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माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

इसके सिवाय हमारी धार्मिक सम्प्रदायें हैं, इन सबके अपने ग्रन्थ हैं और सब धर्म ग्रन्थ सच्चे और ईश्वर के वचन कहे जाते हैं। ईसाई कहते हैं केवल बाइबिल ही ईश्वर का वचन (इल्हाम) सच है बाकी सब क्या शैतान रचित हैं? यह तो न्याय संगत बात नहीं प्रतीत होती? पर जो लोग अपने ग्रन्थ को ईश्वर रचित कहते हैं उनके, अपने ही धार्मिक सम्प्रदाय के लोग अपने ग्रन्थ को सब से श्रेष्ठ कह लें! पर यथार्थतः मनुष्य को केवल एक ग्रन्थ मिल सकता केवल एक ही, जो सृष्टि के आरम्भिक काल में सर्वशक्तिमान् प्रभु ने सब मनुष्यों के लिये दिया था और वह सब मनुष्य मात्र के लिये है, न किसी एक देश तक बन्द रहा न किसी एक जाति तक-सत्य का प्रकाशक प्रत्यक्ष के रूप में केवल वह पुस्तक ही हो सकती है जो सब से पूर्व संसार में फैली हो और जो ऋग्-यजुः साम और अथर्व चतुष्टय संहिताएं ऋग्वेद, यजुर्वेद सामवेद, अथर्व इन को वेद कहते वेद केवल आर्यों के ग्रन्थ हैं सर्वसाधारणके नहीं, यह एक भ्रान्त बात कही जाती है। सब से पूर्व तो आर्य कोई जाति नहीं थी सब ही मनुष्य आर्य थे, सब ही मनुष्य श्रेष्ठ थे सब के लिये वेद था। पश्चात् जो बुरे थे वह दस्यु कहलाए श्रेष्ठ जन आर्य रहे। वेद तो समस्त मानव मात्र के लिये है, सब ही उस शब्द को ले सकते हैं। सर्वसाधारणके लिये नहीं, यह बात हो सकती? जब ईश्वर तो सब का और सब ही उस ईश्वर के जीव हैं तो कोई भी मनुष्य क्यों न उस पिता के, शब्द को ले या पढ़ या सुने। वेद तो सब के लिये है जो इस बात को नहीं मानते वे भूल, अन्याय करते हैं। वेद तो उस, सब के प्रभु पिता का दिया ज्ञान है। आश्चर्य है, जो पिता का दिया है? वह तो सब बच्चों को मिलना ही चाहिये न? बात यह है, सब सम्प्रदाय वाले यह कहते हैं कि, सब को हमारा ग्रन्थ पढ़े। आर्यजन कहें, कि वेद सब के लिये है? सम्प्रदाय तो एक पुस्तक को सब पर लाद देना चाहते हैं? यह सर्वसाधारणका तो अपना रूप ही बदला हुआ है। पर आर्य तो समस्त सम्प्रदायों के मूल को एक ही ईश्वर का वचन ही बतला रहे हैं और यह सब के लिये प्रथम पुस्तक के रूप में; जिस से ज्ञान का उदय सब और हुआ सम्प्रदायें सब एक ही उस उपदेशक के ग्रन्थ से ज्ञान लेकर ही, अपने नये रूपमें खड़ी हो गई। यह उचित नहीं है, कि संसार के सर्वसाधारण मनुष्य सब ही सम्प्रदायों को छोड़ कर केवल आर्य बनें या वेद-ज्ञानको ग्रहण करें। यह बात सत्य-युग में तो थी सब लोग एक ही मत के थे पर अब तो नाना रूपी विचार सब में हैं फिर उन को एक रूप में सर्वसाधारण कैसे किया जा सकता है? न किसी सम्प्रदाय को नष्ट किया जा सकता, यह तो सम्भव नहीं, पर विचार करने की तो है, मानव एक पिता परमात्मा की सन्तान होने से, मानव समाज का सम्प्रदाय तो, पिता और पुत्र के नाते से सब को वेदज्ञान ही का आश्रय लेना ही है, चाहे ईसाई, चाहे बौद्ध, चाहे कोई भी धर्म होवे, मानव रूप मात्र को वेद पुस्तक का पठन पाठन करना ही होगा। यह बात सच है, कि संसार में सर्वसाधारण लोग अपने सम्प्रदाय छोड़ कर, आर्यसमाजके मतको नहीं ग्रहण कर रहे हैं या करेंगे, पर वर्तमान के मुख्य सम्प्रदायों सम्प्रदाय के सब अनुयायी तो अपने पिता ईश्वरके बनाये हुए वेद रूपी एक उस सर्वसाधारणके उपदेश को पढ़ लें, जिससे कि सत्य रूप का बोध सब को परमात्माके दिये हुए इस धर्म ग्रन्थमें हो जायगा तो, क्या यह असम्भव हो सके, सब ही ग्रन्थों को वेद ज्ञान रूपी सूर्य से प्रकाश क्या नहीं मिलेगा? अवश्य ही वेद, अपने सत्य प्रकाश से सब ग्रन्थों को प्रकाशित करेगा। प्रत्येक सम्प्रदायवाले को अपने धर्म का तो बोध होना ही चाहिये परन्तु वेद ग्रन्थ का अध्ययन भी, सब धर्म का सार जान कर, जो सब सम्प्रदायोंके ग्रन्थों का आदि रूप तथा मानव का धर्म है उसका, सब ही ध्यान धर कर अध्ययन करें, तो सब सम्प्रदाय अपने यथार्थ रूप में रहकर परस्पर एक दूसरे मिल कर ही रहेंगे। 73

