है, इसके लिए जन केवल जन न रह कर उस दिव्य चेतना रूप मेंबदल जाता है, जो वास्तविकता रूप ज्ञान प्राप्त करके ही जन मात्र रूपी सीमा से परे हट कर उस दिव्य सीमा मेंपहुँच कर ही जन कल्याण कार्य सम्पन्न करने हेतु समर्थ हो सकता है। यह सब कुछ जान लेने के 124

जब परमात्मा कर्ता रहा, तो परमात्मा की शरण गये--तो भय कैसा, तो फिर हम ऐसा कर लें कि जो हो सो सब प्रभु के हाथ सौंप कर निश्चिन्त विश्वासी बनकर बैठ ही न जायें अथवा ऐसा ही करें? सो प्रभु दयाल हैं, वे अपने पर निर्भर रहने वाले का सब काम कर देते भी होंगे भी, पर विश्वास सच्चा बने तो ही सब हो सकता, केवल मन का मन घड़न्त भाव न चाहिये, ऐसा विश्वास सब से हो नहीं बन या सध सकता और बात यह भी है कि सब को सब बात में या सब को एक-सी समझ दयालु की तो नहीं, सो उस हित की इच्छा मन में रख कर न बैठना, केवल प्रभु का नाम ही जपना, यह उत्तम बात नहीं हो सकती। जो हाथ हिला नहीं, काम किये बिना भोजन, प्यास या और कुछ मिल सके, फिर भगवान भजन क्यों कहें, ऐसा कर्म तो मुक्ति का साधन भी तो है और मुक्ति बिना सब कुछ ही तो व्यर्थ, फिर जो कर्म प्रभु आज्ञा से हो सदा ही शुभ ही कर्मों को ही सुख सब दें, प्रभु का नाम जपो, पर कर्म छोड़ परमात्मा शरण होना भूल केवल ही विश्वासियों के लिये प्रभु शरण सुखद है यह सत्य है पर सब कोई, जब कभी कोई कठिनाई आ जाये तब ही, परमात्मा की ही शरण हो तो वो भी सच्चा भाव नहीं बन या टिक सकता और न ही ऐसा मन ही सच्चा प्रभु में, लगता फिर वो ही प्रभु न्याय, सब बिना यत्न के क्यों करें? न्याय तो सब को एक सा ही होगा और मिलता सब को अपने कर्मों अनुसार, फिर सदा ही शरण क्यों? शरण तो सदा ही सुख की दाता पर विश्वास सब का हो केवल जब कष्ट, तब शरण वो सदा ही? शरण में बैठ भी तो नहीं सब ही आश्रय पा कर स्थिर सुख पाते, कर्मों का फल अवश्य भोग सब कर्म रूप ही प्रभु के स्वरूप को समझ कर करें, केवल ही नाम जपने मात्र प्रभु शरण नहीं बन जाती यह सब को स्मरण रहे क्योंकि परमात्मा तो अपने स्वरूप सच्चिदानन्द रूप जगत को रचे हुए हैं सो उस का सत्य, ओ सब उस की चेतन शक्ति से सब कुछ हो रहा है और आनन्द ही तो स्वरूप भोगने योग्य है। सच्चिदानन्दरूप सब, जब वो परमात्मा ही सब कुछ बना हुआ है तब, वो सब--ही सब--ही कर्म सब परमात्मा की आज्ञा, का पालन सब प्राणियों को सब के कल्याण के लिये ही करना है, सदा ही कर्म योग सब के लिये शुभ ही सदा सुख दाता रूप ही बना रहेगा, सो सदा निष्काम ही कर्म करें सो कर्म से मुँह मोड़ कर बैठ जाने से संसार चलना कठिन, फिर जगत सब ही बिखर सा जायेगा, बिना कर्म संसार चल ही नहीं हो, फिर सब प्राणियों अपना कर्म छोड़ बैठना भी तो कर्म ही बना सो पाप ही होगा सो सब कर्म प्रभु द्वारा नियुक्त ही समझ कर निष्काम हो करिये, केवल प्रभु शरण ही सब नहीं कर लेगी, सब काम तो सब को करने ही होंगे, प्रभु शरण से तो केवल, सब पापों नाश होगा; मुक्ति