पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
भाषाटीकासमेतम् । ( ३३९) पक्षिणो गतासून् कृत्वा शीघ्रमानयत” । राजादेशानन्तर- मेव प्रचेलुस्ते । अथ लगुडहस्तान् राजपुरुषान् दृष्ट्वा तत्र एकेन पक्षिणा वृद्धेन उक्तं, –“भोः स्वजनाः ! न शोभनमाप- तितम् । ततः सर्वैः एकमतीभूय शघ्रिमुत्पतितव्यम्” । तैश्च तथानुष्ठितम् । अतोऽहं ब्रवीमि- किसी स्थानमे एक चित्ररथ नाम राजा था। उसके योधाओंसे रक्षित पद्मसरनाम एक सरोवर था वहा बहुतसे सुवर्णमय हंसथे । छठे २ महीनेसे एक एक पख त्यागते रहे तब उस सरोवरमें सुवर्णमय बडा पक्षी आया । उन्होंने कहा,-“हमारे बीचमे तुमको रहना न चाहिये । जिस कारणसे कि हमने छःमहीनेमे एक २ पखदान करके यह सरोवर प्राप्त किया है। ऐसा बहुत कहनेसे परस्पर उनका द्वेष उत्पन्न हुआ । वह राजाकी शरणमे जाकर कहने लगा,–“देव यह पक्षी इस प्रकारसे कहते हैं कि,–“हमारा राजा क्या करेगा ? । किसीको हम स्थान न देंगे” मैने कहा-“तुमने अच्छा नही कहा । मै जाकर राजासे कहूगा” । इस कार्यमें स्वामीही प्रमाणहैं” । तब राजा भृत्योंसे बोला-“भो भो ! जाओ सब पक्षियोंको प्राणरहित करके शीघ्र लाओ ” । वे राजाकी आज्ञा पातेही चले । तब लगुड हाथमें लिये राजपुरुषोको देख एक वृद्ध पक्षीने कहा,-“भो सुजनो भलीबात न हुई सो सब एकमत होकर शीघ्र उडो” और उन्होंने वैसाही अनु- ष्ठान किया इससे मैं कहताहूं- भूतान्यो नानुगृह्णाति ह्यात्मनः शरणागतान् । भूतार्थास्तस्य नश्यन्ति हंसाः पद्मवने यथा ॥ १३७ ॥” कि अपनी शरणमे आये हुए भृत्योंपर जो अनुग्रह नहीं करताहै उसके भूत अर्थ नष्ट हो जातेहैं जैसे पद्मवनमें हस ॥ १३७ ॥” इत्युक्त्वा पुनरपि ब्राह्मणः प्रत्यूषे क्षीरं गृहीत्वा, तत्र गत्वा तारस्वरेण सर्पमस्तौत् । तथा सर्पश्विरं वल्मीकद्वारान्त- र्लीन एव ब्राह्मणं प्रत्युवाच त्वं लोभादत्र आगतः पुत्रशोकमपि विहाय । अतः परं तव मम च प्रीतिर्नोचिता । तव पुत्रेण यौवनोन्मदेन अहं ताडितः । मया स दष्टः । कथं मया लगु
( ३४० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३४० ) पञ्चतन्त्रम् । डप्रहारो विस्मर्त्तव्यः, ? त्वया पुत्रशोकदुःखं कथं विस्मर्त्त- व्यम् ?” । इत्युक्त्वा बहुमूल्यं हीरकमणिं तस्मै दत्त्वा “अतः परं पुनस्त्वया न आगन्तव्यम्” इति पुनरुक्त्वा विवरान्तर्गतः। ब्राह्मणश्च मणिं गृहीत्वा पुत्रबुद्धिं निन्दन् स्वगृहमागतः । अतोऽहं ब्रवीमि- यह कह फिरभी ब्राह्मण प्रातःकाल दुध ग्रहण कर वहां जाकर ऊंचे स्वरसे सर्पकी स्तुति करने लगा । तब सर्प अधिक वल्मीकके भीतर लीन हुआही ब्राह्म- णसे बोला-“तू लोभसे यहां आया है पुत्रशोक भी छोड दिया ! अब तेरी और मेरी प्रीति उचित नही । यौवनके मदसे तेरे पुत्रने मुझे ताडन किया है। मैने उसे काट लिया। किस प्रकार मै लगुडप्रहार भूल जाऊंगा ? और तू पुत्रशोकका दुःख किस प्रकार भूल सकता है ?” । ऐसा कह एक बहुत मोलका हीरा उसे देकर “बस अब तू यहां न आना” यह फिर कह विवरके भीतर गया । ब्राह्मणभी मणिको ले पुत्रकी बुद्धिकी निन्दा करता अपने घर आया । इससे मैं कहता हूं- “चितिकां दीपितां पश्य फटां भग्नां ममैव च । भिन्नश्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्द्धते ॥ १३८ ॥” “प्रज्वलित चिता और फटा हुआ मेरा फन देखकर जानले कि भिन्न होकर जुडी प्रीति स्नेहसे नहीं बढती ॥ १३८ ॥” तदस्मिन् हते यत्नादेव राज्यमकण्टकं भवतो भवति” । तस्य एतद्वचनं श्रुत्वा क्रूराक्षं पप्रच्छ,-“भद्र ! त्वं तु किं मन्यसे ?” सोऽब्रवीत,-“देव ! निर्दयमेतत्, यदनेन अभि- हितम् । यत् कारणं शरणागतो न वध्यते । सुष्ठु खलु इदमाख्यातम्- सो इसके मारनेसे यत्नपूर्वक तुम्हारा अकंटक राज्यहो” उसके यह बचन सुन क्रूराक्षसे पूछा-“भद्र ! तुम इसमें क्या मानते ? ” । वह बोला-“देव यह निर्दयता हे जो इस मन्त्रीने कहा है । कारण कि शरणमें आया हुआ नहीं मारा जाता । यह सत्य कहा गया है कि-
कथा ७.