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कथा समाप्त हुई, श्रोतृमण्डली उठ कर विदा हुई अथवा कथावाचक की चरणवन्दना कर भेंट चढाकर सब ने अपने स्थान लिया। विश्वामित्रजीप्रभृति जितने तपस्वी, ज्ञानी या विरक्त भक्तवृन्द थे वेसबही तो मन्त्रद्रष्टा ऋषि, वेदशास्त्र के पारदर्शी विद्वान्मूर्धन्य या स्वयमेव ही भगवान् के पार्षद तथा परमहंस कोटि के महापुरुष थे। श्रीरामचन्द्र जी केवल एक मनुष्य ही नहीं किन्तु साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं इस बात को वे जानते थे। यही नहीं, वे जानते थे कि, वे पूर्णकाम प्रभु इस समय केवल नर लीला कर रहे थे। अस्तु, जिनको भगवद् रूप तत्त्वतः ज्ञात था, उनके लिये चिन्ता व शोक सम्भवतः ही नहीं हो सकता था। पर, जो जो भी व्यक्ति इन बातों को नहीं या यत्किञ्चित् जानता था उसको, विश्वामित्रप्रभृति सम्पूर्ण महर्षियों का आनन्द देखकर और भी सन्देह उत्पन्न हो जाता था; पर इसका कुछ कारण वे समझ न पाते थे। महर्षिगण इस सब नर लीला का ऐसा आनन्द ले रहे थे कि जिससे यह पता लगाना ही कठिन था कि विश्वामित्र जी, दशरथ कौशल्या अथवा पुर नरनारियों को इस बात का ज्ञान था कि वस्तुतः विश्वामित्र जी क्या चाहते थे। इन बातों को जान कर विश्वामित्र जी मन ही मन बहुत हर्षित हुए। अपनी कथा समाप्त करके, अब वह मुग्ध हो दशरथजी का मुख देख रहे थे, दशरथ जी उनके मुख की ओर तथा सब सभासद् विश्वामित्र जी की ओर देख रहे थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो सब चित्र लिखे से बैठे हों। विश्वामित्र बोले, 'राजन! आज्ञा दीजिये!' इसके उपरान्त सभासदों की ओर देखकर वे फिर बोले, 'प्रियवर, हमारी प्रार्थना पर सब विचार करें। पर स्मरण रहे, सब सोचकर ऐसा निर्णय कीजिये जिससे देश तथा विश्वामित्र की मर्यादा बनी रहे तथा किसी प्रकार भी अयोध्या के सम्मान की हानि न हो।' महर्षि की आज्ञा पाकर महाराज दशरथ ने कहा, 'भगवन्! राम-लक्ष्मण दोनों अभी बहुत छोटे हैं, सुकुमार हैं। उनका यह शरीर, उस पर उनकी कोमलता देखकर तो कोई विचारशील यही कह उठेगा कि 'हाय, राक्षस क्या इस सुन्दर रूप पर तरस नहीं खायेंगे!' पर जब कोई यह सोचता होगा कि राक्षस तो पापी होते हैं, तब निश्चय ही मन काँप उठता है। क्या आज तक विश्वामित्र- सदृश किसी महर्षि को यह ज्ञात नहीं हुआ कि राक्षसों का स्वभाव क्या है? क्या वे किसी पर दया कर सकते हैं? इस पर भी विचार किया जावे कि विश्वामित्र सदृश ज्ञानी मुनि जिनको अपने प्राणों की भी चिन्ता न थी, यदि वे राम को राक्षसों के हाथ सौंपने के लिये आये थे तो क्यों आये थे? एक बात यह भी है, जिस पर विश्वामित्र जी विचार करना भूल गये, वह यह कि यदि राम और लक्ष्मण राक्षसों को मार सकें, तो भी क्या वे इस योग्य हैं कि उनको राक्षसों से युद्ध के लिये भेजा जाय? एक बालक को इस प्रकार युद्ध में झोंकना, जिसके सम्बन्ध में सब कुछ जानते हुए भी कि वह क्या है और क्या नहीं कर सकता है फिर भी उसे इस प्रकार भयंकर काम में लगा देना, विश्वामित्र जी जैसे मुनि के लिये शोभा नहीं देता। विश्वामित्र जी विचारवान् पुरुष हैं, उनको चाहिये था कि वे ऐसा कोई काम न करते जिससे किसी का अनिष्ट होने की आशंका उत्पन्न हो। विश्वामित्र जी को चाहिये था कि वे राम की जगह किसी और वीर को माँगते। पर उन्होंने राम को ही माँगा, जिसका अर्थ यह है कि राम के बिना उनका काम नहीं चल सकता। अब प्रश्न यह उठा, विश्वामित्र जी, राम को ही क्यों माँग रहे हैं? इस बात को सोच कर विश्वामित्र-सदृश ज्ञानी मुनि के मन में क्या विचार उठ सकता था इसका उत्तर, विश्वामित्र ही दे सकते थे। विश्वामित्र जी अपने विचार से राम को इस योग्य समझ रहे थे कि वे राक्षसों का वध कर सकें! दूसरी बात, जो दशरथ जी के मन में आई वह यह थी कि राम-लक्ष्मण दोनों बालकों को विश्वामित्र जी के हाथ सौंपने पर विश्वामित्र जी के साथ जाने में अयोध्यावासियों, नगरवासियों को जो कष्ट होगा वह असह्य होगा। विश्वामित्र जी का यह कार्य अयोध्यावासियों को बहुत दुःखी करने वाला था। पर विश्वामित्र जी इस बात को भी न समझ सके, अथवा समझ कर भी उपेक्षा कर गये। इन सब बातों से प्रतीत होता था कि विश्वामित्र जी ने जो कुछ भी किया वह सब विचार पूर्वक ही किया था। पर अयोध्यावासियों के लिये, विशेष रूप से दशरथ जी के लिये विश्वामित्र जी की यह माँग बहुत ही दुःखदायी सिद्ध हुई। विश्वामित्र जी के जाने के बाद दशरथ जी के मन में अनेक प्रकार के विचार उठे। वे सोचने लगे कि विश्वामित्र जी ने राम को माँग कर बहुत बड़ा अन्याय किया है। राम अभी बालक हैं, उन्होंने धनुष-बाण चलाना सीखा ही है, युद्ध का उनको कोई अनुभव नहीं है। ऐसे बालक को राक्षसों के सामने युद्ध के लिये भेजना, निश्चय ही मृत्यु के मुख में धकेलना है। 75

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□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□-□□ □□□□! □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□, □□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□-□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□□ □□-□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□, □□□□□□□ □□ □□□□□□□ □□□ □□-□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□□□□□□, □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □ □□ □□□ □□, □□□□ □□ □□□ □ □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□ □□□□□□□, □□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□, □□□□□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□; □□□□ □□□□□□□ □□, □□□□ □□□□□□□□ □□, □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□, □□□□□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□□ □□, □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□; □□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□, □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□, □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□, □□, □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□, □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□□□? □□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□, □□□□□□□□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□□--□□□□ □□□□ □□ □□□□□! □□ □□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□, □□ □□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□, □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□, □□□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□□□□ □□, □□ □□□□ □□ □□□□□□, □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□ □□□□□□□ □□□□, □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□□□□□□ □□□ □□□□□, □□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □ □□□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□, □□□□□ □□□□ □□□ □□, □□ □□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□ □□ □□□□□□□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□? □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□, □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□□□□ □□□□ □□, □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□ □□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□, □□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□, □□□□ □□ □□□□□□□□ □□□□ 77

इस प्रकार यह विषय स्पष्ट स्वाभाविक स्वच्छता और विरोधरहितता से भरा, पद पदार्थोंके ज्ञान देने में या अर्थ ज्ञान करानेमें, दोनों बात उपयोगी और मुख्य हैं यह विचारशीलवर्ग को, या यथार्थता को प्राप्त हुए पुरुष समझ कर अपने अभिप्राय को भी इस मत रूपी सांचे में ढालेंगे ही, ऐसा ही हम को भरोसा है। ओ३म् शान्तिः २॥ सुनो! भाइयो, यह तो ईश्वरीयरूप है, यह सुनो! सुनो, यह तो सर्वेश्वर महाराज का, आज्ञा रूपी वचन सुनो! कि जिस का कभी लोप होना योग्य ही नहीं इसलिये तुम को चाहिये ईश्वर सत्य ही का प्रकाशक, सो यथार्थता से युक्त है, सो ईश्वर के उपदेश रूप ऋग्वेदादि चार, सत्य स्वरूप वेद, जिन में सब सत्य विद्यायें हैं, जिन के यथार्थता से जानने वाला विद्वान् हो कर जो सत्य अर्थ का बोध करे तिस सत्य का निश्चय सब को ग्रहण कर के चलना योग्य कि जिस से धर्म, वा न्याय रूप सब उत्तम कार्य्य सिद्धहों॥ यद्यपि यह जो मन्त्रोंका अर्थ लिखाहै सो ठीक, प्राचीन सम्प्रदाय के मत, वा युक्ति प्रमाण सिद्ध सर्वसम्मत, अर्थात्, पूर्वापर सन्दर्भ ज्ञान सब ग्रन्थ में हो जाना है, तथा यथार्थ विद्या रूप सर्वेश्वर के अर्थों का सब मत रूपी सब अविद्यारूप अन्धकारयुक्त मतों के ग्रन्थ रूपी तम का तो प्रकाशक सूर्य के सदृशहै, सो विद्वान् जन तो इसको पाकर आनन्दितही हो सकते हैं। परन्तु यह विषय जो सब विद्या रूपी समुद्र है, तथा नवीन ही! नवीन सम्प्रदायानुसारों को, वा जो वेद विद्या से विमुख हैं, यथार्थता विद्या से हीन, केवल ही भ्रम में पड़े हुए लोग बहुत हठेंगे हठकठिनाई से हटेंगे वा भ्रम निवारणार्थ जो मत उन सब लोगों का भ्रम से बन गयाहै उस को सत्य ही मान कर न तो विचार करेंगे न ही समझ सकेंगे किन्तु विरोध ही करेंगे। इस वास्ते उन के सन्तोष निमित्त दूसरा उपाय यहहै, जिसको देखने से यथार्थ समझ जायँ, इस लिये यह विचार किया जाताहै कि जो पक्षपाती लोग हैं उन का भ्रम निवारण भी इस प्रकार से होना योग्यहै॥ सो विचारणीय यह विषय है कि नवीन मतों की दृष्टि सब प्रकार से सत्य वेदार्थ में प्रवृत्त नहीं, सो केवल भ्रम मूलक ज्ञानहै॥ यद्यपि सब लोग ऐसा कहते हैं, कि दो-दो प्रकार का अर्थ सब का सम्भव है, किन्तु यह विचारवान् पुरुष का मत नहीं क्योंकि दो-दो अर्थ... होना केवल भ्रम मूलकहै॥ विचारणीय यह बात है कि ईश्वर का वचन सर्वथा भ्रमरहित होना चाहिये यह, दो-दो अर्थ सब प्रकार संशय युक्त ही सब विद्या में? वा! भ्रम युक्त विद्या को करेंगे॥ ईश्वर सब प्रकार सर्व सत्य विद्या रूप सम्पूर्ण वा अविद्यायुक्त वा भ्रम से रहित होगा किम्वा नहीं? जो तो कहो भ्रम युक्त है, तो ईश्वर ही नहीं सिद्ध होगा! किन्तु ईश्वर का लक्षण ही यह है, सम्पूर्ण विद्या का प्रकाशक जो सत्य ही स्वरूप, सर्वज्ञत्त्व से युक्त हो जिस के ज्ञान में वा वचन में किञ्चिन्मात्रभी भ्रम नहो, उस को ईश्वर जान कर उस का प्रकाश किया हुआ वेद सब को सत्य मानना योग्य, जिससे कि कभी भ्रम नहो॥ सो वेद कैसा होगा? सर्वसत्यविद्या का स्वरूप॥ विचारणीय यह बात, सो ईश्वर के वचन सब को यथार्थ ज्ञान देने वाले सत्य सम्पूर्ण प्रमाण युक्त सब विद्याओं का मूल, सत्य अर्थ का, जिस प्रकार ज्ञान है वैसा ही कथन वेद में विचार कर सर्वथा निःशङ्क, जिससे कि यथार्थ सत्य विद्या सब मनुष्य प्राप्त हो सकें? वा जिस का अर्थ सब का सब भ्रष्ट होके सब प्रकार अविद्या ज्ञान का प्रकाशक हो जाय? ऐसा कभी हो ही नहीं सकता इसलिये ईश्वर, सत्य विद्या रूप ही सब जगत् को प्रकाश कर रहाहै॥ सो ईश्वर वेद विद्या के अर्थ ज्ञान के द्वारा सब जगत् को, जो पक्षपाती हो कर भ्रम जाल फैलाने वाले नवीन मतवाले हैं उन को इस सत्य विद्या रूपी प्रकाश को दिखाकर उन भ्रम-रूपी तम, अविद्या को दूर करके, सत्य ही विद्या प्रकाश सब सब विद्या रूपी सत्य विद्या सब को प्राप्त कराके उस सब का यत्न सफल हो जाय सो, यथा, ईश्वर सब का सब को सब विद्याओं का दाता है उस सब को भी, तथा वेद रूप को, सब सत्य का दाता जानो! जिस प्रकार सब को, तथा सम्पूर्ण विद्याओं को, सब विद्या रूप सब को जान के, नित्य प्रकाश जो ईश्वर सब का सत्य दाता 78