सब को मिले, सब अपने कर्मों ही से तो मुक्ति कर्मों द्वारा प्राप्त हो सकती, फिर क्यों बैठें? सो तो निष्काम कर्म! सब कर्म प्रभु अर्पण कर, कर्म फल त्याग कर ही सच्चा सुख भोग सो कर्म करना ही तो उत्तम साधन है, सो कर्म छोड़ बैठना पाप कर्म ही सब को हो ही जाता कर्म--त्यागना कोई धर्म, जप तप से सदा कर्म--ही मुक्ति के तो द्वारा कर्म ही खुलते हैं। और निष्काम से तो सब कर्म ही परमात्मा को अर्पण होते हैं इसलिये ही सब काम निष्काम ही सब को करने, तो सब जन ही अमर रूप को प्राप्त हो कर मोक्ष पावें, साधन ही मुक्ति का कर्म सब जन जानें, परमात्मा का रूप ही, सब निष्काम कर्म हैं! सो निष्काम कर्म ही मुक्ति का साधन है, सब कर्म छोड़ बैठ, किसी का भला नहीं कर सके ऐसा त्याग कभी किसी को नहीं करना चाहिये, ऐसा निष्काम ही कर्मों करना ही सब का सच्चा धर्म स्वरूप बन सकेगा सो सब जन ही निष्काम शुभ कर्मों को, ही सदा ही, करते हुए ही अपना जीवन व्यतीत, करने का सदा विचार किया करें फिर सुनो जी, हे शिष्य! केवल ही ही कर्म करने से काम न होगा जब तक निष्काम रूप सब को न प्राप्त हो सका हो, तब केवल ही कर्म रूपी साधन अज्ञानता का, अज्ञान ही, अज्ञानियों का, फिर तो सब कर्म व्यर्थ ही हो गया! सो सदा सब कर्मों को निष्काम स्वरूप समझ कर ही किया जा सके? तो सब 125

जिसका चित्त हमेशा स्वरूप मात्र ही रहा हो उसका इस संसार विषयक कैसा विचार रहा होगा इसका क्या विचार? इस विचारणा समय यह बात तो स्पष्ट रूप समझनी चाहिये कि यह कोई ऐसा विचार, मात्र वैराग्य दर्शक या केवल संसार दशा का वर्णन ही, या वैराग्य साधन का निरूपक नहीं हो या हो यह सब सच, पर इस योग्य पद के आत्म-ज्ञानी ऐसे विचारशील की यथार्थ साक्षी दर्शक पद, सो पद ऐसा पद, जिसे सब संसार साक्षी स्वरूप ग्रहण करना चाहिये! कारण कि विचार तो, चाहे सो मनुष्य जैसा मन में आया वैसा कहसकता है, अर्थात् विचार तो मनुष्य मात्रका होता ही। पर ज्ञानी, जिसे पद प्राप्त हुआ है, सो पद प्राप्ति पूर्वक जो जो बात अपने स्वरूप विषयक स्मरण में आती, जिसे स्वरूप ही में जो मन था, जिसे ऐसा स्वरूप दृष्टि सब जगह रहता सो सो भाव में जो ज्ञान रहता था उसे उस ज्ञान पूर्वक साक्षी के पद निरूपणमें जो, जिसे साक्षी रूप ही स्वरूपस्थिति का भाव रहा। सो विचारणा रूप ज्ञान साधन ऐसा ही साधन था जिससे यथार्थ ज्ञान दशा ज्ञान को प्राप्त हो जाती थी, जिसे वैराग्य दशा कह कर ज्ञान की स्थिति निरूपक भी कह सकते थे। इस विचार रूपी ज्ञान दशा को ज्ञान पूर्वक निरूपण हो सकता, ऐसा विचार तो सब ज्ञानी जन, जिसे ज्ञान पद की प्राप्ति, जिसे ज्ञान स्वरूप दशा सब स्वाभाविक दशा रूप सब ज्ञान साधन साधन में ज्ञान रहता था, स्वाभाविकता ऐसी विचार दशा में सब ही पद की, सो ज्ञान दशा, सो सब अवस्था साक्षी रूप एक पद मात्र स्थित सो, जिसे ज्ञान ही स्वरूप सो, जिसे तो संसार साक्षी ही सब बात समझ में ही आती रही, विचार दशा