माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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गया अथवा नहीं, यह जानकर समाधान कर सके ऐसा कोई भी तो उपाय उनके पास नहीं था। इसके सिवा उनकी धारणाएं विकृत थीं, जो इसके पर सत्य स्वरूप को जान सके ऐसा उपाय, जो केवल उनके पास ही था पर वे उस पर ध्यान नहीं देते थे। वे केवल एक ईश्वर की पूजा के स्थान पर अनेक अन्य कल्पित देवी-देवताओं की भी पूजा करने लगे थे। उन्होंने यह नहीं समझा कि ईश्वर तो एक है, परब्रह्म के रूप में। फिर भी उसे कई नामों से पुकारा, जैसे कि अग्नि के रूप में, जल के रूप में। इस प्रकार कुछ कल्पित देवी-देवता बन गये, जिनके पास शक्तियां थीं; जैसे कि, इन्द्र देव, जल के देव, वायु के देव, सूर्य देव, चन्द्रमा के देव। इस पर उस समय भी एक मत के लोग एकत्र नहीं थे। कुछ लोग तो, जो ईश्वर के सच्चे उपासक थे, वे इस प्रकार की धारणाओं से विमुख रहते थे, वे तो केवल ईश्वर की, जो सर्व शक्तिमान था और सब का रचियता था और सब को देखता था, उस की पूजा में लगे थे, पर उनकी संख्या कम थी, वे संख्या में कम थे। अतः वे इन बातों को रोक न सके जो केवल अन्धविश्वास थी, जिसे वे धर्म समझ रहे, न वे धर्म सुधार सके। इसके अतिरिक्त धर्म का पतन हो रहा था... इस कारण से कि इस काल में कुछ ऐसे भी, जो स्वयं को ज्ञानी मानते, ऋषि और सन्यासी मानते, पर थे वास्तव में अज्ञानी थी, वे इस बात पर बल देने लगे कि ईश्वर केवल यज्ञ के रूप में मिल सकता, और यह धार्मिक कृत्य केवल ब्राह्मण ही कर सकते हैं। इस प्रकार एक तो पाखण्ड और बढ़ गया जिसके कारण उस काल में, जब कि यज्ञों में पशुओं की बलि दी जाने लगी, एक विशेष वर्ग, जिसे पुरोहित वर्ग कहते, ने अपने स्वार्थ के लिए ईश्वर को, यज्ञों द्वारा प्रसन्न करने का, मार्ग बना कर लोगों को, यज्ञों द्वारा ठगना शुरू कर दिया। ईश्वर के नाम पर इस प्रकार के अनाचार का फल यह हुआ कि वेद काल समाप्त, जिसे सत्य युग, या सतयुग कहते हैं, वह समाप्त हो गया, क्योंकि इस प्रकार अनाचार उस समय का रूप बन चुका था। इस काल में जहाँ कर्म का महत्व समाप्त हो चुका था और भाग्य का ही बोलबाला था। उस समय का मानव यज्ञ, बलि पर सब कुछ निर्भर समझता हुआ कर्म से ही विमुख होकर, केवल इन साधनों पर ही अपने उद्धार का साधन समझने लगा था। हाँ, जब ऐसा समय आ गया, धर्म के नाम पर ऐसा अधर्म होने लगा जिससे मनुष्य का भाग्य केवल भाग्य पर ही छोड़ कर भगवान और ईश्वर को भूलने लगा तो मनुष्य का उद्धार करने हेतु इस धरा पर अनेक अवतारी पुरुषों और महात्माओं का आगमन हुआ। ईश्वर ने जब देखा कि उसके द्वारा बनाये गये संसार में मनुष्य भ्रम में फंसा हुआ है और सत्य मार्ग छोड़कर अधर्म के मार्ग पर चल रहा है तथा उसके कर्म समाप्त हो रहे हैं तथा केवल कर्म के नाम पर पाखण्ड हो रहा है। महात्मा बुद्ध के पूर्व काल की जो यह दशा थी, उस समय एक ऐसा महा- मानव का इस धरा पर जन्म हुआ जो इन सब कुरीतियों को दूर करने में सहायक हुआ, जिसे भगवान बुद्ध कहते हैं। वे इस धरा पर धर्म को सच्चा स्वरूप प्रदान करने में सहायक हुए तथा उनके द्वारा चलाये गये बौद्ध धर्म से इस धरा पर एक नई चेतना का उदय हुआ तथा वह धर्म भारत की सीमाओं से बाहर जाकर भी, विश्व का सबसे बड़ा धर्म बन गया! हाँ, जब यह अनाचार, यह अन्धविश्वास और यह दुराचार इस संसार में व्याप्त था, तब इस समय के काल के अनुसार इस धरा पर महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ। यह समय ईसा मसीह के जन्म से पूर्व की लगभग छठी शती का था। इस समय मगध साम्राज्य, जो उस समय अपने में महान था, उत्तर भारत में बहुत शक्तिशाली माना जाता था। इस काल के इतिहास के अनुसार मगध के साथ तीन अन्य बड़े राज्य भी भारत में थे, जो अपने प्रभाव तथा प्रभुत्व के कारण विख्यात थे। वे थे, कोशल राज्य, वत्स राज्य तथा अवन्ति राज्य। इन चार शक्तिशाली राज्यों में मगध का साम्राज्य सबसे शक्तिशाली था, जिसे इस काल में सब से श्रेष्ठ माना गया था; शेष अन्य तीन राज्य भी कुछ कम नहीं थे। इन चार बड़े साम्राज्यों के अतिरिक्त कुछ छोटे-छोटे राज्य भी उस समय भारत के पूर्व में थे। इनमें से कुछ गणतन्त्र राज्यों में शाक्य राज्य भी एक था। शाक्य वंश का राज्य हिमालय की तराई में स्थित था। इस राज्य की राजधानी कपिलवस्तु थी। यह राज्य आधुनिक नेपाल की सीमा पर स्थित था। इस शाक्य वंश के राजा शुद्धोदन थे, जिनकी पत्नी का नाम माया देवी था। राजा शुद्धोदन बड़े-बड़े प्रतापी राजा थे तथा उनकी ख्याति सर्वत्र फैली हुई थी। 59
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भाग 4 (पृष्ठ 61-80)
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[L1-L27] (फ़ॉन्ट लोड न होने के कारण मूल पाठ अपठनीय है)