भाषाटीकासमेतम् । ( ३४१ ) श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः । पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ १३९ ॥" सुना है कि, कबूतरने शरणमें आये हुए शत्रुको यथायोग्य पूजन कर अपने मांससे निमंत्रित किया ॥ १३९ ॥" अरिमर्दनोऽब्रवीत्-“कथमेतत् ?” । क्रूराक्षः कथयति- अरिमर्दन बोला-“यह कैसे ?” क्रूराक्ष कहने लगा- कथा ७. कश्चित्क्षुद्रसमाचारः प्राणिनां कालसन्निभः । विचचार महारण्ये घोरः शकुनिलुब्धकः ॥ १४० ॥ कोई क्षुद्र आचारवाला प्राणियोंको कालकी समान घोर पक्षियोका लुब्धक वनमें विचरता था ॥ १४० ॥ नैव कश्चित्सुहृत्तस्य न सम्बन्धी न बान्धवः । स तैः सर्वैः परित्यक्तस्तेन रौद्रेण कर्मणा ॥ १४१ ॥ न कोई उसका सुहृत्, न सम्बन्धी, न बांधव था, उसके क्रूर कर्मसे सबने उसे त्याग दिया ॥ १४१ ॥ अथवा- अथवा- ये नृशंसा दुरात्मानः प्राणिनां प्राणनाशकाः । उद्वेजनीया भूतानां व्याला इव भवन्ति ते ॥ १४२ ॥ जो क्रूर दुरात्मा प्राणियोंके प्राण नाशक हैं वे भूतोंके उद्वेगकारक कालकी समान होते हैं ॥ १४२ ॥ स पञ्जरकमादाय पाशं च लगुडं तथा । नित्यमेव वनं याति सर्वप्राणिविहिंसकः ॥ १४३ ॥ वह सब प्राणियोंकी हिंसा करनेवाला पिंजरा पाश और लगुड लेकर नित्यही वनको जाता ॥ १४३ ॥ अन्येद्युर्भ्रमतस्तस्य वने कापि कपोतिका । जाता हस्तगता तां स प्राक्षिपत्पञ्जरान्तरे ॥ १४४ ॥
( ३४२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३४२ ) पञ्चतन्त्रम् । एक दिन उसके वनमें घूमते हुए कोई कबूतरी हाथ आई उसने उसे पिंजरेमें डाल लिया ॥ १४४ ॥ अथ कृष्णा दिशः सर्वा वनस्थस्याभवन्धनैः । वातवृष्टिश्च महती क्षयकाल इवाभवत् ॥ १४५ ॥ तब उस वनकी सब दिशा मेघोंसे श्याम होगई क्षय कालकी समान बडी पवन चली और वर्षा हुई ॥ १४५ ॥ ततः सन्त्रस्तहृदयः कम्पमानो मुहुर्मुहुः । अन्वेषन्परित्राणमाससाद वनस्पतिम् ॥ १४६ ॥ तब संत्रस्त हृदय होकर वारम्वार कम्पित हुआ वह परित्राण ( रक्षा ) खोजता हुआ वृक्षके नीचे प्राप्त हुआ ॥ १४६ ॥ मुहूर्त्तं भ्रश्यते यावद्वियद्विमलतारकम् । प्राप्य वृक्षं वदत्येव योऽत्र तिष्ठति कश्चन ॥ १४७ ॥ जब मुहूर्त्त मात्रमें आकाश निर्मल तारेवाला हुआ तब वृक्षको प्राप्त होकर बोला,—“जो कोई यहां स्थितहो ॥ १४७ ॥ तस्याहं शरणं प्राप्तः स परित्रातु मामिति । शीतेन भिद्यमानञ्च क्षुधया गतचेतसम् ॥ १४८ ॥ उसीकी मैं शरणमे प्राप्त हूं मेरी वह रक्षा करे मैं शीतसे भेदित और भूखसे व्याकुल हूं ॥ १४८ ॥ अथ तस्य तरोः स्कन्धे कपोतः सुचिरोषितः । भार्याविरहितस्तिष्ठन्विललाप सुदुःखितः ॥ १४९ ॥ उसी वृक्षकी शाखामें कबूतर बहुत कालसे रहताथा वह उस समय स्त्रीके बिना विलाप कर रहा दुःखी था ॥ १४९ ॥ वातवर्षो महानासीन्न चागच्छति मे प्रिया । तया विरहितं ह्येतच्छून्यमद्य गृहं मम ॥ १५० ॥ बडी वात और वर्षा हुई है अभीतक मेरी प्यारी नहीं आई उसके विना आज यह मेरा घर सूना है ॥ १५० ॥ पतिव्रता पतिप्राणा पत्युः प्रियहिते रता । यस्य स्यादीदृशी भार्या धन्यः स पुरुषो भुवि ॥१५१॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ३४३ ) पतिव्रता पतिकी प्राण पतिके प्रिय और हितमे तत्पर जिसके ऐसी भार्या है वह पुरुष पृथ्वीमें धन्य है ॥ १९१ ॥ न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते । गृहं हि गृहिणीहीनमरण्यसदृशं मतम् ॥ १९२ ॥ घरका नाम घर नहीं किन्तु स्त्रीका नाम गृह है, गृहिणीके विना घर वनकी समान है ॥ १९२ ॥ पञ्जरस्था ततः श्रुत्वा भर्तुर्दुःखान्वितं वचः । कपोतिका सुसन्तुष्टा वाक्यञ्चेदमथाह सा ॥ १९३ ॥ तब पींजरेमें स्थित हुई कबूतरी उसके दुःखभरे वचन सुनकर इस प्रकार सन्तुष्ट होकर कहने लगी ॥ १९३ ॥ न सा स्त्रीत्यभिमन्तव्या यस्यां भर्त्ता न तुष्यति । तुष्टे भर्त्तरि नारीणां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ १९४ ॥ उसमें स्त्रीपन मत मानो जिससे कि स्वामी प्रसन्न नहीं होता नारियोंके पति प्रसन्न होनेमें सब देवता उसपर प्रसन्न होजाते हैं ॥ १९४ ॥ दावाग्निना विदग्धेव सपुष्पस्तवका लता । भस्मीभवतु सा नारी यस्यां भर्त्ता न तुष्यति ॥ १९५ ॥ दावाग्निसे दग्ध हुई फल गुच्छेवाली लताकी समान वह स्त्री भस्म होजातीहै जिसपर स्वामी प्रसन्न नहीं होता ॥ १९५ ॥ मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः । अमितस्य हि दातारं भर्त्तारं का न पूजयेत् ॥ १९६ ॥ पिता माता पुत्र परिमित सुख देते हैं, इससे अमित दान देनेवाले भर्त्ताका पूजन कौन न करे ॥ १९६ ॥ पुनश्च अब्रवीत्- फिरभी बोली- शृणुष्वावहितः कान्त यत्ते वक्ष्याम्यहं हितम् । प्राणैरपि त्वया नित्यं संरक्ष्यः शरणागतः ॥ १९७ ॥ हे स्वामी ! सावधान होकर सुनो जो मैं तुमको हितकर वचन कहतीहूं शरणमें आया पुरुष प्राणोंसे अधिक रक्षा करना चाहिये ॥ १९७ ॥
