पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
( १३२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १३२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सकोपमिदमाह- "धिक् पापाधम ! यद्येवं भूयोऽपि वदसि ततः त्वां तत्क्षणमेव वधिष्यामि यतो मया तस्य अभयं प्रद- त्तम् । तत् कथं व्यापादयामि । उक्तञ्च- सो अभय दान देकर हमारे निकट लाओ जिससे यहां आनेका कारण पूँछूं"। तब यह सबने विश्वास दे अभय दानकर उसको मदोत्कटके निकट लाकर प्रणाम कर बैठाया । तब उसके पूछनेपर उसने अपना वृत्तान्त सार्थसे छूटनेका निवे- दन किया, तब सिंहने कहा"-भोः क्रथनक ! अब तू फिर गांवको जाकर भार उठानेके कष्टका भागी नहो । सो इसी वनमें शंकारहित होकर मरकतमणिके सदृश तृणके अग्रभागोको भोजन करता हुआ हमारे साथ सदैव निवासकर"। वहभी "बहुत अच्छा"कह उनके मध्यमें विचरता हुआ निर्भय सुखसे रहता था। एकदिन मदोत्कटका वनचारी महाग़जके साथ युद्ध हुआ, तब उसके दांतरूपी मूसलके प्रहारसे उसको बडी व्यथा हुई । परन्तु व्यथित होकर किसी प्रकार प्राणोंसे मुक्त न हुआ, परन्तु शरीरकी असामर्थ्यसे सर्वथा चलनेको भी समर्थ नहींथा । वेभी सब काकादि प्रभुके अशक्त होनेसे क्षुधासे परम दुखको प्राप्तहुए। तब उनसे सिंह बोला, - "भो ! कहीं कोई जीवकी खोज करो जिससे मै इस दशामें भी प्राप्त हुआ उसे मारकर तुम्हारा भोजन सम्पादन करूंगा" तब वे चारोंभी भ्रमण करने लगे जब कोई जीव नहीं पाया तब कौए और गीदड परस्पर मंत्रणा करने लगे, शृगाल बोला, - "भो वायस ! बहुत घूमनेसे क्याहै यह हमारे प्रभुका विश्वासी क्रथनक मौजूदहै। सो इसे मारकर हम प्राणयात्रा करें"। काक बोला- ' आपने सत्य कहा, परन्तु स्वामीने उसको अभयदान दियाहै इस कारणसे वह वध्यनहीं है"। शृगाल बोला, - "वायस ! मै स्वामीसे विज्ञप्ति कर ऐसा करूंगा जो स्वामी उसका वधकरे सो आप यहीं स्थित रहो जबतक मैं घर जाय प्रभुकी आज्ञा लेकर आऊं" । यह कह वह सिंहकी ओरको चला । और सिंहको प्राप्त होकर बोला,-"स्वामी ! हम सम्पूर्ण वन घूम आये, परन्तु कोई जीव प्राप्त नहीं हुआ । सो हम क्या करें अब हम भूखसे एक चरणभी नहीं चल सकते हैं. आप- कोभी पथ्य व्यापार करना युक्त है । सो यदि स्वामीकी आज्ञा हो तो क्रथनकके मांससे आज भोजन व्यापार किया जाय" । तब सिंह उसके दारुण वचन सुन- कर क्रोधसे यह बोला, - "पापाधम ! धिक्कार है तुझे ! यदि फिर ऐसा कहेगा
भाषाटीकासमेतम् । ( १३३ ) तो उसीक्षण तुझको मारडालूंगा कारण कि, मैंने इसको अभयदान दियाहै सो किस प्रकार मारू, कहा है- न गोप्रदानं न महीप्रदानं न चान्नदानं हि तथा प्रधानम् । यथा वदन्तीह बुधाः प्रधानं सर्वप्रदानेष्वभयप्रदानम् ३१३" न गोदान, न भूमिदान, न अन्नदान ऐसा प्रधान है जैसे पंडितलोग सब दानोंमें अभयप्रदानको श्रेष्ठ कहते हैं ॥ ३१३ ॥” तच्छ्रुत्वा शृगाल आह-“स्वामिन् ! यदि अभयप्रदानं दत्त्वा वधः क्रियते तदा एष दोषो भवति। पुनर्यदि देवपादानां भक्त्या स आत्मनो जीवितव्यं प्रयच्छति तन्न दोषः, ततो यदि स स्वयमेव आत्मानं वधाय नियोजयति, तद्वध्योऽन्यथा अस्माकं मध्यादेकतमो वध्य इति, यतो देवपादाः पथ्याशिनः क्षुन्निरोधादन्त्यां दशां यास्यन्ति । तत् किमेतैः प्राणैरस्माकं ये स्वाम्यर्थे न यास्यन्ति । अपरं पश्चादपि अस्माभिर्वह्निप्रवेशः कार्यः । यदि स्वा- मिपादानां किंचिदनिष्टं भविष्यति । उक्तञ्च- यह सुनकर शृगाळ बोला-“स्वामिन् ! यदि अभय दान देकर वध किया जाय तो यह दोष लगे और जो स्वामीके चरणोंमें भक्तिसे अपना जीवदे तो दोष नहीं है सो यदि वह स्वयंही अपनेको वधके निमित्त प्रदान करे तो वध्य है नहीं तो हममेसे किसी एकको वधकरना । कारण कि, स्वामीके चरण पथ्य- व्यापारसे युक्त भूखके कारण मरणावस्थाको प्राप्त हैं । और पीछे भी हमको अग्निमे प्रवेश करना पडेगा जो स्वामीके चरणोंका कुछभी अनिष्ट होगा । कहा है कि- यस्मिन्कुले यः पुरुषः प्रधानः स सर्वयत्नैः परिरक्षणीयः । तस्मिन्विनष्टे कुलसारभूते न नाभिषंगे ह्यरयो वहन्ति ३१४" जिस कुलमें जो पुरुष प्रधान है उसकी सब यत्नोंसे रक्षा करना चाहिये उस कुलके सारभूतके नष्ट होनेमें सब ओरसे शत्रु उसको पराभूत करते हैं” तदाकर्ण्य मदोत्कट आह-“यद्येवं तत् कुरुष्व यद्रोचते” तच्छ्रुत्वा स सत्वरं गत्वा तान् आह-“भोः स्वामिनो महती