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इस प्रकार सब तरफ अन्धेर देखकर, चिन्ता निमग्न होकर, वह दीन बालक रोता हुआ अपनी माताके सम्मुख जाकर हाथ जोड बोला... ! माताजी तुम इस संसारके सब काम को जानती हुई यह नहीं जानती हो! मेरी माता, यह चिन्ता का विषय सब बातों का है। संसार मुझे उपनयन योग्य विद्याध्ययन योग्य सब तरह योग्य समझ कर पिता का गोत्र पूछ रहा है। यह बात सच है, यह सब विद्याध्ययन को रोकके हैं, संस्कार को रोकके हैं॥ आप यह विचार कभी मन में मत करो, कि विद्या का पढना केवल आजीविका का साधन है। यह केवल विद्या, यह केवल सत्य बात नहीं कही गई! इस बात को जानने का यही यत्न हो रहा रहता है। यह सत्य विचार बहुत बडा! सत्य विद्या संसार का परम आधार माना॥ सत्यके प्रकाश का आधार तो इस बात का विचार करना मनुष्य जीवनके सब ओर से हो रहा है। सत्य को धारण कर चलने का नाम जीवन धर्मयुक्त बतलाया गया, इसमें तनिक सन्देहभीनहीं, सत्य विचारधारामें विचर कर हम इस जीवन संग्राम को पारकरके ही रहेंगे। हे माता, हम सत्य विचार सम्बन्धी अपने धर्म से कभी विचलित होकर न रहेंगे! विद्याका अभ्यास करना ही तो परम धर्म है, जो सत्यका उपदेशक बनकर सब का उद्धार करेगा? विद्या ही जीवनका आधार? विद्या ही सत्य विचार सिखाकर, यह भव-पार करानेका साधन कराके सत्य विचार देती। संसार में जो सत्य धर्म को नहीं जान सके रहे, वे सत्य विचार का नाम कभी न लेंगे, न सत्य की शरण जाना चाहेंगे! विद्या का प्रकाश? विद्या का विचार सब, जो सत्य का सिखाता? सत्यविचारको सब ही प्रकाश करना चाहते हैं। जहां विचारका प्रकाश आ जाता है। वहां तम, अन्धकारका नाश निश्चित हो ही जाता है। इसी से तो सत्य विचार द्वारा ही सब संसार को पार कर लें! इस प्रकार सत्य ही तो सत्य विद्या का आधारभूत माना गया है। यह विचार तो माता सत्यविचार द्वारा ही हो सकता रहता है। संसार को सब तरह का सत्य विचार प्रकाश मिलना योग्य॥ विद्याध्ययन ही तो केवल सब तरह सत्य द्वारा इस संसार को, समाज को, राष्ट्रको सब तरह उद्धार का यत्न करा सक्ता, यह सत्यका विचार रहा॥ सत्यका विचार ही तो, विद्या द्वारा ही हो सकता रहता है। इस प्रकार, यह विचार सत्य ही सत्य को चमकावे॥ अब इस सत्यका क्या रूप हो सकता? सत्य प्रकाशक सन्तों की शरणमें ही सब होवे! यह सुनकर ही वह, सत्यकामकी माता इस यत्न को कराने को उद्यत होकर सब तरफ ध्यान कर के विचारने लगी। इस प्रकार, सत्यकामके विचारों द्वारा ही सब सत्य का ही प्रकाश, न असत्य आधार, न सन्देहका ही नाम प्रकाश हो कर सब प्रकार सत्यकामके मन को सत्यकी ओर ही प्रेरित किया॥ सब भाव-रूप से यह विचार माताके मन विचार कर सब तरह सत्य द्वारा तय हुआ गया कि, जो सत्य हो, वह सत्य ही सत्यका अवलम्बन ले। सब तरह सत्य की शरण ही सबसे उत्तम उपाय माता द्वारा भाव-रूप से तय करके निर्णय किया गया विचार हुआ । अतः, सब को सत्य द्वारा सम्बोधन कर सत्यता की ओर ही झुकाव हो ही जाता है। सत्यके न भय होवे! सत्यका ही तो बल है, विद्याध्ययन द्वारा सत्य विद्या का विचार ही तो सब तरह, सत्य ही सब कुछ, उस सत्य द्वारा सब तरह विचार होता रहे, सब प्रकार सत्य विद्या का विचार सब प्रकार सत्य द्वारा सब तरह सम्भव होकर अपने सत्य विचार द्वारा सब आधार सत्य प्रकार सत्य बना कर रहे, सत्य मार्ग, ही सब तरह हो? इस प्रकार सब, सब तरह सत्यके द्वारा ही तो सत्य द्वारा सत्यज्ञान प्रकार हो सकता रहा है। सत्यका विचार द्वारा, यह सत्यता द्वारा ही सम्भव हुआ॥ अब तो निश्चय हो गया, कि सत्यता ही है, सो ही सत्य द्वारा सत्य का सब ही प्रकाश हो! यह सुनकर ही वह, जो सत्यता द्वारा ही सब था, वह सत्यता द्वारा सब कुछ सत्य ही सब तरफ फैला॥ सत्यके प्रभाव द्वारा सब प्रकार सत्य का ही प्रभाव हो न सके? सब तरह, सत्य ही सब को विद्याध्ययन द्वारा भाव--विचार से ही सत्यता द्वारा प्रकाशित हो सकेगा॥ सो यह सत्यता द्वारा सब, सत्यता के आधारको ही ही सत्यद्वारा सत्य विचार प्रकाश का रूप सत्य को धारण करके सत्य ही सब तरह प्रकाशित रहा, सत्यता का सब तरह प्रकाश ही सब तरफ सब प्रकार का सत्य ही प्रकाश फैला॥ 63
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इस तरह विचार कर संसार का भला करने का मन बनाए रखना व उस दिशा विशेष प्रयत्न निरन्तर- प्रयास करते रहने वाले ही न केवल सच्चे परोपकारी कहे जा सकते हैं वरन् वे ही आस्तिक कहलाने अधिकारी भी कहे जायेंगे। आस्तिक, भाव सम्पन्न स्वरूप, भव्य स्वरूप व्यक्तित्व का निर्माण इन प्रयत्नों द्वारा सम्पन्न हो सकता है। संसार सदा ही एक जैसा रहता तो नहीं मनुष्य समाज रूपी इस रथ रूपी संसार को चलाने का प्रयत्न कर रहे, सदा चलते ही दिखलायी या सम्मुख रहते ही नहीं, पर जब तक संसार का स्वरूप या मनुष्य का अन्तर्मन एक सा बना रहता आया या रहता दिखाई देता हो वहाँ तक विचारशील हो, या ज्ञानी पुरुष, संसार को सुखी करने सम्बन्धी परोपकारी प्रयत्न करते रहना सदा ही अपना जीवन उद्देश्य सम्बन्धी कर्त्तव्य मान ही चुके हैं या मान ही सकते हैं यह, सच्चे स्वरूप विषय सम्बन्धी बात विचारणीय है। संसार को संसारी व्यक्ति मात्र, संसार की नश्वर दिशा विषय मात्र सोच या देख ही सकते हैं पर आत्म-ज्ञान सम्पन्नों को इस जग--संसार रूपी व्यवस्था का संचालक तो परमात्मा ही प्रतीत हो, विचार या दृष्टि व नियंता कर्ता-धर्ता सर्वसमर्थ तो वही माना जाता है। विचारशीलता का लक्ष्य तो यही हो कर ही रहा है जिस से संसार की संकीर्णताओं को त्याग, ईश्वरत्व का ध्यान, परब्रह्म का भजन, आत्मज्ञान का सतत चिन्तन आदि करते रहने का नाम ही ज्ञान या परमात्मा की ही भक्ति माना गया हो जो संसार के हर रूप रंग में परमात्मा का स्वरूप या हर प्राणी अथवा वस्तु को, ईश्वर का रूप मान कर संसार की भलाई के विचार करना ही तो इस दिशा विषय मात्र में सच्चा परोपकारी रूप धारण करना अथवा