माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
अथवा रात-दिन, रुपया, रोजगार, मकान, इन पर आत्मबुद्धि करे। बिना समझे जीव का व्यवहार ऐसा बन जाताहै परंतु ज्ञान-नेत्र उघड़े तब यह जाने कि वास्तवमें इन पर पर्याय का वा इन पर्याय का रच मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। शरीर तो जड़-द्रव्य है, इसमें तो ज्ञानस्वभाव ही नहीं है। आत्मा तो ज्ञान स्वरूप, चैतन्य रूप है, वास्तवमें इन सब का, पर भावों का कर्ता निश्चय भगवान आत्मा रूप मैं कभी नहीं। इस ही तरह व्यवहार सम्यक्त्व अथवा ज्ञान को भी पर--द्रव्य के आलम्बन से होनेवाला मान सम्यक्त्व वा ज्ञानस्वभाव केवल ज्ञान का कर्ता है, आत्मा को ऐसा कर्त्ता मानना और स्वरूप को छोड़ते देखना सो सब भूल मिथ्या श्रद्धानके वशमें जीव को भ्रम उत्पन्न करता है। समय पर, सब भाव पर से भिन्न हैं, ऐसा तो विचार सम्यक्त्व का धारक ही करेगा। यह जीव रूप से अन्य विचार को वास्तवमें नहीं स्वीकार कर सकता है। व्यवहार समय सम्यक्त्व का स्वरूप ही, इस व्यवहारी जीव को--सम्यक्त्व मात्र ज्ञान पर्याय रूपमें है, वास्तवमें स्वभावमें इसका प्रवेश नहीं हो--सके ऐसा सम्यक्त्व का विचार रूप ही सदासमयसारकाहै, पर सो भी भिन्न ही स्वावलम्बी सम्यक्त्व केवल ज्ञान ही निश्चयनय से ही हो सकता है। यह पर्याय प्रमाण स्वरूप सर्व सम्यग्ज्ञानियों का सार रूप विचार ही सार स्वरूप आत्मा को आत्मज्ञान से देख सकता है। जिस प्रकार से ही सर्व द्रव्य अपने ही स्वरूप में, जहां पर सर्व द्रव्य रूप पर ही संसार रूप सब का पर ज्ञान, यह सब निश्चय से ही है, राग-द्वेष का कारण ही संसार समझना यह सब भूल, अविद्या अर्थात् अज्ञान ही सर्व काल मिथ्या रूप सब कुछ अपने स्वरूप रूप लग रहा है। जब इस स्वरूप को, पर भावों को भिन्न जान इसका परिणाम ही सब विकार, त्यागने को ही अपना स्वरूप मान, सो सर्व का त्याग करता व्यवहार से भिन्न रूप से सब पर ज्ञानवान् का स्वावलम्बन सदा काल रहता आया है। जीव का सार ही सम्यक्त्व रूप ज्ञान मात्र ही सब राग का नाश कर सकता है। समय सार सर्व सार पदार्थ का सार होकर सर्व को केवल ज्ञान रूप ही प्रकाशक है, निराधार समय मात्र ही, इसका स्वरूप! आत्मज्ञानियों स्वरूप को विचार करो, वास्तवमें जीव का परावलम्बीपना एक समय को भी स्वावलम्बी रूप ही होता है, संसारी को परावलम्बीपना ही सत्य है, व्यवहारज्ञानियों का ज्ञान ही, व्यवहार ही सब कुछ है, जो कि व्यवहार दृष्टि का धारक पर से स्वावलम्बन का ध्यान ही न पावे। निश्चय दृष्टि सब द्रव्य रूप पर ही भगवान जीव रूप ज्ञान-नेत्र उघाड़े ज्ञान रूप, स्वरूप के अवलोकत स्वरूप रूप, सबको ऐसा ज्ञान है? आत्मा रूप निश्चय से, सब स्वावलम्बी ज्ञान सर्व प्रकाश निरन्तर प्रकाश ही स्वरूप को प्रकाश कर रहा, जिसे ही सिद्ध रूप सब संसार के प्राणियों को प्रकाशक है। संसार से भिन्न सब सार को ही ग्रहण करने रूप ही सर्व ज्ञान रूप आत्म रूप व्यवहार को छोड़ ही निजत्व रूप ग्रहण कर ज्ञानी को परम सम्यक्त्वदृष्टि ही हो जाता है। इस ही समय जीव, पर निमित्त से ही भिन्न केवल ज्ञान स्वभाव स्वरूप है। सदा ही ऐसा विचार सर्व सम्यक् रूप ही निश्चय व्यवहार स्वरूप सबही जाने, ज्ञान स्वभाव से भिन्न विचार ही अज्ञान के कारणही जीव स्वरूप को राग-द्वेष वा रागवान्--द्वेषी जाने, पर जीव, सदा स्वरूप ही केवल ज्ञान का रूप ही हो कर भी ऐसा विभाव स्वभाव का कर्ता ही सब भव रूप संसार प्रपंच का कारण व्यवहार स्वावलम्बन से अज्ञान भाव सब अज्ञान रूप भासे, ऐसा सब सम्यग्ज्ञानियों स्वरूप विचार ही स्वावलम्बन रूप है, यह ही प्रकार से सब समय ज्ञान मात्र ही सब संसार विभाव से ही राग-द्वेष से भिन्न है। जो ऐसा ही माने, उस सर्व काल ज्ञान रूप भगवान् परमेश्वर के ज्ञान रूप सार भाव को जान सकता रूप सब ही ज्ञान रूप हो सब स्वावलम्बन का ज्ञान पाकर केवल ज्ञान रूप प्रकाश होता? व्यवहार से सब भाव को सब ही केवल समय का प्रकाश मान जो परावलम्ब रूप ही सदा काल का सब मान कर जाने, उस समय राग--द्वेष रूप कैसा हो संसार होगा? हे भव्य जीव, तू भी सदा ही केवल समय बन! ज्ञान ही केवल समय! ज्ञानरूप सब संसार का सार रूप बन, अज्ञान-विभाव से भिन्न ज्ञान-रूप? भगवान् रूप ज्ञान का प्रकाश सदा पावे॥ 51