( ३४४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३४४ ) पञ्चतन्त्रम् । एष शाकुनिकः शेते तवावासं समाश्रितः । शीतार्त्तश्च क्षुधार्त्तश्च पूजामस्मै समाचर ॥ १६८ ॥ यह पक्षीका पकड़नेवाला तुम्हारे स्थानमें प्राप्त हुआ सोता है और भूखसे व्याकुल है तू इसका सत्कार कर ॥ १६८ ॥ श्रूयते च- सुना है कि- यः सायमतिथिं प्राप्तं यथाशक्ति न पूजयेत् । तस्यासौ दुष्कृतं दत्त्वा सुकृतं चापकर्षति ॥ १६९ ॥ संध्याके समय प्राप्त हुए अतिथिको जो यथाशक्ति पूजन नहीं करता है उसको यह अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है ॥ १६९ ॥ मा चास्मै त्वं कृथा द्वेषं बद्धानेनेति मत्प्रिया । स्वकृतैरेव बद्धाहं प्राक्तनैः कर्मबन्धनैः ॥ १७० ॥ इसने मेरी प्रिया बांधी है इस कारण इससे द्वेष मत करो मैं अपने किये पूर्व जन्मके कर्मानुसारही बन्धी हूं ॥ १७० ॥ दारिद्र्यरोगदुःखानि बन्धनव्यसनानि च । आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ॥ १७१ ॥ दरिद्र, रोग, दुःख, बन्धन, व्यसन यह आत्मापराधवृक्षके फल देह धारियोंको होते हैं ॥ १७१ ॥ तस्मात्त्वं द्वेषमुत्सृज्य मद्बन्धनसमुद्भवम् । धर्मे मनः समाधाय पूज्यैनं यथाविधि ॥ १७२ ॥ इस कारण तू मेरे बंधनसे उत्पन्न हुए द्वेषको त्यागन कर धर्ममें मनको लगाय यथाविधिसे इसको पूजनकर ॥ १७२ ॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा धर्मयुक्तिसमन्वितम् । उपगम्य ततोऽधृष्टः कपोतः प्राह लुब्धकम् ॥ १७३ ॥ उसके धर्म और युक्तिके वचन सुनकर लुब्धकके पास जाय नम्रतासे कपोत बोला ॥ १७३ ॥ सुस्वागतं भद्र तेऽस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते । सन्तापश्च न कर्त्तव्यः स्वगृहे वर्त्तते भवान् ॥ १७४ ॥
हे भद्र! आपका शुभागमनहो कहो मै तुम्हारा क्या प्रिय करू दुख मत मानना
[Header] भाषाटीकासमेतम् । ( ३४५ )
हे भद्र! आपका शुभागमनहो कहो मै तुम्हारा क्या प्रिय करू दुख मत मानना तुम अपने घरमेंही प्राप्त हो ॥ १६४ ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच विहंगमम् । कपोत खलु शीतं मे हिमत्राणं विधीयताम् ॥ १६५ ॥ उसके यह वचन सुन ( वह व्याधा ) पक्षीसे बोला हे कबूतर, मुझे जाडा बहुत लगता है जाडेसे बचाओ ॥ १६५ ॥ स गत्वाङ्गारकं नीत्वा पातयामास पावकम् । ततः शुष्केषु पर्णेषु तमाशु समदीपयत् ॥ १६६ ॥ तब वह जाकर ( चोंचमें ) अगारेकी लकडी लाकर अग्निको गिराता हुआ और फिर सूखे पत्तोंमे उसको जलाता हुआ ॥ १६६ ॥ सुसन्दीप्तं ततः कृत्वा तमाह शरणागतम् । सन्तापयस्व विश्रब्धं स्वगात्राण्यत्र निर्भयः । न चास्ति विभवः कश्चिन्नाशये येन ते क्षुधम् ॥ १६७ ॥ अग्निको दीप्तकर उस शरणमे आये हुएसे बोला अब निर्भय होकर तुम अपने गात्रको तपाओ और कुछ वैभव तो है नहीं जिससे तुम्हारी क्षुधा निवृत्त करूं ॥ १६७ ॥ सहस्रं भरते कश्चिच्छतमन्यो दशापरः । मम त्वकृतपुण्यस्य क्षुद्रस्यात्मापि दुर्भरः ॥ १६८ ॥ कोई सहस्रको, कोई सौको, कोई दशको पालन करताहै अपुण्यकारी मुझ क्षुद्रका शरीर तो एककी तृप्तिके निमित्त भी पूर्ण नहींहै ॥ १६८ ॥ एकस्याप्यतिथेरन्नं यः प्रदातुं न शक्तिमान् । तस्यानेकपरिक्लेशे गृहे किं वसतः फलम् ॥ १६९ ॥ जो एक अतिथिको भी अन्नदेनेकी सामर्थ्य नहीं रखता उसका अनेक क्लेश- -वाले घरमे रहनेसे क्या फलहै ? ॥ १६९ ॥ तत्तथा साधयाम्येतच्छरीरं दुःखजीवितम् । यथा भूयो न वक्ष्यामि नास्तीत्यर्थिसमागमे ॥ १७० ॥ सो इस दुःख जीवित शरीरको इस प्रकारसे साधन करूंगा कि जो फिर अर्थीके समीप मेरे पास कुछ नहीं ऐसा न कहसकू ॥ १७० ॥
( ३४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३४६ ) पञ्चतन्त्रम् । स निनिन्द किलात्मानं न तु तं लुब्धकं पुनः । उवाच तर्पयिष्ये त्वां मुहूर्त्तं प्रतिपालय ॥ १७१ ॥ वह अपनी ही निन्दा करके न कि उस लुब्धककी इस प्रकार वह (कबूतर) लुब्धकसे बोला एक मुहूर्ततक तू ठहर ॥ १७१ ॥ एवमुक्त्वा स धर्मात्मा प्रहृष्टेनान्तरात्मना । तमग्निं सम्परिक्रम्य प्रविवेश स्ववेश्मवत् ॥ १७२ ॥ ऐसा कह वह धर्मात्मा प्रसन्न मनसे उस अग्निकी परिक्रमाकर अपने घरकी समान उसमें प्रवेश करगया ॥ १७२ ॥ ततस्तं लुब्धको दृष्ट्वा कृपया पीडितो भृशम् । कपोतमग्नौ पतितं वाक्यमेतदभाषत ॥ १७३ ॥ तब यह लुब्धक उसको देख कृपासे अत्यन्त पीडितहो अग्निमें गिरते कबूत- रसे यह वचन बोला ॥ १७३ ॥ यः करोति नरः पापं न तस्यात्मा ध्रुवं प्रियः । आत्मना हि कृतं पापमात्मनैव हि भुज्यते १७४ ॥ जो मनुष्य पाप करता है अवश्यही उसको आत्मा प्रिय नहीं है आत्माके लिये पापको आत्माही भोगता है ॥ १७४ ॥ सोऽहं पापमतिश्चैव पापकर्मरतः सदा । पतिष्यामि महाघोरे नरके नात्र संशयः ॥ १७५ ॥ वह मैं पापमति पापकर्ममें सदा रत महाघोर नरकमें पडूंगा इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥ १७५ ॥ नूनं मम नृशंसस्य प्रत्यादर्शः सुदर्शितः । प्रयच्छता स्वमांसानि कपोतेन महात्मना ॥ १७६ ॥ अवश्यही अपना मांस देते हुए इस महात्मा कपोतने मुझ निर्दयीको शिक्षा दी है ॥ १७६ ॥ अद्य प्रभृति देहं स्वं सर्वभोगविवर्जितम् । तोयं स्वल्पं यथा ग्रीष्मे शोषयिष्याम्यहं पुनः ॥ १७७ ॥ आजसे सम्पूर्ण भोगरहित इस देहको गरमीमें थोडे जलकी समान सुखा डालूंगा ॥ १७७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (३४७) शीतवातातपसहः कृशाङ्गो मलिनस्तथा । उपवासैर्बहुविधैश्चरिष्ये धर्ममुत्तमम् ॥ १७८ ॥ शीत वात गरमीका सहनेवाला कृश अंग मलीन मैं अनेक उपवास कर धर्म करूंगा ॥ १७८ ॥ ततो यष्टिं शलाकाञ्च जालकं पञ्जरं तथा । बभञ्ज लुब्धकोपीमां कपोतीञ्च मुमोचह ॥ १७९ ॥ तब वह लुब्धक लकडी शलाका जाल पाँजरा तोडकर उस दीन कपोतीको भी छोड देता हुआ ॥ १७९ ॥ लुब्धकेन ततो मुक्ता दृष्ट्वाग्नौ पतितं पतिम् । कपोती विललापार्त्ता शोकसन्तप्तमानसा ॥ १८० ॥ वह लुब्धकसे छोडी हुई कपोती अग्निमें पतिको गिरा देख शोक सन्ताप मनसे व्याकुल हो विलाप करने लगी ॥ १८० ॥ न कार्यमद्य मे नाथ जीवितेन त्वया विना । दीनायाः पतिहीनायाः किं नार्य्या जीविते फलम्॥१८१॥ हे नाथ ! तुम्हारे बिना मुझे जीनेसे अब काम नहीं है दीन पतिहीन स्त्रीके जीनेसे क्या फल है ? ॥ १८१ ॥ मनोदर्पस्त्वहङ्कारः कुलपूजा च बन्धुषु । दासभृत्यजनेष्वाज्ञा वैधव्येन प्रणश्यति ॥ १८२ ॥ मनका हर्ष, अहङ्कार, बन्धुओंमें कुल गौरव, दास तथा भृत्यजनोंमें आज्ञा यह सब वैधव्य होनेमें नष्ट होजाता है ॥ १८२ ॥ एवं विलप्य बहुशः कृपणं भृशदुःखिता । पतिव्रता सुसन्दीप्तं तमेवाग्निं विवेश सा ॥ १८३ ॥ इस प्रकार बहुत विलाप कर दीन दुखी हो वह पतिव्रता उस प्रदीप्त अग्निमें प्रवेश कर गई ॥ १८३ ॥ ततो दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता । भर्त्तारं सा विमानस्थं ददर्श स्वं कपोतिका ॥ १८४ ॥ तब दिव्य वस्त्र पहरे दिव्य गहनोंसे भूषित वह कपोती विमानमें अपने स्वा- मीको देखने लगी ॥ १८४ ॥
( ३४८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३४८ ) पञ्चतन्त्रम् । सोऽपि दिव्यतनुर्भूत्वा यथार्थमिदमब्रवीत् । अहो मामनुगच्छन्त्या कृतं साधु शुभे त्वया ॥ १८५ ॥ और वह भी दिव्य शरीर हो यथार्थ ऐसा कहने लगा हे शुभे ! मेरे पीछे आई यह तुमने अच्छा किया ॥ १८५ ॥ तिस्रः कोट्योऽर्द्धकोटी च यानि रोमाणि मानुषे । तावत्कालं वसेत्स्वर्गे भर्त्तारं यानुगच्छति ॥ १८६ ॥ साढेतीन करोड जितने रोम मनुष्यके हैं इतने समयतक वह स्त्री स्वर्गमें निवास करती है जो अपने स्वामीके पीछे अनुगमन करती है ॥ १८६ ॥ कपोतदेवः सूर्यास्ते प्रत्यहं सुखमन्वभूत् । कपोतदेहवत्सासीत्प्राक्पुण्यप्रभवं हि तत् ॥ १८७ ॥ वह कपोतदेव सूर्यास्तमें प्रतिदिन सुख अनुभव करता था और वह कपोती पूर्वजन्मके पुण्यप्रभावसे कपोत देहवत् होगई ॥ १८७ ॥ हर्षाविष्टस्ततो व्याधो विवेश च वनं घनम् । प्राणिहिंसां परित्यज्य बहुनिर्वेदवान्भृशम् ॥ १८८ ॥ तब प्रसन्न हो वह व्याधा गहन वनमें प्रवेश करगया । और प्राणीकी हिंसा त्यागन कर बहुत निर्वेदवाला होकर ॥ १८८ ॥ तत्र दावानलं दृष्ट्वा विवेश विरताशयः । निर्दग्धकल्मषो भूत्वा स्वर्गसौख्यमवाप्तवान् ॥ १८९ ॥ वहां दावानल लगी देखकर उसमें प्रवेश करगया और पापरहित होकर स्वर्गका सुख भोगने लगा ॥ १८९ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि- इससे मैं कहता हूं- “श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः । पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ १९० ॥” “सुना है कि, कपोतने शरणमें आये शत्रुको यथायोग्य पूजन कर अपने मांससे निमंत्रित किया ॥ १९० ॥” तत श्रुत्वा अरिमर्दनो दीप्ताक्षं पृष्टवान्-“ एवमवस्थिते किं भवान् मन्यते?” सोऽब्रवीत,-“देव ! न हन्तव्य एवायम्।