संसार को परमात्मा का ही रूप मान उसी रूप से संसार का उद्धार अथवा कल्याण हो, इस का यत्न करना कहा जा सके तो इस दिशा विचार को ही सच्चा परोपकार कहा जाएगा या इस को ईश्वर रूप मान कर कहा जा सकेगा? यह तो सब जान ही रहे कि जो मनुष्य मात्र का हित सोचता है, संसार का तो नहीं, पर तो मानवतावादी रूप विचार को धारण करता ही है इसलिए, वह तो उन विचारों, जो मात्र या संकीर्णतावादी कहलाएं, उन से तो निश्चित रूप से महान् ही कहा जा सके, इसलिए मनुष्य, जो संसार मात्र हित को ही विचारता या उस दिशा में यत्न कर रहा, सच्चा परोपकारी तो अवश्य कहा जाएगा, सच्चा मानवतावादी ही, सच्चा समदर्शी ही, सच्चा निष्काम-कर्मयोगी ही, संसार का हितैषी ही कहा जा सकता है। भगवान् व मनुष्य के बीच में इस संसार का कोई रूप रहना चाहिए या उस रूप को स्वीकार किया जा सकता है? स्वरूप मात्र का ही सवाल नहीं, मूल सवाल यह, स्वरूप मात्र से ही भगवान् स्वरूप तक पहुँचा जा सके? संसार के या मनुष्य कल्याणकारी रूप स्वरूप को ही ऐसा रूप मान लिया जाएगा? इस बात का जो जो निर्णय होगा वह, उस पर टिका रहेगा निश्चय ही; इस बात सम्बन्ध में तो प्रत्येक मानव भिन्न हो, पर प्रत्येक मानव रूपी अंश को भगवान् रूप अंश का रूप मान चलना होगा और, मानवता विशुद्धता को ही पाना रूप ही स्वीकार कर, संसार को नश्वर जान, उस को त्याग ईश्वर भक्ति सम्बन्धी ज्ञान की ओर, उस ओर ही सारा ध्यान दिया जाना ही तो सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था बने, इसलिए सच्चा स्वरूप तो वही, संसारता को ही जो मात्र त्याग का विषय मान ही चला हो। पर जो ऐसा सोचकर ही चलता हो, कि जब तक वह इस संसार में है संसार रूप व्यवस्था मात्र के सम्मुख उस द्वारा किए जाने का अधिकार ही, कर्मों मात्र को ज्ञान विशुद्धता से अलग भी या भिन्न रूप में माना ही जा रहा हो तब भी कर्म तो किए ही जा रहे जिन को कोई दिशा नहीं दी गई हो या जिस दिशा दी जा रही हो भगवान् का मार्ग दिशा मान लिया गया। ऐसी अवस्था में परोपकार रूप व्यवस्था का निर्वाह करना मात्र स्वार्थ कहलाए तो नहीं कहा जा, परोपकार का कोई स्वरूप तो, उसे सम्भव माना ही गया जिस द्वारा जीवित मात्र जीव संसार में कुछ लाभ पाए, तो ऐसा सब होने पर इसे सच्चा परोपकार कहें, वास्तविकता रूप में यह विचारणीय विषय बन ही जाता। जब तक मनुष्य आत्मा को नहीं पहचान पाता, तब तक वह कुछ भी जान सकेगा; यह साधारण सत्य ही हर एक ज्ञान विषय व्यवस्था द्वारा ही सामने आता रहा प्रमाणित रूप बना है, प्रत्येक बात का हल तो इसी रूप में-- स्वरूप, स्थिति से ही खोजा जाना चाहिए अथवा संभव पाया जाता रहा है। जो भी प्रयास किए जा रहे संसार सम्बन्धी ज्ञान के रूप में या दिशा द्वारा लिए जाने वाले कार्यों में, विचार अथवा, परोपकारी कर्म-कलाप द्वारा सब बातों का हल खोजना व्यर्थ 67
महाराज श्री बाबा जू--महाराज इस बात सुनो, संसार महा गम्भीर सागर, ताको पार पायो नाहिं, तब बाबा जी आज्ञा करी के तुम ठाकुर सिधार के सेवा करो सम्प्रदाय की, प्रथम गुरु ते दीक्षा ले, तब ठाकुर जी को पद सम्हारे मन्दिर महल के भीतर रहत महा दुख पाइयो हो, जो आज्ञा शिर पर धरी तब से सब संत जन को घर पर ही रख सेवा करते रहे ओ सेवा नित्य नित्य ही हो रही पर मन थिर नाहिं था सदा सोच विचार में ही रहे के कब साधु संग मिले तब ऐसा समय आया, के जो मन चाहा सो पाया संत के संग से ही, जो सोच था सो सब मिट गया तब से सदा ही सेवा में ही लगे रहे जिस चित्त सदा ही रहे, दो चार ही रोज सब संप्रदाय के संत महापुरुष एकत्र भए। भक्त संग भगवान् के संग ही समान जानत हैं ओ सेवा संप्रदाय की ही सबसे बढ़ के सेवा जान कही॥ सो संप्रदाय का स्वरूप यह, संप्रदाय की परम्परा से साँच उपजा जान सो सेवा की सार सब संप्रदाय जान, वैष्णव के चरण रज सीस धार, साधु ही आधार दो हाथ सिर नवावत सदा, 5 प्रकार सदा भक्त रूप जान, 5 प्रकार सदा विभूति सदा भगवत् स्वरूप, प्रथम साक्षात् संत, दूजा चरणामृत, तीजा चरणोदक जान--इन सब को एक भाव जान के हृदय में जो धार सो ही महापुरुषन के सब तन मन धन से लग सेवा में ही सदा भाव रख, ऐसा जो भक्त ताके पद कमल में वन्दन सो बार बार बार कहि कहि॥ ऐसी सेवा भक्त के चरण सेवा साक्षात् प्रभु सेवा जान कीजै जो संत के पग की रज सम और कछु नाहिं जो चरण सेवा नित्य करे सो निश्चय सुख को पावे जो रस सदा संत सेवा में पावत सोई, सेवा भाव सब तन मन धन से समर्पण हो जाय सब संप्रदाय के चरण कमल में वन्दन परम्परा से दीक्षा ले परम्परा के सत ज्ञान से चित्त को शुद्ध करत जावे, ज्ञान परम साक्षात्, जो ज्ञान संप्रदाय, ताके चरण में सदा ही समर्पण हो जो पर निंदक जन के पास न बैठ संप्रदाय जन के पद चरण में बैठ रहत, सो नर सदा सुखी, जो ऐसा नियम चित्त में धारत सो सब दुख से पार होइ जात है नाम जाप से ही सब पाप कटत, संत परम्परा कीजै, साधु सेवक जान, सेवक मन पावै, चरण रज सीस धारिबे को ध्यान कर मन के विकारों को दूर कर नाम जप ध्यान में लीन रहे सो भक्तन सेवा को ही सार जन के हृदय में बिचारै, संत शरण ही परम्परा जान तन मन से शरण हो जान सो ही सदा सुखी, सो वैष्णव परम्परा है॥ अब जो संप्रदाय की चरण रज आराधत सो सब काल में वन्दन के योग्य है, गुरु-मुख जान सब ज्ञान सार जानि संप्रदाय के चरण लाग रहे, वैष्णव-स्वरूप संप्रदाय के सब तन मन चित्त से ही सदा जान सेवा कर, 5 प्रकार से ही सदा जान प्रभु को साक्षात् ही हृदय भीतर निवास जान सेवा में ही तन मन को लीन कर--ऐसा जो स्वरूप प्रभु का जान जो सब तन मन चित्त से ही परम्परा को जाने सो--सच्चा, परमहंस, साधु संग ही संप्रदाय॥ दो प्रकार रूप, प्रथम तो स्वरूप के ज्ञान से ही संशय को दूर करि ले दूजे रूप में संप्रदाय के स्वरूप जान सदा सत्संग करै सो भक्तन भक्त कह सब संप्रदाय रूप ही स्वरूप जान, जो जो सब भाव मन भीतर ही धारै सो ज्ञान रूप तन मन को, हृदय से साधन ही उत्तम जान सब रूप 5 प्रकार रूप को सब भगवत् रूप जान संप्रदाय जान रहै, ऐसा भक्त जन, भक्त रूप जन के, संप्रदाय रूप ही के सब, भक्तन सेवा ही को संप्रदाय का रूप जान सो भक्त सो सदा साक्षात् ही प्रभु के चरण में लीन रहैगा ऐसा भक्त साक्षात् ही प्रभु का ही स्वरूप जान सो सब प्रकार सम्मुख ही हो संप्रदाय भक्त जन को ज्ञान रूप ही हो जावे, जो जो सब प्रकार से सेवा भाव करैगा सोई साक्षात् रूप संप्रदाय का ही स्वरूप जान, सो ऐसा जो संप्रदाय स्वरूप को प्रकार से जाने संप्रदाय को सो पर प्रगट? सो सब को संशय रूप को दूर करि संशय मिटावै? सो जो जन सो संप्रदाय स्वरूप सदा जानत सब के संशय मिटा 5 रूप, सो भक्त वैष्णव सो सब संत जनन को संप्रदाय के स्वरूप जान तन मन चित्त से सदा जान सदा वन्दन करै॥ 68
विचार यह करना पड़ता होगा तथा अन्य जितने धर्मावलम्बी हैं, उन सब ग्रन्थकारों का विचार देखना ही नहीं पड़ा होगा कि सर्वज्ञता किसके द्वारा कब प्राप्त हुई, किस प्रकार मिली वा क्यों मिली सो तो सर्वज्ञता उनकी बनाई हुई नहीं, केवल अपने मन कल्पित ईश्वर की आज्ञा--मात्र समझ रक्खी कि ईश्वर की यह आज्ञा सर्वशास्त्रों से परे है, न्यायशास्त्र से, विचार से परे है, विचार का तो काम, जो आज्ञा ईश्वर शास्त्र कह देवे उसी पर दृढ--रह विश्वास रखना चाहिए विचार को आज्ञा मानना, शास्त्रार्थ का ध्यान रखना, विचार, न्याय इनको तो वे कुछ नहीं समझते, केवल हठ और जिद को ही अपना धर्म व मुक्ति का मुख्य कारण जानते हैं। महाशय जी कुछ सोच समझ कर न्याय को हाथ में रख कर न्याय विचार से ही निर्णय करें कि न्याय क्या वस्तु? जो सर्वज्ञता को माने, बिना प्रमाण के ईश्वर को सर्वज्ञ कह देवै सो न्याय कैसे कहा जाय, वा जो मनुष्य अपने आत्मा को सर्वज्ञता सिद्ध कर सकता है, सो न्याय हुआ, यह विचारिये! न्याय क्या हठ, जिद्द रूप होता है! जो मनुष्य सत्य को ग्रहण कर न्याय को, न्यायपूर्वक ग्रहण करता है सो सत्य को प्राप्त हो जाता है, जब सत्य मिल जाता है तब न्याय के कारण से उस सत्य की सब ओर प्रभावना हो गई, जब प्रभावना हो गई तब न्यायपूर्वक अपने को सर्वज्ञ भी कह सकता है क्योंकि उस समय, सर्वज्ञता प्राप्त करने का समय, वा काम ही ऐसा किया जब सत्य काम किया तब प्रभावना सत्य ही होगी और सत्य प्रभावना द्वारा सर्वज्ञ प्रभावना रूप फल सत्य प्राप्त हुआ तो क्या इस न्याय को कोई हटा सकता है वा इस न्याय का खण्डन कोई कर सकता है? नहीं, कदापि नहीं। इस प्रकार के न्याय द्वारा विचार करने में ही सत्य लाभ हो सकता है, नहीं तो कभी भी सत्य का लाभ महाशय जी जब इस प्रकार सत्य, न्याय से सर्वज्ञता का काम सिद्ध होता आया तो मानना ही पड़ा, जब सर्वज्ञता के इस सत्य काम को सत्य माना गया तो सर्वज्ञ भी रहा, सर्वज्ञ प्रभावना भी रही और सर्वज्ञ परोपकार काम भी सिद्ध हुआ। जब केवल सर्वज्ञता ही न, सर्वज्ञता के कर्तव्य भी सिद्ध हैं, सर्वज्ञता के काम जो जगत हित वास्ते प्रभावना रूप में जो जगत कल्याण प्रभावना रूप काम सर्वज्ञ द्वारा न्यायपूर्वक किए गए उनका फल आज तक जगत पा रहा है क्या ईश्वर के काम द्वारा उस प्रकार फल जगत को प्राप्त हुआ, वा ईश्वर कृत वेद--विद्या से? कभी नहीं? जो न्यायपूर्वक काम सर्वज्ञ द्वारा किया गया सो सब ही सत्य काम आज तक चला आ रहा है और आगे भी सत्य रहेगा, जिस फल द्वारा वा प्रभाव द्वारा आज भी कल्याण हो, वा लाभ प्राप्त सर्वज्ञता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है वा सब प्रमाणों से बढ़ कर प्रत्यक्ष प्रमाण ही माना जा सकता है। जिस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण दृष्टिगोचर हो रहा उसके विरुद्ध जो कुछ कहा जावे वा माना जाय सो प्रत्यक्ष के विरुद्ध होने प्रमाण को गिरा सर्वथा असत्य ही होता है; सत्य को तो प्रत्यक्ष ही सिद्ध करता है; जब प्रत्यक्ष द्वारा सिद्ध हो चुका कि सर्वज्ञ सर्वव्यापक का काम कभी नहीं सिद्ध हुआ, केवल मन का ही कल्पित विचार मिथ्या सिद्ध है; सत्य प्रत्यक्ष से यह सिद्ध हुआ, फिर तो कोई भी बाधा इसमें बाकी नहीं रही। सर्वज्ञ काम के न्यायपूर्वक पद को समझना महाशय जी को कठिन नहीं था, जिस समय कि न्याय का सहारा ले सत्य काम को सच समझा जा सकता था। केवल उस स्वभाव रूप काम में, जो सब स्वभाव रूप काम है, उस ही बात द्वारा सब ही महाशयों द्वारा अपने सिद्धान्त की बात सर्वज्ञ द्वारा सत्य--प्रमाण सिद्ध होती रही? तब फिर इसमें क्यों? संशय रूपी विचार किया गया? जो मनुष्य सब प्रकार से न्याय को ही अपना आधार बनाता है वह सर्वथा सत्य फल पाता है। महाशय जी को सत्य न्याय का ही आधार लेना उचित था। सत्य न्याय का काम न करके जो बात मन कल्पित ईश्वर के नाम पर कही गई सो अयोग्य, वा झूठ बात, जो सब शास्त्रों व सब विचार न्यायपूर्वक रूप सब ग्रन्थों से बाहर निकली, वा उस ग्रन्थ द्वारा भी सब बात सच सिद्ध नहीं हो सकी, उस कल्पना, उस अज्ञानता द्वारा ही कही। संसार में प्रत्यक्ष देखा गया, देखा जा रहा, देखा जा रहा, परोपकार का काम जितना भी हुआ सर्वज्ञ द्वारा हुआ ईश्वर द्वारा तो कुछ भी सिद्ध नहीं होता हुआ देखा न मन कल्पित शास्त्र सम्मत द्वारा ही परोपकार का कोई काम हो ही सकता जिससे जगत का भला हो सके या ईश्वर के कर्तव्य का ऐसा लाभ-नुकसान का कुछ फल जगत को सर्वथा प्राप्त हो सकता जिस द्वारा जगत का उद्धार व कल्याण 69