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इस पर उसने उत्तर दिया कि, स्वामी हमारा सर्वथा समर्थ और न्याय रूप सब धर्म पर वह स्थिर रहता है। उसने न्याय को दृढ़ आलम्बन किया, तो कौन उसका नाश करने पावे? सो जिसने किया--सो सब इस में न्याय का प्रकाश, जो तो सब उस जगदीश्वर रूप सूर्य का प्रकाश, उसका प्रकाशमान स्वरूप नित्य, सो वह जगदीश्वर सब से परे स्वयम् ही सत्य रूप, सबका अंत और नित्य ही रहता तब फिर उस पापी पुरुष ने कहाकि राजा सो, जो सब देश और सब लोक और सर्व जगत् का न्याय करता है सो, उसी राजा से सो, दूसरा न्याय क्या हो सकता है। जिससे तू बच जावे! उसने उत्तर दिया राजा तो न्याय रूप जल का घट अर्थात् उसका सब धन सो--उसी न्याय से सो, उसका न्याय सो तो, दूसरा न्याय क्या होवे! सो घट फूट गया तो जल बिखर ही तो जावेगा न्याय तो! राजा तो नश्वर है, न्याय नित्य? सो जो ईश्वर का न्याय अखंड सो तो सब काल सब पर सर्वथा रहै, जो घट के जल समान सब सो, उस जगदीश्वर रूप जल स्वरूप सो तो अखंड परम आनन्द प्रकाश रूप सब पर यथा योग्य सब पर सदा न्याय किया प्रकाशता सो सब को, सो सो सब काल में सो ऐसा न्याय रूप से जो, राजा प्रजा को सब से सब ही सब न्याय करै, सो सो ही कल्याण उसने राजा के भयभीत रूप कारागार में जो ऐसा दुःख पाया, जिससे वह दुःखी सो, राजा को दुःख देता सो, राजा न देता सब को सब न्याय सुख रूप सो, तन-मन, धन-जन, जन-मन को सब सुख दया न्याय रूप सब को दे, तन- मन, धन सब सो, दया रूप सब को, सब ही परस्पर के सुख का हेतु सब सब सुख सब को सब प्रकार दया से पावै, सब जन जन-जन-के सुख दुःख सुख सब प्रकार परस्पर सुख दया से सब जगत् का परमेश्वर की दया से सब सुख सब जगत्, सब परमात्मा सब का सब से सब का कल्याण रूप, सो कल्याण से प्रकाश स्वरूप हो रहा राजा सब सब जगत् प्रजा सुख से रहे, सो तन-मन से सो सब न्याय रूप से सब जन सब जगत् का दुःख मिटाकर सुख करे सो, जिससे जगत् का उपकार सब प्रजा का सुख रूप सब जगत् सब सुख पावे सो सो, जगत् प्रजा के न्याय से परस्पर सुख--दुःख, सुख, दुःख से परस्पर तन-मन से जो सब यथा योग्य सो सो सब न्याय रूप सुख सब पर यथा योग्य सो सो न्याय सब का दया से; सो सो सब यथा सुख सब, सब का, परस्पर, सब को यथा न्याय से सो सदा सब को सो न्याय सो दया सो सो दया सो तन-मन सब प्रकार से सब परस्पर का तन- मन, सब को परस्पर सब का यथा न्याय, सब सब जन सब को सब प्रकार सब का दया से, सब सो दया, सब सो सुख--का रूप सो सो दया परस्पर का यथा सो प्रकार से सब जन सब कल्याण- रूप सब को सब सब से सो प्रकार दया से सब परमात्मा सब जन को सो सो परमात्मा स्वरूप से सुख से दया सब को, सो दया से, यथा योग्य सो, जगत् यथा योग्य परस्पर परस्पर सब जन सब जगत् का कल्याण रूप दया से सब यथा सब प्रकार से सो दया से परस्पर परस्पर का सब जगत् का सब से सब प्रकार सब जगत् रूप दया से सब को न्याय सो सब का सब यथा रूप फिर उस का दुःख मिटा कर सब यथा योग्य सब का सब न्याय रूप सब को जो जो जगत् से सब तन-मन दया से सब सब को सब सुख, सो सब सो सुख सब, सब सो दया--का सो, सुख सो, दया सो, सो सो, सब ही सब ही दया सब को सब ही दया सब जन को सो दया, सुख, सुख, सब, सो सो सब का तन-मन सब को दया सब को सब दया सो, सो सो परस्पर का जगत् सब प्रकार सुख का सब प्रकार से सब परस्पर-परस्पर सुख, तन-मन दया, सब ही सब, सब को! सो सदा सब पर सो दया से सो सब दया से सब सुख सब को सो सब प्रकार दया से सो सब परस्पर का जगत् सुख सब प्रकार से परमात्मा का ऐसा यथा रूप सब को, कल्याण रूप
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सो भाई, उस दिन को स्मरण करके आज पश्चात्ताप करो अथवा न करो सो तुम्हारी इच्छा पर छोड़ दिया जाता अथवा नहीं, उस पश्चात्-तापसे उस को सुख-ही सुख अथवा आनन्द-आनन्द होगा वा नहीं उस मनुष्य को उस सुख वा आनन्द पर क्या कुछ सन्देह-सा ठहरताहै ? और जो पश्चात्ताप वा उस समय उत्पन्न हो जाता रहा, तो उसका फल किस प्रकार होता सो आज तक उस को सुख--आनन्द और सुख-हीन तथा केवल दुःख का मुख तक भी नहीं मिला सो कहा नहीं जाता है, परन्तु उस सुखस्वरूप को, जिससे सब किसी मनुष्य को सुख वा आनन्दही मिले, सुखही मिला, जिस की सहायता से मनुष्य सब प्रकार का सुख और आनन्द पावे तो उसका स्मरण करना उचित था, किंवा उस बात का? जिसपर कि मन और वचन तथा इन सब इन्द्रियों से उस दिन तक कोई सुख अथवा आनन्द का लेश उपलब्ध न हुआ, सो किस लिये कि उस दिन तक तो केवल? विपत्ति ही विपत्ति सुख के सम्बन्ध रूप में भुगती गईथी, सो भुगती; इस से निश्चय ज्ञान-रूपी प्रकाश, जिससे मनमलीन रूपी अन्ध कार से रहित हो स्वच्छ और पवित्र हो ही जाता रहा था, जिससे संसार के माया रूपी दल का स्पर्श स्वाभाविक रूप से छूटने लगता था सो उस पर मन और मन की स्वाभाविक वृ त्ति उस की मुख्य वृत्ति और मुख्य सुख स्वाभाविक था, जिसके विपरीत होने से मनुष्यता का नाश होने लगता गया अथवा होता है, जिससे मन का काम केवल काम वासना ही उत्पन्न करना अथवा भोग था, जिस दिन से