भाषाटीकासमेतम् । (३४९) यह सुन अरिमर्दनने दीप्ताक्षसे पूछा- "ऐसा कहनेपर आप क्या मानते हो?"। वह बोला- "देव! इसको मत मारो- यतः- जिससे- या ममोद्विजते नित्यं सा मामद्यावगूहते । प्रियकारक भद्रं ते यन्ममास्ति हरस्व तत् ॥ १९१ ॥ जो निरन्तर मुझसे क्लेश मानती थी वह आज मुझे आलिंगन करती है हे प्रियकारक ! तुम्हारा मगल हो जो मेरा है उसे ग्रहण कर (चोरके प्रति गृहस्थीका वचन है) ॥ १९१ ॥ चौरेण चापि उक्तम्- तब चोरने भी कहा- "हर्त्तव्यं ते न पश्यामि हर्त्तव्यं चेद्भविष्यति । पुनरप्यागमिष्यामि यदीयं नावगूहते ॥ १९२ ॥" तेरे हरने योग्य धनको नहीं देखता हूं जो हरने योग्य होगा तो फिर भी आऊंगा जो यह स्त्री आलिंगन न करेगी ॥ १९२ ॥" अरिमर्दनः पृष्टवान्,-"का च नावगूहते ? कश्चार्यं चौर इति विस्तरतः श्रोतुमिच्छामि"। दीप्ताक्षः कथयति- अरिमर्दन पूछने लगा- "कौन नहीं आलिंगन करती ? कौन यह चोर है ? यह विस्तारसे सुननेकी इच्छा करता हूँ"। दीप्ताक्ष कहने । लगा- कथा ८. अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने कामातुरो नाम वृद्धवणिक्, तेन च कामोपहतचेतसा मृतभार्येण काचिन्निर्द्धनवणिक्- सुता प्रभूतं धनं दत्त्वा उद्वाहिता । अथ सा दुःखाभिभूता तं वृद्धवणिजं द्रष्टुमपि न शशाक । युक्तञ्चैतत्- किसी एक स्थानमे कामातुर नाम वृद्ध वणिक् रहता था, उसने कामसे उपहत चित्त हो भार्याके मृत होजानेसे कोई निर्धन वणिकपुत्री बहुतसा धन देकर विवाही। वह दुःखसे व्याकुल हुई उस वृद्ध वणिकको देखनेको भी समर्थ न हुई। यह युक्तही हे-
( ३५० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३५० ) पञ्चतन्त्रम् । श्वेतं पदं शिरसि यत्तु शिरोरुहाणां स्थानं परं परिभवस्य तदेव पुंसाम् । आरोपितास्थिशकलं परिहृत्य यान्ति चाण्डालकूपमिव दूरतरं तरुण्यः ॥ १९३ ॥ जो कि शिरपर श्वेत बालोंका स्थान है यह पुरुषोंके तिरस्कारका परम स्थान है तरुणी चाण्डालके कूपकी समान आरोपित अस्थिखण्डकी समान उसे त्यागकर चली जाती हैं ॥ १९३ ॥ तथाच- और देखो- गात्रं संकुचितं गतिर्विगलिता दन्ताश्च नाशं गता दृष्टिर्भ्राम्यति रूपमप्युपहंतं वक्त्रञ्च लालायते । वाक्यं नैव करोति बान्धवजनः पत्नी न शुश्रूषते धिक् कष्टं जरयाभिभूतपुरुषं पुत्रोऽप्यवज्ञायते ॥ १९४ ॥ शरीरमें झिल्ली पडी, गति हीन हुई, दांत नाशको प्राप्त हुए, दृष्टि घूमने लगी, रूप नष्ट हुआ, मुखसे लार गिरने लगी, बन्धुजन उसके वचन नहीं मानते तथा पत्नी भी नहीं सुनती । जरासे तिरस्कृत पुरुषको धिक् तथा कष्ट है कि जिसकी पुत्र भी अवज्ञा करता है ॥ १९४ ॥ अथ कदाचित् सा तेन सह एकशयने पराङ्मुखी यावत् तिष्ठति, तावद्गृहे चौरः प्रविष्टः। सा अपि तं चौरं दृष्ट्वा भयव्याकुलिता वृद्धमपि तं पतिं गाढं समालिलिङ्ग। सोऽपि विस्मयात् पुलकांकितसर्वगात्रः चिन्तयामास । "अहो ! किमेषा मामद्य अवगूहते" । यावत् निपुणतया पश्यति, तावत् गृहकोणैकदेशे चौरं दृष्ट्वा व्यचिन्तयत् । "नूनं एषा अस्य भयात् मामालिङ्गति" इति ज्ञात्वा तं चौरमाह- एक समय जब वह उसके साथ एक ही शयनमें मुख फेरे स्थित थी उसके घरमें उस समय चोर घुसा । वह भी उस चोरको देख भयसे व्याकुल चित्त हो उस वृद्धकोही आलिंगन करती हुई । वह भी विस्मयसे सब शरीर पुलकित हो विचारने लगा । "अहो ! आज यह कैसे मुझे आलिंगन करती है" । जब
भाषाटीकासमेतम् । ( ३५१) अच्छी प्रकारसे देखा तो घरके एक कोनेमें चोरको देख विचारने लगा। "अव- श्यही यह इसके भयसे मुझे आलिंगन करती है" ऐसा विचार चोरसे बोला- या ममोद्विजते नित्यं सा मामद्यावगूहते । प्रियकारक भद्रं ते यन्ममास्ति हरस्व तत् ॥ १९५ ॥" जो मुझसे सदा क्लेश मानती थी वह आज मुझे आलिंगन करती है हे प्रियकरनेवाले ! जो मेरा है उसे हरण कर ॥ १९५ ॥" तत् श्रुत्वा चौरोऽपि आह- यह सुनकर चोर भी बोला- हर्तव्यं ते न पश्यामि हर्तव्यं चेद्भविष्यति । पुनरप्यागमिष्यामि यदीयं नावगूहते ॥ १९६ ॥ तेरे हरने योग्य नहीं देखताहू जो हरने योग्य होगा तो फिर आऊंगा जो यह न आलिंगन करेगी ॥ १९६ ॥ तस्मात् चौरस्यापि उपकारिणः श्रेयः चिन्त्यते, किं पुनर्न शरणागतस्य। अपि च अयं तैः विप्रकृतोऽस्माकमेव पुष्टये भविष्यति तदीयरन्ध्रदर्शनाथ चेति। अनेन कारणेन अय- मवध्य" इति। एतदाकर्ण्य अरिमर्दनोऽन्यं सचिवं वक्रनासं पप्रच्छ,-"भद्र ! साम्प्रतमेवं स्थिते किं कर्तव्यम् ?" सोऽ- ब्रवीत,-" देव ! अवध्योऽयम् । यतः- इस कारण उपकारी चोरका भी मगल विचारा जाता है फिर शरण आयेका तो क्या । और फिर यह उनसे तिरस्कृत हुआ हमारी पुष्टिके निमित्त ही होगा उसका रन्ध्र दिखानेको । इन कारणोंसे यह अवध्य है"। यह सुनकर अरिमर्दन दूसरे मन्त्री वक्रनाससे पूछने लगा- "भद्र ! इस स्थितिमें क्या करना चाहिये" वह बोला-"यह अवध्य है । क्यों कि- शत्रवोऽपि हितायैव विवदन्तः परस्परम् । चौरेण जीवितं दत्तं राक्षसेन तु गोयुगम् ॥ १९७॥" परस्पर विवाद करते हुए शत्रुभी हितके निमित्त होते हैं चोरने जीवन और राक्षसने दो गौ दीं ॥ १९७ ॥