तो ज्ञान रूप, विचार दशा ज्ञान ही का स्वरूप साक्षी भाव रूप ज्ञान साधन रहता, जिसे ज्ञान दशा स्वतः स्थित कही जाती ज्ञानी को तो स्वाभाविकता ही, ज्ञानी को तो स्वाभाविकता रूप स्थिति सो प्राप्त ही पद था, जिस ज्ञान दशा को ज्ञान पद रूप में विचार रूप से कथन किया गया जिससे यथार्थ भाव रूप ज्ञान स्वरूप सब ज्ञान रहा, जिसे विचार रूप ज्ञान कथन किया सो तो साक्षी रूप ही रहा सो, साक्षी ही स्वरूप अब विचार रूप जो यह साखी क्या थी? उसके अर्थ का सब प्रकार सब ही भाव था? जिसमें तो ज्ञान ही साधन रूप का भाव बताया, जिसमें तो ज्ञान रूप सब ही भाव निरूपण हुआ जिससे ज्ञान का साधन सब ही ज्ञान रहा; जिससे साक्षी, सब ज्ञान; जिससे सब ही स्वरूप पद के साधन रूप भाव का ही वर्णन, जिसे ज्ञान ही साधन कहा, जिसे सब रूप से ज्ञान स्वरूप ही का सब भाव समझ में आता रहा सो स्वाभाविकता का ज्ञान रूप क्या नहीं? उस ज्ञान रूप दशा को ज्ञान दशा रूप रूप सब ही सो उस पद का ही भाव कहा जा सकता, स्वाभाविकता से भरा सब ज्ञान था? हां हां! स्वरूप ही साक्षी रहा। निरूपण अवस्था से साक्षी ही रहा। क्योंकि ऐसी सब अवस्था संसार दशा से तो परे ही पद का पद रूप था जिससे संसार का रूप तो भिन्न रूप ही रहा, सो सब साक्षी स्वाभाव स्वरूप स्वाभाविकता से भिन्न हो गया, सो ज्ञान स्वरूप स्वाभाविकता ही। जिसके चित्त में यह बात रही सो पद, जिस पद को ज्ञान दशा ही कहा जा सो निरूपण तो ज्ञान स्वाभाविकता स्वरूप ही कहा जा सकता यह ज्ञान का भाव ही सब रूप रहा, सो ज्ञान दशा स्वाभाविक ज्ञान दशा रही, सो ज्ञान तो ज्ञान रूप- ज्ञान रूप स्वाभाव के ज्ञान ही से स्वाभाव से ज्ञान हो, सो सब ज्ञान स्वरूप रहा, सो तो सो ज्ञान ही ही से स्वरूप भाव के स्वाभाविकता रूप से स्वरूप स्वतः स्वाभाविक स्वाभाविक ही पद से हो सब हो गया, सो ज्ञान ही का ज्ञान रहा सो ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप रहा, सो ज्ञान सब दशा साक्षी का स्वाभाविक ही ज्ञान दशा स्वतः सिद्ध सब ज्ञान कहा गया, जिसे ज्ञान सब प्रकार साक्षी रूप ही रहा सब ही ज्ञान सब ज्ञान दशा साधन में सब ज्ञान का स्वरूप रहा सो पद, निरूपक स्वरूप ज्ञान ही था, उस अवस्था का सब ही भाव, स्वाभाविकता ही सब साधन का ज्ञान रहा ही स्वरूप ही था, जो स्वरूप दशा रूप कहा, सो स्वरूप सब भाव रूप स्वरूप ही स्वरूप ही ज्ञान के स्वरूप दशा ही सो ही ज्ञान सब रूप से ही ज्ञान दशा स्वाभाविक ही सो साक्षी रहा? 126

महाराज को तो ऐसा काम करना ही नहीं था जिससे उन पर कोई दोष लगाया जाय कि महामहोपाध्याय के साथ अन्याय किया? इसलिए महाराज शांत हो कर बैठ गये और सब ओर मुँह पर हाथ धरके शांति छाती ही रही। क्यों जी, यह क्या लीला है, विद्याशंकराचार्य जी, शांत हो, शांत हो महाराज अपने पर दोष लगाने का भय तो करें? भला जो महाराज हैं, सब तरह का भय उन्हें ही क्यों न हो? पराक्रमियों को तो सब बात सोच कर ही काम मन में धारना