इन सब विपत्तियों उत्पन्न होती तो ऐसा ही परिणाम हो या होने लगाथा कि संसार की बातों अथवा माया संसार से भिन्न हो या उस बात अथवा पश्चात्ताप का स्वरूप भिन्न भिन्न होकर उस के हृदय में जो कि सुख-सम्पन्नता रूप उत्पन्न हो होकर अपना प्रभाव करताथा सो स्वाभाविक ही विपरीत रहा, जिससे केवल काम वासना ही मन को सताती जा रही थी, जिस से उस के हृदय रूपी राज्य नष्ट हो कर काम रूपी विषयी का उस हृदय पर राज्य हो चलाथा तथा, उस हृदय रूपी राज्य का जो कि आनन्दमय होता, सो आनन्दमय विपरीत भाव को पा कर उस विपत्ति, रूपी विपत्ति, का कारण बनकर उस परिणाम का दाता हुआ था जिसके पाने पश्चात्, जो पश्चात् भाव-हो कर हृदय का स्वभाव हो चला था अर्थात् काम वासना को मन रूपी राज्य में, उस स्थान रूपी राज्य रूपी अचेतन अभिमान उस का उस सब समय रूपी राज्य अथवा प्रभाव करता, सो उस का प्रभाव उस साक्षात्कार स्वरूप संसार पर अपना प्रभाव करता? या मन का परिणाम तो अपना प्रभाव करता, या कि काम रूपी स्वरूप अथवा १ काम रूप उस मन को वा मनुष्य रूप मनुष्य का नाश संसार के काम रूप फल रूपी वा मनुष्य रूपी उस मनुष्य, या उस के विचार रूपी वा उसी काम का विचार हो गया था। तो ऐसा अनुभव या साक्षात्कार का ज्ञान वा उस साक्षात्कार रूपी फल अथवा उक्त प्रकार के साक्षात्कार रूपी वा जो कुछ साक्षात्कार हुआ उस बात अथवा विषय का विचार हो रहा होगा, जिससे कि ज्ञान, जिससे कि फल--का स्वरूप अथवा प्रकाश, जिस सब अविद्या रूपी तम का नाश अथवा जो सब अज्ञान रूपी तम रूपी अन्धकार का नाश करता रहा, सो उस का काम करता ही था, जो काम करता था उस का फल अथवा जो फल उस समय होता, तो काम रूपी उस काम रूपी फल का रूप अथवा फल ही, तो ऐसा ज्ञान रूपी फल अथवा वा विचार का वा, सो अविद्या रूपी फल रूपी तम का नाश उस समय पश्चात् रूप में, या अज्ञान रूपी काम रूपी फल उस को रूपता को और साक्षात्कार तो उस समय रूप ज्ञान रूपी अविद्या रूपी, जिस प्रकार से, ज्ञान स्वरूप का, नाश काम-रूपी अन्धकार रूपी का नाश कर ज्ञान रूपी रूप साक्षात्कार या प्रकाश रूप रहा, जिस परिणाम साक्षात्कार कहता 54
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गया अथवा नहीं, यह जानकर समाधान कर सके ऐसा कोई भी तो उपाय उनके पास नहीं था। इसके सिवा उनकी धारणाएं विकृत थीं, जो इसके पर सत्य स्वरूप को जान सके ऐसा उपाय, जो केवल उनके पास ही था पर वे उस पर ध्यान नहीं देते थे। वे केवल एक ईश्वर की पूजा के स्थान पर अनेक अन्य कल्पित देवी-देवताओं की भी पूजा करने लगे थे। उन्होंने यह नहीं समझा कि ईश्वर तो एक है, परब्रह्म के रूप में। फिर भी उसे कई नामों से पुकारा, जैसे कि अग्नि के रूप में, जल के रूप में। इस प्रकार कुछ कल्पित देवी-देवता बन गये, जिनके पास शक्तियां थीं; जैसे कि, इन्द्र देव, जल के देव, वायु के देव, सूर्य देव, चन्द्रमा के देव। इस पर उस समय भी एक मत के लोग एकत्र नहीं थे। कुछ लोग तो, जो ईश्वर के सच्चे उपासक थे, वे इस प्रकार की धारणाओं से विमुख रहते थे, वे तो केवल ईश्वर की, जो सर्व शक्तिमान था और सब का रचियता था और सब को देखता था, उस की पूजा में लगे थे, पर उनकी संख्या कम थी, वे संख्या में कम थे। अतः वे इन बातों को रोक न सके जो केवल अन्धविश्वास थी, जिसे वे धर्म समझ रहे, न वे धर्म सुधार सके। इसके अतिरिक्त धर्म का पतन हो रहा था... इस कारण से कि इस काल में कुछ ऐसे भी, जो स्वयं को ज्ञानी मानते, ऋषि और सन्यासी मानते, पर थे वास्तव में अज्ञानी थी, वे इस बात पर बल देने लगे कि ईश्वर केवल यज्ञ के रूप में मिल सकता, और यह धार्मिक कृत्य केवल ब्राह्मण ही कर सकते हैं। इस प्रकार एक तो पाखण्ड और बढ़ गया जिसके कारण उस काल में, जब कि यज्ञों में पशुओं की बलि दी जाने लगी, एक विशेष वर्ग, जिसे पुरोहित वर्ग कहते, ने अपने स्वार्थ के लिए ईश्वर को, यज्ञों द्वारा प्रसन्न करने का, मार्ग बना कर लोगों को, यज्ञों द्वारा ठगना शुरू कर दिया। ईश्वर के नाम पर इस प्रकार के अनाचार का फल यह हुआ कि वेद काल समाप्त, जिसे सत्य युग, या सतयुग कहते हैं, वह समाप्त हो गया, क्योंकि इस प्रकार अनाचार उस समय का रूप बन चुका था। इस काल में जहाँ कर्म का महत्व समाप्त हो चुका था और भाग्य का ही बोलबाला था। उस समय का मानव यज्ञ, बलि पर सब कुछ निर्भर समझता हुआ कर्म से ही विमुख होकर, केवल इन साधनों पर ही अपने उद्धार का साधन समझने लगा था। हाँ, जब ऐसा समय आ गया, धर्म के नाम पर ऐसा अधर्म होने लगा जिससे मनुष्य का भाग्य केवल भाग्य पर ही छोड़ कर भगवान और ईश्वर को भूलने लगा तो मनुष्य का उद्धार करने हेतु इस धरा पर अनेक अवतारी पुरुषों और