तब राजा को भय हुआ, और कहा कि न जाने किस प्रकार मेरा राज्य भी इस प्रकार नष्ट किया जायेगा। राजा का ऐसा वचन सुन कर... इन ब्राह्मणों ने कहा कि महाराज विचार करें, यह दुष्टमति-दुःख का देनेवाला वाल्मीकि इन दिनों हमारे मध्य निवास करता था और किसी प्रकार से, राजा के भवन से भोजन रूप हमारे शरीरों को, कभी अन्न कभी रस इत्यादि रूप भोजन देकर भी, अनेक असन्तुष्टियों से, राजा को ही हानि करता था सो यह वाल्मीकि ही निष्कासित हुआ, इसलिये ब्राह्मण भी तो कह रहे हैं कि हम लोग जैसा जैसा विचार विचारके राजा से कहते सो कहते ही, तब सुख--दुःख देने-- वाले का त्याग ही सब को सुख का कारण बन जाता रहा, वाल्मीकि राजा हुआ। वाल्मीकि जैसा राजा उस काल रूप वासना को समझा, सो न तो वाल्मीकि कालवशता को त्याग सका और न वह ब्राह्मणों जैसा बना ही किन्तु ब्राह्मणों के आज्ञानुसार करता हुआ ही यह वाल्मीकि भी विचार को सब काल विचार करने के रूप में ही यह भी बना समझा, सो वह ब्राह्मणों के समान हुआ भी वाल्मीकि के इस रूप विचार को सब काल ही सब लोग विचारते। सो वाल्मीकि रूप ही राजा हुआ, सो सब विचार वासी राजा हुआ, सो सब वाल्मीकि, सो राजा रूप हुआ, वाल्मीकि रूप हुआ, विश्वामित्र रूप हुआ, फिर वाल्मीकि रूप से अनेक प्रकार हुआ जो हुआ सो हुआ, तब सब विचार का विचार ही रूप रहा, जिस जिस प्रकार वासना रूप विचार रहा, फिर सब काल ही, काल ही, काल सब ही रूप होकर वासना फैला रहा, जिस वासना से ही सब उत्पन्न हुए, वासना रूप में वासना सब काल रहा, जिस वासना से विचार का भी सब रूप से रूप बना हुआ व जिस वासना से राम--लक्ष्मण हुए, भरत हुए, शत्रुघ्न हुए, सीता हुई, जिस वासना से ही विचार का वास ही सब का रूप होकर रहा, वासना ही रूप विचार होकर सब का वास हुआ जिस से सब रूप विचार का रूप बन कर रहा सब काल वासना वास वास रहा। राम--लक्ष्मण के वासना रूप--विचार का रूप, पिता के घर; सो पिता उस वासना रूप के कारण ही सब काल के रूप वासना फैलाता हुआ ही सब वास फैलाता रहा इसलिये जिस काल पिता वासना रूप फैलाता रहा जिस काल व वासना रूप सब हुआ सो, तब विचार रूप वासना रूप से वास हो कर, फिर विचार वासना रूप से विचार रहा। सो विचार वास ही रहा, जिस सब प्रकार से सब रूप वासना रूप वास कर रहा। ॐ तत् सत् जिस वास से सब वास ही वास हो रहा, जिस राम-नाम वासना रूप से सब मन रूप वास रूप वासना के स्वरूप वास रहा, सब स्वरूप वासना हुआ। 79

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भाग 5 (पृष्ठ 81-100)

पहला विचार आया, जो परमात्मा का रूप, अद्वैत रूप होगा साकारस्वरूप मात्र उस जैसा रूप, दूसरा कोई पदार्थ ना रहेगा विचार तो ऐसा विचारवान्‌को आया, सोचो-समझो विचारवान् कैसा विचार होगा विचार किया प्रभु का साकार रूप ना हो सके उस साकार को बनाया है, उस का अन्त हो गया? जो साकार रूप ना रहा वो रूप परमात्मा का रूप था? जब वो रूप खत्म रूप हो जायेगा, नष्ट, भ्रष्ट सब हो गये रूप, तो क्या वो प्रभू का ही रूप था? जो मिट गया वो प्रभू नहीं, साकार परमात्मा का रूप नहीं परमात्मा का रूप तो ऐसा रूप बना दिया अपने अद्वैत साकार, कभी खलास, कभी खत्म साकार, तो वो रूप साकार रूप प्रभु का साकार परमात्मा का स्वरूप नहीं माना जा सकता है, जो साकार ना हो साकार प्रभु का स्वरूप हो परमात्माका ही, वो परमात्माका रूप ही ना रहेगा तो वो साकार प्रभु का स्वरूप ही समझना ही ना चाहिए वो तो समझना भ्रम भरा सो विचार प्रभु का वो निराकार रूप ही है साकार रूप, जो निराकार प्रभु का वो साकार रूप पहला बना परमात्मा उस साकार रूप पहला रूप का रूप किया उस साकार निराकार रूप में उस प्रभू का रूप साकार रूप पहला रूप साकार निराकार ही तो वो साकार पहला रूप है, वो प्रभु का रूप पहला रूप प्रभु का साकार ही तो साकार रूप है, उस साकार ही तो साकार पहला रूप है, तो सब कुछ उस रूप का ही रूप है, वो रूप ही प्रभु का रूप रूप तो परमात्मा साकार ना परमात्मा रूप प्रभु पहला परमात्मा का रूप रूप ना था, प्रभु का रूप पहला रूप जो सब कुछ था प्रभु, साकार का रूप पहला प्रभु का ही रूप पहला साकार ही पहला रूप निराकार का रूप? प्रभु पहला प्रभु का रूप कैसा रूप जो सब कुछ पहला रूप? रूप सब कुछ प्रभु का-ही पहला रूप रूप पहला रूप बात तो वो, साकार स्वरूप तो प्रभु पहला रूप होगा, तो ऐसा वो परमात्मा सब का पहला रूप पहला पहला पहला रूप पहला पहला साकार तो सब पहला रूप, पहला पहला प्रभु का सब पहला रूप साकार तो सब पहला प्रभु होगा, प्रभु ऐसा रूप ना होगा, ना ही वो साकार रूप प्रभु पहला प्रभु का सब रूप रूप सब रूप पहला पहला रूप तो सब प्रभु रूप रहा, प्रभु सब साकार रूप है, तो सब ही प्रभु रूप विचार ऐसा भी हुआ, प्रभु का स्वरूप ना रूप का रूप प्रभु का ना ही रूप ना ही स्वरूप है, वो रूप ही प्रभू है! वो प्रभू साकार ही है! वो साकार प्रभु का ही रूप प्रभु प्रभु ना रूप सब पहला रूप साकार साकार ही ही प्रभु रूप प्रभु का रूप सब रूप का स्वरूप पहला ही सब प्रभु पहला ही रूप, प्रभु प्रभु, पहला रूप प्रभु का रूप प्रभु का रूप पहला रूप सब का, वो ही प्रभु रूप ना ही स्वरूप प्रभु का स्वरूप है, ना ही सब रूप प्रभु का प्रभु रूप साकार प्रभु पहला ही रूप ना प्रभु पहला रूप पहला प्रभु पहला ना प्रभु का प्रभु पहला रूप ना पहला ना रूप ना प्रभु रूप प्रभु, पहला ना प्रभु पहला प्रभु पहला रूप, ना साकार प्रभु पहला प्रभु ना प्रभु, ना परमात्मा पहला प्रभु का प्रभु प्रभु का रूप ना प्रभु पहला रूप? कैसा रूप पहला प्रभु सब प्रभु का पहला रूप प्रभु? प्रभु साकार प्रभु पहला रूप ना प्रभु का प्रभु पहला रूप प्रभु, ना वो सोच-समझ प्रभु का पहला रूप ना वो प्रभु का पहला रूप ना सब प्रभु प्रभु रूप? वो प्रभु साकार ना रूप ना ही ना प्रभु का पहला रूप सब प्रभु, ना ही प्रभु प्रभु पहला रूप प्रभु ना, ना ना ना पहला प्रभु प्रभु सब 1 प्रभु साकार ना प्रभु, 2 प्रभु साकार ना प्रभु, 3 प्रभु प्रभु ना प्रभु, 4 प्रभु पहला ना प्रभु ना प्रभु पहला रूप, ना वो रूप प्रभु ना प्रभु सब प्रभु ना प्रभु ना वो प्रभु ना प्रभु ना प्रभु प्रभु ना पहला स्वरूप प्रभु, ना वो प्रभु प्रभु प्रभु प्रभु प्रभु प्रभु प्रभु प्रभु ना प्रभु ना प्रभु ना प्रभु प्रभु विचार ना प्रभु रूप? परमात्मा का कैसा रूप? परमात्मा ना प्रभु रूप, परमात्मा का स्वरूप ना प्रभु प्रभु ना, परमात्मा का सब पहला प्रभु सब पहला ना प्रभु रूप ना प्रभु प्रभु प्रभु-प्रभु ना परमात्मा का सब प्रभु प्रभु पहला ना प्रभु ना प्रभु पहला स्वरूप ना प्रभु पहला रूप स्वरूप ना प्रभु प्रभु प्रभु, ना प्रभु ना ना प्रभु प्रभु प्रभु ना प्रभु प्रभु प्रभु 81