( ३५२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३५२ ) पञ्चतन्त्रम् । अरिमर्दनः प्राह,-“कथमेतत् ?” वक्रनासः कथयति- अरिमर्दन बोला,-“यह कैसे ?” वक्रनास कहने लगा- कथा ९. अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने दरिद्रो द्रोणनामा ब्राह्मणःप्रति- ग्रहधनः सततविशिष्टवस्त्रानुलेपनगन्धमाल्यालङ्कारताम्बू- लादिभोगपरिवर्जितः प्ररूढकेशश्मश्रुनखरोमोपचितः शीतो- ष्णवातवर्षादिभिः परिशोषितशरीरः । तस्य च केनापि यजमानेन अनुकम्पया शिशुगोयुगं दत्तम्। ब्राह्मणेन च बाल- भावात् आरभ्य याचितघृततैल्यवसादिभिः संवर्द्धय सुपुष्टं कृतम् । तच्च दृष्ट्वा सहसा एव कश्चित् चौरः चिन्तितवान्, “अहमस्य ब्राह्मणस्य गोयुगमिदमपहरिष्यामि” । इति निश्चित्य निशायां बन्धनपाशं गृहीत्वा यावत् प्रस्थितःताव दर्द्धमार्गे प्रविरलतीक्ष्णदन्तपङ्क्तिः उन्नतनासावंशो प्रकट- रक्तान्तनयन उपचितस्नायुसन्ततिर्नतगात्रः शुष्ककपोलः सुहु- तहुतवहपिङ्गलश्मश्रुकेशशरीरः कश्चित् दृष्टः । दृष्ट्वा च तं तीव्रभयत्रस्तोऽपि चौरोऽब्रवीत्-“को भवानिति ?”स आह- “सत्यवचनोऽहं ब्रह्मराक्षसः । भवान् अपि आत्मानं निवेद- यतु”सोऽब्रवीत्-“अहं क्रूरकर्मा चौरः। दरिद्रब्राह्मणस्य गोयुगं हर्तुं प्रस्थितोऽस्मिः” । अथ जातप्रत्ययो राक्षसोऽब्रवीत्- “भद्र ! षष्ठान्हकालिकोऽयं, अतः तमेव ब्राह्मणमद्य भक्षयि- ष्यामि । तत् सुन्दरमिदमेककार्यों एव आवाम्” । अथ तौ तत्र गत्वा एकान्ते कालमन्वेषयन्तौ स्थितौ । प्रसुप्ते च ब्राह्मणे तद्भक्षणार्थं प्रस्थितं राक्षसं दृष्ट्वा चौरोऽब्रवीत्-“भद्र ! नैष न्यायः, यतो गोयुगे मया अपहृते पश्चात् त्वमेनं ब्राह्मणं भक्षय " । सोऽब्रवीत्-“ कदाचिदयं ब्राह्मणो गोशब्देन बुध्येत, तदा अनर्थकोऽयं मम आरम्भः स्यात्” । चौरोऽपि अब्रवीत्-“तव अपि यदि भक्षणाय उपस्थितस्यान्तर एकोपि
भाषाटीकासमेतम् । (३५३)
अन्तरायः स्यात् तदाहमपि न शक्नोमि गोयुगमपहर्तुम् । अतः प्रथमं मया अपहृते गोयुगे पश्चात् त्वया ब्राह्मणो भक्ष- यितव्यः” । इत्थं च अहमहमिकया तयोर्विषदतोः समुत्पन्ने द्वैधे प्रतिरववशाद् ब्राह्मणो जजागार। अथ तं चौरोऽब्रवीत्- “ब्राह्मण ! त्वामेव अयं राक्षसो भक्षयितुमिच्छति”। राक्षसो- ऽपि आह-“ब्राह्मण ! चौरोऽयं, गोयुगं ते अपहर्तुमिच्छति”। एवं श्रुत्वा उत्थाय ब्राह्मणः सावधानो भूत्वा इष्टदेवतामन्त्रा- ध्यायेन आत्मानं राक्षसाद् उद्गूर्णलगुडेन चौरात् गोयुगं ररक्ष। अतोऽहं ब्रवीमि- किसी स्थानमें दरिद्र द्रोणनाम ब्राह्मण प्रतिग्रह मात्र जीविकावाला निरन्तर श्रेष्ठ वस्त्रानुलेपन गंध माला अलकार ताम्बूलादि भोगसे हीन बढेहुए केश दाढी मूछ नखरोमसे युक्त शीत उष्ण वात वर्षासे शोषित शरीर था । उसको किसी यजमानने कृपाकर दो बछडे दिये । ब्राह्मणने उन दोनो बछडोंको बाल्यक- पनसेही मागे हुए घी तेल घास आदिसे बढाकर पुष्ट किया । उनको देख सह- साही कोई चोर विचारने लगा—“मैं इस ब्राह्मणके दोनो बछडे चुराऊगा” । ऐसा विचार रात्रिमें बन्धनरज्जु लेकर जब चला तब तक आधे मार्गमें पृथक् तीक्ष्ण दांतोंकी पंक्तिवाला, ऊंचे नासिका वशसे युक्त, उज्ज्वल लाल नेत्र, पुष्ट हैं नाडीसमूह जिसका ऐसा, नत शरीर, सूखे कपोल, सम्यक् हुत हुए अग्निके सदृश पिङ्गल दाढी मूछों और शरीरवाला कोई देखा । देखतेही उसको बडे भयसे व्याकुल हुआभी चोर बोला,—“तुम कौनहै ?” वह बोला—“मैं सत्य वचन ब्रह्मराक्षस हू । तुमभी अपनेको कहो”। वह बोला--“मैं क्रूर कर्मा चोर हूं। दरिद्र ब्राह्मणके दो बैल चुराने जाता हूं”। तब विश्वासको प्राप्तहो राक्षस बोला- “भद्र ! मैं छठे समय भोजन करनेवाला हू । इस कारण आज उसी ब्राह्मणको भक्षण करूंगा । यह अच्छी बात है जो हम तुम दोनो एकही कार्यमें हैं” । तब वे दोनो वहा जाकर एकान्तमें समय देखते स्थित रहे । ब्राह्मणके सोनेपर उसके भक्षणके निमित्त जाते हुए राक्षसको देखकर चोर बोला,—“भद्र ! यह न्याय नहीं है । जो कि मेरे बैलोंको हरण करनेके पीछे तुम इस ब्राह्मणको भक्षण २३