महात्माओं का आगमन हुआ। ईश्वर ने जब देखा कि उसके द्वारा बनाये गये संसार में मनुष्य भ्रम में फंसा हुआ है और सत्य मार्ग छोड़कर अधर्म के मार्ग पर चल रहा है तथा उसके कर्म समाप्त हो रहे हैं तथा केवल कर्म के नाम पर पाखण्ड हो रहा है। महात्मा बुद्ध के पूर्व काल की जो यह दशा थी, उस समय एक ऐसा महा- मानव का इस धरा पर जन्म हुआ जो इन सब कुरीतियों को दूर करने में सहायक हुआ, जिसे भगवान बुद्ध कहते हैं। वे इस धरा पर धर्म को सच्चा स्वरूप प्रदान करने में सहायक हुए तथा उनके द्वारा चलाये गये बौद्ध धर्म से इस धरा पर एक नई चेतना का उदय हुआ तथा वह धर्म भारत की सीमाओं से बाहर जाकर भी, विश्व का सबसे बड़ा धर्म बन गया! हाँ, जब यह अनाचार, यह अन्धविश्वास और यह दुराचार इस संसार में व्याप्त था, तब इस समय के काल के अनुसार इस धरा पर महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ। यह समय ईसा मसीह के जन्म से पूर्व की लगभग छठी शती का था। इस समय मगध साम्राज्य, जो उस समय अपने में महान था, उत्तर भारत में बहुत शक्तिशाली माना जाता था। इस काल के इतिहास के अनुसार मगध के साथ तीन अन्य बड़े राज्य भी भारत में थे, जो अपने प्रभाव तथा प्रभुत्व के कारण विख्यात थे। वे थे, कोशल राज्य, वत्स राज्य तथा अवन्ति राज्य। इन चार शक्तिशाली राज्यों में मगध का साम्राज्य सबसे शक्तिशाली था, जिसे इस काल में सब से श्रेष्ठ माना गया था; शेष अन्य तीन राज्य भी कुछ कम नहीं थे। इन चार बड़े साम्राज्यों के अतिरिक्त कुछ छोटे-छोटे राज्य भी उस समय भारत के पूर्व में थे। इनमें से कुछ गणतन्त्र राज्यों में शाक्य राज्य भी एक था। शाक्य वंश का राज्य हिमालय की तराई में स्थित था। इस राज्य की राजधानी कपिलवस्तु थी। यह राज्य आधुनिक नेपाल की सीमा पर स्थित था। इस शाक्य वंश के राजा शुद्धोदन थे, जिनकी पत्नी का नाम माया देवी था। राजा शुद्धोदन बड़े-बड़े प्रतापी राजा थे तथा उनकी ख्याति सर्वत्र फैली हुई थी। 59
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भाग 4 (पृष्ठ 61-80)
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इस प्रकार सब तरफ अन्धेर देखकर, चिन्ता निमग्न होकर, वह दीन बालक रोता हुआ अपनी माताके सम्मुख जाकर हाथ जोड बोला... ! माताजी तुम इस संसारके सब काम को जानती हुई यह नहीं जानती हो! मेरी माता, यह चिन्ता का विषय सब बातों का है। संसार मुझे उपनयन योग्य विद्याध्ययन योग्य सब तरह योग्य समझ कर पिता का गोत्र पूछ रहा है। यह बात सच है, यह सब विद्याध्ययन को रोकके हैं, संस्कार को रोकके हैं॥ आप यह विचार कभी मन में मत करो, कि विद्या का पढना केवल आजीविका का साधन है। यह केवल विद्या, यह केवल सत्य बात नहीं कही गई! इस बात को जानने का यही यत्न हो रहा रहता है। यह सत्य विचार बहुत बडा! सत्य विद्या संसार का परम आधार माना॥ सत्यके प्रकाश का आधार तो इस बात का विचार करना मनुष्य जीवनके सब ओर से हो रहा है। सत्य को धारण कर चलने का नाम जीवन धर्मयुक्त बतलाया गया, इसमें तनिक सन्देहभीनहीं, सत्य विचारधारामें विचर कर हम इस जीवन संग्राम को पारकरके ही रहेंगे। हे माता, हम सत्य विचार सम्बन्धी अपने धर्म से कभी विचलित होकर न रहेंगे! विद्याका अभ्यास करना ही तो परम धर्म है, जो सत्यका उपदेशक बनकर सब का उद्धार करेगा? विद्या ही जीवनका आधार? विद्या ही सत्य विचार सिखाकर, यह भव-पार करानेका साधन कराके सत्य विचार देती। संसार में जो सत्य धर्म को नहीं जान सके रहे, वे सत्य विचार का नाम कभी न लेंगे, न सत्य की शरण जाना चाहेंगे! विद्या का प्रकाश? विद्या का विचार सब, जो सत्य का सिखाता? सत्यविचारको सब ही प्रकाश करना चाहते हैं। जहां विचारका प्रकाश आ जाता है। वहां तम, अन्धकारका नाश निश्चित हो ही जाता है। इसी से तो सत्य विचार द्वारा ही सब संसार को पार कर लें! इस प्रकार सत्य ही तो सत्य विद्या का आधारभूत माना गया है। यह विचार तो माता सत्यविचार द्वारा ही हो सकता रहता है। संसार को सब तरह का सत्य विचार प्रकाश मिलना योग्य॥ विद्याध्ययन ही तो केवल सब तरह सत्य द्वारा इस संसार को, समाज को, राष्ट्रको सब तरह उद्धार का यत्न करा सक्ता, यह सत्यका विचार रहा॥ सत्यका विचार ही तो, विद्या द्वारा ही हो सकता रहता है। इस प्रकार, यह विचार सत्य ही सत्य को चमकावे॥ अब इस सत्यका क्या रूप हो सकता? सत्य प्रकाशक सन्तों की शरणमें ही सब होवे! यह सुनकर ही वह, सत्यकामकी माता इस यत्न को कराने को उद्यत होकर सब तरफ ध्यान कर के विचारने लगी। इस प्रकार, सत्यकामके विचारों द्वारा ही सब सत्य का ही प्रकाश, न असत्य आधार, न सन्देहका ही नाम प्रकाश हो कर सब प्रकार सत्यकामके मन को सत्यकी ओर ही प्रेरित किया॥ सब भाव-रूप से यह विचार माताके मन विचार कर सब तरह सत्य द्वारा तय हुआ गया कि, जो सत्य हो, वह सत्य ही सत्यका अवलम्बन ले। सब तरह सत्य की शरण ही सबसे उत्तम उपाय माता द्वारा भाव-रूप से तय करके निर्णय किया गया विचार हुआ । अतः, सब को सत्य द्वारा सम्बोधन कर सत्यता की ओर ही झुकाव हो ही जाता है। सत्यके न भय होवे! सत्यका ही तो बल है, विद्याध्ययन द्वारा सत्य विद्या का विचार ही तो सब तरह, सत्य ही सब कुछ, उस सत्य द्वारा सब तरह विचार होता रहे, सब प्रकार सत्य विद्या का विचार सब प्रकार सत्य द्वारा सब तरह सम्भव होकर अपने सत्य विचार द्वारा सब आधार सत्य प्रकार सत्य बना कर रहे, सत्य मार्ग, ही सब तरह हो? इस प्रकार सब, सब तरह सत्यके द्वारा ही तो सत्य द्वारा सत्यज्ञान प्रकार हो सकता रहा है। सत्यका विचार द्वारा, यह सत्यता द्वारा ही सम्भव हुआ॥ अब तो निश्चय हो गया, कि सत्यता ही है, सो ही सत्य द्वारा सत्य का सब ही प्रकाश हो! यह सुनकर ही वह, जो सत्यता द्वारा ही सब था, वह सत्यता द्वारा सब कुछ सत्य ही सब तरफ फैला॥ सत्यके प्रभाव द्वारा सब प्रकार सत्य का ही प्रभाव हो न सके? सब तरह, सत्य ही सब को विद्याध्ययन द्वारा भाव--विचार से ही सत्यता द्वारा प्रकाशित हो सकेगा॥ सो यह सत्यता द्वारा सब, सत्यता के आधारको ही ही सत्यद्वारा सत्य विचार प्रकाश का रूप सत्य को धारण करके सत्य ही सब तरह प्रकाशित रहा, सत्यता का सब तरह प्रकाश ही सब तरफ सब प्रकार का सत्य ही प्रकाश फैला॥ 63
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इस तरह विचार कर संसार का भला करने का मन बनाए रखना व उस दिशा विशेष प्रयत्न निरन्तर- प्रयास करते रहने वाले ही न केवल सच्चे परोपकारी कहे जा सकते हैं वरन् वे ही आस्तिक कहलाने अधिकारी भी कहे जायेंगे। आस्तिक, भाव सम्पन्न स्वरूप, भव्य स्वरूप व्यक्तित्व का निर्माण इन प्रयत्नों द्वारा सम्पन्न हो सकता है। संसार सदा ही एक जैसा रहता तो नहीं मनुष्य समाज रूपी इस रथ रूपी संसार को चलाने का प्रयत्न कर रहे, सदा चलते ही दिखलायी या सम्मुख रहते ही नहीं, पर जब तक संसार का स्वरूप या मनुष्य का अन्तर्मन एक सा बना रहता आया या रहता दिखाई देता हो वहाँ तक विचारशील हो, या ज्ञानी पुरुष, संसार को सुखी करने सम्बन्धी परोपकारी प्रयत्न करते रहना सदा ही अपना जीवन उद्देश्य सम्बन्धी कर्त्तव्य मान ही चुके हैं या मान ही सकते हैं यह, सच्चे स्वरूप विषय सम्बन्धी बात विचारणीय है। संसार को संसारी व्यक्ति मात्र, संसार की नश्वर दिशा विषय मात्र सोच या देख ही सकते हैं पर आत्म-ज्ञान सम्पन्नों को इस जग--संसार रूपी व्यवस्था का संचालक तो परमात्मा ही प्रतीत हो, विचार या दृष्टि व नियंता कर्ता-धर्ता सर्वसमर्थ तो वही माना जाता है। विचारशीलता का लक्ष्य तो यही हो कर ही रहा है जिस से संसार की संकीर्णताओं को त्याग, ईश्वरत्व का ध्यान, परब्रह्म का भजन, आत्मज्ञान का सतत चिन्तन आदि करते रहने का नाम ही ज्ञान या परमात्मा की ही भक्ति माना गया हो जो संसार के हर रूप रंग में परमात्मा का स्वरूप या हर प्राणी अथवा वस्तु को, ईश्वर का रूप मान कर संसार की भलाई के विचार करना ही तो इस दिशा विषय मात्र में सच्चा परोपकारी रूप धारण करना अथवा संसार को परमात्मा का ही रूप मान उसी रूप से संसार का उद्धार अथवा कल्याण हो, इस का यत्न करना कहा जा सके तो इस दिशा विचार को ही सच्चा परोपकार कहा जाएगा या इस को ईश्वर रूप मान कर कहा जा सकेगा? यह तो सब जान ही रहे कि जो मनुष्य मात्र का हित सोचता है, संसार का तो नहीं, पर तो मानवतावादी रूप विचार को धारण करता ही है इसलिए, वह तो उन विचारों, जो मात्र या संकीर्णतावादी कहलाएं, उन से तो निश्चित रूप से महान् ही कहा जा सके, इसलिए मनुष्य, जो संसार मात्र हित को ही विचारता या उस दिशा में यत्न कर रहा, सच्चा परोपकारी तो अवश्य कहा जाएगा, सच्चा मानवतावादी ही, सच्चा समदर्शी ही, सच्चा निष्काम-कर्मयोगी ही, संसार का हितैषी ही कहा जा सकता है। भगवान् व मनुष्य के बीच में इस संसार का कोई रूप रहना चाहिए या उस रूप को स्वीकार किया जा सकता है? स्वरूप मात्र का ही सवाल नहीं, मूल सवाल यह, स्वरूप मात्र से ही भगवान् स्वरूप तक पहुँचा जा सके? संसार के या मनुष्य कल्याणकारी रूप स्वरूप को ही ऐसा रूप मान लिया जाएगा? इस बात का जो जो निर्णय होगा वह, उस पर टिका रहेगा निश्चय ही; इस बात सम्बन्ध में तो प्रत्येक मानव भिन्न हो, पर प्रत्येक मानव रूपी अंश को भगवान् रूप अंश का रूप मान चलना होगा और, मानवता विशुद्धता को ही पाना रूप ही स्वीकार कर, संसार को नश्वर जान, उस को त्याग ईश्वर