विचार कर प्रत्येक निर्णय लेना चाहिए व प्रत्येक विषय पर विचार परस्पर होना चाहिए जिससे कि व्यक्तिगत रूप से निर्णय अन्याय पूर्ण बन कर रह न जाये ताकि हर एक न्याय पाकर सन्तुष्ट इसलिए प्रजाजन को भी शांत रहना चाहिए कि जो राज्य व्यवस्था बनाई जावेगी वह भी प्रजाजन की भलाई का ही ध्यान रखकर आवश्यकतानुसार बनाई जा सकती इसलिए राजा का वचन मानना होगा, और राजा को भी प्रजाजन निष्ठा का ध्यान रखना पड़ेगा। संक्षेप वार्ता, समस्त प्रजा शांत होकर बैठ पर राजा का न्याय कुछ और ही प्रकार का हुआ। राजा निष्पक्ष न्याय का वचन दे रहा इसलिए सब जनता शांत हो कर न्यायाधिकरण की आज्ञा सुनने लगी कि सब प्रजाजन यह जान ले कि प्रजाजन निष्पक्ष न्याय व आज्ञा पर निर्भर रहा करते हैं। जैसा न्याय सब मनुष्य पर लागू हो सके, जो दोषी होगा उसको सजा मिलेगी ही मिलेगी पर कोई निर्दोष राजा से अन्याय नहीं पा सकता है सो, राजा ने कहा महाराज यह निर्णय होना चाहिए कि राज्य व्यवस्था को सुचारू रूप देने वाले अधिकारी जन स्वयं हैं, जो कि न्याय दिला रहे अथवा जो प्रजाजन आज्ञाकारी बनकर रह रहे सो इसका फल सब प्रजा जनो को मिलना ही चाहिये पर केवल न्याय व्यवस्था में भेद हो तो उस विभेद का भी निर्णय हो जाना व होना सो कहा सब राजा महाराजा तो हो ही जाते पर उन सब का भेद जानना एक ही न्याय का फल हो सके ऐसा संभव होगा? राजा तो केवल यह, राजा से सब भय खायें सब प्रजा न्याय मांगें और राजा दे देवे ऐसा न्याय तो प्रत्येक राजा स्वयं करता रहा सो न्याय का फल न होने पर भय तो बना रहेगा न्याय व्यवस्था सब पर लागू हो यह होना ही चाहिये पर ऐसा न हो! राज्य सत्ता के बल पर राजा अन्याय करता जाय जिससे सब जन तंग आ जावें पर राजा का आज्ञा से डर कर सिर झुकाते रहें। इसका फल किस प्रकार से प्रजा पावेगी सो विचार कर ही कोई निर्णय प्रत्येक जन हित बने न्यायाधिकरण सब पर तो लागू हो, पर राजा तो स्वतंत्र सब से अलग ही रहेगा ऐसा सब का भाव रहेगा ही, सो राजा निष्पक्ष जन बनके स्वयं आगे आ कर जो कुछ अपने विषय में सुन रहा हो सो ऐसा समझ के प्रजा केवल यह निर्णय करने को तो नहीं बैठी कि राजा का पक्ष ले अथवा न्याय का साथ दे। सो न्याय तो निष्पक्ष ही सब का अधिकार है? सब प्रजाजन मत से न्याय का पक्ष न देवे तो! राजा को राज्य का त्याग, अथवा निष्पक्ष न्याय प्रणाली को मान कर सिर झुका कर ही ऐसा वचन देना होगा जिस पर सब न्यायाधिकरण की सब बात सुन राजा ने समझा कि बात ठीक, केवल यह बात कही, प्रजाजन तो सदा विचार करके न्याय करते आये हैं। आज तक राजा जन सदा उन पर ही तो सब आज्ञा प्रचार करके ही राज्य करते रहे सो व्यवस्था तो रही, केवल प्रजा पर न्याय किस प्रकार? राजा पर क्या न्याय होगा? राजा तो एक, सब जन तो अनेक हैं! राजा सब प्रजा जनो पर एक समान दृष्टि से नहीं देखता अथवा पक्षपात का व्यवहार ही करता रहा सो तो ठीक नहीं कहा जा सके इस दशा में राजा निष्पक्ष न हो तो न्याय की बात का कोई अर्थ सिद्ध नहीं होता है, बात केवल इतनी, कि राजा सब प्रजाजन का समान रूप से न्याय करे और निष्पक्ष रूप से सत्य को जाने तथा सत्य निर्णय दे सके सो सब को यह तो मानना ही होगा कि सत्य, प्रजाजन अथवा राजा सभी केवल प्रजा के पक्षपाती ही हैं जिससे सब का विश्वास टूट, निष्पक्ष रूप से निर्णय सब प्रजा न्यायाधिकरण के समक्ष रखे, प्रजा के सम्मुख राजा का भी न्याय हो तो प्रजा का विश्वास और बढ़ेगा! सब को भय होगा राजा भी अपराधी हो! राजा स्वयं ही न्याय का पालन कर ले तो अन्य जनो का क्या वश जो वे कहें, राजा तो स्वयं न्याय का पालन कर रहा सब को अपने ही समान न्याय समझ राजा बन बैठा राजा का रूप तो रूप-रंग सब जन सा ही है पर वह न्याय की मूर्ति कहलाये, जिसे प्रजाजन ही रूप देते हैं सो उस पर विश्वास बहुत अधिक सब जन का मन ही लगा रहेगा ऐसा समझ कर सब जन को भी न्यायाधिकरण से ही सहायता मिले ऐसा ही प्रजा प्रत्येक को भी भय तो निष्पक्ष रूप का रहेगा जिससे सब का न्याय पर विश्वास रहे, जिससे कि व्यक्तिगत रूप से न्याय सब पाकर राजा को सब जन ही पूज्य मान कर राजा के वचन का पालन करेंगे 70