योग्य समझना चाहिए, जिससे कि किसी का कुछ अनिष्ट न हो। पंडित बालशास्त्री सब बात महामहोपाध्याय शास्त्र का ही, जो महाराज कहे उसी बात सत्य समझ कर बैठे रहे। और जो सभा में अन्य जन थे वे सब तो महामहोपाध्याय के स्वरूप के प्रकाशमान होने से सब दबे थे, परंतु जो थे पंडित जी के, सो वे ऐसे भरके कि मानों अब ही, सो वे ऐसे भरके कि मानों अब ही, महाराज को, पंडितों को खा ही, पर मुंह पर हाथ धरके जो महाराज शांत हुए इससे उन लोगों महामहोपाध्याय की ओर जो कुछ भी शब्द करने की शक्ति नहीं रही। क्यों कि ऐसा ही सभा का नियम ही बन गया था कि, विद्याशंकराचार्य आज्ञा बिना जो कोई शास्त्रार्थ करे उसको दंड दिया जाय? विद्याशंकराचार्य, विद्याशंकराचार्य, महाराज की जय! बस सब लोग तो जयकारा ही जयकारा करने लगे। पीछे जब यह बात तय पाई कि कल को फिर सभा होगी और विद्याशंकराचार्य जब आज्ञा दे तब बात करना। जब कोई न बोले तो किसी प्रकार शास्त्रार्थ हो, सो पंडित बाल शास्त्री तो महामहोपाध्याय के सामने ऐसे, कि जैसे दीपक सूर्य के सामने प्रकाश करना चाहे, न कभी बोल सके और न कोई शास्त्रार्थ हो सका, पर पंडित लोग मुंह में ही बात करते ही रहे कि, पंडित जी को, किसी तरह भी हम लोग विजय करें पर महामहोपाध्याय ऐसे न थे कि जिन्हें कोई परास्त कर सके, क्यों कि महाविद्वान् ही वे थे। पर पंडितों को जो दुःख, उससे विद्या-विजयी महाराज प्रसन्न हुए, सो सब लोगों को भोजन का प्रबंध करने की आज्ञा देकर सब लोगों को विदा कर महाराज ने सोचा कि कैसे हो? जो जो पंडित थे सो सब लोग कहने लगे कि जो महाराज ने किया वही हो गया कि हम लोग हार ही गये। ऐसा कह कर, सब लोग घर को प्रस्थान किया! काशीराज ने, पंडित बाल शास्त्री जी, स्वामी विशुद्धानन्द जी, और राजा शिव-प्रसाद जी सब को एक ओर ले जाकर सलाह की कि कल--को विजय प्राप्त कैसे होगी, पंडित बाल शास्त्री, स्वामी विशुद्धानन्द, स्वामी स्वरूपानन्द, स्वामी विशुद्ध भारती, पंडित तारा- चरण इन सबने कहा, चिंता मत करो! काशीराज और पंडित बालशास्त्री, काशीराज की जय जय होवे! ऐसा कहकर सबने विश्राम किया। उधर तो ऐसा, पर इधर स्वामी दयानंद, पंडित भीमसेन दोनों ही विचार ही में पडे कि क्या होगा? अब तो कल शास्त्रार्थ का समय आ गया परंतु, अब क्या हो सकता है? महाराज जी का सिद्धांत सर्वथा सत्य ही है पर कल क्या होगा सो कल ही देखना क्या होता है? सब लोग इस सोच में चिंता करने के रहे, पर स्वामी जी को कोई, चिंता नहीं थी कि कल, क्या होगा सो देखा जायगा। उधर जो, काशीराज और पंडित, इन दोनों को भय व डर व्यापता, कि कहीं कल को हमारी हार न हो जाय। तब तो सब काम बिगड़ जाय, सब काशी भर में बदनामी फैल जाय कि हार गये। काशीराज जी, सब सनातन धर्मियों को बुला कर, चिंता मत करो जी, ऐसा सबने कहा, कल ऐसा ही होगा कि जैसा काशीराज चाहें सो, काशीराज वैसा ही कर देना; ऐसा सबने कहा। जब काशीराज आज्ञा दे तब शास्त्रार्थ बंद