भक्ति सम्बन्धी ज्ञान की ओर, उस ओर ही सारा ध्यान दिया जाना ही तो सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था बने, इसलिए सच्चा स्वरूप तो वही, संसारता को ही जो मात्र त्याग का विषय मान ही चला हो। पर जो ऐसा सोचकर ही चलता हो, कि जब तक वह इस संसार में है संसार रूप व्यवस्था मात्र के सम्मुख उस द्वारा किए जाने का अधिकार ही, कर्मों मात्र को ज्ञान विशुद्धता से अलग भी या भिन्न रूप में माना ही जा रहा हो तब भी कर्म तो किए ही जा रहे जिन को कोई दिशा नहीं दी गई हो या जिस दिशा दी जा रही हो भगवान् का मार्ग दिशा मान लिया गया। ऐसी अवस्था में परोपकार रूप व्यवस्था का निर्वाह करना मात्र स्वार्थ कहलाए तो नहीं कहा जा, परोपकार का कोई स्वरूप तो, उसे सम्भव माना ही गया जिस द्वारा जीवित मात्र जीव संसार में कुछ लाभ पाए, तो ऐसा सब होने पर इसे सच्चा परोपकार कहें, वास्तविकता रूप में यह विचारणीय विषय बन ही जाता। जब तक मनुष्य आत्मा को नहीं पहचान पाता, तब तक वह कुछ भी जान सकेगा; यह साधारण सत्य ही हर एक ज्ञान विषय व्यवस्था द्वारा ही सामने आता रहा प्रमाणित रूप बना है, प्रत्येक बात का हल तो इसी रूप में-- स्वरूप, स्थिति से ही खोजा जाना चाहिए अथवा संभव पाया जाता रहा है। जो भी प्रयास किए जा रहे संसार सम्बन्धी ज्ञान के रूप में या दिशा द्वारा लिए जाने वाले कार्यों में, विचार अथवा, परोपकारी कर्म-कलाप द्वारा सब बातों का हल खोजना व्यर्थ 67
महाराज श्री बाबा जू--महाराज इस बात सुनो, संसार महा गम्भीर सागर, ताको पार पायो नाहिं, तब बाबा जी आज्ञा करी के तुम ठाकुर सिधार के सेवा करो सम्प्रदाय की, प्रथम गुरु ते दीक्षा ले, तब ठाकुर जी को पद सम्हारे मन्दिर महल के भीतर रहत महा दुख पाइयो हो, जो आज्ञा शिर पर धरी तब से सब संत जन को घर पर ही रख सेवा करते रहे ओ सेवा नित्य नित्य ही हो रही पर मन थिर नाहिं था सदा सोच विचार में ही रहे के कब साधु संग मिले तब ऐसा समय आया, के जो मन चाहा सो पाया संत के संग से ही, जो सोच था सो सब मिट गया तब से सदा ही सेवा में ही लगे रहे जिस चित्त सदा ही रहे, दो चार ही रोज सब संप्रदाय के संत महापुरुष एकत्र भए। भक्त संग भगवान् के संग ही समान जानत हैं ओ सेवा संप्रदाय की ही सबसे बढ़ के सेवा जान कही॥ सो संप्रदाय का स्वरूप यह, संप्रदाय की परम्परा से साँच उपजा जान सो सेवा की सार सब संप्रदाय जान, वैष्णव के चरण रज सीस धार, साधु ही आधार दो हाथ सिर नवावत सदा, 5 प्रकार सदा भक्त रूप जान, 5 प्रकार सदा विभूति सदा भगवत् स्वरूप, प्रथम साक्षात् संत, दूजा चरणामृत, तीजा चरणोदक जान--इन सब को एक भाव जान के हृदय में जो धार सो ही महापुरुषन के सब तन मन धन से लग सेवा में ही सदा भाव रख, ऐसा जो भक्त ताके पद कमल में वन्दन सो बार बार बार कहि कहि॥ ऐसी सेवा भक्त के चरण सेवा साक्षात् प्रभु सेवा जान कीजै जो संत के पग की रज सम और कछु नाहिं जो चरण सेवा नित्य करे सो निश्चय सुख को पावे जो रस सदा संत सेवा में पावत सोई, सेवा भाव सब तन मन धन से समर्पण हो जाय सब संप्रदाय के चरण कमल में वन्दन परम्परा से दीक्षा ले परम्परा के सत ज्ञान से चित्त को शुद्ध करत जावे, ज्ञान परम साक्षात्, जो ज्ञान संप्रदाय, ताके चरण में सदा ही समर्पण हो जो पर निंदक जन के पास न बैठ संप्रदाय जन के पद चरण में बैठ रहत, सो नर सदा सुखी, जो ऐसा नियम चित्त में धारत सो सब दुख से पार होइ जात है नाम जाप से ही सब पाप कटत, संत परम्परा कीजै, साधु सेवक जान, सेवक मन पावै, चरण रज सीस धारिबे को ध्यान कर मन के विकारों को दूर कर नाम जप ध्यान में लीन रहे सो भक्तन सेवा को ही सार जन के हृदय में बिचारै, संत शरण ही परम्परा जान तन मन से शरण हो जान सो ही सदा सुखी, सो वैष्णव परम्परा है॥ अब जो संप्रदाय की चरण रज आराधत सो सब काल में वन्दन के योग्य है, गुरु-मुख जान सब ज्ञान सार जानि संप्रदाय के चरण लाग रहे, वैष्णव-स्वरूप संप्रदाय के सब तन मन चित्त से ही सदा जान सेवा कर, 5 प्रकार से ही सदा जान प्रभु को साक्षात् ही हृदय भीतर निवास जान सेवा में ही तन मन को लीन कर--ऐसा जो स्वरूप प्रभु का जान जो सब तन मन चित्त से ही परम्परा को जाने सो--सच्चा, परमहंस, साधु संग ही संप्रदाय॥ दो प्रकार रूप, प्रथम तो स्वरूप के ज्ञान से ही संशय को दूर करि ले दूजे रूप में संप्रदाय के स्वरूप जान सदा सत्संग करै सो भक्तन भक्त कह सब संप्रदाय रूप ही स्वरूप जान, जो जो सब भाव मन भीतर ही धारै सो ज्ञान रूप तन मन को, हृदय से साधन ही उत्तम जान सब रूप 5 प्रकार रूप को सब भगवत् रूप जान संप्रदाय जान रहै, ऐसा भक्त जन, भक्त रूप जन के, संप्रदाय रूप ही के सब, भक्तन सेवा ही को संप्रदाय का रूप जान सो भक्त सो सदा साक्षात् ही प्रभु के चरण में लीन रहैगा ऐसा भक्त साक्षात् ही प्रभु का ही स्वरूप जान सो सब प्रकार सम्मुख ही हो संप्रदाय भक्त जन को ज्ञान रूप ही हो जावे, जो जो सब प्रकार से सेवा भाव करैगा सोई साक्षात् रूप संप्रदाय का ही स्वरूप जान, सो ऐसा जो संप्रदाय स्वरूप को प्रकार से जाने संप्रदाय को सो पर प्रगट? सो सब को संशय रूप को दूर करि संशय मिटावै? सो जो जन सो संप्रदाय स्वरूप सदा जानत सब के संशय मिटा 5 रूप, सो भक्त वैष्णव सो सब संत जनन को संप्रदाय के स्वरूप जान तन मन चित्त से सदा जान सदा वन्दन करै॥ 68