इस पर शिष्य ने पूछा कि जब हम परमात्माका भजन, पूजन करतेहैं तो हमारे कष्टनिवृत्त, विद्या और धन आदिकीसिद्धि सहज क्यों नहीं होती? इसका समाधान यों समझना चाहिये कि जो पुरुष जैसा कर्मकरताहै, वैसा हीउसका, वैसा हीअन्यका, वैसा हीसृष्टिका, फल परमात्मा व्यवस्था करदेताहै अर्थात् जिस कामके करनेकीजिसको जो सामर्थ्यहै उसी कामके अनुकूल फल परमेश्वर उसको देताहै पर किसीके कर्मको दूसरानहीं हरसक्ता जो कोई जैसा काम करे उसका फल परमात्मा उसको वैसा हीदेता है, पर किसी का फल किसी को नहीं दे, अन्याय कभीनहोवे; इसीसे संसार अपने अपने कर्मोंका, सुख वा दुःख भोगे, न्याय कर्त्ता का ऐसा न्याय होना चाहिये कि अपराधीको दण्ड और जिसने भला काम करा हो उसको उसका बदला मिले इसी से जगत्कर्त्ता की महिमा वा न्याय विख्यातहै, इसके पर कुछ संशय, अविद्या वा कुतर्क करना वा परमात्मा की महिमाके जानने वाले को कभी नहीं होता तब शिष्य को ज्ञान हुआ, योग्य कहा, इसमें सन्देहकिसीबातका नहींहै परन्तु यह अवश्यहोना सिद्ध हुआ कि ईश्वर का ज्ञान सबसे अधिकहै इस कारण कभी किसीका अज्ञान कभी नहीं होगा इसी से ईश्वरका यह काम है कि सर्व जगत्का सब से उत्तम और उपकार करने के निमित्त सर्वदा सत्य ज्ञान सब जीवों के लिये प्रकाशित करे सो किया, सो किया जिस ग्रन्थ का--नाम वा व्याख्या जिस प्रकार से है सो कृपाकर के समझाइये सो, हे शिष्य-सुनपरमेश्वर वेद का ज्ञान सब विद्याओं सहित जगत् की आदिकाल में सर्व जीवों के उपकार केलिये कर, जो विचार के परमेश्वर का किया जानकर उस ग्रन्थका ज्ञान विचार के सत्य धर्मका आचरण करे तो सब जगत् सुखी हो जावे, इसका नाम वेद ज्ञान कहते हैं इसका कारण यह है कि जैसा ज्ञान ईश्वर का वैसाही सत्य प्रकाश है, जो उस सत्य ज्ञान को ईश्वर न प्रकाशित करता तो, मनुष्यों को कुछ सत्य ज्ञान नहीं होता और सब लोग अज्ञानमें रहते, इसलिये ईश्वरने सत्य ज्ञान सब जीवों के हित के लिये अपने सर्वसामर्थ्य करके, जगत्की आदिकाल में सब जीवों के लिये चार वेदों का ज्ञान चार ऋषियों के अन्तःकरण मेंदिया सो चारों वेद चार ऋषियों के अन्तःकरण में उत्पन्न कर मनुष्यमात्र का सर्व सुख के लिये सब जगत् मेंफैला, सो चारोंवेद ईश्वर कृतविद्या के प्रकाश से प्रकाशित विद्या जो सब संसार मेंहै, सो सब वेदों की विद्या का ही प्रकाश जानना यह जान शिष्यने हाथ जोड़कर विनय कर के कहा हे सत्य स्वरूप के जानने वाले महाराज आप कृपा कर यह बतलाइये कि, किस प्रकार से ईश्वरने चारों वेदों को रचा है! किस का क्या नाम? कितने २ भेद हैं? चार वेदोंका क्या २ अर्थ? वेदोंका प्रमाण क्याहै सो कृपा कर के मुझे समझाइये जिससे मेरा सब? भ्रम, संशय, छूटजावे, इसपर गुरु बोले, हेप्रिय! सुन तुझे जो २ सन्देह वेदोंके विषयमें हो सब निवारण करता हूँ तूचित्त देकर सुन? इसमेंप्रथम, ऋग्वेद का स्वरूप, जो कि ज्ञान, जिससे सब सत्य विद्या जानी जावे! दूसरे का नाम, यजुर्वेद जिससे कर्म? तीसरे का सामवेद जिससे ज्ञान वा उपासना? चौथे का नाम अथर्ववेद, जिस करके सब कर्म और सब संशय दूरहो जावें, सो ईश्वर ने, इन वेदों को चार ऋषियों के अन्तःकरण मेंरचा सो विस्तार-पूर्वक सुना ता हूँ, सो ध्यान देकर सुनकि जिस का जो नाम ईश्वरने जिसप्रकार रचा सो कहता हूँ किजब इस जगत् की आदि मेंईश्वरने सब सृष्टि को रचा, उस समय, सब, जीवों के कर्मोंका फल देने के लिये शरीरों का योग किया उस सब के सब लोग जो उत्पन्न हुये, केवल बालक के समान अज्ञानवाले थे उनको कोई ज्ञान वा गुरु कोई नथा इस से उनका और उनके पीछे होने वाले लोगोंका सब सुख नष्ट होजाता इस हेतु से दयालु परमेश्वर, बालकों पर पिताके समान सुख देनेके लिये, सत्य ज्ञान सब के सुख केलिये प्रकाशित किया सो वेद, अब तू इन चारों वेदों का विषय सुनता जा? प्रथम यह, ज्ञान का वा विद्या का प्रकाश करने वाला ऋग्वेद सो प्रथम अग्नि ऋषि के अन्तःकरण मेंरचा? सो किस के लिये, सो तू जान कि जितने जगत्के पदार्थ, सब का ज्ञान सर्व लो गको कराने केलिए रचा दूसरा यजुर्वेद सो सब विद्या के कर्म कांड का प्रकाश करने वालाहै, जिस करके यह जान पड़ता है कि जो जो उत्तम काम करने के निमित्त जो आज्ञा है ईश्वर की सो सब मनुष्य २ कर सब जगत्का भला करकेअपनेलिये परम सुख प्राप्त हो, सो यजुर्वेद का ज्ञान सब के सुख केलिये वायुऋषि के अन्तःकरण में ईश्वर ने प्रकाश किया अब तू तीसरे साम वेद का सुनो कि 71
यम बड़ा कामी, पर हमारा जीव तो इस योग्य नहीं जिस योग्य कन्द--मूल फल फूल हों, दूध घृत जल हों, कन्द मूल फल हों, पत्तल दोना पान हों, सो सब सेवा तो जी को कामि लागि रे! उस बड़े सुजान--जीव को तो जन सेवक ही को सर्वस्व भोग्य वस्तु का पान रहे, सो सब काम लायक विचारि विचारि के सो सेवा को रस ले! सेवक सब जी को रस ही समझ के सो सेवा करे सो सेवा की रिति ३ प्रकार सुझाइ सुझाइ सो सुजन सेवक जानि करै सो सेवा रस क्यों न आवै? तब कृष्ण चरणामृत पान सेवा के रस बिनु सेवक जीव का मन कैसे रहे, सो सेवा बिना और सेवा कैसी सेवा के रस बिना सुख तो पावैगा, पर सेवा बिना रस का रस कैसे पावैगा? सेवा बिना जब जीवन ही न आवै तब तो सेवा रस बिना प्रभु का सुख आवैगा कैसे तब भगवद् के स्वरूप सेवा में लगि के सेवा के सुख में रत हो स्वरूप को सर्वस्व भोग्य समझ के स्वरूप के रस का पान जब स्वरूप के अंग अंग स्वरूप के प्रति अंग स्वरूप के बसनन में स्वरूप के भाव में मन कर अंग अंग रस लीजै तब, रस लीजै स्वरूप, रूप ध्यान में मग्न होइ, रस का रस ऐसा स्वरूप भोग सोय के अंग के भाव रस भोग्य को अंग के स्वरूप रस भोग हो जाय रसमय रूप में स्वरूप का रस भोग सब रस को रसना से भोग रस स्वरूप भोग अंग रस के भाव स्वरूप, रस भोग रूप रस के अंग स्वरूप रस रस भोग स्वरूप के रसामृत में डूब ३ के, स्वरूप रस रस रूप सेवा के स्वरूप रसामृत में सेवा स्वरूप, सेवा स्वरूप के रस रस भोग रस रस भोग रूप के रसामृत स्वरूप के अंग भोग रस स्वरूप के भाव, स्वरूप के स्वरूप सेवा रूप में स्वरूप