( १३४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १३४ ) पञ्चतन्त्रम् । अवस्था वर्त्तते, तत् किं पर्य्यटितेन तेन विना कोऽत्र अस्मान् रक्षिष्यति । तद्गत्वा तस्य क्षुद्रोगात् परलोकं प्रस्थितस्य आत्मशरीरदानं कुर्मो येन स्वामिप्रसादस्य अनृणतां गच्छामः । उक्तञ्च- यह सुनकर मदोत्कट बोला,-"जा ऐसा है तो जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो"। यह सुनकर वह उनके पास जाकर बोला,-"भो ! भो ! स्वामीकी बडी कठिन अवस्था है सो अब फिरनेसे क्या स्वामीके बिना हमारी कौन रक्षा करेगा, सो चलकर क्षुधारोगसे परलोक जाते हुए उसको अपना शरीर- प्रदान करें जिससे स्वामीके प्रसादसे अनृणताको प्राप्त होजायँ, कहा है- आपदं प्राप्नुयात्स्वामी यस्य भृत्यस्य पश्यतः । प्राणेषु विद्यमानेषु स भृत्यो नरकं व्रजेत् ॥ ३१५ ॥" जिस भृत्यके देखते स्वामी आपत्तिको प्राप्त होता हो अपने प्राण होते उसकी रक्षा न करे वह भृत्य नरकको जाता है ॥ ३१५ ॥" तदनन्तरं ते सर्वे बाष्पपूरितदृशो मदोत्कटं प्रणम्य उप- विष्टाः । तान् दृष्ट्वा मदोत्कट आह-"भोः ! प्राप्तं दृष्टं वा किञ्चित् सत्त्वम् ?" अथ तेषां मध्यात् काकः प्रोवाच,- "स्वामिन् ! वयं तावत् सर्वत्र पर्य्यटिताः, परं न किञ्चित्स- त्वमासादितं दृष्टं वा । तदद्य मां भक्षयित्वा प्राणान् धारयतु स्वामी, येन देवस्य आश्वासनं भवति मम पुनः स्वर्गप्राप्ति- रिति । उक्तञ्च- तब वे सब आंखोंमें आंसू भरे मदोत्कटको प्रणाम कर बैठे । उनको देखकर मदोत्कट बोला,-"भो ! कोई जीव प्राप्त हुआ या देखा?"। तब उनके बीच- मेंसे कौआ बोला,-"स्वामिन् ! हम सब स्थानमें घूमे परन्तु न कोई जीव पाया न देखा । सो आज मुझे भक्षण कर स्वामी अपने प्राणोंको धारण करे जिससे स्वामीका आश्वासन और मेरी स्वर्गप्राप्ति होगी, कहा है- स्वाम्यर्थे यस्त्यजेत्प्राणान्भृत्यो भक्तिसमन्वितः । परं स पदमाप्नोति जरामरणवर्जितम् ॥ ३१६ ॥" भक्तिमान् जो सेवक स्वामीके निमित्त प्राण त्यागन करता है वह जरामरण रहित परमपदको प्राप्त होता है ॥ ३१६ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १३५ ) तच्छ्रुत्वा शृगाल आह-"भोः ! स्वल्पकायो भवान् तव भक्षणात् स्वामिनस्तावत् प्राणयात्रा न भवति अपरो दोषश्च तावत् समुत्पद्यते । उक्तञ्च- यह सुनकर शृगाल बोला,-"आप स्वल्प शरीर हो तुम्हारे भक्षणसे स्वामी- को प्राणयात्रा न होगी और दोषभी प्राप्त होगा । कहा है- काकमांसं शुनोच्छिष्टं स्वल्पं तदपि दुर्लभम् । भक्षितेनापि किं तेन तृप्तिर्येन न जायते ॥ ३१७ ॥ एक तो काकका मांस दूसरे कुत्तेकी उच्छिष्टतासे बचा हुआ और फिर थोडा तथा दुष्प्राप्य उसके खानेसे क्या है जिससे कि, तृप्ति नहो ॥ ३१७ ॥ तद्दर्शिता स्वामिभक्तिर्भवता, गतं च आनृण्यं भर्तृपि- ण्डस्य, प्राप्तश्च उभयलोके साधुवादः तदपसर अग्रतः अहं स्वामिनं विज्ञापयामि"। तथानुष्ठिते शृगालः सादरं प्रणम्य उपविष्टः प्राह-"स्वामिन् ! मां भक्षयित्वा अद्य प्राणयात्रां विधाय मम उभयलोकप्राप्तिं कुरु । उक्तञ्च- सो आपने स्वामीभक्ति दिखादी स्वामीकी अनृणताकी प्राप्ति की, दोनों लोकोंमें साधुवाद प्राप्तकिया, सो आगेसे हटो मै स्व.मीको कहू,” यह होनेपर शृगाल आदरसे प्रणाम कर बैठा और बोला-"स्वामिन् ! मुझ भक्षणकर, आज ग्राणयात्रा कर मेरी उभयलोकप्राप्ति करो । कहाहै- स्वाम्यायत्ताः सदा प्राणा भृत्पानामर्जिता धनैः । यतस्ततो न दोषोऽस्ति तेषां ग्रहणसम्भवः ॥ ३१८ ॥” प्राण सदा स्वामीके आधीनहैं कारण कि, स्वामीने वह धनसे खरीद लियेहैं सो उनके ग्रहण करनेमे कुछ दोष नहीं होताहै ॥ ३१८ ॥” अथ तच्छ्रुत्वा द्वीपी आह-“भोः ! साधु उक्तं भवता, पुनः भवानपि स्वल्पकायः स्वजातिश्च, नखायुधत्वात् अभक्ष्य एव। उक्तञ्च- यह सुनकर गैंडा बोला,-"भो ! तुमने ठीक कहा आपभी स्वल्पकाय और सजातीयहो नखायुध होनेसे अभक्ष्यहो । कहाहै-
( १३६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १३६ ) पञ्चतन्त्रम् । नाभक्ष्यं भक्षयेत्प्राज्ञः प्राणैः कण्ठगतैरपि । विशेषात्तदपि स्तोकं लोकद्वयविनाशकम् ॥ ३१९ ॥ बुद्धिमान् कंठमें प्राण आनेपरभी अभक्ष्यको न खाय उसमे भी विशेषकर लघु होनेसे दोनों लोक नष्ट होतेहैं ॥ ३१९ ॥ तद्दर्शितं त्वया आत्मनः कौलीन्यम्, अथवा साधु चेद- मुच्यते- सो तुमने अपनी कुलीनता दिखलादी, अथवा अच्छा कहाह- एतदर्थं कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम् । आदिमध्यावसानेषु न ते गच्छन्ति विक्रियाम् ॥ ३२० ॥" इसीकारण अच्छे कुलवानोंको राजा संग्रह करतेहैं जो आदि, मध्य, अन्तमें कभी विकारको प्राप्त नहीं होतेहैं ॥ ३२० ॥ " तदपसर अग्रतो येनाहं स्वामिनं विज्ञापयामि"। तथा- नुष्ठिते द्वीपी प्रणम्य मदोत्कटमाह,-"स्वामिन् ! क्रियताम् अद्य मम प्राणैः प्राणयात्रा, दीयतामक्षयोवासः स्वर्गे, मम विस्तार्यतां क्षितितले प्रभूततरं यशः तन्नात्र विकल्पः कार्य्यः । उक्तञ्च- सो आगेसे हटो जिससे मै स्वामीसे कहू" ऐसा होनेपर गेड़ा प्रणामकर मदो- त्कटसे बोला,-"स्वामिन् ! आज मेरे प्राणोसे अपना निर्वाह करो मुझे स्वर्गमें अक्षय निवासदो पृथ्वीमें मेरा अत्यन्त यश विस्तार करो, उसमें विकल्पकरना नहीं चाहिये । कहाहै कि- मृतानां स्वामिनः कार्य्ये भृत्यानामनुवर्त्तिनाम् । भवेत्स्वर्गेऽक्षयो वासः कीर्त्तिश्च धरणीतले ॥ ३२१ ॥" जो अनुकूल भृत्य स्वामीके निमित्त प्राण त्यागन करते हैं उनका स्वर्गमें अक्षयवास और पृथ्वीमें कीर्त्ति होतीहै ॥ ३२१ ॥" तच्छ्रुत्वा क्रथनकश्चिन्तयामास,। "एतैः तावत्सर्वैरपि शो- भनानि वाक्यानि प्रोक्तानि, न च एकोऽपि स्वामिना विना- शितः, तदहमपि प्राप्तकालं विज्ञापयामि, येन मम वचनमेते योऽपि समर्थयन्ति" । इति निश्चित्य प्रोवाच,-"भोः !