विचार यह करना पड़ता होगा तथा अन्य जितने धर्मावलम्बी हैं, उन सब ग्रन्थकारों का विचार देखना ही नहीं पड़ा होगा कि सर्वज्ञता किसके द्वारा कब प्राप्त हुई, किस प्रकार मिली वा क्यों मिली सो तो सर्वज्ञता उनकी बनाई हुई नहीं, केवल अपने मन कल्पित ईश्वर की आज्ञा--मात्र समझ रक्खी कि ईश्वर की यह आज्ञा सर्वशास्त्रों से परे है, न्यायशास्त्र से, विचार से परे है, विचार का तो काम, जो आज्ञा ईश्वर शास्त्र कह देवे उसी पर दृढ--रह विश्वास रखना चाहिए विचार को आज्ञा मानना, शास्त्रार्थ का ध्यान रखना, विचार, न्याय इनको तो वे कुछ नहीं समझते, केवल हठ और जिद को ही अपना धर्म व मुक्ति का मुख्य कारण जानते हैं। महाशय जी कुछ सोच समझ कर न्याय को हाथ में रख कर न्याय विचार से ही निर्णय करें कि न्याय क्या वस्तु? जो सर्वज्ञता को माने, बिना प्रमाण के ईश्वर को सर्वज्ञ कह देवै सो न्याय कैसे कहा जाय, वा जो मनुष्य अपने आत्मा को सर्वज्ञता सिद्ध कर सकता है, सो न्याय हुआ, यह विचारिये! न्याय क्या हठ, जिद्द रूप होता है! जो मनुष्य सत्य को ग्रहण कर न्याय को, न्यायपूर्वक ग्रहण करता है सो सत्य को प्राप्त हो जाता है, जब सत्य मिल जाता है तब न्याय के कारण से उस सत्य की सब ओर प्रभावना हो गई, जब प्रभावना हो गई तब न्यायपूर्वक अपने को सर्वज्ञ भी कह सकता है क्योंकि उस समय, सर्वज्ञता प्राप्त करने का समय, वा काम ही ऐसा किया जब सत्य काम किया तब प्रभावना सत्य ही होगी और सत्य प्रभावना द्वारा सर्वज्ञ प्रभावना रूप फल सत्य प्राप्त हुआ तो क्या इस न्याय को कोई हटा सकता है वा इस न्याय का खण्डन कोई कर सकता है? नहीं, कदापि नहीं। इस प्रकार के न्याय द्वारा विचार करने में ही सत्य लाभ हो सकता है, नहीं तो कभी भी सत्य का लाभ महाशय जी जब इस प्रकार सत्य, न्याय से सर्वज्ञता का काम सिद्ध होता आया तो मानना ही पड़ा, जब सर्वज्ञता के इस सत्य काम को सत्य माना गया तो सर्वज्ञ भी रहा, सर्वज्ञ प्रभावना भी रही और सर्वज्ञ परोपकार काम भी सिद्ध हुआ। जब केवल सर्वज्ञता ही न, सर्वज्ञता के कर्तव्य भी सिद्ध हैं, सर्वज्ञता के काम जो जगत हित वास्ते प्रभावना रूप में जो जगत कल्याण प्रभावना रूप काम सर्वज्ञ द्वारा न्यायपूर्वक किए गए उनका फल आज तक जगत पा रहा है क्या ईश्वर के काम द्वारा उस प्रकार फल जगत को प्राप्त हुआ, वा ईश्वर कृत वेद--विद्या से? कभी नहीं? जो न्यायपूर्वक काम सर्वज्ञ द्वारा किया गया सो सब ही सत्य काम आज तक चला आ रहा है और आगे भी सत्य रहेगा, जिस फल द्वारा वा प्रभाव द्वारा आज भी कल्याण हो, वा लाभ प्राप्त सर्वज्ञता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है वा सब प्रमाणों से बढ़ कर प्रत्यक्ष प्रमाण ही माना जा सकता है। जिस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण दृष्टिगोचर हो रहा उसके विरुद्ध जो कुछ कहा जावे वा माना जाय सो प्रत्यक्ष के विरुद्ध होने प्रमाण को गिरा सर्वथा असत्य ही होता है; सत्य को तो प्रत्यक्ष ही सिद्ध करता है; जब प्रत्यक्ष द्वारा सिद्ध हो चुका कि सर्वज्ञ सर्वव्यापक का काम कभी नहीं सिद्ध हुआ, केवल मन का ही कल्पित विचार मिथ्या सिद्ध है; सत्य प्रत्यक्ष से यह सिद्ध हुआ, फिर तो कोई भी बाधा इसमें बाकी नहीं रही। सर्वज्ञ काम के न्यायपूर्वक पद को समझना महाशय जी को कठिन नहीं था, जिस समय कि न्याय का सहारा ले सत्य काम को सच समझा जा सकता था। केवल उस स्वभाव रूप काम में, जो सब स्वभाव रूप काम है, उस ही बात द्वारा सब ही महाशयों द्वारा अपने सिद्धान्त की बात सर्वज्ञ द्वारा सत्य--प्रमाण सिद्ध होती रही? तब फिर इसमें क्यों? संशय रूपी विचार किया गया? जो मनुष्य सब प्रकार से न्याय को ही अपना आधार बनाता है वह सर्वथा सत्य फल पाता है। महाशय जी को सत्य न्याय का ही आधार लेना उचित था। सत्य न्याय का काम न करके जो बात मन कल्पित ईश्वर के नाम पर कही गई सो अयोग्य, वा झूठ बात, जो सब शास्त्रों व सब विचार न्यायपूर्वक रूप सब ग्रन्थों से बाहर निकली, वा उस ग्रन्थ द्वारा भी सब बात सच सिद्ध नहीं हो सकी, उस कल्पना, उस अज्ञानता द्वारा ही कही। संसार में प्रत्यक्ष देखा गया, देखा जा रहा, देखा जा रहा, परोपकार का काम जितना भी हुआ सर्वज्ञ द्वारा हुआ ईश्वर द्वारा तो कुछ भी सिद्ध नहीं होता हुआ देखा न मन कल्पित शास्त्र सम्मत द्वारा ही परोपकार का कोई काम हो ही सकता जिससे जगत का भला हो सके या ईश्वर के कर्तव्य का ऐसा लाभ-नुकसान का कुछ फल जगत को सर्वथा प्राप्त हो सकता जिस द्वारा जगत का उद्धार व कल्याण 69