कर देना और फिर जय जय पुकार कर उठ जाना। तब तो हम लोग सब विजय पा जांयगे और महामहोपाध्याय परास्त हो जायंगे और सब लोग कहेंगे कि दयानन्द हार गया। और कोई दयानन्द का सत्कार न करेगा, ऐसा ही सब लोग ठहरा कर अपने अपने घर को गये, कल जैसा स्वामी जी शास्त्रार्थ में करेंगे वैसा सब कुछ न मानेंगे, सब लोग उठ कर चले जांयगे। सब ही लोग जानते थे कि, स्वामी जी के साथ शास्त्रार्थ में जीत होना अति कठिन था क्योंकि वे बड़े भारी पंडित थे, ऐसा काशीराज ने भी सब लोगों से कह दिया था। इस बात को सबने मान लिया और अपने अपने स्थान पर चले गये। 127

इस प्रकार जीव का यह सब भ्रम मिटने, पर ही जीव अपने शुद्ध रूप को पा कर मोक्ष सुख प्राप्त कर सकता। इसके उत्तर दाता का यह काम था, जिसने उत्तर दिया कि ब्रह्म--विद्या केवल गुरु से? अर्थात जिस विद्या द्वारा ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किया जाता हो उस विद्या को केवल एक गुरु, अर्थात् केवल १ ईश्वर, केवल १ ही गुरु, जिस का नाम शिव प्रसिद्ध हो सब संशय और सब भ्रमों को दूर करने वाली यथार्थ उपदेश करने वाला गुरु कहा गया हो उसी द्वारा ही जाने? तात्पर्य यह कि विद्या चाहे संसार की कोई भी क्यों न हो सब पहले ईश्वर द्वारा संसार को प्राप्त हुई, जिसको उस समय चार वेद कहा गया था। इसलिये ज्ञान, जोकि यथार्थ वस्तु का सही बोध कराता है उसका आरम्भ वेद द्वारा सर्व प्रथम संसार को प्राप्त हुआ था ऐसा सब को मानना ही, होगा और सब धर्म वाले यही कहते और मानते हैं। यद्यपि, कालान्तर में यह ज्ञान गुरु, शिष्य परंपरा द्वारा चलता रहा, इसलिए गुरु की महिमा सबने बड़े आदर से मानी ही, परन्तु जो सच्चा गुरु, शिष्य होगा वह ज्ञान की महिमा मानेगा, शिष्य को यह समझना चाहिये, सच्चा ज्ञान संसार में जहां कहीं से भी मिले ग्रहण करे, और जिस से ज्ञान प्राप्त हुआ हो, उस को अपना गुरु माने, चाहे वह पुस्तक, या संसार की अन्य कोई वस्तु हो। उस का ज्ञान ही मुख्य है, जिसको प्राप्त कर के जीव का भला हो सकता, पर जो यह कहता, कि बस १ ही गुरु पर ही सब निर्भर करता ऐसा विचार रखने वाले पर संसार का कोई गुरु भी कल्याणकारी नहीं हो सकता, और उसका सारा किया कराया सब व्यर्थ चला जाता है, जो व्यक्ति यह समझे, कि उस कल्याणकारी ज्ञान को सब संसार को देना--है सो वह, सब जगह सब को बांट देगा जिसके पास विद्या रूपी धन है, जिस से संसार का भला हो, उसको यह कभी नहीं सोचना चाहिये कि जब तक कोई शिष्य बन कर न आयेगा, विद्या प्रदान नहीं की जा सकती, विद्या का दान सब से बड़ा है--जो सब के लिये है, जिसको सब को सब समय दिया जा सकता है। इसमें यह सब भेद कैसा क्यों? उस ज्ञान दाता का नाम ही ईश्वर अथवा यथार्थ गुरु का स्वरूप कहा जा सकता है। जो विद्या का प्रसार करे, उस विद्या के बदले संसार से कुछ न चाहे। न धन चाहे न प्रतिष्ठा ही चाहे, केवल यह भाव ही मन में हो, कि सब का सब प्रकार से भला हो, ऐसा