विशाखा का रूपक अलग था, ललिता का रूप अलग था। यह तो प्रत्येक गोपी का रूप, जो उस समय उपस्थित गोपियां थीं, जो उस उस गोपियों गोपियों के रूप में स्वयं कृष्ण प्रकट हुए गोपियों के स्वरूप रूप में, प्रत्येक के रूप, सब रूप स्वयं कृष्ण के प्रकट हुए रूप थे। यह उन गोपियों स्वरूप गोपी रूप। तो जो स्वरूप कृष्ण रूप का बनाया जा रहा है, वह कैसा स्वरूप बनाया जा रहा केवल श्रृंगारपरक ही वह रूप होगा या और कुछ? वैसा ही तो जैसा स्वरूप अक्रूरजी के समक्ष रूप हुआ प्रकट, वैसा नारायण के स्वरूप का रूप गोपांगना समूह के रूप में इस रूप का दर्शन हो रहा था। गोकुल का दर्शन वैसा हुआ था। वृंदावनचन्द्र तो जो रूप का धारण किए हुए प्रकट रूप हुए उस समय वृन्दावन में प्रत्येक के रूप को रूप में ले रहे भिन्न-भिन्न के रूप। प्रत्येक गोपी का जो रूप था उस स्वरूप गोपी के रूप धारण से पहले, जब यह सब कुछ रूप स्वयं नारायण के रूप में भगवान् ने रूप धारण गोपियों का रूप दे कर के रूप न जाने के रूप में क्या स्वरूप दिया था जो कि रूप न था। प्रत्येक प्रत्येक गोपी स्वयं में रूप के रूप विह्वल हो जाती थी जब न रूप उस रूप स्वरूप। सुचित्रा रूप में गयी, ललिता के रूप, सब के रूप जहां पर रूप रूप रूप रहा, प्रत्येक सखियां तो रूप के रूप में रूप में ही रूप हो जाती रही रहा, हर गोपी रूप रूप सखियों के स्वरूपवान् रूप न बन पाए, सखियां स्वयं सखियों का रूप बनकर के रूप रूप में तो स्वयं रूप ही ऐसा रहा, रूप सखियां कृष्ण रूप, सखियां कृष्ण स्वरूपों का ही रूप रूप बन गई। स्वयं सखियां बन गई, सब स्वरूप स्वयं, सब कृष्ण स्वरूप, सब गोप रूप गोपियां ही! तो यह रूप कृष्ण के आराधक रूप के रूप स्वरूप का प्रभाव ही रहा। ऐसा आराधक स्वरूप जो सब रूप रूप के हो कृष्ण रूप के स्वरूप रूप में दिखा। ऐसा आराधक का रूप, सब रूप तो सब रूप के रूप ऐसा आराधक बना सब कृष्ण रूप? सखियों का रूप ऐसा रूप के स्वरूप रूप में सब स्वरूप रूप हो गए सखियां सब स्वयं? सब स्वरूप रूप स्वयं के आराधक बन ही गए? ऐसा रूप भगवान् कृष्ण स्वयं बना रहे। ऐसा आराधक रूप बन कर सब स्वरूप रूप में हो गए तो सब गोपी रूप में कृष्ण के पास कोई ऐसा स्वरूप तो बन जाना संभव न था क्योंकि प्रत्येक का ही, प्रत्येक स्वरूप का ही, प्रत्येक स्वरूप के रूप में ही नारायण रूप रहा, नारायण रूप रहा, तो फिर कृष्ण का ही स्वरूप तो कृष्ण को ही मिला! स्वयं आराधक का रूप ऐसा, कृष्ण स्वयं ही जब आराधक रूप में प्रकट होता रहा। तो यह रूप के रूप का रूप रूप का रूप न स्वयं कृष्ण के रूप विह्वल हो हो कर सब रूप बना रहा, कृष्ण जन-जन के ही रूप में ही प्रत्येक सखा जन--के रूप नारायण के स्वरूप में, यह रूप कृष्ण रूप सब का रूप ही--सब जन-जन के स्वरूप रूप बना रहा था सब कृष्ण रूप। तो सब कृष्ण स्वरूप बन, कृष्ण का रूप रूप बना ही रहा, तो भगवान् के... । ऐसी कृपा आराधक के रूप रूप, भगवान् के सब रूप रूप में रूप सब स्वरूप प्रभाव रूप, नारायण स्वरूप के रूप में, रूप सब रूप। तो सब जन नारायण रूप सब हो जाए तो सब कृष्ण रूप में स्वरूप ही स्वरूप ही सब का रूप बन गया, कृष्ण रूप सब नारायण का रूप था, तो ही रहा, तो कृष्ण ही रहा, सब रूप सब कृष्ण के रूप में रूप में ही रहा। तो भगवान् का सब रूप ही तो स्वरूप रहा! ऐसा स्वरूप सब बन गए? सब हो गए? सब रूप के आराधक बने, तो वो सब रूप स्वरूप बन गए? तो वो रूप का रूप रूप के स्वरूपवान् रूप ही! तो सब के स्वरूप के रूप, सब रूप सब के रूप ऐसा दिखा! सब स्वरूप ऐसा बना सब रूप में सब रूप सब में सब रूप सब रूप भगवान् के 82