भाषाटीकासमेतम् । (१३७) सत्यमुक्तं भवता, परं भवानपि नखायुधः तत् कथं भवन्तं स्वामी भक्षयति। उक्तञ्च- यह सुनकर क्रथनक विचारने लगा कि, "इन सबने अच्छे २ वचन कहे एककोभी स्वामीने न मारा सो मैं भी अब समय प्राप्तिपर विज्ञप्ति करू जिससे यह तीनो मेरे वचनको समर्थन करेंगे।" यह विचारकर बोला,-"भोः ! आपने सत्य कहा परन्तु तुमभी नखायुधवालेहो सो कैसे आपको स्वामी भक्षण करेंगे । कहाहै- मनसापि स्वजात्यानां योऽनिष्टानि प्रचिन्तयेत् । भवन्ति तस्य तान्येव इहलोके परत्र च ॥ ३२२ ॥ जो मनसेभी अपने जातिके अनिष्टकी चिन्ता करताहै इस लोकमे और परलोकमे उसको वेही होतेहैं ॥ ३२२ ॥ तदपसर अग्रतो येन अहं स्वामिनं विज्ञापयामि" तथा- नुष्ठिते क्रथनकोऽग्रे स्थित्वा प्रणम्योवाच-" स्वामिन् ! एते तावदभक्ष्या भवतां तत् मम प्राणैः प्राणयात्रा विधीयतां येन मम उभयलोकप्राप्तिर्भवति । उक्तञ्च- सो आगेसे हटो जिससे मैं स्वामीको विज्ञापनादू" ऐसा करनेपर क्रथनक आगे स्थितहो प्रणाम कर बोला,-"स्वामिन् ! यह तो सब अभक्ष्यहैं आपके, सो हमारे प्राणोंसे प्राणयात्रा करो जिससे मेरी उभयलोक प्राप्ति होगी। कहाहै- न यज्वानोऽपि गच्छन्ति तां गतिं नैव योगिनः । यां यान्ति प्रोज्झितप्राणाः स्वाम्यर्थे सेवकोत्तमाः॥३२३॥ उस गतिको न यज्ञशील न योगी जातेहैं जिस गतिको स्वामीके निमित्त प्राण त्यागने करनेवाले उत्तम सेवक जाते हैं ॥ ३२३ ॥" एवमभिहिते ताभ्यां शृगालचित्रकाभ्यां विदारितोभय- कुक्षिः। क्रथनकः प्राणान् अत्याक्षीत्। ततश्च तैः क्षुद्रपण्डितैः सर्वैर्भक्षितःअतोऽहं ब्रवीमि । "बहवः पण्डिताः क्षुद्राः"इति । ऐसा कहनेपर शृगाल और चीतेसे कोख विदीर्ण किया हुआ क्रथनक प्राणत्यागन करता हुआ, तब उन सब क्षुद्रपडितोंने उसको भक्षणकर लिया । ससे मैं कहताहू कि, "बहुत क्षुद्रपडितोंने" इत्यादि ।
( १३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १३८ ) पञ्चतन्त्रम् । तद्भद्र ! क्षुद्रपरिवारोऽयं ते राजा मया सम्यग् ज्ञातः सतामसेव्यश्च । उक्तञ्च- सो हे भद्र ! यह तुम्हारा राजा क्षुद्रपरिवारवाला है यह मैंने भलीप्रकार जानलिया इससे सत्पुरुषोंको असेव्यहै। कहाभीहै- अशुद्धप्रकृतौ राज्ञि जनता नानुरज्यते । यथा गृध्रसमासन्नः कलहंसः समाचरेत् ॥ ३२४ ॥ अशुद्ध प्रकृतिवाले राजामें प्रजा ( प्रसन्न ) आनन्द नहीं होती जैसे गृध्रोंसे युक्त कलहंस श्रेष्ठ आचरण नहीं करसकता ॥ ३२४ ॥ तथाच- ओर देखो- गृध्राकारोऽपि सेव्यः स्याद्धंसाकारैः सभासदैः । हंसाकारोऽपि सन्त्याज्यो गृध्राकारैः स तैर्नृपः ॥ ३२५ ॥ गृध्रकेसे आकारवाले राजाका हंसाकारवाले सभासद सेवन करसकतेहैं और हंसाकार राजा गृध्राकारवाले सभासदोंसे युक्त हो तो त्यागना चाहिये ॥३२५॥ तन्नूनं ममोपरि केनचित् दुर्जनेन अयं प्रकोपितः । तेनैवं वदति । अथवा भवति एतत् । उक्तञ्च- सो निश्चय मेरे ऊपर किसी दुर्जनने इसको क्रोधित करादिया इसीसे ऐसा कहताहै । अथवा यह होताहीहै, कहाहै- मृदुना सलिलेन खन्यमाना- न्यवधृष्यन्ति गिरेरपि स्थलानि । उपजापविदां च कर्णजापैः किमु चेतांसि मृदूनि मानवानाम् ॥ ३२६ ॥ कोमल जलसे घिसे हुए पर्वतके स्थलभी घिस जाते हैं फिर भेदमें कुशल मनुष्योंके कान भरनेसे कोमल मनुष्योंके चित्तोंकी कौन कहे ॥ ३२६ ॥ कर्णविषेण च भग्नः किं किं न करोति बालिशो लोकः । क्षपणकतामपि धत्ते पिबति सुरां नरकपालेन ॥ ३२७ ॥ कान भरनेके विषसे भग्न हुआ मूर्ख लोग क्या क्या नहीं करताहै बहुत क्या संन्यासीभी होता है तथा मनुष्यकी खोपडीमें सुरापान भी करता है ॥३२७
भाषाटीकासमेतम् । (१३९)
अथवा साधु चेदमुच्यते- अथवा सत्य कहाहै- पादाहतोऽपि दृढदण्डसमाहतोऽपि यं दंष्ट्रया स्पृशति तं किल हन्ति सर्पः । कोऽप्येष एव पिशुनोऽयममनुष्यधर्मः कर्णे परं स्पृशति हन्ति परं समूलम् ॥ ३२८ ॥ चरणसे हत और दृढ दंडसे ताडित सर्प जिसे दष्ट्रासे काटता है वही मरता है और यह मनुष्य धर्मकी चुगली इस प्रकारकी है कि, मनुष्यको समूल नष्ट करतीहै ॥ ३२८ ॥ तथाच- औरभी- अहो ! खलभुजङ्गस्य विपरीतो वधक्रमः । कर्णे लगति चैकस्य प्राणैरन्यो वियुज्यते ॥ ३२९ ॥ अहो दुष्ट और सर्पके वध करनेका धर्म विपरीत है कि, वह कानमें किसीके लगताहै और प्राणोंसे कोई ( नष्ट ) पृथक् होता है ॥ ३२९ ॥ तदेवं गतेऽपि किं कर्त्तव्यमिति अहं त्वां सुहृद्भावात्,पृच्छा- मि" । दमनक आह-"तद्देशान्तरगमनं युज्यते न एवं विध- स्य कुस्वामिनः सेवां विधातुम् । उक्तञ्च- सो ऐसा होनेपरभी क्या करना चाहिये मैं तुझसे सुहृद्भावसे पूछता हू" दमनक बोला,-"आप अन्यस्थानमे चले जाइये इस प्रकारके कुस्वामीकी सेवा करनी उचित नहीं कहा है- गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्य्याकार्य्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥ ३३० ॥" उद्धत कार्य अकार्यके न जाननेवाले उन्मार्गमें प्राप्त गुरुजनका भी त्याग कर देना चाहिये ॥ ३३० ॥" सञ्जीवक आह-"अस्माकमुपरि स्वामिनि कुपिते गन्तुं न शक्यते न च अन्यत्र गतानामपि निर्वृत्तिर्भवति । उक्तञ्च-