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( ३५४ ) पञ्चतन्त्रम् । कर जाना"। वह बोला—"जो यह ब्राह्मण गोके शब्दसे जाग जाय तो यह मेरा आरम्भ अनर्थक होजायगा"। चोर बोला,—"यदि तुम्हारे भक्षणमें कोई विघ्न उपस्थित होजावे तो मैं भी दोनो बछडोंके हरणको समर्थ न हूूंगा। तब पहले मेरे गोयुगके हरण करनेके पीछे तुम ब्राह्मणको भक्षण करना"। इस प्रकार मैं पहले मैं पहले ऐसे परस्पर विवाद करते उन दोनोंके केलश उत्पन्न होनेमें शब्द होनेके कारण ब्राह्मण जाग उठा। तब उससे चोर बोला—"ब्राह्मण ! यह राक्षस तुझे खानेकी इच्छा करता है" राक्षस बोला,—"ब्राह्मण ! यह चोर तेरे दोनो बछडे चुराना चाहता है" यह सुनकर ब्राह्मण उठ सावधान हो इष्ट देव- ताके मन्त्र उच्चारणसे अपनेको राक्षससे और लकडी उठाकर चोरसे दोनो बछडोंकी रक्षा करता भया। इसमें मैं कहता हूं— "शत्रवोऽपि हितायैव विवदन्तः परस्परम् । चौरेण जीवितं दत्तं राक्षसेन तु गोयुगम् ॥ १९८ ॥" "परस्पर विवाद करते शत्रुभी हितके निमित्त होते हैं चोरने जीवित और राक्ष- सने इस प्रकार दो बछडे दिये ॥ १९८ ॥" अथ तस्य वचनमवधार्य अरिमर्दनः पुनरपि प्राकार- कर्णमपृच्छत्,—"कथय किमत्र मन्यते भवान् ?" सोऽब्रवीत्, "देव ! अवध्य एवायं, यतो रक्षितेन अनेन कदाचित् पर- स्परप्रीत्या कालः सुखेन गच्छति। उक्तञ्च— तब उसके वचनको सुन अरिमर्दन फिर प्राकारकर्णसे पूछने लगा—"कहो तुम इसमें क्या मानते हो ?" वह बोला,—"देव ! यह अवध्य है। जो इसकी रक्षा करनेसे कदाचित् प्रीतिसे सुखसे समय बीतेगा। कहा है— परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः । त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ १९९ ॥ जो प्राणी परस्पर एक दूसरेके मर्मकी रक्षा नहीं करते वह वल्मीकिके और पेटके भीतर सर्पकी समान नष्ट होते हैं ॥ १९९ ॥ अरिमर्दनोऽब्रवीत्,—"कथमेतत् ?" प्राकारकर्णः कथयति- अरिमर्दन बोला,—"यह कैसे ?" प्राकारकर्ण कहता है—
कथा १०.
भाषाटीकासमेतम्। ( ३५१ ) कथा १०. अस्ति कस्मिंश्चिन्नगरे देवशक्तिर्नाम राजा, तस्य च पुत्रो जठरवल्मीकाश्रयेण उरगेण प्रतिदिनं प्रत्यङ्गं क्षीयते। अनेकोपचारैः सद्वैद्यैः सच्छास्त्रोपदिष्टौषधयुक्त्यापि चिकि- त्स्यमानो न स्वास्थ्यमाप्नोति। अथ असौ राजपुत्रो निर्वे- दात् देशान्तरं गतः। कस्मिंश्चिन्नगरे भिक्षाटनं कृत्वा महति देवालये कालं यापयति। अथ तत्र नगरे बलिर्नाम राजा आस्ते, तस्य च द्वे दुहितरौ यौवनस्थे तिष्ठतः। ते च प्रतिदिवसमादित्योदये पितुः पादान्तिकमागत्य नमस्कारं चक्रतुः। तत्र च एका अब्रवीत्,-"विजयस्व महाराज यस्य प्रसादात् सर्वं सुखं लभ्यते"। द्वितीया तु,-"विहितं भुङ्क्ष्व महाराज!" इति ब्रवीति। तच्छ्रुत्वा प्रकुपितो राजा अब्रवीत्,-"भो मन्त्रिन् ! एनां दुष्टभाषिणीं कुमारिकां कस्यचिद् वैदेशिकस्य प्रयच्छत येन निजविहितामियमेव भुङ्क्ते"। अथ तथेति प्रतिपद्य अल्पपरिवारा सा कुमा- रिका मन्त्रिभिः तस्य देवकुलाश्रितराजपुत्रस्य प्रतिपादिता। सा अपि प्रहृष्टमानसा तं पतिं देववत् प्रतिपाद्य आदाय च अन्यविषयं गता। ततः कस्मिंश्चिद्दूरतरनगरप्रदेशे तडा- गतटे राजपुत्रमावासरक्षायै निरूप्य, स्वयं च घृततैललवण- तण्डुलादिक्रयनिमित्तं सपरिवारा गता। कृत्वा च क्रयवि- क्रयं यावदागच्छति, तावत् स राजपुत्रो वल्मीकोपरि- कृतमूर्धा प्रसुप्तः। तस्य च मुखात् भुजगः फणां निष्क्राम्य वायुमश्नाति। तत्र एव च वल्मीकेऽपरः सर्पो निष्क्रम्य तथा एव आसीत्। अथ तयोः परस्परदर्शनेन क्रोधसंरक्तलो- चनयोः मध्यात् वल्मीकस्थेन सर्पेण उक्तं,-"भोभो दुरात्मन्! कथं सुन्दरसर्वाङ्गं राजपुत्रमित्थं कदर्थयसि!" मुखस्थोऽहिर- ब्रवीत्,-"भो भोः ! त्वया अपि दुरात्मना अस्य वल्मीकस्य मध्ये कथमिदं दूषितं हाटकपूर्णं कलशयुगलम्" इति।एवं पर-
( ३५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
स्परस्य मर्माणि उद्घाटितवन्तौ। पुनः वल्मीकस्थोऽहिरब्रवीत्- “भो दुरात्मन् ! भेषजमिदं ते किं कोऽपि न जानाति। यत् जीर्णोत्कालिकातिक्राराजिकापानेन भवान् विनाशमु- पयाति” । अथ उदरस्थोऽहिरब्रवीत्-“ तवापि एतद्भेषजं किं कश्चिदपि न वेत्ति ? यत् उष्णतैलेन वा महोष्णोदके- न तव विनाशः स्यादिति ” । एवञ्च सा राजकन्या विटपान्तरिता तयोः परस्परालापान् मर्ममयान् आक- र्ण्य तथा एव अनुष्ठितवती । विधाय अव्यङ्गं नीरोगं भर्तारं निधिश्च परममासाद्य स्वदेशाभिमुखं प्रायात् । पितृमातृस्वजनैः प्रतिपूजिता विहितोपभोगं प्राप्य सुखेन अवस्थिता। अतोऽहं ब्रवीमि-
किसी नगरमें देवशक्ति नामवाला राजा रहता था उसका पुत्र उदररूप (१) वल्मीकमें रहनेवाले सर्पसे प्रतिदिन प्रत्यंगसे दुबला होता था, अनेक उपायोंसे सवैद्यों द्वारा सच्छास्त्रोंमें कही औषधीसे युक्तभी चिकित्सा करा हुआ स्वस्थ- ताको न प्राप्त होता । तब यह राजपुत्र निर्वेदसे देशान्तरको गया किसी एक नगरमें भिक्षाटन कर बडे देवालयमें समय बिताता था । उस नगरमे बलिनाम राजा है उसकी दो कन्या जवानथीं । वो प्रतिदिन सूर्योदयमें पिताके निकट आकर नमस्कार करती हुईं । उनमेंसे एक बोली-“महाराजकी जय हो । जिसके प्रसादसे सब सुख प्राप्त होता है” । दूसरी-“महाराज ! अपने कर्मसे उत्पन्न हुआ भोगो,” ऐसा बोली । यह सुन क्रोध कर राजा बोला,-“भो ! मन्त्रिन् इस दुष्ट बोलनेवाली कुमारिकाको किसी विदेशी पुरुषको दे दो । जिससे अपना किया हुआ यही भोगे” । तब “बहुत अच्छा” कहकर थोडी सखियोंके सहित वह कुमारी मत्रियोंने उस देवमंदिरमें रहनेवाले राजपुत्रको देदी । वह भी प्रसन्नमनसे उस पतिको देववत् प्राप्त हो लेकर और देशको गई । तब किसी अत्यन्त दूर नगर देशमें सरोवरके तट राजपुत्रको स्थान- रक्षाके लिये नियुक्तकर स्वयं घी तेल लवण तण्डुलादिक लेनेके निमित्त परिवार सहित गई । क्रय विक्रय कर जब आने लगी तबतक वह राजपुत्र वल्मीकके-