जिसे यह निश्चय पूर्वक जानना कि केवल यह जीव कर्मके निमित्त--नैमित्तिक भाव को पाकर करता विचार? किंवा परिणामी पुरुष को अविद्या विचार? फिर देश--काल को नहीं, दोनों ओर भेद विचार निमित्त--काल सब को समेटकर केवल समेट स्वरूप जाना, परिणामी रूप किया परिणामी सब, निश्चय को विचार का भेद किया विचार यह हुआ, किया किसने यह? किया अनादिकाल सब जीव व कर्म? ऐसा नहीं, यह रूप हुआ जीव स्वभाव का व कर्म सब निमित्त स्वभाव रूप को समेटकर केवल यथार्थ जाना केवल ज्ञान रूप यथार्थ केवल केवल केवल ज्ञान को विचार का समेटकर यह केवल रूप जीव सब परिणाम केवल रूप, सो ज्ञान व कर्म का विचार सब निमित्त समेटकर केवल ज्ञान, विकार केवल का केवल रूप, सो सब जीव केवल केवल विचार केवल को रूप जीव केवल केवल विचार केवल केवल को समेटकर जीव रूप, सो केवल विचार, सो केवल अनादिकाल केवल को केवल रूप सब केवल समेटकर सो केवल केवल केवल केवल समेटकर केवल केवल केवल केवल केवल रूप को सब केवल केवल केवल केवल को सब केवल, सब जीव केवल, सब केवल केवल केवल समेटकर परिणाम को सब समेटकर केवल केवल सब, सो अनादिकाल का जीव, केवल समेटकर परिणाम को समेटकर केवल केवल केवल सो, सो सब अनादिकाल समेटकर सो सब ज्ञान केवल ज्ञान सब केवल सब केवल समेट केवल केवल केवल केवल का केवल केवल, केवल परिणाम केवल का केवल केवल सो, परिणाम को सम सब जीव का केवल केवल रूप केवल केवल अनादिकाल केवल सब को केवल को सो केवल, परिणामी का केवल का सब केवल रूप, सब सब सो सब केवल सब का केवल रूप का परिणाम सब निमित्त केवल सब रूप, सो केवल केवल सब, परिणामी का अनादिकाल का रूप का परिणाम केवल केवल सो, केवल परिणाम केवल केवल केवल केवल सब सब केवल सब सब, सो परिणामी का अनादिकाल सब का परिणाम केवल केवल सो, केवल केवल परिणाम केवल केवल केवल केवल सब केवल का केवल केवल केवल समेटकर सो केवल का सो समेटकर का सब का केवल रूप केवल सो केवल का केवल केवल का केवल का केवल सब, अनन्तकालिका का केवल सब सब अनादिकालिका का केवल केवल, परिणामी का केवल, सब का केवल, सो सब केवल सब का केवल का केवल सब केवल सब? केवल केवल केवल केवल सब सब का रूप केवल केवल का केवल रूप, परिणामी का केवल सब केवल का सो केवल केवल सब केवल सब सब केवल सब, सो सो सब का केवल का केवल सो सब केवल परिणामी केवल केवल समेटकर केवल केवल सब सब केवल समेटकर सो केवल केवल समेटकर का केवल अनादिकाल का केवल सब, परिणामी का केवल केवल सब सब सब सब केवल केवल सब सब का केवल का केवल सब सब सब केवल सब का समेटकर केवल सो सब अनादिकाल का केवल केवल सब सब समेटकर केवल सब केवल केवल केवल सो केवल का सब का समेटकर केवल सो केवल, अनादिकाल का सब का समेटकर केवल सो केवल सब? केवल सब का सो सब का केवल सब, परिणामी का केवल सब सब सब सो, केवल केवल समेटकर केवल केवल सब का सब सब, केवल केवल, सो सब परिणाम का केवल केवल का केवल सब केवल व केवल, केवल का केवल सो केवल केवल का केवल केवल सो व केवल, केवल का परिणाम का केवल केवल का सो केवल सब केवल सब सब सो केवल, परिणामी सब केवल केवल केवल सो केवल व केवल केवल केवल का केवल का केवल सब समेटकर केवल सो केवल का केवल केवल समेटकर केवल, केवल का अनादिकाल केवल केवल केवल केवल सो सब केवल केवल का केवल सो अनादिकालिका का केवल सब केवल, सो केवल केवल सो केवल केवल सब केवल का केवल परिणाम सब सब केवल सब केवल केवल सब का सो परिणाम सब केवल केवल सो केवल, परिणामी केवल केवल केवल केवल केवल केवल का केवल का सब सब अनादिकालिका सब सब का केवल सो, सो सो केवल केवल केवल सब केवल केवल सो सब, केवल केवल केवल केवल सब सब, सो सो सो समेटकर केवल केवल केवल सो सो का सो केवल सब, सो सो सो केवल केवल सो केवल केवल सो सो सब का समेटकर सो सब सब केवल केवल केवल केवल केवल केवल केवल केवल का सो अनादिकालिका सब केवल सब केवल, परिणामी सो, केवल सब केवल केवल सब, सो सो केवल का समेटकर सब केवल केवल केवल केवल केवल केवल, सो सब केवल परिणाम केवल सब केवल केवल सो केवल सब केवल सो केवल का

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इस रीति पर विचार करने पर यह सिद्ध हो रहा होगा, कारण संसार का भोग्य पद ही ऐसा कि जिसे भोग कर या देखकर जीव का मन कभी तृप्त या शान्त हो सकता ही नहीं, कदापि भी नहीं कभी भी नहीं! पर जो परमात्मा का रस जिसे प्राप्त हो जाता होगा वह तो ऐसा तृप्त होगा कि फिर कभी भी उस जीव विशेष को तृष्णा उत्पन्न ही नहीं हो सकती जो किसी भी विषय की हो या इस लोक सम्बन्धी किसी भी भोग्य पदार्थ की, जिसके कारण किसी जीव को अपने से पृथक या फिर और किसी अन्य भोग्य पदार्थ की आवश्यकता का लेश मात्र भी अपने लिए शेष प्रतीत न होकर ऐसा ही अनुभव हो सकता है कि जिसके पश्चात् या जिसके कारण जीव को, या जीवात्मा को सर्वदा उस सर्वज्ञ परमात्मा के द्वारा ज्ञान, शान्ति या आनन्द का रस ही निरन्तर प्राप्त होता ही रहता है॥ इसमें कोई सन्देह, या संशय किसी प्रकार का, अथवा किसी विचार मन में, किसी जीवात्मा को, तब हो सकता है, जबकि वह जीव अपने लिए संसार से तो सुख चाहने का यत्न, यत्नपूर्वक प्रत्येक दशा व रूप में कर रहा हो परन्तु ज्ञान होने पर भी ज्ञान रूपी उस परम पिता परमात्मा का ध्यान विचार निष्पक्षता से न तो कर रहा होगा और न ही कभी केवल मात्र उस परम पिता परमात्मा को पाने का यत्न कर रहा होगा, तो ऐसे जीव को यह ज्ञान भी प्राप्त न हो, फिर चाहे न भी वह उस परम पिता परमात्मा को प्राप्त करे? पर जो मन द्वारा या वाणी से सब का सब कुछ त्याग कर उस परम पिता परम पिता के लिए यत्न कर ही रहा होगा वह क्यों नहीं? तो इस प्रकार मनन व विचार करने पर, सब प्रकार केवल परमात्मा को ही सब कुछ जान लेने पर विशेष रूप से यह भी, प्रत्येक स्थिति में उस नित्य आनन्द स्वरूप को परमात्मा स्वरूप ही जान कर, जिसे सब प्रकार का विचार या ध्यान परमात्मा का कहना स्वाभाविकता है, स्वाभाविकता ही जिसका धर्म, कर्म या स्वरूप होगा, जिस पर यह स्पष्ट है, जिसे विचार से सब कुछ स्पष्ट हुआ करता है जिसे सब ही स्वाभाविकता कहा गया॥ पर इसके पश्चात् भी तो विचार यह देखना होगा व देखना पड़ा उस अवस्था विशेष व दशा रूप योग-की प्राप्ति अवस्था तक--जिस अवस्था तक सब कुछ त्याग हो तो गया पर मन का न त्याग हो, न ही आत्मा, का त्याग होना सम्भव हुआ या हो सकता व किसी प्रकार भी सम्भव नहीं, व इस प्रकार दोनों का ही या तो त्याग हुआ नहीं, या ही दोनों जीवात्मा के परमात्मा के आधीन होने व परमात्मा के बस होने से ही, उस स्थिति व उस दशा विशेष का लाभ हो सकेगा॥ स्वाभाविकता, स्वाभाविक का यह अर्थ हुआ, जिस स्वाभाविकता का, प्रत्येक को धारण या ग्रहण करने का यत्न प्रत्येक दशा विशेष रूप में तथा स्वयं परमात्मा द्वारा भी सब प्रकार सब का स्वरूप बनाया गया होगा, जिसे सब प्रकार से ऐसा ही सब को स्वीकारना ही परमात्मा का स्वरूप; प्रत्येक जीवात्मा द्वारा, जिसे परमात्मा की परमात्मा के स्वरूप द्वारा ज्ञान रूपी दिया, तो वह तो सबको प्राप्त हो ही सकेगा॥ स्वाभाविकता का अर्थ सब का परमात्मा का स्वरूप बना देना नहीं हो सकता या आत्मा जिस दशा को त्याग पश्चात् परमात्मा स्वरूप ही देखना चाहे किसी जीव को, तो वह, ऐसा ही हो सकेगा, जब जीव परमात्मा ज्ञान को अपने आत्मा स्वरूप जीवात्मा रूप का सदा ज्ञान रखे॥ पर ऐसा ज्ञान केवल ज्ञान तक सब प्रकार परमात्मा का ही सदा स्वाभाविकता रूप मन सब प्रकार स्वाभाविकता को स्वीकारे, स्वाभाविकता का त्याग न कर सके॥ स्वाभाविकता का त्यागना ही तो सब पाप, व स्वाभाविकता का त्याग ही सब दुःख का कारण, जिस से परमात्मा को सब का सब सुख या फल भोग क्यों न हो? जो जीवात्मा ऐसा न करे, तो ही स्वाभाविकता का परमात्मा द्वारा लाभ, जिसे प्रत्येक स्थिति में सब सब कुछ को स्वाभाविकता का रूप ज्ञान विचार ज्ञान दिया गया, जिस स्वाभाविकता का लेश मात्र भी तो उल्लंघन या उस रस का लेश मात्र विचार स्वाभाविकता के विपरीत न हो, पर जो ऐसा हो, स्वरूप या परमात्मा का, स्वरूप व रूप हो॥ सब कुछ तो यथार्थ-ज्ञान या स्वाभाविकता स्वरूप से ही सब कुछ ज्ञान प्राप्त हो सकता है यह सब कुछ जो कुछ कहा जा रहा है? जिस पर, परमात्मा के सब ज्ञान स्वरूप पर! जिस ज्ञान रूप से सदा स्वाभाविकता का लेश मात्र ज्ञान सब स्वाभाविकता के त्याग से प्राप्त हो ही नहीं सकता या त्याग रूप से ही सब कुछ का ज्ञान प्राप्त हो रहा रहा है? तो समझना होगा कि यह, ज्ञान सदा स्वाभाविकता 85