ही उपदेश १ गुरु शिव द्वारा मिलता, जिन्होंने स्वयं, संसार को सब कुछ दिया पर कुछ न मांगा। ऐसे पुरुष ही संसार में यथार्थ, गुरु कहे जा सकते! केवल पेट पालने को नहीं! ऐसा समझ कर, ज्ञान का उपदेश सब को करना चाहिये? इसका उत्तर केवल यह है, यदि ऐसा विचार संसार में पहले रहता सब जगह विद्या फैलती ही, पर जो कुछ नहीं फैला, उसका कारण केवल यह बना कि जिसको जो ज्ञान प्राप्त हुआ, उसने उस पर अपना कब्जा करने का प्रयत्न किया, जो कि सब का सब सर्वथा अनुचित था, जो विद्या केवल संसार के, कल्याण के लिए थी उस पर अपना दावा सिद्ध करने का व्यर्थ यत्न किया गया और सब कुछ छिन गया जो विचार आज भारत वर्ष में सब को प्राप्त हैं उन का नाम केवल हिन्दू ही नहीं कह सके। क्योंकि ज्ञान किसी के घर में बन्द नहीं किया जा सकता, यह ज्ञान तो संसार के सब मनुष्यों के लिये ईश्वर ने प्रदान किया था, पर जब तक यह ज्ञान १ घर में बन्द रहा तब तक उस का फल भी वैसा ही ही मिला कि जिस घर में बन्द किया गया वह नष्ट हो गया, जिस प्रकार से बन्द जल सड़ कर जाता है, इस लिये वेद के ज्ञान को, फैलाना चाहिये ताकि सारे संसार को लाभ हो सके। ज्ञान की वृद्धि, तब होती है जब उस को सब के लिए फैलाया जाये। फिर यह कहना, कि गुरु ही जाने, सो गुरु का अर्थ क्या सब लोग समझ गये? फिर उसका भी हल, उस कल्याणकारी शिव, ने दिया जिसका वह ज्ञान था। जिसका वह ज्ञान था सो स्वयं १ गुरु बन कर इस ज्ञान रूपी अमृत को सब को दे रहा है, पर उसका लाभ सब को तभी पहुंच सकता है, जब निष्काम हो, निष्काम ही उपदेश संसार को दिया जाये। यजुर्वेद का १९.१२ मन्त्र इस प्रकार के उपदेश को ही सब प्रकार के कल्याण का आधार मानता है।

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इसके सिवाय इसके प्रत्येक विभाग पर एक-एक सौ हजार वीरोंका दल नियुक्त किया गया, जिससे कि केवल एक दल किसी विपत्ति का शिकार न बने, और बाकी दल सहायता देकर उस विपत्ति स्वरूप पहाड़ को चक ना चूर करने समर्थ हो सकें, इसीलिए प्रत्येक प्रकार से सोचा, विचारा प्रत्येक ने जाना, कि अब लंका विजय का कोई प्रश्न नहीं ना जाने वो दिन, वो घडी कब आएगी? वो भी क्या शुभ दिन होगा? जिस दिन लंका विजय होगी? ऐसा विचार के मन, में जो विश्वास उत्पन्न हुआ था उनका, सो वो सारा जाता रहा, ना तो कभी लंका विजय हुई, और कभी होगी विजय जब तक स्वयं राम जी दल बल के साथ हैं, तभी तक लंका विजय? फिर विजय तो बाद बात रह गई? वो कहते गए राम जी, ना कोई बात विचारने योग्य, ना कोई बात सोचने योग्य ना ही कोई बात मन में ही संशय करने योग्य; सो जो कुछ बात सो तो केवल इन सब बातों की चर्चा ना करने की ही केवल सो तो केवल इन सब बातों उपरांत केवल ही वो निर्णय का समय आ गया, जिस दल द्वारा सब लोग आ--पहुंचे, चलो, समय से चलें? इसलिए विभीषण स्वयं साथ गए इन सब के, विभीषण सब को साथ दिए हुए जा ही रहे केवल उस स्थान की ओर सो वो कहता गया, इस