( १४० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १४० ) पञ्चतन्त्रम् । संजीवक बोला,-"हम स्वामीके क्रोधित होनेपर अन्य स्थानमें नहीं जा- सकते कारण कि, अन्य स्थानमें जानेसे मंगल नहीं होगा । कहा है- महतां योऽपराध्येत दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् । दीर्घौ बुद्धिमतो बाहू ताभ्यां हिंसति हिंसकम् ॥ ३३१ ॥ जो बडे पुरुषोका अपराध करता है वह मैं दूरहूं ऐसा विचार नकरे बुद्धि- मान्की दीर्घ बाहु दूरसेभी उस हिंसकको पकडकर मारती है ॥ ३३१ ॥ तद्युद्धं मुक्त्वा मे नान्यदस्ति श्रेयस्करम् । उक्तञ्च- सो युद्धको छोडकर अब और श्रेयस्कर उपाय नहीं है। कहा है- न तान् हि तीर्थैस्तपसा च लोकान् स्वर्गैषिणो दानशतैः सुवृत्तैः । क्षणेन यान्यान्ति रणेषु धीराः प्राणान्समुज्झन्ति हि ये सुशीलाः ॥ ३३२ ॥ स्वर्गकी इच्छा करनेवाले उन लोकोंको तीर्थ तप सैकडो दान और सुकृतोंसे नहीं प्राप्त होते हैं जहां धैर्यवान सुशील पुरुष युद्धकर क्षणमात्रमें प्राप्तहोते हैं ॥ ३३२ ॥ मृतैः सम्प्राप्यते स्वर्गो जीवद्भिः कीर्तिरुत्तमा । तदुभावपि शूराणां गुणावेतौ सुदुर्लभौ ॥ ३३३ ॥ मरनेसे स्वर्ग और जीनेसे उत्तम कीर्ति प्राप्त होती है यह दोनों गुण शूर पुरुषोंके दुर्लभ हैं ॥ ३३३ ॥ ललाटदेशे रुधिरं स्रवत्तु शूरस्य यस्य प्रविशेच्च वक्रे । तत्सोमपानेन समं भवेच्च संग्रामयज्ञे विधिवत्प्रदिष्टम् ॥३३४॥ जिस शूरके माथेसे बहता हुआ रुधिर मुखमें प्रवेश करता है वह विधिपूर्वक संग्रामयज्ञमें प्राप्त हुआ सोमपानकी समान होता है ॥ ३३४ ॥ तथाच- और देखो- होमार्थैर्विधिवत्प्रदानविधिना सद्भिर्वृन्दार्चनैः यज्ञैर्भूरिसुदक्षिणैः सुविहितैः सम्प्राप्यते यत्फलम् ।
भाषाटीकासमेतम् । ( १४१ ) सत्तीर्थाश्रमवासहोमनियमैश्चान्द्रायणाद्यैः कृतैः पुम्भिस्तत्फलमाहवे विनिहतैः सम्प्राप्यते तत्क्षणात् ॥” विधिपूर्वक होमार्थ और दानविधिसे सद्ब्राह्मणोंके अर्चनसे तथा बड़ी- दक्षिणावाले यज्ञोंसे ( जो श्रेष्ठ कहे हैं ) जो फल उनसे प्राप्त होता है तथा तीर्थ, आश्रम, वास, होम, नियम, चान्द्रायण आदि करनेसे पुरुषोंको जो फल प्राप्त होता है वह फल संग्राममें प्राण त्यागनेसे तत्काल मिलता है ॥ ३३५ ॥” तदाकर्ण्य दमनकश्चिन्तयामास । “युद्धाय कृतनिश्चयोऽयं दृश्यते दुरात्मा तद्यदि कदाचित् तीक्ष्णशृङ्गाभ्यां स्वामिनं प्रहरिष्यति तत् महान् अनर्थः सम्पत्स्यते । तदेनं भूयोऽपि स्वबुद्ध्या प्रबोध्य तथा करोमि यथा देशान्तरगमनं करोति” आह च,—“भो मित्र ! सम्यक् अभिहितं भवता, परं किन्तु कः स्वामिभृत्ययोः संग्रामः । उक्तञ्च- यह सुनकर दमनक विचारने लगा, “यह दुरात्मा तो युद्धके लिये निश्चय किये हैं सो यदि कदाचित् यह तीक्ष्ण शृंगोंसे स्वामीको प्रहार करे तो महान् अनर्थ होगा, सो इसको फिरभी अपनी बुद्धिसे समझाकर वैसा करूं जो यह देशान्तरको चला जाय” । बोलाभी-“भो मित्र ! तुमने सत्य कहा परन्तु स्वामी सेवकका क्या संग्राम ? कहाहै- बलवन्तं रिपुं दृष्ट्वा किलात्मानं प्रगोपयेत् । बलवद्भिश्च कर्त्तव्या शरच्चन्द्रप्रकाशता ॥ ३३६ ॥ बलवान् शत्रुको देखकर अवश्यही आत्माकी रक्षाकरे और बलवानोंको शर- च्चन्द्रकी समान अपना प्रकाश करना चाहिये ॥ ३३६ ॥ अन्यच्च- और भी- शत्रोर्विक्रममज्ञात्वा वैरमारभते हि यः । स पराभवमाप्नोति समुद्रट्टिट्टिभाद्यथा ॥ ३३७ ॥” औरभी जो शत्रुके पराक्रमको न जानकर वैर आरंभ करता है वह टिट्टिभसे समुद्रकी समान पराभवको प्राप्त होता है ॥ ३३७ ॥”
( १४२ ) पंचतन्त्रम् ।