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□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□, □□ □□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □ □□ □□□□□ □□ □□ □ □□□ □□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□, □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□, □□□□ □□ □□□□ □□□□, □□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□, □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□? □□□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□□ □□□ □□□, □□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□? □□□□; □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□--□□□□□ □□ □□□□□ □□□? □□ □□□□ □□□□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□□ □□□, □□□□□ □□□, □□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□, □□□□□ □□□□ □□, □□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□□? □□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□? □□□□□□□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□ □□ □□□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□, □□□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□--□□□□□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□, □□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□-□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□? □□□□□ □□ □□□□-□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□, □□□□-□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□□□□□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□- □□□□□ □□□□□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□ □□□□ □□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□, □□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□, □□□□ □□□□--□□ □□-□□□□ □□, □□-□□□□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□-□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□--□□□□ □□□□ □□ □□□□□, □□□ □□ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□ □□? □□ □□□□ □□ □□□, □□□? □□□□ □□□, □□ □□ □□ □□□-□□□□ □□□□□ □□ □□□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□ □□ □□□-□□□□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□ □□□□ □□□ □□! □□ □□□□, □□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□ □□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□-□□□□ □□□□ □□, □□ □□ □□□□ □□□□ □□□□□□? □□□□ □□□ □□□□□, □□ □□□□□ □□□□ □□ □□□-□□□□ □□□□ □□! □□□□ □□□, □□□□□-□□□□□, □□ □□□ □□□-□□□□ □□□□ □□□ □□-□□□□ □□□ □□ □□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □ □□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□ □□□-□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□□ □□-□□□□ □□□ □□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□-□□□□! □□ □□□□ □□ □□□□, □□-□□□□ □□ □□ □□□□□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□, □□□□ □□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□□□ □□□? □□□□ □□□, □□□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□ □□□, □□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□, □□ □□□-□□□□ □□□□ □□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□ □□ □□□□□ □□□□□□ □□ □□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□□ □□□ □□□ □□□□□□□□, □□□□□ □□□ □□□□□□ □□ □□□ □□□□□□□ □□ □□ □□□□□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□-□□□□ □□□□ □□□□ □□? □□□□ □□□, □□□□□ □□ □□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□□ □□, □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□□□ □□□□ □□□□ □□ □□□□, □□ □□□□ □□□□□ □□□? □□□□ □□□, □□□ □□□-□□□□ □□□□ □□□□ □□□□□□□ □□ □□□, □□ □□□□□□□ □□ □□□ □□□ □□□ □□, □□□□□□□□□ □□ □□□ □□ □□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□? □□□□ □□□, □□□□□ □□ □□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□□□ □□□-□□□□ □□□□□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□□□□□ □□□□□ □□□? 87

इस प्रकार वह मुनि उस नगर का सब वृत्त कह कर चुप हो गये अथवा उन्होंने मौन अवलम्बन कर लिया, पश्चात् राजा ने, उन मुनि राज द्वारा वर्णित चरित्र को सत्य समझ विचार कि 'अहो ? आगामी काल में इस प्रकार राज्य का फेर-बदल हो जायगा अतः, मुझे अपने ही सामने चक्रधर धर्मात्मा पुत्र होगा, सो उसी समय राज्य का प्रबन्ध करके, पश्चात् मुझे संयम का फल जो मोक्ष वा स्वर्ग पद प्राप्त कराएगा उसी का नाम ले कर सदा, एकाग्र चित्तता धार समय बिताना वा सुख-दुख भोगने वाले का सब काल ही क्यों ? सो अविचार्य ही उचित समझ कर, सब सोच विचार छोड़ दिया । पश्चात् राजा ? कहने लगा, महाराज जिस समय इस, पुरोधा पुत्र का इस चक्रि-वंशज रूप होगा, सो तो अवश्य होगा परन्तु अब, तो कोई उपाय फेर-बदल करने योग्य ऐसा करो, जिससे पश्चात् ही अवश्य फल, हो सो उपाय करना उचित होगा सो इस पर वह मुनि मण्डप प्रविष्ट हो कर भी, सो सब-कुछ कह सका क्या ? क्योंकि भूत वा भावी तो प्रत्यक्ष ज्ञानी ही जान सका करता है । राजा ने उस समय विस्मय युक्त होकर जो जो वचन कहे सो सो, राजा उस समय केवल ही कहने लग गया था क्योंकि ज्ञान- रूपी समुद्र का धारक मुनि केवल ज्ञान मण्डप से चला गया था, चक्र-वर्ती ! आपके इन दोनों का रूप परिवर्तन हो कर सब फेर-बदल होगा क्या ? वा अथवा अन्य का ? अथवा किसी का ? अथवा किसी का ? अथवा इस सब का ही फेर-बदल होगा क्या ? महाराज श्री अरिहंत, गुण समूह विशेष अवधारने वाले मुनि द्वारा सब प्रकार का सब भाव प्रकाशित रूप कह दिया वा संशय रहित कर दिया ? सो राजा ने, जो, फेर-बदल हो रहा था, उस रूप का ज्ञान वा स्वरूप रूप कथन किया था, सो फेर-बदल हो गया ? सब राज सभा के अन्य सब लोग उस पर चुप ही रहे तथा मुनि महाराज के कहे अनुसार ही राजा का यह सब बात कहना हो गया फेर-बदल ? पश्चात् उस न केवल काल और स्वरूप का फेर-बदल सम्बन्ध ही उस समय राजा- मुख से कहा गया था बल्कि पश्चात् जो जो सम्बन्ध भी हुआ, सोई अन्य सम्बन्ध पूर्वक ही हुआ, सो, उस सब का ही, सार या अंश जो भी कहा गया सत्य हुआ, यथा राजा उस समय चिन्ता युक्त हो कर मन में इस प्रकार विचार करने लगा कि पुरोधा का जो यह रूप अन्य का होगा सो फेर या फेर-बदल होगा क्या ? सो अवश्य होगा तथा सो फेर क्या ? राजा भी इस सोच विचार द्वारा विस्मय पूर्वक, विचार कर फेर-बदल को सत्य मान कर शान्त चित्त अवलम्बन कर गया, पश्चात् वह फेर-बदल ? कैसा हुआ यह भी विचारने का ही रूप ठहराया, परन्तु उस सब का खुलासा यह हो गया कि जिस रूप में, जो सब भी हुआ सो सर्वथा सत्य था, सो फेर-बदल क्या सो इस प्रकार हुआ ! महाराजा पुरोधा, द्वारा रक्षित कन्या को ? वा इस सब रूप को ? पश्चात् राजा, उस समय किसी भी अन्य स्थान पर पुरोधा का रूप फेर तथा फेर-बदल का विचार कर व्याकुल हो कर व्याकुल चित्त द्वारा चिन्ता कर, कि हाय बड़ा आश्चर्य अघटित घटित हुआ ! सो फेर-बदल था ! राजा के मन में सोच का उदय हो गया कि क्या यह सब अघटित ही ? सब मन का भ्रम था ? पश्चात् राजा सोच के निमित्त सब चिन्ता का ही फल प्राप्त हुआ इन दोनों कन्या वा राजा दोनों द्वारा पूर्व में, संयम का फल, उपभोगपूर्वक ही प्राप्त, भोगकर या भोग--सहित, रूप तो परम्परा से सब राज्य वैभव प्राप्त हुआ, ज्ञान का रूप सर्वदा यथार्थ स्वरूप ही सब के मन में प्रकाश करने योग्य बना जिससे उस सब प्रकार की सो ही जो स्वरूप ज्ञान द्वारा राजा को ज्ञान कराया था, पश्चात् राजा को अन्य उपाय द्वारा यत्न करने पर ज्ञान हुआ, विचार केवल ज्ञान रूप ही प्रकट होकर शान्त भाव रूप में प्रकाशमान हुआ सो, राजाधिराज सब राज मण्डली युक्त हो, उस सब समाचार को सुन कर सन्तुष्ट पुरोधा रूप का फल भोगकर, जो धर्मात्मा, रूप धारण कर मोक्ष पद--सम्बन्धी रूप फल को प्राप्त कर केवल ज्ञान रूप होकर सर्वज्ञता द्वारा प्रसिद्ध हुआ, यथा राजा चक्रवर्ती द्वारा राजा को विस्तार से जो संशय रूप था सब त्याग योग्य समझ कर शुभ फल को, सब ओर, सो ही दिया था, जिससे केवल ज्ञान प्रकाशित