स्वरूप को रस भोग सो स्वरूप रस के स्वरूप का सो सेवा रूप में स्वरूप का रस आ--भाव समझ के, सेवा स्वरूप के, सेवा स्वरूप आ--भाव स्वरूप के स्वरूप के चरण में बैठ कर सेवा स्वरूप के रस रूप के रस रस रस को स्वरूप सेवा रूप सेवा रूप के रस स्वरूप रस, रस रस स्वरूप रस, रस रस रस, रस रस स्वरूप रस, रस रस रस स्वरूप रस रस के भाव रूप रस, रस रस स्वरूप रस सो सेवा स्वरूप को, सो सेवा चरणारविन्द के चरण रस सेवा को स्वरूप रस समझ स्वरूपारविन्द के अंग रस सेवा रूप भाव--रस, रस स्वरूप, रस रूप, रस स्वरूप, सेवा में रस स्वरूप भाव रस रस के रस स्वरूप सेवा रूप को जान के, सेवा के रस स्वरूप, प्रभु के रस स्वरूप, सेवा के रस स्वरूप, स्वरूपारविन्द के रूप--रसभाव से रस भाव आ-- भाव के स्वरूपारविन्द के रस रस के चरण के रस रस, सो सब रस के रस स्वरूप रस रस रस रस के चरण के रस रस रस रस रस स्वरूप रस के रस रस रस रस रस के रस के रस रस रस भाव, सो चरण कमल रूप रस सेवा रूप रस? सो सेवा को रस समझ कर के रस के रस के रस स्वरूप रस रूप के रस स्वरूप रस रस के रस के रस रस रस रूप रस स्वरूप रस स्वरूप रस रस--रस रस रस सो सब रस स्वरूप, सो सब को रस सब स्वरूप के रस स्वरूप को के चरणारविन्द के रस स्वरूप स्वरूप के चरण के चरण चरण सब रस स्वरूप के स्वरूप रस रस रस रस रस, रस स्वरूप सब के रस रस स्वरूप के रस के रस के स्वरूप के रस स्वरूप के स्वरूप रस स्वरूप स्वरूप स्वरूप के स्वरूप रस रस रस के चरणारविन्द रस के रस रस रस रस रूप रस सब स्वरूप के रस चरण कमल के रस रस रस रस रस के रस रस रस रस रस रस रस रस रस के रस रस रस रस रस स्वरूप के रस रस के रस रस रस रस सब रस, स्वरूप के रस रस रस, सब के रस रस रस के रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस रस के रस रस रस रस रस के रस रस के रस रस सो स्वरूप रस रस के रस, सो रस के रस रस? सो रस के रस रस रस रस! सो रस रस रस के रस रस के रस रस रस 72
इसके सिवाय हमारी धार्मिक सम्प्रदायें हैं, इन सबके अपने ग्रन्थ हैं और सब धर्म ग्रन्थ सच्चे और ईश्वर के वचन कहे जाते हैं। ईसाई कहते हैं केवल बाइबिल ही ईश्वर का वचन (इल्हाम) सच है बाकी सब क्या शैतान रचित हैं? यह तो न्याय संगत बात नहीं प्रतीत होती? पर जो लोग अपने ग्रन्थ को ईश्वर रचित कहते हैं उनके, अपने ही धार्मिक सम्प्रदाय के लोग अपने ग्रन्थ को सब से श्रेष्ठ कह लें! पर यथार्थतः मनुष्य को केवल एक ग्रन्थ मिल सकता केवल एक ही, जो सृष्टि के आरम्भिक काल में सर्वशक्तिमान् प्रभु ने सब मनुष्यों के लिये दिया था और वह सब मनुष्य मात्र के लिये है, न किसी एक देश तक बन्द रहा न किसी एक जाति तक-सत्य का प्रकाशक प्रत्यक्ष के रूप में केवल वह पुस्तक ही हो सकती है जो सब से पूर्व संसार में फैली हो और जो ऋग्-यजुः साम और अथर्व चतुष्टय संहिताएं ऋग्वेद, यजुर्वेद सामवेद, अथर्व इन को वेद कहते वेद केवल आर्यों के ग्रन्थ हैं सर्वसाधारणके नहीं, यह एक भ्रान्त बात कही जाती है। सब से पूर्व तो आर्य कोई जाति नहीं थी सब ही मनुष्य आर्य थे, सब ही मनुष्य श्रेष्ठ थे सब के लिये वेद था। पश्चात् जो बुरे थे वह दस्यु कहलाए श्रेष्ठ जन आर्य रहे। वेद तो समस्त मानव मात्र के लिये है, सब ही उस शब्द को ले सकते हैं। सर्वसाधारणके लिये नहीं, यह बात हो सकती? जब ईश्वर तो सब का और सब ही उस ईश्वर के जीव हैं तो कोई भी मनुष्य क्यों न उस पिता के, शब्द को ले या पढ़ या सुने। वेद तो सब के लिये है जो इस बात को नहीं मानते वे भूल, अन्याय करते हैं। वेद तो उस, सब के प्रभु पिता का दिया ज्ञान है। आश्चर्य है, जो पिता का दिया है? वह तो सब बच्चों को मिलना ही चाहिये न? बात यह है, सब सम्प्रदाय वाले यह कहते हैं कि, सब को हमारा ग्रन्थ पढ़े। आर्यजन कहें, कि वेद सब के लिये है? सम्प्रदाय तो एक पुस्तक को सब पर लाद देना चाहते हैं? यह सर्वसाधारणका तो अपना रूप ही बदला हुआ है। पर आर्य तो समस्त सम्प्रदायों के मूल को एक ही ईश्वर का वचन ही बतला रहे हैं और यह सब के लिये प्रथम पुस्तक के रूप में; जिस से ज्ञान का उदय सब और हुआ सम्प्रदायें सब एक ही उस उपदेशक के ग्रन्थ से ज्ञान लेकर ही, अपने नये रूपमें खड़ी हो गई। यह उचित नहीं है, कि संसार के सर्वसाधारण मनुष्य सब ही सम्प्रदायों को छोड़ कर केवल आर्य बनें या वेद-ज्ञानको ग्रहण करें। यह बात सत्य-युग में तो थी सब लोग एक ही मत के थे पर अब तो नाना रूपी विचार सब में हैं फिर उन को एक रूप में सर्वसाधारण कैसे किया जा सकता है? न किसी सम्प्रदाय को नष्ट किया जा सकता, यह तो सम्भव नहीं, पर विचार करने की तो है, मानव एक पिता परमात्मा की सन्तान होने से, मानव समाज का सम्प्रदाय तो, पिता और पुत्र के नाते से सब को वेदज्ञान ही का आश्रय लेना ही है, चाहे ईसाई, चाहे बौद्ध, चाहे कोई भी धर्म होवे, मानव रूप मात्र को वेद पुस्तक का पठन पाठन करना ही होगा। यह बात सच है, कि संसार में सर्वसाधारण लोग अपने सम्प्रदाय छोड़ कर, आर्यसमाजके मतको नहीं ग्रहण कर रहे हैं या करेंगे, पर वर्तमान के मुख्य सम्प्रदायों सम्प्रदाय के सब अनुयायी तो अपने पिता ईश्वरके बनाये हुए वेद रूपी एक उस सर्वसाधारणके उपदेश को पढ़ लें, जिससे कि सत्य रूप का बोध सब को परमात्माके दिये हुए इस धर्म ग्रन्थमें हो जायगा तो, क्या यह असम्भव हो सके, सब ही ग्रन्थों को वेद ज्ञान रूपी सूर्य से प्रकाश क्या नहीं मिलेगा? अवश्य ही वेद, अपने सत्य प्रकाश से सब ग्रन्थों को प्रकाशित करेगा। प्रत्येक सम्प्रदायवाले को अपने धर्म का तो बोध होना ही चाहिये परन्तु वेद ग्रन्थ का अध्ययन भी, सब धर्म का सार जान कर, जो सब सम्प्रदायोंके ग्रन्थों का आदि रूप तथा मानव का धर्म है उसका, सब ही ध्यान धर कर अध्ययन करें, तो सब सम्प्रदाय अपने यथार्थ रूप में रहकर परस्पर एक दूसरे मिल कर ही रहेंगे। 73