( १४२ ) पंचतन्त्रम् । सञ्जीवक आह- "कथमेतत्" सोऽब्रवीत- संजीवक बोला,- "यह कैसे" ? वह बोला- कथा १२. कस्मिंश्चित् समुद्रतीरैकदेशे टिट्टिभदम्पती प्रतिवसतः स्म। ततो गच्छति काले ऋतुसमयमासाद्य टिट्टिभी गर्भमाधत्त । अथ आसन्नप्रसवा सती सा टिट्टिभमूचे- "भोः कान्त ! मम प्रसवसमयो वर्तते तद्विचिन्त्यतां किमपि निरुपद्रवं स्थानं येन तत्राहमण्डकविमोक्षणं करोमि।" टिट्टिभः प्राह- "भद्रे ! रम्योऽयं समुद्रप्रदेशः। तदत्रैव प्रसवः कार्य्यः”। सा आह- “अत्र पूर्णिमादिने समुद्रवेला चरति । सा मत्तगजेन्द्रानपि समाकर्षति तद्दूरमन्यत्र किञ्चित् स्थानमन्विष्यताम्” । तच्छ्रुत्वा विहस्य टिट्टिभ अ ह- "भद्रे ! युक्तमुक्तं भवत्या का मात्रा समुद्रस्य या मम दूषयिष्यति प्रसूतिम् ? किं न श्रुतं भवत्या ? कहीं समुद्रके एक देशमें टटीहरी और उसका स्वामी रहताथा तब समय बीतनेमें ऋतुसमयको प्राप्त होकर टिट्टिभीने गर्भ धारण किया। तब प्रसवके समीप होनेसे सो वह टटीहरी स्वामीसे बोली,-- "भो स्वामिन् ! मेरे प्रसवका समय वर्तमान है सो कोई उपद्रव रहित स्थान खोज किया जाय जिससे मैं वहां अपने अण्डे त्यागन करूं"। टिट्टिभ बोला, - "भद्रे ! यह समुद्रस्थान बहुत सुन्दर है सो यहीं बच्चे उत्पन्न करो" वह बोली,- "पूर्णमासीके दिन यहां समुद्र- वेला प्राप्त होती है वह और तो क्या मतवाले हाथियोंकोभी आकर्षण करतीहै सो कहीं दूर और स्थान खोज किया जाय"। यह सुन हँसकर वह टिट्टिभ बोला,- "तुमने सत्य कहा परन्तु समुद्रकी क्या सामर्थ्य है जो मेरी सन्तानको दूषित करे क्या तुमने न सुनाहै, कि- बद्धाम्बरचरमार्गं व्यपगतधूमं सदा महद्भयदम् । मन्दमतिः कः प्रविशति हुताशनं स्वेच्छया मनुजः ॥३३८॥ आकाशचारियोंके मार्ग रोकनेवाले, धूमरहित महाभयदायक अग्निमें कौन मन्दमति अपनी इच्छासे प्रवेश करता है ॥ ३३८ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १४३ ) मत्तेभकुम्भविदलनकृतश्रमं सुप्तमन्तकप्रतिमम् । यमलोकदर्शनैच्छुः सिंहं बोधयति को नाम ? ॥ ३३९ ॥ मतवाले हाथियोंके गण्डस्थलके विदीर्ण करनेमे श्रम किये सोते कालकी समान सिंहको कौन यमलोक देखनेकी इच्छावाला जगावै ॥ ३३९ ॥ को गत्वा यमसदनं स्वयमन्तकमादिशत्यजातभयः । प्राणानपहर मत्तो यदि शक्तिः काचिदस्ति तव ॥ ३४० ॥ कौन यमलोकको जाकर स्वय भयरहित यमराजसे कहेगा कि, यदि तुझमें कोई शक्ति हो तो मेरे प्राणोको हर ॥ ३४० ॥ प्रालेयलेशमिश्रे मरुति प्राभातिके च वाति जडे । गुणदोषज्ञः पुरुषं जलेन कः शीतमपनयति ॥ ३४१ ॥ शिशिरसे मिली जड भारी प्रभात वायुके चलनेसे गुण दोषको जाननेवाला कौन पुरुष उस शीतको जलसे दूर करसकताहै ॥ ३४१ ॥ तस्मात् विश्रब्धा अत्रैव गर्भं मुञ्च । उक्तञ्च- इस कारण निश्शंक हो यहीं गर्भ त्यागो । कहाहै- यः पराभवसन्त्रस्तः स्वस्थानं सन्त्यजेन्नरः । तेन चेत्पुत्रिणी माता तद्वन्ध्या केन कथ्यते ॥ ३४२ ॥" जो पराभवके डरसे मनुष्य अपना स्थान त्यागताहै यदि माता उसीके होनेसे पुत्रिणीहै तो वंध्या किससे कही जायगी ॥ ३४२ ॥” तच्छ्रुत्वा समुद्रश्चिन्तयामास अहो गर्वः पक्षिकीटस्यास्य । अथवा साधु चेदमुच्यते- यह सुनकर समुद्र विचारने लगा, "अहो इस पक्षि कीट्का यह गर्वहै। अथवा सत्य कहाहै- उत्क्षिप्य टिट्टिभः पादावास्ते अंगभयाद्दिवः । स्वचित्तकल्पितो गर्वः कस्य नात्रापि विद्यते ॥ ३४३ ॥ कीट आकाशके गिरनेके भयसे आकाशकी ओरको चरण करके सोताहैं वहा अपने चित्तसे कल्पित गर्व किसको नहीं है ॥ ३४३ ॥ तन्मया अस्य प्रमाणं कुतूहलादपि द्रष्टव्यम् । किं मम एषोऽण्डापहारे कृते करिष्यति " इति चिन्तयित्वा
( १४४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १४४ ) पञ्चतन्त्रम् । स्थितः। अथ प्रसवानन्तरं प्राणयात्रार्थं गतायाः टिट्टिभ्या समुद्रो वेलाव्याजेन अण्डानि अपजहार । अथ आयाता सा टिट्टिभी प्रसवस्थानं शून्यमवलोक्य प्रलपन्ती टिट्टिभमूचे- “भो मूर्ख!कथितमासीत् मया ते यत् समुद्रवेलया अण्डानां विनाशो भविष्यति,तद्दूरतरं व्रजावः परं मूढतया अहङ्कार- माश्रित्य मम वचनं न करोषि । अथवा साधु चेदमुच्यते- सो मैं कुतूहलसे इसका प्रमाण देखूंगा ही । कि, मेरे अण्डहरण करनेपर यह क्या करेगा । ऐसा चिन्ताकर स्थित हुआ । अण्डेरखनेके उपरान्त प्राणयात्राके लिये गई हुई टिट्टिभीके अण्डोको समुद्रने वेलाके बहानेसे हरण कर लिया ।- तब आई हुई वह टिट्टिभी अपने प्रसवस्थानको शून्यदेखकर विलापकर टिट्टि- भसे बोली- “भो मूर्ख ! मैंने तुझसे कहाथा कि समुद्रवेलासे अण्डोका नाश होगा सो बहुत दूर चलकर रक्खें तैने मूढतासे अहंकारके आश्रितहो मेरे वचन न किये। अथवा सत्य कहाहै- सुहृदां हितकामानां न करोतीह यो वचः । स कूर्म इव दुर्बुद्धिः काष्ठाद्भ्रष्टो विनश्यति ॥ ३४४ ॥” हितकारी सुहृदोके जो वचन नहीं करताहै वह दुर्बुद्धि लकडीसे गिरे कछु- एकी समान नष्ट होताहै ॥ ३४४ ॥” टिट्टिभ आह-"कथमेतत् ? " सा अब्रवीत्- टिट्टिभने कहा- “यह कैसे ?" वह बोली- कथा १३. अस्ति कस्मिंश्चित् जलाशये कम्बुग्रीवो नाम कच्छपः। तस्य च संकटविकटनाम्नी मित्रे हंसजातीये परमस्नेहकोटिमाथिते नित्यमेव सरस्तीरमासाद्य तेन सह अनेकदेवर्षिमहर्षीणां कथाः कृत्वा अस्तमयवेलायां स्वनीडसंश्रयं कुरुतः । अथ गच्छता कालेन अवृष्टिवशात् सरः शनैः शनैः शोषमगमत् । ततस्तद्दुःखदुःखितौ तौ ऊचतुः-“भो मित्र!जम्बालशेषमेत- त्सरः सञ्जातं तत्कथं भवान्भविष्यतीति व्याकुलत्वं नो हृदि
रहतेथे । उसके साथ अनेक देवर्षि महर्षियोंकी कथाकर सूर्यास्तके समय अपने
भाषाटीकासमेतम् । ( १४५ )
वर्त्तते''। तच्छ्रुत्वा कम्बुग्रीव आह--"भोः! साम्प्रतं न अस्ति अस्माकं जीवितव्यं जलाभावात्। तथापि उपायश्चिन्त्यता- मिति। उक्तञ्च- किसी सरोवरमे कम्बुग्रीव नाम कच्छप रहता था उसके संकट विकटनाम- वाले हंसजातिके दो मित्रपरम स्नेहकी कोटिको प्राप्तहुए नित्यही सरोवरके समीप रहतेथे । उसके साथ अनेक देवर्षि महर्षियोंकी कथाकर सूर्यास्तके समय अपने घोंसलेका आश्रय करते । फिर कुछ दिनोंके उपरान्त अवर्षणसे सरोवर शनैः २ सूखने लगा, तब उसके दुःखसे दुखी हुए वोह बोले,-"हे मित्र ! यह सरोवर तो कर्दम ( कीच ) मात्र अवशेष है सो आप कैसे रहेंगे यह व्याकुलता हमारे हृदयमें है" सो सुनकर कम्बुग्रीव बोला,-"भो ! इस समय जलके अभावसे हमारा जीवन नहीं होगा तो भी उपाय विचारो । कहाहै- त्याज्यं न धैर्य्यं विधुरेऽपि काले धैर्यात्कदाचिद्गतिमाप्नुयात्सः। यथा समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति तर्तुमेव ॥ ३४५ ॥ प्रारब्धके विगड जानेमेंभी धैर्य त्यागन करना न चाहिये कदाचित् धैर्यसे उसकी गति प्राप्त होजाय अर्थात् उपाय प्राप्त होजाय, जैसे सागरमें पोत ( जहाज ) भंग होनेपर पोतवणिक् धैर्यसे तरनेहीकी इच्छा करताहै ॥ ३४५ ॥ अपरञ्च- औरभी- मित्रार्थे बान्धवार्थे च बुद्धिमान्यतते सदा । जातास्वापत्सु यत्नेन जगादेदं वचो मनुः ॥ ३४६ ॥ बुद्धिमान् सदा मित्र और बाधवोंके निमित्त यत्न करे चाहे कैसीभी विपत्तिहो मनुने यह वचन कहाहै ॥ ३४६ ॥ तद् आनीयतां काचित् दृढरज्जुर्लघु काष्ठं वा, अन्विष्यतां च प्रभूतजलसनाथं सरो येन मया मध्यप्रदेशे दन्तैर्गृहीते सति युवां कोटिभागयोः तत्काष्ठं मया सहितं संगृह्य १०
( १४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तत्सरो नयथः”। तौ ऊचतुः,-“भो मित्र ! एवं करिष्यावः परं भवता मौनव्रतेन स्थातव्यं, नो चेत् तव काष्ठात् पातो भविष्यति”। तथा अनुष्ठिते, गच्छता कम्बुग्रीवेण- अधोभागव्यवस्थितं कञ्चित् पुरमालोकितं तत्र ये पौरास्ते तथा नीयमानं विलोक्य सविस्मयामदमूचुः,-“अहो ! चक्राकारं किमपि पक्षिभ्यां नीयते, पश्यत पश्यत” अथ तेषां कोलाहलमाकर्ण्य कम्बुग्रीव आह-“भोः ! किमेष कोलाहलः” इति वक्तुमना अर्द्धोक्ते पतितः पौरैः खण्डशः कृतश्च । अतोऽहं ब्रवीमि-“सुहृदां हितकामानाम्” इति । सो कोई दृढरज्जु वा लघु काष्ठ लाना चाहिये और बहुत जलसे युक्त कोई सरोवर खोज करो जिससे मैं उसका मध्यभाग अपने दांतोंसे पकडूं और तुम उसके दोनों किनारे पकड मुझ सहित उस सरोवरमें लेजाभो । वह बोले, “मित्र ! ऐसाही करेंगे परन्तु तुम मौन रहना, नहीं तो आपका काष्ठसे पतन हो जायगा”। तबते तैसा करनेपर जाते हुए कम्बुग्रीवने नीचे कोई पुर देखा । वहांके पुरवासी उसको वैसा लेजाते देखकर विस्मयपूर्वक बोले-“अहो ! यह क्या चक्राकार वस्तु पक्षि लिये जाते हैं देखो २”। तब उनका कोलाहल सुनकर कम्बुग्रीव बोला,-“भो ! कैसा यह कोलाहलहै” ऐसा कहनेकी इच्छासे आधा कहता हुआ गिरा पुरवासियोंने खण्ड २ करडाला । इससे मैं कहताहूं “हितकारी सुहृदोंका इत्यादि” । तथाच- तैसेही- अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा । द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ३४७ ॥” अनागतविधाता ( अनुपस्थितकर्मको विचारकर करनेवाला ) प्रत्युत्पन्नमति ( उपस्थित विपत्के प्रतिकारमें समर्थ ) यह दोनों सुखसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं यद्भविष्य ( जो भागमें है सो होगा ) नाश होताहै ॥ ३४७ ॥” टिट्टिभ आह-“कथमेतत् ?” सा अब्रवीत्- टिट्टिभ बोला-“यह कैसा ?” वह बोली-
कथा १४.