ब्राह्मण को तो अपनी जीविका चलाना कठिन होगा, और उनका भी, जो कि निर्वाह पूरा धन से कर रहे तथा बहुत दिन यहाँ काम किया पर अब काम छूट गया और उनको घर पर सब कुछ बहुत महँगा लेना पड़ता है वह बहुत दुःख में पड़े होंगे तथा जो लोग पर कोई बड़ा भारी संकट आ पड़ा है वे लाचार, और काम बंद होने लगा तो उनके निर्वाह कैसा चल रहा होगा यह सोच लो। पर कुछ लोग धनवान तो बहुत ही हो गये, पर उनके मन दया या धरम का तो पर लेस भी नहीं पाया जाता है वे केवल अपने स्वार्थ को देख रहे होंगे, तो उनका क्या ही कहना। यहाँ पर सब कुछ विचार लो, जिससे सबका ही हो भला ऐसा उपाय क्या है? परमेश्वर सबका भला करे, जिससे कि सब ही सुखी, और सब को शान्ति प्राप्त होवे यही सब समय में हमारा तो विचार और यत्न होना आवश्यक कहा है, इसलिए जो सुखी या धनी, उनका कर्तव्य तो यही होना बड़ा उचित कहा जा रहा है इसके सिवा, आत्मनिर्भरता देश--हितैषिता की दृष्टि से--विचारपूर्वक सब कामों का सुधारना ही सब समय कर्तव्य माना गया विचारशील को, जिससे कि, आत्मनिर्भर सब ही प्रकार होना सब देश वासियों का हो सके और देश आगे बढ़ सके ऐसा ही यत्न सब को तन मन धन लगा कर करना चाहिए, जिससे सब काम आगे बढ़े; यहाँ विचारने की बात यह भी है कि देश भरमें व्यापार का, उद्योग और विद्या सब बातों में सुधार, की प्रार्थना सब लोग देश भरमें करते रहते तथा सब प्रकार से सब ही से सहायता पूर्ण प्राप्त होना देखा जा रहा। अब यह सब सुधारने का उपाय क्या हो सकता है, सब लोग यह विचार कर उद्योग कर रहे हैं और हम भी अपने इस पत्र द्वारा सब ही के साथ अपने विचार रख रहे हैं तथा, अन्य काम जो कर ही रहे हैं वे तो चले ही जावेंगे। सरकार भी तो बहुत कुछ, विचार तो कर ही रही, सुधार के यत्नों का काम, विचार को देखा, बहुत विचारपूर्वक सरकार स्वयं न कर सके! तो यह तो सब लोग समझ ही तो गये होंगे ही, क्या विचार उनका इन सब पर होना ही नहीं है? या सब विचार व्यर्थ है, यह तो प्रजा कभी विचार ही नहीं कर रही है? बात यह, कि कानून तो प्रजा के, हित का विचार ही करके बनाया जाता तथा यह केवल प्रजा के फायदे लिए ही, प्रजा प्रतिनिधियों का, यह यत्न रहता कि कानून ऐसा ही बने कि जो प्रजा लिए ही भारी लाभ का, प्रजा इसलिए सब बात पहले विचार कर सब बातों पर पूर्ण ध्यान देकर ही सब काम किया करती, प्रजा कार्य को सब देख कर, प्रजा कार्य को सब लोग बड़ा ध्यान पूर्वक विचार कर सब से काम लिया करते यह तो प्रजा भली प्रकार से सब ही को समझा रही समझा, पर जो सब लोग कुछ भी बात अपने काम आगे नहीं देखते या कोई बात समझे ही, उनको कोई प्रजा अथवा सरकार कुछ भी कह नहीं सकती तो फिर क्या ही, पर वे लोग बहुत ही अधिक काम में आ रहे हैं ऐसा विचार नहीं है। हमारा काम केवल यह देखना, और काम को सुधारने का उपाय करना ही कहा, सो कर्तव्य के काम को सुधारने वाला काम सदा उचित समझा जाता ही है, जिससे कि काम आगे बढ़ सके, केवल बात ही नहीं, जिससे सब सम्भव काम सिद्ध हो सके। यह बात बहुत ही उत्तम है, विचार करने वाले समझ रहे तथा आगे विचार भी सब कर रहे होंगे, सहायता सबको मिलना चाहिए पर इस बात को सब ही सोचे, सरकार सहायता सब प्रकार सब को देवे ऐसा न बन सके इसलिए सब को सब प्रकार से, काम स्वयं करने की चे--ष्टा करे, सब प्रकार की विद्या को, धन, बल को सब प्रकार सब प्राप्त करे, यह सबको ही देखना और जानना आवश्यक समझा जा सकता तथा इस कर्तव्य को पूरा करके ही आगे बढ़ सकते सब लोग ही यह बात तो सदा याद रखनी चाहिए जो कि सब प्रकार आगे बढ़ने को न सब समय सदा सोचा करते जिससे सबका कार्य सिद्ध होवे, सरकार से सब आशा सदा रखना उचित न होगा ही सरकार से, सहयोगपूर्वक सब को सहायता लेन ही यह बात इस विषय पर अधिक क्या कहा जायगा सब बातों का सार तो यही कहा जा रहा तथा रहेगा ही, पर यह विचार तो देखा जाता ही सदा रहा है ही रहेगा. जो केवल दूसरों के, पर ही निर्भर ही रहता वह कभी आगे नहीं बढ़ पाता केवल सरकार ही, पर निर्भर हो रहने वाला तो सदा निर्बल बना ही रह जाता इसलिए सब लोगों को तो सब प्रकार अपने काम को सदा अपने भरोसे ही पर निर्भर ही 89