प्रकार केवल जा ही तो रहे विभीषण सो उस दल का प्रत्येक जन जब तक वहां पहुंचा विभीषण सो वहां से पीछे ना हट सका केवल आगे ही बढ़ गया सो इन सब दलों को उस समय तक वो सब कुछ ज्ञात ना हुआ कि लंका में क्या हो रहा होगा, सो विभीषण तो जा चुका था लंका में सो क्या कह सके कोई? विभीषण तो गया! दल आगे आया सो वो तो केवल यही सब देखने में लगा गया कि कहो, लंका में क्या हो सकता? ना कोई बात है, जो कुछ भी कहा जाएगा? सो उस दल का विचार तो जा रहा केवल दो बातों, केवल इस बात का ध्यान रहा राम विचार, राम केवल ध्यान लगा बैठ विभीषण के प्रस्थान-- उपरांत शांतमय--चित्त द्वारा केवल प्रभु की शरण लगा विभीषण जिस प्रकार, स्वयं को समर्पण किया प्रभु सम्मुख सो, स्वयं को केवल ऐसा माना जिसके द्वारा सब ही कार्य विधाता के आश्रित चले जा ही विभीषणके किए हुए सब ही कार्य प्रभु के ही पद चरण में जा गिरे सो कहा ना जा सके! जो केवल उस विभीषण विचारने विचार केवल सत्य जान सदा विधाता सम्मुख विभीषणके विचार केवल ही केवल, केवल प्रभु के नाम का सुमिरन विभीषण के द्वारा, उसी नाम के विचार को मनन माना जा रहा, सदा ही आगे बढ़ रहा था लंका की ओर सो ऐसा जान कर चलो ना, ऐसा विचार केवल राम जी को बार बार प्रभु पुकारे बार बार ना जाने केवल वो सोच, ऐसा मन सोच-सोच विह्वल हो विभीषण चला गया लंका दिशा विभीषण के पद पग लंका दिशा बढ़े, सदा केवल विवशता दिखाई 129

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इस तरह विचार कर उसने मन-मन में निश्चय किया, आजन्म मरूँ तो, पर दूसरा विवाह कभी नहीं करूँगा। जब वह मरा, तब उसने देखा, कि स्वर्ग में कोई दो-तीन स्त्रियाँ हैं। जो केवल दो पत्नियों का स्वामी बनकर रहा उसको दोनो ओरसे हाथ पकड़कर ले जाने वाले यमदूत ऐसे खींचते हैं कि वह सोच नहीं सकता कि किस ओर जाऊँ। जो तीन पत्नियाँ रखते हैं उनको तीन ओर तीन यमदूत खींच कर त्रिशंकुकेसमान कर, असमंजसमें डाल, कष्टप्रद बनाते हैं, बहुविवाहवालों की गति तो और भी विचित्र ही होती है। कोई तो कह रहा, अरे मूर्खो! एक स्त्री से ही तुम्हारा निर्वाह नहीं हो सका तो फिर विवाह ही क्यों न छोड़ दिया? जब विवाह करना पड़ा तो केवल एक ही पत्नी क्यों न रखी? दूसरों का विवाह क्यों कराया? स्वयं कई स्त्रियों से विवाह क्यों किया? यदि कई एक से विवाह किया था? फिर दूसरी के आधीन क्यों हुआ? अपनी इच्छा से कई स्त्रियों पर रीझ कर विवाह कर उनके जाल में फँसने वाले तो अवश्य नरकमें गिरेंगे इसमें कोई सन्देह नहीं! जिन्होंने केवल पुत्रोत्पत्ति तथा गृहस्थ धर्म पालनार्थ एक ही से रूप-रंग वा धन-दौलत को न देख कर केवल कुल को उत्तम समझ कर विवाह किया, केवल धर्मार्थ ही पत्नी का उपयोग किया वा केवल सन्तान के निमित्त ही पत्नी का सङ्ग किया वा जिसने मन से भी पर-नारी चिन्तन न किया। गृहस्थ में रहकर भी, ब्रह्मचारीवत् रहा। जो किसी दूसरे पर या तो परावलम्बी बन कर नहीं रहा