भाषाटीकासमेतम् । ( १४७ ) कथा १४. कस्मिंश्चित् जलाशये अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमतिः यद्भविष्यश्चेति त्रयो मत्स्याः सन्ति । अथ कदाचित् तं जला- शयं दृष्ट्वा गच्छद्भिर्मत्स्यजीविभिरुक्तं “यदहो ! बहुमत्स्योऽयं ह्रदः कदाचिदपि नास्माभिरन्वेषितः । तदद्य तावदाहार- वृत्तिः सञ्जाता, सन्ध्यासमयश्च संवृत्तः ततः प्रभातेऽत्र आग- न्तव्यमिति निश्चयः” । अतस्तेषां तत्कुलिशपातोपमं वचः समाकर्ण्य अनागतविधाता सर्वान्मत्स्यान् आहूय इदमुचे, - “अहो ! श्रुतं भवद्भिः यन्मत्स्यजीविभिरभिहितम् ? तत् रात्रावपि गम्यतां कथञ्चिन्निकटं सरः । उक्तञ्च- किसी एक सरोवरमे अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य तीन मत्स्य रहतेथे, तब उस जलाशयको देखकर जाते हुए मत्स्यजीवियोंने कहा-“अहो ! यह ह्रद बहुतसी मछलियोंवाला है, हमने कभी इसकी खोज न की । सो आज तो आहारवृत्ति हो चुकी और सन्ध्या भी होगई । सो प्रातः काल यहा आओ यह निश्चय है” । तब वज्रपातके समान उनके वचनको श्रवणकर अनागत- विधाता सब मछलियोंको बुलाकर यह बोला,-“अहो सुना आपने जो धीमरों ने कहा ? सो रातमेही किसी निकट के सरोवरमें चलो । कहा है- अशक्तेर्बलिनः शत्रोः कर्त्तव्यं प्रपलायनम् । संश्रितव्योऽथवा दुर्गो नान्या तेषां गतिर्भवेत् ॥ ३४८ ॥ असमर्थोंको बलवान् शत्रुओंके निकटसे पलायन करना चाहिये अथवा दुर्गमें स्थिति करे उनको दूसरी गति नहीं है ॥ ३४८ ॥ तन्नूनं प्रभातसमये मत्स्यजीविनोऽत्र समागम्य मत्स्यसं- क्षयं करिष्यन्ति एतन्मम मनसि वर्त्तते । तन्न युक्तं साम्प्रतं क्षणमपि अत्रावस्थातुम् । उक्तञ्च- सो अवश्यही प्रभातसमय मत्स्यजीवी यहा आकर मत्स्योंका नाश करेंगे यह मेरे मनमें वर्तता है सो इस समय क्षणमात्र भी यहा रहना उचित नहीं है । कहा है-
( १४८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १४८ ) पञ्चतन्त्रम् । विद्यमाना गतिर्येषामन्यत्रापि सुखावहा । ते न पश्यन्ति विद्वांसो देहभङ्गं कुलक्षयम् ॥ ३४९ ॥” जिनको अन्य स्थानमें सुखदायक गति विद्यमान है वे विद्वान् देहभंग और कुलक्षयको नहीं देखते हैं ॥ ३४९ ॥” तदाकर्ण्य प्रत्युत्पन्नमतिः प्राह-“अहो ! सत्यमभिहितं भवता,ममापि अभीष्टमेतत्, तदन्यत्र गम्यतामिति । उक्तञ्च- यह सुन प्रत्युत्पन्नमति बोला-“अहो ! आपने सत्य कहा, यह मुझकोभी अभीष्टहै सो अन्य स्थानमें जाना चाहिये । कहाहै- : परदेशभयाद्भीता बहुमाया नपुंसकाः । स्वदेशे निधनं यान्ति काकाः कापुरुषा मृगाः ॥ ३५० ॥ परदेशके भयसे भीत बहुत ममतावाले नपुंसक काक कापुरुष और मृग वहीं मृतक होजातेहैं ॥ ३५० ॥ यस्यास्ति सर्वत्र गतिः स कस्मात् स्वदेशरागेण हि याति नाशम् । तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणाः क्षारं जलं कापुरुषाः पिबन्ति ॥ ३५१ ॥ ” जिसको सर्वत्रगति विद्यमानहै वह अपने देशके रागसे क्यों नाश होताहै पिताका कुआँहै ऐसा विचार कर खारे पानीको पुरुष पीते हैं ॥ ३५१ ॥” अथ तत्समाकर्ण्य प्रोच्चैर्विहस्य यद्भविष्यः प्रोवाच,- “अहो ! न भवद्भ्यां मन्त्रितं सम्यगेतदिति । यतः किं वाङ्- मात्रेणापि तेषां पितृपैतामहिकं एतत्सरः त्यक्तुं युज्यते ?। यदि आयुःक्षयोऽस्ति तदन्यत्र गतानामपि मृत्युर्भविष्यति एव । उक्तञ्च- यह वचन सुन ऊंचे स्वरसे हँसकर यद्भविष्य बोला,-“अहो ! आपने अच्छा मंत्र नहीं किया सो क्या वाणीमात्रसेही उन पिता पितामहादिका यह सरोवर त्यागन करदें ? यदि आयुका क्षयहै तो अन्य स्थानमें जाकर भी मृत्यु होगी । कहाहै-
भाषाटीकासमेतम् । ( १४९ ) अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विनश्यति ॥ ३५२ ॥ अरक्षित पुरुष दैवसे रक्षित हुआ स्थित रहताहै दैवसे हत होनेसे सुर- क्षितभी नष्ट होता है । वनमें त्यागन किया अनाथभी जीताहै और यत्नकरने पर घरमें भी नहीं जीता है ॥ ३५२ ॥ तदहं न यास्यामि भवद्भ्यां च यत्प्रतिभाति तत्कर्त्तव्यम्" । अथ तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमतिश्च निष्क्रान्तौ सह परिजनेन । अथ प्रभाते तैर्मत्स्यजीविभि- र्जलैस्तज्जलाशयमालोढ्य यद्भविष्येण सह तत् सरो निर्म- त्स्यतां नीतम् । अतोऽहं ब्रवीमि "अनागतविधाता च" इति तत् ज्ञात्वा टिट्टिभ आह-"भद्रे ? किं मां यद्भविष्यसदृशं सम्भावयसि ? तत्पश्य मे बुद्धिप्रभावं यावदेनं दुष्टसमुद्रं स्वचञ्च्वा शोषयामि" । टिट्टिभी आह- "अहो ! कस्ते समुद्रेण सह विग्रहः ? तन्न युक्तमस्योपरि कोपं कर्तुम् । उक्तञ्च- सो मैं तो और स्थानमें न जाऊंगा जो आपको अच्छा लगे सो करो" । तब उसके इस निश्चयको जानकर अनागतविधाता और प्रत्युत्पन्नमति परि- जन (कुटुम्ब) सहित वहांसे चलेगये । प्रातःकाल धीमरोंने जालसे उस सरो- वरको आलोड़ित कर यद्भविष्यके संग वह सरोवर मत्स्यरहित करदिया । इससे मैं कहता हूं "अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमति"। यह सुन टिट्टिभ बोला, - "भद्रे! क्या तू मुझे यद्भविष्यकी समान जानती है ? सो मेरी बुद्धिके प्रभावको देख कि, इस दुष्ट समुद्रको अपनी चोंचसे शोखे डालता हूं" । टिट्टिभी बोली,- "अहो ! समुद्रसे तुम्हारी कैसी लड़ाई ? सो इसके ऊपर क्रोध करना उचित नहीं । कहाहै- पुंसामसमर्थानामुपद्रवायात्मनो भवेत्कोपः । पिठरं ज्वलदतिमात्रं निजपार्श्वानिव दह्तितराम् ॥३५३॥
( १५० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( १५० ) पञ्चतन्त्रम् । असमर्थ पुरुषोंका क्रोध अपने नाशके ही निमित्त होताहै अत्यन्त जलती हुई कसेरी अपने निकटकोही जलातीहै ॥ ३५३ ॥ तथाच- और देखो- अविदित्वात्मनः शक्तिं परस्य च समुत्सुकः । गच्छन्नभिमुखो नाशं याति वह्नौ पतंगवत् ॥ ३५४ ॥” जो उत्कंठित हो अपनी शक्ति और परकी शक्ति विनाजाने सम्मुख जाताहै वह अग्निमें पतंगकी समान नष्ट होजाताहै ॥ ३५४ ॥” टिट्टिभ आह-“प्रिये ! मामैवं वद् येषामुत्साहशक्तिः भवति ते स्वल्पा अपि गुरून् विक्रमन्ते । उक्तञ्च- टिट्टिभ बोला, - “प्रिये ! ऐसा मत कहो जिनको उत्साहशक्ति होतीहै वे स्वल्पभी बडे बडोंपर आक्रमण करते हैं। कहाहै- विशेषात्परिपूर्णस्य याति शत्रोरमर्षणः । आभिमुख्यं शशाङ्कस्य यथाद्यापि विधुन्तुदः ॥ ३५५ ॥ क्रोधी शत्रु विशेषकर परिपूर्णकेही सम्मुख जातेहैं जैसे राहु अर्थातक चन्द्रमाके सम्मुख ॥ ३५५ ॥ तथाच- औरभी देखो- प्रमाणादाधिकस्यापि गण्डश्याममदच्युतेः । पदं मूर्ध्नि समाधत्ते केसरी मत्तदन्तिनः ॥ ३५६ ॥ प्रमाणसेभी अधिक, गण्डस्थलमें श्याम, मदत्यागनेवाले मत्त हाथीके सिरपर सिंह चरण रखता है ॥ ३५६ ॥ तथाच- तैसेही- बालस्यापि रवेः पादाः पतन्त्युपरि भूभृताम् । तेजसा सहजातानां वयः कुत्रोपयुज्यते ॥ ३५७ ॥ बालक सूर्यकी किरणों पर्व्वतोंके ऊपर गिरती हैं तेजके साथ उत्पन्न हुओंकी अवस्था नहीं देखीजातीहै ॥ ३५७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १५१) हस्ती स्थूलतरः स चाङ्कुशवशः किं हस्तिमात्रोऽङ्कुशः दीपे प्रज्वलिते प्रणश्यति तमः किं दीपमानं तमः । वज्रेणापि शताः पतन्ति गिरयः किं वज्रमात्रो गिरि- स्तेजो यस्य विराजते स बलवान्स्थूलेषु कः प्रत्ययः ३५८ हाथी महास्थूलहै वह अंकुशके वशमेंहै क्या अंकुश हाथीकी समान है ? दीप- कके ज्वलित होनेमें अंधकार नाश होताहै क्या दीपक अंधकारकी समान है ? वज्रसे सैकड़ों पर्वत गिरजाते हैं क्या वज्र पर्वतकी समान है ? तेज जिसमे है वही बलवान् है मोटे शरीरवालोंमें क्या विश्वास है ॥ ३५८ ॥ तदनया चञ्च्वास्य सकलं तोयं शुष्कस्थलतां नयामि” । टिट्टिभी आह-“भोः कान्त ! यत्र जाह्नवी नवनदीशतानि गृहीत्वा नित्यमेव प्रविशति तथा सिन्धुश्च, तत्कथं त्वमष्टा- दशनदीशतीः पूर्य्यमाणं तं विप्रुषवाहिन्या चञ्च्वा शोषयि- ष्यसि ? । तत् किमश्रद्धेयेन उक्तेन” । टिट्टिभ आह-“प्रिये ! सो इस चोचसे इसका सम्पूर्ण जल सुखा डालूंगा” टिट्टिभी बोली,–“भो स्वामिन् ! जहा गगा नदी नौसौ नदियोंको लेकर नित्यही प्रवेश करती है तथा सिन्धु नदभी, सो किस प्रकार तू अठारहसौ नदियोंसे पूर्यमाण उस सागरको जलकण वहन करनेवाली चोचसे सुखासकेगा ? सो अश्रद्धेय वचनोंसे क्या लाभ है” टिट्टिभ बोला,–“प्रिये ! अनिर्वेदः श्रियो मूलं चञ्चुर्मे लोहसन्निभा । अहोरात्राणि दीर्घाणि समुद्रः किं न शुष्यति ॥ ३५० ॥ निर्वेदका नहोना (उद्योग) लक्ष्मीका मूल है मेरी चोच लोहनिर्मितसी है दिन रात दीर्घहै समुद्र क्यों न सूखेगा ॥ ३५९ ॥ दुराधिगमः परभागो यावत्पुरुषेण पौरुषं न कृतम् । जयति तुलामधिरूढो भास्वानपि जलदपटलानि॥३६०॥ परायाभाग कठिनतासे मिलताहै, परन्तु तभीतक, जबतक कि,-पुरुष पुरुषार्थ नहीं करताहै तुला (सक्रमण)में प्राप्त हुआ सूर्यभी मेघसमुहको जीतताहै ॥ ३६०॥” टिट्टिभ्याह-“यदि त्वयावश्यं समुद्रेण सह वैरानुष्ठानं कार्यं तदन्यानपि विहंगानाहूय सुहृज्जनसहित एवं समाचर । उक्तञ्च-