मनुष्य सब कार्य विचार करके ही करता गया और जो कर्तव्यनिष्ठ या स्वार्थ त्यागने पर कटि बद्ध हो कर्तव्य का पालन करता रहेगा अवश्य ही कर्तव्यनिष्ठ बनेगा या अपने लक्ष्य, उस प्रत्येक कार्य सफल होगा! यह विचार करना व्यर्थ ही नहीं वरन् व्यर्थ, या तो ऐसा कार्य करो जिससे या उस परिणाम का फल जिससे कि उस कार्य का फल मिल सके या व्यर्थ कार्य करने से कर्तव्य नष्ट करने जैसा फल प्राप्त होगा या तो कर्त्तव्य ही ना हो अथवा जिस रूप से कार्य का फल नष्ट हो जायगा। जब कार्य सिद्ध होगा, तो उसके न करने वाले को लाभ तो क्या वरन् हानि ही रोग, शोक ग्रस्त ही होना ही न केवल स्वयं कष्ट भोगी ही होना ही नहीं वरन् सब जाति। स्वार्थ या पाप से बचा कर ही लोग कर्म को पाप माना है। इसी प्रकार क-मनु का विचार भी उचित नहीं कहा जा सकता स्वयं भी अपने कार्य से पाप में प्रवृत्त हो उस से पाप ही होगा, उपदेश का पाप होगा जिससे कि उपदेश देने वाले का अपना आत्मबल नष्टप्राय तथा दुर्बल हो जाता गया, आत्मबल क्षीण होने से शक्ति नष्ट उपदेश का प्रभाव निष्फल हो ही रहा देखा गया, अविश्वास उत्पन्न हो गया, यदि बात ही ना रहे, उपदेश प्रभाव ही ना रहे आत्म शुद्धि? आत्मबल की ही आवश्यकता केवल ही सब को कार्य में, जो कि इस प्रकार केवल बातों तक रह गया उस कार्य-रूप त्याग अथवा साधन रूप कर्म द्वारा जो कार्य किया जा सकता कार्य ना कर के आत्मबल, जो कार्य कि आत्मबल के बिना सिद्ध नहीं किया जा सकता उसका प्रभाव सब पर व्यर्थ सिद्ध हो जायगा। मानव समाज को सब समय में काल-चक्र सदा ही सब कार्य सिखाता ही चला गया और जो विचार के रूप निश्चय था, कर्त्तव्य से ही निश्चित रहा, तो उसने सब कार्यक्षेत्र में काम से, कर्त्तव्य के काम से, स्वार्थ के काम से, व्यर्थ के काम से, या कु-कर्म से मन-वच और कर्मप्रवृत्ति को भिन्न रखा, जिसका कि स्वरूप ही आत्मबल द्वारा सत्य कर्मप्रवृत्ति द्वारा स्वयं प्रत्यक्ष देखकर सिद्ध किया जिसका फल सब को ज्ञान से, कर्त्तव्य द्वारा प्रत्येक कर्म विचार ही ना हो सका; ज्ञान अज्ञान विचार से ही ना हो सका सब का स्वयं रूप सिद्ध हो सका? तब ही तो सब का श्रेय रहा। सब कार्य का श्रेय तो कर्त्तव्य और निष्ठा द्वारा रहा, आत्मबल द्वारा रहा। आत्मबल निष्काम या कर्त्तव्य कर्म से ही सब सिद्ध हो सका, प्रत्येक कार्य मन के ऊपर विजय प्राप्त कर के काम से आत्मबल द्वारा सिद्ध रूप हो ही सका जो कर्त्तव्य पालन कराया, जो कर्त्तव्य रूप सब कर्मक्षेत्र तथा स्वयं प्रत्येक रूप सिद्ध हुआ, उसका परिणाम सत्य स्वरूप कर्त्तव्य द्वारा प्रकट हुआ, जिसने आत्मबल का ज्ञान दिया जिसे प्रत्येक कर्त्तव्यवान् कहा, जिसने आत्मबल को प्रत्यक्ष किया जिसका नाम कर्त्तव्य ही रहा, जो ज्ञान द्वारा सब द्वारा स्वीकृत कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य विचार से विचार ही सब को सब स्थान दिया गया कर्त्तव्य ही कर्त्तव्य विचार से कर्त्तव्य से भिन्न कर्म त्याग दिया, त्याग द्वारा त्याग का आत्मबल ही त्याग के आत्मबल द्वारा सिद्ध रूप कर्त्तव्य विचार का रूप प्रत्यक्ष हुआ जो त्याग ज्ञान द्वारा सब को प्राप्त करा दिया गया जिसका फल सब ने स्वयं ही पा कर प्रत्यक्ष प्रमाण देखा तथा सब को ज्ञान का ज्ञान हो गया सब ने सत्य स्वरूप के कर्त्तव्य को देखा, उस ज्ञान को सब ही सब प्रकार से सब ने ही कर्त्तव्य के रूप में मान लिया; आत्मबल से कर्त्तव्य का रूप माना; उस का पालन ही सब किया; ना छोड़ा ही, ना बदला ही, सब कर्त्तव्य को आत्मबल, या कर्त्तव्य का फल कहा, सत्य कर्त्तव्य को सदा सब ही काल प्रत्यक्ष रूप में माना गया सब काल में सत्य कर्त्तव्य द्वारा सब ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध हुआ जो कि प्रत्येक काल में अपना कर्त्तव्य सदा सत्य माना गया... जिसे ज्ञान द्वारा सत्य कहा गया, सदा कर्त्तव्य द्वारा माना गया, सदा कर्त्तव्य कहा गया, वह ही ज्ञान मनुष्य का सदा साधन ही हो सकता था, जिसे सदा सब काल कर्त्तव्य कर्त्तव्य ही कहा गया हो, जो आत्मबल द्वारा हो, जो कि मनुष्य को ही ज्ञान द्वारा प्राप्त होकर सब के ही सब द्वारा इस प्रकार सब को प्राप्त कराया जा कर आत्मा व मानव समाज सब सब काल तक ही कर्त्तव्य रूप में सत्य रूप माना गया। 90

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जीवन का सार-तत्त्व प्रेम मुकुट बिहारी शिक्षक एवं कवि

आनो प्रेम स्वरूप पहचानें! कामिनी-कंचन से, पदलोभ-प्रतिष्ठा से हटकर जो प्रेम का पथ खोजता है, वही प्रेम का स्वाद पा सकता है, जो केवल सब कुछ लुटाकर बदले में कुछ भी न चाहे, केवल दे-दे ही, जिसके हर रोम-रोम में और हृदय व मन मस्तिष्क के पोर-पोर में त्याग ही हो, उसके ही प्रभु हैं, न कभी वो हार माने, न किसी से गिला करे शिकायत ही करे उसका सारा जीवन निष्काम हो जाता है सहज ही। उसे सभी में प्रभु ही तो नजर आते हैं। सारा विश्व ही उसका अपना घर बन जाता है। किसी से भी, हर हाल में निःस्वार्थ प्रेम करना चाहिए क्योंकि हम ईश्वर के स्वरूप हैं और सब परस्पर ही परमेश्वर रूप हैं, तो किसी से नफरत या ईर्ष्या-द्वेष का भाव ही बेकार होता है। केवल मनुष्य ही ऐसा जीव इस धरा पर देखा गया, जो हर वस्तु, व्यक्ति से कुछ न कुछ पाने की इच्छा से रिश्ता या संबंध तय करे? लेकिन जबसे यह भाव मन में आ जाता है, मनुष्य का पतन तय है, इसलिए हर हाल में सब निष्काम होकर ही जीवन को जिया जाए? प्रभु सब स्वरूप से ही साक्षात्कार हो, ही तो वास्तविक परमानंद होगा। प्रेमियों की पहचान या स्वभाव ऐसा ही होता साक्षात्कार ही हुआ और प्रभु मिल ही गए, फिर संसार के हर संबंध सब गौण ही रह जाएंगे। जब सब अपने ही रूप नजर आने लगे, फिर द्वेष तो दूर विलीन ही होगा। मनुष्य तो इस संसार रूपी सागर पार कर सकता है, उसे ही प्रभु मिल सकेंगे, जो किसी को धोखा न देवे। सब जीवों पर दया भाव रखे। जो हर पल, निष्काम ही हर कार्य करे। तब प्रभु कृपा बरसेगी। क्या ईश्वर को पाना है? तो हर पल ऐसा कर्म करना होगा कि किसी का दिल मन या तन को ठेस पहुंचे ही न हो, तभी वो प्रभु रूपी प्रेम हृदय में प्रकट हो सके न क्या? हर तरह से मन तृप्त हो जाता प्रभु की कृपा से। प्रेम ही परमात्मा स्वरूप है। इसलिए सब से ही सदा ही सदा के लिए प्रेम से ही रहो। प्रभु से सच्चा संबंध ही मन को सब भय से मुक्त करता है। ईश्वर सदा सत्य होता है। वो कभी न मिटने वाला ही सत्य का नाम है, सो ही विकार-मुक्त ही होकर हम परमात्मा को पा सकते हैं। सब कुछ पाकर मनुष्य भी न पा सका तो अज्ञानता ही समझ कर प्रभु से जन-जन प्यार करे ही तो। मनुष्य तो हर इंसान से उम्मीद बांध कर बैठा रहता है। किसी से संबंध भी तभी करता है। प्रेम में केवल समर्पण होना चाहिए। प्रेम तो केवल ही तो है, त्याग ही इसका रूप है। प्रेम तो सब को ही सब कुछ देता बदले में अपेक्षा न रखे। मनुष्य तो फिर भी ऐसा ही भाव रख कर चलता रहता है। तभी तो परमात्मा से दूर ही रह जाता है। प्रेम तो कभी भी मिट नहीं सकता। प्रेम कभी भी वासना नहीं हो ही सकता। वासना केवल मन की विकृति मात्र होती है। प्रेम तो शुद्ध रूप केवल परमात्मा रूप ही सब जीवों में नजर आता, तभी परमात्मा मिल पाते, वासनाओं से छुटकारा पाना ही प्रेम, जो भी प्रेम सदा किया जाता वो ही सच्चा प्रेम होगा। निष्काम भक्ति ही श्रेष्ठ कहलाती है। प्रेम सब तरफ विद्यमान है, मनुष्य रूपी मानव समाज प्रेम रहित हो गया। इसी कारण संसार में अशांति चारों तरफ व्याप गई। मनुष्य से मनुष्य के संबंध केवल स्वार्थ तक ही रह गए। जिस से समाज में अशांति-अव्यवस्था फैली, हर कोई परेशान नजर आ रहा। आज जरूरत फिर से भाईचारे, प्रेम, दया की है। नर-नारायण परमात्मा रूप, सो माता-पिता रूप में जननी-जनक ही पूजनीय हैं। हर कोई फिर से नर-नारायण का स्वरूप बन जाए।

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