अथवा स्वयं, दीन- हीन, दुर्बल होने पर, गृहस्थ धर्मका पालन करने लगा। उसने पत्नी के साथ धर्म-साधन में सहयोग दिया, पत्नी ने भी हर तरह पति का साथ निभाया। दोनों में परस्पर कभी कपट, द्वेष, विरोध नहीं रहा, वरन् दोनों परस्पर एक दूसरे का सदैव ध्यान रखते रहे। सदा धर्म, सत्य, नियम का पालन करते रहे, किसी को अपने से कष्ट न पहुँचे इस बात का पूरा ध्यान रक्खा गया, परोपकार में लगे रहे। किसी को सताया नहीं और न ही किसी को परपीड़क बनने दिया, ऐसे लोगों का जीवन धन्य है। वे तो स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। यही नहीं, उस लोक में जाकर, इन बातों का भी ज्ञान कराया गया कि, जो मनुष्य केवल अपने उदर-पोषण में लगे रहते हैं। सदा यही सोचा, स्वयं खाऊँ पर कभी किसीको दिया नहीं। दान-धर्म से सदा जी चुराते रहे। दूसरों को जब-जब आवश्यकता पड़ी उस समय कोई सहायता न दी, जो माता-पिता की सेवा नहीं करते वरन् उनका तिरस्कार करते हैं। जो भाई-भाई में कलह कराते हैं। जो सन्तों का मान-भङ्ग करते हैं। वे नरक गामी होते हैं। जो पर-नारी गमन, पर-धन का हरण करने में लगे, मदिरा-पान में ही मस्त रहे, अपने को ही सब कुछ समझते, दूसरों को तुच्छ व हेय, दूसरों के दुःख को न देखकर, केवल अपने सुख में ही लगे रहे। वे नरक गामी होते हैं। जो विद्या दान नहीं देते वरन् धन कमाने की दृष्टि से ही विद्या देते, वे नरक में घोर यातना पाते हैं। जो अपनी सन्तान को सुमार्ग नहीं दिखाते, वरन् उन्हें कुमार्ग की ओर प्रवृत्त करते हैं। जो अपने स्वामी का अहित करते हैं, जो माता-पिता को घर से निकाल बाहर करते हैं। इस प्रकार यमदूत उस जीव को, सब प्रकार समझा कर, कहते हैं, धर्मराज के दो रूप हैं। एक तो सौम्य रूप है, जिसमें वे धर्मराज कहलाते हैं और दूसरा रूप अति भयंकर, विकराल है जिसमें वे यमराज कहलाते हैं। जो, पापी होता उसके सम्मुख वे भयानक रूप दिखाकर दण्ड की व्यवस्था देते हैं और, धर्मशील के आगे वे सौम्य। जो पराई स्त्री को देख कर, अपनी दृष्टि को नीचा कर लेता है। जो पराई स्त्री को अपनी माता अथवा बहन के समान समझता, वह धर्मराज का दर्शन पाता है? जो दूसरे के धन को मिट्टी-पत्थर समझता है। जो अपने सुख की तरह दूसरों को भी सुखी देखना चाहता है? जो किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देता, वही पाता है, जिसने पराए दुःख को दूर करने का प्रयत्न किया है। जो तो उस व्यक्ति को कभी भी नरक नहीं भोगना पड़ता, जिसने पराया अहित कभी नहीं सोचा, वरन् सदा ही सबका भला ही सोचा है। जो दूसरों की निन्दा नहीं करता, जो किसी भी प्राणी को धोखा नहीं देता। जो सन्तों का आदर करता है। जो दीन-दुखियों की हर सम्भव सहायता करता है। जो सदा प्रभु स्मरण करता है। जो अपने गुरुजनों का आदर करता है। जो अपने माता- पिता को ईश्वर मानता है, जो कभी किसी का बुरा नहीं सोचता। 131

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