विचार कर प्रत्येक निर्णय लेना चाहिए व प्रत्येक विषय पर विचार परस्पर होना चाहिए जिससे कि व्यक्तिगत रूप से निर्णय अन्याय पूर्ण बन कर रह न जाये ताकि हर एक न्याय पाकर सन्तुष्ट इसलिए प्रजाजन को भी शांत रहना चाहिए कि जो राज्य व्यवस्था बनाई जावेगी वह भी प्रजाजन की भलाई का ही ध्यान रखकर आवश्यकतानुसार बनाई जा सकती इसलिए राजा का वचन मानना होगा, और राजा को भी प्रजाजन निष्ठा का ध्यान रखना पड़ेगा। संक्षेप वार्ता, समस्त प्रजा शांत होकर बैठ पर राजा का न्याय कुछ और ही प्रकार का हुआ। राजा निष्पक्ष न्याय का वचन दे रहा इसलिए सब जनता शांत हो कर न्यायाधिकरण की आज्ञा सुनने लगी कि सब प्रजाजन यह जान ले कि प्रजाजन निष्पक्ष न्याय व आज्ञा पर निर्भर रहा करते हैं। जैसा न्याय सब मनुष्य पर लागू हो सके, जो दोषी होगा उसको सजा मिलेगी ही मिलेगी पर कोई निर्दोष राजा से अन्याय नहीं पा सकता है सो, राजा ने कहा महाराज यह निर्णय होना चाहिए कि राज्य व्यवस्था को सुचारू रूप देने वाले अधिकारी जन स्वयं हैं, जो कि न्याय दिला रहे अथवा जो प्रजाजन आज्ञाकारी बनकर रह रहे सो इसका फल सब प्रजा जनो को मिलना ही चाहिये पर केवल न्याय व्यवस्था में भेद हो तो उस विभेद का भी निर्णय हो जाना व होना सो कहा सब राजा महाराजा तो हो ही जाते पर उन सब का भेद जानना एक ही न्याय का फल हो सके ऐसा संभव होगा? राजा तो केवल यह, राजा से सब भय खायें सब प्रजा न्याय मांगें और राजा दे देवे ऐसा न्याय तो प्रत्येक राजा स्वयं करता रहा सो न्याय का फल न होने पर भय तो बना रहेगा न्याय व्यवस्था सब पर लागू हो यह होना ही चाहिये पर ऐसा न हो! राज्य सत्ता के बल पर राजा अन्याय करता जाय जिससे सब जन तंग आ जावें पर राजा का आज्ञा से डर कर सिर झुकाते रहें। इसका फल किस प्रकार से प्रजा पावेगी सो विचार कर ही कोई निर्णय प्रत्येक जन हित बने न्यायाधिकरण सब पर तो लागू हो, पर राजा तो स्वतंत्र सब से अलग ही रहेगा ऐसा सब का भाव रहेगा ही, सो राजा निष्पक्ष जन बनके स्वयं आगे आ कर जो कुछ अपने विषय में सुन रहा हो सो ऐसा समझ के प्रजा केवल यह निर्णय करने को तो नहीं बैठी कि राजा का पक्ष ले अथवा न्याय का साथ दे। सो न्याय तो निष्पक्ष ही सब का अधिकार है? सब प्रजाजन मत से न्याय का पक्ष न देवे तो! राजा को राज्य का त्याग, अथवा निष्पक्ष न्याय प्रणाली को मान कर सिर झुका कर ही ऐसा वचन देना होगा जिस पर सब न्यायाधिकरण की सब बात सुन राजा ने समझा कि बात ठीक, केवल यह बात कही, प्रजाजन तो सदा विचार करके न्याय करते आये हैं। आज तक राजा जन सदा उन पर ही तो सब आज्ञा प्रचार करके ही राज्य करते रहे सो व्यवस्था तो रही, केवल प्रजा पर न्याय किस प्रकार? राजा पर क्या न्याय होगा? राजा तो एक, सब जन तो अनेक हैं! राजा सब प्रजा जनो पर एक समान दृष्टि से नहीं देखता अथवा पक्षपात का व्यवहार ही करता रहा सो तो ठीक नहीं कहा जा सके इस दशा में राजा निष्पक्ष न हो तो न्याय की बात का कोई अर्थ सिद्ध नहीं होता है, बात केवल इतनी, कि राजा सब प्रजाजन का समान रूप से न्याय करे और निष्पक्ष रूप से सत्य को जाने तथा सत्य निर्णय दे सके सो सब को यह तो मानना ही होगा कि सत्य, प्रजाजन अथवा राजा सभी केवल प्रजा के पक्षपाती ही हैं जिससे सब का विश्वास टूट, निष्पक्ष रूप से निर्णय सब प्रजा न्यायाधिकरण के समक्ष रखे, प्रजा के सम्मुख राजा का भी न्याय हो तो प्रजा का विश्वास और बढ़ेगा! सब को भय होगा राजा भी अपराधी हो! राजा स्वयं ही न्याय का पालन कर ले तो अन्य जनो का क्या वश जो वे कहें, राजा तो स्वयं न्याय का पालन कर रहा सब को अपने ही समान न्याय समझ राजा बन बैठा राजा का रूप तो रूप-रंग सब जन सा ही है पर वह न्याय की मूर्ति कहलाये, जिसे प्रजाजन ही रूप देते हैं सो उस पर विश्वास बहुत अधिक सब जन का मन ही लगा रहेगा ऐसा समझ कर सब जन को भी न्यायाधिकरण से ही सहायता मिले ऐसा ही प्रजा प्रत्येक को भी भय तो निष्पक्ष रूप का रहेगा जिससे सब का न्याय पर विश्वास रहे, जिससे कि व्यक्तिगत रूप से न्याय सब पाकर राजा को सब जन ही पूज्य मान कर राजा के वचन का पालन करेंगे 70