१ उसके पेटमें सर्प रहताथा ।
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ऊपर शिर धरकर सो गया । उसके मुखसे सर्प फण निकालकर वायुभक्षण करता था । उसी बॉवईसे दूसरा सर्प निकल कर भी इसी प्रकार करता । तब उनके परस्पर दर्शनसे क्रोधसे लाल नेत्र कर वल्मीकमे स्थित सर्पने कहा- "भो भो दुरात्मन् ! किस प्रकार सर्वांगसुन्दर इस राजपुत्रको क्लेश देता है ?" मुखमें स्थित सर्प बोला,- "भो ! भो ! तुम दुरात्माने भी इस वल्मीकके मध्यमें किस प्रकार यह सुवर्णसे पूर्ण दो कलश दूषित किये हैं ?" इस प्रकार परस्पर दोनों भेद खोलते भये । फिर वल्मीकमे स्थित सर्प बोला,- "भो दुरात्मन् ! यह तेरी औषधी क्या कोई नहीं जानता है ? जो कि पुरानी आलोड़ित राजकां- जीके पानसे तू नाशको प्राप्त होगा" । तब वह मुखके भीतरका सर्प बोला- "क्या तेरी यह औषधी कोई नहीं जानता है ? जो गरम जल वा गरमतेलसे तेरा नाश होगा" । इस प्रकार वह राजकन्या वृक्षकी ओरसे उन दोनोंके पर- स्पर भेदके वचन सुनकर, वैसाही करती हुई अव्यंग और निरोग स्वामीको करके परम धनको प्राप्त हो अपने देशको चली । पिता माता सुजनोंसे पूजित हो यथेच्छ भोगोंको प्राप्त होकर सुखसे रही । इससे मैं कहता हू- परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः । त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ २०० ॥” जो प्राणी परस्परमर्मोकी रक्षा नहीं करते हैं वह वल्मीक और उदरके सर्पकी समान नष्ट होते हैं ॥ २०० ॥” तच्च श्रुत्वा स्वयमरिमर्दनोंऽपि एवं समर्थितवान् । तथाच अनुष्ठितं दृष्ट्वान्तर्लीनं विहस्य रक्ताक्षः पुनरब्रवीत्,- “कष्टम् ! विनाशितोऽयं भवद्भिः अन्यायेन स्वामी ! उक्तञ्च- यह सुनकर स्वयं अरिमर्दन भी इस बातको पुष्ट करता हुआ इस प्रकार ( शरणागत रक्षा ) के अनुष्ठानको देखकर अस्पष्ट स्वरसे हँसकर रक्ताक्ष फिर बोला, - "कष्ट है कि तुमने अन्यायसे स्वामीका नाश किया । कहा है- अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यानान्तु विमानना । त्रीणि तत्र प्रवर्त्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ॥ २०१ ॥ जहा अपूज्य पूजे जाते हैं पूज्योंका निरादर होता है वहा तीन होते हैं दुर्भिक्ष, मरण और भय ॥ ३०१ ॥
( ३५८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ३५८ ) पञ्चतन्त्रम् । तथाच- और देखो- प्रत्यक्षेऽपि कृते पापे मूर्खः साम्ना प्रशाम्यति । रथकारः स्वकां भार्या सजारां शिरसाऽऽवहत् ॥२०२॥” प्रत्यक्ष दोष होनेपर भी ( पापीकी ) विनयसे मूर्ख शान्त होता है रथकारने अपनी भार्याको जारसहित शिरपर उठाया ॥ २०२ ॥” मन्त्रिणः प्राहुः-“कथमेतत् ?” रक्ताक्षः कथयति- मंत्री बोले,-“यह कैसे ?” रक्ताक्ष कहता है- कथा ११. अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने वीरधरो नाम रथकारः, तस्य भार्या कामदमनी । सा च पुंश्चली जनापवादसं- युक्ता । सोऽपि तस्याः परीक्षणार्थं व्यचिन्तयत् ।-“अथ मया अस्याः परीक्षणं कर्त्तव्यम् । उक्तञ्च यतः- किसी एक स्थानमें वीरधर नामवाला बढई रहता है । उसकी भार्या काम- दमनी । वह व्यभिचारिणी लोकापवादसे युक्तथी । वह भी उसकी परीक्षा कर- नेका विचार करताथा कि “किस प्रकारमें इसकी परीक्षा करूं । कहाहै- यदि स्यात्पावकः शीतः प्रोष्णो वा शशलाञ्छनः । स्त्रीणां तदा सतीत्वं स्याद्यदि स्याद्दुर्जनो हितः ॥२०३॥ यदि अग्नि शीतल होजाय वा चन्द्रमा गरम होजाय वा दुर्जन हित होजाय तो स्त्रियोंके सतीपनका विश्वास हो ॥ २०३ ॥ जानामि च एनां लोकवचनात् असतीम् । उक्तञ्च- लोकप्रवादसे मैं इसको असती जानता हूं । कहा है- यन्न वेदेषु शास्त्रेषु न दृष्टं न च संश्रुतम् । तत्सर्वं वेत्ति लोकोऽयं यत्स्याद्ब्रह्माण्डमध्यगम् ॥ २०४ ॥ जो वेदशास्त्रमें न देखा न सुना है और जो कुछ इस संसारके मध्यमें स्थित है उसको स्त्री लोक सब जानते हैं ॥ २०४ ॥ एवं सम्प्रधार्य भार्यामुवोचत्-“प्रिये ! प्रभातेऽहं ग्रामा- न्तरं यास्यामि । तत्र कतिचिद्दिनानि लगिष्यन्ति । तत