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कथा समाप्त हुई, श्रोतृमण्डली उठ कर विदा हुई अथवा कथावाचक की चरणवन्दना कर भेंट चढाकर सब ने अपने स्थान लिया। विश्वामित्रजीप्रभृति जितने तपस्वी, ज्ञानी या विरक्त भक्तवृन्द थे वेसबही तो मन्त्रद्रष्टा ऋषि, वेदशास्त्र के पारदर्शी विद्वान्मूर्धन्य या स्वयमेव ही भगवान् के पार्षद तथा परमहंस कोटि के महापुरुष थे। श्रीरामचन्द्र जी केवल एक मनुष्य ही नहीं किन्तु साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं इस बात को वे जानते थे। यही नहीं, वे जानते थे कि, वे पूर्णकाम प्रभु इस समय केवल नर लीला कर रहे थे। अस्तु, जिनको भगवद् रूप तत्त्वतः ज्ञात था, उनके लिये चिन्ता व शोक सम्भवतः ही नहीं हो सकता था। पर, जो जो भी व्यक्ति इन बातों को नहीं या यत्किञ्चित् जानता था उसको, विश्वामित्रप्रभृति सम्पूर्ण महर्षियों का आनन्द देखकर और भी सन्देह उत्पन्न हो जाता था; पर इसका कुछ कारण वे समझ न पाते थे। महर्षिगण इस सब नर लीला का ऐसा आनन्द ले रहे थे कि जिससे यह पता लगाना ही कठिन था कि विश्वामित्र जी, दशरथ कौशल्या अथवा पुर नरनारियों को इस बात का ज्ञान था कि वस्तुतः विश्वामित्र जी क्या चाहते थे। इन बातों को जान कर विश्वामित्र जी मन ही मन बहुत हर्षित हुए। अपनी कथा समाप्त करके, अब वह मुग्ध हो दशरथजी का मुख देख रहे थे, दशरथ जी उनके मुख की ओर तथा सब सभासद् विश्वामित्र जी की ओर देख रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो सब चित्र लिखे से बैठे हों। विश्वामित्र बोले, 'राजन! आज्ञा दीजिये!' इसके उपरान्त सभासदों की ओर देखकर वे फिर बोले, 'प्रियवर, हमारी प्रार्थना पर सब विचार करें। पर स्मरण रहे, सब सोचकर ऐसा निर्णय कीजिये जिससे देश तथा विश्वामित्र की मर्यादा बनी रहे तथा किसी प्रकार भी अयोध्या के सम्मान की हानि न हो।' महर्षि की आज्ञा पाकर महाराज दशरथ ने कहा, 'भगवन्! राम-लक्ष्मण दोनों अभी बहुत छोटे हैं, सुकुमार हैं। उनका यह शरीर, उस पर उनकी कोमलता देखकर तो कोई विचारशील यही कह उठेगा कि 'हाय, राक्षस क्या इस सुन्दर रूप पर तरस नहीं खायेंगे!' पर जब कोई यह सोचता होगा कि राक्षस तो पापी होते हैं, तब निश्चय ही मन काँप उठता है। क्या आज तक विश्वामित्र- सदृश किसी महर्षि को यह ज्ञात नहीं हुआ कि राक्षसों का स्वभाव क्या है? क्या वे किसी पर दया कर सकते हैं? इस पर भी विचार किया जावे कि विश्वामित्र सदृश ज्ञानी मुनि जिनको अपने प्राणों की भी चिन्ता न थी, यदि वे राम को राक्षसों के हाथ सौंपने के लिये आये थे तो क्यों आये थे? एक बात यह भी है, जिस पर विश्वामित्र जी विचार करना भूल गये, वह यह कि यदि राम और लक्ष्मण राक्षसों को मार सकें, तो भी क्या वे इस योग्य हैं कि उनको राक्षसों से युद्ध के लिये भेजा जाय? एक बालक को इस प्रकार युद्ध में झोंकना, जिसके सम्बन्ध में सब कुछ जानते हुए भी कि वह क्या है और क्या नहीं कर सकता है फिर भी उसे इस प्रकार भयंकर काम में लगा देना, विश्वामित्र जी जैसे मुनि के लिये शोभा नहीं देता। विश्वामित्र जी विचारवान् पुरुष हैं, उनको चाहिये था कि वे ऐसा कोई काम न करते जिससे किसी का अनिष्ट होने की आशंका उत्पन्न हो। विश्वामित्र जी को चाहिये था कि वे राम की जगह किसी और वीर को माँगते। पर उन्होंने राम को ही माँगा, जिसका अर्थ यह है कि राम के बिना उनका काम नहीं चल सकता। अब प्रश्न यह उठा, विश्वामित्र जी, राम को ही क्यों माँग रहे हैं? इस बात को सोच कर विश्वामित्र-सदृश ज्ञानी मुनि के मन में क्या विचार उठ सकता था इसका उत्तर, विश्वामित्र ही दे सकते थे। विश्वामित्र जी अपने विचार से राम को इस योग्य समझ रहे थे कि वे राक्षसों का वध कर सकें! दूसरी बात, जो दशरथ जी के मन में आई वह यह थी कि राम-लक्ष्मण दोनों बालकों को विश्वामित्र जी के हाथ सौंपने पर विश्वामित्र जी के साथ जाने में अयोध्यावासियों, नगरवासियों को जो कष्ट होगा वह असह्य होगा। विश्वामित्र जी का यह कार्य अयोध्यावासियों को बहुत दुःखी करने वाला था। पर विश्वामित्र जी इस बात को भी न समझ सके, अथवा समझ कर भी उपेक्षा कर गये। इन सब बातों से प्रतीत होता था कि विश्वामित्र जी ने जो कुछ भी किया वह सब विचार पूर्वक ही किया था। पर अयोध्यावासियों के लिये, विशेष रूप से दशरथ जी के लिये विश्वामित्र जी की यह माँग बहुत ही दुःखदायी सिद्ध हुई। विश्वामित्र जी के जाने के बाद दशरथ जी के मन में अनेक प्रकार के विचार उठे। वे सोचने लगे कि विश्वामित्र जी ने राम को माँग कर बहुत बड़ा अन्याय किया है। राम अभी बालक हैं, उन्होंने धनुष-बाण चलाना सीखा ही है, युद्ध का उनको कोई अनुभव नहीं है। ऐसे बालक को राक्षसों के सामने युद्ध के लिये भेजना, निश्चय ही मृत्यु के मुख में धकेलना है। 75
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